Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Friday, June 23, 2023

व्यंग्य: नकल योद्धाओं का सम्मान


         अब समय आ  गया है कि नकल योद्धाओं को समाज में, व्यवस्था में उनको उनका ड्यू दिलाया जाये। नकल के उद्यम में लगे लोगों को इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाये। उनको पेंशन, प्रोविडेंट फंड मेडिकल जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाएँ। यह अब कोई कुटीर उद्योग या लघु उद्योग नहीं रह गया है बल्कि एक विशाल उद्योग होयला है जिसमें लाखों लोग रोज़गार में हैं और नकल उद्योग से अपनी आजीविका चला रेले हैं।


             यह पुराना समय नहीं है जब बस कुछ फर्रे या चिट से काम चल जाता था। अब पूरी की पूरी बुक रखने से भी काम नहीं चलेगा। अन्य फील्ड्स की तरह यह फील्ड भी एकदम हाईटैक हो गया है। एक बार मुझे एक क्रिमिनल लाॅ के वकील साब से मिलवाया गया जिनके बारे में मशहूर था कि वो पूरे केस का ठेका उठा लेते हैं। मुझे कनफ्यूज देख उन्होने बताया वो पुलिस थाने से ही काम करते हैं। एफ. आई. आर. बदलवाना उसमें दफा चेंज करना, दफा हटाना, केस में लूपहोल छोड़ना आदि। एकदम ग्रासरूट एप्रोच है। उसी तरह नकल का काम बहुत मेहनत का काम है।  पेपर लीक करना आसान नहीं होता। बहुत परसिवरेंस चाहिये। बिलकुल हिन्दी फिल्म के इश्क़ में पागल लड़की के अमीर बाप की तरह कहना होता है:

          "इस सूटकेस में इतने पैसे हैं ... ये ब्लैंक चैक़ है इस चैक़ पर जो चाहे रकम भर लो और प्रश्नपत्र वाला एक पेज़ मुझे दे दो  ग्यारह क्या ? इक्कीस मुल्क़ों की पुलिस भी तुम्हें ढूंढ नहीं पाएगी। पचास खोखे...ऑल ओ. के. ?"


       उनका काम एकदम कॉर्पोरेट स्टाइल का हो गया है। मार्केटिंग, लॉजिस्टिक, एकाउंट्स, टेक्निकल टीम, एच. आर. आदि।एच. आर. को सॉल्वर एंगेज करने पड़ते हैं उनका सी. टी. सी. तय करना होता है। एग्रीमेंट साइन कराना आदि आदि। उसी तरह मार्केटिंग टीम को उम्मीदवारों को झूठी-सच्ची उम्मीद दिला दिला कर बीमा एजेंट की तरह शीशे में उतारना पड़ता है। फीस तय करनी होती है। फीस का स्ट्रक्चर फ्लेक्सिबल रखा जाता है। किसी से कुछ, किसी से कुछ, एक की दी हुई फीस दूसरे से काॅन्फीडेंशियल रखी जाती है।  लाॅजिस्टिक वाले साॅल्वर को समय पर सेंटर पर पहुंचाने का काम करते हैं। उनके आराम का ध्यान रखते हैं। फाइव स्टार होटल में उन्हे रुकवाया जाता है। और उनके विज़िट को पूरी तरह सीक्रेट रखा जाता है। वैसे सिंगल विंडो पॉलिसी के अंतर्गत ये लोग मेडिकल आदि भी कराते हैं नहीं तो एक्स-रे वालों ने ही गड़बड़ बता कर आपको फेल कर देना है।


            अपने नवीनतम डायवर्सिफिकेशन प्लान में ये अब जनरल को एस. सी., एस. टी., ओ. बी. सी. सर्टिफिकेट भी उपलब्ध कराते हैं। ए टू ज़ेड सर्विस, कंप्लीट सैटिस्फैक्शन गारंटीड, सबका अलग- अलग रेट है। ई. डब्लू. एस. वालों के लिए आसान ई. एम. आई. का भी इंतज़ाम है। ई. एम. आई. रिकवरी की टेंशन नहीं, बस एक कम्प्लेन्ट और नौकरी गई, पोलिस का लोचा अलग। 


           मेरा सरकार से निवेदन है। निवेदन क्या आग्रह है। इस उद्योग में लगे लोगों की सुधि लें। उनकी सर्विस कंडीशन सुधारें। निष्पक्ष देखे ! वे कितने पुण्य का काम कर रहे हैं। आपके इंटरव्यू खत्म कर देने से इनके ऊपर कितना लोड आ गया है। अब सारा दारोमदार लिखित परीक्षा पर ही है। बेचारे हमेशा प्रेशर में रहते हैं। कभी इस परीक्षा का पेपर आउट कराओ, कभी उस परीक्षा का। 24 बाई 7 काम, काम, काम।  ये उच्च शिक्षित बेरोजगार साॅल्वर्स को बड़ी तादाद में नौकरी दे रहे हैं। जिन्हें आप नालायक बेरोज़गार कहते हैं उनको वो 'लायक' बना आपके दफ्तरों में बाबू, स्कूलों में टीचर, अस्पतालों को नर्स, डॉक्टर, इंजीनियर दे रहे हैं। दे रहे हैं कि नहीं ? 


            खाली-पीली योद्धा कहने भर से योद्धा नहीं हो जाते हैं आप खुद देखें कितनी मेहनत का काम है। साला ! ये सोशल-सर्विस कभी किसी युग में आसान नहीं रही। कृपया इस असंगठित क्षेत्र की और उपेक्षा न करें। 


            नकल योद्धा ज़िंदाबाद!

