Monday, May 18, 2026

व्यंग्य: जीजा ने सपने में छेड़ा था

 

                                            





एक मशहूर शेर है:

 

                   क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए

                   हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का

 

ये जो सपने हैं ये बहुत ज़ालिम होते हैं। ना ये सोने देते हैं ना ये शांति से जीने देते हैं। बस सपने में दम होना चाहिए उस से कहीं ज्यादा सपने देखने वाले में दम होना चाहिए। एक कहावत है 'सपने सच नहीं होते उन्हें सच करना पड़ता है'। अर्थात उसके लिए बहुत मेहनत करनी होती है तब कहीं जाकर सपने सच होते हैं। एक सूबे में आधी रात को सोते-सोते साली साहिबा जाग गईं और लगी चीखने-चिल्लाने। किस्सा कोताह ये कि साली साहिबा ने रोते-रोते आरोप लगाया कि जीजा जी ने उसे छेड़ा और 'मिसबिहेव' किया। इतना सुनना था कि बीवी ने ही पुलिस को फोन कर दिया। वो अपने पति को अच्छे से जानती थी। लो जी पुलिस आ गयी। मगर ये क्या ? जीजा जी तो फरार हो गये। जिसे पुलिस छेड़ने पर आ जाये वह कितनी देर तक बचता फिरेगा? पुलिस ने जीजा को पकड़ ही लिया। जीजा जी की किस्मत! पुलिस ने फिर जीजा जी को, जी भर के छेड़ा, और ऐसा-ऐसा 'मिसबिहेव' किया जितना जीजा ने साली को भी न छेड़ा था। जीजा थे  एयरफोर्स में। सो खबर सुनते ही लंबी जेल /केस हो गया।  इस चक्कर में नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा।

 

ऐसे केस लंबे चलते हैं। ये केस भी खूब ही चला। जीजा जी को पक्का पता था कि बड़ी मुश्किल है बाबा।  नौकरी तो जानी ही जानी है जेल और सज़ा अलग। तारीख पे तारीख मिलती गई। सच तो ये है कि भले नाबालिग सही, जीजा जी की नियत डोली तो जरूर थी। अब वो नाबालिग बालिग हो अपने जीवन में ठीक-ठाक सैटल थी। उसे जीजा पर दया आ गयी। आखिर अपनी खुद की बहन के घर का सवाल था। मराठी में एक जुमला है ‘नको दाजिबा’ हंसी-ठिठोली में साली जीजा को कह रही है ‘ना जीजा’ मुझे लगता है वकील से सलाह कर के और अपनी जीजी के घर का ख्याल रखते हुए साली ने जो बयान दिया वह चौंकाने वाला था। साली ने अदालत में कह दिया "मी लॉर्ड ! मुझे भ्रम हुआ था। दरअसल जीजा ने मुझे छेड़ा जरूर था मगर सपने में। ख्वाब में छेड़ा था, मैं डर गयी, बाली उम्र मेरी! मैं भला क्या जानूं ख्वाब और असलियत में अंतर। वो उम्र ही ऐसी होती है कहाँ किसको होश रहता है मी लाॅर्ड ये सपना है या हक़ीक़त। मेरे आदरणीय जीजा जी ने मुझे सपने में छेड़ा, मैं डर गयी। मेरी ख्वाब में ही चीख निकल गयी। जिसे सुनकर घरवाले इकट्ठे हो गए और ये सारा कांड हो गया। जीजा से ये पूछो ये मेरे सपने में क्या कर रहे थे ?" जीजा कह रहा है "भई ! सपना तेरा, तू डिसाइड कर क्या देखना है क्या नहीं" मी लॉर्ड! भी सारा माजरा समझ गए। आखिर उन्होंने इस दु:स्वप्न को अंत करने का डिसाइड किया और मामला रफा-दफा कर दिया। ये मामला लीगल से ज्यादा मामला ख्वाब का निकला।

 

                                ज़िंदगी ख्वाब है!

                                ख्वाब में सच है क्या

                                और भला झूठ है क्या

व्यंग्य: आओ कॉकरोच कॉकरोच खेलें !

 


      ये जो तिलचट्टा है उसी को अंग्रेजी में कॉकरोच कहते हैं। यह लगभग-लगभग हर घर में पाया जाता है। कभी किचन में कभी बाथरूम में। कई बार यह आपके 'लिविंग रूम' और 'कोर्ट यार्ड' में भी दिख जाता है। यह एक शाश्वत प्राणी है। ये था, है और रहेगा। कहते हैं 320 मिलियन साल पहले से कॉकरोच हमारे साथ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि परमाणु बम से दुनिया नष्ट भी हो जाती है तो भी कॉकरोच जीवित रहेगा, देखी है ऐसी जिजीविषा किसी और में ? आपने गौर से देखा हो तो इसके आगे मुंह के पास दो डंक जैसे एंटीना लगे होते हैं जो हरदम हिलते से नज़र आते हैं गोया कि एंटीना सक्रिय है। ऐसा कहा जाता है  ‘दि मीक शैल इन्हेरिट दि अर्थ’। गोया कि जब कोई नहीं रहेगा तब भी 'एक्स-पार्टे' स्टे के चलते हमारा कॉकरोच रहने वाला है। कोई कुछ भी कहे एक औसत कॉकरोच बस छह माह से एक बरस तक जीता है और उतने में ही तबाही मचा देता है। वह एक 'एक्साइटिंग' जीवन जीता है, जितना भी जीता है। मज़े की बात ये है कि उसे कोई डिग्री  नहीं लेनी पड़ती।

 

कोई मेरे दफ्तर में मुझ से मिलने आया। मुझे खबर दी गई कि दो कॉकरोच मुझ से मिलने आए हैं। पता चला वे आर.टी.आई. वाले थे। उन्होने बताया  "जी! आर.टी.आई. का जो 'टी' है वो हमारा ही परिचय है 'टी' बोले तो तिलचट्टा।  पता नहीं आपने 'कॉकरोच-सिंड्रोम' सुना है कि नहीं। कहते हैं अगर आपको एक कॉकरोच दिख जाये तो यह मान लीजिये कि वह अकेला नहीं बल्कि आस-पास ही उनकी पूरी की पूरी कॉलोनी है। सुना है कॉकरोच के राजा ने एक सभा बुलाई है यह जानने को कि ये क्या 'भानगढ़' चल रेली है?

 

अब भर्ती के विज्ञापन आया करेंगे। जैसे आपने सिक्यूरिटी गार्ड्स के विज्ञापन देखे होंगे। फलां दफ्तर में सौ कॉकरोच की आवश्यकता है। एक अच्छी बात ये है कि कॉकरोच को कोई 'नीट' एक्जाम नहीं देना पड़ता नहीं तो बेचारे छोटे से जीवन में कितना कुछ सहना पड़ता। न उनके लिए कोई स्कूल-कॉलेज है ना कोई यूनिवर्सिटी। अब चारों ओर कॉकरोच ही कॉकरोच नज़र आएंगे। उनके लिए मल्टीप्लेक्स होंगे, उनके लिए मॉल हुआ करेंगे। रेस्टोरेंट और होटल पर तो पहले ही उनका कब्जा है। फिल्मे भी उनके लिए बना करेंगी। 'दिलवाले कॉकरोच ले जाएँगे', 'कॉकरोच फाइल्स' और गीत भी उनके लिए बनाए जाएँगे। 'अंखियों के झरोखे से देखा जो सांवरे मुझे कॉकरोच नज़र आए', 'कोई चप्पल से न मारे कॉकरोच को'

 

एक बात और है कॉकरोच को करेंसी नोटों से कोई लेना-देना नहीं अतः रुपया पैसा रखने में उनका विश्वास ही नहीं। दीमक नोट खा जाते हैं पर कॉकरोच तो वह भी नहीं खाता। लोग नाहक ही काॅकरोच को बुरा भला कहते हैं। कॉकरोच 'ह्यूमन-फ़्रेंडली' है। मनुष्य नाम की प्रजाति अपने को कितना ही फन्ने खां समझे वे आयेंगे-जायेंगे। कॉकरोच परमानेंट है। वह था, वह है और रहेगा।  आप कॉकरोच को ‘विश-अवे’ नहीं कर सकते। कॉकरोच को ‘को-एक्ज़िस्ट’ करना आता है फिर चाहे आदमियों के साथ रहना हो, कीड़े-मकौड़ों- दीमकों के साथ।

 

                   जब तक सूरज चांद रहेगा

                  काॅकरोच तेरा नाम रहेगा

Friday, May 15, 2026

व्यंग्य: पेपर लीक होने के फायदे

  

                           

     पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ मीडिया में फुल-फुल बावेला मचा हुआ है कि पेपर लीक हो गया-पेपर लीक हो गया। कहीं कहीं तो किसी ने पूरी लिस्ट ही बना दी है कब- कब कौन सा पेपर लीक हुआ। कितने लाख अभ्यर्थियों का नुकसान हुआ वगैरा वगैरा। आपने वो कहावत नहीं सुनी कि हर काम में कुछ न कुछ फायदा (पाॅज़िटिव) भी होता है। आप लोगों की नज़र उस पर जाती ही नहीं। आँखों को 'निगेटिव' देखने की बुरी आदत हो गई है। आप को चाँद का उजला पक्ष दिखता ही नहीं या फिर दिखता भी है तो आप उसे स्वीकार नहीं करते। पर्चा बनाना अर्थात प्रश्नपत्र सेट करना कोई आसान काम नहीं है। आग का दरिया है और डूब के जाना है। आप सोचो अगर पेपर सेट करना आग का दरिया है तो उसे लीक करना किसी ज्वालामुखी से कम नहीं। लेकिन वो कहते हैं न खतरों के खिलाड़ी ही ज़ंग में फतह पाते हैं। 


