Ravi ki duniya

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Sunday, October 18, 2026

निर्मला देवी और कुमकुम

 

वाराणसी (बनारस) में एक तबला उस्ताद वासुदेव नारायण सिंह  रहा करते थे। वे बनारस (वाराणसी) के संगीत जगत में वासुदेव महाराज के नाम से प्रसिद्ध थे। उनकी एक बेटी निर्मला (7 जून 1927) और एक बेटा लक्ष्मण नारायण सिंह थे। जो सिंह लक्ष्मण प्रसाद सिंह एक प्रमुख तबला वादक बने  और दुनिया उन्हें लच्छू महाराज के रूप में जानती है।


                                         


 

पारिवारिक परंपरा के अनुरुप बेटी निर्मला ने संगीत शिक्षा को अपनाया और पटियाला घराने की एक निपुण हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका बनीं। उनका दूसरा नाम दुलारी था। हांलाकि अपनी चाची द्वारा पालने की वजह से उन्हें नाज़िम नाम भी मिला। उन्होंने फिल्मों में अभिनय भी किया और 1942 की शुरुआत में उन्होंने 1940 और 50 के दशक में एक दर्जन से अधिक फिल्में दीं। 15 जून 1996 को उनका निधन हो गया।

 उन्होंने अपनी फिल्मों के  सह-कलाकार, गुलशन सिंह आहूजा से शादी कर ली। वे अपने स्क्रीन नाम अरुण से मशहूर थे। समय के साथ  दंपति के पांच बच्चे हुए। दो बेटे और तीन बेटियां।

                                       


वासुदेव महाराज ने बाद में एक मुस्लिम महिला से भी शादी रचाई उनकी मुस्लिम पत्नी का नाम मुन्नन था।  मुन्नन से वासुदेव महाराज के दो खूबसूरत बेटियाँ हुईं। ज़ैबुन्निसा और राधा। प्रसिद्ध कत्थक नर्तक पंडित शंभू महाराज ने कत्थक नृत्य में जैबुन्निसा को प्रशिक्षित किया। उनकी बड़ी बहन राधा एक अभिनेत्री बन गईं और उन्होंने राधिका नाम से  कुछ फिल्मों में अभिनय किया। मिस्टर एंड मिसेज 55, रात के राही, लाल निशान और शोला जो भड़के।

एक बार विख्यात निर्माता निर्देशक गुरुदत्त की पारखी नज़र जैबुन्निसा पर पड़ी। उन्होंने जैबुन्निसा को अवसर दिया। स्क्रीन नाम कुमकुम से जैबुन्निसा ने 115 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वह एक श्रेष्ठ नर्तकी थीं। रामानंद सागर की फिल्मों का वह  जरूर होतीं थीं। उन्होंने भारत की पहली भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियारी चढ़ाईबो' 1963 में अभिनय किया था। उनकी  अंतिम फिल्म 'एक कुँवारी एक कुँवारा' 1977 थी। फिर वे 1975 में सज्जाद अकबर खान (लखनऊ) शादी कर सऊदी अरब चलीं गईं। 28 जुलाई 2020 को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

                 

                                          


गुलशन सिंह आहूजा ने 1939 से शुरू कर अरुण आहूजा नाम से 40 से अधिक फिल्में दीं। उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म 'सेहरा' के फ्लाॅप होने के बाद उन्हें कार्टर रोड, बान्द्रा स्थित अपना बंगला बेचना पड़ा और 1960 के दशक में वे विरार में आ बसे। माधुरी दीक्षित की पहली फिल्म 1984 में रिलीज हुई फिल्म 'अबोध' में अरुण कुमार ने अपनी आखिरी सहायक भूमिका की थी।  3 जुलाई 1998 को उनका निधन हो गया। उनके अभिनेता बेटे गोविंदा को 'विरार का छोकरा' भी कहा जाता है।                          

तुमको पता है जी?