Wednesday, June 21, 2023

व्यंग्य: स्टेडियम प्राइवेट को

           



         


             

                कुछ बरस पहले यह खबर अखबार में छपी कि सरकारी स्टेडियम प्राइवेट पार्टीज़ को सौंपे जाएँगे ताकि उनका उचित रखरखाव हो सके, वे आय का साधन बन सक। इससे इसमें लगे लोगों को रोज़गार मिलेगा।   स्पोर्ट्स को बल मिलेगा। आप तो जानते ही हो निर्बल के बल राम। सरकार की  इसी नीति के चलते कुश्ती संघ ने अपना दफ्तर और अभ्यास कराने के मैट-शैट अपने बंगले में ही बिछवा लिए थे। सब कुश्तीवालियों का वहीं  सांस लेने के तरीके का चेक-अप बड़े हकीम जी खुद करते हैं। तभी न सभी वहीं शरण लेते

 

                 अब देखिये स्टेडियम प्राइवेट करने के कितने फायदे हैं। एक तो उसके रखरखाव के लिए सरकारी कर्मचारी नहीं रखने पड़ेंगे। सरकारी कर्मचारी को रखने में बड़े लोचे हैं। पढ़ाई लिखाई तय करो, उम्र तय करो, विज्ञापन निकालो, लिखित मौखिक परीक्षा लो। सिफ़ारिशें देखो। पेपर आउट न हो जाये ये देखो। वेतन दो, पेंशन दो, मेडिकल दो, हिसाब रखो, सरकारी आवास दो। एक झंझट है। खर्चा ही खर्चा। स्टेडियम न हुआ सरकारी दफ्तर हो गया।  इस पर तुर्रा ये कि जब जाओ या तो बंदा छुट्टी पर है या बीमार है। रखरखाव इतना बेकार होता है कि पूछो मत। स्कैम पर स्कैम।

 

                      प्राइवेट के दे दो छुट्टी पाओ। खर्चा नहीं उल्टे आमदनी ही आमदनी। उनका एक आदमी सरकारी के पाँच के बराबर दौड़ दौड़ के काम करेगा। ये जो एथलीट वहाँ दौड़ते हैं उन्ही में से किसी को ठेके पर रख लो शाम को ठेके की रौनक देखने लायक होगी। मुंबई में स्टेडियम के अंदर जो बार हैं, रैस्टौरेंट हैं, जो शादी-ब्याह के हॉल हैं उनसे आमदनी ही आम्दानी है। कितने लोगों को रोज़गार मिला हुआ है। लोग खूब जाते हैं और धीरे धीरे उनकी स्नोब वैल्यू इतनी हो चली है कि मैम्बरशिप भी नहीं मिलती। ये वाकई एक मॉडल है जो देश भर के स्टेडियमों को अपनाना चाहिए।

 

                 स्टेडियम खेलने के लिए ही तो हुआ करते हैं। सब अपना अपना खेल खेलते हैं। पता नहीं किस खेल में तुम्हारी प्रतिभा निखर के आए  और तुम अपने क्षेत्र अपनी क़ौम का नाम रोशन करो

 

           और खेल-फेल क्या होता है जी ! यही सब न ! 

Friday, June 16, 2023

व्यंग्य: गोली खट्टी-मीठी

 

       पहले गोली केवल डॉक्टर लोग देते थे। लाल, पीली, हरी गोलियां। सिर- दर्द, पेट-दर्द की गोली, ताकत की गोली। टॉफी-चॉकलेट कहना सीखने से पहले हम बच्चे उनको गोली ही बोलते थे और गोली ही खाते थे। खट्टी मीठी गोलियां। एक और गोली होती थी जो युद्ध में चलती थीं और ग़रीब सैनिक लोग अपनी देशभक्ति का सबूत देते हुए अपने-अपने देश के लिए सीने पर खाते थे।


                सबसे आखिरी गोली वो थी जो फिल्मों में दिखाई देती थी। बॉस मारता था अपने राइवल गेंग के आदमियों को तो कभी दुश्मन को। ज़्यादातर अपने ही गैंग मेम्बर को गोली मारता था जो बॉस से बेवफाई करता था। मज़े की बात है जिस मेम्बर को गोली मारनी होती थी उसे लास्ट तक, यानि गोली चलने तक, शक भी नहीं होता था कि गोली अब आई कि तब आई।


                  फिर परिदृश्य बदला और पटल पर आए नेता लोग, तरह-तरह के नेता, किसिम-किसिम के नेता, छोटे नेता, बड़े नेता, गाँव के नेता, कस्बे के नेता, गोया कि ग्राम पंचायत से लेकर दुनियाँ के कोने कोने में एड्स की तरह फैल गए ये नेता। बिलकुल माफिया के माफिक। माफिया जैसे हर क्षेत्र में हैं वाटर टेंकर माफिया, किडनी माफिया, ब्लड बेंक माफिया, पार्किंग माफिया, टेंडर माफिया, एक्जाम माफिया, नकल माफिया, पेपर आउट कराने वाला माफिया, विदेश भिजवाने वाला माफिया आदि आदि। इसी तरह कोई अपने आप को गाँव का नेता बताता तो कोई अपने आप को दुनियाँ का। नेताओं की एक हॉबी होती है गोली देने की। वो हर समय हर मीटिंग में हर चुनाव में आवाम को गोली देते हैं। बस गोली के रंग और तासीर बदलती रहती है। बदलती क्या रहती है वो यकीन दिलाते हैं ये गोली आपकी ग़रीबी हटा देगी, दूसरा आता है बताता है कि उसकी गोली इंडिया को शाइनिंग बना देगी.  मूरख ! जब इंडिया शाइनिंग होगा तो तुम, तुम्हारा गाँव, तुम्हारा शहर, तुम्हारी बिरादरी अपने आप ही शाइनिंग करने लगेगी।


                   कोई कहता जो हुआ सो हुआ बस ! अब तुम्हें ऐसे अंधेरे में, पेड़ पर नहीं रहने देंगे, न ये पेड़ की छाल पहनने देंगे आओ बेझिझक पेड़ से नीचे उतरो, ये रथ तुम्हें मंदिर होते हुए मतदान बूथ तक ले जाएगा जब तक लौटोगे अच्छे दिन आ चुके होंगे।

                       इस तरह चुनाव दर चुनाव गोली बदलती रहती है। आवाम

 है कि हर बार नई गोली का यकीन कर लेता है। पिछले 75 साल से तो कर ही रहा है।

Wednesday, June 14, 2023

व्यंग्य: उड़ेगा आम नागरिक

                                 यह बहुत प्रभावकारी टैगलाइन है, अब आप इसे नारा बोलो, आव्हान बोलो, चेतावनी बोलो मगर है तो है। आगे आपकी श्रद्धा। 'उड़ेगा आम आदमी' कितना रोमांचकारी और रोमानी ख्याल है। अब इसी की परिपूर्ति के लिए सरकार ने एक के बाद एक उड़ान अड्डे प्राइवेट को दे दिये हैं। अज्ञानी लोग इसी को बेच दिया ! बेच दिया ! कह कर शोर मचा रहे हैं। आप हाल-फ़िलहाल यदि एयरपोर्ट गए हों तो देखा होगा कि आपकी टैक्सी, आपकी कैब और आपकी अपनी कार के साथ पार्किंग के, इंतज़ार करने के कितने सारे इशू हो गए हैं और सबका लक्ष्य एक ही है कि आपकी जेब कैसे काटी जाये। अब इस जेब काटने को कोई भी भारी भरकम नाम दिया जा सकता है यथा डी-क्लटरिंग, डी-कंजेशन, रेगुलेशन, एजुकेशन-सेस, देश-प्रेम शुल्क, करोना रिलीफ़ फंड, वेक्सिन डव्लपमेंट निधि, कुश्ती केयर फंड आदि आदि।

