Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Friday, July 31, 2026

व्यंग्य: हेरिटेज घड़ी से लिमिटेड एडिशन घड़ी तक

 

 

हम बचपन में नाना-नानी दादा-दादी के घर में पुराने, बोले तो, बेहद पुराने सन्दूक रखे और फ़ोटोज़ टंगे  देखते थे। जॉर्ज पंचम का फोटो हो या रानी एलीज़ाबेथ का। स्वदेशी में नेहरू जी और गांधी जी के फोटो लोकप्रिय थे। एक फोटो मुझे याद है जिसमें नेहरू जी और केनेडी वाईट हाउस के लाॅन में टहल रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे केनेडी उन्हें कुछ इंगित कर दिखा रहे हैं और नेहरू जी ठोड़ी पर हाथ लगाए आश्चर्य से निहार रहे हैं। आपने अगर सुदर्शन की 'हार की जीत' कहानी पढ़ी हो तो उसमें ज़िक्र आता है “बाबा ने घोड़ा दिखाया घमडं से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से” वैसा ही कुछ आश्चर्य नेहरू जी के चेहरे पर था।

 

हमारे रेडियो, फ्रिज, ए.सी.  और टी.वी. 30-30 साल चले। वो भी बिना किसी हील-हुज्जत के। तब सोचो चीजों की कितनी गारंटी होती थी। दरअसल वो गारंटी चीजों की नहीं थी। वो गारंटी आदमी की थी। उसकी नीयत की थी। उसे अपनी साख बहुत प्यारी थी, प्रॉफ़िट सेकंडरी था। वारंटी शब्द ही अब आया है। पहले तो गारंटी ही चला करती थी। चीज़ खराब भी  नहीं होती थी। दुकानदार आम कहते थे 'दादा खरीदे पोता बरते'। अब कोई दुकानदार ऐसा नहीं कहता क्योंकि अब यह फैशनेबल नहीं। अब आदमी पोते के बरतने की दृष्टि से कुछ नहीं खरीदता। उसकी और पोते की पसंद मिलती - जुलती नहीं है। यहाँ हर दो महीने बाद तो नए वर्जन का लैपटाॅप और फोन मार्किट में आ जाता है। मुझे याद है जब बैल बॉटम चले थे तब कोई इंसान अगर ड्रेन पाइप वाली पेंट पहने दिख जाता था तो ऐसा मालूम देता था कि वह किसी पुरानी सभ्यता से चला आया है।

 

