Ravi ki duniya

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Wednesday, May 13, 2026

व्यंग्य : बारिश ! बारिश ! भाग जाओ

 

                                     


 

एक सूबे के वज़ीरे-तालीम ने यह ऐलान  किया है कि ये अंग्रेजों ने अपनी संस्कृति भारत पर लादने के लिए अपनी ऊटपटाँग कवितायें (पोयम्स) हमारे छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाने लगे। इससे उनके कोमल मन को, इस तरह से शुरू से प्रभावित कर दिया गया। बल्कि कहना चाहिए ज़हर भर दिया। ये सारी की सारी कवितायें हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराओं और सनातन के अनुकूल नहीं हैं। उल्टे हमारे नन्हें-मुन्ने बच्चों को भारतीयता से विमुख कर रही हैं। चलिये देखते हैं कैसे हमारे बच्चों को बचपन से ही झूठ बोलना, मिथ्या आचरण करना, चोरी चकारी करना यहाँ तक कि कर्तव्य से मुंह मोड़ना और मक्कारी सिखाई जाने लगी। उसी का अंजाम है ये आज की पीढ़ी। अब समय आ गया है कि ऐतहासिक भूल को करेक्ट किया जाये। और फिर अगर हम करेक्ट नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

 

 

1.       अब आप देखिये इस नर्सरी राइम को "रेन रेन गो अवे... कम एनोदर डे ...लिटल जॉनी वांट्स टू प्ले"। देखिये इसमें जॉनी को स्वार्थी दिखाया गया है। इस जॉनी के बच्चे को किसानों का कोई ख्याल ही नहीं है। आखिर किसान हमारा अन्नदाता है। इस सबके बावजूद ये छोकरा जॉनी, जो है सो, रेन से कह रहा है कि तुम चली जाओ मुझे खेलना है। यह हमारी संस्कृति नहीं। उल्टे हमें स्वार्थी होना सिखाती है। इसे तुरंत प्रभाव से हटाया जाना चाहिये।

2.       ये जॉनी जो है सो ऐसा लगता है जैसे इसका निर्माण भारत की संस्कृति को करप्ट करने के लिए ही हुआ है।  इस राइम में जब जॉनी से पूछा गया "जॉनी! जॉनी! ईटिंग शुगर ?" ...वह यद्यपि शुगर खा रहा है और उसके मुंह में  शुगर अभी है भी इस सब के बावजूद वह सफ़ेद झूठ बोलता है "नो पापा"। ये तो जब उससे कहा जाता है "ओपन योअर माउथ" तब वह चोरी पकड़े जाने पर और कोई चारा न देख हँसने लगता है "हा...हा...हा..."

3.       एक और राइम है जो रंगभेद (एपर्थिड) की समर्थक मालूम देती है। पहली लाइन में ही "बा बा ... बा बा ब्लैक शीप..." देखने वाली बात ये है कि ये भेड़ काली ही क्यूँ चुनी गयी है। जबकि भेड़ तो सफ़ेद/भूरी/ब्राउन भी होती है। यह हम अफ्रीकन और भारतीयों के लिए अपमानजनक है चाहे कितने ही अप्रत्यक्ष रूप से क्यों न हो। इसी राइम में एक पंक्ति आती है "वन फॉर माई डेम..." अब यह क्या है? किसी की बहन-बेटी को "डेम" कहना और वो भी "माई डेम" कहना? तौबा! तौबा!

4.       इसी श्रंखला में एक और कविता आती है जो अंग्रेजों ने हमारे समाज में फैलाई है और उसके माध्यम से हमारी मर्यादाओं को भंग करने का प्रयास किया है। "जैक एंड जिल वेंट अप दि हिल"। अब हमारे समाज में इस तरह लड़का-लड़की पहाड़ पर अकेले नहीं भेजे जाते। ये पानी-वानी भरने का काम लड़कियों और महिलाओं के जिम्मे है। फिर वो चाहे कुएं से लाना हो, नदी हो, तालाब से लाना हो। हमारे यहाँ पहाड़ पर चढ़ कर पानी लाने का रिवाज नहीं के बराबर है। वही बात हुई दोनों फिसल गए और गिर पड़े चोट लगी सो अलग। उसी के अनुरूप आज भी जब कहीं 'वेलेंटाइन डे' पर ये जैक एंड जिल दिख जाते हैं तो दोनों की खूब पिटाई करते हैं।

5.       इस तरह अंत में एक और कविता है "ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार ...लाइक ए डायमंड" ... हमारी सनातन संस्कृति कहती है कि सिंपल जीवन जीना है। 'डिटेचमेंट' रखना है। रूखा-सूखा खाना है। किन्तु यहाँ बच्चा, जो है सो, अपने यथार्थ से कटा हुआ दिखाया गया है। वह दिवास्वप्न ले रहा है। वह तारों की तुलना हीरे से कर रहा है। यह सरासर सांसारिक प्रवृति है। यह विलासिता है और कुछ नहीं। बच्चा बचपने से ही हीरे जवाहरात की बात कर रहा है। आगे जाकर यह क्या बनेगा बताने की ज़रूरत नहीं।