 

                     इन बातों का क्या अर्थ है आपका मूल किराया या एलीमेंटरी किराया कितना भी कम है। बाकी जितने भी टैक्स हैं, फंड, सेस, शुल्क हैं। भई ! पैसे तो यात्री ने ही देने हैं। अब आप नाम कुछ भी कर दें। अभी तक हम सोचते थे मल्टीप्लेक्स की तरह पानी, चाय-कॉफी, पॉप कॉर्न, समोसा ही महंगे हैं। कहाँ पहले एयर इंडिया में कितनी टॉफी, चॉकलेट देते, खिलाते-पिलाते ले जाते थे। कब मंज़िल आ गई पता भी न चलता था।

 

खाते-पीते कट

जाते थे रस्ते

 

             अब ऐसा नहीं है। आप को समोसा 350/- का और हेम्बर्गर 700/- का खरीदने पर या न खरीदने पर मन मसोसते-मसोसते मंज़िल दूर मालूम देने लगती है।

 

               वक़्त आ गया है कि अब एयरलाइंस आदमी को उसके वजन के हिसाब से किराया वसूल करे। एक मिनिमम वजन 30 किलो रखा जाये और इसके बाद हर एक किलो पर डायनामिक फेयर के अंतर्गत इतने रुपये लिए जाएँ, इतने रुपये लिए जाएँ कि या तो आदमी अपना वजन कम करे या फिर टिकट पैसे देने में ही वह सूख जाये। 'स्वस्थ्य भारत' बनाने में एयरलाइंस के इस योगदान को भारत हमेशा याद रखेगा।

 

                      यह डायनामिक फेयर भी 'आपदा में अवसर' का बहुत सही उदाहरण है। अब देखिये ना ! इधर बालासोर की रेल दुर्घटना हुई उधर उस दिशा में जाने वाली सब एयरलाइंस ने अपने-अपने किराये को दस गुना बढ़ा दिया। वो जरूर आपदा की दुआ मनाते होंगे ताकि उनकी आय बढ़ सके। उनके बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स की मीटिंग में ये बातें डिस्कस होती होंगी "हाँ भाई अगर कुछ और आपदाएँ हो जाएँ तो आपका वेतन बढ़ा दिया जाएगा, अथवा स्टाफ को 20% बोनस दे दिया जाएगा अभी तो 8.33% से ही काम चलाओ और अगर कोई आपदा नहीं हुई तो अगले वित्त वर्ष छँटनी भी करनी पड़ सकती है।"

 

                       वैसे सोचने वाली बात ये है कि हवाई चप्पल पहनने वाला क्या एयरपोर्ट में घुस भी सकता है कारण कि अब नया मालिक उसको घुसने नहीं देगा। घुसने का शुल्क ही इतना है कि आम आदमी की हवाई चप्पल तक बिक जाएगी, और जो कहीं डायनामिक फेयर की चपेट में आ गया तो घर-बार गिरवी रखने की नौबत आ जायेगी।

 

                    इसके बाद भी यह पक्का नहीं है कि वह टाइम पर पहुँच पाएगा। हवाई उड़ान अब इतनी लेट हो जाती हैं जितनी कि कभी रेल होती थी। रेल तो आप भागते-भागते भी पकड़ सकते थे। हवाई यात्रा में ऐसा नहीं है। यहाँ आपको बहुत सारे प्रोटोकॉल के चलते 3-4 घंटे पहले पहुँचना पड़ता है। जबकि भारत में कहीं भी यात्रा दो ढाई घंटे की ही होती है। तो जब आप एययपोर्ट पर रुक रहे हैं तो कुछ तो खाएँगे- पीएंगे इसलिए वहाँ पूरा बाज़ार खोल दिया है अगलों ने आपके वास्ते । जहां मिठाई से लेकर बिरयानी और किताब से लेकर बीयर-शराब तक सब मिलता है, केक-पेस्ट्री, कहीं कहीं तो मैंने कार भी खड़ी देखी हैं।

 

                    हवाई चप्पल वालों को उड़ाने का वादा किया था सो उड़ा दिया। इतनी महंगाई, पेट्रोल के दाम, गैस के दाम, बेरोजगारी कोई विरला ही हवाई चप्पल वाला होगा जो परिदृश्य से उड़ ना गया होगा। उड़ाने का वादा किया था सो उड़ा दिया पटल से ही, फ़लक से ही। कल्पना में उड़ो, धरती से आकाश को निहारो और भले आदमी उड़ना क्या होता है? यही सब तो।

उसकी छोड़ो अब अच्छे-अच्छे सूट-बूट वाले उड़ना तो दूर हवाई अड्डे में घुसने न पाएंगे।

 

               इस सब रेल-पेल में सोच रहा था रेल मंत्री के पास रेल है। अब जैसी भी है, हाउसिंग मिनिस्टर के पास हाउस हैं। हमारे एयरलाइंस के मंत्री के पास ? न एयरलाइंस हैं न एयरपोर्ट। सब हवा हवाई (चप्पल) है।

 

            तो भाईजान ! अब देर किस बात की है। मालिक एयरपोर्ट पलक पांवड़े बिछाए आपका इंतज़ार कर रहे हैं।

 

पधारो म्हारे एयरपोर्ट !