                                        


1.         चेतन आनंद की फिल्म (राजेश खन्ना की पहली फिल्म) ‘आखिरी खत’ 1966 में जो बालक है वह मास्टर बंटी, और कोई नहीं बल्कि प्रोड्यूसर और कभी हेमा मालिनी के सचिव रहे इंदर कुमार बहल का पुत्र बंटी बहल है।

                                       



2.   “तुम अपना रंजो-गम अपनी परेशानी मुझे दे दो” (फिल्म: शगुन) में जो अभिनेत्री पियानो पर यह गीत गा रही है उसका नाम लिबी राना है, स्क्रीन नाम निवेदिता था।

  

                                                  


3.   “जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी” (फिल्म: मिस्टर एंड मिसेज 55) जॉनी वॉकर के साथ जो अभिनेत्री है उसका नाम विनीता बट्ट था, स्क्रीन नाम यासमिन था।


                                            


4.   अंग्रेज़ जैसा दिखने वाला सभी पार्टी में सूट-टाई में नीली आँखों वाला अभिनेता (पारसी) का नाम  के.सी. सुपारीवाला था।

                                              


5.   “आगे भी जाने न तू पीछे भी जाने न तू जो भी है यही एक पल है” (फिल्म वक़्त) में क्लब में पर्दे पर गाने वाली ‘सिंगर’ एरिका लाल है। जो एक रेलवे अधिकारी सी. एस. लाल की बेटी थी।

 

Friday, October 16, 2026

व्यंग्य: तेरा मुस्कराना गजब हो गया!


                                                 


 

     भले आप कुछ भी कहें परंतु हम सब अपने पूर्वाग्रहों से बंधे रहते हैं। यद्यपि इसका कोई ठोस कारण या लॉजिक नहीं है पर कुछ लोग आपको शकल से अच्छे लगने लगते हैं और उसी तर्क से कुछ लोग आपको अपने चेहरे और बॉडी लेंग्वेज़ से बिलकुल नहीं भाते। इसको और 'वेलिडेशन' मिलता है जब वह जैसा इम्प्रेशन था वैसा ही निकलता है तो और बन आती है। "मैं तो शकल देख कर ही पहचान गया था। यह बदमाश/ठग/चोर/ बेईमान है।" कभी-कभी यह भी सुनने को मिलता है फलां "शकल से ही खानदानी लगता है। भला आदमी लगता है"। आपने अगर फिल्म डाॅन देखी हो तो अमिताभ बच्चन अपनी गेंग के एक साथी को गोली मार देता है। दूसरे साथी गेंगस्टर के पूछने पर डाॅन बताता है “मुझे इसके जूते अच्छे नहीं लगे” दरअसल जूते की हील में छिपा कर वह खबर/प्लान इधर से उधर करता था।

 

जब एक सूबे में आई.जी. साब अपने मातहतों की मीटिंग ले रहे थे। किसी बड़े संजीदा टॉपिक पर बात चल रही थी, उन्होने नोटिस किया  एक दरोगा जबसे वो आये हैं मुस्कराए ही जा रहा है। पहले उन्हें अटपटा लगा। फिर उन्होने देखा उसका मुस्कराना रुक ही नहीं रहा है। बड़ी गंभीर बात हो रही है। लाॅ एंड ऑर्डर पर चर्चा चल रही है। लोग मर रहे हैं, कट रहे हैं। एक ये दरोगा बाबू हैं कि हर बात पर सतत् मुस्कराए ही जा रहे हैं। वो एक 'स्लोगन' है ना 'हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में मुस्कराना हमारा नारा है'। पद्मभूषण नीरज जी  ने लिखा है: “जिन मुश्किलों में मुस्कराना हो मना उन मुश्किलों में मुस्कराना धर्म है” मगर इन दरोगा जी का मुस्कराना इन पर भारी पड़ गया। इन्हें मुश्किल में डाल गया।

 