मेरे फ्रिज और ए.सी. ने मेरा साथ 30 साल तक निभाया। हमने बहुत सी चीजों का साथ तो महज़ इसलिए छोड़ा कि अब उसके पुर्जे मिलना बंद हो गए या अब के मकेनिक उसे समझ ही नहीं पाते और हाथ खड़े कर देते हैं। अभी चालीस साल पहले मैंने अपना ट्रान्जिस्टर की नाॅब को ठीक होने दिया तो बाद में ख्याल आया कि मैंने रसीद तो ली ही नहीं। करीब एक माह बाद मैं दुकान पर गया तो उसने एक टोकरी मेरे आगे कर दी इसमें से पहचान कर अपना ट्रान्जिस्टर ले लो। कारण कि इस बीच में बलवाईयों ने उसकी दुकान पर हमला कर लूटमार की थी। मेरी नज़रों में उस दुकानदार की इज्ज़त बहुत बढ़ गयी। मैं ये सोच रहा था कि ये कंज्यूमर कोर्ट क्यों बनाने पड़े क्यों कि कोई तो है जो इस पूरी चेन में अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा। एक और नया जुमला आजकल चला है। 'इन चीजों की इतनी ही एज होती है'। दो साल चल गया और क्या चाहिए। अब नया मॉडल ले लो। उसमें फलां फीचर भी है। हमारे यहाँ जब वो वाला फ्रिज था जिस में बर्फ (फ़्राॅस्ट) हफ्ते के हफ्ते निकालनी पड़ती थी तब कमसेकम चीज़ें कब से फ्रिज में रखी हैं, पता चलता रहता था और बहुधा खराब होने से पहले बरत ली जाती थी। लेकिन अब 'ऑटोमेटिक डिफराॅस्ट' होने वाले फ्रिज आ गए हैं। अब चीज़ें सीधे फ्रिज से डस्टबिन में जाती हैं। इस चक्कर में हमने अपने पेट को भी कमोबेशी डस्टबिन ही बना लिया है। अब रेडियो, घड़ी, ट्रान्जिस्टर, मोबाइल फोन, लैपटाॅप खराब हो जाये तो मैं इस जुगाड़ में लग जाता हूँ कि इसे कैसे चलाने लायक बनाया जाये। बच्चों को कानों कान खबर हुए बिना। क्यों कि आज के दौर में चीज़ें ऐसी नहीं बनीं हैं आजकल के बच्चे भी कम बेसबरे नहीं। वे तुरंत डिक्लेयर कर देते हैं कि "फेंको इसे! दूसरा नया ले लो"। अब उन्हे कौन समझाये कि हम उस पीढ़ी के हैं जो हवाई चप्पल की बद्दी (स्ट्रैप) टूट जाने पर ऑलपिन या सेफ़्टी पिन से चला लिया करते थे। जूते की रिपेयर तब तक कराते रहते थे जब तक हमें या जूते को शर्म ही न आने लग जाये या मोची हाथ खड़े कर दे। जो भी पहले हो। हम बड़े गर्व से बताते थे ये मेरे पिताजी की अथवा दादा जी की घड़ी है। आज भी सही टाइम बताती है। सही चल रही है। वहीं 'ग्रांड सन' का कहना है "ये लिमिटेड एडिशन घड़ी है। यह वाटर प्रूफ है, यह दिन, तारीख बताती है। आप कितना चले, कितनी कैलोरी बर्न की और आपका हार्ट रेट भी"। अब उन्हें कौन समझाये हमारे टाइम पर तो बुजुर्ग हमें देख कर ही हमारे दिल का हाल बता देते थे।

 

 

Wednesday, July 29, 2026

व्यंग्य: असली ज़ेन-जी हम हैं

 


आजकल जो है सो ज़ेन-जी का बहुत बोलबाला है। जित देखो तित ज़ेन-जी के धमाल का शोर है। उन्ही की चर्चा हो रेली है। ऐसे में मेरा और मेरे जैसे अन्य असली खालिस ज़ेन-जी का परेशान होना, 'नैगलेक्टड फील' करना 'बट-नैचुरल' है। यह तो 'कूल' नहीं। आगे दो-चार लाइन्स में ही मैंने 'प्रूव' कर देना है। देखिये! मैं और मेरे जैसे रिटायर्ड लोगों को 'एक्स' क्यों कहते हैं। बोले तो ! ये जो भी भूतपूर्व हैं उन्हें 'एक्स' कहा जाता है। रिटायर होने के पाँच-दस साल तलक आप 'वाई' समझते और कहलाते हो। अब इस 'वाई' के अनेक अर्थ हैं। जैसे अपने को अभी भी 'वाई' से यंग समझना।  यूथ समझना। वैसे ही टाइट टी-शर्ट पहन कर चहल-कदमी करना। घर में भी ये 'वाई' वाले सबको टोकते-रोकते हैं। कोई बात हो इनकी ज़ुबान पर 'वाई' (क्यों) रहता है। बात-बात में बल्कि हर बात में 'वाई' (क्यों) इसकी क्या ज़रूरत है? पंखा क्यों चल रहा है? ए.सी. बंद क्यों नहीं किया? ये इतना महंगा खरीदने की क्या ज़रूरत? इन शॉर्ट ! सब जगह 'वाई' (क्यों-क्यों) का ग़दर मचाये रखते हैं। लेकिन ये ज्यादा नहीं चलता।