 

अतः ये कुछ उदाहरण इसलिए दिये गए हैं कि जब आँख खुले तभी सवेरा है अतः ये जितनी भी अंग्रेज़ी की राइम/कवितायें है वह हमारी संस्कृति के खिलाफ हैं। इनसे जल्द से जल्द छुटकारा पा लेना चाहिए। इन्हें रिप्लेस करना है मंत्रों से, आरती से, श्लोकों से, चौपाइयों से।

शुभस्य शीघ्रम।

व्यंग्य : औपनिवेशिक दौर के सभी निशान मिटाने हैं

 

                                         


 

सच भी है मिटाने ही चाहिए। जब तक ये निशान रहेंगे हमें याद दिलाते रहेंगे और शर्मिंदा कराते रहेंगे कि देखो पुल इसको कहते हैं, सड़क इसको कहते हैं, इमारत इस को कहते हैं जो सैकड़ों बरसों से ज्यों की त्यों खड़ी हैं। एक तुम्हारे बनाए पुल, इमारतें और सड़कें हैं जो इतने हफ्ते या महीने भी नहीं चलते। अब क्यों कि हम हार्डिंग ब्रिज सा या उससे बेहतर ब्रिज बना नहीं सकते अतः हमने क्या काम किया हार्डिंग ब्रिज पर अपनी नेम प्लेट लगा दी और खबर छाप दी आज से हमने इस औपनिवेशिक निशान को मिटा दिया है। खबरदार जो किसी ने इसे हार्डिंग ब्रिज कहा। आज से यह तिलक ब्रिज होगा। हमारा अपना देसी तिलक ब्रिज। हालांकि केवल बोर्ड हमारा है जिस पर हमने तिलक ब्रिज लिखा है।

 

यही हाल हुआ है औपनिवेशिक निशान मिटाने के नाम पर कर्ज़न रोड के बोर्ड को बदल हमने कस्तूरबा गांधी मार्ग कर दिया। बस पेंट-ब्रश का खर्चा पड़ा। रोड तो वही है। फ्लोरा-फाउंटेन का नाम कर दिया हूतात्मा चौक। दिल्ली में अनेक स्टेचू अंग्रेजों के लगे थे। सबको उखाड़ कर एक जगह कोरोनेशन पार्क में खड़ा कर दिया। दिल्ली साफ कर दी। दुनिया में कोई सबसे आसान काम है तो वह है नाम बदलने का। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आ जाता है।

 

अब इसी श्रंखला में यह तय पाया गया है कि रेलवे से भी औपनिवेशिक निशान मिटाये जाएँगे। ये निशान भी तो बड़े जिद्दी किस्म के हैं 1853 से लगे हैं। मिटाते मिटाते टाइम लगेगा। अतः एक तो ये है कि आप बार-बार हम को ही चुन कर भेजें ताकि हम ये सारे निशान मिटा सकें। यूं अंग्रेज़ जो सिस्टम छोड़ कर गये सारे आज भी वही हैं। सिग्नल को सिग्नल ही कहते हैं ट्रेन ही कहते हैं। पदनाम भी वही हैं जो अंग्रेज़ दे गए थे। मुसीबत ये है कि ये रेल चलाई ही अंग्रेजों ने थी। अब या तो पूरी की पूरी रेल ही खत्म कर दो तब मिटेंगे ये औपनिवेशिक निशान नहीं तो कैसे मिट पाएंगे। एक बाबरी मस्जिद ढहा देने से मुस्लिम आक्रांताओं की विरासत खत्म नहीं हो पाएगी। हमें ताजमहल, लाल क़िला, जामा मस्जिद, और दुनिया भर की दरगाह-मकबरे मिटाने होंगे। उसी तरह औपनिवेशिक निशान मिटाने को हमें, क्या इंडिया गेट, क्या गेटवे ऑफ इंडिया, क्या राष्ट्रपति भवन, क्या वी.टी. क्या चर्चगेट सब को ढहा कर दुबारा अपने देसी अंदाज में चीजें बनानी होंगी।

 

रेल से औपनिवेशिक निशान मिटाने का मतलब समझ रहे हैं आप ? पूरी की पूरी रेलवे ही खत्म करनी होगी कारण की पूरी की रेलवे ही औपनिवेशिक है। देसी है तो यात्रियों की टोली देसी है जो बेटिकट चलने में गर्व महसूस करती है। देसी हैं तो चोर, उचक्के, जेबकतरे, उठाईगीरे देसी हैं। देसी है तो दुर्घटनाएं देसी हैं। देसी है तो वे अभागे यात्री देसी हैं जो आज भी गिर कर या पटरी पार करते मरते हैं। और अगर देसी है तो वो बलास्ट (पत्थर की गिट्टक) है जो पटरी के दोनों ओर बिछी रहती है जिस पर चढ़ कर 'लपका' लोग आपके मोबाइल को छीन लेते हैं।

