Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Tuesday, June 30, 2026

व्यंग्य: भिक्षावृति - हमारा राष्ट्रीय व्यवसाय

 

 

हमारे प्राचीन शास्त्रों में भिक्षावृति बोलचाल की भाषा में बोले तो भीख मांगने का खूब प्रचलन रहा है। आप "भिक्षाम देहि" से अपरिचित नहीं होंगे। दशानन ने सीता का अपहरण इसी वाक्य की सहायता से किया था। दूसरे शब्दों में हर शहर, हर गाँव में एक वर्ग ऐसा था जिसका मुख्य व्यवसाय भीख मांगना होता था। अब आप चाहें तो इसे किसी भी सम्मानजनक नाम दे दें कहलाता यह मूलतः भीख मांगना ही है। आपके गाँव, कस्बे शहर में सुबह सुबह भिक्षावृति वाले निकल पड़ते थे। जनता इन्हें कुछ न कुछ भिक्षा देना अपना सामाजिक और धार्मिक कर्तव्य समझती थी। शायद ही कोई भिक्षुक खाली हाथ भेजा जाता था। अनाज, पैसा, जो हो। अब तो भिक्षा वालों ने अपने दफ्तर ही खोल रखे हैं। जहां किसी न किसी छद्म नाम का बोर्ड लगा होगा मगर मुख्य काम भीख का ही होता है। ये भीख मांगने वाले सड़क किनारे, मंदिर-मस्जिद के रूट पर, रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में, हज के दौरान और कुम्भ जैसे विशेष अवसरों पर  प्रोफेशनल भिखारी अपनी यूनिफ़ाॅर्म पहन जा पहुँचते हैं। उनकी इस काम में अच्छी-ख़ासी आय होती है। आए दिन केस आप भी पढ़ते रहते होंगे कि अमुक भिखारी लाखों छोड़ के मर गया या भिखारी के शहर में महंगे फ्लैट हैं अथवा उसके ऑटो चल रहे हैं। कई भिखारी तो बड़े ठेकेदार टाइप बन जाते हैं बोले तो उनके अंडर में यानि उनके सिंडीकेट में अन्य भिखारियों के भी दल के दल शामिल होते हैं।

 

इन सब में भारतीय रेलवे का बहुत बड़ा योगदान है। 1853 में जब रेलवे चली थी तब किसी ने सोचा भी न होगा कि भिक्षावृति में रेलवे इतनी महत्ती भूमिका अदा करेगी। भिखारी लोग स्टेशन के आसपास मँडराते रहते हैं। ये उनके परमानेंट टाइप के अड्डे यानि कट्टे (अड्डे का मराठी अनुवाद)  होते हैं। मुंबई भीख के लिए बड़ा मुफीद है यूं तो हर वो शहर जहां खूब लोग-बाग हों, भिखारियों की पसंदीदा जगह होती है। इस मामले में वे बिलकुल नेताओं जैसे होते हैं। जैसे नेता को हर शख्स में एक अदद वोटर नज़र आता है वैसे ही भिखारी को हर चलता-फिरता मानुष दाता नज़र आता है। भीड़-भाड़ के मामले में स्टेशन से बेहतर क्या होगा। गाड़ी आ रही है...गाड़ी जा रही है...गाड़ी बुला रही है। बहुत से भिखारी प्रिंट्ड कार्ड सा भी रखते थे और सोचते थे यह एक थोड़ा सम्मानजनक तरीका है। कुछ गीत गा कर, कुछ करुणामयी आवाज निकाल कर। कुछ और तरीके का स्वांग भर के भीख मांगते हैं।

 

ये भिखारी आपको स्टेशन स्टेशन मिलेंगे। क्या स्टेशन के बाहर क्या स्टेशन के अंदर। ट्रेन में भी।  कोई ट्रेन इनसे अछूती नहीं। ना ही कोई स्टेशन इनसे दूर। मुझे लगता है कई बार ये प्लेटफॉर्म पर आने के लिए किसी न किसी को जरूर भीख देकर ही अंदर आ पाते होंगे। ऑटो-टैक्सी वालों को प्लेटफॉर्म के अंदर आने की मनाही होती है अतः वे सीढ़ियों पर खड़े आपको मिल जाते हैं और आपसे लगभग लगभग सामान छीन कर अपने ऑटो अपनी टैक्सी में बिठाना चाहते हैं ताकि आपको किसी सुनसान जगह पर जाकर लूटा जा सके और लूटा नहीं जा सके तो किराये के रूप में ही छीन लो जितना हो सके।

 

पता नहीं क्यों मगर स्टेशन का इलाका भीख मांगने वालों में बहुत लोकप्रिय होता है। एक कारण तो यह होगा की 24 घंटे स्टेशन पर रौनक-मेला रहता है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई छोड़ने आया है तो कोई लेने आया है। यह जमावड़ा ही तो भिखारी का भिक्षादान केंद्र है। वे बिंदास आपको जनरल डिब्बे में मिलेंगे, रिजर्व डिब्बे में मिलेंगे। फर्स्ट क्लास में मिलेंगे। सेकंड क्लास में मिलेंगे। अब तो स्वांग के साथ साथ टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोलते भी मिल जाते हैं दरअसल ये उनका व्यवसाय है इसके लिए जो भी समान लगता है जैसे यूनिफ़ाॅर्म, अस्पताल की पट्टी, पलस्तर, सहारा लेकर चलने को लाठी। उँगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी करना। अनेकानेक प्राॅप्स हैं इस काम में। आपका थोड़ा मरा-गिरा सुकड़ू सा होना जरूरी हैं अगर आप जिस्मानी तौर पर मजबूत कद-काठी के हैं तो आसानी से भीख नहीं मिलती। कुछ और औटपाए करने पड़ते हैं। सन् सत्तर के दशक की बात है मेरे मित्र ने कॉलेज के बाहर एक भिखारी को कहा छुट्टे नहीं हैं उसने पूछ लिया कितने का नोट है? मित्र ने कहा सौ का नोट है! उसने बैठ कर अपनी पगड़ी में से सौ के खुले दे दिये। तब सौ रुपये बहुत होते थे।

 

यह एरिया किन्ही कारणोंवश सरकार से वैसी मान्यता और सुविधाएं नहीं पा रहा जैसी कि ये डिजर्व करता है। मसलन फौरन से पेश्तर भिखारियों को बाकायदा लाइसेन्स दिये जाएँ ताकि उनके आपस में क्षेत्राधिकार के झगड़े न हों। बागपत में किन्नर लोग की शिकायत है  सोनीपत के किन्नर आ कर हमारे बिजनिस में हिस्सा-बाँट कर रहे हैं। इसी तरह जब क्षेत्राधिकार तय हो जाएँगे तो यह समस्या नहीं रह जाएगी। उनसे आयकर भी लिया जा सकता है। उनके भीख मांगने के टाइमिंग्स भी रेगुलेट किए जा सकते हैं। वे हमेशा अपने पास आई.डी. कार्ड रखेंगे। सरकार बी.डी.ओ. नियुक्त करे भिखारी डवलपमेंट ऑफिसर। इस मद को समवर्ती सूची (कनकरंट लिस्ट)  में रखा जाये ताकि राज्य सरकार इसकी देखा देखी अपने नियम-अधिनियम बना सके। कुछ बरस बाद रिव्यू करके इनको इजाजत दी जाये कि अन्य देशों के भिखारियों के साथ ये जाॅइंट वेंचर कर सकें और अपने आई.पी.ओ. जारी कर सकें दूसरे शब्दों में इसे फुल फ्लैज्ड इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाये। भिखारियों के लिये पी.एफ., ग्रेच्युटी और पेंशन पर भी विचार किया जाये। देखें इन्हें इसके लिए अपनी कोई भिखारी पार्टी न बनानी पड़े। रेलवे तो सबसे पहले इनके साथ फिफ़्टी फिफ़्टी की पार्टनरशिप पर पार्टनरशिप डीड साइन कर ले। ये सॉफ्ट स्किल आपको ढूँढे नहीं मिलेगा। राजस्व की प्राप्ति होगी सो अलग। भिक्षाम देहि ?