Monday, June 12, 2023

व्यंग्य: दलित खाने से टिफिन राजनीति तक

 


             पुरानी कहावत है जिन्हें अपना समझते हैं उनसे रोटी-बेटी का संबंध बनाया जाता है। कहने - सुनने में आता है अमुक गाँव से, अमुक बिरादरी से हमारा रोटी-बेटी का नाता है अथवा नहीं है। जिनसे नाता तोड़ा जाता था खासकर जिन लोगों को समाज से निकाल दिया जाता था, छेक दिया जाता था उनके बारे में कहते थे कि अमुक का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया है। बात घूम-फिर कर शादी-ब्याह, खाने-पीने पर ही आकर रुकती। अब शहरीकरण और होटल, रेस्टोरेन्ट कल्चर के आने से खाने-पीने की वर्जनाएं शिथिल हुई हैं। बाद बाकी कसर स्विगी, जमेटो के चलते समाप्त प्राय: हो गईं।

 

                    इन सबसे नेताओं में चिंता होना स्वाभाविक है। अब वो क्या अनोखा करें कि न्यूज बने और वो भी ऐसी कि जिससे यह प्रोजेक्ट हो सके कि दलित वर्ग के सबसे बड़े हितैषी वही हैं, कोई दूसरा नहीं। खासकर, विपक्षी तो हरगिज़ नहीं। आप इफ्तार पार्टी को भी कुछ-कुछ इसी वर्ग में रख सकते हैं। जहां ग़ैर-मुस्लिम लोग रोज़ा तो रखते नहीं हाँ मगर इफ्तार पार्टी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। अपनी नेटवर्किंग करते हैं। इफ्तार पार्टी को बाहुबली लोग अपनी शक्ति प्रदर्शन का एक माध्यम बना लेते हैं। फोटो खिंचाते हैं जो फ्रंट पेज़ नहीं तो पेज़ तीन के खूब काम आतीं हैं।

 

                 पिछले कुछ सालों से दलित के घर खाने का फैशन चल निकला मगर फैशन तो फैशन है। अदलता-बदलता रहता है। कभी तंग मोहरी, कभी बैल बॉटम, फिर तंग मोहरी आदि-आदि। देखा-देखी सबने वो ट्रेंड फैशन की तरह अपना लिया। जिस दल को देखो वही किसी न किसी दलित के घर डेरा डाल लेता। अलबता इसका पहले खूब प्रचार-प्रसार किया जाता कि इससे कैसे दलित सशक्तिकरण को एक नई दिशा मिलेगी असल में इससे नेता जी का अपना ही सशक्तिकरण हो रहा होता है, प्रेस-काॅन्फरेंस की जाती, फोटोग्राफर जमाये जाते। बैठने के एंगल सेट किए जाते। पकवानों की सूची बनती। फिर पत्तल मंगाए जाते। ताकि दलित, दलित सा तो लगे। ग़रीब और वंचित। जिस पर प्लेट, थाली-कटोरी के भी पैसे नहीं। दरअसल फोटो ही खींचना है कोई असल में खाना थोड़े ही खाना है। फिर उनके बर्तन में ? न बाबा न ! कोई इन्फेक्शन हो गया तो ? डर्टी पीपुल। अभी कितने इलाके कवर करने हैं। खाना शहर के सबसे टॉप होटल से मंगाया जाता। कई बार तो बिल के पैसे बेचारे दलित से ही वसूले जाते। अबे ! देख नहीं रहा तेरे घर खुद नारायण चल कर आए हैं। शबरी के बाद ऐसा कभी देखा सुना था तूने ? चार पैसे नहीं खर्च सकता। इस भोज के बाद तेरा गाँव में कितना नाम होगा। गाँव के सैकड़ों घरों मे से तेरा घर चुना गया है। तुझे तो उत्सव मनाना चाहिए। आज के इस भोज के बाद अब तू गाँव में राजा भोज हो गया है, गंगू तेली नहीं रहा।

 

                   ऐसा जब तक चुनाव की वेला रहती किसी न किसी गाँव में किसी न किसी दल द्वारा यह जारी रहता और प्रचार थमते ही सब थम जाता। मैं अपने बंगले, तू अपनी झोंपड़ी। अगले चुनाव में फिर मिलेंगे। एक के बाद एक ऐसे आयोजनों ने इस दलित-भोज की चमक फीकी कर दी। हरेक ऐरा-गैरा मुंह उठाए दलित के घर खाने पहुँच जाता इससे इसमें जो 'यूनिकनेस' थी वो खत्म हो गई। वो क्या कहते हैं 'क्लिशे' बनते बनते रूटीन हो गया। जब आपके जादू की पोल खुल जाये तो खेल जमाये रखने के लिये जरूरी हो जाता है कि मदारी ट्रिक बदल ले। कोई दूसरा खेल दिखाने लग पड़ता है। इस बीच दलित गुहार लगा रहे हैं "साब जी ! कभी खाने पर अपने घर भी तो बुलाईये"। अब उसे कौन समझाये पहले तो फैमिली तैयार नहीं होगी, हो भी गई तो वो 'एम्बियन्स' कहाँ से आ पाएगी और सबसे बड़ी बात अब चुनाव खत्म हो गये इसे घुसने किसे दिया चौखट पर ?

 

                  इसलिए अब लेटेस्ट है टिफिन राजनीति। याद है पहले एक चलती थी डिनर डिप्लोमेसी। टिफिन मीटिंग में बहुत सुभीता है। भैया सब अपने-अपने घर से टिफिन लेकर आओ, खुद खाओ, हमें खिलाओ, बैठो हमारे साथ, फोटो खिंचाओ और फूटो यहाँ से। दिखाई मत देना दूर-दूर तक। मैं सोच रहा था ! सबके टिफिन एक जैसे होते हैं ये टिफिन पार्टी दफ्तर ने परमानेंट खरीद लिए हैं या फिर इसका ठेका किसी पार्टी वर्कर के भाई या मैडम को मिल गया है जिन्हें टिफिन सर्विस का तजुरबा पहले से होगा ही।

 

                   अब मैं सोच रहा हूँ टिफिन सर्विस के बाद अगला ईवेंट क्या हो सकता है। भारत में बहुत व्यंजन हैं। मेरे कुछ सुझाव हैं:

 

पानी-पूरी पार्टी

चाट-चर्चा

समोसा सेमीनार

दही-भल्ला सम्मेलन

छोले-भटूरे संवाद

चूरमा-बाटी कॉन्फ्रेंस

पुलाव-वार्ता

                

                 आखिर यूं ही तो नहीं मेरे भारत महान में 'मल्टी पार्टी सिस्टम' बताया जाता थोड़ा वेट करिये पास्ता, नूडल, मेक्रोनी, मोमोज, सभी आएंगे ! सुना नहीं अब हम विश्वगुरु हो गयेले हैं।

Sunday, June 11, 2023

व्यंग्य : सेफ़्टी-फंड, फुट मसाजर, क्रॉकरी और विंटर जैकिट

 

सुनने में आया है कि ऑडिटर्स ने एक रपट दी है जिसके अनुसार रेलवे को जो फंड सेफ़्टी के नाम से दिया था उससे रेलवे ने फुट मसाजर, क्रॉकरी और विंटर जैकिट खरीद ली हैं। इस बात को इस तरह से पेश किया गया है जैसे कि इन चीजों का रेलवे सेफ़्टी से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि ऐसा नहीं है। मैं साबित कर सकता हूँ कि तीनों ही चीज़ें रेलवे की सेफ़्टी के लिए अनिवार्य हैं। इनमें से एक का भी न होना सेफ़्टी के साथ खिलवाड़ है। सेफ़्टी को नज़र अंदाज़ करना है।