      यह बहुत क्लिष्ट प्राॅसिजर है। देखिये जो पेपर सेट कर रहा है या तो आप उसे सेट करो। उसका तोड़ गवर्नमेंट ने ये निकाला कि कई पेपर सेटर चुन कर उन से 10-10, 20-20 सवाल सेट करा लेते हैं। फिर सबको मिक्स करके जितने सवाल चाहिए ले लेते हैं। इसमें एक परेशानी यह है की अब कई सारे पेपर सेटर को सेट करना आसान काम नहीं। उनमें कोई न कोई ऐसा सिरफिरा निकल आता है जो अड़ जाता है। इस एक ईमानदार की वजह से पूरा प्रोजेक्ट खतरे में आ जाता है। अतः बेहतर विकल्प ये है कि फ़ोटोस्टेट वाले को या फिर पूरी श्रंखला में किसी न किसी को तोड़ना पड़ता है जैसे प्यून, दफ्तरी या बाबू को। कई बार लालची अथवा तुरंत अमीर बनने की चाह रखने वाला या फिर रिटायर होने वाले अफसर भी सहयोग करते हैं। इसमें बंदे को हिन्दी फिल्म की के लड़की के बाप की तरह कहना पड़ता है “इस चेक में जो रकम चाहो भर लो और पेपर की एक कॉपी यहाँ रख कर देश छोड़ कर चले जाओ” या फिर "इस सूटकेस में इतनी रकम है कि तुम्हारी सात पीढ़ी को काफी होगी" यह करोड़ों का खेल है। फिर इस पेपर की मार्कीटिंग करनी पड़ती है। बहुत से लोग इसे इनवेस्टमेंट की तरह लेते हैं। दोनों, पेपर बेचने वाला भी और पेपर खरीदने वाला भी। 


देखिये अगर पेपर लीक नहीं होता तो आप पास कैसे हो पाते?  और जैसे-तैसे पास हो भी जाते तो फिर जानलेवा पढ़ाई और फीस। इनसे बच पाना मुश्किल है। 'लोन' लेने में और फिर उसे चुकाने में न जाने कितने जोड़ी जूते-चप्पल घिस जाते। एक बार पेपर लीक हो जाता है फिर आप भी विकल्प ढूँढने में लग जाते हो। बड़े बड़े आविष्कार 'क्राइसिस' में ही हुए हैं। आप बड़े लोगों की आत्मकथा पढ़ोगे तो ऐसी सैकड़ों कहानियों से भरी पड़ी हैं कैसे उनके माँ-बाप उन्हें कुछ बनाना चाहते था मगर वो बन कुछ और गए। वे कैसे बहुत सफल रहे। आपने वो सुना नहीं जो मन का हो जाये तो अच्छा न हो तो और भी अच्छा। क्यों कि यह नियति द्वारा आपको परोसा गया है उसकी इज्ज़त करें। पेपर लीक बहुत अच्छी चीज़ है। इससे न जाने कितनों की ज़िंदगी सँवर जाती है। अतः इस पेपर लीक को दिल पर न लें। हमारे देश में डॉ. का क्या काम ?, इंजीनियर का क्या काम? हम तो वैसे ही विश्वगुरु हैं। पेपर लीक कर-कर के हम तीसरे या चौथे नंबर पर तो आ ही गए हैं। अब क्या पेपर लीक नहीं कर के फिसड्डी बनना चाहते है? आप टेंशन क्यूँ ले रहे हो? खुली डिग्री बिक रही हैं एक पकड़ लीजिये सौदा खरा-खरा। प्रेक्टिस चालू कर दो बाकी जीना-मरना तो ईश्वर हाथ है। लीक हमारा राष्ट्रीय पर्व है। हमारी छतें लीक करती हैं, हमारी बड़ी से बड़ी इमारत लीक करती है। हमारे पुल लीक करते हैं। हमारे एयरपोर्ट लीक करते हैं। हमारी ट्रेन लीक करतीं हैं। हमारे नल बंद होने के बावजूद लीक करते हैं। हमारी फ्लश की टंकी लीक करती है। बाॅल पेन आने से पहले हमारे फाउंटेन पेन भी लीक करते थे। हमारे दफ्तरों में तो न जाने क्या-क्या लीक होता है। बोले तो डिसीजन लीक हो जाता है। फाइल किसके पास है ये बात लीक हो जाती है। पेपर कौन सेट कर रहा है ये लीक हो जाता है। आजकल बॉस के कौन ज्यादा मुंह लगा हुआ है, ये लीक हो जाता है। यहाँ तक कि किसका चक्कर किसके संग है ये बात पूरे दफ्तर में लीक हो जाती है। अतः लीक को इतना सीरियसली नहीं लेना है। वीर तुम बढ़े चलो !! लीक तो होता ही रहेगा। इसके लिए कोई 'एम-सील' नहीं चली है। इस लीक के साथ जीना जितना जल्दी हो सीख लेना चाहिए। ज़िंदगी एक ज़ंग है। मत भूलो कि आप वाॅरियर हैं बोले तो योद्धा। सच तो यह है कि तुरंत  प्रभाव से हमें ज़रुरत है एन.एल.ए. की। नहीं समझे ? नेशनल लीक एजेन्सी।

Thursday, May 14, 2026

व्यंग्य : कितना नीट है ये नीट

     



     इधर नीट का विज्ञापन निकलता है उधर जितने भी 'डार्क' और ओपन दुनिया के 'नीट' और 'नाॅट सो नीट' लोग इकट्ठे हो स्ट्रेटेजी बनाते हैं। जैसे कंपनियों के एजेंट होते हैं उसी तरह इनके एजेंट नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे जाकर इच्छुक उम्मीदवारों को उम्मीद दिलाते हैं और वो भी एक निश्चित रकम ले कर। वो और भी बड़ी उम्मीद इन उम्मीदवारों के अभिभावकों को पकड़ाते हैं कारण कि असली फाइनेंसर तो वो ही होते हैं। उन्हें बहुत रोज़ी-रोज़ी पिक्चर दिखाई जाती है। वो आनन-फानन में जो भी तय रकम है वह इन एजेंट्स को दे देते हैं। ज्यादा हील-हुज्जत की ज़रूरत नहीं पड़ती है। कौन अभिभावक नहीं चाहता कि उनका बालक अच्छे से कॉलेज से डॉक्टरी पास करे और जल्दी से जल्दी आवश्यक/अनावश्यक ऑपरेशन करना शुरू करे। 


ये अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा होती है। अतः जब-जब इनका पेपर लीक होता है, जो कि अब अक्सर होने लगा है, तो बयानबाजी भी अखिल भारतीय स्तर की होती है। मसलन, एक नेता जी का कहना है कि ये अगर लीक होनी ही थी तो पहले हो जाती ताकि बच्चों को निराशा न होती। तो एक का कहना है कि बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होतीं रहती हैं। एक ने तो ये तक कह दिया कि ऐसे डॉ. जो पैसे देकर प्रश्नपत्र खरीद रहे हैं वो किस किस्म के डॉ. बनेंगे? अब इस बात पर डिबेट की जा सकती है। बहरहाल, पेपर लीक तो हो गया। यह एक प्रकार से सरकार के लिए विन-विन सिचुएशन है। अगर परीक्षा सफलता पूर्वक हो जाती है तो देखो हमारा सिस्टम हमने इतने साल में पहली बार इतने केंडीडेट्स को लेकर परीक्षा सफलता पूर्वक करा दी। अगर पेपर लीक हो जाये तो देखो हमने तुरंत इसका संज्ञान लिया और तुरंत परीक्षा रद्द कर दी। हमें अपनी नई पीढ़ी का कितना ख्याल है। जो इस लेन-देन में करोड़ों रुपये का खेल हुआ ? भाई पैसा क्या है ? हाथ का मैल है। किसी किसी जगह साल-छह महीने में आपको बनी बनाई डॉ. की डिग्री पकड़ा दी जाती है। धीरे- धीरे विश्वगुरु की छवि के अनुकूल भारत की सभी डिग्रीज़ को अंतर्राष्ट्रीय जगत 'डीरिकाॅग्नाइज़' कर देगा। आप कहेंगे आप भारत से आठवीं पास है तो वे अपने देश का पाँचवीं का इम्तिहान लेंगे तब घुसने देंगे। इसी प्रकार आप कहेंगे आप भारत से ग्रेजुएट हैं तो वो आपका आठवीं का इम्तिहान लेंगे। आपने कहीं एम. ए. बोल दिया तो वे आपकी दसवीं की परीक्षा लेना चाहेंगे। हम सनातनी हैं। हमारी शानदार परंपरा रही हैं। हम ढाई अक्षर प्रेम का पढ़ कर पंडित हो जाते हैं। आप ये बेकार कागज की डिग्री के पीछे बावले हो रहे हैं। असली ज्ञान-ध्यान पर आपकी नज़र ही नहीं जा रही। ऐ परीक्षा योद्धाओ !  अब समय आ गया है कि इस परीक्षा, इस पढ़ाई-लिखाई को भस्म कर दो, नष्ट कर दो, नेस्तो-नाबूद कर दो। इसने आखिर दिया क्या है आपको। ये डिलिवरी बॉय का काम, ये कांवड़िए का काम, ये जुलूस और रैली के लिए अथवा पाँच किलो अनाज के लिए किसी पढ़ाई-लिखाई की ज़रूरत नहीं। जो राम को भजै सो राम का होय। क्या कबीर किसी यूनिवर्सिटी में गए थे? क्या तुलसीदास किसी आई.आई. टी. के प्रोडक्ट थे ? क्या के. आसिफ ने एम.बी.ए. किया था ? ये अंग्रेज़ी शिक्षा ने हम सबको तबाह कर दिया है। आर्थिक और मानसिक रूप से खोखला कर दिया है। बस रट लो और रट के इम्तिहान पास कर लो। इतने इंजीनियर साल-दर-साल निकल रहे हैं इनके बनाए पुल और सड़क देखे हैं आपने ? इतने डॉ सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों से निकल मार्किट में आ रहे हैं। उनसे ज्यादा नयी-नयी बीमारियाँ मार्किट में आ रहीं हैं ? सबका ध्येय एक ही है सब अपनी फीस और डोनेशन का पैसा जल्द से जल्द आप ही से ले लेना चाहते हैं। तभी न आपके 36 तरह के टेस्ट, बात-बात में स्टेंट लगाने, ऑपरेशन करने, सीजेरियन करने और आपको सीधे सीधे वेंटिलेटर पर रख देने की बात करते हैं। वह दिन दूर नहीं जब आप डॉ को कहें कि आपको खांसी जुकाम है और अगला आपको वेंटिलेटर पर रख दे।     

               

    यूं देखा जाये तो आज की तारीख में ऐसा क्या है जो वेंटिलेटर पर नहीं रखा हुआ ?