व्यंग्य : सफ़ेद तौलिया और भारतीय नौकरशाही

                                                       


 

      भारतीय नौकशाही और सफ़ेद तौलिया का चोली- दामन बोले तो तौलिया-दामन का साथ है। यदि आपकी चेयर पर सफ़ेद तौलिया का खोल नहीं चढ़ा है तो आप खाक सीनियर अफसर हैं। सीनियाॅरिटी के सुखद एहसास का नाम ही सफ़ेद तौलिया है। सफ़ेद तौलिया के आपकी चेयर से लिपटे - चिपटे रहने के अनेकानेक अर्थ हैं। ये ऐसे ही है जैसे मंदिर में आप अपने दैनिक वस्त्रों को थोड़ी देर को त्याग कर दर्शन करते हैं। उसी तरह आपने क्या पहना है यह बेमानी है। आपकी चेयर पर यह सफ़ेद तौलिया  कवच-कुंडल का काम करती  है। यह आपकी सफेदपोशी का प्रतीक है। शुभ्र-धवल। सफ़ेद रंग शांति का प्रतीक है। शांति से सब ले-दे कर शांति पूर्ण ढंग से निपटा लिया जाये।  राका शांति...वनस्पति शांति। कभी हमारे घर में महज़ एक तौलिया होता था/होती थी। पूरा घर उसी से बदन पोंछता था। फिर धीरे-धीरे हम दूसरी -तीसरी तौलिया एफोर्ड करने लायक हुए तो घर के एक-एक सदस्य पर दो-दो तौलिया हो गईं। इस तौलिया ने स्वदेसी स्वापी/गमछे का बहुत नुकसान किया है। वो तो भला हो इन पाॅलिटिकल पार्टीज़ और इन सेना और दल वालों का कि अब गले में पटका/गमछा पहनने लगे हैं लोग।

 

 मैं कल्पना भी नहीं कर सकता कि इस सफ़ेद तौलिया के आविष्कार से पहले लोग अपना जीवन यापन कैसे करते थे। बोले तो चेयर पर क्या बिछाते थे। यूं सफ़ेद तौलिया नहीं तो क्या बिछाना क्या ओढ़ना। एक नौकशाह सभ्य कहलाया ही तब जब बगुले सा श्वेत वर्णीय तौलिया का आवरण उसकी चेयर पर आ लगा। जिसने भी यह प्रथा चलाई उस दूरदर्शी महापुरुष को कोटि-कोटि धन्यवाद। इस सफ़ेद तौलिया के बल-बूते पर कितनों के काम सर हो रहे हैं। क्या बाबू, क्या अफसर, क्या देखने वाला, क्या चेयर वाला क्या तौलिया वाला, क्या तौलिया धो कर भक्क सफ़ेद करके देने वाला, क्या तौलिया बदलने वाला, यूं समझिए इस सफ़ेद तौलिया के अकेले के दम पर एक पूरी मानव श्रंखला रोजगार पर लगी हुई है। 

 

सफ़ेद तौलिया के बारे में एक बहुत बड़ा सवाल यह है कि इस सफ़ेद तौलिया को बदलने की आवृति क्या रहेगी? क्या हफ्ते में एक बार या हफ्ते में दो बार या फिर दो हफ्ते में एक बार। नौकशाही का सबसे बड़ा पहलू है उसका पिरामिडी होना अतः बिना सीनियर - जूनियर आप नौकशाही की कल्पना नहीं कर सकते। एक कहावत भी है न कि नौकरशाही में कोई किसी का साथी नहीं होता, या तो आप सीनियर हैं या जूनियर हैं। इसी तर्ज़ पर तौलिया के बदलने का क्रम है। तौलिया के सभी पहलुओं को यह सीनियाॅरिटी-जूनियाॅरिटी ही कमांड करती है। अतः जहां सीनियर की तौलिया एक हफ्ते में दो बार बदली जाया करेगी वहीं जूनियर की दो हफ्ते में एक बार बदली जाएगी। उससे जूनियर की बदली ही नहीं जाएगी क्यों कि उसे साल में एक तौलिया मिलेगी। उसका ज्यादा तौलिया-तौलिया खेलने का दिल कर रहा है तो अपने घर से अपना तौलिया लाये। कोई हरकत नहीं। तौलिया, सीनियर को फुल बड़े, बोले तो सुपर साइज़ की मिलेगी। जिसे वक़्त ज़रूरत वह ओढ़ भी सके अथवा छापा-वापा पड़ने की स्थिति में मुंह ढाँप सके। जबकि जूनियर की तौलिया साइज़ में छोटी रखी जाएगी। तौलिया की एक खास आदत है कि यह अपनी जगह से खिसकती बहुत है। बिलकुल नवविवाहिता के पल्लू की तरह। नवविवाहिता इसीलिए कहा कि जो जूनी-विवाहिता (पुरानी-विवाहिता) हैं वहाँ पल्लू नहीं है। बल्कि ड्रेस है वो भी उस तरह की जिसमें पल्लू चुन्नी-दुपट्टे का काम ही नहीं।  अतः इस तौलिया को खिसकने से बचाने के लिए 'वेलक्रो' लगाने का रिवाज है। कहते हैं कि इन्टरनेशनल ड्रग डीलर पैब्लो ऐस्कोबार के यहाँ नोटों की गड्डी बांधने को करोड़ों रुपये के रबर-बैंड लग जाते थे। कुछ कुछ इसी तर्ज़ पर ये छोटे-बड़े तौलिया, उनकी रख-रखाव, अलमारियां, धोने, कलफ लगाने वाले और वेलक्रो का खर्चा भी अगर करोड़ों में नहीं तो लाखों में तो जरूर है।