 

           आप अपने घर में फुट-मसाजर पता नहीं रखते हैं या नहीं। नहीं रखते तो कभी न कभी अपने बच्चे, अपने छोटे भाई या अपने किसी न किसी पारिवारिक सदस्य को अपने शरीर पर खड़ा कर दबवाते तो होंगे। जो दबवाते हैं उन्हे यह भान है कि इससे कितना आराम मिलता है। कितनी स्फूर्ति मिलती है। और आप पुनः काम पर जाने को तैयार हो जाते हैं। ऐसी ही कुछ ताज़गी का संचार होता है। अब बात लीजिये रेलवे के सेफ़्टी स्टाफ की। वे बेचारे सर्दी-गर्मी, बारिश-लू, रात-दिन पेट्रोलिंग करते हैं। एक ट्रैक मेंटेनर कितना पैदल चलता है आपको अंदाज़ा भी नहीं होगा। अतः फुट-मसाजर कोई आराम की या विलासिता की वस्तु, यंत्र या उपकरण नहीं बल्कि एक आवश्यक किट है। मैं तो कहूँगा अनिवार्य है।

 

        अब बात करते हैं क्रॉकरी की। भई इंसान ड्यूटी पर चाय-पानी पिएगा या नहीं। जब हाड़ कंपाने वाली ठंड पड़ती है, जब कप में डालते-डालते चाय ठंडी हो जाती है, जब हाथ जेब से बाहर निकालना भी दूभर होता है ऐसे में कोई गरीब क्रॉकरी में चाय-पानी भी न पिये। या क्या आप उसको यह कहेंगे कि कप-प्लेट चम्मच गिलास अपने घर से लेकर आओ या कहोगे कि जाओ ड्यूटी छोड़ो अपने घर से चाय-पानी पी कर आओ।सेफ्टी के साथ खिलवाड़ तो आप कर रहे हैं। सर जी ! क्रॉकरी उतनी ही ज़रूरी है सेफ़्टी के लिए जितने अन्य कोई हाई-फ़ाई उपकरण। आप इसे नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। याद है न एक कील की वजह से युद्ध हार गए थे। (बैटल वाज लॉस्ट ड्यू टू ए नेल) तो कप-प्लेट को आप इतने हल्के में न लें प्लीज़। कप यानि प्याले पर उर्दू शायरी में दीवान के दीवान लिखे जा चुके हैं। क्या उमर ख़ैयाम,

क्या मधुशाला। कप अर्थात प्याले से शुरू हो प्याले पर खत्म हैं। कभी एक प्याली चाय सेफ़्टी स्टाफ के साथ पी कर तो देखें आपको यकीन आ जाएगा क्रॉकरी की महत्ता का।

            अगली मद है विंटर जैकिट की। यह भी खूब रही। आप क्या चाहते हैं बेचारा गैंगमैन ठंड से ठिठुर कर ही मर जाये। आप तो अपने ड्राइंग रूम में बैठे हैं, हीटर लगा कर। उस बंदे से पूछो जिसे पूरी रात दिसंबर की सर्दी में खुले आकाश के नीचे पेट्रोलिंग करनी है। सिग्नल देना है। लैवल क्राॅसिंग गेट को हर ट्रेन के लिये बंद करना, खोलना है। लाइन क्लियर देनी है। यह ऑब्जेक्सन वगैरह लगाना आसान है ज़मीनी हक़ीक़त जानना भी ज़रूरी होता है सरकार। जिन्हें लगता हो आवश्यक नहीं है उनको मुझे याद है जब एक बार जॉर्ज फर्नान्डिज़ के रक्षा मंत्री के टाइम पर जब उनके मंत्रालय में से किसी ने सेना के लिए विंटर जैकिट पर आपत्ति की थी उन्होंने उस स्टाफ को बार्डर पर भेज दिया कहा कि खुद देख कर आओ, महसूस करके आओ, ज़रूरत है या नहीं। कहना न होगा कि तुरंत आनन-फानन में सब आपत्तियां उसी तरह पिघल गईं जैसे सूर्य के आने से स्नो पिघल जाती है।

 

        एक फुट- मसाजर को छोड़ भी दें तो बाकी चीज़ें इन पर अंग्रेजों के ज़माने से हैं। वो तो उन्होने आपसे फुट-मसाजर भी नहीं मांगना था। आपने अर्थात आपके अधिकारियों ने ज़रूरी समझा होगा तब न सैंक्शन किया होगा। एक कारण यह भी है कि अब आपने भर्ती तो लगभग-लगभग बंद ही कर दी है। अतः आपके ये फुट-सोल्जर अपने फुट की मसाज किस से कराएं ? पहले तो केजुअल लेबर होती थी, खलासी होते थे  प्यून होते थे। आपने सब बंद कर दिये। अब आपकी 'अच्छी नज़र' इन चरण दासों के चरणों पर बोले तो फुट-मसाजर पर है। क्या यह भारत जैसे विश्वगुरु को शोभा देता है कि जिसके चरणों में विश्व लोटने को लालायित हो उसके कर्मयोगियों को फुट मसाजरों के लिए तरसना पड़े।

Thursday, June 8, 2023

व्यंग्य बारिश बम्बई और बजट

                      कहते हैं भारत में तीन मुख्य फसलें होती हैं। रबी, जायद, खरीफ किन्तु यह एक अर्धसत्य है सच यह है कि इन तीनों से कहीं अधिक ‘रिलीफ़’ की फसल होती है। रबी-खरीफ की फसल के तो मौसम आते है मगर रिलीफ़ की फसल प्यार के मौसम की तरह  साल भर लहलहाती है। कारण भारत एक महान देश के साथ साथ विशाल देश भी है। अतः यहाँ कहीं न कहीं हर मौसम में कुछ न कुछ चलता रहता है। कहीं बाढ़, कभी सूखा, कहीं ओलावृष्टि, कहीं अकाल, कहीं भूकंप, कभी दुर्घटनाएँ। और कुछ नहीं तो अनेकानेक सरकारी योजनाएँ जिनमें इन रिलीफ़ वालों के लिए पर्याप्त संभावनाएं निहित (इन-बिल्ट) होती हैं.