जब आई.जी. साब ने देखा कि अगले का मुस्कराना  थम ही नहीं रहा है तो उन्हें 'अनक्मफ़र्टेबल फीलिंग'  होने लगी। आप मर्डर और डकैती रोकने की बात कर रहे हैं और अगले का मुस्कराना ही नहीं रुक रहा। मुस्कराना रुके तो मर्डर/डकैती रुके। मैं तेरे चेहरे से नज़र हटाऊं तो दुनियां देखूं।

 

होना क्या था आई.जी. साब ने इसे पर्सनली ले लिया और एकदम खफा हो गए। वे फुल-फुल फायरिंग मूड में आ गए। लगे उसे भला-बुरा कहने। उन्होने देखा कि अगला अब भी मुस्कराए जा रहा है। बस उन्होने आव देखा न ताव और उसको तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर कर छोड़ा। जिसे पुलिसिया भाषा में लाइन हाजिर कहना कहते हैं। जब दरोगा जी को अपने इस ट्रांसफर का पता चला तो उन्हें भान हुआ कि उनकी क़ातिल मुस्कान ने तो उनको ही मुश्किल में डाल दिया। उन्हें अपने मुस्कराने का ग़म नहीं। ग़म ये है कि उनकी मुस्कान को बेदर्द ज़माने की तरह आई.जी. साब भी नहीं समझे। जब वह थाने में अपराधियों से पूछताछ करता या फिर ‘कड़ी’ पूछताछ करता, कंबल परेड अथवा ‘भैरों बाबा के प्रसाद’ के वक़्त भी दरोगा जी मुस्कराते रहते। दरोगा जी ने हाथ जोड़ कर आई.जी. साब को बताया हुज़ूर मेरी इतनी जुर्रत कि आपके इगलास में मुस्कराऊँ? भगवान जानता है और एस.पी. साब से पूछ लीजिये सर मेरी शक्ल ही ऐसी है। ऐसा कहते वक़्त भी दरोगा जी मुस्करा रहे थे। अब पुलिस विभाग सोच रहा है कि दरोगा जी को अपने पी.आर. डिपार्ट में शिफ्ट कर दे। वो 'मोटो' है ना “सर्विस विद स्माइल” उसके जीते-जागते प्रमाण (मास्कट) साबित होंगे हमारे दरोगा जी।  

व्यंग्य: दो सौ शोध प्रबंध कबाड़ में बेचे

 

                                         


       

मेरा भारत महान है। इसमें जिसको तनिक भी शक़ हो उसके लिए ये खबर है कि मेरे भारत महान की, महानतम यूनिवर्सिटी के दो चपरासियों ने अलमारी में रखी दो सौ थीसिस कबाड़ीवाले को बतौर रद्दी बेच दी। पता ये चला है कि ये दोनों मल्टी-टास्किंग स्टाफ संविदा कर्मी थे। बहुत संभव है कि वे रोज की मच-मच से तंग आ गए हो गए हों। दूसरे संविदा कर्मचारियों को अपने अनुबंध के नवीनीकरण पर संदेह हो या पता हो कि अब उनका डेरा-डंडा इस यूनिवर्सिटी से उठ रहा है। एक भानगढ़ और है, हो सकता है इनको कई महीनों से अनुबंध राशि मिली ही न हो। संविदा कर्मचारियों में से ज्यादातर को समय पर वेतन नहीं मिलता है। कई महीने के एरियर हो जाते हैं। और फिर बाबू लोग, जिनकी मुट्ठी ठंडी पड़ी होती है उसको क्रियाशील बनाने को मुट्ठी गरम करनी पड़ती है। तब हाथ चलते हैं और तब कहीं जाकर कलम चलती है।

 

एक बात और है जिस बात को यूनिवर्सिटी के बड़े-बड़े प्रोफेसर नहीं समझ पाये वह 'ज्ञान' इन दो संविदा कर्मियों को हो गया था। अब ज्ञान की प्राप्ति तो किसी को, कभी भी, हो सकती है। ये संविदाकर्मी समझ गए थे ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ हमारे संत कह- कह के थक गए पर यह 'रियालाइज़ेशन' इन दो ‘संत’ संविदाकर्मियों को हुआ वह तमाम प्रोफेसरों की फौज में से किसी को भी नहीं हो पाया। 