 

तो हुज़ूर देखा आपने ऐसी ग़रीबपरवर है ये नौकरशाह की चेयर पर लगी सफेद तौलिया।

 

व्यंग्य : आवभगत जन-प्रतिनिधि की

 

                                     


 

 

    एक मशहूर शेर है:  

     

                               लोग हो गए हैं बेपरवाह या अब इश्क़ नहीं करते

                              क्यूँ अब मुहब्बत में कोई बदनाम नहीं होता

 

 

एक सूबे में ये नौबत क्यूँ कर आन पड़ी कि एक सरकारी हुक़्मनामा निकालना पड़ा कि जब भी जन-प्रतिनिधि (सोचो! नेता कहना अब गाली सा हो गया है अतः यह नया नामकरण है) आपके दफ़्तर पधारें आपको खड़े होकर इनका स्वागत करना है पूरे सम्मान के साथ। एक सीरीज़ में प्रसिद्ध संवाद था हमारी मम्मी को चाहिए फुल इज्ज़त ये पंडिताईन क्या होता है बे?” अतः मॉरल ऑफ दि स्टोरी यह है कि जन-प्रतिनिधि भले कहता फिर कि वह फलां बिरादरी, फलां समाज का है और एकछत्र नेता है आपको उसे जन-प्रतिनिधि मानना है और फुल फुल इज्ज़त देनी है। अब सोचो! इतने पर ही बस नहीं है बल्कि उन्हीं पानी भी पिलाना है। और फिर आग्रह पूर्वक उन्हें बिठाना, ठंडा गरम देना है और फिर कहीं जाकर खुद बैठना है।

 

अब इसमें दो बातें हैं। यह ठंडे-गरम जलपान की तफ़सील और मिल जाती तो काम आसान हो जाता। अक्सर यह देखने में आया है कि जन प्रतिनिधि के साथ जो अशिष्ट किस्म के लठैत लोग शिष्टमंडल का हिसा बन घुस आते हैं उनका सारा ध्यान समोसा, बर्फी और पकौड़ों पर होता है और उसी में उनकी अनर्जी काम पर लग जाती है। अब क्यूँ कि बात पानी की ही आई है कि वह आग्रहपूर्वक पिलाना है अतः ऐसा मालूम देता है कि बाकी जलपान वैकल्पिक है। आपकी इच्छा हो तो दें नहीं तो पानी पिला कर ही टाटा-बाय-बाय कर दें यद्यपि आपको दोनों बार खड़ा होना है 'एक तेरे आने से पहले एक तेरे जाने के बाद' । उन्हें और प्रतिनिधिमंडल को लगना चाहिए कि फुल फुल इज्ज़त मिली।

मुझे यह समझ नहीं लगी कि आखिर इस जन-प्रतिनिधि की परिभाषा में कौन-कौन लोग आएंगे। मसलन मंत्री, सांसद, एम.एल.ए. भर या फिर ग्राम प्रधान, सरपंच, सरपंच पति, पार्षद और नामांकित लोग बाग भी आएंगे ? रेजीडेंट सोसायटी के अध्यक्ष ? उनका ? उनका क्या? उन्हें पानी पिलाना है अथवा नहीं ? वे तो बेचारे मिलते ही पानी की समस्या को लेकर हैं। आपने गौर किया इस ऑर्डर में ज़िक्र केवल जन-प्रतिनिधियों को ‘आग्रहपूर्वक पानी पिलाने’ का है यह कतई नहीं है कि आपको उनका काम भी करना है। अतः यही पेच है। समझो अगले ने पानी तो आग्रहपूर्वक पिला दिया, बढ़िया क्वालिटी का जलपान भी करा दिया मगर काम के नाम पर ठन-ठन गोपाल, तब ? तब की कोई बात इस आदेश में नहीं है। उसके लिए इंतज़ार करें अगले आदेश का। अभी चुनाव में वक़्त है।

 

व्यंगय : स्पॉट हुईं सिने तारिका

                                        


  

