Ravi ki duniya

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Thursday, June 11, 2026

दि हिस्ट्री ऑफ एंग्लो-इंडियन्स

 

                                      


दि हिस्ट्री ऑफ एंग्लो-इंडियन्स एक ग्राफिक उपन्यास है। यह मूलतः एक ऐतिहासिक पुस्तक है। मैंने हाल ही में इसे पढ़ा। इस पुस्तक को कीथ बटलर और हैरी मैक्ल्युर, दोनों एंग्लो-इंडियन लेखकों ने लिखा और चित्रित किया है। यह पुस्तक इतनी दिलचस्प है कि इसे शुरू करने के बाद बिना पूरी पढ़े आप इसे छोड़ नहीं सकते। यह पुस्तक अपनी कॉमिक्स-टाइप स्टोरीलाइन के कारण आपकी आँखों और मस्तिष्क, दोनों पर सहज प्रभाव डालती है।



इस पुस्तक ने मेरे अनेक ‘डाउट’ साफ करने में मदद की है। मैं अपनी अज्ञानता में सोचता था कि एंग्लो-इंडियन वे व्यक्ति होते हैं, जिनके माता-पिता, दादा या परदादा में से कोई एक ब्रिटिश रहा हो, लेकिन यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि उनके पूर्वज पुर्तगाली, फ्रांसीसी या डच भी हो सकते हैं। वे भी एंग्लो-इंडियन ही कहलाते हैं।
यह पुस्तक न केवल एंग्लो-इंडियनों के इतिहास और भूगोल का विवरण देती है, बल्कि उनके समाजशास्त्र और नृविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) का भी विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करती है। मुझे यकीन है कि यह पुस्तक स्वयं एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए भी अनेक दृष्टियों से शिक्षाप्रद सिद्ध होगी, विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए, जिसे अपने इतिहास, विरासत और आनुवंशिकता को जानने का एक सरल माध्यम प्राप्त होगा।
मैं लेखक-द्वय के कार्य से प्रभावित हूँ। हैरी मैक्ल्युर एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सम्मानित सेलिब्रिटी हैं। भारत में पारसियों के इतिहास तथा अन्य जातीय समूहों और अल्पसंख्यक समुदायों पर बहुत-सी पुस्तकें उपलब्ध हैं, लेकिन एंग्लो-इंडियनों पर प्रामाणिक सामग्री का अभाव है। विकास कुमार झा द्वारा लिखित मैक्लुस्कीगंज पर मैंने एक पुस्तक पढ़ी थी, जो हिन्दी में है। वह अब ‘भूतिया शहर’ मैक्लुस्कीगंज का एक प्रामाणिक विवरण मानी जाती है।


भारत के निर्माण में एंग्लो-इंडियनों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। आप किसी भी ऐसे क्षेत्र का नाम नहीं ले सकते, जिसमें कोई न कोई एंग्लो-इंडियन चमकदार सितारे की तरह न चमका हो। चाहे वह भारतीय फिल्मों का क्षेत्र हो, राजनीति, शिक्षा, साहित्य या संगीत का। भारतीय रेलवे रोजगार के लिए उनकी पहली पसंद हुआ करती थी। रेलवे के पुराने कर्मचारियों के बीच एंग्लो-इंडियनों के अनेक किस्से मशहूर रहे हैं। उन्हें अपने काम, अपने रोजगार और अपनी जीवनशैली पर गर्व होता था। उनकी वफादारी और जीवनशैली दूसरों के लिए ईर्ष्या का विषय होती थी। 1947 तक आते-आते उनमें से अनेक परिवार ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड चले गए।
मैं सत्तर वर्ष का हूँ और दिल्ली में रहता हूँ। मैंने भारतीय संसद में फ्रैंक एंथनी को थ्री-पीस सूट और उनकी पसंदीदा टाई में भाषण देते देखा है। मैं दिल्ली के फ्रैंक एंथनी पब्लिक स्कूल भी एक-दो बार गया हूँ। मैंने अपनी बेटियों के लिए इस स्कूल में प्रवेश दिलाने का असफल प्रयास किया था। स्कूल की लॉबी में फ्रैंक एंथनी एस्क्वायर का एक आदमकद तैलचित्र शोभा बढ़ाता है।


