https://youtu.be/IaweREcYL4c?si=BpeZPfIk57xNUsip
Ravi ki duniya
Ravi ki duniya
Monday, October 26, 2026
Thursday, October 22, 2026
व्यंग्य: पुलिस और पजामा
एक
रील देखी। पुलिस वालों ने बनाई है जनसाधारण के लिये। यह एक प्रकार का रोल रिवर्सल
है। अभी तक जन-साधारण पुलिस वालों के 'सात्विक'
'सनातन' 'सदव्यवहार' की
रील बनाते रहे हैं। रील से पता चलता है कि
दिल्ली को 18 अक्तूबर 1861 को भारतीय
पुलिस एक्ट से परिचित कराया। फलस्वरूप
दिल्ली में पाँच थाने स्थापित किए गए। ये थे सब्जी मंडी (18.10.1861) मुंडका (नांगलोई) (29.10.1861) महरौली ( 2.11.1861
) कोतवाली (4.11.1861) और सदर बाज़ार (31.12.1861)
इसी श्रंखला में बताया गया है कि तब अपने पजामे के चोरी हो जाने की
एफ.आई.आर. एक बंदे ने कराई हुई है। पजामे की कीमत आठ आने लिखाई गयी है। ये
एफ.आई.आर. सब्जी मंडी थाने में कराई गयी थी। एफ.आई.आर. नं. भी दिया है- 6/36, अगले पर मतलब पाजामा चोर पर धारा
380 लगाई गयी है। एफ.आई.आर. की तारीख है 10 मार्च 1897 पूरी रील में बस एक बात मिसिंग है कि
आखिर वो पजामा बरामद हुआ या नहीं? पजामा चोर पकड़ा गया या
नहीं। क्या तब भी 'मंडावली' प्रथा हुआ
करती थी? अगर पजामा चोर पकड़ा गया था तो उसे क्या सज़ा मिली?
यूं पुलिस के रिकॉर्ड में यह भी होना चाहिए कि जो रिपोर्ट लिखाने
आया था उसकी पुलिस ने क्या खातिरदारी की हां भई पहले तो ये बता तेरे पास ये
इतना.मंहगा पजामा.खरीदने को आठ आने आये कहां से? तू करता
क्या है? (अब 1897 हो, 1997 हो या फिर 2097 पुलिस आपको "आप" तो कहने
से रही) ये तो सीधे-सीधे डी.ए. (डिसप्रोपेशनेट असैट) का केस लगता है। चल आजा !
पजामा कहां भागा जा रहा है। पहले तेरी जांच कर लें पजामे की फिर कर लेंगे। अगर
पुलिस की पकड़ में ये पजामा-चोर आया होगा तो पुलिस ने जरूर वो गीत गया होगा
“आप आए तो
ख्याल - ए - दिले नाशाद आया
कितने चोरी
हुए पजामों का पता याद आया”
वैसे पुलिस ने उसका पजामा अच्छी तरह फाड़ा
होगा। ऐसी मेरी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है। 1897
में पजामा भले आठ आने का था मगर मैं सोच रहा हूँ इस आठ आने के पजामे ने पुलिस के
कितने पजामों का इंतज़ाम किया होगा। पर एक बात और है इस रील में सिर्फ संतरों,
पजामे और चार आने की जेब-तराशी, टट्टू चोरी के
केस ही 'शो-केस' किए हैं। क्या तब
बड़े-बड़े केस हुआ नहीं करते थे या फिर उन्हें तब भी रफा-दफा कर दिया जाता था। उनकी 'ऑउट-ऑफ-कोर्ट' की तरह 'ऑउट ऑफ
थाना' सैटलमेंट हो जाती थी। एफ.आई.आर. लिखी ही नहीं जाती थी।
तब एफ.आई.आर. लिखना-लिखवाना आसान रहा होगा। यदि हाँ तो वह कौन सा 'काल खंड' था जब एफ.आई.आर. लिखना दुरूह से दुरूह होता
चला गया।
आज की तारीख में अगर कोई इस तरह पजामे और
संतरों की एफ.आई.आर. लिखाने जाये तो पुलिस कितना हँसेगी और हो सकता है कि शिकायत
करने वाले का पहना हुआ पजामा भी छीन ले। "तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने
की"। आप कितना ही डिजिटल हो जाओ कितना ही कंप्यूटर ले आओ। थाने और एफ.आई. आर.
