Ravi ki duniya

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Sunday, April 26, 2026

भारतीय रेल : साहित्य से सिनेमा तक

 

    

पहले पहल जब भारत में रेल चलना शुरू हुई तब क्या अधिकारी क्या सुपरवाइज़र सभी अंग्रेज़ ही होते थे। धीरे-धीरे रेल नेटवर्क के विस्तार के साथ इसमें एंग्लो इंडियंस और पारसियों को जगह मिलनी शुरू हुई। इसका एक बड़ा कारण था उनकी अँग्रेजी भाषा पर अपेक्षाकृत बेहतर पकड़ और उनका अँग्रेजी  रहन-सहन। लेकिन वे थे कर्मचारी स्तर पर ही। यथा टी.टी., गार्ड, ए.एस.एम. इंजन ड्राइवर आदि। प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड ने अपने एक चाचा का ज़िक्र किया है जो दिल्ली स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।

 

यदि आप साहित्य के फ़लक पर देखेंगे तो पाएंगे क्या गीतकार शेलेन्द्र क्या गुलशन बावरा क्या आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जिनके नाम से एक पूरा युग ही हिंदी साहित्य में दिवेदी युग कहलाता है. वे मध्य रेलवे, तब की जी.आई.पी. रेलवे में कार्यरत थे. अजमेर, बम्बई, नागपुर के अलावा वे झांसी डी.एस. ऑफिस ( डिस्ट्रिक्ट सुपरिटेंडेंट ) वर्तमान डी.आर.एम. ( डिवीजनल रेलवे मैनेजर) के कार्यालय में मुख्य लिपिक थे. सीनियर से अन-बन के कारण नौकरी छोड़ हिंदी की फुल टाइम  सेवा में जुट गये। 


दरअसल तब दो तीन ही विभाग थे जिसमें बम्पर नौकरियों की गुंजायश थी। एक मिलिटरी जिसमें जाने के नाम से ही परिवार में रोना-धोना शुरू हो जाता था दूसरे रेलवे और तीसरा डाक विभाग। 



कुछ प्रमुख लोग जो भारतीय फिल्मी दुनिया और साहित्य को रेलवे की देन है:


1. बीना राय (कृष्णा सरीन)  पिता पश्चिम रेलवे में स्टोर्स ऑफिसर (IRSS

2. शैलेंद्र माटुंगा रेलवे वर्क शॉप में मकेनिक (वैल्डर)      

3. ओम पुरी पिता जालंधर में रेलवे के स्टोर्स विभाग में  

4. डेविड पिता इंजन ड्राइवर  

5. गिरीश कार्नाड बड़े भाई मध्य रेलवे में चीफ इंजीनियर (IRSE)  

6. नूतन ससुर रेलवे में महाप्रबंधक/रेलवे स्टाफ कॉलेज के प्रथम प्रिंसिपल  

7. वी शांताराम जी आई पी (मध्य रेल) में टी एक्स आर स्टाफ               

8. ई. बिलीमोरिया          जी आई पी (मध्य रेलवे) में फायरमैन  

9. राज बब्बर              पिता टूंडला (उत्तर रेलवे) में टी एक्स आर स्टाफ  

10. गुलशन बावरा          पश्चिम रेलवे मुंबई  में गुड्स क्लर्क  

11. बासु चटर्जी             पिता रेलवे वर्कशॉप अजमेर में  

12. शेख मुख्तार            पिता रेलवे पुलिस में  

13. विमल मित्रा            ट्रेन कंट्रोलर दक्षिण पूर्व रेलवे में  

14. वीना                       पिता रेलवे में  

15. भप्पी सोनी             पूर्व टिकट कलेक्टर     

16. के पी सक्सेना          कहानीकार, संवाद/स्क्रिप्ट लेखक स्टेशन अधीक्षक  

17. शीला  (मलयालम)      पिता रेलवे में  

18. सी रामचंद               पिता मध्य रेलवे में स्टेशन मास्टर   

19. ऋषिकेश मुखर्जी       ससुर रेलवे में महाप्रन्धक (ए के मुखर्जी)   

20. मौसमी चटर्जी           पिता रेलवे में (कोलकाता)  

21. के एल सहगल           मुरादाबाद उत्तर रेलवे में टाइम कीपर   

22. रंगनाथ (तेलुगू)          चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी  टी.टी. विजयवाड़ा   

23. रघुनाथ रेड्डी (तेलुगू)     चरित्र अभिनेता पूर्व रेलकर्मी  

24. बालचन्द्र मेनन निर्देशक  पिता दक्षिण रेलवे में स्टेशन मास्टर  

25. खराज मुखर्जी (बंगला अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी  

26. नागेश (तमिल अभिनेता)     पूर्व रेलकर्मी  

27. वीनू चक्रवर्ती (अभिनेता) पूर्व रेलकर्मी  

28. अलेक्स (तमिल) गोल्डन रॉक वर्क शॉप के स्टोर्स विभाग में  

29. विजयन     निर्देशक (तमिल) गोल्डन रॉक वर्कशॉप  

 30. शिखा स्वरूप       पिता उत्तर रेलवे के स्टोर्स विभाग में  

31. जॉर्ज बेकर  असमिया/बंगलाअभिनेता उत्तर-सीमांत रेलवेपी.डब्लू.आई.  