Wednesday, May 13, 2026

व्यंग्य : बारिश ! बारिश ! भाग जाओ

 

                                     


 

एक सूबे के वज़ीरे-तालीम ने यह ऐलान  किया है कि ये अंग्रेजों ने अपनी संस्कृति भारत पर लादने के लिए अपनी ऊटपटाँग कवितायें (पोयम्स) हमारे छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाने लगे। इससे उनके कोमल मन को, इस तरह से शुरू से प्रभावित कर दिया गया। बल्कि कहना चाहिए ज़हर भर दिया। ये सारी की सारी कवितायें हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराओं और सनातन के अनुकूल नहीं हैं। उल्टे हमारे नन्हें-मुन्ने बच्चों को भारतीयता से विमुख कर रही हैं। चलिये देखते हैं कैसे हमारे बच्चों को बचपन से ही झूठ बोलना, मिथ्या आचरण करना, चोरी चकारी करना यहाँ तक कि कर्तव्य से मुंह मोड़ना और मक्कारी सिखाई जाने लगी। उसी का अंजाम है ये आज की पीढ़ी। अब समय आ गया है कि ऐतहासिक भूल को करेक्ट किया जाये। और फिर अगर हम करेक्ट नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

 

 

1.       अब आप देखिये इस नर्सरी राइम को "रेन रेन गो अवे... कम एनोदर डे ...लिटल जॉनी वांट्स टू प्ले"। देखिये इसमें जॉनी को स्वार्थी दिखाया गया है। इस जॉनी के बच्चे को किसानों का कोई ख्याल ही नहीं है। आखिर किसान हमारा अन्नदाता है। इस सबके बावजूद ये छोकरा जॉनी, जो है सो, रेन से कह रहा है कि तुम चली जाओ मुझे खेलना है। यह हमारी संस्कृति नहीं। उल्टे हमें स्वार्थी होना सिखाती है। इसे तुरंत प्रभाव से हटाया जाना चाहिये।

2.       ये जॉनी जो है सो ऐसा लगता है जैसे इसका निर्माण भारत की संस्कृति को करप्ट करने के लिए ही हुआ है।  इस राइम में जब जॉनी से पूछा गया "जॉनी! जॉनी! ईटिंग शुगर ?" ...वह यद्यपि शुगर खा रहा है और उसके मुंह में  शुगर अभी है भी इस सब के बावजूद वह सफ़ेद झूठ बोलता है "नो पापा"। ये तो जब उससे कहा जाता है "ओपन योअर माउथ" तब वह चोरी पकड़े जाने पर और कोई चारा न देख हँसने लगता है "हा...हा...हा..."

3.       एक और राइम है जो रंगभेद (एपर्थिड) की समर्थक मालूम देती है। पहली लाइन में ही "बा बा ... बा बा ब्लैक शीप..." देखने वाली बात ये है कि ये भेड़ काली ही क्यूँ चुनी गयी है। जबकि भेड़ तो सफ़ेद/भूरी/ब्राउन भी होती है। यह हम अफ्रीकन और भारतीयों के लिए अपमानजनक है चाहे कितने ही अप्रत्यक्ष रूप से क्यों न हो। इसी राइम में एक पंक्ति आती है "वन फॉर माई डेम..." अब यह क्या है? किसी की बहन-बेटी को "डेम" कहना और वो भी "माई डेम" कहना? तौबा! तौबा!

4.       इसी श्रंखला में एक और कविता आती है जो अंग्रेजों ने हमारे समाज में फैलाई है और उसके माध्यम से हमारी मर्यादाओं को भंग करने का प्रयास किया है। "जैक एंड जिल वेंट अप दि हिल"। अब हमारे समाज में इस तरह लड़का-लड़की पहाड़ पर अकेले नहीं भेजे जाते। ये पानी-वानी भरने का काम लड़कियों और महिलाओं के जिम्मे है। फिर वो चाहे कुएं से लाना हो, नदी हो, तालाब से लाना हो। हमारे यहाँ पहाड़ पर चढ़ कर पानी लाने का रिवाज नहीं के बराबर है। वही बात हुई दोनों फिसल गए और गिर पड़े चोट लगी सो अलग। उसी के अनुरूप आज भी जब कहीं 'वेलेंटाइन डे' पर ये जैक एंड जिल दिख जाते हैं तो दोनों की खूब पिटाई करते हैं।

5.       इस तरह अंत में एक और कविता है "ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार ...लाइक ए डायमंड" ... हमारी सनातन संस्कृति कहती है कि सिंपल जीवन जीना है। 'डिटेचमेंट' रखना है। रूखा-सूखा खाना है। किन्तु यहाँ बच्चा, जो है सो, अपने यथार्थ से कटा हुआ दिखाया गया है। वह दिवास्वप्न ले रहा है। वह तारों की तुलना हीरे से कर रहा है। यह सरासर सांसारिक प्रवृति है। यह विलासिता है और कुछ नहीं। बच्चा बचपने से ही हीरे जवाहरात की बात कर रहा है। आगे जाकर यह क्या बनेगा बताने की ज़रूरत नहीं।

 

अतः ये कुछ उदाहरण इसलिए दिये गए हैं कि जब आँख खुले तभी सवेरा है अतः ये जितनी भी अंग्रेज़ी की राइम/कवितायें है वह हमारी संस्कृति के खिलाफ हैं। इनसे जल्द से जल्द छुटकारा पा लेना चाहिए। इन्हें रिप्लेस करना है मंत्रों से, आरती से, श्लोकों से, चौपाइयों से।

शुभस्य शीघ्रम।

व्यंग्य : औपनिवेशिक दौर के सभी निशान मिटाने हैं

 

                                         


 

सच भी है मिटाने ही चाहिए। जब तक ये निशान रहेंगे हमें याद दिलाते रहेंगे और शर्मिंदा कराते रहेंगे कि देखो पुल इसको कहते हैं, सड़क इसको कहते हैं, इमारत इस को कहते हैं जो सैकड़ों बरसों से ज्यों की त्यों खड़ी हैं। एक तुम्हारे बनाए पुल, इमारतें और सड़कें हैं जो इतने हफ्ते या महीने भी नहीं चलते। अब क्यों कि हम हार्डिंग ब्रिज सा या उससे बेहतर ब्रिज बना नहीं सकते अतः हमने क्या काम किया हार्डिंग ब्रिज पर अपनी नेम प्लेट लगा दी और खबर छाप दी आज से हमने इस औपनिवेशिक निशान को मिटा दिया है। खबरदार जो किसी ने इसे हार्डिंग ब्रिज कहा। आज से यह तिलक ब्रिज होगा। हमारा अपना देसी तिलक ब्रिज। हालांकि केवल बोर्ड हमारा है जिस पर हमने तिलक ब्रिज लिखा है।

 

यही हाल हुआ है औपनिवेशिक निशान मिटाने के नाम पर कर्ज़न रोड के बोर्ड को बदल हमने कस्तूरबा गांधी मार्ग कर दिया। बस पेंट-ब्रश का खर्चा पड़ा। रोड तो वही है। फ्लोरा-फाउंटेन का नाम कर दिया हूतात्मा चौक। दिल्ली में अनेक स्टेचू अंग्रेजों के लगे थे। सबको उखाड़ कर एक जगह कोरोनेशन पार्क में खड़ा कर दिया। दिल्ली साफ कर दी। दुनिया में कोई सबसे आसान काम है तो वह है नाम बदलने का। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आ जाता है।

 

अब इसी श्रंखला में यह तय पाया गया है कि रेलवे से भी औपनिवेशिक निशान मिटाये जाएँगे। ये निशान भी तो बड़े जिद्दी किस्म के हैं 1853 से लगे हैं। मिटाते मिटाते टाइम लगेगा। अतः एक तो ये है कि आप बार-बार हम को ही चुन कर भेजें ताकि हम ये सारे निशान मिटा सकें। यूं अंग्रेज़ जो सिस्टम छोड़ कर गये सारे आज भी वही हैं। सिग्नल को सिग्नल ही कहते हैं ट्रेन ही कहते हैं। पदनाम भी वही हैं जो अंग्रेज़ दे गए थे। मुसीबत ये है कि ये रेल चलाई ही अंग्रेजों ने थी। अब या तो पूरी की पूरी रेल ही खत्म कर दो तब मिटेंगे ये औपनिवेशिक निशान नहीं तो कैसे मिट पाएंगे। एक बाबरी मस्जिद ढहा देने से मुस्लिम आक्रांताओं की विरासत खत्म नहीं हो पाएगी। हमें ताजमहल, लाल क़िला, जामा मस्जिद, और दुनिया भर की दरगाह-मकबरे मिटाने होंगे। उसी तरह औपनिवेशिक निशान मिटाने को हमें, क्या इंडिया गेट, क्या गेटवे ऑफ इंडिया, क्या राष्ट्रपति भवन, क्या वी.टी. क्या चर्चगेट सब को ढहा कर दुबारा अपने देसी अंदाज में चीजें बनानी होंगी।

 

रेल से औपनिवेशिक निशान मिटाने का मतलब समझ रहे हैं आप ? पूरी की पूरी रेलवे ही खत्म करनी होगी कारण की पूरी की रेलवे ही औपनिवेशिक है। देसी है तो यात्रियों की टोली देसी है जो बेटिकट चलने में गर्व महसूस करती है। देसी हैं तो चोर, उचक्के, जेबकतरे, उठाईगीरे देसी हैं। देसी है तो दुर्घटनाएं देसी हैं। देसी है तो वे अभागे यात्री देसी हैं जो आज भी गिर कर या पटरी पार करते मरते हैं। और अगर देसी है तो वो बलास्ट (पत्थर की गिट्टक) है जो पटरी के दोनों ओर बिछी रहती है जिस पर चढ़ कर 'लपका' लोग आपके मोबाइल को छीन लेते हैं।

व्यंग्य : सफ़ेद तौलिया और भारतीय नौकरशाही

                                                       


 