का कोई अन्य विकल्प नहीं है। उर्दू में एफ.आई.आर. को पर्चा कटाना कहते हैं। पुलिस
का पहला और अंतिम प्रयास यही होता है कि एफ.आई. आर. लिखी ही न जाये। कारण कि
एफ.आई.आर. लिखी जाएगी तो उसका निपटारा भी करना पड़ेगा/दिखाना पड़ेगा। नहीं तो ये
एफ.आई.आर. पेंडिंग दिखाई जाएगी, बोले तो मुंह चिढ़ाती
रहेगी। यूं एक सूत्र ये भी है कि यदि घटनाएँ/वारदातें बोर्ड पर नहीं हैं तो आप
अपनी पीठ थपथपा सकते हैं और अगर खुदा न ख्वास्ता बोर्ड पर लिखी इबारत 'अनकमफ़र्टेबल' सी लगे यानि ज्यादा लगे तो भी आप अपनी
पीठ थपथपा सकते हैं कि "पिछले वाला अमला तो केस रजिस्टर ही नहीं करता था। हम
न केवल रजिस्टर करते हैं बल्कि केस साॅल्व करने की भरसक भाग-दौड़ भी करते
हैं"। गो कि फिगर घटे या बढ़े वाहवाही हमेशा पुलिस की ही होती है। नहीं तो ‘प’
से पुलिस आपको ‘प’ से पजामा पहनने लायक
नहीं छोड़ेगी। आप कब तक और कहाँ तक बचोगे? उनकी 'टैग लाइन' नहीं सुनी "हमेशा आपके साथ-आपके
लिए" तो हुजूर टांगें सलामत रहें! पजामे हज़ार हैं
Sunday, October 18, 2026
निर्मला देवी और कुमकुम
वाराणसी (बनारस) में
एक तबला उस्ताद वासुदेव नारायण सिंह रहा
करते थे। वे बनारस (वाराणसी) के संगीत जगत में वासुदेव महाराज के नाम से प्रसिद्ध
थे। उनकी एक बेटी निर्मला (7 जून 1927)
और एक बेटा लक्ष्मण नारायण सिंह थे। जो सिंह लक्ष्मण
प्रसाद सिंह एक प्रमुख तबला वादक बने और
दुनिया उन्हें लच्छू महाराज के रूप में जानती है।
पारिवारिक परंपरा के
अनुरुप बेटी निर्मला ने संगीत शिक्षा को अपनाया और पटियाला घराने की एक निपुण
हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका बनीं। उनका दूसरा नाम दुलारी था। हांलाकि अपनी चाची
द्वारा पालने की वजह से उन्हें नाज़िम नाम भी मिला। उन्होंने फिल्मों में अभिनय भी
किया और 1942 की शुरुआत में उन्होंने 1940
और 50 के दशक में एक दर्जन से अधिक फिल्में दीं। 15
जून 1996 को उनका निधन हो गया।
उन्होंने अपनी फिल्मों के सह-कलाकार, गुलशन
सिंह आहूजा से शादी कर ली। वे अपने स्क्रीन नाम अरुण से मशहूर थे। समय के साथ दंपति के पांच बच्चे हुए। दो बेटे और तीन
बेटियां।
वासुदेव महाराज ने
बाद में एक मुस्लिम महिला से भी शादी रचाई उनकी मुस्लिम पत्नी का नाम मुन्नन
था। मुन्नन से वासुदेव महाराज के दो
खूबसूरत बेटियाँ हुईं। ज़ैबुन्निसा और राधा। प्रसिद्ध कत्थक नर्तक पंडित शंभू
महाराज ने कत्थक नृत्य में जैबुन्निसा को प्रशिक्षित किया। उनकी बड़ी बहन राधा एक