32. सोहराब मोदी    (पिता जयपुर/रतलाम/अलवर) में रेलवे इंजन ड्राइवर  

33. नज़ीर हुसैन           पिता रेलवे लखनऊ में गार्ड  

34. राशिद खान          वडोदरा स्टेशन पर  

35. इंद्रजीत सिंह तुलसी (गीतकार) लॉ ऑफिसर पश्चिम रेलवे   

36. आदेश श्रीवास्तव         पिता जबलपुर में टी एक्स आर  

37. मिलिंद सोमन         पूर्व टिकट कलेक्टर  

38. पलाश सेन            पिता उत्तर रेलवे में डॉक्टर 

39. उत्तम मोहंती       (उडिया फिल्म) पिता खड़कपुर में गुड्स क्लर्क  

40. सुमा (तेलुगू)         पिता दक्षिण मध्य रेलवे में कार्यरत  

41. बुद्ध देब दासगुप्ता    (बंगला निर्देशक) पिता दक्षिण पूर्व रेलवे   

42. सुरोजीत चटर्जी     पूर्व अधिकारी दक्षिण पूर्व रेलवे   

43. मालविका तिवारी     पिता रेलवे अधिकारी  

44. आयशा धाड़कर    दादा रेलवे में अधिकारी ( IRAS)  

45. नागभूषण      (तेलुगू)  गुंटकल में पूर्व बुकिंग क्लर्क  

46. ज़रीना वहाब     पिता राजमुन्दरी में गार्ड  

47. महमूद जूनियर   पिता पश्चिम रेलवे में  

48. गजराज राव       पिता उत्तर रेलवे में  

49. लिलेट दूबे               पिता गोविंद केसवानी रेलवे में इंजीनियर  

50. डॉ जब्बार पटेल        निर्देशक  पिता दौंड में चीफ यार्ड मास्टर  

51. शांता आप्टे           पिता मध्य रेलवे के सोलापूर में स्टेशन मास्टर  

52. राजीव मेनन          फिल्म निर्माता भाई करुणाकर मेनन (IRAS)  .

53. रलल्पलली नरसिम्हा राव   दक्षिण मध्य रेलवे के स्टेटिक्स विभाग में  

54.  ऐरिका लाल  वक़्त फिल्म पर्दे पर ‘आगे भी जाने न तू’ पिता रेलवे में मकेनिकल ऑफिसर  

55. प्रेम ऋषि         अभिनेता ड्राइंग ऑफिस पश्चिम रेलवे मुंबई  


इसके अलावा क्या भगवती चरण वर्मा, क्या मुंशी प्रेम चंद क्या के पी सक्सेना इन लोगों ने भी भारतीय फिल्मों से किसी न किसी रूप जुड़ाव रखा है। के पी सक्सेना तो रेलवे से ही थे। जबकि मुंशी प्रेम चंद और भगवती चरण वर्मा की पुस्तकों पर फिल्म बनी। पंडित चंद्र धर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पर भी फिल्म बनी। 


हिन्दी फिल्मों मे यह आम दृश्य होता था जिसमें रेल किसी न किसी रूप मे अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराती रही है। या तो हीरो खुद या कोई न कोई रेलवे मे कार्यरत  दिखाया जाता था। नायक ट्रेन मे चढ़ रहा है या उतर रहा है या फिर हीरोइन साथ में ही यात्रा कर रही होती थी। 


न जाने कितने ही गीत रेल मे, रेल के ऊपर, रेल के इंजन मे फिल्माए गए। किसी दुखियारे या दुखियारी को ख़ुदकुशी करनी हो तो रेल, विलेन की मनपसंद जगह रेल की पटरी होती थी जहां वह किसी न किसी को पटरी से बांध देता था।  


कितनी ही फिल्मों के टाइटल तक रेलवे के इर्द गिर्द घूमते हैं मसलन फ़्रंटियर मेल, पंजाब मेल, तूफान मेल। रेलवे प्लेटफॉर्म, बनिंग ट्रेन, चेन्नई एक्स्प्रेस, एक चालीस की लास्ट लोकल, दि ट्रेन, भवानी जंक्शन, रेल का डिब्बा, हाफ टिकट, लास्ट ट्रेन फ्राम बॉम्बे, डिकेन क्वीन, बॉम्बे मेल।  