      भारतीय नौकशाही और सफ़ेद तौलिया का चोली- दामन बोले तो तौलिया-दामन का साथ है। यदि आपकी चेयर पर सफ़ेद तौलिया का खोल नहीं चढ़ा है तो आप खाक सीनियर अफसर हैं। सीनियाॅरिटी के सुखद एहसास का नाम ही सफ़ेद तौलिया है। सफ़ेद तौलिया के आपकी चेयर से लिपटे - चिपटे रहने के अनेकानेक अर्थ हैं। ये ऐसे ही है जैसे मंदिर में आप अपने दैनिक वस्त्रों को थोड़ी देर को त्याग कर दर्शन करते हैं। उसी तरह आपने क्या पहना है यह बेमानी है। आपकी चेयर पर यह सफ़ेद तौलिया  कवच-कुंडल का काम करती  है। यह आपकी सफेदपोशी का प्रतीक है। शुभ्र-धवल। सफ़ेद रंग शांति का प्रतीक है। शांति से सब ले-दे कर शांति पूर्ण ढंग से निपटा लिया जाये।  राका शांति...वनस्पति शांति। कभी हमारे घर में महज़ एक तौलिया होता था/होती थी। पूरा घर उसी से बदन पोंछता था। फिर धीरे-धीरे हम दूसरी -तीसरी तौलिया एफोर्ड करने लायक हुए तो घर के एक-एक सदस्य पर दो-दो तौलिया हो गईं। इस तौलिया ने स्वदेसी स्वापी/गमछे का बहुत नुकसान किया है। वो तो भला हो इन पाॅलिटिकल पार्टीज़ और इन सेना और दल वालों का कि अब गले में पटका/गमछा पहनने लगे हैं लोग।

 

 मैं कल्पना भी नहीं कर सकता कि इस सफ़ेद तौलिया के आविष्कार से पहले लोग अपना जीवन यापन कैसे करते थे। बोले तो चेयर पर क्या बिछाते थे। यूं सफ़ेद तौलिया नहीं तो क्या बिछाना क्या ओढ़ना। एक नौकशाह सभ्य कहलाया ही तब जब बगुले सा श्वेत वर्णीय तौलिया का आवरण उसकी चेयर पर आ लगा। जिसने भी यह प्रथा चलाई उस दूरदर्शी महापुरुष को कोटि-कोटि धन्यवाद। इस सफ़ेद तौलिया के बल-बूते पर कितनों के काम सर हो रहे हैं। क्या बाबू, क्या अफसर, क्या देखने वाला, क्या चेयर वाला क्या तौलिया वाला, क्या तौलिया धो कर भक्क सफ़ेद करके देने वाला, क्या तौलिया बदलने वाला, यूं समझिए इस सफ़ेद तौलिया के अकेले के दम पर एक पूरी मानव श्रंखला रोजगार पर लगी हुई है। 

 

सफ़ेद तौलिया के बारे में एक बहुत बड़ा सवाल यह है कि इस सफ़ेद तौलिया को बदलने की आवृति क्या रहेगी? क्या हफ्ते में एक बार या हफ्ते में दो बार या फिर दो हफ्ते में एक बार। नौकशाही का सबसे बड़ा पहलू है उसका पिरामिडी होना अतः बिना सीनियर - जूनियर आप नौकशाही की कल्पना नहीं कर सकते। एक कहावत भी है न कि नौकरशाही में कोई किसी का साथी नहीं होता, या तो आप सीनियर हैं या जूनियर हैं। इसी तर्ज़ पर तौलिया के बदलने का क्रम है। तौलिया के सभी पहलुओं को यह सीनियाॅरिटी-जूनियाॅरिटी ही कमांड करती है। अतः जहां सीनियर की तौलिया एक हफ्ते में दो बार बदली जाया करेगी वहीं जूनियर की दो हफ्ते में एक बार बदली जाएगी। उससे जूनियर की बदली ही नहीं जाएगी क्यों कि उसे साल में एक तौलिया मिलेगी। उसका ज्यादा तौलिया-तौलिया खेलने का दिल कर रहा है तो अपने घर से अपना तौलिया लाये। कोई हरकत नहीं। तौलिया, सीनियर को फुल बड़े, बोले तो सुपर साइज़ की मिलेगी। जिसे वक़्त ज़रूरत वह ओढ़ भी सके अथवा छापा-वापा पड़ने की स्थिति में मुंह ढाँप सके। जबकि जूनियर की तौलिया साइज़ में छोटी रखी जाएगी। तौलिया की एक खास आदत है कि यह अपनी जगह से खिसकती बहुत है। बिलकुल नवविवाहिता के पल्लू की तरह। नवविवाहिता इसीलिए कहा कि जो जूनी-विवाहिता (पुरानी-विवाहिता) हैं वहाँ पल्लू नहीं है। बल्कि ड्रेस है वो भी उस तरह की जिसमें पल्लू चुन्नी-दुपट्टे का काम ही नहीं।  अतः इस तौलिया को खिसकने से बचाने के लिए 'वेलक्रो' लगाने का रिवाज है। कहते हैं कि इन्टरनेशनल ड्रग डीलर पैब्लो ऐस्कोबार के यहाँ नोटों की गड्डी बांधने को करोड़ों रुपये के रबर-बैंड लग जाते थे। कुछ कुछ इसी तर्ज़ पर ये छोटे-बड़े तौलिया, उनकी रख-रखाव, अलमारियां, धोने, कलफ लगाने वाले और वेलक्रो का खर्चा भी अगर करोड़ों में नहीं तो लाखों में तो जरूर है।

 

तो हुज़ूर देखा आपने ऐसी ग़रीबपरवर है ये नौकरशाह की चेयर पर लगी सफेद तौलिया।

 

व्यंग्य : आवभगत जन-प्रतिनिधि की

 

                                     


 

 

    एक मशहूर शेर है:  

     

                               लोग हो गए हैं बेपरवाह या अब इश्क़ नहीं करते

                              क्यूँ अब मुहब्बत में कोई बदनाम नहीं होता

 

 

एक सूबे में ये नौबत क्यूँ कर आन पड़ी कि एक सरकारी हुक़्मनामा निकालना पड़ा कि जब भी जन-प्रतिनिधि (सोचो! नेता कहना अब गाली सा हो गया है अतः यह नया नामकरण है) आपके दफ़्तर पधारें आपको खड़े होकर इनका स्वागत करना है पूरे सम्मान के साथ। एक सीरीज़ में प्रसिद्ध संवाद था हमारी मम्मी को चाहिए फुल इज्ज़त ये पंडिताईन क्या होता है बे?” अतः मॉरल ऑफ दि स्टोरी यह है कि जन-प्रतिनिधि भले कहता फिर कि वह फलां बिरादरी, फलां समाज का है और एकछत्र नेता है आपको उसे जन-प्रतिनिधि मानना है और फुल फुल इज्ज़त देनी है। अब सोचो! इतने पर ही बस नहीं है बल्कि उन्हीं पानी भी पिलाना है। और फिर आग्रह पूर्वक उन्हें बिठाना, ठंडा गरम देना है और फिर कहीं जाकर खुद बैठना है।

 

अब इसमें दो बातें हैं। यह ठंडे-गरम जलपान की तफ़सील और मिल जाती तो काम आसान हो जाता। अक्सर यह देखने में आया है कि जन प्रतिनिधि के साथ जो अशिष्ट किस्म के लठैत लोग शिष्टमंडल का हिसा बन घुस आते हैं उनका सारा ध्यान समोसा, बर्फी और पकौड़ों पर होता है और उसी में उनकी अनर्जी काम पर लग जाती है। अब क्यूँ कि बात पानी की ही आई है कि वह आग्रहपूर्वक पिलाना है अतः ऐसा मालूम देता है कि बाकी जलपान वैकल्पिक है। आपकी इच्छा हो तो दें नहीं तो पानी पिला कर ही टाटा-बाय-बाय कर दें यद्यपि आपको दोनों बार खड़ा होना है 'एक तेरे आने से पहले एक तेरे जाने के बाद' । उन्हें और प्रतिनिधिमंडल को लगना चाहिए कि फुल फुल इज्ज़त मिली।

मुझे यह समझ नहीं लगी कि आखिर इस जन-प्रतिनिधि की परिभाषा में कौन-कौन लोग आएंगे। मसलन मंत्री, सांसद, एम.एल.ए. भर या फिर ग्राम प्रधान, सरपंच, सरपंच पति, पार्षद और नामांकित लोग बाग भी आएंगे ? रेजीडेंट सोसायटी के अध्यक्ष ? उनका ? उनका क्या? उन्हें पानी पिलाना है अथवा नहीं ? वे तो बेचारे मिलते ही पानी की समस्या को लेकर हैं। आपने गौर किया इस ऑर्डर में ज़िक्र केवल जन-प्रतिनिधियों को ‘आग्रहपूर्वक पानी पिलाने’ का है यह कतई नहीं है कि आपको उनका काम भी करना है। अतः यही पेच है। समझो अगले ने पानी तो आग्रहपूर्वक पिला दिया, बढ़िया क्वालिटी का जलपान भी करा दिया मगर काम के नाम पर ठन-ठन गोपाल, तब ? तब की कोई बात इस आदेश में नहीं है। उसके लिए इंतज़ार करें अगले आदेश का। अभी चुनाव में वक़्त है।

 

व्यंगय : स्पॉट हुईं सिने तारिका

                                        


  

    एक हैडलाइन है सोहा अली खान बांद्रा में स्पॉट हुईं। मैं सोच रहा हूँ क्या बांद्रा में उन्हें जाना नहीं चाहिए था ? और यदि जाना चाहिए था तो स्पॉट नहीं होना चाहिए था? स्पॉट तो वो होते हैं जो तेज़ी से 'एक्सटिंक्ट' हो रहे हैं या हो गए हैं। रिपोर्टर कहना क्या चाहता है? क्या ये कि सबसे पहले उसने सोहा जी को पहचान लिया और फोटो खींच लिया। मैं सोहा अली खान का फैन नहीं। अलबत्ता उनकी माँ का फैन जरूर रहा हूँ। अब भी हूं। मेरा ये लेख दरअसल सोहा अली खान के बारे में नहीं उस पत्रकार के बारे में है जिसने सोहा अली खान को ‘स्पॉट’ किया वो भी बांद्रा में। इस पर कोई पुरस्कार तो बनता है।

 

क्या सोहा अली खान के फैन ये जानने में रुचि रखते होंगे कि वो आजकल कहाँ घूम-फिर रही हैं। या फिर उनके बांद्रा वाले फैन यह सुन कर सिर धुनेंगे कि लो सोहा अपुन के बांद्रा में आई और एक हम अभागे हैं जो न देख पाये, न सेल्फ़ी ले पाये। अब ऑटोग्राफ लेने का रिवाज तो खत्म सा ही हो गया। अब तो सीधे सेल्फ़ी का चलन है। क्या रिपोर्टर महोदय देश को ये बताना चाह रहे थे कि देखो सोहा भी हमारी-तुम्हारी तरह बांद्रा 11-40 की फास्ट लोकल लेकर जाती है। लेडीज कोच में भी सीट नहीं मिलती कितनी गर्दी है रे बाबा।