    एक हैडलाइन है सोहा अली खान बांद्रा में स्पॉट हुईं। मैं सोच रहा हूँ क्या बांद्रा में उन्हें जाना नहीं चाहिए था ? और यदि जाना चाहिए था तो स्पॉट नहीं होना चाहिए था? स्पॉट तो वो होते हैं जो तेज़ी से 'एक्सटिंक्ट' हो रहे हैं या हो गए हैं। रिपोर्टर कहना क्या चाहता है? क्या ये कि सबसे पहले उसने सोहा जी को पहचान लिया और फोटो खींच लिया। मैं सोहा अली खान का फैन नहीं। अलबत्ता उनकी माँ का फैन जरूर रहा हूँ। अब भी हूं। मेरा ये लेख दरअसल सोहा अली खान के बारे में नहीं उस पत्रकार के बारे में है जिसने सोहा अली खान को ‘स्पॉट’ किया वो भी बांद्रा में। इस पर कोई पुरस्कार तो बनता है।

 

क्या सोहा अली खान के फैन ये जानने में रुचि रखते होंगे कि वो आजकल कहाँ घूम-फिर रही हैं। या फिर उनके बांद्रा वाले फैन यह सुन कर सिर धुनेंगे कि लो सोहा अपुन के बांद्रा में आई और एक हम अभागे हैं जो न देख पाये, न सेल्फ़ी ले पाये। अब ऑटोग्राफ लेने का रिवाज तो खत्म सा ही हो गया। अब तो सीधे सेल्फ़ी का चलन है। क्या रिपोर्टर महोदय देश को ये बताना चाह रहे थे कि देखो सोहा भी हमारी-तुम्हारी तरह बांद्रा 11-40 की फास्ट लोकल लेकर जाती है। लेडीज कोच में भी सीट नहीं मिलती कितनी गर्दी है रे बाबा।

 

क्या सोहा को बांद्रा में जाना वर्जित है। यदि नहीं तो फिर ये खबर कैसे हुई ? हो सकता है वो जगह-जगह स्पॉट हो रही थीं। क्या कोलबा, क्या मीरा रोड, क्या नेरुल, क्या कल्याण। किन्तु-परंतु वे बांद्रा में अभी तक स्पॉट नहीं हो पायी थीं। जैसे होता है न फलां बाघ, फलां मोर या फलां किस्म की बिल्ली जो भारत में दुर्लभ है वह बांद्रा में स्पॉट हो गयी। मैं समझता हूँ कि अब सोहा जी ने तो कहा नहीं होगा कि मैं बांद्रा जा रही हूँ वहाँ मिलना और ये हैडिंग देना ‘बांद्रा में स्पाॅट हुईं सोहा अली खान' गोया कि चाँद जो बांद्रा में दिखाई नहीं दिया करता था वह दृष्टिगोचर हो गया है। अब बांद्रा के लोगों के ऊपर है कि वे इस राष्ट्रीय महत्व के समाचार/सूचना का कैसे उपयोग करते हैं। बेचारे ग़रीब रिपोर्टर का काम था ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। बांद्रा वालो ! अब तुम्हारी बारी है। ये रोज़ रोज़ नहीं होता कि बांद्रा में सोहा स्पॉट हो। अब वो स्पॉट हो गईं हैं और सदैव-सजग रिपोर्टर ने अपनी जान पर खेल कर यह समाचार आप तक पहुंचाया है। कहीं आपने कभी भी देखी है ऐसी 'इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग' ? अब वो दिन दूर नहीं जब मेरे भारत महान की रैंकिंग विश्व प्रेस फ़्रीडम में नंबर एक हो जाएगी। थैंक यू रिपोर्टर जी। थैंक यू सोहा जी! थैंक यू कुणाल जो आपने सोहा जी को बांद्रा में स्पॉट होने दिया। खेमू भाऊ संभाल के, अगला नंबर आपका लग सकता है। अब समय आ गया है कि आप भी कहीं सांताक्रूज, विले पार्ले या दादर में स्पॉट हो जायें। एक जोक है कि एक दोस्त दूसरे दोस्त से कह रहा था कि मैंने कल एक चीता को स्पॉट किया ( आई स्पाॅट्ड ए चीता) दोस्त ने कहा चल झूठे ! चीता तो नैचुरली स्पाॅट्ड ही आते हैं) अब रिपोर्टर भी बेचारा क्या करे वह भी तो यही चाहता है कोई उसे स्पॉट करे ताकि जीवन में कुछ तरक्की कर सके। आखिर वो कब तक बांद्रा में सोहा को स्पॉट करता फिरेगा उसको भी हक़ है एक अदद अपना ए.सी. केबिन और अपने लिये डीसेंट पैकेज स्पॉट कर सके।

Sunday, April 26, 2026

भारतीय रेल : साहित्य से सिनेमा तक

 

    