असल में भारतीय रेलवे आम जन-जीवन से इतनी जुड़ी हुई है कि यह किसी न किसी रूप में आपके जीवन में स्थान रखती है। आप किसी से बात करें संभावना यह होती है कि उसके परिवार या एक्स्टेंडिड परिवार से कोई न कोई रेलवे में जरूर होता था, पापा, चाचा, ताऊ, मामा, भतीजा। यह तो साहित्य और फिल्मों की बात है अन्यथा खेल की दुनिया हो या जीवन के अन्य क्षेत्र उदाहरण के तौर पर पी टी ऊषा, विश्वनाथन आनंद, पी वी सिंधु, महेंद्र सिंह धोनी हो, लाला अमरनाथ या फिर डायना एडुलजी, गुरबक्स सिंह, पूरन सिंह या फिर मेकलुस्कीगंज को बसाने का श्रेय रखने वाले मेकलुस्की के पिता। एक वक़्त था जब अपनी अपनी किस्मत आज़माने रेल से ही मुंबई उतरते रह हैं। सालों साल लोकल ट्रेन में सफर करते हैं कई बार तो बेटिकट भी।

व्यंग्य: स्टेशन मास्टर और केंटीन का उदघाटन


  

           पूरे राज्य में ये खबर केंटीन के चूल्हे की आग की तरह फैल गयी है कि किसी स्टेशन मास्टर ने ये हिमाकत, बोले तो ये दुस्साहस किया है कि अपने स्टेशन की केंटीन का उदघाटन खुद ही कर डाला। लोग-बाग अब उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जगह-जगह, नुक्कड़ नुक्कड़, चैनल-चैनल यही ब्रेकिंग न्यूज़ गरम है कि इस स्टेशन मास्टर को ये सूझी तो सूझी क्या। ये क्या बात हुई ? अब ऐसी भी क्या मजबूरी आन पड़ी कि मास्साब ने खुद ही केंटीन का फीता काट डाला। यह तो सरासर बेईमानी है। नाइंसाफी है। अब ये ऐरे गैरे मास्टर फीता काटने लगेंगे तो हाकिम बेचारा क्या करेगा? जिस तरह हुकम हाकिम का उसी तरह यह विशेषाधिकार भी हाकिम का है कि वह जी चाहे जिसको काटे। जहां चाहे जिसका फीता काटे, उदघाटन करे। वह केवल उसी सूरत में किसी और को उदघाटन की इजाजत देता है जब उसका नामकरण उसी के नाम से हो। क्या इन मास्टर साब को पता नहीं की हर गाँव-खेड़ा में सभी जगहों का उदघाटन हाकिम ने करना होता है। ये खेकड़ा स्टेशन क्या भारत से अलग है? बसंत कुमार को साफ-साफ शब्दों में बता दिया जाये वह बस नाम का बसंत है। काम का बसंत हर मौसम में हाकिम होता है। 

  

 

इतने सालों में इस स्टेशन मास्टर को ये भी नहीं पता चला कि स्टेशन पर क्या करना होता है क्या नहीं। माना कि ट्रेन को हरी झंडी उसी ने दिखानी है और सारी उम्र दिखानी है। फिर क्यों वह नामाकूल, नाकारा, नालायक एक दिन की ये विजुअल खुशी हाकिम से छीन लेना चाहता है। हो न हो ये किसी दुश्मन राज्य का जासूस तो नहीं जिसने हमारे राज्य में अराजकता फैलाने का ये तरीका निकाला हो। मगर हाकिम उसके इन मंसूबों को कामयाब नहीं होने देगा। उसके सभी पतों पर लोग पूछताछ को भेज दिये गए हैं वे सब दल-बल के साथ पहुँचते ही होंगे और उसकी अगली-पिछली सात पीढ़ियों का हिसाब निकाल कर ले आएंगे। आज तक का रिकॉर्ड है कि हाकिम की टीम कभी खाली हाथ नहीं लौटी।

 

बच्चू ! स्टेशन मास्टर जब दो-चार बरस कारावास में रहेगा तो सारी मास्टरी भूल जाएगा। अब से कारावास ही उसका स्टेशन होगा। इस मास्टर ने डाकिये से भी कुछ न सीखा। भई कैसा मास्टर है? अब देखो ठेके की नौकरियों के रुक्के भी हाकिम खुद दे रहा है। किसी डाकिये ने आवाज़ उठाई। हरगिज़ नहीं। वे समझदार हैं। उन्हें पता है पहले ही ये कूरियर वाले , ई मेल और वाट्स अप से उनकी नौकरी पर बन आई है। चुपचाप अपने दिन काटिए। चूँ चाँ की तो आपको बैरंग घर भेज दिया जाएगा। और पूरा डिपार्ट ही बंद कर दिया जाएगा फिर डाकिया-डाकिया आपस में ही खेलते रहना। अरे हाकिम आखिर हाकिम होता है वह चाहे तो नेज़ा फेंकने वाले से उसका नेज़ा ले कर नीलाम कर दे। यह उस नेजेवाले की खुशकिस्मती है। उसे तो उलटा खुश होना चाहिए और हाकिम का सौ सौ बार शुक्राना अदा करना चाहिए। अब अगर वो नेजे वाला अपना नेज़ा देने में आना-कानी करता तो क्या वह दुबारा नेज़ा फेंकने लायक रह जाता। वह जानता है बांह सलामत रहे नेजे हज़ार। महज़ हुकम हाकिम का नहीं होता, हुकूमत हाकिम कि नहीं होती... कायनात हाकिम की होती है। 