Monday, June 29, 2026

व्यंग्य: तौबा ये कमेटी

                                                


इस एक छोटे से शब्द के अनेक अर्थ हैं। बचपन में हम सुनते थे 'कमेटी आई ! कमेटी आई !' इसका अर्थ था कि वह छापामार दस्ता जो दिल्ली की गलियों-सड़कों से फेरीवालों यथा गोलगप्पे वालों, बर्फ के गोले वालों और चना-मुरमुरा बेचने वालों की धर-पकड़ करते थे। वे उनको नहीं पकड़ते थे बल्कि उनका सामान ज़ब्त कर लेते थे। हम सोचते यार कुछ भी हो सबसे बढ़िया नौकरी तो इनकी है जब जो खाने का दिल करे उसी का सारा सामान ज़ब्त कर लो। भर पेट गोलगप्पे खाओ। बर्फ के रंग-बिरंगे गोले बना-बना कर खाओ। बर्फ के गोले छोटे, मध्यम और बड़े  खांचों (कप्स) के हिसाब से होते थे और सबसे छोटी इकाई होती थी 'थपकी' बोले तो कोई कप नहीं बस एक मुट्ठी घिसी बर्फ को थपकी देकर चिड़िया सी बना कर पकड़ा देता था।

 

फिर ये कमेटी टर्म हमने सुना जब भद्र महिलाएं जिनके घर के चौके-चूल्हे को 'बाई' देखती थी वे खाली वक़्त को कमेटी तरह बिताने लगीं। इसे वे अंग्रेजी में 'किटी' कहने लगीं। कमेटी(किटी) कई तरह की होतीं थीं। पैसे की लॉटरी से लेकर, बोली लगाने वाली। कमेटी बजट के अनुसार ही भद्र महिलाओं का वर्ग उस से जुड़ा होता था। यह हाई-फाई से लेकर  जिसमें कार्ड्स खेले जाते, बीयर, जिन और बाहर रेस्तरां में लंच होता, कुछ गाना-वाना, जोक-शोक होते हैं। दूसरी तरफ वो लघु बजट कमेटी जो दस-बीस हज़ार की होतीं जिनमें चाय-नाश्ता, भल्ला-पापड़ी होती।

 

इन सबमें सबसे ऊपर होती हैं वे सरकारी कमेटियाँ जिनका गठन संसद करती है। मोटा-मोटा सरकारी कमेटी। वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाया करती हैं और तरह तरह की खामियां निकालती हैं। जितनी ज्यादा खामियां उतनी ज्यादा खातिरदारी। बोले तो खातिरदारी बढ़ती जाएगी अगर खामियां बढ़ती जाएंगी। इनका ज़लवा देखते ही बनता है। शहर में इनके उतरते ही कारों का काफिला पुष्प-हार से एयरपोर्ट पर ही स्वागत के साथ साथ जबर्दस्त ग्लॉसी पेपर पर छपी सामग्री उससे भी महंगा ब्रीफकेस, बैग, फोल्डर, महंगे वाला पेन आदि आदि। जो भी महंगा चल रहा हो उस ब्रांड के सूटकेस से लेकर अपने प्रोडक्ट की झलकस्वरूप प्रतीक / अनुकृति अथवा प्रोडक्ट ही। वे सामान्यत: पाँच सितारा होटल में ठहराए जाते हैं। क्या प्रबंध निदेशक, क्या अध्यक्ष क्या निदेशक सब आतंकित से रहते हैं। ना जाने कब किसकी नस दबा दे ये कमेटी। इस दशा में ये कमेटी उस कमेटी जैसी ही है जो गोलगप्पे वाले का सामान ज़ब्त कर लेती थी और गोलगप्पे के पानी के घड़े को सड़क पर ही उसी निर्दयता से पटक देती थी जैसे कभी कंस ने अपने भांजे-भाँजियों को पटका होगा। इन कमेटी मेंबर्स के आराम का, घूमने का ख्याल रखा जाता है। असल में तो वो जो ग्लॉसी जर्नल उन्हें पकड़ाया जाता है उसमें एक चैप्टर इस बात का ही होता है कि इस शहर में दर्शनीय और शॉपिंग के लिए क्या क्या है। ये 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' बहुत पुराना है। एक कमेटी के रात्रिभोज में हम भी गए थे तथाकथित वरिष्ठ अधिकारी/विभागाध्यक्ष के तौर पर। पता चला कमेटी के अध्यक्ष और मेम्बरान पी कर टल्ली हुए पड़े हैं। बस एक अदद मेम्बर जो शायद सबसे जूनियर रहा होगा/पीता न होगा उसके सान्निध्य में हमने अपना डिनर लिया था। ये कमेटी मेम्बर भी कम नहीं होते एक अध्यक्ष महाराज तो मुझसे बोले "कल रात मेरा पर्स आपके गेस्ट हाउस से कहीं गिर गया"। अब हमारे तो हाथ पाँव फूल गए। लेकिन किसी तरह बात संभाली गयी कि सबसे पूछताछ की जाएगी और सी.सी.टी.वी. की सहायता से चोर को पकड़ लिया जाएगा और पर्स आप तक पहुंचा दिया जाएगा। आगे आप जानते ही हैं सी.सी.टी.वी. का सुन उन्होने बात बढ़ाई नहीं।

 

सरकार ने लेटेस्ट निर्देश दिये है जिसके अनुसार अब से कमेटी मेम्बर पाँच सितारा होटल में नहीं रुक कर सरकारी गेस्ट हाउस/ डाक बंगला/सर्किट हाउस में रहा करेंगे। इसमें एक ही पतली गली है सरकार ने पाँच सितारा होटल को मना किया है आजकल तो होटल छह/सात सितारा भी होते हैं। और तो और कितनों के तो ऑफिशियल गैस्ट हाऊस या गैस्ट हाऊस के एक्सटेंशन इन होटलों में ही होते हैं। बाई दि वे होटल पाँच सितारा डीलक्स  भी होते हैं । पांच सितारा प्रतिबंध किये हैं। पांच सितारा डीलक्स नहीं। मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि मित्र लोग मिल कर इसका तोड़ निकाल ही लेंगे। खानपान पर भी प्रतिबंध लगाए हैं मसलन आप महंगा भोजन नहीं करेंगे। हमारी विभागीय मीटिंग्स के लिए जब लंच के लिए 25-30 रुपये प्रति व्यक्ति  सीमा रेखा आई तो हम लोग ने अतिथियों की संख्या कागज पर ही बढ़ा ली और हमारे पनीर-पकोड़ा, कॉफी- काजू-बादाम बदस्तूर जारी रहे। भला इनके बिना भी कोई मीटिंग होती है कमेटी मीटिंग तो कदापि नहीं। अब से कमेटी मेंबर्स को महंगे गिफ्ट्स  देने की भी मनाही है।  अब ये ‘महंगा’ एक सब्जैक्टिव टर्म है कोई चीज़ मेरे लिए महंगी हो सकती है आपके लिए नहीं। इसमें एक अपवाद है- आप उन्हें 'प्रशासनिक किट' (भगवान जाने इसका क्या अर्थ होता है) डायरी, पेन, स्टेशनरी आइटम दे सकते हैं अतः ये जो बाज़ार में लाखों के पेन हैं ये आपको कागज काले करने को नहीं बेच रहे हैं। ये तो बिक ही इसलिये रहे हैं कि आप इन्हें उपहार स्वरूप दे सकें। बजट अनुसार पेन उपलब्ध हैं। करोड़ों से लेकर पाँच रुपये वाले। सरकार ने चांदी के सिक्कों और इलेक्ट्रॉनिक्स गेजेट्स को देना सर्वथा वर्जित किया है। अतः अब से आप केवल सोने के सिक्के ही दे सकेंगे। नो चांदी प्लीज़। हां आप चाहें तो हीरे-मोती-लाल-जवाहर दे सकते हैं। उनका ज़िक़्र नहीं है। दूसरे ये इलेक्ट्रॉनिक्स गेजेट्स क्या होता है जी? क्या चीज़ है जो गेजेट्स में नहीं आती। हमारे टीचर कहते थे ये जो शेविंग रेज़र है ये भी एक मशीन ही है। अतः हम इसका भी कोई हल निकाल लेंगे इस विषय पर तुरंत एक कमेटी का गठन कर दिया जाये। सरकार ने नोट किया है और घोषणा की है कि अबसे "कमेटी के दौरे शाही नहीं बल्कि सादगी भरे होंगे"। चचा ग़ालिब कह गये हैं:

 

                इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा

                लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं 

Sunday, June 28, 2026

व्यंग्य: पता है मेरा बाप कौन है सिंड्रोम

 


अब ये नहीं पता कि क्या ये 'मेरा बाप कौन है सिंड्रोम' भारत के बाहर भी किसी मुल्क में है क्या। हमारे देश में तो इस सिंड्रोम का खूब बोलबाला है। रोड से लेकर गली-मोहल्ले तक। पॉलिटिक्स हो, बिजनिस हो ये वाली बीमारी हमारे मुल्क़ में महामारी की हद तक फैली है। भारत यूं भी मिडियाॅकर्स (औसत दर्जे/साधारण) लोगों की धरती है। अतः पूरी पीढ़ी की श्रंखला में अगर कोई एक औसत से थोड़ा ज्यादा/साधारण से तनिक ऊपर रिश्तेदार हुआ होता है तो पूरा का पूरा खानदान उसी के पुण्य-प्रताप से जाना जाता है।  वे ये सुनिश्चित करते हैं कि फलां ‘महान’ आत्मा उन के ही रिश्तेदार, बाप, चाचा, ताऊ, मामू, भाई-भतीजा-भांजे हैं अतः उनका भी कुछ-कुछ महान होना तो बनता ही है। सेम-सेम डी.एन.ए. यू सी! (डी.एन.ए. की कोई 'भैलू' है या नहीं?) फिर 'वो' रिश्तेदार कितने ही दूर का हो या आप को मुंह भी नहीं लगाता हो ये आपकी प्रतिभा है कि उसे आप नज़दीक एकदम नजदीक ले आयें ताकि मुंह से मुंह लग जाये।

 

इसे दूसरे शब्दों में 'रिफ़्लेक्टड ग्लोरी' कहते हैं। जिन्हें नहीं मालूम उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि जैसे चंद्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं होती वह सूरज की रोशनी से चमकता फिरता है। कुछ यही हाल इन लोगों का होता है वह गाहे-बगाहे, जगह-जगह इसी मंत्र का जाप करते रहते हैं। इसमें वे कुछ सच्चे-झूठे किस्से भी जोड़ लेते हैं उन किस्सों में मुख्य पात्र वे खुद अथवा उनके ये बाबा, जीजा जी, चाचा-भतीजा होते हैं। वे सभी 'सक्सेस-स्टोरीज़' होती हैं। जिनमें वे खुद अथवा उनका ही अपना ‘वो’  जन्मजात हीरो बन कर निकलता है। यह बड़ी सुखद स्थिति होती है। यह भारत में बड़े काम की चीज़ है। आप यहाँ-वहाँ उनके नाम की जुगाली करते फिरते हैं। इसे अंग्रेज़ी में 'नेम-ड्रॉपिंग' कहते हैं। दरअसल! ग़लती उनकी भी नहीं। शेक्सपियर बहुत पहले कह गए थे:

 

    सम आर बाॅर्न ग्रेट, सम एचीव ग्रेटनेस, सम हैव ग्रेटनेस थर्स्ट अपाॅन दैम

 

तो ये इसी तीसरी किस्म के ग्रेट होते हैं। अब अगर उनका जीजा, साला, भाई-भतीजा ग्रेट है, तो है। इससे उनका रुतबा कम तो नहीं हो जाता। अब अगर समझो किसी का यही भाई-भतीजा भयंकर वाला अपराधी, क़ातिल या स्मगलर निकल जाये तो लोग सब पता लगा लेते है आप बताएं या नहीं। उसी प्रकार अगर उनके ‘वो’ बड़े आदमी बन गए तो इसका कुछ क्रेडिट तो उनको भी दिया जाना चाहिए। यह सब डर और ज़रूरियात का कारोबार है। डर ये कि अगर आपने उनका काम नहीं किया या उनका चालान कर ही दिया तो देख लें हमारे ‘वो’ आपका क्या हाल करेंगे। दूसरे अगर आप हमें छोड़ देते हैं/हमारी मदद करते हैं तो कल को हम आपका काम भी अपने ‘वो’ से कह कर हाथों-हाथ करवा देंगे। मुंबई में रेलवे वाले कहा करते हैं कि एक बार को ट्रैफिक पुलिस भी यह जानकर कि वो रेलवे में हैं फोन नंबर के आदान-प्रदान के बाद छोड़ देती है। यह वादा लेकर कि अगली बार ट्रेन में वी.आई.पी. कोटे से उनकी बर्थ पक्की है। अब अपने बाहर-गाँव कौन नहीं जाना चाहता। सीट की मारा-मारी/सरगर्मी, गर्मी की छुट्टियाँ पड़ते ही दर-साल होनी ही है। यह पचास साल पहले भी थी आज भी है।

 

आपको ऐसे लोगों पर दया करनी चाहिए कि उसके पास सिवाय यह कहने के और कुछ भी नहीं। ना अपनी लियाकत ना अपना नाम। उसकी योग्यता ही यह है कि वह आपका भाई-भतीजा है। उसकी रोज़ी/रोटी/प्रतिष्ठा या तीनों आपके नाम से ही चल रेली है। मैंने एक समारोह में शिरकत की जिसमें नामी फिल्म अभिनेता नहीं आ पाया तो भाई लोग उसकी बहन को ही ले आए। वो बेचारी सीधी-सादी गृहिणी समारोह की चीफ गेस्ट बनी और बचपन से लेकर अब तक के कुछ असली कुछ मनगढ़ंत किस्से सुनाती रही। जिससे दर्शकों को ये पता चले कि 'एक्टिंग' उसमें जन्म से ही थी। कैसे वह रोता भी फुल फुल एक्टिंग के साथ था। ये बेचारे 'मेरा बाप कौन सिंड्रोम' से ग्रस्त लोग भी ऐसे ही होते हैं। इनमें ये प्रतिभा होती है कि कौन से कहानी, कौन सी लघु कथा, कौन सा प्रकरण कहाँ डालना है। जो कहीं उनका सुरक्षा कर्मी या उनकी गाड़ी मिल जाये तो उस दिन तो वे शहर में अपने किसी काम को नहीं छोड़ते। यहाँ जा, वहाँ जा। इससे मिल, उससे मिल। अतः आप से निवेदन है कि ऐसे लोगों की हँसी न उड़ाएं। उनका मज़ाक नहीं बनाना है उनके साथ सहानुभूति रखें। वो कहावत है न कि अगर आपकी कुल जमा संपत्ति एक अदद हथौड़ा मात्र है तो आपको हर चीज़ कील दिखने लगती है। तो उनके पास यही एक अदद हथौड़ा ही तो है आप उनसे ये भी छीन लेना चाहते हैं। शेक्सपियर जो रोमियो-जूलियट में पूछते हैं "वाट्स इन नेम..."  गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो उसकी खुशबू वही रहनी है।  वही शेक्सपियर खुद ऑथेलो में कहते हैं - मेरे पास एक नाम ही तो है।

 

Saturday, June 27, 2026

व्यंग्य भालू बनाओ मोर बनाओ पर नौकरी दिलाओ

 

                                                       