प्रथम दृष्टया यह पुस्तक 1150 रुपये की महंगी प्रतीत हो सकती है, लेकिन उत्कृष्ट गुणवत्ता वाला चमकदार कागज और सुंदर चित्र, जिनमें बारीक विवरण दिए गए हैं, इसकी कीमत को उचित ठहराते हैं। प्रकाशक एंग्लो-इंक बुक्स, चेन्नई, ऐसी कलात्मक और ऐतिहासिक महत्व की उत्कृष्ट कृति को प्रकाशित करने के लिए सराहना के पात्र हैं। कीथ बटलर और हैरी मैक्ल्युर ने संयुक्त रूप से इतिहास और विरासत प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज रचा है। अब यह सभी पुस्तक प्रेमियों तथा इतिहास और विरासत के संरक्षकों का कर्तव्य है कि वे इसे भावी पीढ़ियों के लिए संजोकर रखें।

व्यंग्य: आप दो आपके दो

 

  

परिवार नियोजन के टाइम पर हमारे देश में एक नारा बहुत चला था - हम दो हमारे दो। तब आज की तरह नहीं था। 5-7 बच्चे होना ईश्वर का प्रसाद समझा जाता था। अतः इसीलिए पहले नारा दिया था 'दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे'। इसमें दिक्कत यह थी कि लोग समझे दो और तीन को जोड़ कर अर्थात पाँच बच्चे करने हैं। यह नई राष्ट्रीय पॉलिसी है। इसके बाद सिर्फ दो बच्चे वाला नारा मार्किट में लाया गया। अब तो ज़माना बिल्कुल बदल गया है। अव्वल तो अब शादी ही नहीं करनी होती। शादी अगर जैसे-तैसे हो भी जाये तो बच्चे नहीं करने। बच्चे करने हैं तो बस एक।

 

जो बात दो में है वह ना एक में है ना तीन में। आप अपने आसपास नज़र दौड़ाएँ सब चीज़ जोड़े से बोले तो दो होती हैं। दो आँखें, दो हाथ, दो पैर। इससे आगे बढ़ो तो देश-विदेश, रात-दिन, प्रोज-पोयट्री, लेखक-पाठक, दोस्त-दुश्मन। यह दो का अंक ऊपर से ही लिख कर 'आयेला' है। इसलिए सब चीज़ आप पाएंगे जोड़े/जोड़ी से ही हैं। क्या जीवन क्या मृत्यु। क्या पति क्या पत्नी, क्या प्रेमी क्या प्रेमिका। आप देखो ना पढ़ाई में भी टैन प्लस टू है। गोया कि इसमें भी दो है। फिर क्या बी.ए. क्या एम.ए. क्या बी.ई., क्या सी.ए.। अब यह गुरु-शिष्य परंपरा है ही ऐसी। क्या क्लास रूम-क्या कोचिंग। ये 'लड़की तीन कपड़ों में चाहिए' को भी बदल कर दो कपड़ों में कर देना चाहिए। ओढ़नी अब कौन पहनता है। यह केवल कस्ट्यूम ड्रामा/फिल्मऔर फिल्मी गीतों में रह गयी है।  दो ही दिन तो जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं एक दिन इस संसार में आने का दूसरा इस संसार से विदा का। अद्भुत बात ये है कि दोनों के बारे में ही आदमी बेखबर रहता है। ये तो दूसरे ही हैं जो खुशी या ग़म मना रहे होते हैं। अब विपदाओं को ही देख लो या तो सूखा पड़ता है या बाढ़। तीर है तो कमान है। राइफल है तो गोली है। सब जोड़े से है। तलवार है तो म्यान है। डॉ. है तो मरीज़ है।

 

यह दो का अंक का इतना विकास हुआ है इतना विकास हुआ है कि लोग दो जून की रोटी कमाने को मारे-मारे घूमते हैं। 'प्रेम गली अति साँकरी जा में दो ना समाय'। किसी को बेकार का साबित करना होता है तो उसे दो कौड़ी का बताया जाता है। यूं कहने को एक कौड़ी का अथवा एक फूटी कौड़ी का भी कहा जा सकता है। पर दो कौड़ी का कहने का ही रिवाज है। यहाँ तक तो ठीक था पर सोचो दो की महिमा कितनी है कि मानहानि के मुकदमे भी दो करोड़ के ही होने लग पड़े हैं हालांकि ये हानि आराम से एक करोड़ अथवा तीन करोड़ की  हो सकती थी। पर जो बात दो में है वह एक-डेढ़ में या ढाई-तीन में नहीं। दो की महिमा ही निराली है।