 

क्या सोहा को बांद्रा में जाना वर्जित है। यदि नहीं तो फिर ये खबर कैसे हुई ? हो सकता है वो जगह-जगह स्पॉट हो रही थीं। क्या कोलबा, क्या मीरा रोड, क्या नेरुल, क्या कल्याण। किन्तु-परंतु वे बांद्रा में अभी तक स्पॉट नहीं हो पायी थीं। जैसे होता है न फलां बाघ, फलां मोर या फलां किस्म की बिल्ली जो भारत में दुर्लभ है वह बांद्रा में स्पॉट हो गयी। मैं समझता हूँ कि अब सोहा जी ने तो कहा नहीं होगा कि मैं बांद्रा जा रही हूँ वहाँ मिलना और ये हैडिंग देना ‘बांद्रा में स्पाॅट हुईं सोहा अली खान' गोया कि चाँद जो बांद्रा में दिखाई नहीं दिया करता था वह दृष्टिगोचर हो गया है। अब बांद्रा के लोगों के ऊपर है कि वे इस राष्ट्रीय महत्व के समाचार/सूचना का कैसे उपयोग करते हैं। बेचारे ग़रीब रिपोर्टर का काम था ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। बांद्रा वालो ! अब तुम्हारी बारी है। ये रोज़ रोज़ नहीं होता कि बांद्रा में सोहा स्पॉट हो। अब वो स्पॉट हो गईं हैं और सदैव-सजग रिपोर्टर ने अपनी जान पर खेल कर यह समाचार आप तक पहुंचाया है। कहीं आपने कभी भी देखी है ऐसी 'इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग' ? अब वो दिन दूर नहीं जब मेरे भारत महान की रैंकिंग विश्व प्रेस फ़्रीडम में नंबर एक हो जाएगी। थैंक यू रिपोर्टर जी। थैंक यू सोहा जी! थैंक यू कुणाल जो आपने सोहा जी को बांद्रा में स्पॉट होने दिया। खेमू भाऊ संभाल के, अगला नंबर आपका लग सकता है। अब समय आ गया है कि आप भी कहीं सांताक्रूज, विले पार्ले या दादर में स्पॉट हो जायें। एक जोक है कि एक दोस्त दूसरे दोस्त से कह रहा था कि मैंने कल एक चीता को स्पॉट किया ( आई स्पाॅट्ड ए चीता) दोस्त ने कहा चल झूठे ! चीता तो नैचुरली स्पाॅट्ड ही आते हैं) अब रिपोर्टर भी बेचारा क्या करे वह भी तो यही चाहता है कोई उसे स्पॉट करे ताकि जीवन में कुछ तरक्की कर सके। आखिर वो कब तक बांद्रा में सोहा को स्पॉट करता फिरेगा उसको भी हक़ है एक अदद अपना ए.सी. केबिन और अपने लिये डीसेंट पैकेज स्पॉट कर सके।

Sunday, April 26, 2026

भारतीय रेल : साहित्य से सिनेमा तक

 

    

पहले पहल जब भारत में रेल चलना शुरू हुई तब क्या अधिकारी क्या सुपरवाइज़र सभी अंग्रेज़ ही होते थे। धीरे-धीरे रेल नेटवर्क के विस्तार के साथ इसमें एंग्लो इंडियंस और पारसियों को जगह मिलनी शुरू हुई। इसका एक बड़ा कारण था उनकी अँग्रेजी भाषा पर अपेक्षाकृत बेहतर पकड़ और उनका अँग्रेजी  रहन-सहन। लेकिन वे थे कर्मचारी स्तर पर ही। यथा टी.टी., गार्ड, ए.एस.एम. इंजन ड्राइवर आदि। प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड ने अपने एक चाचा का ज़िक्र किया है जो दिल्ली स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।

 

यदि आप साहित्य के फ़लक पर देखेंगे तो पाएंगे क्या गीतकार शेलेन्द्र क्या गुलशन बावरा क्या आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जिनके नाम से एक पूरा युग ही हिंदी साहित्य में दिवेदी युग कहलाता है. वे मध्य रेलवे, तब की जी.आई.पी. रेलवे में कार्यरत थे. अजमेर, बम्बई, नागपुर के अलावा वे झांसी डी.एस. ऑफिस ( डिस्ट्रिक्ट सुपरिटेंडेंट ) वर्तमान डी.आर.एम. ( डिवीजनल रेलवे मैनेजर) के कार्यालय में मुख्य लिपिक थे. सीनियर से अन-बन के कारण नौकरी छोड़ हिंदी की फुल टाइम  सेवा में जुट गये। 


दरअसल तब दो तीन ही विभाग थे जिसमें बम्पर नौकरियों की गुंजायश थी। एक मिलिटरी जिसमें जाने के नाम से ही परिवार में रोना-धोना शुरू हो जाता था दूसरे रेलवे और तीसरा डाक विभाग। 



कुछ प्रमुख लोग जो भारतीय फिल्मी दुनिया और साहित्य को रेलवे की देन है:


1. बीना राय (कृष्णा सरीन)  पिता पश्चिम रेलवे में स्टोर्स ऑफिसर (IRSS

2. शैलेंद्र माटुंगा रेलवे वर्क शॉप में मकेनिक (वैल्डर)      

3. ओम पुरी पिता जालंधर में रेलवे के स्टोर्स विभाग में  

4. डेविड पिता इंजन ड्राइवर  

5. गिरीश कार्नाड बड़े भाई मध्य रेलवे में चीफ इंजीनियर (IRSE)  

6. नूतन ससुर रेलवे में महाप्रबंधक/रेलवे स्टाफ कॉलेज के प्रथम प्रिंसिपल  

7. वी शांताराम जी आई पी (मध्य रेल) में टी एक्स आर स्टाफ               

8. ई. बिलीमोरिया          जी आई पी (मध्य रेलवे) में फायरमैन  

9. राज बब्बर              पिता टूंडला (उत्तर रेलवे) में टी एक्स आर स्टाफ  

10. गुलशन बावरा          पश्चिम रेलवे मुंबई  में गुड्स क्लर्क  

11. बासु चटर्जी             पिता रेलवे वर्कशॉप अजमेर में  

12. शेख मुख्तार            पिता रेलवे पुलिस में  

13. विमल मित्रा            ट्रेन कंट्रोलर दक्षिण पूर्व रेलवे में  

14. वीना                       पिता रेलवे में  

15. भप्पी सोनी             पूर्व टिकट कलेक्टर     

16. के पी सक्सेना          कहानीकार, संवाद/स्क्रिप्ट लेखक स्टेशन अधीक्षक  

17. शीला  (मलयालम)      पिता रेलवे में  

18. सी रामचंद               पिता मध्य रेलवे में स्टेशन मास्टर   

19. ऋषिकेश मुखर्जी       ससुर रेलवे में महाप्रन्धक (ए के मुखर्जी)   

20. मौसमी चटर्जी           पिता रेलवे में (कोलकाता)  

21. के एल सहगल           मुरादाबाद उत्तर रेलवे में टाइम कीपर   

22. रंगनाथ (तेलुगू)          चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी  टी.टी. विजयवाड़ा   

23. रघुनाथ रेड्डी (तेलुगू)     चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी  

24. बालचन्द्र मेनन निर्देशक  पिता दक्षिण रेलवे में स्टेशन मास्टर  

25. खराज मुखर्जी (बंगला अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी  

26. नागेश (तमिल अभिनेता)     पूर्व रेलकर्मी  

27. वीनू चक्रवर्ती (अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी  

28. अलेक्स (तमिल) गोल्डन रॉक वर्क शॉप के स्टोर्स विभाग में  

29. विजयन     निर्देशक (तमिल) गोल्डन रॉक वर्कशॉप  

 30. शिखा स्वरूप       पिता उत्तर रेलवे के स्टोर्स विभाग में  

31. जॉर्ज बेकर  असमिया/बंगलाअभिनेता उत्तर-सीमांत रेलवेपी.डब्लू.आई.  

32. सोहराब मोदी    (पिता जयपुर/रतलाम/अलवर) में रेलवे इंजन ड्राइवर  

33. नज़ीर हुसैन           पिता रेलवे लखनऊ में गार्ड  

34. राशिद खान          वडोदरा स्टेशन पर  

35. इंद्रजीत सिंह तुलसी (गीतकार) लॉ ऑफिसर पश्चिम रेलवे   

36. आदेश श्रीवास्तव         पिता जबलपुर में टी एक्स आर  

37. मिलिंद सोमन         पूर्व टिकट कलेक्टर  

38. पलाश सेन            पिता उत्तर रेलवे में डॉक्टर 

39. उत्तम मोहंती       (उडिया फिल्म) पिता खड़कपुर में गुड्स क्लर्क  

40. सुमा (तेलुगू)         पिता दक्षिण मध्य रेलवे में कार्यरत  

41. बुद्ध देब दासगुप्ता    (बंगला निर्देशक) पिता दक्षिण पूर्व रेलवे   

42. सुरोजीत चटर्जी     पूर्व अधिकारी दक्षिण पूर्व रेलवे   

43. मालविका तिवारी     पिता रेलवे अधिकारी  

44. आयशा धाड़कर    दादा रेलवे में अधिकारी ( IRAS)  

45. नागभूषण      (तेलुगू)  गुंटकल में पूर्व बुकिंग क्लर्क  

46. ज़रीना वहाब     पिता राजमुन्दरी में गार्ड  

47. महमूद जूनियर   पिता पश्चिम रेलवे में  

48. गजराज राव       पिता उत्तर रेलवे में  

49. लिलेट दूबे               पिता गोविंद केसवानी रेलवे में इंजीनियर  

50. डॉ जब्बार पटेल        निर्देशक  पिता दौंड में चीफ यार्ड मास्टर  

51. शांता आप्टे           पिता मध्य रेलवे के सोलापूर में स्टेशन मास्टर  

52. राजीव मेनन          फिल्म निर्माता भाई करुणाकर मेनन (IRAS)  .