 

दस साल बाद यानि की जब आप सत्तर के लपेटे में आ जाते हो तो आप असली 'ज़ेड' तक आन पहुँचते हैं। देखिये जब आप रिटायर हो गए तब से आप 'अल्फाबेट' के 'एक्स' हो जाते हो। उसके दस साल तलक आप 'वाई' रहते हो और फिर अंग्रेजी वर्णमाला के आखिरी 'अल्फाबेट' ज़ेड तक आ जाते हो। बस उसके बाद कभी भी चला-चली की वेला रहती है। अब आप ना 'एक्स' हैं ना 'वाई'। अब आप 'ज़ेड' हो। इसीलिए मैं हुआ आप हुए (अगर आप सत्तर के ऊपर के हो) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप ‘अर्ली सेवेंटीज़’ में हो या ‘लेट सेवेंटीज़’ में आप हो तो ज़ेन-जी ही।

 

अब आप समझे! मैं क्यों अपने को और अपने जैसे ‘स्वीट सेवेंटी’ वाले सभी लोग को ज़ेन जी कहता-समझता हूं। असली 'ज़ेन-जी', खालिस 'ज़ेन-जी'। आप बिंदास हैं क्यों कि आपके पास खोने को कुछ नहीं। आप तो वैसे ही ‘डिपार्चर-लाउंज’ में बैठे हैं। न जाने कब आपकी फ्लाइट एनाउंस हो जाए। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है:

 

 

         उन किताबों को हम काबिले-जब्ती समझते हैं

         जिन्हें पढ़ कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं

 

अब इसमें दो बातें हैं। पहली तो ये कि अकबर इलाहाबादी अब रहे नहीं। नहीं तो पता नहीं वो अपना नाम अकबर प्रयागराजी कहलाना पसंद करते क्या? दूसरा, ये कि अगर बेटे (बेटी इन्क्लुडिड) बाप को खब्ती समझते हैं तो 'डेफ़िनिटली' ज़्यादातर बाप निश्चय ही खब्ती हैं। खब्ती इंसान अव्वल तो लॉजिक से काम लेता नहीं। वह अपने पूर्वाग्रहों से बुरी तरह ग्रस्त रहता है। दूसरे उनकी बहुत 'स्ट्रॉंग लाइक्स' और 'डिसलाइक्स' रहती हैं। देखिये कुछ भी बड़ा करने को जुनून चाहिए। मेरा सत्तर वालों से अनुरोध है कि आप अपने आप को कम न समझें। आप सत्तर नहीं आप 'सतर्क' हैं। आप असली के ज़ेन-जी हैं। आपकी ‘नाॅलिज़ वास्ट’ है। तजुर्बा तो विशाल है ही। एक सीरियल आता था दूरदर्शन पर ‘हम लोग’ उसमें लाजो जी (मुख्य पात्र) एक संवाद अपने बच्चों को कहती है “मैं तब की मॉडर्न हूँ जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे”

 

Sunday, July 19, 2026

भांति भांति के लोग...

  

वह टूरिज़म विभाग में ही था। उसे रूम-अटेंडेंट का काम सौंपा हुआ था। जिन्हें होटल लाइन का ज्ञान न हो उनकी मालूमात के लिए बता दूँ रूम-अटेंडेंट अथवा हाउसमैन का काम सीढ़ी पर सबसे बॉटम पर माना जाता है। मैट्रिक फिर भी मांगा जाता था, ताकि वक़्त ज़रूरत गैस्ट से बात कर सके। समझ सके। बहरहाल इस पोस्ट (पद) पर मोटीवेशन कम ही रहता था। जहां मोटीवेशन न हो वहाँ लोगबाग अपना मोटीवेशन खुद बना लेते हैं।.तलाश कर लेते हैं। जैसे सहकर्मी के साथ आँख लड़ाना अथवा प्रेम पींग बढ़ाना। शाम को यारों की ड्रिंक पार्टी। किस गेस्ट ने किस को क्या दिया। किसका टांका किससे भिड़ा है। लेटैस्ट किसका किसके साथ क्या चल रहा है। कोई-कोई कॉल गर्ल रैकिट से भी इनडाइरेक्टली जुड़ जाते। हम सब अपने-अपने काम का एक्साइटमेंट बनाए रखने को कुछ न कुछ करते ही हैं। एक आदर्श स्टेंडर्ड होटल में मोटे-मोटे दो डिवाइड होते हैं। फ्रंट ऑफिस और बैक ऑफिस।