ना कैसे कहें


 

ऐसी एक लोकप्रिय कहावत है "अगर कोई भद्र महिला 'ना' कहती है, तो उसका मतलब होता है 'शायद', अगर वह शायद  कहती है, तो इसका अर्थ होता है 'हाँ' और अगर वह हाँ कहती है, तो वह भद्र महिला है ही नहीं। यदि कोई राजदूत (डिप्लोमैट) हाँ कहता है, तो इसका मतलब है शायद, अगर वह शायद कहता है तो इसका मतलब होता है नहीं और अगर वह नहीं कहता है, तो वह राजदूत है ही नहीं " आप क्यों कि  राजदूत (डिप्लोमैट) नहीं हैं अत: आईये  हम अपने दौर की एक बड़ी समस्या पर ध्यान दें कि गैर-अपमानजनक और सुखद तरीके से 'ना' कैसे कहें। हम खुद को कई बार एक ऐसे गतिरोध, मानसिक, सामाजिक दबाव में पाते हैं जहां हमारा एकमात्र जवाब 'ना' होना चाहिये  फिर भी हम संकोच करते हैं, परिणामों की शंका/ आशंका हमारी दृष्टि धुंधला देती है, हमारे निर्णय को बदल देती है और हमारी जीभ को अकड़ा देती है। वास्तव में, यह आपकी गलती नहीं है, हम सभी एक ऐसे वातावरण के  पले बढ़े हैं जहां सकारात्मकता सर्वोच्च हुआ करती थी। सामाजिक रूप से हम हाँ / हां जी वाली संस्कृति के हैं।

 

आइए हम उन स्थितियों पर चर्चा करें जहां आप केवल एक ही जवाब 'ना' देना चाहते हैं। वह एक मुखर उत्तर है, फिर भी आपको 'ना' कहना वह भी पॉइंट ब्लैंक रेंज से कहना बहुत मुश्किल लगता है। यहाँ उन तरीकों की चर्चा करेंगे जिनसे आप सामने वाले को इस तरह ना कह सकें जिससे दोनों का सम्मान बना रहे। कमसेकम आपका तो जरुर ही बना रहे कारण आपके लिये सम्मान से और भी अधिक दांव पर होता है। आपकी रेपुटेशन, आपकी जाॅब-सिक्युरिटी, आपके लिये ना कहने के कुछ सुझाव हैं जिनका सहारा ले आप थोड़े सुविधाजनक तरीके से 'ना' कह सकते हैं:

1.    पहली बार में ही 'फेवर' चाहने वालों को 'ऑब्लाइज़न करें। फोन स्क्रीन पर उनका नाम     देखकर ही आप जानते हैं कि यह कोई न कोई काम के लिए होगा। इसलिए समय लें, बाद में आप वापस कॉल कर सकते हैं यदि वह व्यक्ति महत्वपूर्ण है या फिर इसे एक अच्छा छुटकारा मान फोन न ही करें।

2.    हमेशा यह कहने की आदत डालें 'मुझे देखने दें', 'मैं वहाँ एक व्यक्ति को पहले जानता था, वह अब वहाँ नहीं है, स्थानांतरित हो गया है'

3.    "अगर मैं कहूंगा तो ये सुनिश्चित जानें कि काम नहीं होगा, मेरे उसके साथ अच्छे संबंध नहीं है आजकल। बेहतर तो ये होगा कि उस पर कोई दबाव ना ही डालें। इसका कोई फायदा नहीं होगा और काम नहीं होगा पक्का समझें"।

4.    "ओह! यह हमारे हाथ में था लेकिन अब नहीं, पिछले महीने ही इस कार्य को, इन शक्तियों को मुख्यालय/अलग कार्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया है"।

5.    'मैंने पहले ही इसके लिए किसी और के लिये बात/अनुशंसा कर चुका हूं। अगर आपने मुझे पिछले हफ्ते कहा होता तो मैं निश्चित रूप से कुछ मदद कर सकता था"।