 

व्यंग्य: रेल-भोजन और सूजे होंठ

 

 

लो, जी कॉकरोच से शुरू करके, चूहे, साँप, बिच्छू  के बाद अब पेश है। 'वन मील एंड टू ब्यूटीफुल लिप्स' योजना। एक भद्र महिला ने सफर करते हुए पाया कि ट्रेन का भोजन करने के बाद उसके होंठ सूज गए हैं। उसने डॉ. से उपचार लिया और डॉ. की पर्ची तथा अपने सूजे होंठ के फोटू सोशल मीडिया में डाल दिये। यह देख आई.आर. टी.सी. वाले आग-बबूला हो सूज गए। उन्होने तुरंत डिस्क्लेमर जारी किया कि यह हमारे भोजन का असर नहीं है। कारण कि यदि होंठ हमारे भोजन से सूजने होते तो केवल एक ही यात्री के क्यूँ सूजते, बाकी यात्रियों के क्यूँ नहीं, दूसरे भद्र महिला ने शिकायत की थी कि ट्रेन का यह भोजन करने के बाद उसके बच्चे को दस्त लग गए। इसका प्रतिकार भी ऑथरिटी ने यह कह कर किया है कि और तो किसी बच्चे को दस्त नहीं लगे। लगे भी हों तो हमारे पास ऐसी कोई कम्पलेंट नहीं।

 

अब बेचारी भद्र महिला बहुत परेशान है। जाये तो जाये कहाँ? शिकायत करे तो किस से करे। उसके सूजे होंठों के फोटो सोशल मीडिया में चल रहे हैं। इन दिनों अगर आप ब्यूटी पार्लर जाएँ तो वहाँ 'लैन' लगी है ऐसी भद्र महिलाओं की जो अपने होंठो को सुजाना चाहती हैं। उसे ब्यूटी पार्लर की डिक्शनरी मे 'बी स्टिंग लिप्स' कहते हैं बोले तो ऐसे होंठ जैसे मधुमक्खी ने डंक मार दिया हो। कहते हैं ऐसे होंठ आजकल खूब प्रचलन (डिमांड) में हैं और नवीन ब्यूटी स्पॉट माने जा रहे हैं।

 

अब इतना सब जानते बूझते हुए इस महिला को शिकायत नहीं करनी थी। उसका ये ब्यूटी ट्रीटमेंट तो बैठे-बिठाए एक भोजन करने मात्र से हो गया। उसे उल्टा धन्यवाद देना चाहिए और फाइव स्टार रेटिंग देनी थी। फीडबेक फाॅर्म से अफसरों को पता लगेगा कि भोजन में क्या डाला जाये कि महिलाओं को यह ‘सर्विस’ ‘पार्लर ऑन व्हील’ मुहैया कराई जाये। शोध का विषय हो सकता है। अभी तक भोजन के 'केसरोल' पर वैज तथा नॉन वैज लिखा होता था अब एस.एल. ( स्वाॅलन लिप्स) अथवा नॉन एस.एल. लिखा भी आया करेगा। आखिर सभी को तो सूजे होंठ नहीं चाहिए होंगे। बहुत से दक़ियानूसी लोग अब भी 'बस पंखुड़ी गुलाब की सी है'  के झमेले में ही पड़े हैं। मेरा अनुरोध है कि आई.आर.टी. सी. कदापि न घबराये। दुनिया में बड़ी बड़ी खोजें इसी तरह हुईं हैं। ज्यादा हो तो इस वाली थाली का नाम इस भद्र महिला के नाम पर रखा जा सकता है। आखिर आपका प्रयोग सफल रहा है। मुंबई में एक 'संजू बाबा चिकन' चला था पता चला कि अभिनेता संजय दत्त ने देर रात चिकन चाहा तो रेस्टोरेन्ट वाले ने कुछ अल्ल-मल्ल मिला के ये चिकन बना दिया था। तभी से इस अल्ल-मल्ल वाली चिकन डिश का नाम संजू बाबा चिकन पड़ गया। भई ! हमारे देश में साधना कट बाल, मुमताज साड़ी, माधुरी दीक्षित धक-धक ड्रेस, अनारकली ड्रेस और राजेश खन्ना कट कुर्ता चला ही है। आप देखना लाइन लग जानी है महिला यात्रियों की। जो इस होंठ सुजाऊ भोजन के सेवन के लिए ही आपकी ट्रेन में यात्रा करेंगी। आपको अलग से कोच लगाने पड़ेंगे। मेन्यू में कुछ और परिवर्तन कर आप लिख सकते हैं 'एंजिलिना जोली' भोजन, इसी तरह से कुछ देसी अभिनेत्रियों को भी 'रोप-इन' कर लें उनके एड आने लगें। मेरे जैसे होंठ पाने के लिए यात्रा करें और भोजन करें फलां ट्रेन में। फिर देखना कैसे ट्रेन 'फूल' जानी हैं। होंठ तो होंठ ट्रेन भी फूल (सूज) जानी हैं।