फ्रंट ऑफिस: जैसा नाम से ही विदित है वे विभाग होते हैं जो सामने-सामने होते है बोले तो गेस्ट के संपर्क में आते हैं। यथा रिसेप्शनिस्ट, बैल बॉय, बिल क्लर्क, दूसरे होते हैं

हाउस कीपिंग: जिसमें हाउस कीपर, रूम अटेंडेंट/हाउसमैन आते हैं। एक होता है

एफ एंड बी: फूड एंड बेवरेज ( रेस्टाॅरेंट/खाना-पीना/बार)

स्टोर एंड पर्चेज: (होटल की सामग्री खरीदना उसका रखरखाव)

सिक्यूरिटी एंड विजिलेन्स:

पर्सनेल:

एकाउंट्स:

शेफ: ( किचन/कुक/कुकिंग)

 

पता चला कि एक हाउसमैन के पिता की दुखद मृत्यु हो गयी है। वह हाउसमैन छुट्टी पर चला गया। महीने भर बाद  एक दिन वह आया। उसके हाथ में उस दौर में जो फ़ैशन थी उसके अनुरूप एक विदेशी ब्रांड का मंहगा सिगरेट का पैकेट और  गोल्डन लाइटर था। वह उस लाइटर को हाथ में घुमा-घुमा कर उसके साथ लगातार खेल रहा था। उसने अपनी गर्दन में सोने की मोटी चेन पहन रखी थी। तदनुसार बुशर्ट के ऊपर के दो बटन खुले रखे थे। आपने सोने की चेन  पहन रखी हो वो भी इतनी मोटी और उसे दिखा भी ना पाएँ तो क्या ही फायदा ऐसी चेन पहनने का? वह बिना पूछे मेरे चेम्बर मे आकर मेरे सामने लगी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया। और बोला मेरा केस अपने पिता की जगह करुणा आधार पर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी के लिए प्राॅसस हो गया है। वह यही बताने आया है। जैसे ही लैटर आयेगा वह अपना त्यागपत्र दे देगा। तब तक भागा-दौड़ी के लिए अब लीव पर ही रहेगा।

 

दो महीने बाद वह आया। अबके उसके हाथ में सिगरेट का पैकेट नहीं था। न ही लाइटर था। उसने मुझसे पूछा कि क्या वह बैठ सकता है। मुझे वह बीमार सा लग रहा था। मैंने उससे पूछा उसने जॉइन कर लिया ? किस पोस्ट पर जॉइन किया ? और उसका ऑफिस कहाँ है ? सब के उत्तर में उसने एक लंबी ठंडी आह भरी। बोला :

 

"जी हमें तो पता नहीं था पिताजी का किसी भारी वित्तीय गड़बड़ी के केस में नाम था। उसी से परेशान हो उन्होने आत्महत्या कर ली थी। ऑफिस ने सूचित किया है कि ऐसे केस में करुणामूलक नौकरी का कोई प्रावधान नहीं है। हम उनसे मिले। उनकी बहुत अनुनय-विनय की मगर उन्होने नियमों का हवाला देते हुए हमें दफ्तर से हकाल दिया। सर ! क्या मुझे मेरी हाउसमैन की नौकरी वापिस मिल सकती है ? सोचो मुझे क्या करना चाहिये था ?    