6.    "मुझे देखने दो मैं क्या कर सकता हूँ, वैसे आप देर से आये हैं"

7.    "इस केस के लिए किसी भी सिफारिश का मतलब है निश्चित रूप से अस्वीकृति, अगर आप अभी भी चाहते हैं कि मैं बोलूं तो मैं करूँगा लेकिन मैंने सोचा कि एक दोस्त होने के नाते मुझे आपको ये बात बता देनी चाहिए"।

8.    "मैं इसमें पार्टी नहीं हो सकता; मुझे बहुत खेद है कि पहली बार (भले ही यह 100वीं बार हो) आपने कोई काम बताया और मैं कर नहीं पा रहा हूं। क्यों? जब हम मिलेंगे तो मैं बाद में समझाऊंगा। फोन पर नहीं बता सकता"।

9.    "क्षमा करें! काश मैं आपकी मदद कर पाता, वर्तमान में यह संभव नहीं है"

10.                  "मैं ऐसा कर सकता हूँ लेकिन यह मुझे बहुत महंगा पड़ेगा। मेरा तबादला भी हो सकता है। (मैं एक ऐसे अधिकारी को जानता हूं जो कहता था कि मेरा वेतन पांच अंकों में है आपके मामूली वेतन से कहीं अधिक है अब आपके इतने से वेतन के लिये मैं अपनी पांच अंकों की नौकरी पर खतरा नहीं लेना चाहता। अब टाइम बदल गया है")

11.                  "हमारे दफ्तर के फोn टैप किये जा रहे हैं इसलिए कृपया ऐसा अनुरोध न करें मैं नहीं चाहता कि आपके फोन की वजह से या मुझसे बस बात करने की वजह से आप किसी भी परेशानी में पड़ें। ना आप ये चाहेंगे कि मुझे कोई परेशानी हो"।

12.                  "मैं कह दूंगा पर काम की गारंटी नहीं है"।

13.                   "बेहतर होगा आप श्री रामलाल से मिलें। संभवत: वह इसमें आपकी मदद कर पाये। आपके मिलने के बाद मैं भी उसे बोलने की कोशिश करुंगा"।

14.                  "संभव नहीं है इस केस में वे 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार/योग्यता/वरिष्ठता के नियम का सख्ती से पालन करते हैं"।

15.                  "यह काम तो पहले ही पिछले सप्ताह/कल शाम फाइनल हो गया है"

16.                  कुछ लोग दूसरे के काम को अपना काम बता कर या अपने निकटतम संबधी /मित्र का काम बता उससे आपके नाम से सौदा कर लेते हैं। अत: उस मित्र/संबधी को साथ बुला कर साफ साफ मना कर दें।

17.                  कुछ लोग अपने दोस्तों/संबधियों में आपके नाम से रौब जमाने को फोन पर काम बताने लगते हैं उनको साफ कह दें यह कतई संभव नहीं है।

18.                  पहले वाक्य में ही कोशिश करके ना कह दें।

19.                   बता दें कि "आजकल के 'ऑन-लाइन' और आर. टी.आई. के ज़माने में मैं ही क्या कोई भी रिस्क नहीं लेगा"।

20.                  जो फोन पर आपको काम बता/आपको काम पर लगा खुद मज़े लेते हैं या सोचते हैं कैसे आसानी से काम बन गया/बन जाता है। उन्हें भी काम पर लगा दिया करें। कहें कि "आप ये सब 'फैक्स' से भेजें। पूरे कागजात और आधार कार्ड/पैन कार्ड के साथ"। कभी-कभी उनसे कहें "इसके लिये आपको दफ्तर आना होगा, रजिस्टर पर कुछ एन्ट्रीज़ भरनी होंगी"। और कुछ नहीं तो कहें "आप एक बार मुझे फलां दिन रिमाइंड करा देना"। तब की तब देखी जायेगी न रिमाइंड करे तो आपको करना ही नहीं है।

 

हिंदी में कहावत है "सखी से  सूम भला, जो तुरत दे जवाब" अर्थात उस धनी मित्र से (जो टालमटोल करता है) कहीं अच्छा है कंजूस मित्र जो हाथ के हाथ तुरन्त ना कर देता है। किस्सा खत्म।