अभिनेत्री बन गईं और उन्होंने राधिका नाम से
कुछ फिल्मों में अभिनय किया। मिस्टर एंड मिसेज 55, रात
के राही, लाल निशान और शोला जो भड़के।
एक बार विख्यात
निर्माता निर्देशक गुरुदत्त की पारखी नज़र जैबुन्निसा पर पड़ी। उन्होंने
जैबुन्निसा को अवसर दिया। स्क्रीन नाम कुमकुम से जैबुन्निसा ने 115
से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वह एक श्रेष्ठ नर्तकी थीं। रामानंद सागर की
फिल्मों का वह जरूर होतीं थीं। उन्होंने
भारत की पहली भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियारी चढ़ाईबो' 1963
में अभिनय किया था। उनकी अंतिम फिल्म 'एक
कुँवारी एक कुँवारा' 1977 थी। फिर वे 1975 में सज्जाद अकबर
खान (लखनऊ) शादी कर सऊदी अरब चलीं गईं। 28 जुलाई 2020
को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।
गुलशन सिंह आहूजा ने
1939 से शुरू कर अरुण आहूजा नाम से 40 से
अधिक फिल्में दीं। उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म 'सेहरा' के
फ्लाॅप होने के बाद उन्हें कार्टर रोड, बान्द्रा स्थित अपना
बंगला बेचना पड़ा और 1960 के दशक में वे विरार में आ बसे। माधुरी दीक्षित की पहली
फिल्म 1984 में रिलीज हुई फिल्म 'अबोध' में
अरुण कुमार ने अपनी आखिरी सहायक भूमिका की थी।
3 जुलाई 1998
को उनका निधन हो गया। उनके अभिनेता बेटे गोविंदा को 'विरार
का छोकरा' भी कहा जाता है।
तुमको पता है जी?
1.
चेतन आनंद की फिल्म (राजेश खन्ना की पहली फिल्म) ‘आखिरी
खत’ 1966 में जो बालक है वह मास्टर बंटी,
और कोई नहीं बल्कि प्रोड्यूसर और कभी हेमा मालिनी के सचिव रहे इंदर कुमार बहल का
पुत्र बंटी बहल है।
2.
“तुम
अपना रंजो-गम अपनी परेशानी मुझे दे दो” (फिल्म: शगुन) में जो अभिनेत्री पियानो पर
यह गीत गा रही है उसका नाम लिबी राना है, स्क्रीन नाम
निवेदिता था।
3.
“जाने
कहाँ मेरा जिगर गया जी” (फिल्म: मिस्टर एंड मिसेज 55) जॉनी वॉकर के साथ जो
अभिनेत्री है उसका नाम विनीता बट्ट था, स्क्रीन नाम यासमिन
था।
4.
अंग्रेज़
जैसा दिखने वाला सभी पार्टी में सूट-टाई में नीली आँखों वाला अभिनेता (पारसी) का
नाम के.सी. सुपारीवाला था।
5.
“आगे
भी जाने न तू पीछे भी जाने न तू जो भी है यही एक पल है” (फिल्म वक़्त) में क्लब में
पर्दे पर गाने वाली ‘सिंगर’ एरिका लाल है। जो एक रेलवे अधिकारी सी. एस. लाल की बेटी
थी।
Friday, October 16, 2026
व्यंग्य: तेरा मुस्कराना गजब हो गया!