 

व्यंग्य : अगले जनम मोहे साँप से मत डसवाईयो

 


    सयाने कह गए हैं हर अपराध के पीछे तीन चीजों में से एक न एक का हाथ होता है: जर, जोरू, ज़मीन। आजकल जैसा सब कुछ चल रहा है अखबार के अखबार भरे पड़े रहते हैं ऐसे ही न्यूज चैनल एक के बाद एक खबर देते रहते हैं जैसे कोई कंपटीशन सा चल रहा हो। अब प्रिये! मेरी समस्या ये है कि मुझे साँपों से बहुत डर लगता है। साँप तो साँप मुझे तो केंचुए से भी डर लगता है। अतः तुम कुछ भी करना पर वादा करो तुम मुझे साँप से नहीं डसवाओगी। सुनते हैं जब साँप डस लेता है तो ज़हर से पूरा जिस्म नीला पड़ जाता है। वैसा ही नीला जैसा नीला प्लास्टिक ड्रम होता है। अब मैं नहीं चाहता कि मेरा जिस्म नीला पड़े। पहले ही मेरा रंग काला बोलो, सांवला बोलो है। नीला होकर तो और भी ना जाने कैसा-कैसा लगेगा। भले तुम्हें साँप और सपेरे आराम से 'ईजीली' मिल जाएँगे। पर देखो मेरी आखिरी इच्छा यही समझो कि मुझे साँप से मत डसवाना। सिर्फ इसलिए कि मुझे साँप से डर लगता है बहुत डर लगता है। हो सकता है सांप को देखने मात्र से ही मेरा दम निकल जाये। कहावत है न जब गुड़ से मरता हो तो ज़हर क्यों दिया जाये।

 

अब तुम अगर ये सोचो कि तुम मुझे किसी पहाड़ पर ले जाने का प्लान बना रही हो जैसे कि नॉर्थ ईस्ट के इलाके में होते हैं। पर प्रिये ! मुझे हाइट्स से डर लगता है। बोले तो मैं वर्टिगो से ग्रस्त हूँ। अक्रोफोबिया है मुझे। हाइट्स पर जाने का दूर हाइट्स का नाम सुन कर ही जी मिचलाने लगता है। मुझे चक्कर आने लगते हैं। अतः हे प्रिये! मुझे कभी पहाड़ पर ले चलने का ज़िक्र भी मत कर देना। और सुनो प्रिये! मुझे इन पुराने किलों और महलों में भी कोई रुचि नहीं है। मैं अपने टू बी.एच.के. के क्वाटर में बहुत खुश हूं। अतः प्लीज़ मुझे कभी किसी भी क़िले या महल ले जाने की ज़िद मत करना। जब भी तुम इसका ज़िक्र भर करोगे मेरा जिस्म सुन्न पड़ जाएगा। जाना तो दूर मैं इन भूतहा किलों का नाम सुन कर ही  सहम जाता हूं।

 

अब आजकल ये छुरी-चक्कू बोलो, तमंचा-कट्टा बोलो आसानी से सुलभ हैं। इनको चलाने वाले भी आजकल बहुत सस्ते में मिल जाते हैं। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं दूर ढूंढो पास मिलते हैं। फिल्मों- सीरियलों में गोली चलते, गोली लगते देखना एक बात है मगर मेरे को गोली लगे सुन कर ही पसली में सिहरन दौड़ जाती है। मैं जानता हूँ अगर एक बार तुम ठान लो तो ऐसी कोई बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं बनी जो मुझे तुम्हारी बुलेट से बचा ले।

 