53. रलल्पलली नरसिम्हा राव   दक्षिण मध्य रेलवे के स्टेटिक्स विभाग में  

54.  ऐरिका लाल  वक़्त फिल्म पर्दे पर ‘आगे भी जाने न तू’ पिता रेलवे में मकेनिकल ऑफिसर  

55. प्रेम ऋषि         अभिनेता ड्राइंग ऑफिस पश्चिम रेलवे मुंबई  


इसके अलावा क्या भगवती चरण वर्मा, क्या मुंशी प्रेम चंद क्या के पी सक्सेना इन लोगों ने भी भारतीय फिल्मों से किसी न किसी रूप जुड़ाव रखा है। के पी सक्सेना तो रेलवे से ही थे। जबकि मुंशी प्रेम चंद और भगवती चरण वर्मा की पुस्तकों पर फिल्म बनी। पंडित चंद्र धर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पर भी फिल्म बनी। 


हिन्दी फिल्मों मे यह आम दृश्य होता था जिसमें रेल किसी न किसी रूप मे अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराती रही है। या तो हीरो खुद या कोई न कोई रेलवे मे कार्यरत  दिखाया जाता था। नायक ट्रेन मे चढ़ रहा है या उतर रहा है या फिर हीरोइन साथ में ही यात्रा कर रही होती थी। 


न जाने कितने ही गीत रेल मे, रेल के ऊपर, रेल के इंजन मे फिल्माए गए। किसी दुखियारे या दुखियारी को ख़ुदकुशी करनी हो तो रेल, विलेन की मनपसंद जगह रेल की पटरी होती थी जहां वह किसी न किसी को पटरी से बांध देता था।  


कितनी ही फिल्मों के टाइटल तक रेलवे के इर्द गिर्द घूमते हैं मसलन फ़्रंटियर मेल, पंजाब मेल, तूफान मेल। रेलवे प्लेटफॉर्म, बनिंग ट्रेन, चेन्नई एक्स्प्रेस, एक चालीस की लास्ट लोकल, दि ट्रेन, भवानी जंक्शन, रेल का डिब्बा, हाफ टिकट, लास्ट ट्रेन फ्राम बॉम्बे, डिकेन क्वीन, बॉम्बे मेल।  

असल में भारतीय रेलवे आम जन-जीवन से इतनी जुड़ी हुई है कि यह किसी न किसी रूप में आपके जीवन में स्थान रखती है। आप किसी से बात करें संभावना यह होती है कि उसके परिवार या एक्स्टेंडिड परिवार से कोई न कोई रेलवे में जरूर होता था, पापा, चाचा, ताऊ, मामा, भतीजा। यह तो साहित्य और फिल्मों की बात है अन्यथा खेल की दुनिया हो या जीवन के अन्य क्षेत्र उदाहरण के तौर पर पी टी ऊषा, विश्वनाथन आनंद, पी वी सिंधु, महेंद्र सिंह धोनी हो, लाला अमरनाथ या फिर डायना एडुलजी, गुरबक्स सिंह, पूरन सिंह या फिर मेकलुस्कीगंज को बसाने का श्रेय रखने वाले मेकलुस्की के पिता। 

एक वक़्त था जब अपनी अपनी किस्मत आज़माने रेल से ही मुंबई उतरते रह हैं। सालों साल लोकल ट्रेन में सफर करते हैं कई बार तो बेटिकट भी।

व्यंग्य: स्टेशन मास्टर और केंटीन का उदघाटन


                                                


 

           पूरे राज्य में ये खबर केंटीन के चूल्हे की आग की तरह फैल गयी है कि किसी स्टेशन मास्टर ने ये हिमाकत, बोले तो ये दुस्साहस किया है कि अपने स्टेशन की केंटीन का उदघाटन खुद ही कर डाला। लोग-बाग अब उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जगह-जगह, नुक्कड़ नुक्कड़, चैनल-चैनल यही ब्रेकिंग न्यूज़ गरम है कि इस स्टेशन मास्टर को ये सूझी तो सूझी क्या। ये क्या बात हुई ? अब ऐसी भी क्या मजबूरी आन पड़ी कि मास्साब ने खुद ही केंटीन का फीता काट डाला। यह तो सरासर बेईमानी है। नाइंसाफी है। अब ये ऐरे गैरे मास्टर फीता काटने लगेंगे तो हाकिम बेचारा क्या करेगा? जिस तरह हुकम हाकिम का उसी तरह यह विशेषाधिकार भी हाकिम का है कि वह जी चाहे जिसको काटे। जहां चाहे जिसका फीता काटे, उदघाटन करे। वह केवल उसी सूरत में किसी और को उदघाटन की इजाजत देता है जब उसका नामकरण उसी के नाम से हो। क्या इन मास्टर साब को पता नहीं की हर गाँव-खेड़ा में सभी जगहों का उदघाटन हाकिम ने करना होता है। ये खेकड़ा स्टेशन क्या भारत से अलग है? बसंत कुमार को साफ-साफ शब्दों में बता दिया जाये वह बस नाम का बसंत है। काम का बसंत हर मौसम में हाकिम होता है। 

  

 

इतने सालों में इस स्टेशन मास्टर को ये भी नहीं पता चला कि स्टेशन पर क्या करना होता है क्या नहीं। माना कि ट्रेन को हरी झंडी उसी ने दिखानी है और सारी उम्र दिखानी है। फिर क्यों वह नामाकूल, नाकारा, नालायक एक दिन की ये विजुअल खुशी हाकिम से छीन लेना चाहता है। हो न हो ये किसी दुश्मन राज्य का जासूस तो नहीं जिसने हमारे राज्य में अराजकता फैलाने का ये तरीका निकाला हो। मगर हाकिम उसके इन मंसूबों को कामयाब नहीं होने देगा। उसके सभी पतों पर लोग पूछताछ को भेज दिये गए हैं वे सब दल-बल के साथ पहुँचते ही होंगे और उसकी अगली-पिछली सात पीढ़ियों का हिसाब निकाल कर ले आएंगे। आज तक का रिकॉर्ड है कि हाकिम की टीम कभी खाली हाथ नहीं लौटी।

 

बच्चू ! स्टेशन मास्टर जब दो-चार बरस कारावास में रहेगा तो सारी मास्टरी भूल जाएगा। अब से कारावास ही उसका स्टेशन होगा। इस मास्टर ने डाकिये से भी कुछ न सीखा। भई कैसा मास्टर है? अब देखो ठेके की नौकरियों के रुक्के भी हाकिम खुद दे रहा है। किसी डाकिये ने आवाज़ उठाई। हरगिज़ नहीं। वे समझदार हैं। उन्हें पता है पहले ही ये कूरियर वाले , ई मेल और वाट्स अप से उनकी नौकरी पर बन आई है। चुपचाप अपने दिन काटिए। चूँ चाँ की तो आपको बैरंग घर भेज दिया जाएगा। और पूरा डिपार्ट ही बंद कर दिया जाएगा फिर डाकिया-डाकिया आपस में ही खेलते रहना। अरे हाकिम आखिर हाकिम होता है वह चाहे तो नेज़ा फेंकने वाले से उसका नेज़ा ले कर नीलाम कर दे। यह उस नेजेवाले की खुशकिस्मती है। उसे तो उलटा खुश होना चाहिए और हाकिम का सौ सौ बार शुक्राना अदा करना चाहिए। अब अगर वो नेजे वाला अपना नेज़ा देने में आना-कानी करता तो क्या वह दुबारा नेज़ा फेंकने लायक रह जाता। वह जानता है बांह सलामत रहे नेजे हज़ार। महज़ हुकम हाकिम का नहीं होता, हुकूमत हाकिम कि नहीं होती... कायनात हाकिम की होती है। 

 

व्यंग्य: रेल-भोजन और सूजे होंठ

 

 

लो, जी कॉकरोच से शुरू करके, चूहे, साँप, बिच्छू  के बाद अब पेश है। 'वन मील एंड टू ब्यूटीफुल लिप्स' योजना। एक भद्र महिला ने सफर करते हुए पाया कि ट्रेन का भोजन करने के बाद उसके होंठ सूज गए हैं। उसने डॉ. से उपचार लिया और डॉ. की पर्ची तथा अपने सूजे होंठ के फोटू सोशल मीडिया में डाल दिये। यह देख आई.आर. टी.सी. वाले आग-बबूला हो सूज गए। उन्होने तुरंत डिस्क्लेमर जारी किया कि यह हमारे भोजन का असर नहीं है। कारण कि यदि होंठ हमारे भोजन से सूजने होते तो केवल एक ही यात्री के क्यूँ सूजते, बाकी यात्रियों के क्यूँ नहीं, दूसरे भद्र महिला ने शिकायत की थी कि ट्रेन का यह भोजन करने के बाद उसके बच्चे को दस्त लग गए। इसका प्रतिकार भी ऑथरिटी ने यह कह कर किया है कि और तो किसी बच्चे को दस्त नहीं लगे। लगे भी हों तो हमारे पास ऐसी कोई कम्पलेंट नहीं।

 

अब बेचारी भद्र महिला बहुत परेशान है। जाये तो जाये कहाँ? शिकायत करे तो किस से करे। उसके सूजे होंठों के फोटो सोशल मीडिया में चल रहे हैं। इन दिनों अगर आप ब्यूटी पार्लर जाएँ तो वहाँ 'लैन' लगी है ऐसी भद्र महिलाओं की जो अपने होंठो को सुजाना चाहती हैं। उसे ब्यूटी पार्लर की डिक्शनरी मे 'बी स्टिंग लिप्स' कहते हैं बोले तो ऐसे होंठ जैसे मधुमक्खी ने डंक मार दिया हो। कहते हैं ऐसे होंठ आजकल खूब प्रचलन (डिमांड) में हैं और नवीन ब्यूटी स्पॉट माने जा रहे हैं।

 