एक समाचार के अनुसार चीन के एक चिड़ियाघर ने भालू की वेकेंसी निकाली हैं। आप सोचते होंगे भालू कौन समाचार पत्र पढ़ता है या टी.वी. देखता अथवा वोट देता है जो सुनेगा,समझेगा और नौकरी का सुन कर आपको वोट देने दौड़ पड़ेगा। हुज़ूर ये वेकेंसी आदमियों के लिए ही निकाली हैं। उन्हें भालू के भेष में चिड़ियाघर में अज़ीब अज़ीब भालू सी हरकतें करके दर्शकों का मनोरंजन करना है। शर्त ये है कि जब वे भालू के भेष में होंगे तब आदमी की भाषा में बोलने का नहीं है। बस खों-खों करना है। इन्सानों की भाषा में बोलना सर्वथा वर्जित है। वेतन होगा पूरे 14 लाख सालाना। सैकड़ों आवेदन आए और देखते-देखते सभी पद भर गए। सिर्फ दिन में 6 घंटे की ड्यूटी और महीने की चार छुट्टियां आलग से मिला करेंगी।

मैं सोच रहा हूँ अगर भारत के चिड़ियाघर भी ऐसी ही रोजगार योजना निकालें तो इस 'वनरेगा' का कोई जवाब न होगा। हम एक कदम और आगे जा सकते हैं। भालू ही क्यों, हम कुत्ता, बिल्ली, ऊंट, गधा, घोड़ा सब बनने को तैयार हैं। 14 लाख के इस पैकेज के लिए आज भी भारत की नवजवान पीढ़ी क्या-क्या नहीं कर रही। आप भालू की एक खों-खों की बात करते हो यहाँ रोजगार मार्किट में हाहाकार मची हुई है। दस-दस, बारह-बारह हज़ार के लिए न जाने क्या-क्या रें-रें खें-खें नहीं करनी पड़ रही है। अब तो कहते हैं हमारे यहाँ की आई.आई.टी. से निकले बच्चों का सी.टी.सी. भी बहुत नीचे आ गया है। शिक्षा का रोजगार से जुड़ा होना सुनते आए थे। अब तो दोनों ही क्षेत्र लस्त-पस्त बरबाद से पड़े हैं। पता नहीं इस क्षेत्र में रिनेसां कब आयेगा? आयेगा भी या नहीं?

प्राइवेट का क्या हाल है आप को भनक नहीं होगी। क्या बच्चे, क्या माताएं-बहनें सब बंधुआ मजदूर से लगे हुए हैं। न दिन दिखता है न रात। काम-काम बस काम। वह भी इतने कम वेतन पर। सिने अभिनेता मनोज कुमार जी की फिल्म उपकार का इन्दीवर जी के गीत की एक लाइन है:

                ये हाल रहा तो दुनिया में भारत की कहानी क्या होगी

               जिस देश का बचपन भूखा हो उसकी जवानी क्या होगी

जैसे-तैसे दूसरे देश चले जाओ तो वहाँ भी 'इंडियन' हो सुन कर कोई भालू भी नहीं बनाता। अब हमीं को योजनाबद्ध तरीके से शिक्षित बेरोजगारों के लिए नई-नई स्कीमें लानी पड़ेंगी यथा: अग्निभालू, अग्नि गधा, अग्नि कुत्ता। तरुणाई का इस युग में इतना अनादर है कि सुन-सुन कलेजा मुंह को आता है। क्या नई पीढ़ी को अब बस भालू-कुत्ता-गधा बना कर ही छोड़ेंगे।

                           डेढ़ आखर खों-खों का

                           पढ़े सो भालू होय


भालू महान है। वह कॉकरोच से बड़ा होता है। वह परजीवी नहीं होता बल्कि उल्टे मदारी और उसके परिवार का पेट पालता है।

Monday, June 22, 2026

व्यंग्य: 45 मिनट्स एट पालम

 

 

हम कितने खुशकिस्मत हैं हमें ऐसे ऐसे नेता मिले हैं कि हमारा सीना गर्व से फूल जाता है। सिर ऊंचा उठ कर आकाश की तरफ बढ़ा जाता है। हिन्दुस्तानी क़ौम अपने लीडरान से त्याग की तवक़्क़ो करती है। हमारे नेता भी एक के बाद एक त्याग की घोषणाएँ करते ही रहते हैं। अब यह हमारे नेताओं की आदत सी हो गयी है। आपने सुना नहीं कितनी ही बार खबर आती है कि फलां ने 'चिल्ला' खींचा है बोले तो बीड़ा उठाया है कि जब तक ढिकाने की सरकार नहीं आ जाती है वह दाढ़ी नहीं काटेगा, अथवा वह जूता-चप्पल नहीं पहनेगा।  कुछ बरस पहले एक नेता जी को जब ये पता चला कि कैसे उनके कारों के काफिले के लिए लगाई गयी ट्रैफिक की रोक-टोक की वजह से बच्चे बोर्ड की परीक्षा देने से वंचित रह गए। यह सुन कर वह इतने द्रवित हुए इतने द्रवित हुए कि दर्जनों तौलिये तो उनके आंसुओं से भीग गए। फिर उन्होने खुद को संभाला और तुरंत ऐलान किया कि अब से वे वायुयान/हेलिकाॅप्टर  से यात्रा किया करेंगे। वे ये कदापि नहीं चाहेंगे कि उनकी वजह से बच्चों का जिनको वे देश का मुस्तकबिल समझते हैं को कोई तनिक सी भी कठिनाई आए।

 

कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है। अभी फिर ऐसा वाकया आया है जहां नेताजी को जैसे ही पता चला कि आज महत्वपूर्ण परीक्षा है उन्होने तुरत फुरत राष्ट्रीय हित में यह फैसला लिया कि वे परीक्षा शुरू होने तक यहीं एयरपोर्ट पर रुकेंगे ताकि उनके लिए लगाए गए 'रूट' से किसी भी स्टूडेंट को कठिनाई ना आए। कहीं वह अपने सेंटर जाने में लेट न हो जायें। आपको दोस्ती फिल्म का वो गीत याद है ना मेरा तो जो भी कदम है वो तेरी राह में है बस यूं समझिए नेता जो भी निर्णय लेता है या जो भी निर्णय नहीं लेता है सब राष्ट्रीय हित  में होता है। उफ़्फ़ वो 45 मिनट्स जो देश की तकदीर बदल देंगे। कैसे ? अरे भाई सब जानते हैं आज के ये बच्चे कल का भविष्य हैं। एक किताब प्रकाशित होनी चाहिए बाद में उस पर फिल्म भी बनाई जा सकती है। अगर '90 मिनट्स एट एंटेबी'  बन सकती है तो '45 मिनट्स एट पालम' क्यों नहीं। सोचिए कितनी चलेगी। एक के बाद एक राज्य, टैक्स फ्री अलग कर देंगे।

 

दिखाया जाएगा कि कैसे नेता जी को जैसे ही पता चला आज देश में इतनी बड़ी परीक्षा है वे एयरपोर्ट से बाहर निकल कर फिर उल्टे पाँव लौट गए। उनका 'एंग्री यंगमैन' रूप पब्लिक ने देखा कमसकम उनके स्टाफ ने तो देखा ही। कहते हैं उन्होने कुछ  बड़बड़ाया कि "नालयको ! ये बात पहले ही बता देते तो विदेश प्रवास का एक दिन और बढ़ा सकते थे"। लेकिन उन्होने तुरंत अपने सेक्रेटरी को बुलाया और बताया कि वह प्रेस में विज्ञप्ति जारी कर दे कि कैसे नेता जी ने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने सभी काम, जरूरी अपाॅइन्टमेंट मुल्तवी करते हुए 45 मिनट्स एयरपोर्ट पर ही रुकने का ऐतहासिक फैसला लिया है। ऐतहासिक इसलिए कि इससे पहले 70 सालों में किसी भी नेता ने यह फैसला नहीं लिया। इसी के साथ ही इस तरह वे भारत के पहले ऐसे नेता बन गए।

 