 

          नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए

         बाकी जो बचा था रिलीफ़चोर ले गए

 

             बंबई पर प्रकृति बहुत मेहरबान है। अब बम्बई मुम्बई हो गई है मगर प्रकृति की मेहरबानियों में कोई कमी नहीं है। बारिश होती है और खूब होती है। इतनी होती है कि रिलीफ़ की ज़रूरत पड़ती है और मज़े की बात है वो भी साल दर साल। न बारिश कम होती है, न रिलीफ़। न वो फंड जो नालों की सफाई, सीवर की सफाई आदि-आदि के मद मे लिए-दिये जाते हैं। आपने दिल्ली के अशोक होटल का नाम सुना होगा। जब बना था तब लाल पत्थर का था, बिल्कुल लाल क़िले के माफिक। फिर एक अध्यक्ष आए और उन्होने कहा ये होटल कम लालक़िला ज्यादा दिखता है। लालकिला आखिर क्या है हमारी गुलामी का प्रतीक यह प्रभावशाली नहीं। पर्यटक को प्रभावित नहीं करता। आँखों को सुखद नहीं लगता। अतः इसे सफ़ेद पेंट कर दो। ताजमहल बना दो। शुभ्र, श्वेत  बिलकुल हंस के माफिक। फिर क्या था देखते-देखते अशोक होटल सफ़ेद पोत दिया गया और साहब लालकिला जो है सो ताजमहल बना दिया। वो बात दीगर है दिल्ली का लालकिला हो या आगरा का ताजमहल दोनों बनवाये मुग़ल शहंशाह शाहजहां ने ही थे। आने वाले सभी अध्यक्ष उन अध्यक्ष महोदय के शुक्रगुजार हैं क्यों कि अब अध्यक्ष दर अध्यक्ष पूरे होटल को सफ़ेद पेंट किया जाता है। सोचो सफ़ेद रंग है तो मैला भी जल्द हो जाता है। कितना सुभीता हो गया है आने वाले नए-नए अध्यक्षों के लिए।  पेंट वालों के लिए, ठेकेदारों के लिए।

 

                सब्बे सत्ता सुखी होन्तु

 

             बस कुछ इसी तर्ज़ पर न बैरी बारिश कम होती है न रिलीफ़ फंड कम होता है। अब बाकी बचा रिलीफ़ वो भी आम जनता को तो वान्दा नहीं। आम आदमी की भला क्या बात करना जो आगे देखता न पीछे। बस मुंह उठा कर बंबई की तरफ भाग छूटता है। यही है जो पटरियों के सहारे ‘खोली’ डालता है। यही है जो पटरियो के साथ इंडिया शाइनिंग के चक्कर में सुबह-सुबह गंदगी करता है। इनकी खोली मे संडास बनाया तो भी ये यहीं रेल ट्रेक पर आने वाले हैं। इनकी वजह से ही नाले, सीवर जाम होते हैं, चोक होते हैं।इन्हीं के लिए इतने सारे फंड्स एलोकेट करने पड़ते हैं। न आपका गंदगी करना रुकता है, न हमारा फंड एलोकेट करना। हजारों करोड़ साल दर साल सीवर मे अरमानों की तरह बह गए, अब बह गए या तर गए वो किस्सा फिर कभी।  कितने लोग इस रिलीफ़ के चलते चीफ हो गए। कितने 'सी' क्लास ठेकेदार, '' क्लास काँट्रेक्टर बन गए। सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ गए, और तो और ब्रांच आउट कर के जीवन के अनेक क्षेत्रों मे सीढ़ी चढ़ गए। अब क्यों न चढ़ते ? वो सीढ़ी  बनाने को खोखे रूपी सीमेंट-गारा साथ लिए चलते हैं।  बोलो कहाँ सीढ़ी बनाने का है ?  कितने खोखे ? आई मीन कितने माला ? मतलब नाले से उठ कर निराले हो गए। बी.एम. सी. से चले मंत्रालय जाकर रुके, कितने तो दिल्ली तक आन पहुंचे। तो दोस्तो देखी आपने रिलीफ़ की फसल।  इसकी खुराक द्रुत गति से  चित्त मे चपलता लाती है।  'आई एम ए कम्पलान बॉय' पुराना पड़ गया। 'आई एम ए काँट्रेक्टर बॉय' लेटेस्ट है।

 

             अब वो भी क्या करें ? अगर बारिश ने यह तय कर लिया है कि वह नहीं रुकेगी, अपना रौद्र रूप जारी रखेगी तो कांट्रैक्ट देने वाले रिलीफ़ पहुंचाने वाले और हमारे काँट्रेक्टर भाऊ क्यों पीछे हटने लगे।

 

           "वो जफा किए जा रहे हैं हम वफा किए जा रहे हैं

           अपना - अपना फर्ज़ है दोनों अदा किए जा रहे हैं"

Tuesday, June 6, 2023

रेलवे एक्सीडेंट -- आदमी और इंसान

              

दुनियाँ भर मे हर क्षण कहीं न कहीं कोई न कोई दुर्घटना घटित होती रहती है. तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में यह अनहोनी भले हो मगर हो रही है तो हो रही है। असल में 'फेल-सेफ' या 'ज़ीरो एक्सीडेंट' एक आदर्श है एक गोल है। ज़रूरत इस बात की है कि कितनी जल्दी कितनी सूझ बूझ से मदद पहुँच जाती है। जिस समाज में हम रह रहे हैं वह कितना संवेदनशील है। 'व्यवस्था' का रिसपाॅन्स टाइम और रवैया क्या है ?

रेल दुर्घटना में प्राय: देखा गया है कि सरकरी मदद पहुंचे, डॉक्टर नर्स, एक्सीडेंट रिलीफ़ ट्रेन पहुंचे, हेलीकाॅप्टर घनघनाएं, नेतागण लपकें उस से पहले निकटवर्ती गाँव के बाशिंदे भाग छूटते हैं। यहाँ बाशिंदों से मेरी मुराद मवेशी छोड़ सबसे है क्या आदमी, औरत, क्या किशोर, क्या बच्चे। यहां तमाशबीन ज्यादा होते हैं। आनन-फानन में बड़े-बूढ़े और सयाने किशोर घायलों की मदद को आते हैं। दिल से मदद करते हैं। जी-जान लगा देते हैं। काफी कुछ तमाशबीन भर होते हैं जबकि एक वर्ग और उसकी संख्या छोटी नहीं, जो लूट पाट चोरी-चकारी में व्यस्त हो जाता है। जान के अलावा माल की सुरक्षा बहुत ज़रूरी है ऐसे में।