पहले पहल जब भारत में रेल चलना शुरू हुई तब क्या अधिकारी क्या सुपरवाइज़र सभी अंग्रेज़ ही होते थे। धीरे-धीरे रेल नेटवर्क के विस्तार के साथ इसमें एंग्लो इंडियंस और पारसियों को जगह मिलनी शुरू हुई। इसका एक बड़ा कारण था उनकी अँग्रेजी भाषा पर अपेक्षाकृत बेहतर पकड़ और उनका अँग्रेजी  रहन-सहन। लेकिन वे थे कर्मचारी स्तर पर ही। यथा टी.टी., गार्ड, ए.एस.एम. इंजन ड्राइवर आदि। प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड ने अपने एक चाचा का ज़िक्र किया है जो दिल्ली स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।

 

यदि आप साहित्य के फ़लक पर देखेंगे तो पाएंगे क्या गीतकार शेलेन्द्र क्या गुलशन बावरा क्या आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जिनके नाम से एक पूरा युग ही हिंदी साहित्य में दिवेदी युग कहलाता है. वे मध्य रेलवे, तब की जी.आई.पी. रेलवे में कार्यरत थे. अजमेर, बम्बई, नागपुर के अलावा वे झांसी डी.एस. ऑफिस ( डिस्ट्रिक्ट सुपरिटेंडेंट ) वर्तमान डी.आर.एम. ( डिवीजनल रेलवे मैनेजर) के कार्यालय में मुख्य लिपिक थे. सीनियर से अन-बन के कारण नौकरी छोड़ हिंदी की फुल टाइम  सेवा में जुट गये। 


दरअसल तब दो तीन ही विभाग थे जिसमें बम्पर नौकरियों की गुंजायश थी। एक मिलिटरी जिसमें जाने के नाम से ही परिवार में रोना-धोना शुरू हो जाता था दूसरे रेलवे और तीसरा डाक विभाग। 



कुछ प्रमुख लोग जो भारतीय फिल्मी दुनिया और साहित्य को रेलवे की देन है:


1. बीना राय (कृष्णा सरीन)  पिता पश्चिम रेलवे में स्टोर्स ऑफिसर (IRSS

2. शैलेंद्र माटुंगा रेलवे वर्क शॉप में मकेनिक (वैल्डर)      

3. ओम पुरी पिता जालंधर में रेलवे के स्टोर्स विभाग में  

4. डेविड पिता इंजन ड्राइवर  

5. गिरीश कार्नाड बड़े भाई मध्य रेलवे में चीफ इंजीनियर (IRSE)  

6. नूतन ससुर रेलवे में महाप्रबंधक/रेलवे स्टाफ कॉलेज के प्रथम प्रिंसिपल  

7. वी शांताराम जी आई पी (मध्य रेल) में टी एक्स आर स्टाफ               

8. ई. बिलीमोरिया          जी आई पी (मध्य रेलवे) में फायरमैन  

9. राज बब्बर              पिता टूंडला (उत्तर रेलवे) में टी एक्स आर स्टाफ  

10. गुलशन बावरा          पश्चिम रेलवे मुंबई  में गुड्स क्लर्क  

11. बासु चटर्जी             पिता रेलवे वर्कशॉप अजमेर में  

12. शेख मुख्तार            पिता रेलवे पुलिस में  

13. विमल मित्रा            ट्रेन कंट्रोलर दक्षिण पूर्व रेलवे में  

14. वीना                       पिता रेलवे में  

15. भप्पी सोनी             पूर्व टिकट कलेक्टर     

16. के पी सक्सेना          कहानीकार, संवाद/स्क्रिप्ट लेखक स्टेशन अधीक्षक  

17. शीला  (मलयालम)      पिता रेलवे में  

18. सी रामचंद               पिता मध्य रेलवे में स्टेशन मास्टर   

19. ऋषिकेश मुखर्जी       ससुर रेलवे में महाप्रन्धक (ए के मुखर्जी)   

20. मौसमी चटर्जी           पिता रेलवे में (कोलकाता)  

21. के एल सहगल           मुरादाबाद उत्तर रेलवे में टाइम कीपर   

22. रंगनाथ (तेलुगू)          चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी  टी.टी. विजयवाड़ा   

23. रघुनाथ रेड्डी (तेलुगू)     चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी  

24. बालचन्द्र मेनन निर्देशक  पिता दक्षिण रेलवे में स्टेशन मास्टर  

25. खराज मुखर्जी (बंगला अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी  

26. नागेश (तमिल अभिनेता)     पूर्व रेलकर्मी  

27. वीनू चक्रवर्ती (अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी  

28. अलेक्स (तमिल) गोल्डन रॉक वर्क शॉप के स्टोर्स विभाग में  

29. विजयन     निर्देशक (तमिल) गोल्डन रॉक वर्कशॉप  

 30. शिखा स्वरूप       पिता उत्तर रेलवे के स्टोर्स विभाग में  

31. जॉर्ज बेकर  असमिया/बंगलाअभिनेता उत्तर-सीमांत रेलवेपी.डब्लू.आई.  