तभी किसी मुखालिफ पार्टी के छुटभैये नेता ने सवाल खड़ा कर रंग में भंग डाल दिया। ये ऐसे निगेटिव लोगों की, ऐसे बिना सिर-दुम के सवाल पूछने वालों की ज़ुबान जला क्यों नहीं दी जाती। पूछते हैं: प्रधानमंत्री चुपचाप चले जाते किसी को पता भी नहीं चलना था। आप खुद ही शोर मचायंगे तो डिस्टर्ब तो होना ही है। दूसरे उनका कहना है कि विदेश में तो ऐसे कोई विशेष इंतजामात होते नहीं उल्टे वो तो कभी साइकिल पर कभी पैदल, कभी बस या मेट्रो में अकेले ही घूमते फिरते हैं। ना कोई उन्हे डिस्टर्ब करता है ना वो किसी को। विपक्षी नेता ने एक बात और पूछी कि किसी ने ये पता लगाया भी क्या एयरपोर्ट से नेताजी के घर के रूट पर कोई एक्जाम सेंटर था भी या नहीं। हमने तो सुना था की नेता जी के आवास पर हेलिकाॅप्टर के लिए हेलीपैड भी है फिर क्यों नहीं वे एयरपोर्ट से हेलीपैड की ओर रवाना हो गए ? अब ऐसे ही कुछ बेसिरपैर के सवाल थे जिन्हें पूछने की गंदी आदत विपक्षियों को लग गयी है। देश के विकास के लिए इनके पास कोई ठोस अजेंडा तो है नहीं। इसीलिए इन्हें चुनाव दर चुनाव पब्लिक नकार रही है। पता नहीं इन्हें कब अक़ल आएगी।

Saturday, June 20, 2026

व्यंग्य: पर्ची बम



दीवाली पर अनेक तरह के बम मार्किट में आते रहे हैं। एक से बढ़ कर एक। समर्थ लोग पूरी 'लड़ी' भी जलाया करते थे। पतले बम, छोटे बम, बड़े बम, दरमियाने बम। मोटे बम। इन सबसे अलग और विशिष्ट होते थे सुतली बम। बहुत जानदार और शानदार आवाज वाले। पलीते में आग लगाने वाले के थोड़ी देर को तो कान ही सुन्न पड़ जाते थे। ये सब बम एक तरफ क्यों कि ये मौसमी बम होते, वही दो-चार दिन के पटाखे। इधर 'पर्ची बम' निकल कर आया है जो पहले तो उन राज्यों में प्रकट होता है जहां चुनाव आदि हुआ करते हैं। डेमोक्रेसी एक खर्चीली शासन प्रणाली है। अब जैसे-तैसे चुनाव अगर डेमोक्रेटिक्ली करा लिए गए हैं तो सी.एम. पर्ची से चुने जाने लगे। आप छोटी सी पर्ची पर न जाएँ इसके पीछे कितनी आर. एंड डी. जाती है आपको पता नहीं।

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अब लोग 'पोल' (चुनाव)  से इतना नहीं डरते। क्यों कि जो है सो, टिकट भी पर्ची से ही मिलने लगी है। पर्ची-खर्ची एक नया टर्म है जो आज के प्रजातन्त्र ने हमें दिया है। प्रजातन्त्र नित नयी शब्दावली हमें देता है। बैलट था तो बूथ था, बूथ था तो बूथ केप्चरिंग थी। अब ई.वी.एम. है बोले तो ई. से इलेक्शन वी. से वोटिंग और एम. से मशीन। अब मशीन है तो मशीनें खराब होतीं हैं। मशीनें ऑटोमैटिक भी होती हैं। सैल्फ-सफिशियंट टाइप। स्कूल-कॉलेज में हम लोग नकल के लिए चिट/फर्रे इस्तेमाल करते थे। बहुधा पकड़े जाने पर चिट ज़ब्त हो जाती थी। गोया कि हिंदुस्तान में पर्ची का वजूद बहुत पहले से रहा है। मुग़ल काल में इसी को 'रुक्का' कहा जाता था। अब क्यों कि ज़्यादातर परीक्षाएँ लीक हो जाती हैं अतः चिट/फर्रे का चलन मृतप्राय: हो गया है। जहां सफलतापूर्वक परीक्षा हो भी जाये तो वह क्यों कि ऑन-लाइन होने लगी है अतः पर्ची चल नहीं पाती। ठीक है यहाँ नहीं चल पाती न चले और भी क्षेत्र हैं जहां यह अभी भी खूब ही प्रासंगिक है। बल्कि चलन ही पर्ची का है। पर्ची कभी आउट ऑफ फैशन नहीं होगी।

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आपने पीछे देखा है किस तरह सूबे के वज़ीर-ए-आला पर्ची से निकलने लगे हैं। पहले मतदान के बाद कहा जाता था इनका भविष्य मतपेटी या ई. वी.एम. में क़ैद हो गया है। अब ऐसा नहीं है अब तो यूं कहिए अगले का मुस्तकबिल पर्ची में क़ैद है। पर्ची खुलने पर ये बात खुलेगी कि आपकी किस्मत खुली भी है या नहीं। ये पी.ए. लोग भी पर्ची भेजते हैं मगर उस पर्ची की शब्दावली देखने लायक होती है “मुझे यह कहने का आदेश हुआ है कि.....कृपया इनके आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाये” इसका अर्थ ये होता है कि काम नहीं हुआ तो आप अपनी छुट्टी समझें और आपके केस पर सहानुभूति पूर्वक विचार तो दूर कोई नामलेवा भी नहीं होगा। एफ.आई.आर. को उर्दू में 'पर्चा' कहा जाता है चुनांचे अगर आप पर्ची का यथोचित आदर-सम्मान नहीं करते हैं तो अपना पर्चा कटाने को तैयार रहें। फिर भी तो पर्ची की शरण में ही आना पड़ेगा। अब समझे हुज़ूर !! पर्ची की अहमियत।


उसने मुझे बताया मेरे नाम की है पर्ची

फिर कैसे निकाली उसने रक़ीब की पर्ची

मुझे भरोसा था अपनी वफा पर

जाने कब आगई दरमियाँ में पर्ची

तिजारत से तंग हो,आई सियासत में पर्ची

ऐ ! खुदा मत भेजना मेरी मुहब्बत में पर्ची

महबूब की इस अदा पर निसार हर पर्ची

कसम खा हर बार कहती है -- 

'दिल से मैं तुम्हारी हूँ भले निकले किसी के नाम की पर्ची

Tuesday, June 16, 2026

व्यंग्य : ईसबगोल सिविल सर्विस कोचिंग


 

कहते हैं कोचिंग में अंधा पैसा है। पता नहीं ऐसी खबरें कौन चला देता है। लेकिन आप नज़र दौड़ाएंगे तो पाएंगे ये बिलकुल असत्य भी नहीं। किसी एक पॉइंट पर ये तय पाया गया था कि भारत के विशाल क्षेत्रफल और आबादी को देखते हुए अब यह वक़्त आ गया है कि दो आधारभूत क्षेत्रों में प्राइवेट उद्यमशीलों की मदद ली जाये। फिर क्या था 'खुल जा सिम सिम' का यह मंत्र सुन कर दो क्षेत्र उद्योगपतियों के लिए खोल दिये गए। वह थे स्वास्थ्य और शिक्षा। एक रुपये के टोकन मूल्य पर ज़मीन ली गयी अपने चार्टर में बड़े बड़े वायदे किए गए। हम ग़रीबों के इलाज़ के लिए सौ बेड सुरक्षित रखेंगे। नि:शुल्क। स्कूल में ग़रीबों का अलग कोटा होगा ताकि कोई ग़रीब तालीम से महरूम ना रह जाये।

 

यह सुन व्यापार जगत में हलचल मच गयी। ना कुछ आयात करना है ना निर्यात। ना मार्किट के आम जोखिम का सामना। वे सब डॉ की नकली डिग्री ले इस क्षेत्र में कूद पड़े। आप पाएंगे कि अस्पताल हो या स्कूल/यूनिवर्सिटी किसी न किसी उद्योगपति के नाम से जुड़ी हैं। उनके आदर्श भयंकर रूप से उच्च हैं मसलन देश को पूरा का पूरा शिक्षित करना है। अथवा सभी को स्वास्थ्य देना है। फिर क्या था दनादन स्कूल/यूनिवर्सिटी खुलने लग पड़े। एक-एक शहर में अनेक प्राइवेट हॉस्पिटल खुल गए। पाँच सितारा होटल और अस्पताल का जैसे समागम हो गया। आप बता नहीं सकते ये होटल की लॉबी है या अस्पताल की। इसमें एक ही समस्या थी ग़रीब जो है सो शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों से दूर...दूरतर...दूरतम होता चला गया। निजी संस्थान उठते चले गए और सरकारी गिरते चले गए। कहावत हो गयी एक जगह आप जान से जा सकते हो दूसरी जगह जायदाद से। इलाज़ और मेडिकल सुविधा इतनी महंगी हो गयी कि लगता है आज के दौर में तो माता-पिता हम को पढ़ा ही नहीं पाते। पढ़ा क्या दाखिला ही नहीं करा पाते। हमें भी बड़े होकर कहीं से डिग्री का जुगाड़ करना पड़ता।