 

अब आप सोचो ‘प्रेम’ का ढाई अक्षर लिखने को कितनी जगह चाहिए। दो सौ थीसिस रखने और संभाल के लिए कितनी जगह, कितनी अलमारियां चाहिए। और इस यूनिवर्सिटी में न जाने कितनी थीसिस पड़ी होंगी जो अंततः दीमक का भोजन बनने को शापित हैं। चलो किसी की रोटी तो इन थीसिस से चली। एक बात और है यह ‘ज्ञान’ जो इन थीसिस के माध्यम से अर्जित किया जाएगा वह किस काम का? न रोजगार है! न उद्योग! बाकी जितने भी काम-धंधे और उद्योग धंधे हैं उनमें ये 'थीसिस' काम नहीं आनी। अतः  अधिक से अधिक ये थीसिस 'स्वांतै: सुखाय' हो सकती हैं। समय आ गया है कि ये शोध-प्रबंध, ये स्कूल-कॉलेज ये यूनिवर्सिटी किस काम के? बेकार जगह घेरे हुए हैं। कितने चमक-दमक वाले मॉल और मल्टीप्लेक्स यहाँ बन सकते हैं। सोचा है कभी?

 

अतः मैं समझता हूँ इन दो सौ थीसिस से वाकई कोई लाभान्वित हुआ है तो केवल ये दोनों संविदा कर्मी ही हैं। बेच कर एक जून की रोटी या दो टाइम की झालमूड़ी तो चल ही जायेगी। यूनिवर्सिटी वाले भी अब चैन से सो सकेंगे। वैसे ही जैसे डाकू खड्ग सिंह के 'सुल्तान' नामक घोड़े को छल से ले जाने के बाद बाबा भारती सोने लगे थे।

 

Thursday, October 15, 2026

ग्रेटेस्ट हैंसम पाॅपुलर हीरो- श्याम

 

                                             


                               

25 अप्रैल 1951 का वाकया है। फिल्म स्टार श्याम, फिल्मिस्तान स्टूडियो के  शशधर मुखर्जी की फिल्म 'शबिस्तान' की  शूटिंग चाइनीज़ क्रीक, घोडबंदर, थाणे में कर रहे थे। घोड़ों के साथ शूटिंग सीन खत्म हो गये थे। दोपहर लगभग 12 बजे  'पैक-अप' हो गया था। श्याम घोड़े पर सवार लौट रहे थे। अचानक, घोड़ा फिसल गया और श्याम घोड़े से गिर पड़े। वह हंसते हुए उठे और बोले कुछ नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद ही उनके कान से खून बहने लगा। दर्द बढ़ने लगा, उन्हें तुरंत सीधे बॉम्बे ले जाया गया और मरीन लाईन्स के 'बॉम्बे अस्पताल' में दिखाया गया। कुछ ही मिनटों में श्याम (श्याम सुंदर चड्डा) की मृत्यु हो गई। जिससे पूरी फिल्मी दुनिया में सदमे की लहर फैल गई। श्याम की उम्र केवल 31 बरस थी।

 

श्याम (सुंदर चड्डा) का जन्म 20 फरवरी 1920 को सियालकोट में हुआ था। चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे श्याम। वह अपने टाइम के सबसे स्टाइलिस्ट और सुशिक्षित अभिनेता थे। उन्होंने गोर्डन कॉलेज रावलपिंडी से  स्नातक की परीक्षा पास की थी। जहाँ वे ड्रामैटिक्स सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे थे। नाटकों में उनकी परफाॅर्मेंस उत्कृष्ट होती थी। उन्हें टेनिस खेलने का जुनून था। उन्होंने ‘ताजी मुमताज कुरैशी’ से शादी की थी, उनकी एक बेटी साहिरा और एक बेटा (श्याम के मरने के दो महीने बाद) मरणोपरांत हुआ था जिसका नाम शेखर (शाकिर) था। अब वह लंदन में एक मनोचिकित्सक है। बेटी साहिरा ने राहल काज़मी से निकाह किया। उनका एक बेटा अली काज़मी एक पाक-कनैडियन अभिनेता है।