भले
आप कुछ भी कहें परंतु हम सब अपने पूर्वाग्रहों से बंधे रहते हैं। यद्यपि इसका कोई
ठोस कारण या लॉजिक नहीं है पर कुछ लोग आपको शकल से अच्छे लगने लगते हैं और उसी
तर्क से कुछ लोग आपको अपने चेहरे और बॉडी लेंग्वेज़ से बिलकुल नहीं भाते। इसको और 'वेलिडेशन' मिलता है जब वह जैसा इम्प्रेशन था वैसा ही
निकलता है तो और बन आती है। "मैं तो शकल देख कर ही पहचान गया था। यह
बदमाश/ठग/चोर/ बेईमान है।" कभी-कभी यह भी सुनने को मिलता है फलां "शकल
से ही खानदानी लगता है। भला आदमी लगता है"। आपने अगर फिल्म डाॅन देखी हो तो
अमिताभ बच्चन अपनी गेंग के एक साथी को गोली मार देता है। दूसरे साथी गेंगस्टर के
पूछने पर डाॅन बताता है “मुझे इसके जूते अच्छे नहीं लगे” दरअसल जूते की हील में
छिपा कर वह खबर/प्लान इधर से उधर करता था।
जब एक सूबे में आई.जी. साब अपने मातहतों की
मीटिंग ले रहे थे। किसी बड़े संजीदा टॉपिक पर बात चल रही थी, उन्होने नोटिस किया एक दरोगा जबसे
वो आये हैं मुस्कराए ही जा रहा है। पहले उन्हें अटपटा लगा। फिर उन्होने देखा उसका
मुस्कराना रुक ही नहीं रहा है। बड़ी गंभीर बात हो रही है। लाॅ एंड ऑर्डर पर चर्चा
चल रही है। लोग मर रहे हैं, कट रहे हैं। एक ये दरोगा बाबू
हैं कि हर बात पर सतत् मुस्कराए ही जा रहे हैं। वो एक 'स्लोगन'
है ना 'हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में मुस्कराना
हमारा नारा है'। पद्मभूषण नीरज जी ने लिखा है: “जिन मुश्किलों में मुस्कराना हो
मना उन मुश्किलों में मुस्कराना धर्म है” मगर इन दरोगा जी का मुस्कराना इन पर भारी
पड़ गया। इन्हें मुश्किल में डाल गया।
जब आई.जी. साब ने देखा कि अगले का
मुस्कराना थम ही नहीं रहा है तो उन्हें 'अनक्मफ़र्टेबल फीलिंग' होने लगी। आप मर्डर और डकैती रोकने की बात कर रहे हैं और अगले का
मुस्कराना ही नहीं रुक रहा। मुस्कराना रुके तो मर्डर/डकैती रुके। मैं तेरे चेहरे
से नज़र हटाऊं तो दुनियां देखूं।
होना क्या था आई.जी. साब ने इसे पर्सनली ले लिया और एकदम खफा हो गए। वे फुल-फुल फायरिंग मूड में आ गए। लगे उसे भला-बुरा कहने। उन्होने देखा कि अगला अब भी मुस्कराए जा रहा है। बस उन्होने आव देखा न ताव और उसको तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर कर छोड़ा। जिसे पुलिसिया भाषा में लाइन हाजिर कहना कहते हैं। जब दरोगा जी को अपने इस ट्रांसफर का पता चला तो उन्हें भान हुआ कि उनकी क़ातिल मुस्कान ने तो उनको ही मुश्किल में डाल दिया। उन्हें अपने मुस्कराने का ग़म नहीं। ग़म ये है कि उनकी मुस्कान को बेदर्द ज़माने की तरह आई.जी. साब भी नहीं समझे। जब वह थाने में अपराधियों से पूछताछ करता या फिर ‘कड़ी’ पूछताछ करता, कंबल परेड अथवा ‘भैरों बाबा के प्रसाद’ के वक़्त भी दरोगा जी मुस्कराते रहते। दरोगा जी ने हाथ जोड़ कर आई.