 

कुछ नए नए सिविल सर्विस कोचिंग संस्थान जो जल्द ही मार्किट में आने वाले हैं:

 

1. दादा छाप ज़र्दा सिविल सर्विस कोचिंग

2. जलजीरा सिविल सर्विस कोचिंग

3. ग्रीन चिली सिविल सर्विस सेंटर

4. सनातन आई.ए.एस. केंद्र

5. बॉलीवुड अकेडमी ऑफ आई.ए.एस.

6. प्रेस्टीज़ पुलिस कोचिंग अकादमी

7. हिन्दू आई.ए.एस. केंद्र

8. एन.डी.एच. कोचिंग

9. भालू छाप के.डी. (काला दंतमंजन) कोचिंग

10. फफोला रिफाइंड अकादमी ऑफ आई.ए. एस.

आप यकीन रखें मार्किट में बच्चों की कमी नहीं है। 'ऑफ लाइन' हो गया, 'ऑन-लाइन' हो गया। अब क्या बचा? अभी बचा है:

 “हमारा अपना सैटेलाइट (उपग्रह) है”

"हमें पेपर लीक कराने का दस साल का तजुर्बा है"।

हमारे गैस पेपर 80% सही निकलते हैं”

अब तक हमारी अकादमी के हज़ार स्टूडेंट्स ऑलरेडी सलेक्ट हो कलेक्टर/ एम्बेसडर/ कमिश्नर लगे हुए हैं। 'कैच दैम यंग' स्कीम के अंतर्गत अब बच्चों को प्राइमरी कक्षा से अकेडमी ही पढ़ाएगी। आप कोटा के इंजिनयरिंग मॉडल से वाकिफ हैं। वे भी बच्चों को आठवीं दसवीं में ही ले जाते हैं। नयी नयी सुविधाएं आएंगी। "हम हॉस्टल में शुद्ध खाना देते हैं"। "हमारे यहाँ सातों दिन नॉन वेज बनता है"। हमारे यहा एक एंटे रूम में आप चाहें तो अपने परिजन/गर्ल फ्रेंड/बॉय फ्रेंड को रख सकते हैं। ये पूरा पैकेज है। मार्किट निसंदेह बहुत ब्राइट और प्राॅमिजिंग है।

  

संस्मरण: दिल्ली का पोलो ग्राउंड

 

 

फाईनली दिल्ली के जयपुर पोलो ग्राउंड का पटाक्षेप हो गया। खबर ये है कि उसे सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों से सील कर दिया गया है। यह पोलो ग्राउंड ऐसा समझिए सफदरजंग मकबरे से शुरू होकर आगे प्रधानमंत्री की पूर्व आवास 7 रेसकोर्स रोड नया नाम ( लोक कल्याण मार्ग) तक जाता है। रेस के सीजन में आप कार से लेकर फोर सीटर तक खड़े देख सकते थे। यहां एक सर्विसेज का टाॅकीज़ भी था रेसकोर्स नाम से, मैंने वहां कई फिल्में देखीं थीं। टिकटों के रेट अन्य टाॅकीज़ के मुकाबले कम होते थे। वहां रविवार को तंबोला (हाऊसी) भी हुआ करती थी। ऐसी खुली-खुली जगहों और हरियाली के लिए नया नाम है शहर के फेफड़े (लंग्स)। जयपुर नाम शायद इसलिए पड़ा होगा कि एक तो जयपुर नरेश स्वयं पोलो के शौकीन थे उनका देहांत भी पोलो खेलते हुए हुआ था। पोलो ग्राउंड की ये ज़मीन जयपुर नरेश की थी और उन्होंने ही दी थी। यूं ये भी बताते हैं कि दिल्ली खासकर लुटयन्स दिल्ली की ज़्यादातर ज़मीन का मालिकाना हक़ जयपुर राजघराने के पास था। उसी का परिणाम था कि राष्ट्रपति भवन के प्रांगण (फोरकोर्ट) में एक पिलर जयपुर पिलर के नाम से बीचों बीच गड़ा है।

 

नेहरू जी अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान तीन मूर्ति में रहे। यह एक शानदार भवन है। बिलकुल प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुकूल। मगर जब इसे संग्रहालय बनाने का निर्णय ले लिया तो अगले प्रधानमंत्री के लिए दूसरे स्थान की तलाश लाजिमी थी। यूं इंग्लेंड में 10 डाउनिंग स्ट्रीट सैकड़ों सालों से प्रधानमंत्री का अधिकृत राजकीय आवास है। जब 10 जनपथ रोड पर लालबहादुर शास्त्री जी बतौर प्रधानमंत्री रहा करते थे। तब हमारी स्कूल जाने वाली बस को उनके आवास से ना निकाल कर रूट बदल दिया था अब बस जो है सो निर्माण भवन उद्योग भवन की तरफ मुड़ कर फिर मोतीलाल नेहरू रोड लेकर वापिस जनपथ के 'राउंड-एबाउट' पर आ जाती थी। मेरे खयाल से सुरक्षा और शोर दोनों की वजह से ऐसा किया गया होगा। कालांतर में शास्त्री जी की अकस्मात मृत्यु के उपरांत बगल की कोठी में ही उनके नाम का एक संग्रहालय खुल गया। जहां उनकी यादगार चीजें सँजो कर रखी गयी हैं। पहले उनके परिवार के सदस्य भी वहाँ रहा करते थे। अब का पता नहीं।

ये जो म्यूज़ियम बनाने का रिवाज है यह हमारे देश में दिवंगत के प्रति आदर और उनकी स्मृति को सम्मान देने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि चाहे तीन मूर्ति हो, या 10 जनपथ या फिर 1 सफदरजंग रोड (इंदिरा गांधी) सभी संग्रहालय बन गए हैं। 7 रेसकोर्स रोड जो एक-दो बंगले से शुरू होते-होते आज पूरी की पूरी लेन प्रधानमंत्री आवास का हिस्सा हो गयी। कहीं आगंतुक से मुलाकात, कहीं मीटिंग रूम आदि आदि। अब लेटेस्ट तो प्रधानमंत्री आवास वहाँ से भी शिफ्ट हो राष्ट्रपति भवन के आसपास कहीं आ गया है।

 

जब इंदिरा जी 1 सफदरजंग रोड में रहती थीं तब बगल की एक कोठी बतौर ऑफिस ले ली गयी थी। यूं उनके आवास के ठीक सामने दिल्ली जिमख़ाना क्लब अपनी स्थापना से रहा है, बोले तो 'पीसफुल को-एक्जिस्टेंस'। अब सुना है उन्हें भी अपना टीन-टब्बर उठाने को कह दिया गया है। इसी श्रंखला में दिल्ली फ्लाइंग क्लब, दिल्ली ग्लाइडिंग क्लब पहले ही जा चुके हैं, अर्थात खाली कराये जा चुके हैं। आपातकाल के दौरान हमारा ग्लाइडिंग रूट बदल दिया गया था और पी. एम. आवास की तरफ को जाना सर्वथा वर्जित कर दिया गया था।

 

सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के 'पर्सप्शन' समय के साथ बदलते रहते हैं। दिल्ली दर रोज़ बदल रही है। नयी नयी इमारतें बन रही हैं आप जब जहां निकल जाओ कुछ न कुछ बन रहा होता या तोड़ा जा रहा होता है। 'ओल्ड ऑर्डर चेंजज़ गिविंग वे टू न्यू' कभी दिल्ली के गांवों को विस्थापित कर लुटियन्स दिल्ली बनी थी। मुझे तो कई बार ऐसा लगता है जैसे वो 450 गांवों के मूल ग्रामीणों का श्राप दिल्ली को लगा हुआ है। कोई 'स्टेबिलिटी' नहीं। पता नहीं 'हैपीनेस इंडैक्स' पर दिल्ली वाले किस नंबर पर आते होंगे। गमन फिल्म में शहरयार जी का लिखा सुरेश वाडकर का गाया गीत याद है:

 

                           सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यूं है

                          इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है

Sunday, June 14, 2026

संस्मरण: टूटत टूटत पुनः - विक्टोरिया मैस-शास्त्री-कर्तव्य भवन

  


यह बात सन 1960 के आसपास की होगी। जहां शास्त्री भवन खड़ा है तब उस रोड का नाम डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड नहीं था बल्कि विक्टोरिया रोड था। जहां शास्त्री भवन बना वहाँ बैरक्स थीं और नाम था विक्टोरिया मैस। तब इस इलाके मेन तीन मैस हुआ करतीं थीं। एडवर्ड मैस जहां निर्माण भवन आदि बने, वह रोड भी तब एडवर्ड रोड कहलाती थी। कालांतर में उस रोड का नाम बादल कर मौलाना आज़ाद रोड कर दिया गया कारण मौलाना आज़ाद उसी रोड के एक बंगले में रहते थे जहां फिर विज्ञान भवन बना। विक्टोरिया मैस आपको बता चुका हूँ जहां डिफेंस के कुछ दफ्तर/रिहायशगाह थी। इसी पर आगे चल कर डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर ही सेंट्रल विस्टा मैस थी। वहाँ भी बैरक्स थीं। तीन-चार शोप्स भी थीं। जो परचून की हलवाई की और एक मीट की दुकान थी। एक साइकिल रिपेयर शॉप भी थी।

 

तब 15 जनपथ के दी टी यू बस स्टेंड का नाम विक्टोरिया मैस हुआ करता था। जनपथ और डॉ राजेंद्र प्रसाद रोड की जो क्रॉसिंग है वहाँ पहले एक गोल चक्कर (राउंड एबाउट) हुआ करता था जिसके अंदर घास हुआ करती थी। इसी क्रोस्स सेक्शन पर दो पान वाले और दूसरी टरग एक मोची बैठा करता था। जनपथ वाली साइड पर एक तरफ बहुत से नाई अपनी सन्दूकची लेकर बैठे रहते थे तो दूसरी ओर एक अच्छा खासा टेकसी स्टेंड हुआ करता था। सन 1960 की आसपास की ही बात है मुझे प्री स्कूल बोलो के जी बोलो में दाखिल कराया गया था। वह स्कूल एक कमरे में 1एसटी फ्लोर पर चला करता था। अज़ाब रिवाज था उसमें या कह लो अभी देश आज़ाद हुए बहुत साल नहीं हुए थे क्लास के मुहाने पर एक क्लास का बालक खड़ा रहता और टीचर के आता देख ज़ोर से पुकारता “क्लास स्टेंड अप” इस पर क्लास अपनी अपनी जगह खड़ी हो जाती और पूरे जोश से बोलती “ जयहिंद” एक बार क्लास्स स्टेंड अप कहने की मेरी भी बारी आई थी। तीस पर टीचर ने मुझे गोद में उठा प्यार किया था। ये किस्सा मैंने विधिवत घर आकार माता जी को सुनाया था। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे की घोषणा कर दी गयी की यह स्कूल शिफ्ट हो रहा है। बस फिर क्या था देखते-देखते विक्टोरिया मैस टूटने लगा और फिर शास्त्री भवन बन कर तैयार हुआ। वहाँ पर पहली बार सतीश गुजराल जी का मुराल देखने को मिला। स्कूल शिफ्ट होकर सतीश कुमार या चंद सांसद जी के बंगले में 2 रायसीना रोड पर आ गया। बंगले में अंदर नहीं बल्कि बंगले के बरामदे और लोन में। क्लास चलाने लगीं। जब सतीश कुमार/चंद चुनाव हार गए तो यह स्कूल जा पहुंचा उसके पीछे धोबीघात के इलाके में। फिर वहाँ से भी जल्द ही विस्थापित कर दिये गए क्यों की वहाँ दिल्ली सरकार के ग्लाइट बनाने लग पड़े थे। अब वहाँ आदित्य सदन खड़ा है। आदित्य जी से मुराद षड दिल्ली के उप-राज्यपाल से रही। यह स्कूल वहाँ से शिफ्ट हो कीलिङ्ग लें में आया वह भी एक पार्क में टेंट में। बस तब मैंने और मटा पिता अदोनों ने समवेत स्वर में तौबा कर ली। अतुल ग्रोव रोड पर पी एंड टी प्राइमरी स्कूल था। हाम्रा दाखिला वाहा करा दिया गया था। तब हम तीन भाई उसमें जाने लगे। मैं सीधा फोर्ट स्टैंडर्ड में, जबकि मैंने केवल दूसरी जमात पास की थी। गो की तीसरी क्लास कभी गए ही नहीं। छोटा भाई शायद दूसरी क्लास में था और उससे छोटा शायद के जी टाइप।

 

डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर लोकप्रिय सांसद  तारकेशवरी सिन्हा रहा करती थीं। जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय भी डॉ राजेंद्र प्रसाद रोड पर ही रहा अरते थे। यूं डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर जगजीवन राम, मोरारजी देसाई और एस के पाटील भी रहे। साथ ही सी वी सी का ऑफिस और निर्वाचन आयोग भी बहुत दिनों तक डॉ राजेन्द्र प्रसाद के ही एक बंगले से संचालित हुआ था। इस रोड से पैदल चल कर या बाद में साइकिल पर चल कर हैदराबाद हाउस मटन लेने जाते थे। वहाँ मटन की एक दुकान थी।

 

जब सुना शास्त्री भवन टूट रहा है और अब वहाँ कर्तव्य भवन की शाखा खुलेगी तो अनायास ही याद हो आया...ओल्ल्द ऑर्डर छेंजेस गिविंग वे तो न्यू। पृत्वी वही है आदमी अपने अपनी ज़रूरियात और फेनसी के कारण बनाता-तोड़ता-बनाता रहता है और खुश होता रहता है। वह मालिक समझने की भूल करता रहता है हर युग में और इतनी सी बात समझ नहीं लगती की हम सब किरायेदार हैं वो एक शेर है ना :

 

                               अपनी तो उससे यारी है

                               जिसकी दुनिया सारी है

 

( अब डॉ राजेन्द्र प्रसाद के एक हिस्से में नेशनल आर्काइव का बड़ा दफ्तर खुल गया है पहले केंद्रीय सचिवालय को बड़ा दफ्तर कह बुलाया जाता था। जहां बाबू जगजीवन राम, मोरारजी देसाई और एस के पाटिल रहे थे वह और सेंट्रल विस्टा पहले ही कर्तव्य भवन बन गए  हैं । पी. एंड टी. स्कूल प्राइमरी से टेन प्लस टू बन गया है। यूं जब हम पी.एंड टी. में पढ़ते थे तब ही किदवई भवन और खुर्शीद लाल भवन बने थे।)

 

व्यंग्य: फर्ज़ी ब्रिगेडियर

 

                                                           


 

खबर है कि एक नकली ब्रिगेडियर पकड़े गए हैं। वह नवयुवक मात्र 21 बरस का है। केवल वर्दी ही नहीं बल्कि उसके पास से नकली आई कार्ड, दो अदद बाउंसर, एक ड्राइवर जो था तो असली ड्राइवर मगर उसका आई कार्ड नकली था। एक हैरियर गाड़ी, सायरन, नकली पिस्तौल और रेजिमेंटल केन भी उसने कबाड़ राखी थी। बाकी जो है सो है, पर देखिये 21 बरस के बंदे ने रिसरच पूरी कर राखी थी। बारीक से बारीक। लोचा बस एक था कि वह 21 वर्षीय ब्रिगेडियर बना हुआ था जबकि फौज में उससे अधिक बरस की सिनियोरिटी के बाद कोई ब्रिगेडियर बनता है। यहाँ उससे चूक हो गयी। अब ये नहीं पता कि यह नकली ब्रिगेडियर बनके उसने क्या क्या लाभ उठाया।