                                            


1942 से शुरु करें तो श्याम ने 25 से अधिक फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया। सब एक से बढ़ कर एक। उन्होंने अपने समय की सभी टाॅप हीरोइन यथा निगार सुल्ताना, नसीम बानू, रेहाना, नरगिस, कुलदीप कौर, मीना शौरी, मुनव्वर सुल्ताना, सुरैया और रमोला के साथ काम किया। उनकी आखिरी अधूरी फिल्म शबिस्तान (1951) को 'बॉडी-डबल' की मदद से पूरा किया गया।

 

लाहौर और रावलपिंडी के दिनों से ही श्याम के सबसे करीबी दोस्तों में अभिनेता ओम प्रकाश थे। उनकी दोस्ती का बंधन विभाजन के बाद भी जारी रहा। उन्होंने यूनियन पार्क में आमने-सामने घर खरीदे थे। अभिनेता की मृत्यु के बाद इसका नाम 'श्याम पार्क' रखा गया। अब इसका नाम चैम्बूर नाका रोड से दूर फ्रेंडशिप पार्क ('मैत्रेयी पार्क') रखा गया है। एक पतली गली यूनियन पार्क रोड इलाके को आर.के. स्टूडियो से जोड़ती है। इसी सड़क के साथ अभिनेता - निर्देशक किशोर साहू, फिल्म निर्माता रमेश सैगल, त्रिलोक कपूर, अभिनेत्री नलिनी जयवंत के घर भी थे। आगे, मोड़ के पास, अशोक कुमार रहते थे।  श्याम सुसंस्कृत, पढ़े-लिखे और अंग्रेजी-उर्दू में पारंगत और धाराप्रवाह थे। वे समाचार पत्रों में दोनों भाषाओं में नियमित साप्ताहिक कॉलम भी लिखते थे।

 

वास्तव में, श्याम की मृत्यु के बाद श्याम की पत्नी अपनी बड़ी बहन, ज़ेब कुरैशी के साथ लाहौर चली गईं, बड़ी बहन ज़ेब कुरेशी बॉम्बे में एक अभिनेत्री थी। मुमताज़ ने बाद में एक अंसारी नामक सज्जन से पुनर्विवाह किया। उनके बच्चों का पालन-पोषण मुस्लिम के रूप में किया गया।

 

प्रसिद्ध लेखक सआदत हसन मंटो के साथ श्याम की दोस्ती एक लीजेंड थी। बहुत मजबूत थी। मंटो और श्याम दो शरीर एक आत्मा की तरह थे।। अपनी पुस्तक 'स्टार्स फ्रॉम अनदर स्काई' मंटो के अनुभवों के उर्दू -'मीना बाज़ार' से अनुवादित पुस्तक है।  मंटो ने सबसे मार्मिक और दिल को छू लेने वाला चैप्टर श्याम को समर्पित किया है ।  जिसका शीर्षक था श्याम: कृष्णा की बांसुरी। मंटो तब बॉम्बे टॉकीज़ के  एक 'एम्पलाॅयी' थे, जहां श्याम को एक फिल्म का काॅन्ट्रेक्ट मिल गया था। लेकिन पैसा थोड़ा-थोड़ा और बहुत धीरे-धीरे आ रहा था। वे संघर्ष भरे दिन थे और दोनों दोस्त एक अपार्टमेंट और खर्चा साझा किया करते थे।

 