 

व्यंग्य: चलता फिरता केसर

 


 

मेरे भारत महान की महान ट्रेन में यात्रा करते हुए एक यात्री के भोजन के साथ दी गयी दही में कुछ तैरता हुआ प्रतीत हुआ। उसने गौर से देखा तो वे कुछ कीड़े थे। ऐसा समझिए एक प्रकार से नॉन-वेज दही थी। यात्री पता नहीं वेजेटेरियन था अथवा नॉन वेजेटेरियन। बहरहाल नॉन वेजेटेरियन भी रहा होगा तो भी उसे ये तैरते हुए कीड़े पसंद नहीं आए। उसने केटरिंग स्टाफ को बुलाया और उनसे इस कीड़ों युक्त दही की शिकायत की। केटरिंग स्टाफ सत्य को पा चुके होते हैं। वे सत्य की खोज में नहीं निकले हैं। उन्होने तुरंत यात्री की इस निर्मूल आशंका का समाधान किया और समवेत स्वर में घोषणा की कि ये कीड़े नहीं केसर है। अब बारी यात्री के चकराने की थी।

 

यात्री को सभवतः बताया गया कि उसने अभी तक पिछड़ी हुई, थकी हुई गाय-भैंस के दूध की दही खाई है यह नए भारत की नयी दही है। बहुत नायाब दही है। बोले तो जेनेटिकली माॅडीफाइड और जिसे वह कीड़े समझ रहा है ‘रे मूरख ! वे कीड़े नहीं, नयी प्रजाति की केसर है। बोले तो चलती-फिरती केसर। अंग्रेजी में मोबाइल केसर। भारतीय रेलवे अपने यात्रियों के लिए कितने कष्ट सहती है और उनके लिए एक से एक ‘डेलीकेसी’ लाती है। इसी क्रम में यह चाइना वाली केसर है ये ऐसे ही कीड़े के माफिक लगती है। कोई भी देखे तो ये ही समझे की कीड़े दही में चढ़ उतर रहे हैं। अठखेलियाँ कर रहे हैं।

 

 

यात्री का माथा एक बार को तो ठनका। फिर उसने अन्य यात्रियों को भी दिखाया तो अन्य यात्रियों ने भी तस्दीक की कि यह केसर नहीं कीड़े हैं। ‘क’ से केसर ‘क’ से कीड़े। कहाँ अंतर है ? केटरिंग स्टाफ मानने को तैयार नहीं था। फिर उन्होंने बौद्ध धर्म का मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहा कि आप को ये केसर युक्त दही पसंद नहीं है तो आप मत लीजिये और उन्होने पूरी गंभीरता से इस बात पर ज़ोर दिया कि आप दही के कप पर एक्स्पायरी डेट देख लीजिये अभी एक्सपायर नहीं हुई है। अत: हमारी ओर से यह सर्वथा सेवन योग्य है। इनकी तरफ से ‘केस क्लोज़’। उन्होने यह धमकी भी दे डाली कि इसका विडियो फैलाया या मंत्री जी के पोर्टल पर शिकायत की तो उनसे बुरा कोई न होगा ये कीड़े भी नहीं और वे इस यात्री को मारते मारते कीड़ा बना देंगे। क्या कीड़ा, क्या केसर सभी तो उस कृपालु की क्रिएशन है। समदर्शी बनिए। इस चराचर जगत में क्या जड़, क्या चेतन सभी तो राम की माया है। राम जी का गुड़, राम जी की चींटी। राम जी की कर्ड, राम जी के कीड़े, राम जी की केसर।

 

स्किट: स्वयंवर डॉली का


 

 (प्रस्तुत है सन् 2026 के एक स्वयंवर का दृश्य। स्थान है एक सांभ्रांत सोसायटी, हरे-हरे जंगलों की हरियाली के बीच आपको तो पता है सावन के अंधे को सब हरा हरा ही दिखता है। सभी पात्र, अपात्र, कुपात्र व्यक्ति अपने आपको योग्यतम/उपर्युक्त लाइफ पार्टनर बता रहे हैं। कुछ तो कह रहे हैं कि लाइफ पार्टनर ना सही लिव-इन-पार्टनर ही बना लो।ये जान तो वैसे भी जानी है हम एन.सी.आर. के जाँबाज हैं । प्रदूषण से मरना है या डॉली के प्यार रूपी आभूषण से ? लाइफ आपकी .... चाॅइस आपकी)