 

पता ये भी चला है कि वह नीट में भी दो बार फेल हुआ है।  अब वह इतनी धन संपत्ति तो रखता था कि उसने वर्दी सिल्वा राखी थी, दो-दो बाउंसर जिन्हें वह एन एस जी कमांडो बताता था एक अदद महंगी कार और ड्राइवर। ऐसा समझो ये उसका इनवेस्टमेंट था अब इनवेस्टमेंट किया था तो कुछ तो रिटर्न भी रहा होगा। वह क्या था इसकी तफसील नहीं मिली है। वह अपने रेंक को खूब एंजॉय कर रहा था। यहाँ-वहाँ अपनी खातिर-तवज्जोह करा रहा था।

 

इतनी उम्र में उसे कैप्टेन बनाना था ना कि सीधे ब्रिगेडियर ही बन जाना था। जनरली ऐसे केस आते रहे हैं मसलन कोई नकली सिपाही बन जाता है या ज्यादा से ज्यादा दरोगा। इसी तरह नकली आयकर वाले क्षेत्र में भी या तो महज़ इंस्पेक्टर या हद से हद आयकर अधिकारी बन जाता है। जैसे फिल्मों में दिखाया जाता है नकली सी.बी.आई. अधिकारी। पर ब्रिगेडियर तो कुछ ज्यादा हो गया। अब ये हो सकता है कि उसने दोस्तों से कोई शर्त लगाई हो। भाई छोटे-मोटे रेंक और ओहदे वाले तो रोज़ ही कहीं ना कहीं पकड़े ही जाते हैं जैसे रेलवे के टी।टी। बन, टाई-कोट पहन रेल यात्रा कराते रहना। नकली विधायक, नकली रेलवे अधिकारी बन फ्री यात्रा करना। या रेलवे में नौकरी दिलाने की ठगी करना। शादी की मार्किट में ऐसे फ़्रौड खून चलन में हैं। मैं एक केस को जानता हूँ जहां लड़के (भावी दूल्हे) को स्टेडियम का मैनेजर बताया गया जबकि वह था डेली वेज वाला माली। कागजात नकली होते थे, बाद में पूरे के पूरे दफ्तर नकली, थाना, बैंक, कोर्ट सब नकली। आप इस-उस की डिग्री को नकली बताते फिरते हो यहा पूरा का पूरा ब्रिगेडियर ही नकली निकला। दुल्हन नकली निकाल रही है वह दूसरे दिन ही लूट-लाट के ये जा वो जा।

 

मार्किट में कितने नकली डॉ., नकली बाबा भरे पड़े हैं। यह देश है वीर मुन्ना भाईयों का, मुल्क में बंटियों का, बबलियों का बोलबाला है। बस अब तो  कसर ये रह गयी है कि कहीं संसार में कोई पूरा का पूरा मुल्क ही नकली ना निकल आए       

 

व्यंग्य: मैं कंप्रोमाइज्ड हूँ

 

 

          किशोर कुमार जी का एक लोकप्रिय गीत है “मैं हूँ  झुम-झुम-झुम झुमरू फक्कड़  घूमूँ बन के घुँमरू...”   बस मैं भी कुछ इसी तर्ज़ पर कंप्रोमाइज्ड हूँ। यह एक पॉज़िटिव कांसेप्ट है। पहले कंप्रोमाइज़ होने को/कंप्रोमाइज़ करने को अच्छा माना जाता था। पता नहीं कब में यह निगेटिव हो गया। जब आप कहते हैं “प्यार बांटते चलो...  हो...  क्या हिन्दू क्या मुसलमान सब हैं भाई भाई। इस में भी इसी कंप्रोमाइज़ की बात कही गयी है।  कंप्रोमाइज़ की महिमा बताई गयी है।


पता नहीं ये बावेला क्यूँ मचाया हुआ है। फलां कमीशन कंप्रोमाइज़ है...ढिकानी एजेंसी कंप्रोमाइज़ है। भाई आप अपनी बताओ? यह देश-काल के अनुरूप शब्द अपने अर्थ बनाते-बिगाड़ते रहते हैं। अब देखो एक शब्द है 'राजीनामा', हिन्दी में इसका अर्थ है सहमत होना, कुट्टी खत्म और अब्बा हो गयी। लेकिन मराठी में इसका अर्थ है त्यागपत्र दे देना। अतः ऐसा ही कुछ इस टर्म के साथ है।  कंप्रोमाइज़ हो जाने को हाथों हाथ ले लेना चाहिए था। क्या पति-पत्नी कंप्रोमाइज़ नहीं करते। क्या मित्र लोग आए दिन नाराज़ होते  और कंप्रोमाइज़ नहीं करते। ये इंग्लिस में कुछ तो लोचा है। लड़ाई हो जाये। तलाक़ का मुकदमा दायर कर रखा हो तो अगर कंप्रोमाइज़ हो जाये तो कितनी खुशी होती है। चलो जी कंप्रोमाइज़ हो गया। कोर्ट भी बढ़ावा देते हैं कि आउट ऑफ कोर्ट ही कंप्रोमाइज़/सेटलमेंट हो जाये। उनका एक केस कम हो जाएगा। हम बच्चे थे तब भी कहा करते थे लड़ाई-लड़ाई माफ करो कुत्ते की .... यह क्या है ? यह और कुछ नहीं महज़ कंप्रोमाइज़ है।


मैं  अपने आपको कंप्रोमाइज़्ड मानता हूँ। दूसरों की मदद को सदैव सहर्ष तैयार रहता हूँ। कोई गाइडेंस मांगे मैं जेनुइन सलाह देता हूँ। कोई पूछे तो किसी भी विषय के इंपोर्टेन्ट सवाल ‘ऑफ-हेंड’ बता देता हूँ। किसी का भी किसी भी परीक्षा के लिए 'मेंटर' बनने को राज़ी हूँ। ठीक-ठाक लिख-लिखा लेता हूँ। पता नहीं लोग ये क्यूँ कहते हैं कि सरकार और देश दो अलग अलग चीज़ें हैं। अगर ऐसा है तो जब भी सरकार के विरुद्ध कोई धरना/प्रदर्शन होता है नुकसान अंग्रेजों के ज़माने से देश की संपत्ति का ही करते आए हैं। जैसे रेल / रेल की पटरी/ थाना जला देना/ पोस्ट ऑफिस लूट लेना। वाहनों की तोड़ फोड़ करना। ये सब देश के ‘असेट’ हैं न कि किसी सरकार विशेष के। कहनेवाले सी.बी.एस.ई. को भी कंप्रोमाइज्ड बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन कहने लग पड़े हैं। रही बात ‘नीट’ की, (नेशनल एलिजिबिलिटी-कम- एंट्रेस टैस्ट' में कहीं   कंप्रोमाइज़ नहीं आता है। अत: 'सी' से कॉकरोच आया है। 'सी' से कॉकरोच 'सी' से कंप्रोमाइज़। यह ऐसी कोई खराब बात भी नहीं। आप जान नहीं रहे हैं, सच तो ये है हम सब कंप्रोमाइज्ड हैं, पाॅश्चराइज़्ड हैं, फाॅसिलाइज़्ड हैं।


शेक्सपियर ने लिखा है:


       "एज़ फ्लाईज़ टू वान्टन बाॅयज़ आर वी टू दि गाॅड्स, दे किल अस फाॅर देयर स्पोर्ट"

(जैसे शरारती लड़कों के लिये मक्खियां होती हैं वैसे ही देवताओं के लिये हम हैं; वे अपने मनोरंजन के लिए हमें मार डालते हैं)