जी. साब को बताया हुज़ूर मेरी इतनी जुर्रत कि आपके इगलास में मुस्कराऊँ? भगवान जानता है और एस.पी. साब से पूछ लीजिये सर मेरी शक्ल ही ऐसी है। ऐसा कहते वक़्त भी दरोगा जी मुस्करा रहे थे। अब पुलिस विभाग सोच रहा है कि दरोगा जी को अपने पी.आर. डिपार्ट में शिफ्ट कर दे। वो 'मोटो' है ना “सर्विस विद स्माइल” उसके जीते-जागते प्रमाण (मास्कट) साबित होंगे हमारे दरोगा जी।
व्यंग्य: दो सौ शोध प्रबंध कबाड़ में बेचे
मेरा भारत महान है। इसमें जिसको तनिक भी शक़
हो उसके लिए ये खबर है कि मेरे भारत महान की, महानतम
यूनिवर्सिटी के दो चपरासियों ने अलमारी में रखी दो सौ थीसिस कबाड़ीवाले को बतौर
रद्दी बेच दी। पता ये चला है कि ये दोनों मल्टी-टास्किंग स्टाफ संविदा कर्मी थे।
बहुत संभव है कि वे रोज की मच-मच से तंग आ गए हो गए हों। दूसरे संविदा कर्मचारियों
को अपने अनुबंध के नवीनीकरण पर संदेह हो या पता हो कि अब उनका डेरा-डंडा इस
यूनिवर्सिटी से उठ रहा है। एक भानगढ़ और है, हो सकता है इनको
कई महीनों से अनुबंध राशि मिली ही न हो। संविदा कर्मचारियों में से ज्यादातर को
समय पर वेतन नहीं मिलता है। कई महीने के एरियर हो जाते हैं। और फिर बाबू लोग,
जिनकी मुट्ठी ठंडी पड़ी होती है उसको क्रियाशील बनाने को मुट्ठी गरम
करनी पड़ती है। तब हाथ चलते हैं और तब कहीं जाकर कलम चलती है।
एक बात और है जिस बात को यूनिवर्सिटी के
बड़े-बड़े प्रोफेसर नहीं समझ पाये वह 'ज्ञान'
इन दो संविदा कर्मियों को हो गया था। अब ज्ञान की प्राप्ति तो किसी
को, कभी भी, हो सकती है। ये
संविदाकर्मी समझ गए थे ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ हमारे संत कह- कह के
थक गए पर यह 'रियालाइज़ेशन' इन दो ‘संत’
संविदाकर्मियों को हुआ वह तमाम प्रोफेसरों की फौज में से किसी को भी नहीं हो
पाया।
अब आप सोचो ‘प्रेम’ का ढाई अक्षर लिखने को
कितनी जगह चाहिए। दो सौ थीसिस रखने और संभाल के लिए कितनी जगह, कितनी अलमारियां चाहिए। और इस यूनिवर्सिटी में न जाने कितनी थीसिस पड़ी
होंगी जो अंततः दीमक का भोजन बनने को शापित हैं। चलो किसी की रोटी तो इन थीसिस से
चली। एक बात और है यह ‘ज्ञान’ जो इन थीसिस के माध्यम से अर्जित किया जाएगा वह किस
काम का? न रोजगार है! न उद्योग! बाकी जितने भी काम-धंधे और
उद्योग धंधे हैं उनमें ये 'थीसिस' काम
नहीं आनी। अतः अधिक से अधिक ये थीसिस 'स्वांतै: सुखाय' हो सकती हैं। समय आ गया है कि ये
शोध-प्रबंध, ये स्कूल-कॉलेज ये यूनिवर्सिटी किस काम के?
बेकार जगह घेरे हुए हैं। कितने चमक-दमक वाले मॉल और मल्टीप्लेक्स
यहाँ बन सकते हैं। सोचा है कभी?