 

एक जोक है- जब एक आदमी अपने दोस्त से मिलने गया तो वह अपनी टीनेज बेटी को पढ़ाने में व्यस्त था, उसने अपने दोस्त से पूछा तो दोस्त ने कहा, "मेरी बेटी वर्ल्ड टूर पर जा रही है, मैं उसे विश्व की भाषाएँ सिखा रहा हूँ", हैरान दोस्त ने कहा "लेकिन यह दुनिया की तमाम भाषाओं को सीखना तो बहुत कठिन काम होगा और वक्त भी बहुत लगेगा आदमी ने जवाब दिया "नहीं मैं सिर्फ अलग-अलग भाषाओं में 'ना' कहना सिखा रहा हूं"

                                            

व्यंग्य : पत्नी की चप्पल और प्रेमी

 


 

पति बीवी की चप्पल की निगरानी करता रहा और बीवी प्रेमी की साथ फरार हो गयी। अब इसे आप क्या कहेंगे। मैं कहता हूँ समय रहते चप्पल वालों को ऐसी चप्पल बनानी चाहिए जिसकी निगरानी न करनी पड़े। अब या तो यूज़ एंड थ्रो चप्पल बनाई जाये। या फिर ऐसी चप्पल बनाई जाये जो पैर से उतारी ही न जा सके इससे क्या होगा कि न उतारणी पड़ेगी न निगरानी की ज़रूरत पड़ेगी। यह चप्पल उत्पादकों के लिए एक चेलेंज हैं नहीं तो देख लो आज ये उसकी बीवी कल किसी और की भी हो सकती है। दुनिया मेन प्रेम की नदी सूखी नहीं है और ना ही प्रेमियों की पतवार। बताया जाता है कि पति पत्नी अयोध्या मंदिर मेन दर्शन को गए थे। शायद यह तय पाया गया था कि पहले पत्नी दर्शन कर आए तब तक पति चप्पल की निगरानी करेगा। अब राहुल (पति) को यह अंदाज़ नहीं था कि इसी अयोध्या नरेश की पत्नी सीता मटा का अपहरण रावण ने छल से किया था। कभी गौतम बुद्ध अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को रात को सोता छोड़ जंगल की तरफ चले गए थे और बुद्ध बन गए थे। यह राहुल तो रोते रोते अपने घर पर फोन से बता रहा था कि उसकी पत्नी तो चपलता से प्रेमी के साथ ये जा वो जा हो गयी और उसके हाथ रह गयी है तो बस उसकी चप्पल। अब वह नागरी नागरी द्वारे द्वारे चप्पल लिए ऐसे घूमेगा जैसे कहानी में सिण्ड्रेला की खोज में प्रिंस निकला करता था।

 

राहुल को यह बात तब पता चली जब आस-पास के लोगों ने हुलिया जांकर बताया कि इस महिला को एक नवयुवक के साथ जाते हुए देखा गया है। प्रेमी की सुनवाई अयोध्या जाकर हो गई। फ्यूचर प्रेमियों और उनकी विवाहिता प्रेयसियों के लिए एक मिसाल भी हो गयी है। अब टूर ऑपरेटर इसे भुना सकते हैं। इस प्रकार के प्रेमियों और उनकी प्रेयसियों के लियी विशेष पेकेज का ऐलान कर सकते हैं। पतियों को सावधान हो जाना चाहिए यदि पत्नी अयोध्या जाने कि ज़िद करे तो उनके कान खड़े हो जाने चाहिए, बेचारा पति किस किस से बचे, प्लास्टिक के नीले ड्रम से बचे या नॉर्थ ईस्ट के हिल स्टेशन की खाई से। इसी के चलते अब शादी ही अप्रांसगिक होती जा रही हैं यूं जो लीव-इन में रह रहे हैं उनकी भी क्या गति है। ना जाने कब में लिव-इन से डेड-आउट हो जाएँ कुछ पता नहीं। प्रेम के नाम पर इतने कांड प्रति दिन हो रहे हैं।  इस तरह के कांड शादी नाम की संस्था को मुंह चिढ़ा रहे हैं। इससे यह भी साबित होता है कि प्रेमी-प्रेमिका के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं। प्रेम में सब संभव है। यहाँ देखिये कैसे चप्पल ने प्रेमी को प्रेमिका से मिलवाया है और इसी चप्पल की जोड़ी ने पति-पत्नी की जोड़ी की वाट लगा दी। चप्पल महिमा अनंत है। यह चप्पल का अनोखा नया रोल है। फिल्म उपकार में जब लोगों में अभिनेता प्राण के नए अनोखे रोल की चर्चा फैली तो लोगों में भयंकर जिज्ञासा हुई फलस्वरूप टिकट खिड़की पर लोग टूट पड़े। यह कौन ब्रांड की चप्पल थी जी। राहुल को स्पष्ट करना चाहिया या फिर ‘पत्नी-कम-प्रेयसी को बताना चाहिए ताकि भावी प्रेमिकाओं का भी इस प्रकार अपने अपने प्रेमियों से मिलन हो सके। यह काम ज़ाहिर है मिनटों मे हो गया होगा जैसे अङ्ग्रेज़ी फिल्मों में रेसक्यू ऑपरेशन दिखाते हैं। अब राहुल यदि दोबारा घर बसता है तो मेरी राहुल को यह सलाह रहेगी कि अव्वल तो वह बीवी को लेकर अयोध्या क्या किसी भी मंदिर में न ले जाये। यदि मंदिर जाना ही पड़े तो चप्पल की निगरानी को ना बैठे ताकि चप्पल की जोड़ी जाती है तो जाये उसकी जोड़ी सलामत रहे। 