 निष्कर्ष यही छोटा सा है प्रियवर कि जब तुम्हारा मन मुझ से ऊब जाये तो बस कह भर देना मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा। असल में जान है तो जहान है। जान सलामत रहे जाने-मन बहुत मिल जाने हैं। जब जान ही नहीं रहेगी तो काय बात की जाने-मन? तुम बेशक सातों वचन भुला दो वांदा नहीं।  बस तुम तो मेरा यही एक वचन, मेरे लिये  निभाने का वादा करो कि जब तुम्हें किसी भी स्टेज पर ऐसा लगे कि अब बस हो गया तो मुझे बता भर देना। मनी बैक गारंटी की तरह ये दूल्हा बना माल वापिस हो जायेगा। भूल चूक लेनी देनी।  

अनुकंपा नौकरियां -फैमिली वैलफेयर या फ्राॅड

 

ज्ञात हो कि भारतीय रेलवे भारत में सबसे बड़ा नियोक्ता है। एक समय की बात है कि इसमें लगभग 18 लाख कर्मचारी थे, जिनमें दो लाख आकस्मिक श्रमिक भी शामिल थे। चूंकि रेलवे की अपनी संख्या इतनी बड़ी रही है, तदनुसार, सेवानिवृत्ति/त्यागपत्र/ मृत्यु भी आनुपातिक रूप से बड़ी है। रेलवे के विपरीत अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की सीमा अन्य केंद्र सरकार के मंत्रालयों में 5 प्रतिशत है। यह कुल 5 प्रतिशत रिक्तियों/स्वीकृत पद तक सीमित है।

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अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान अंग्रेजों द्वारा बनाई पाॅलिसी के रूप में है। 'क्लोज-शॉप' कई संगठनों में भर्ती का एक वैध तरीका रहा है। उनका मानना है कि इस प्रकार वफादारी और समर्पण, आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं। यह अनुकंपा नियुक्ति  संकट में शोक संतप्त परिवार को सहायता प्रदान करने के लिए था। समय के साथ यह 'एक मौत = एक नौकरी' बन के रह गया। सरकारी रोजगार की आवश्यकता सभी को होती है, वह भी यदि  रेलवे में है तो बल्ले बल्ले ! चिकित्सा सुविधा, सरकारी आवास और उदार पेंशन लाभों के साथ। इसलिए सरकारी नौकरी के लिये परिवार अपने को 'संकट' में घिरा पाता है।  कर्मचारी यूनियन सदैव एक शुल्क पर आपकी सहायता को तत्पर मिलेंगे।

 

 देखा गया है कि परिवार अपने बेटों में से सबसे नालायक को रेलवे को प्रदान करता है। उनका मानना है कि 'योग्य' तो अपनी योग्यता के आधार पर कहीं और भी नौकरी हासिल करने में सक्षम होगा। इसके अलावा, बेटा उनकी स्वाभाविक पसंद होती है क्योंकि पुत्री तो अंततः शादी कर लेगी और परिवार को छोड़ देगी। एक आसान सी लिखित परीक्षा आयोजित की जाती है, जो आम तौर पर मैट्रिक स्तर की होती है। अफ़सोस! बी ए और एम ए इसे पास करने में विफल रहते हैं। फिर वे आँसू भरे दूसरा मौका देने की गुहार लगाते हैं क्योंकि उनके अनुसार वे भावनात्मक आघात से गुजर रहे होते हैं। आम तौर पर, एक दूसरा मौका दे दिया जाता है। जहां तक ग्रुप डी (क्लास IV) नौकरियों का संबंध है; कोई लिखित परीक्षा आयोजित नहीं की जाती है, उम्मीदवार का चयन साक्षात्कार के आधार पर किया जाता है। 99 प्रतिशत लोग इस नौकरी को पा जाते हैं। "ग्रुप डी कार्यालय में जो एम.टी.एस. (मल्टी-टास्किंग स्टाफ) की है, मांग अधिक होती है। न कि श्रम साध्य फील्ड जाॅब्स की। जब तक कि कोई तकनीकी रूप से योग्य न हो और तकनीकी क्षेत्र में अपना भविष्य (कैरियर) बनाने का उत्सुक न हो। कुछ उम्मीदवार बहुत अच्छे और भविष्य को लेकर गंभीर होते हैं। वे समर्पण के साथ कड़ी मेहनत करते हैं। जैसे-जैसे रोजगार बाजार सिकुड़ रहा है, रेलवे में नौकरियां कीमती होती जा रही हैं।