अतः मैं समझता हूँ इन दो सौ थीसिस से वाकई
कोई लाभान्वित हुआ है तो केवल ये दोनों संविदा कर्मी ही हैं। बेच कर एक जून की
रोटी या दो टाइम की झालमूड़ी तो चल ही जायेगी। यूनिवर्सिटी वाले भी अब चैन से सो
सकेंगे। वैसे ही जैसे डाकू खड्ग सिंह के 'सुल्तान'
नामक घोड़े को छल से ले जाने के बाद बाबा भारती सोने लगे थे।
Thursday, October 15, 2026
ग्रेटेस्ट हैंसम पाॅपुलर हीरो- श्याम
25 अप्रैल 1951
का वाकया है। फिल्म स्टार श्याम, फिल्मिस्तान
स्टूडियो के शशधर मुखर्जी की फिल्म 'शबिस्तान' की शूटिंग चाइनीज़ क्रीक, घोडबंदर, थाणे
में कर रहे थे। घोड़ों के साथ शूटिंग सीन खत्म हो गये थे। दोपहर लगभग 12
बजे 'पैक-अप' हो
गया था। श्याम घोड़े पर सवार लौट रहे थे। अचानक, घोड़ा
फिसल गया और श्याम घोड़े से गिर पड़े। वह हंसते हुए उठे और बोले कुछ नहीं हुआ।
थोड़ी देर बाद ही उनके कान से खून बहने लगा। दर्द बढ़ने लगा, उन्हें
तुरंत सीधे बॉम्बे ले जाया गया और मरीन लाईन्स के 'बॉम्बे
अस्पताल' में दिखाया गया। कुछ ही मिनटों में श्याम (श्याम सुंदर
चड्डा) की मृत्यु हो गई। जिससे पूरी फिल्मी दुनिया में सदमे की लहर फैल गई। श्याम
की उम्र केवल 31 बरस थी।
श्याम (सुंदर चड्डा)
का जन्म 20 फरवरी 1920
को सियालकोट में हुआ था। चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे श्याम। वह अपने
टाइम के सबसे स्टाइलिस्ट और सुशिक्षित अभिनेता थे। उन्होंने गोर्डन कॉलेज
रावलपिंडी से स्नातक की परीक्षा पास की
थी। जहाँ वे ड्रामैटिक्स सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे थे। नाटकों में उनकी
परफाॅर्मेंस उत्कृष्ट होती थी। उन्हें टेनिस खेलने का जुनून था। उन्होंने ‘ताजी
मुमताज कुरैशी’ से शादी की थी, उनकी
एक बेटी साहिरा और एक बेटा (श्याम के मरने के दो महीने बाद) मरणोपरांत हुआ था
जिसका नाम शेखर (शाकिर) था। अब वह लंदन में एक मनोचिकित्सक है। बेटी साहिरा ने
राहल काज़मी से निकाह किया। उनका एक बेटा अली काज़मी एक पाक-कनैडियन अभिनेता है।
1942 से शुरु करें तो श्याम ने 25
से अधिक फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया। सब एक से बढ़ कर एक। उन्होंने अपने
समय की सभी टाॅप हीरोइन यथा निगार सुल्ताना, नसीम
बानू, रेहाना, नरगिस, कुलदीप
कौर, मीना शौरी, मुनव्वर
सुल्ताना, सुरैया और रमोला के साथ काम किया। उनकी आखिरी अधूरी
फिल्म शबिस्तान (1951)
को 'बॉडी-डबल' की
मदद से पूरा किया गया।
लाहौर और रावलपिंडी
के दिनों से ही श्याम के सबसे करीबी दोस्तों में अभिनेता ओम प्रकाश थे। उनकी
दोस्ती का बंधन विभाजन के बाद भी जारी रहा। उन्होंने यूनियन पार्क में आमने-सामने
घर खरीदे थे। अभिनेता की मृत्यु के बाद इसका नाम 'श्याम
पार्क' रखा गया। अब इसका नाम चैम्बूर नाका रोड से दूर फ्रेंडशिप
पार्क ('मैत्रेयी पार्क') रखा