 

[ दृश्य: नायिका आधुनिक वस्त्रों में पर्स हिलाती-डुलाती चहलकदमी कर रही है। ग्रीनवुड का नायक नंबर वन का प्रवेश

 

नायक: (टाई पहने/ लैपटॉप का बैग उठाए)  हाय ! हम शायद पहले मिले हैं ? आप जानी-पहचानी लगती हैं ? मैं ग्रीनवुड में रहता हूँ। मैं कॉर्पोरेट जगत का हैड हौंचो हूं। मैं अनममैरिड हूँ क्या आप मुझे अपना लाइफ पार्टनर बनाएँगी?

 

नायिका:   कुछ अपने बारे में बताइये ? आपने तो सीधे डंडा सा मार दिया!

 

नायक1:   जी हमें कॉर्पोरेट वर्ल्ड में टाइम मैनेजमेंट सिखाया जाता है। बायोमेट्रिक के चलते अब तो एक एक मिनट कीमती है। देखो मैं तुम्हें वर्ल्ड टूर पर साल में दो-तीन बार ले जाया करूंगा। मैंने बहुत से फ्रीकुएंट ट्रेवलर पॉइंट जोड़ लिए हैं। खूब शॉपिंग कराऊंगा। यहाँ तक कि मेरी कंपनी के प्रोडक्ट भी तुम्हें मेक्सिमम डिस्काउंट पर दिलाया करूंगा। वीकेंड पर हम दिल्ली जाकर भी घूम सकते हैं। तुम चाहो तो महीने में दो किटी पार्टी करो, चार किटी पार्टी करो, नो प्राॅब्लम! सोच लो!! आज की तारीख में कॉर्पोरेट वालों की बहुत डिमांड है। आधी ज़िंदगी तो वो टूर या मीटिंगों  में ही बिज़ी रहते हैं अतः तुमको क्या बोलते हैं उसे ‘माई स्पेस’ ‘माई प्राइवेसी’ भी मिल जाया करेगी। प्लीज़ मैरी मी। [ एक्ज़िट ]

 

नायक नंबर 2 का प्रवेश: (कैप लगाए, हाथ में बैटन) जयहिंद ! (सेल्यूट मारता है) मैं फौजी हूँ कोई ऐरा-गैरा सिविलियन नहीं। हमेशा अनुशासन में रहता हूँ। एकदम सफाई पसंद। मुझ से शादी करोगी तो सोचो कितना आराम ही आराम होगा। बैटमैन क्या पूरी बटालियन तुम्हारा हुक्म माना करेगी। हर हफ्ते बड़ा खाना हुआ करेगा। तुम्हें चौका-चूल्हा नहीं करना पड़ेगा। हर चीज़ सस्ती मिलेगी। बस तुम्हें हुक्म करने की देर है। समझ रही हो ना मैं केंटीन की सुविधा की बात कर रहा हूँ।  बस तुम मेरी सी.ओ. बन जाओ ? (फिर सेल्यूट एक्ज़िट)

 

नायक नंबर 3: का प्रवेश हाथ में डंडा घुमाते हुए देसी अंदाज़ में : मैडम जी विद ड्यू रिस्पेक्ट आई बैग टू से... आई केम टू नो यू वांट टू मैरी। अपनी पूरे इलाके में धाक है जी। जूरीस्डिक्शन की आप फिकर नाॅट। ये सारे माॅल, रेस्टोरेन्ट जहां आप नज़र डालोगे वो आपकी नज़र होगा जी। आप तो यूं सोचो कि आप ही आई.जी., कमिश्नर, सब हो। क्या आदमी, क्या 'लेडिस' सब पर आपका रौब चलेगा, चलेगा क्या दौड़ेगा जी दौड़ेगा। आप जिसे कहोगे उसे उठवा लिया जाएगा वो भी शुक्रवार की शाम को 48 घंटे उसकी ऐसी खातरदारी करेंगे ऐसी खातरदारी करेंगे कि वो आगे से बस कीर्तन सत्संग करता ही दिखेगा। तुम एक बार अपना हाथ मेरे हाथ में देके तो देखो। हाँ आपका वेट गारंटी बढ़ जाना है जी वो आप जानो। अच्छा चलता हूँ। एफ.वाई. आर. भिजवा देना। नहीं समझे? फर्स्ट यस रिपोर्ट।  बरामदगी तो हम करा ही लेंगे (एक्ज़िट)

 

नायक 4: (सूट टाई कैप पाइप में प्रवेश)      आप सब छोड़ो मादाम प्लीज़ मैरी मी। अपने बैचमेट हर स्टेट, हर शहर में हैं वो सब आपकी सेवा में रहेंगे। घोडा-गाड़ी की कभी कमी नहीं रहेगी। जो जरा भी चूँ करेगा उसको वहीं कायदे से समझा दिया जाएगा। ऐसा उलझायेंगे, ऐसे उलझाएंगे कि ज़िंदगी भर सुलझ नहीं पाएगा। बड़ी बड़ी पार्टियों में आप चीफ गेस्ट बनने की अभी से प्रेक्टिस कर लो जी। बूके की लाइने लग जानी हैं। गिफ्ट्स की तो बरसात होने लगेगी। आप तो यूं सोचो कि बिना इम्तिहान दिये आपने तो खुद आई.ए.एस. बन जाना है। आई.ए.एस. बनने का सबसे आसान तरीका-- मैरी एन आई.ए.एस.