उनके संस्मरण उनके उन दिनों की छोटी छोटी घटनाओं से भरे हुए रहे जो श्याम के विशाल दिल और दोनों की गहरी दोस्ती की मिसाल थे। एक दिन जब श्याम को एक ठीक-ठाक राशि मिली और मंटो पर पैसे नहीं थे, ट्रेन में लौटते समय, श्याम ने दस-दस रुपये के नोटों की गड्डी को आधा-आधा कर दिया और अपने दोस्त से एक बंडल लेने के लिए कहा। मंटो ने एक ले लिया और स्टेशन पर उतर गया। श्याम को एक और दोस्त से मिलने जाना था, जैसे ही ट्रेन जरा दूर गई, श्याम ने कुछ पैसे लहराए और चिल्लाया,  “मैंने इस गड्डी से कुछ रुपये पहले ही निकाल लिए थे”। मंटो प्यार से उस ‘अलविदा’ को याद करता है जिसे दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से कहा था, जब मंटो कराची को रवाना हुआ था। जिस दिन मंटो को जाना था, श्याम अपने दोस्त को ‘सी- ऑफ’  करने शूटिंग से जल्दी वापस आ गया था। उसने अपने दोस्त के साथ दो पैग साझा किए, एक भी शब्द बोले बिना बस कहा “चलें”? उसने सामान पैक करने में उसकी मदद की और पूरे रास्ते एक दूसरे को चुटकुले सुनाते रहे।  जब मंटो शिप की सीटी पर जैटी में सवार हो रहा था, तो श्याम ने अपने दोस्त को हाथ हिलाया, रोया और चिल्लाया "हिपतुल्ला!" फिर पीछे देखे बिना चला गया। अगर आप सोच रहे हैं कि 'हिपतुल्ला!' क्या है?, तो यह मंटो द्वारा गढ़ा गया एक टर्म था, जो किसी क्रिकेटर के अजीब नाम से बना था। जिसे उसने एक अखबार में देखा था। मंटो ने इसे एक ‘ताज्जुब’ या ‘वाह ! वाह’ ! के  रूप में इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे यह फिल्मी हलके में  लोकप्रिय हो गया। जैसे कि कुछ ऐसा जिसे "हिप्तुलाइज़" करने की आवश्यकता है या कुछ "हिप्तुल्ला पर्याप्त" नहीं है। जब एक सभा में  अशोक कुमार ने श्याम से पूछा इसका क्या मतलब है?  तो श्याम ने इसे "मंटोवाद" (मंटोवाइज़) बताया। श्याम बहुत बुलंद शख्शियत का इंसान था। उसकी हर बात, उसकी हर हरकत, उसकी हर अदा, ऊंचे बहुत ऊंचे स्तर की होती थी। जब खूब सफल होने के बाद श्याम की स्थिति (पैसे से) ठीक ठाक हो गयी तो उसने यह सुनिश्चित किया कि सनकी और बेहद खर्चीले मंटो के पास अपने छोटे बच्चों और पत्नी की देखभाल के लिए पर्याप्त पैसा होना चाहिए। मंटो के पाकिस्तान जाने के बाद, श्याम अपने दोस्त के लिए तरसता था, और उसे पत्र लिखता था। मंटो जवाब नहीं देता था। श्याम चिंतित हो उठता और अपनी फिल्म डिस्ट्रीब्युटर्स को कहला भेजता कि श्याम की तरफ से पैसे भेज दें। श्याम के भतीजे बिमल चड्डा लिखते हैं। मंटो से कभी पूछना नहीं पड़ा, श्याम सहज रूप से अपने दोस्त की जरूरतों को जान लेता था। बिमल के अनुसार "श्याम पूरी तरह से मंटो के पाकिस्तान जाने के फैसले के खिलाफ था और उसने उसे अपना मन बदलने के लिए मनाने की हरचंद  कोशिश की, लेकिन मंटो हिला नहीं। दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से बात तक करना बंद कर दिया था।

 