गया है। एक पतली गली यूनियन पार्क रोड इलाके को आर.के. स्टूडियो से जोड़ती है। इसी
सड़क के साथ अभिनेता - निर्देशक किशोर साहू, फिल्म
निर्माता रमेश सैगल, त्रिलोक कपूर, अभिनेत्री
नलिनी जयवंत के घर भी थे। आगे, मोड़ के पास, अशोक
कुमार रहते थे। श्याम सुसंस्कृत, पढ़े-लिखे
और अंग्रेजी-उर्दू में पारंगत और धाराप्रवाह थे। वे समाचार पत्रों में दोनों
भाषाओं में नियमित साप्ताहिक कॉलम भी लिखते थे।
वास्तव में, श्याम
की मृत्यु के बाद श्याम की पत्नी अपनी बड़ी बहन, ज़ेब
कुरैशी के साथ लाहौर चली गईं, बड़ी बहन ज़ेब कुरेशी
बॉम्बे में एक अभिनेत्री थी। मुमताज़ ने बाद में एक अंसारी नामक सज्जन से
पुनर्विवाह किया। उनके बच्चों का पालन-पोषण मुस्लिम के रूप में किया गया।
प्रसिद्ध लेखक सआदत
हसन मंटो के साथ श्याम की दोस्ती एक लीजेंड थी। बहुत मजबूत थी। मंटो और श्याम दो
शरीर एक आत्मा की तरह थे।। अपनी पुस्तक 'स्टार्स
फ्रॉम अनदर स्काई' मंटो के अनुभवों के उर्दू -'मीना
बाज़ार' से अनुवादित पुस्तक है। मंटो ने सबसे मार्मिक और दिल को छू लेने वाला
चैप्टर श्याम को समर्पित किया है । जिसका
शीर्षक था श्याम: कृष्णा की बांसुरी। मंटो तब बॉम्बे टॉकीज़ के एक 'एम्पलाॅयी' थे, जहां
श्याम को एक फिल्म का काॅन्ट्रेक्ट मिल गया था। लेकिन पैसा थोड़ा-थोड़ा और बहुत
धीरे-धीरे आ रहा था। वे संघर्ष भरे दिन थे और दोनों दोस्त एक अपार्टमेंट और खर्चा
साझा किया करते थे।
उनके संस्मरण उनके
उन दिनों की छोटी छोटी घटनाओं से भरे हुए रहे जो श्याम के विशाल दिल और दोनों की
गहरी दोस्ती की मिसाल थे। एक दिन जब श्याम को एक ठीक-ठाक राशि मिली और मंटो पर
पैसे नहीं थे, ट्रेन में लौटते समय, श्याम
ने दस-दस रुपये के नोटों की गड्डी को आधा-आधा कर दिया और अपने दोस्त से एक बंडल
लेने के लिए कहा। मंटो ने एक ले लिया और स्टेशन पर उतर गया। श्याम को एक और दोस्त
से मिलने जाना था, जैसे ही ट्रेन जरा दूर गई, श्याम
ने कुछ पैसे लहराए और चिल्लाया, “मैंने इस गड्डी से कुछ रुपये पहले ही निकाल लिए थे”। मंटो
प्यार से उस ‘अलविदा’ को याद करता है
जिसे दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से कहा था, जब
मंटो कराची को रवाना हुआ था। जिस दिन मंटो को जाना था, श्याम
अपने दोस्त को ‘सी- ऑफ’ करने शूटिंग से जल्दी वापस आ गया था। उसने अपने
दोस्त के साथ दो पैग साझा किए, एक भी शब्द बोले
बिना बस कहा “चलें”? उसने सामान पैक करने
में उसकी मदद की और पूरे रास्ते एक दूसरे को चुटकुले सुनाते रहे। जब मंटो शिप की सीटी पर जैटी में सवार हो रहा
था, तो श्याम ने अपने दोस्त को हाथ हिलाया, रोया
और चिल्लाया "हिपतुल्ला!" फिर पीछे देखे बिना चला गया। अगर आप सोच रहे
हैं कि 'हिपतुल्ला!' क्या
है?, तो यह मंटो द्वारा गढ़ा गया एक टर्म था, जो
किसी क्रिकेटर के अजीब नाम से बना था। जिसे उसने एक अखबार में देखा था। मंटो ने
इसे एक ‘ताज्जुब’
या ‘वाह ! वाह’ !