 

व्यंग्य: पेपर लीक हुआ ही नहीं

 

 

लेटेस्ट खबर ये है कि दरअसल पेपर लीक हुआ ही नहीं। केवल कुछ सवाल लीक हो जाने से यह कहना कि पूरा का पूरा पेपर लीक हो गया एक तरह से असत्य वचन है। नाइंसाफी है। दूसरे शब्दों में अगर किसी पेपर के दस सवाल में से छह आठ सवाल 'वाट्स-अप' पर आ जाएँ तो क्या ये तकनीकी तौर पर लीक कहलाएगा। सच तो ये है कि फर्ज़ करो दस सवाल थे पेपर में और दस सवाल लीक हुए ही नहीं तब पेपर लीक कैसे माना जाये।

 

ये जो लीक है यह हमारी ऐतहासिक धरोहर है। देखिये विभीषण ने यह लीक किया ही था न कि रावण के कहाँ तीर मारना है। महाभारत तो लीक से भरी हुई है।

 

देखिये प्रश्न पत्र में पहले तो एक हैडिंग लिखा होता है कि यह किस बात की और किस विषय की परीक्षा है। लीक में ये दोनों चीज़ें नदारद हैं तब ये लीक कैसे हुआ है? न साल का ज़िक्र है, न तारीख का। पता नहीं कब का पेपर है? किस चीज़ का पेपर है? कब हुआ या होने वाला है? पेपर को प्रथम दृष्ट्या देखने से पता ही नहीं चलता, तब पेपर लीक कैसे माना जाये? पेपर द्विभाषी है अर्थात हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में है जबकि जो सवाल लीक हुए हैं वे केवल अंग्रेज़ी के हैं तब ये ‘पेपर लीक’ कैसे हुआ? यह टेक्निकली पेपर लीक नहीं है। यूं तो हम जब 'चैम्पियन गैस पेपर' स्कूल के ज़माने में खरीदते थे तब कई सवाल थोड़े अदल-बदल कर मूल पेपर में होते थे। इसका अर्थ ये नहीं कि गैस पेपर वालों को आदरणीय अध्यापकों अथवा प्रिंसिपल महोदय ने या लैब असिस्टेंट या चपरासी ने पेपर लीक कर दिया था।

 

ये और कुछ नहीं है बस कुछ 'कम्यूनिकेशन गैप' है। यह लीक जो है सो हमारे जीवन में कहाँ नहीं है। क्या बरसात में हमारी परछत्ती लीक नहीं करती। क्या हमारे फाउंटेन पेन लीक नहीं करते थे। हमने तो माता जी की गुल्लक में से चवन्नी अठन्नी भी तार/पिन की मदद से लीक करी है।  अब पता चला ए.टी.एम. अपने कोड नंबर को पिन क्यों कहते हैं। इस तरह चवन्नी या अठन्नी निकाल लेने को यह नहीं कह सकते कि पूरी गुल्लक लीक कर ली। बस इतने सारे सिक्कों में से कुछ सिक्के ही तो लीक हुए थे। फिर यह साबित भी नहीं होता कि ये चवन्नी/अठन्नी इसी गुल्लक में से निकली हैं।