 

डार्क पक्ष:

बेरोजगार बच्चों और लालची पत्नियों ने इसे एक लूट के रूप में देखना शुरू कर दिया। परिणाम विनाशकारी रहे। रेलवे में भर्ती होने वाली श्रमशक्ति की गुणवत्ता घटी, जबकि पारिवारिक झगड़े बढ़ गए। आप सबसे खराब, भयावह, घिनौने परिदृश्य की कल्पना करें और मेरा विश्वास करें, यह इस अनुकंपा आधार नियुक्ति के नाम पर हुआ है। पिता को मारना, पति को जहर देना जैसे अब कोई पाप ही नहीं रह गया है। एक मामला आया जहां एक मौत (पिता की) और तीन बेटों को नौकरी दे दी गई थी। कैसे? कोई भी अधिकारी उस कार्यालय में लंबे समय तक नहीं रहता था। नया अधिकारी आता, नया अधिकारी.. नई केस फाइल, नया बेटा दर्ज हो जाता। जब अनुकंपा नियुक्तियों की बात आती है, तो आश्चर्यजनक रूप से इसमें शामिल सभी लोग जरुरत से ज्यादा 'दयालु' हो उठते हैं, जैसे इसके सहारे वे स्वंय के लिये स्वर्ग में स्थान सुरक्षित कर लेना चाहते हैं।  यहां तक कि मौत का नाटक भी असामान्य नहीं रहा है। एक मामला ध्यान में आया; एक लड़का सिर मुंडा कर आता है और अपनी 'दुख भरी' कहानी सुनाता है कि कैसे उसके रेलकर्मी पिता पैतृक गांव गए और सांप के काटने के कारण वहां उनकी मृत्यु हो गई। अब चिकित्सा प्रमाण पत्र और ग्राम प्रधान की रिपोर्ट पर निर्भर रहने के अलावा ऑफिस क्या कर सकता है। ऐसी नियुक्ति के मामलों में आश्चर्यजनक रूप से, कागज पूरे होते/रिकॉर्ड एकदम क्लियर, एक-एक पेपर सावधानीपूर्वक रखा जाता। अब ऐसे संगठन/संस्थान हैं जो एकमुश्त अनुदान देते हैं और बस इतना ही। उनके पास ऐसी कोई योजना नहीं है जहां अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की आवश्यकता/प्रावधान हो।

 

भोले-भाले परिवार के गरीब अशिक्षित लोग प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ नहीं होते हैं, वे शुभचिंतकों की आड़ में भेड़ियों का शिकार हो जाते हैं। एक मामला देखा गया जहां गरीब अनपढ़ महिला के पास कुछ कागज थे, ये नकली प्रमाण पत्र और अंक पत्र थे। उसने अपनी लिखित परीक्षा में सौ में से शून्य हासिल किया था। मैंने उससे पूछा कि उसने अपनी मैट्रिक कहाँ से पास की ? वह कनफ्यूज सी ताकती रही। बाद में नम्रता से उसने जवाब दिया "ये कागजात तो मुझे बाबू जी ने बेचे थे"

 

एक अधेड़ उम्र का आदमी अपनी एडवोकेट की पोशाक में मेरे निवास पर आता है; उसे कार्यालय में मिलने के लिए कहा गया। जाते जाते उसने कहा, "अर्जेंट मिलना है हमारे परिवार में महिलाएं काम नहीं करती हैं, इसलिए इसके बजाय मृतक के छोटे भाई को नौकरी दे दी जाये। जब जांच की गई तो पता चला कि इस आदमी ने ऑफिस से पत्राचार के नाम पर अपनी विधवा पुत्र वधू से सादे कागजात पर हस्ताक्षर करा लिये थे। महिला ने मांग की कि यदि अनुकंपा आधार पर नियुक्ति का कोई प्रावधान है तो वह इसे लेना चाहेगी क्योंकि वह इंटरमीडिएट पास है। इस प्रकार, जो उसका हक़ था उसे मिला।

