एक बाबा जी ने ऐलान किया है कि ‘ए’ फॉर एपल
एक विदेशी अवधारणा है। हम भारतीयों को ‘ए’ फॉर एपल नहीं बल्कि ‘ए’ फॉर अमरूद पढ़ाया
जाना चाहिए। मुझे यह बहुत पसंद आया। सच है हमको ये अल्फ़ाबेट दोबारा से लिखने का
वक़्त आ गया है। पूरी की पूरी बारहखड़ी दुबारा लिखने का वक़्त आ गया है। पहले कभी जोक
के तौर पर सुना था ‘ए’ से एपल। ‘बी’ से बड़ा एपल। ‘सी’ से छोटा एपल ‘डी’ से दो एपल
‘ई’ से एक और एपल ‘एफ’ से फिर एक एपल, ‘जी’ से
गला हुआ एपल .... हम उस पीढ़ी के हैं जिसमें ज से जवाहरलाल पढ़ा है। अब मुझे लगता है
कि नयी बारहखड़ी होनी चाहिए:
‘ए’ से अमरूद। ‘बी’ से बेर, बेल पत्थर,
बैंगन, बंद गोभी, भिंडी,
बथुआ। ‘सी’ से कमरख, केला, चीकू। ‘डी’ से दम आलू। ‘ई’ से ईख। ‘एफ’ से फालसे। ‘जी’ से गाजर, गूलर फल, गन्ना, गोभी, ग्वार की फली। ‘एच’ से हरी मिर्च, हरा धनिया। ‘आई’
से इमली। ‘जे’ से जामुन, जंगल जलेबी, जिमीकंद। ‘के’ से करोंदा, कंदमूल, कटहल, कीनू ,करेला, कद्दू , करी पत्ता,
कमल ककड़ी। ‘एल’ से लीची,
लाल मिर्च, लौकी, लहसुन।
‘एम’ से मूली, मौसम्बी,
मेथी, मटर। ‘एन’ से नारियल, नींबू, ‘पी’
से पपीता, प्याज, पत्ता गोभी, परवल, पालक,
पुदीना। ‘आर’ से
रामफल, रसभरी। ‘एस’ से शहतूत, शकरकंद,
सहजन, संतरा, शरीफा,
सिंघाड़ा, शिमला मिर्च, सरसों
का साग, शकरकंदी। ‘टी’ से टमाटर, तरबूज,
तोरई, टिंडा आदि।
अब जब हम इस टॉपिक पर हैं ही तो लगे हाथ
सिलेबस के अन्य चैप्टर भी रिवाइज़ कर डाले जाएँ। मसलन सभी इंगलिश की कवितायें जो
बच्चों को सिखाई जाती हैं। सब या तो झूठ सिखाती हैं या सेलफिश होना या बस खिलखिला
कर हँसना। ज़िंदगी के संजीदा पहलुओं पर इन ‘पोयम्स’ से कोई मदद नहीं मिलती है।
हमारे पास कविताओं, श्लोक, दोहों, चौपाइयों की कोई कमी नहीं है। एक कमेटी का
गठन किया जाए। कमेटी बढ़िया-बढ़िया चौपाई छांट सकती है, ताकि
हमारी भावी पीढ़ी संस्कारी बन सके।
इसी तरह ये जितने भी विदेशी लेखकों की
कहानियाँ और उपन्यास नाटक पढ़ाये जाते हैं सब के सब तुरंत प्रभाव से बंद किए जाने
चाहिए। क्या ज़रूरत है हमें ये सब शेक्सपियर, टाॅलस्टाॅय,
चार्ल्स डिकन्स, मार्क ट्वेन पढ़ने-पढ़ाने की।
हम ये पढ़-पढ़ कर ही अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। यूं देखा जाये तो एक
बात बताओ पढ़ने की दरकार क्या है? बशीर बद्र साब का एक शेर
है:
जी बहुत चाहता है सच बोलें क्या करें हौसला नहीं होता
रात का इंतिज़ार कौन करे, आज-कल दिन
में क्या नहीं होता
बस कुछ इसी तर्ज़ पर हमारे दौर का तर्जुमा है:
जी बहुत चाहता है पढ़ें-लिखें, क्या करें हौंसला नहीं
होता
डिग्री का इंतिज़ार कौन करे, आज-कल बिन
डिग्री क्या नहीं होता