जिस तरह दिल्ली में सन् 84 के दंगों में लूटपाट मची थी और जिसके हत्थे जो लगा ले भागने वाली स्थिति थी उसी तरह के दृश्य देखने को मिलते हैं। लोग-बाग सवारियों से सामान लगभग छीन रहे होते हैं। जैसा कि मैंने कहा हमारे अंदर दोनों मौजूद हैं दानव और मानव। यह तथाकथित सभ्य और आदमियत बोलो इंसानियत बोलो इसके पेंट की परत बहुत पतली है जरा सी खरोंच से अंदर की जंग लगी हमारी शख्सियत (हैवानियत) बाहर आ निकलती है। अब समझ में आया जब मुहावरे के तौर पर ही सही कहा जाता है मेरे अंदर का जानवर, दरअसल यह बेचारे मूक जानवर को बदनाम करने की साजिश है कहना तो चाहिए मेरे अंदर का हैवान। लोग बजाय फँसे हुए यात्री को बचाने के, उंगली काट कर सोने की अंगूठी को लेने में ज्यादा मसरूफ़ दिखे। उनके लिए यह एक स्पोर्ट्स कि तरह हो जाता है। यद्यपि बहुत लोग वास्तव में मदद करते हैं। वह इसको अपना फर्ज़ समझ अपनी इंसानियत का परिचय देते हैं। जबकि ये अन्य के लिए आपदा में अवसर बन जाता है फिर वे एंबुलेंस ड्राइवर हो, या अंग्रेज़ी बोलते एययरलाइन्स के डायनामिक फेयर वाले डेविल हों जो 6 हज़ार किराये के 56 हज़ार वसूलते हैं। सोचने वाली बात है वो जंगल, गाँव खेड़े में लूटने वाला खराब और यह शहर में डायनेमिक फेयर लेने वाले अलग अलग कैसे हो गये। दोनों ही खराब हैं तो इसका उपाय क्या है ? यह हमारे अंदर का दानव ही है जो घटना स्थल पर 'सोलो' काम कर रहा है तो शहर में 'कॉर्पोरेट स्टाइल' में।

इस दौर में इंसानियत और सभ्यता के पेंट का ‘कोट’ वाकई बहुत पतला है
All reactio

Monday, June 5, 2023

रेलवे -- राष्ट्र की जीवन-रेखा

 

1               रेल बजट को खत्म कर जनरल बजट के साथ मिला देने से लाभ क्या हुआ ? पता नहीं। पर नुकसान क्या हुए ? वह हैं: फोकस खत्म हो गया, पहले रेल बजट नीचे से इनपुट लेकर ऊपर जाता था अतः एक प्रतिबद्धता सभी में देखने को मिलती थी। तब राष्ट्रीय फोकस होता था। देश रेल बजट की प्रतीक्षा करता था। उसमें सभी के लिये कुछ न कुछ होता था। अतः रेल कर्मियों और अधिकारियों का भी फोकस रहता था। अब ऐसा नहीं है। बजट कब आया, कब गया किसी को नहीं पता। कुछ लेना देना नहीं। रेलवे बजट जब आता था तो उसके प्रोजेक्ट पर, नई ट्रेनों पर, नई सुविधा नई लाइन इन पर फोकस होता था। लोग नज़र रखते थे इस से रेलवे पर भी एक दबाव रहता था।

 

2               पहले कुछ काम ठेके पर दिये जाते थे अब कुछ ही काम हैं जो रेलवे कर रही है बाकी सब ठेकेदार, एजेंसी, पी. पी. पी. या फिर रेलवे की पी. एस. यू. के माध्यम से ठेकेदार ही कर रहे हैं। जिस से शोषण को एक नई दिशा मिली है। 8-10 हज़ार में आप जिस नौजवान, नवयुवती को ले रहे हैं उसकी प्रतिबद्धता, उसका प्रशिक्षण, उसकी रुचि, उसका मन लगा कर काम करना सभी तो घेरे में है आखिर कुछ तो फर्क रखें रेल संचालन और डिलिवरी बॉय में।

 

3                हजारों रेल कर्मी/अधिकारी प्रति माह सेवा मुक्त हो रहे हैं उनके पद भरे जाने का दूर-दूर तक कोई प्लान या नीयत नहीं है इस से न केवल काम की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है बल्कि जो लोग बचे हैं उनमें एक अज़ब निराशा, फ्रस्ट्रेशन है। रेलवे भर्ती बोर्ड और यू. पी. एस. सी. की लास्ट परीक्षाएँ कब हुईं थीं किसी को याद नहीं। जहां परीक्षा हो गई, वहां दूसरा चरण पेंडिंग है। जहां दूसरा चरण हो गया वहाँ मेडिकल पेंडिंग है। जहां मेडिकल हो गया वहाँ जॉइनिंग पेंडिंग है। वो भी कल, पिछले महीने या पिछले साल से नहीं बल्कि कई साल से। इस चक्कर में कितने ही युवा ओवर-एज हो गए अर्थात कहीं और नौकरी के लायक भी नहीं रहे।

 

4              न केवल बीसियों रेल भर्ती बोर्ड ठलुआ हैं बल्कि रेलवे स्टाफ कॉलेज, ज़ोनल ट्रेनिंग सेंटर भी बंद पड़े हैं। रेलवे स्टाफ कॉलेज (नेशनल अकादमी ऑफ इंडियन रेलवे) अब समाप्त  है और उसकी जगह अब यूनिवर्सिटी बना के अंडर- ग्रेजुएट तथा अन्य तकनीकी कोर्स जनरल पब्लिक के लिए चला दिये गए हैं। अब तो सुनते हैं वहाँ की लाइब्रेरी को जनता के लिए एक भारी शुल्क देकर खोल दिया गया है।

 

5              रिनुयल फंड, भवनों, पुलों की मरम्मत, ट्रैक का काम सब फंड्स का मुंह ताक रहे हैं। मौजूदा सुविधाओं में कटौती पर कटौती ही नहीं बल्कि अन्य अनिवार्य खर्चे भी टल गये हैं या टाल दिये गये हैं। अब सीनियर सिटिज़न आदि जैसी अनेकानेक रियायतें रह ही नहीं गई हैं। रेलवे के कारखाने एक के बाद एक प्राइवेट को सौंप दिये गए हैं या गतिविधि रेलवे से समाप्त कर ठेकेदार को दे दी गईं हैं।

 