अब इतना सब जानते बूझते हुए इस महिला को शिकायत नहीं करनी थी। उसका ये ब्यूटी ट्रीटमेंट तो बैठे-बिठाए एक भोजन करने मात्र से हो गया। उसे उल्टा धन्यवाद देना चाहिए और फाइव स्टार रेटिंग देनी थी। फीडबेक फाॅर्म से अफसरों को पता लगेगा कि भोजन में क्या डाला जाये कि महिलाओं को यह ‘सर्विस’ ‘पार्लर ऑन व्हील’ मुहैया कराई जाये। शोध का विषय हो सकता है। अभी तक भोजन के 'केसरोल' पर वैज तथा नॉन वैज लिखा होता था अब एस.एल. ( स्वाॅलन लिप्स) अथवा नॉन एस.एल. लिखा भी आया करेगा। आखिर सभी को तो सूजे होंठ नहीं चाहिए होंगे। बहुत से दक़ियानूसी लोग अब भी 'बस पंखुड़ी गुलाब की सी है'  के झमेले में ही पड़े हैं। मेरा अनुरोध है कि आई.आर.टी. सी. कदापि न घबराये। दुनिया में बड़ी बड़ी खोजें इसी तरह हुईं हैं। ज्यादा हो तो इस वाली थाली का नाम इस भद्र महिला के नाम पर रखा जा सकता है। आखिर आपका प्रयोग सफल रहा है। मुंबई में एक 'संजू बाबा चिकन' चला था पता चला कि अभिनेता संजय दत्त ने देर रात चिकन चाहा तो रेस्टोरेन्ट वाले ने कुछ अल्ल-मल्ल मिला के ये चिकन बना दिया था। तभी से इस अल्ल-मल्ल वाली चिकन डिश का नाम संजू बाबा चिकन पड़ गया। भई ! हमारे देश में साधना कट बाल, मुमताज साड़ी, माधुरी दीक्षित धक-धक ड्रेस, अनारकली ड्रेस और राजेश खन्ना कट कुर्ता चला ही है। आप देखना लाइन लग जानी है महिला यात्रियों की। जो इस होंठ सुजाऊ भोजन के सेवन के लिए ही आपकी ट्रेन में यात्रा करेंगी। आपको अलग से कोच लगाने पड़ेंगे। मेन्यू में कुछ और परिवर्तन कर आप लिख सकते हैं 'एंजिलिना जोली' भोजन, इसी तरह से कुछ देसी अभिनेत्रियों को भी 'रोप-इन' कर लें उनके एड आने लगें। मेरे जैसे होंठ पाने के लिए यात्रा करें और भोजन करें फलां ट्रेन में। फिर देखना कैसे ट्रेन 'फूल' जानी हैं। होंठ तो होंठ ट्रेन भी फूल (सूज) जानी हैं।

 

व्यंग्य: चलता फिरता केसर

 


 

मेरे भारत महान की महान ट्रेन में यात्रा करते हुए एक यात्री के भोजन के साथ दी गयी दही में कुछ तैरता हुआ प्रतीत हुआ। उसने गौर से देखा तो वे कुछ कीड़े थे। ऐसा समझिए एक प्रकार से नॉन-वेज दही थी। यात्री पता नहीं वेजेटेरियन था अथवा नॉन वेजेटेरियन। बहरहाल नॉन वेजेटेरियन भी रहा होगा तो भी उसे ये तैरते हुए कीड़े पसंद नहीं आए। उसने केटरिंग स्टाफ को बुलाया और उनसे इस कीड़ों युक्त दही की शिकायत की। केटरिंग स्टाफ सत्य को पा चुके होते हैं। वे सत्य की खोज में नहीं निकले हैं। उन्होने तुरंत यात्री की इस निर्मूल आशंका का समाधान किया और समवेत स्वर में घोषणा की कि ये कीड़े नहीं केसर है। अब बारी यात्री के चकराने की थी।

 

यात्री को सभवतः बताया गया कि उसने अभी तक पिछड़ी हुई, थकी हुई गाय-भैंस के दूध की दही खाई है यह नए भारत की नयी दही है। बहुत नायाब दही है। बोले तो जेनेटिकली माॅडीफाइड और जिसे वह कीड़े समझ रहा है ‘रे मूरख ! वे कीड़े नहीं, नयी प्रजाति की केसर है। बोले तो चलती-फिरती केसर। अंग्रेजी में मोबाइल केसर। भारतीय रेलवे अपने यात्रियों के लिए कितने कष्ट सहती है और उनके लिए एक से एक ‘डेलीकेसी’ लाती है। इसी क्रम में यह चाइना वाली केसर है ये ऐसे ही कीड़े के माफिक लगती है। कोई भी देखे तो ये ही समझे की कीड़े दही में चढ़ उतर रहे हैं। अठखेलियाँ कर रहे हैं।

 

 

यात्री का माथा एक बार को तो ठनका। फिर उसने अन्य यात्रियों को भी दिखाया तो अन्य यात्रियों ने भी तस्दीक की कि यह केसर नहीं कीड़े हैं। ‘क’ से केसर ‘क’ से कीड़े। कहाँ अंतर है ? केटरिंग स्टाफ मानने को तैयार नहीं था। फिर उन्होंने बौद्ध धर्म का मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहा कि आप को ये केसर युक्त दही पसंद नहीं है तो आप मत लीजिये और उन्होने पूरी गंभीरता से इस बात पर ज़ोर दिया कि आप दही के कप पर एक्स्पायरी डेट देख लीजिये अभी एक्सपायर नहीं हुई है। अत: हमारी ओर से यह सर्वथा सेवन योग्य है। इनकी तरफ से ‘केस क्लोज़’। उन्होने यह धमकी भी दे डाली कि इसका विडियो फैलाया या मंत्री जी के पोर्टल पर शिकायत की तो उनसे बुरा कोई न होगा ये कीड़े भी नहीं और वे इस यात्री को मारते मारते कीड़ा बना देंगे। क्या कीड़ा, क्या केसर सभी तो उस कृपालु की क्रिएशन है। समदर्शी बनिए। इस चराचर जगत में क्या जड़, क्या चेतन सभी तो राम की माया है। राम जी का गुड़, राम जी की चींटी। राम जी की कर्ड, राम जी के कीड़े, राम जी की केसर।

 

स्किट: स्वयंवर डॉली का


 

 (प्रस्तुत है सन् 2026 के एक स्वयंवर का दृश्य। स्थान है एक सांभ्रांत सोसायटी, हरे-हरे जंगलों की हरियाली के बीच आपको तो पता है सावन के अंधे को सब हरा हरा ही दिखता है। सभी पात्र, अपात्र, कुपात्र व्यक्ति अपने आपको योग्यतम/उपर्युक्त लाइफ पार्टनर बता रहे हैं। कुछ तो कह रहे हैं कि लाइफ पार्टनर ना सही लिव-इन-पार्टनर ही बना लो।ये जान तो वैसे भी जानी है हम एन.सी.आर. के जाँबाज हैं । प्रदूषण से मरना है या डॉली के प्यार रूपी आभूषण से ? लाइफ आपकी .... चाॅइस आपकी)

 

[ दृश्य: नायिका आधुनिक वस्त्रों में पर्स हिलाती-डुलाती चहलकदमी कर रही है। ग्रीनवुड का नायक नंबर वन का प्रवेश

 

नायक: (टाई पहने/ लैपटॉप का बैग उठाए)  हाय ! हम शायद पहले मिले हैं ? आप जानी-पहचानी लगती हैं ? मैं ग्रीनवुड में रहता हूँ। मैं कॉर्पोरेट जगत का हैड हौंचो हूं। मैं अनममैरिड हूँ क्या आप मुझे अपना लाइफ पार्टनर बनाएँगी?

 

नायिका:   कुछ अपने बारे में बताइये ? आपने तो सीधे डंडा सा मार दिया!

 

नायक1:   जी हमें कॉर्पोरेट वर्ल्ड में टाइम मैनेजमेंट सिखाया जाता है। बायोमेट्रिक के चलते अब तो एक एक मिनट कीमती है। देखो मैं तुम्हें वर्ल्ड टूर पर साल में दो-तीन बार ले जाया करूंगा। मैंने बहुत से फ्रीकुएंट ट्रेवलर पॉइंट जोड़ लिए हैं। खूब शॉपिंग कराऊंगा। यहाँ तक कि मेरी कंपनी के प्रोडक्ट भी तुम्हें मेक्सिमम डिस्काउंट पर दिलाया करूंगा। वीकेंड पर हम दिल्ली जाकर भी घूम सकते हैं। तुम चाहो तो महीने में दो किटी पार्टी करो, चार किटी पार्टी करो, नो प्राॅब्लम! सोच लो!! आज की तारीख में कॉर्पोरेट वालों की बहुत डिमांड है। आधी ज़िंदगी तो वो टूर या मीटिंगों  में ही बिज़ी रहते हैं अतः तुमको क्या बोलते हैं उसे ‘माई स्पेस’ ‘माई प्राइवेसी’ भी मिल जाया करेगी। प्लीज़ मैरी मी। [ एक्ज़िट ]

 

नायक नंबर 2 का प्रवेश: (कैप लगाए, हाथ में बैटन) जयहिंद ! (सेल्यूट मारता है) मैं फौजी हूँ कोई ऐरा-गैरा सिविलियन नहीं। हमेशा अनुशासन में रहता हूँ। एकदम सफाई पसंद। मुझ से शादी करोगी तो सोचो कितना आराम ही आराम होगा। बैटमैन क्या पूरी बटालियन तुम्हारा हुक्म माना करेगी। हर हफ्ते बड़ा खाना हुआ करेगा। तुम्हें चौका-चूल्हा नहीं करना पड़ेगा। हर चीज़ सस्ती मिलेगी। बस तुम्हें हुक्म करने की देर है। समझ रही हो ना मैं केंटीन की सुविधा की बात कर रहा हूँ।  बस तुम मेरी सी.ओ. बन जाओ ? (फिर सेल्यूट एक्ज़िट)

 

नायक नंबर 3: का प्रवेश हाथ में डंडा घुमाते हुए देसी अंदाज़ में : मैडम जी विद ड्यू रिस्पेक्ट आई बैग टू से... आई केम टू नो यू वांट टू मैरी। अपनी पूरे इलाके में धाक है जी। जूरीस्डिक्शन की आप फिकर नाॅट। ये सारे माॅल, रेस्टोरेन्ट जहां आप नज़र डालोगे वो आपकी नज़र होगा जी। आप तो यूं सोचो कि आप ही आई.जी., कमिश्नर, सब हो। क्या आदमी, क्या 'लेडिस' सब पर आपका रौब चलेगा, चलेगा क्या दौड़ेगा जी दौड़ेगा। आप जिसे कहोगे उसे उठवा लिया जाएगा वो भी शुक्रवार की शाम को 48 घंटे उसकी ऐसी खातरदारी करेंगे ऐसी खातरदारी करेंगे कि वो आगे से बस कीर्तन सत्संग करता ही दिखेगा। तुम एक बार अपना हाथ मेरे हाथ में देके तो देखो। हाँ आपका वेट गारंटी बढ़ जाना है जी वो आप जानो। अच्छा चलता हूँ। एफ.वाई. आर. भिजवा देना। नहीं समझे? फर्स्ट यस रिपोर्ट।  बरामदगी तो हम करा ही लेंगे (एक्ज़िट)

 

नायक 4: (सूट टाई कैप पाइप में प्रवेश)      आप सब छोड़ो मादाम प्लीज़ मैरी मी। अपने बैचमेट हर स्टेट, हर शहर में हैं वो सब आपकी सेवा में रहेंगे। घोडा-गाड़ी की कभी कमी नहीं रहेगी। जो जरा भी चूँ करेगा उसको वहीं कायदे से समझा दिया जाएगा। ऐसा उलझायेंगे, ऐसे उलझाएंगे कि ज़िंदगी भर सुलझ नहीं पाएगा। बड़ी बड़ी पार्टियों में आप चीफ गेस्ट बनने की अभी से प्रेक्टिस कर लो जी। बूके की लाइने लग जानी हैं। गिफ्ट्स की तो बरसात होने लगेगी। आप तो यूं सोचो कि बिना इम्तिहान दिये आपने तो खुद आई.ए.एस. बन जाना है। आई.ए.एस. बनने का सबसे आसान तरीका-- मैरी एन आई.ए.एस.