 

जहाँ पैसा (रिश्वत) चलता है, वहाँ भर्ती हुआ युवक जल्द ही छोटी- मोटी हेराफेरी और भ्रष्टाचार की तकनीकें सीखने में लग जाता है। नई उक्ति यह प्रतीत होती है: 'मुहब्बत, जंग और अनुकंपा  नियुक्ति में सब फेयर है' घृणित साजिशें और जानलेवा योजनाएं इतनी बार सामने आती हैं कि लगता है इस योजना को बंद कर देना बेहतर होगा। कल्पना कीजिए कि यह परिवार विशेष और समाज में कैसी कैसी कलह को ला रहा है। हम मुंह फेर कर अन्यत्र देखने का नाटक नहीं कर.सकते बोले तो जोखिम नहीं उठा सकते।

 

Humor: You are an Indian:

 

There is lot of debate going on as to what (document) will determine your citizenship.

Forget the paper work, the unflinching test would be:

You will be made to walk on a road and video graphed confidentially, you are an Indian if you:

1. Cross the road jay walking

2. Spit on the road

3. litter the road

4. talk loudly with fellow walkers or on phone

5. laugh no end.

6. Haggle with shopkeeper and insist for discount/free gift

7. Want two polythene bags fearing that single one will tear off

8. Eat making strange sound and fill up your tummy with freebies, if any.

9. Ogle at passers by

10. Over eat your breakfast so as to save expenses of lunch

11. Seeing a long queue, instead of standing in the queue you get bust how to break the queue so that your turn comes first

12. If someone speaks in English, you start speaking in English without knowing much, also if someone speaks in Hindi then you MUST speak in English.

आप एक भारतीय हैं:

 

इस बात पर बहुत बहस चल रही है कि कौन सा (दस्तावेज़) आपकी नागरिकता निर्धारित करेगा।

अब कागज को भूल जाओ, अडिग परीक्षण हाथ लगा है अब से वही होगा:

आपको सड़क पर छोड़ दिया जाएगा और गोपनीय रूप से वीडियोग्राफ किया जाएगा, आप निश्चय ही एक हार्ड कोर भारतीय हैं यदि आप:

1. सड़क पार करते वक़्त जेबरा क्राॅसिंग की बजाय कहीं से भी टेढ़े मेढ़े चल कर पार करें।

2. सड़क पर थूकें

3. सड़क पर कूड़ा फैलायें

4. साथ चल रहे साथियों से या फोन पर जोर-जोर से बात करें

5. हँसो तो हँसते ही रहो वो भी खूब जोर से।

6. शॉपकीपर के साथ सौदेबाजी करें और छूट/मुफ्त उपहार के लिए जोर दें

7. दो पॉलीथीन बैग की डिमांड करें इस डर से कि एक है तो जरुर फट जाएगा

8. अजब गजब आवाज़ निकालते हुए खाना खाओ और अपने गले तक खायें विशेषत: यदि कुछ नि:शुल्क हो।

9. राहगीरों खासकर महिलाओं को घूर घूर कर देखें।

10. अपना नाश्ता जरुरत से ज़्यादा खाओ ताकि दोपहर के भोजन के खर्च को बचाया जा सके।

11. यदि कहीं 'क्यू' लगी हो तो इस जुगाड़ में लग जाओ कि कैसे इसे तोड़ कर अपना नम्बर लगाया जाये

12. कोई अंग्रेजी बोले तो न आते हुए भी अंग्रेजी की टांग तोड़ें और कोई हिन्दी बोले तो उससे तो जरुर ही अंग्रेजी बोलें।