32. सोहराब मोदी    (पिता जयपुर/रतलाम/अलवर) में रेलवे इंजन ड्राइवर  

33. नज़ीर हुसैन           पिता रेलवे लखनऊ में गार्ड  

34. राशिद खान          वडोदरा स्टेशन पर  

35. इंद्रजीत सिंह तुलसी (गीतकार) लॉ ऑफिसर पश्चिम रेलवे   

36. आदेश श्रीवास्तव         पिता जबलपुर में टी एक्स आर  

37. मिलिंद सोमन         पूर्व टिकट कलेक्टर  

38. पलाश सेन            पिता उत्तर रेलवे में डॉक्टर 

39. उत्तम मोहंती       (उडिया फिल्म) पिता खड़कपुर में गुड्स क्लर्क  

40. सुमा (तेलुगू)         पिता दक्षिण मध्य रेलवे में कार्यरत  

41. बुद्ध देब दासगुप्ता    (बंगला निर्देशक) पिता दक्षिण पूर्व रेलवे   

42. सुरोजीत चटर्जी     पूर्व अधिकारी दक्षिण पूर्व रेलवे   

43. मालविका तिवारी     पिता रेलवे अधिकारी  

44. आयशा धाड़कर    दादा रेलवे में अधिकारी ( IRAS)  

45. नागभूषण      (तेलुगू)  गुंटकल में पूर्व बुकिंग क्लर्क  

46. ज़रीना वहाब     पिता राजमुन्दरी में गार्ड  

47. महमूद जूनियर   पिता पश्चिम रेलवे में  

48. गजराज राव       पिता उत्तर रेलवे में  

49. लिलेट दूबे               पिता गोविंद केसवानी रेलवे में इंजीनियर  

50. डॉ जब्बार पटेल        निर्देशक  पिता दौंड में चीफ यार्ड मास्टर  

51. शांता आप्टे           पिता मध्य रेलवे के सोलापूर में स्टेशन मास्टर  

52. राजीव मेनन          फिल्म निर्माता भाई करुणाकर मेनन (IRAS)  .

53. रलल्पलली नरसिम्हा राव   दक्षिण मध्य रेलवे के स्टेटिक्स विभाग में  

54.  ऐरिका लाल  वक़्त फिल्म पर्दे पर ‘आगे भी जाने न तू’ पिता रेलवे में मकेनिकल ऑफिसर  

55. प्रेम ऋषि         अभिनेता ड्राइंग ऑफिस पश्चिम रेलवे मुंबई  


इसके अलावा क्या भगवती चरण वर्मा, क्या मुंशी प्रेम चंद क्या के पी सक्सेना इन लोगों ने भी भारतीय फिल्मों से किसी न किसी रूप जुड़ाव रखा है। के पी सक्सेना तो रेलवे से ही थे। जबकि मुंशी प्रेम चंद और भगवती चरण वर्मा की पुस्तकों पर फिल्म बनी। पंडित चंद्र धर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पर भी फिल्म बनी। 


हिन्दी फिल्मों मे यह आम दृश्य होता था जिसमें रेल किसी न किसी रूप मे अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराती रही है। या तो हीरो खुद या कोई न कोई रेलवे मे कार्यरत  दिखाया जाता था। नायक ट्रेन मे चढ़ रहा है या उतर रहा है या फिर हीरोइन साथ में ही यात्रा कर रही होती थी। 


न जाने कितने ही गीत रेल मे, रेल के ऊपर, रेल के इंजन मे फिल्माए गए। किसी दुखियारे या दुखियारी को ख़ुदकुशी करनी हो तो रेल, विलेन की मनपसंद जगह रेल की पटरी होती थी जहां वह किसी न किसी को पटरी से बांध देता था।  


कितनी ही फिल्मों के टाइटल तक रेलवे के इर्द गिर्द घूमते हैं मसलन फ़्रंटियर मेल, पंजाब मेल, तूफान मेल। रेलवे प्लेटफॉर्म, बनिंग ट्रेन, चेन्नई एक्स्प्रेस, एक चालीस की लास्ट लोकल, दि ट्रेन, भवानी जंक्शन, रेल का डिब्बा, हाफ टिकट, लास्ट ट्रेन फ्राम बॉम्बे, डिकेन क्वीन, बॉम्बे मेल।  

असल में भारतीय रेलवे आम जन-जीवन से इतनी जुड़ी हुई है कि यह किसी न किसी रूप में आपके जीवन में स्थान रखती है। आप किसी से बात करें संभावना यह होती है कि उसके परिवार या एक्स्टेंडिड परिवार से कोई न कोई रेलवे में जरूर होता था, पापा, चाचा, ताऊ, मामा, भतीजा। यह तो साहित्य और फिल्मों की बात है अन्यथा खेल की दुनिया हो या जीवन के अन्य क्षेत्र उदाहरण के तौर पर पी टी ऊषा, विश्वनाथन आनंद, पी वी सिंधु, महेंद्र सिंह धोनी हो, लाला अमरनाथ या फिर डायना एडुलजी, गुरबक्स सिंह, पूरन सिंह या फिर मेकलुस्कीगंज को बसाने का श्रेय रखने वाले मेकलुस्की के पिता। 