सबमिटिड फॉर एप्रूवल प्लीज़ (एक्ज़िट)

 

नायिका:    वाट दि हैल ! आई डोंट वांट टू मैरी। सॉरी !!! !!!

 

व्यंग्य: खाड़ी युद्ध और हम !


 

      हमारा देश युद्ध का नहीं बुद्ध का देश है। हम शान्तिप्रिय लोग हैं। हमारा इतिहास गवाह है, हमने कभी किसी देश पर अपनी तरफ से युद्ध नहीं छेड़ा। हम तो वसुधैव कुटुंबकम मानने वाले और इस विचार धारा के पोषक हैं। हमने पाकिस्तान-ईस्ट पाकिस्तान में सन् 1971 में युद्ध को समाप्त  कराया ही था। अभी फिलहाल के दिनों में हमने रूस और यूक्रेन का युद्ध रुकवाया ही था। आपने  सुना नहीं था? जब वो बेचारी लड़की रुआंसी होकर अपने माता-पिता को बता रही थी कि पापा मैं न कहती थी, मोदी जी ने वॉर रुकवा दी। इस तरह वहाँ पढ़ रहे बच्चे सुरक्षित भारत वापसी कर सके थे। आप सब ने देखा होगा जब वे विमान से उतरते वक़्त नारे लगा रहे थे और उनकी अगवानी मंत्री लोग कर रहे थे। यह इसीलिए मुमकिन हुआ कि हम विश्वगुरु हैं। ये नया भारत है। माइंड इट।


अब जब खाड़ी देश में मध्यस्थता की बात आई तो सभी देश भारत की ओर देख रहे थे कि भारत अपने विश्वगुरु के दायित्व को निभायेगा। किन्तु ये क्या भारत ने एक 'नरचरेंट पेरेंट' की भूमिका निभाते हुए कहा कि नहीं हम मध्यस्थता नहीं करेंगे। अब यह मौका किसी और देश को दिया जाये। नहीं तो बाकी देशों का विकास कैसे होगा? हमने इनसिस्ट किया कि हमारे 'इमीजिएट नेबर' पाकिस्तान को यह रोल दिया जाये। आखिर ऐसे ही तो बाकी देश विश्व के मामलों मे रुचि लेंगे और अपनी जिम्मेवारी समझेंगे। अतः हमने यह फैसला लिया है कि हमारा पड़ोसी देश, हमारा छोटा भाई ये रोल अदा करे। हमारे 'नेबर' मजबूत बनें यही हमारा ऑब्जेक्टिव है।

 

                     हमारे पास इतना टाइम नहीं है कि हम इस-उस के फटे में टांग अड़ाते फिरें। हमारे अपने  बहुत काम हैं। सूबों में चुनाव सिर पर हैं। 'वी आर बिज़ी पीपुल'। एक बार हमने डिसाइड कर लिया कि खाड़ी के देश आपस में सुलट लें। पाकिस्तान को अब तलक हमने पर्याप्त रूप से ट्रेनिंग दे दी है। अब वक़्त आ गया है कि वह इंडिपेंडेंट रूप से विश्व क्षितिज पर आए। सभी पड़ोसियों को मजबूत बनाना भी हमारा ही फर्ज़ है। 'क्षमा बड़न को चाहिए'। हम चाहते थे कि पाकिस्तान ये काम करे। हम यूं बांग्लादेश का नाम, या श्री लंका का नाम दे सकते थे मगर दोनों देश में अभी नयी-नयी सरकार बनी हैं। उन्हें अपने  काम करने दीजिये। 'नेबर फर्स्ट' हमारी नीति है। उसी के फलस्वरूप हमने विश्व बिरादरी को कह दिया कि हमें इस बार 'बाॅदर' न करें बल्कि पाकिस्तान को ये काम दो। नहीं तो वो कब सीखेगा? अब हम ठहरे विश्वगुरु हमारी बात कोई टाल सके ऐसा मुमकिन ही नहीं। अतः उन्होने हमारे कहे अनुसार ही ये काम पाकिस्तान को दिया है। और तो और हमें इस का कोई क्रेडिट भी नहीं चाहिए। ये तो बात आई तो ज़िक्र कर दिया। नहीं तो हम अपने मुंह मियां मिट्ठू नहीं बनते। न कोई नारेबाजी, न कोई एडवरटाइज़मेंट ना कोई फोटोग्राफ। भैया ! आप मुंशी प्रेमचन्द की 'बड़े भाई साब' पढ़े हैं कि नहीं? बस हम वही बड़े भाई साब हैं।

 

 

व्यंग्य: सड़क पर गड्डों का महत्व

 

                   पहले सड़कों पर गड्डे न थे। दरअसल पहले सड़कें ही न थीं। तब मार्ग सुलभ नहीं हुआ करते थे। इससे आदमी खूब हिचकोले खाता आगे बढ़ता था अथवा पैदल चल-चल कर भाग-दौड़ करके हलकान हुआ करता था। तब आदमी मजबूत हुआ करते थे। वे चपल, फुर्तीले हुआ करते थे। आजकल की तरह नहीं कि जरा दचका लगा और 'स्लिप डिस्क' हो गई। किसी डॉ. के आजीवन गाहक। डॉ. तो तैयार ही बैठे हैं आपको अपने क्लीनिक का 'लाइफ मेम्बर' बनाने को।

  

                     फिर जब सड़कें बनने लगीं तो जाहिर है उनमें गड्डे भी होने थे। कभी ठेकेदार की वजह से कभी इंजीनियर की वजह से और कभी दोनों के संयुक्त प्रेम के सौजन्य से। सड़क पर गड्डे हों तो रोजी-रोटी अच्छी चल जाती है, क्या म्युनिसिपलिटी के अफसर, क्या डॉ. क्या इंजीनियर क्या ठेकेदार। ये सड़क आपको 'पाॅवर' तक नहीं ले जाती बल्कि ये तो सड़क के गड्डे हैं जो आपकी पहचान के क्षितिज को विस्तार देते हैं। उसे गड्डों से निकाल कर उन्नत शिखर तक पहुंचाते हैं।

 

               सड़क पर गड्डे हों तो आप चौकन्ने रहते हैं। आप को गड्डों से बच कर चलना आ जाता है। सड़कों के ये गड्डे आपको 'लाइफ-कोच' की तरह जीवन जीने के गुर सिखाते हैं। कैसे परेशानियों से जूझा जाये, कैसे उनसे बचा जाये। मुसीबतों से कैसे बाहर आया जाये। वो शेर है ना:

 

                   "...आसानियां हों तो ज़िंदगी दुश्वार हो जाये

 

                  जहां सड़कों पर गड्डे न हों तो वहाँ के बाशिंदे बड़े नाज़ुक मिज़ाज, कमजोर होते हैं और उसी रंग में आने वाली पीढ़ी को रंग लेते हैं। जबकि ज़िंदगी न केवल फेयर नहीं है।  वह आसान भी नहीं है। आपको बार-बार गिर कर उठना है। ऐसे नहीं कि एक बार गिरे तो गड्डे के ही होकर रह गए।

 

                      इसी श्रंखला में जब खबर आई कि एक अस्पताल में मरीज के कोमा में जाने के बाद उसके परिजनों ने मरीज को घर ले जाकर क्रियाकर्म करना ही ठीक समझा। कारण - कहते हैं न ज़िंदा हाथी एक लाख का तो मरा हाथी सवा लाख का। अस्पताल वाले कोमा वाले मरीज का भो रोज़ का इतना बिल बना देते हैं कि परिवार बिना अस्पताल के ही कोमा में जाने को होता है। जब वे खटारा एंबुलेंस में दादी को क्रियाकर्म को ले जा रहे थे तो किसी सड़क के गड्डे पर एंबुलेंस इतनी ज़ोर से उछली कि दादी कोमा से बाहर आ गई। दादी को होश आ गया। परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। जिसने भी खबर सुनी वह जहां था वही बिना गाड़ी उछल गया। अब परिवार ने तय किया है कि वे आज से गड्डों को सम्मान से देखा करेंगे। गड्डों को देखने की उनकी दृष्टि ही बदल गयी। वे ठेकेदार को ढूंढ रहे हैं ताकि उसका धन्यवाद दे सकें और सार्वजनिक अभिनंदन कर सकें।

 

                  इस सबके देखते अस्पताल वाले अलग इस रिसर्च में लगे हैं कि कैसे इन मरीजों को अपने शहर की सड़कों से गुजारा जाये ताकि उन्हें भी कोमा से बाहर निकाला जा सके। दूसरे कुछ अस्पताल अपने प्रांगण में ऐसा ट्रैक बनाने की सोच रहे है जिसमें छोटे-बड़े, गड्डे ही गड्डे हों। गोल्फ की तरह मरीज़ से उसी अनुसार फीस ली जाया करेगी। आप अपने मरीज को 'नाइन होल' वाली सड़क से ले जाना चाहते हैं या ‘18 होल' वाली सड़क से ?