सबमिटिड फॉर एप्रूवल प्लीज़ (एक्ज़िट)

 

नायिका:    वाट दि हैल ! आई डोंट वांट टू मैरी। सॉरी !!! !!!

 

व्यंग्य: खाड़ी युद्ध और हम !


 

      हमारा देश युद्ध का नहीं बुद्ध का देश है। हम शान्तिप्रिय लोग हैं। हमारा इतिहास गवाह है, हमने कभी किसी देश पर अपनी तरफ से युद्ध नहीं छेड़ा। हम तो वसुधैव कुटुंबकम मानने वाले और इस विचार धारा के पोषक हैं। हमने पाकिस्तान-ईस्ट पाकिस्तान में सन् 1971 में युद्ध को समाप्त  कराया ही था। अभी फिलहाल के दिनों में हमने रूस और यूक्रेन का युद्ध रुकवाया ही था। आपने  सुना नहीं था? जब वो बेचारी लड़की रुआंसी होकर अपने माता-पिता को बता रही थी कि पापा मैं न कहती थी, मोदी जी ने वॉर रुकवा दी। इस तरह वहाँ पढ़ रहे बच्चे सुरक्षित भारत वापसी कर सके थे। आप सब ने देखा होगा जब वे विमान से उतरते वक़्त नारे लगा रहे थे और उनकी अगवानी मंत्री लोग कर रहे थे। यह इसीलिए मुमकिन हुआ कि हम विश्वगुरु हैं। ये नया भारत है। माइंड इट।


अब जब खाड़ी देश में मध्यस्थता की बात आई तो सभी देश भारत की ओर देख रहे थे कि भारत अपने विश्वगुरु के दायित्व को निभायेगा। किन्तु ये क्या भारत ने एक 'नरचरेंट पेरेंट' की भूमिका निभाते हुए कहा कि नहीं हम मध्यस्थता नहीं करेंगे। अब यह मौका किसी और देश को दिया जाये। नहीं तो बाकी देशों का विकास कैसे होगा? हमने इनसिस्ट किया कि हमारे 'इमीजिएट नेबर' पाकिस्तान को यह रोल दिया जाये। आखिर ऐसे ही तो बाकी देश विश्व के मामलों मे रुचि लेंगे और अपनी जिम्मेवारी समझेंगे। अतः हमने यह फैसला लिया है कि हमारा पड़ोसी देश, हमारा छोटा भाई ये रोल अदा करे। हमारे 'नेबर' मजबूत बनें यही हमारा ऑब्जेक्टिव है।

 

                     हमारे पास इतना टाइम नहीं है कि हम इस-उस के फटे में टांग अड़ाते फिरें। हमारे अपने  बहुत काम हैं। सूबों में चुनाव सिर पर हैं। 'वी आर बिज़ी पीपुल'। एक बार हमने डिसाइड कर लिया कि खाड़ी के देश आपस में सुलट लें। पाकिस्तान को अब तलक हमने पर्याप्त रूप से ट्रेनिंग दे दी है। अब वक़्त आ गया है कि वह इंडिपेंडेंट रूप से विश्व क्षितिज पर आए। सभी पड़ोसियों को मजबूत बनाना भी हमारा ही फर्ज़ है। 'क्षमा बड़न को चाहिए'। हम चाहते थे कि पाकिस्तान ये काम करे। हम यूं बांग्लादेश का नाम, या श्री लंका का नाम दे सकते थे मगर दोनों देश में अभी नयी-नयी सरकार बनी हैं। उन्हें अपने  काम करने दीजिये। 'नेबर फर्स्ट' हमारी नीति है। उसी के फलस्वरूप हमने विश्व बिरादरी को कह दिया कि हमें इस बार 'बाॅदर' न करें बल्कि पाकिस्तान को ये काम दो। नहीं तो वो कब सीखेगा? अब हम ठहरे विश्वगुरु हमारी बात कोई टाल सके ऐसा मुमकिन ही नहीं। अतः उन्होने हमारे कहे अनुसार ही ये काम पाकिस्तान को दिया है। और तो और हमें इस का कोई क्रेडिट भी नहीं चाहिए। ये तो बात आई तो ज़िक्र कर दिया। नहीं तो हम अपने मुंह मियां मिट्ठू नहीं बनते। न कोई नारेबाजी, न कोई एडवरटाइज़मेंट ना कोई फोटोग्राफ। भैया ! आप मुंशी प्रेमचन्द की 'बड़े भाई साब' पढ़े हैं कि नहीं? बस हम वही बड़े भाई साब हैं।