एक वक़्त था जब अपनी अपनी किस्मत आज़माने रेल से ही मुंबई उतरते रह हैं। सालों साल लोकल ट्रेन में सफर करते हैं कई बार तो बेटिकट भी।

व्यंग्य: स्टेशन मास्टर और केंटीन का उदघाटन


                                                


 

           पूरे राज्य में ये खबर केंटीन के चूल्हे की आग की तरह फैल गयी है कि किसी स्टेशन मास्टर ने ये हिमाकत, बोले तो ये दुस्साहस किया है कि अपने स्टेशन की केंटीन का उदघाटन खुद ही कर डाला। लोग-बाग अब उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जगह-जगह, नुक्कड़ नुक्कड़, चैनल-चैनल यही ब्रेकिंग न्यूज़ गरम है कि इस स्टेशन मास्टर को ये सूझी तो सूझी क्या। ये क्या बात हुई ? अब ऐसी भी क्या मजबूरी आन पड़ी कि मास्साब ने खुद ही केंटीन का फीता काट डाला। यह तो सरासर बेईमानी है। नाइंसाफी है। अब ये ऐरे गैरे मास्टर फीता काटने लगेंगे तो हाकिम बेचारा क्या करेगा? जिस तरह हुकम हाकिम का उसी तरह यह विशेषाधिकार भी हाकिम का है कि वह जी चाहे जिसको काटे। जहां चाहे जिसका फीता काटे, उदघाटन करे। वह केवल उसी सूरत में किसी और को उदघाटन की इजाजत देता है जब उसका नामकरण उसी के नाम से हो। क्या इन मास्टर साब को पता नहीं की हर गाँव-खेड़ा में सभी जगहों का उदघाटन हाकिम ने करना होता है। ये खेकड़ा स्टेशन क्या भारत से अलग है? बसंत कुमार को साफ-साफ शब्दों में बता दिया जाये वह बस नाम का बसंत है। काम का बसंत हर मौसम में हाकिम होता है। 

  

 

इतने सालों में इस स्टेशन मास्टर को ये भी नहीं पता चला कि स्टेशन पर क्या करना होता है क्या नहीं। माना कि ट्रेन को हरी झंडी उसी ने दिखानी है और सारी उम्र दिखानी है। फिर क्यों वह नामाकूल, नाकारा, नालायक एक दिन की ये विजुअल खुशी हाकिम से छीन लेना चाहता है। हो न हो ये किसी दुश्मन राज्य का जासूस तो नहीं जिसने हमारे राज्य में अराजकता फैलाने का ये तरीका निकाला हो। मगर हाकिम उसके इन मंसूबों को कामयाब नहीं होने देगा। उसके सभी पतों पर लोग पूछताछ को भेज दिये गए हैं वे सब दल-बल के साथ पहुँचते ही होंगे और उसकी अगली-पिछली सात पीढ़ियों का हिसाब निकाल कर ले आएंगे। आज तक का रिकॉर्ड है कि हाकिम की टीम कभी खाली हाथ नहीं लौटी।

 

बच्चू ! स्टेशन मास्टर जब दो-चार बरस कारावास में रहेगा तो सारी मास्टरी भूल जाएगा। अब से कारावास ही उसका स्टेशन होगा। इस मास्टर ने डाकिये से भी कुछ न सीखा। भई कैसा मास्टर है? अब देखो ठेके की नौकरियों के रुक्के भी हाकिम खुद दे रहा है। किसी डाकिये ने आवाज़ उठाई। हरगिज़ नहीं। वे समझदार हैं। उन्हें पता है पहले ही ये कूरियर वाले , ई मेल और वाट्स अप से उनकी नौकरी पर बन आई है। चुपचाप अपने दिन काटिए। चूँ चाँ की तो आपको बैरंग घर भेज दिया जाएगा। और पूरा डिपार्ट ही बंद कर दिया जाएगा फिर डाकिया-डाकिया आपस में ही खेलते रहना। अरे हाकिम आखिर हाकिम होता है वह चाहे तो नेज़ा फेंकने वाले से उसका नेज़ा ले कर नीलाम कर दे। यह उस नेजेवाले की खुशकिस्मती है। उसे तो उलटा खुश होना चाहिए और हाकिम का सौ सौ बार शुक्राना अदा करना चाहिए। अब अगर वो नेजे वाला अपना नेज़ा देने में आना-कानी करता तो क्या वह दुबारा नेज़ा फेंकने लायक रह जाता। वह जानता है बांह सलामत रहे नेजे हज़ार। महज़ हुकम हाकिम का नहीं होता, हुकूमत हाकिम कि नहीं होती... कायनात हाकिम की होती है।