 

हम भारतीय हैं। जुगाड़ हमारी 'साइकी' में इतने अंदर तक जड़ जमा चुका है कि लंबी 'क्यू' देखते ही हमारा दिल 'क्यू' में खड़े होने को नहीं करता बल्कि इस जुगाड़ में लग जाता है कि कैसे या तो 'क्यू' तोड़ी जाये अथवा कैसे बिना क्यू में लगे काम हो जाये। एयरपोर्ट पर अच्छे भले भारतीय व्हील चेयर पर बैठ कर जाते हैं ताकि प्राथमिकता के आधार पर विमान पर सवार हो जाएँ। वक़्त आ गया है कि अधिकारी और नेतागण का 175 सदस्यीय दल ऐसे ऐसे देश में जाये जहां इस तरह की परीक्षाएँ बिना लीक हुए संचालित की जाती हैं। उनकी समस्या क्या है? वो कौन सी चीज़ है जो उन्हें पेपर लीक करने से रोकती है? लीक हमारी राष्ट्रीय समस्या नहीं है अपना नज़रिया बदलिये। लीक हमारा राष्ट्रीय   साॅल्युशन है। लीक था, लीक है, लीक रहेगा। जिन खोजा तिन पाईयां। आप अपना अपना देख लो।

Tuesday, June 9, 2026

How to say No

 


     

There is this famous quote “If a lady says No, she means May be, if she says Maybe, it means Yes and if she says Yes, she is no lady. If a diplomat says yes, it means May be, if he says Maybe, it means No and if he says No, he is not a diplomat” since you are no diplomat, let us dwell upon a bigger problem of our times that is how to say No in most non offending and pleasant way. We do find ourselves many a times in a deadlock where No is the only answer yet we hesitate, flood of unpleasant consequences blurs our vision, cloud our judgement and stiffens our tongue. In fact, it is not your fault, we all have been brought up in an environment where positivity reigned supreme. Socially speaking we are the product of YES PAPA culture.


Let us discuss situations where the only answer you want to give is nothing but a mouthful of No No yet you find it so very difficult to say No point blank. Here are the ways you can say No in a least offending way:


1. Do not pick up call of favor seekers in first go. Seeing their name on phone screen you know it would be for seeking one favor or the other. So take your own time, later you may call back if the person is important enough or else let it be a good riddance. This is not ESCAPISM but this approach gives you pause to think/mull over the most appropriate answer. Why should favor seekers try their little game of catching you unaware/ unprepared.

2. Always say "let me see, I knew one person there earlier, he is no more there, since transferred out".

3. "If I ask them to do this, be sure the work will not be done, I am not in good terms with him. It is better not to put any ‘good word’ (read pressure) upon him. Would be of no use and is bound to give negative result"

4. "Oh! it was in our hands but no more now, last month only these powers have been shifted to HQ/different office". 

5. "I have already spoken/sought favor/recommended somebody else for this. Had you given me a ring/sounded me last week, I would have definitely could be of some assistance".

6. "Let me see what I can do, you are late"

7. "For these orders are any recommendations means sure shot rejection, if you still want me to put in a word I shall, but I thought being a friend I should sound you".

8. "I can not be a party to this; I am so sorry 1st time (even if it is 100th time) you have asked for something, I am not able to do. Why? I will explain later when we meet. I can’t tell you on phone".

9. "Sorry! I wish I could help, not possible at present please/in present case please"

10. "I can do it but it would cost me very dearly. I may get transferred also. (I know an officer who would say my salary is this much for your paltry salary I don’t want to lose my job of this much salary")

11. "My phone is being tapped by anti-corruption so please do not make such request I do not want you to land in any trouble due to talking to me nor would you like me to face any trouble"

12. "I will put in a word but I cannot guarantee whether the work will be done".

13. 'You better meet Mr. X he would be able to help you in this. He is the one dealing. I will put in a word after you have met".