 

 

व्यंग्य: सड़क पर गड्डों का महत्व

 

                   पहले सड़कों पर गड्डे न थे। दरअसल पहले सड़कें ही न थीं। तब मार्ग सुलभ नहीं हुआ करते थे। इससे आदमी खूब हिचकोले खाता आगे बढ़ता था अथवा पैदल चल-चल कर भाग-दौड़ करके हलकान हुआ करता था। तब आदमी मजबूत हुआ करते थे। वे चपल, फुर्तीले हुआ करते थे। आजकल की तरह नहीं कि जरा दचका लगा और 'स्लिप डिस्क' हो गई। किसी डॉ. के आजीवन गाहक। डॉ. तो तैयार ही बैठे हैं आपको अपने क्लीनिक का 'लाइफ मेम्बर' बनाने को।

  

                     फिर जब सड़कें बनने लगीं तो जाहिर है उनमें गड्डे भी होने थे। कभी ठेकेदार की वजह से कभी इंजीनियर की वजह से और कभी दोनों के संयुक्त प्रेम के सौजन्य से। सड़क पर गड्डे हों तो रोजी-रोटी अच्छी चल जाती है, क्या म्युनिसिपलिटी के अफसर, क्या डॉ. क्या इंजीनियर क्या ठेकेदार। ये सड़क आपको 'पाॅवर' तक नहीं ले जाती बल्कि ये तो सड़क के गड्डे हैं जो आपकी पहचान के क्षितिज को विस्तार देते हैं। उसे गड्डों से निकाल कर उन्नत शिखर तक पहुंचाते हैं।

 

               सड़क पर गड्डे हों तो आप चौकन्ने रहते हैं। आप को गड्डों से बच कर चलना आ जाता है। सड़कों के ये गड्डे आपको 'लाइफ-कोच' की तरह जीवन जीने के गुर सिखाते हैं। कैसे परेशानियों से जूझा जाये, कैसे उनसे बचा जाये। मुसीबतों से कैसे बाहर आया जाये। वो शेर है ना:

 

                   "...आसानियां हों तो ज़िंदगी दुश्वार हो जाये

 

                  जहां सड़कों पर गड्डे न हों तो वहाँ के बाशिंदे बड़े नाज़ुक मिज़ाज, कमजोर होते हैं और उसी रंग में आने वाली पीढ़ी को रंग लेते हैं। जबकि ज़िंदगी न केवल फेयर नहीं है।  वह आसान भी नहीं है। आपको बार-बार गिर कर उठना है। ऐसे नहीं कि एक बार गिरे तो गड्डे के ही होकर रह गए।

 

                      इसी श्रंखला में जब खबर आई कि एक अस्पताल में मरीज के कोमा में जाने के बाद उसके परिजनों ने मरीज को घर ले जाकर क्रियाकर्म करना ही ठीक समझा। कारण - कहते हैं न ज़िंदा हाथी एक लाख का तो मरा हाथी सवा लाख का। अस्पताल वाले कोमा वाले मरीज का भो रोज़ का इतना बिल बना देते हैं कि परिवार बिना अस्पताल के ही कोमा में जाने को होता है। जब वे खटारा एंबुलेंस में दादी को क्रियाकर्म को ले जा रहे थे तो किसी सड़क के गड्डे पर एंबुलेंस इतनी ज़ोर से उछली कि दादी कोमा से बाहर आ गई। दादी को होश आ गया। परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। जिसने भी खबर सुनी वह जहां था वही बिना गाड़ी उछल गया। अब परिवार ने तय किया है कि वे आज से गड्डों को सम्मान से देखा करेंगे। गड्डों को देखने की उनकी दृष्टि ही बदल गयी। वे ठेकेदार को ढूंढ रहे हैं ताकि उसका धन्यवाद दे सकें और सार्वजनिक अभिनंदन कर सकें।

 

                  इस सबके देखते अस्पताल वाले अलग इस रिसर्च में लगे हैं कि कैसे इन मरीजों को अपने शहर की सड़कों से गुजारा जाये ताकि उन्हें भी कोमा से बाहर निकाला जा सके। दूसरे कुछ अस्पताल अपने प्रांगण में ऐसा ट्रैक बनाने की सोच रहे है जिसमें छोटे-बड़े, गड्डे ही गड्डे हों। गोल्फ की तरह मरीज़ से उसी अनुसार फीस ली जाया करेगी। आप अपने मरीज को 'नाइन होल' वाली सड़क से ले जाना चाहते हैं या ‘18 होल' वाली सड़क से ?