के रूप में इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे यह
फिल्मी हलके में लोकप्रिय हो गया। जैसे कि
कुछ ऐसा जिसे "हिप्तुलाइज़" करने की आवश्यकता है या कुछ "हिप्तुल्ला
पर्याप्त" नहीं है। जब एक सभा में
अशोक कुमार ने श्याम से पूछा इसका क्या मतलब है? तो श्याम ने इसे "मंटोवाद" (मंटोवाइज़) बताया।
श्याम बहुत बुलंद शख्शियत का इंसान था। उसकी हर बात, उसकी
हर हरकत, उसकी हर अदा, ऊंचे
बहुत ऊंचे स्तर की होती थी। जब खूब सफल होने के बाद श्याम की स्थिति
(पैसे से) ठीक ठाक हो गयी तो उसने यह सुनिश्चित किया कि सनकी और बेहद खर्चीले मंटो
के पास अपने छोटे बच्चों और पत्नी की देखभाल के लिए पर्याप्त पैसा होना चाहिए। मंटो
के पाकिस्तान जाने के बाद, श्याम अपने दोस्त के लिए तरसता था, और
उसे पत्र लिखता था। मंटो जवाब नहीं देता था। श्याम चिंतित हो उठता और अपनी फिल्म
डिस्ट्रीब्युटर्स को कहला भेजता कि श्याम की तरफ से पैसे भेज दें। श्याम के भतीजे बिमल
चड्डा लिखते हैं। मंटो से कभी पूछना नहीं पड़ा, श्याम
सहज रूप से अपने दोस्त की जरूरतों को जान लेता था। बिमल के अनुसार "श्याम
पूरी तरह से मंटो के पाकिस्तान जाने के फैसले के खिलाफ था और उसने उसे अपना मन
बदलने के लिए मनाने की हरचंद कोशिश की, लेकिन
मंटो हिला नहीं। दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से बात तक करना बंद कर दिया था।
जिस तरह से 'दि
टाइम्स ऑफ ने इंडिया' ने श्याम की मृत्यु पर कमेंट किया वह श्याम की महान
शख्सियत को दिखाता है। उसका मुख्य पैरा
स्टार की आभा-प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ बताता है। " टाॅल, प्रभावशाली
और सुंदर, श्याम, भारत
में सबसे अधिक लोकप्रिय, स्क्रीन का श्रेष्ठ सितारा, पूरे
भारत में लाखों फिल्म प्रेमियों का चहेता। बॉम्बे में लाखों लोगों की भीड़ लगी हुई
थी। बुधवार सुबह अपने चेम्बूर घर से काम करने के लिए हँसते हुए गया था और दोपहर तक, वह
मर चुका था। (स्रोतः द टाइम्स ऑफ द टाइम्स ऑफ )
बिमल बताते हैं, जब
श्याम एक फिल्म के प्रीमियर के लिए लाहौर गए, जिस
दिन वह लैंड किये, उसी दिन उन्होंने अपने दोस्त की तलाश की। उस समय तक
श्याम एक स्टार बन गया था और प्रशंसक हरदम उसका पीछा करते। वह उनसे घिरा रहता।
हालांकि मंटो और श्याम मिले, और दोनों दोस्तों ने खुशी से एक-दूसरे को गले लगा लिया, लेकिन
आगंतुकों की बढ़ती भीड़ और प्रशंसकों की भीड़ ने उन्हें एक-दूसरे के साथ ज्यादा
समय बिताने ही नहीं दिया।
नंदिता दास की फिल्म
'मंटो' में मंटो की भूमिका नवाजुद्दीन
सिद्दीकी ने की है। श्याम की भूमिका ताहिर राज भसीन ने निभाई है ।
श्याम की अंतिम
फिल्म शबिस्तान में श्याम की नायिका नसीम बानू थीं। 1942 से 1951 तक श्याम की फिल्मों
और उनके अभिनय ने फिल्म जगत में धूम मचा दी थी। श्याम को फिल्म जगत में आला मुकाम हासिल हुआ।











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