6               रेल-भवन भूतहा हो गया है। कॉरीडोर के कॉरीडोर खाली पड़े हैं। कमरे सील हैं। स्टाफ या तो सेवानिवृत्त हो गया है या ज़ोन में भेजा जा चुका है। यही हाल अफसरों का है। जो बच रहे हैं वे ठकुरसुहाती में बिज़ी हैं। रेलवे की किसी को पड़ी नहीं है, ऊपर से नीचे तक। सब खबर में रहना चाहते हैं या गुड बुक्स में। इसलिए आप सुनते हैं, कभी ऑफिस प्यून हटा दिये। कभी प्यून को बुलाने की घंटी हटा दी। सब कुछ प्रायोजित सा लगता है। सब समवेत सुर में चिल्ला उठते हैं "क्या मास्टर स्ट्रोक है।" अंग्रेजों की निकृष्ट विरासत -- सैलून हटा दिये, प्यून हटा दिये। विदेश की छोड़ो, इंडिया में भी ट्रेनिंग अनावश्यक बता हटा दी। डिवीजन लेवल या जी.एम. लेवल पुरस्कार हटा दिये गये हैं। स्कूल हटाओ, रेलवे अस्पताल हटाओ। रैस्ट हाउस, रनिंग रूम, रेलवे स्टेडियम, लिनन सेवा सभी तो आज ठेके पर है। पीछे फर्स्ट ऐ. सी. में एक यात्रा के दौरान जब अटेंडेंट से लिनन मांगी तो उसने मेरी बर्थ पर लाकर पटक दी। मैंने पूछा फर्स्ट ऐ. सी. में तो बिस्तर लगाते भी हैं वह बोला "मैं नया हूं मुझे लगाना नहीं आता।" मैंने फिर पूछा "कोई ट्रेनिंग नहीं मिली ?" तब उसने बताया "मैं आज ही आया हूं और  यह मेरी पहली ट्रेन यात्रा है" मुझे उस पर दया आई। आप अगली बार यात्रा में केटरिंग वाले किशोर बालक से पूछ देखें उसका असल वेतन क्या है ? आपको जवाब मिल जायेगा। ठेकेदार का अपना रोना है। L-1 और जेब गर्म करने के चक्कर में उसे कुछ बचता ही नहीं है।

 

7                अब इंसपेक्शन कोच (सैलून) हटा दिये गए हैं। अधिकारी निरीक्षण पर पहले जैसे नहीं जाते। स्टाफ के मामले मे टी. ए., डी. ए. में कटौती कर दी गई है कहीं-कहीं एक ऊपरी कैप लगा दी गई है। अतः अब स्टाफ फील्ड मे बहुत कम जाते हैं। इस से नियमित निरीक्षण मे कमी आई है। ड़ी आर एम और जी एम के सालाना निरीक्षण भी अब इतिहास बन गए।

 

8                रेलवे अधिकारियों के टी ए डी के (टेलीफोन अटेंडेंट-कम-डाक खलासी) की पोस्ट ही खत्म कर दी। इससे बहुत असंतोष है वर्तमान तथा भावी प्रत्याशियों के मन में। भावी प्रत्याशी के मन में इसलिए कि वे टी ए डी के बन रेलवे में नौकरी का सपना पाल रहे थे, कहीं कहीं तो वे ट्रायल पर पहले से ही अधिकारियों के साथ काम कर रहे थे।  वर्तमान कार्यरत टी ए डी के  इसलिए दुखी हैं कि क्या अब वे जीवन भर टी ए डी के ही बने रहेंगे कारण कि अधिकारी उनको छोड़ेंगे नहीं जब तक वे दूसरे टी ए डी के की भर्ती न कर लें। रेल अधिकारी दूसरे टी ए डी के की भर्ती कर नहीं सकते कारण कि अब वो स्कीम ही खत्म कर दी गई है। उसकी जगह जो स्कीम आई है उसमें एजेंसी के माध्यम से ठेके पर लेना है।  रेलवे में नौकरी पर नहीं।

                यहाँ टी.ए.डी.के. भावी टी.ए.डी.के. और अधिकारियों की भी सुनें टी.ए.डी.के. एक असैट है। वह दिन-रात भाग दौड़ करता है। जब आप रिमोट जगह पोस्ट होते हो तब घर की देखभाल करता है। उसके लिये बेहद भरोसे का व्यक्ति चाहिए होता है जिसे आप जिम्मेवारी सौंप सकें और बेफिकर हो सकें। वह समय के साथ रेलवे केन्द्रित कामों के लिये प्रशिक्षित होता है यह लगन यह निष्ठा एजेंसी वाले से आप उम्मीद नहीं कर सकते।

 

9                 बहुधा रेल की तुलना सेना से की जाती है। यद्यपि सेना युद्ध के समय मुस्तैद रहती है जबकि रेलवे दिन-रात, सर्दी-बारिश, दीवाली-ईद हर समय चलती रहती है। आखिर इसे यूं ही नहीं लाइफ लाइन ऑफ नेशन कहा जाता। आप जब ट्रेन में चैन की नींद सो रहे होते हैं तो कितने रेलकर्मी काम पर लगे होते हैं जंगल में लैवल क्रासिंग गेट हो या मेन स्टेशन या वे साइड स्टेशन। ऐसी निष्ठा और कर्तव्य के प्रति सजगता और प्रतिबद्धता एक रेलवे कार्यप्रणाली केन्द्रित प्रशिक्षित रेलकर्मी से ही मिल सकती है। ठेके की लेबर से नहीं। आप बहुधा सेना की ही तरह पायेंगे कि लोगबाग बड़े गर्व से बताते हैं हमारी तीसरी पीढ़ी रेल सेवा में है।

 

10                सन् 2026 में वेतन कमीशन आयेगा इसका बहुत संदेह है और इस से अनिश्चितता की स्थिति है। कोई शुभ संकेत नहीं हैं कारण कि आपके डी.ए. की किश्त कहां गई आपको हवा भी नहीं लगी।

 

11                   दुर्घटना नहीं होगी ऐसा नहीं है मगर हर दुर्घटना की कायदे से जांच हो, और उसमे कोई पालिटिकल कोण नहीं होना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। और हाँ इस प्रकार की घटना दोबारा न हो उसका इंतज़ाम करना बहुत ज़रूरी है। अब डी. आर. एम. और जी. एम. क्या और मेम्बर क्या सब अपने आपको एक ‘वर्थलेसनेस’ के दौर से गुजरता महसूस कर रहे हैं।

 

     सास को अपने सिंगार से ही जहां फुर्सत न हो वहां बहू सजने की ज़ुर्रत नहीं करती।