14. "Not possible they do strictly as per 1st come 1st served basis/merit/seniority"

15. "It is already decided last week/last evening"

16. some people live and flourish under reflected glory. They have no credentials of their own to talk about, their only asset is that they are friends/related with you. Basically, it is nothing but name dropping. So to prove this, they would ring you. You wont know about the 'deal' being struck on your behalf/ in your name, so be cautious with such piggy riders. In such cases, better it is to call them both in your office and tell them No in no uncertain terms.

17. Some people would ring to tell you so and so is my close relative/friend and his 'small' work. Tell them a 'Big' No right in beginning.

18. Your efforts should be to say No at the first instance. This saves time and embarrassment at a later stage.

19. Tell them clearly that everything is On-line these days so not possible to tamper. Also under RTI it is impossible.

20. Some people just tell you a 'small' work on phone and feel 'free' don't let them feel free. Give them a job in return such as Get me fax of all the details duly signed, also copies of Aadhar/PAN card along with all related documents. Tell them for this job you will have to come to office when i tell you, till then, nothing can be done as you have to make entries in a register and sign. If nothing works at least tell them to remind you on a specific day/time. No reminder No work. 

In Hindi there is this saying "सखी से सूम भला, जो तुरत दे जवाब" meaning a miser is better who says No on face at the first instance than a rich friend who gives nothing but empty promises.

There is this hilarious joke. When a man visited his friend he was busy teaching his teenaged daughter, he asked his friend, Friend replied "my daughter is going on world tour, I am teaching her world languages", puzzled friend wondered “But this would be such a tough task learning world languages, there are so many of them” Man replied “No I am teaching just how to say 'No' in different languages”

The History of Anglo-Indians --- Book Review

 


                                       


 

 

The History of Anglo-Indians a graphic novel is a landmark book, I came across recently. The book is written and illustrated by the duo Keith Butler and Harry MacLure both Anglo Indian themselves. The book is so interesting that it could really be labelled as 'Unputdownable' once you have started it. The book is so easy both on your eyes and brain due to its comics type storyline.

So many cobwebs this book has helped clearing in my mind. I all along in my ignorance thought the Anglo-Indians are the persons whose one parent/grand/great grand was British but this book amply clarifies -- one forefather could well be Portuguese, French or Dutch. They too come under the omnibus heading of Anglo-Indian.

The book not only traces the history and geography of Anglo-Indians but also the sociology and anthropology of Anglo-Indians as the world saw them and as they saw themselves. I am certain this book would prove to be educative in more ways than one to Anglo-Indians themselves, especially, the new generation which hardly has any ‘regard’ for history, heritage or heredity.

I am impressed by the perseverance of the writer team. Harry MacLure is a known and respected celebrity in Anglo-Indian community. One may find plethora of books on history of Parsis in India or for that matter on other ethnic groups/minority communities. Authentic work on Anglo-Indians is fewer. One book I came across on McCluskieganj authored by Vikas Kumar Jha. It is in Hindi, an authentic account of now ghost town McCluskieganj. The Anglo-Indians contribution in building India is immense. You name an area and an Anglo Indian would be a luminary in it. Be it the field of Indian Films, politics, education, literature or music. Indian Railways was their first port of call of Anglo Indians. Old timers of Railways will have a tale or two about Anglo Indians in their midst. Anglo Indians took palpable pride in their job. Their loyalty and life style was envy of others, to say the least. Come 1947 and we lost so many many of them to Britain, Australia and New Zealand. I am seventy-year-old. I live in Delhi. I have seen Frank Anthony in Parliament impeccably dressed complete in three-piece suit and his favorite tie. I have also visited Frank Anthony Public school in Delhi. I had once unsuccessfully tried to obtain admission for my daughters in the school. The school has a life size oil portrait of Frank Anthony Esq. in the lobby.

The book prima facie may appear to be costly at Rs.1150/-per copy but the glossy paper and beautiful pictures with fine detailing more than justify the price. The publishers-Anglo-Ink Books, Chennai deserve appreciation for bringing out such a fine piece of artistic and historical value. I must say Mr. Keith Butler and Harry MacLure have jointly created a treatise for the history and heritage lovers to treasure and cherish. The book indeed is a love’s labor please ensure it does not get ‘lost’