जिस तरह से 'दि टाइम्स ऑफ ने इंडिया' ने श्याम की मृत्यु पर कमेंट किया वह श्याम की महान शख्सियत  को दिखाता है। उसका मुख्य पैरा स्टार की आभा-प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ बताता है। " टाॅल, प्रभावशाली और सुंदर,  श्याम, भारत में सबसे अधिक लोकप्रिय, स्क्रीन का श्रेष्ठ सितारा, पूरे भारत में लाखों फिल्म प्रेमियों का चहेता। बॉम्बे में लाखों लोगों की भीड़ लगी हुई थी। बुधवार सुबह अपने चेम्बूर घर से काम करने के लिए हँसते हुए गया था और दोपहर तक, वह मर चुका था। (स्रोतः द टाइम्स ऑफ द टाइम्स ऑफ )

 

बिमल बताते हैं, जब श्याम एक फिल्म के प्रीमियर के लिए लाहौर गए, जिस दिन वह लैंड किये, उसी दिन उन्होंने अपने दोस्त की तलाश की। उस समय तक श्याम एक स्टार बन गया था और प्रशंसक हरदम उसका पीछा करते। वह उनसे घिरा रहता। हालांकि मंटो और श्याम मिले, और दोनों दोस्तों ने खुशी से एक-दूसरे को गले लगा लिया, लेकिन आगंतुकों की बढ़ती भीड़ और प्रशंसकों की भीड़ ने उन्हें एक-दूसरे के साथ ज्यादा समय बिताने ही नहीं दिया।

 

नंदिता दास की फिल्म 'मंटो' में मंटो की भूमिका नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने की है। श्याम की भूमिका ताहिर राज भसीन ने निभाई है ।

 

श्याम की अंतिम फिल्म शबिस्तान में श्याम की नायिका नसीम बानू थीं। 1942 से 1951 तक श्याम की फिल्मों और उनके अभिनय ने फिल्म जगत में धूम मचा दी थी। श्याम को  फिल्म जगत में आला मुकाम हासिल हुआ।

 

व्यंग्य: सत्यनिष्ठा से समृद्धि


                                                            


यह इस बरस की सतर्कता थीम है। देख रहे हो बिनोद ! कैसे शब्दों के साथ 'खेला' करते हैं। थीम के अंदर छुपा विरोधाभास और विनोदाभास आप भी देख-पढ़ और समझ पा रहे होंगे। ये किस युग की बात है जब सत्यनिष्ठा से समृद्धि आती थी। आज की तारीख में तो हरगिज़ नहीं। दिल पर हाथ रख कर बताएं क्या इसका उल्टा सच नहीं है? हम रात-दिन अपने आस-पास इसका उल्टा ही सच होता देख रहे हैं। असत्य निष्ठा से समृद्धि सुलभ है और शीघ्र है।

                       कहा बड़ों ने सन्मार्ग पर  मंज़िल मिलेगी

                       किन्तु पाया मैंने कुपथ पर लक्ष्य को समीप


अब आप अध्यात्म में मत घुस जाना कि इससे मन को शांति मिलती है। रात को नींद ठीक से आती है। मैंने देखा है वो तो बेचारा ये सोच सोच के मरा जाता है बेटी की शादी कैसे होगी? बेटे की नौकरी का क्या होगा? जो दंदी-फंदी हैं उनका कन्फ़्यूजन तो बस इतना है कि पढ़ने के लिए बालक को इंग्लेंड भेजना है या अमरीका। जबकि तथाकथित ईमानदार का रोना यह है कि आगे की पढ़ाई कैसे चलेगी? मकान कहाँ कैसे बन पायेगा ? या फिर सारी उम्र किराये के मकान में ही निकल जाएगी।


ये तथाकथित सत्यनिष्ठा वाले की लाइफ में 'वान्दे' ही 'वान्दे' होते हैं। 'लट जो संभालूँ तो घूँघट खुल जाये' टाइप।  बशीर बद्र साब ने कहा है ना :


                   ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है जमीं                                                                       

                    पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है


सत्यनिष्ठा वालों के अंतिम संस्कार के भी 'वान्दे' होते हैं। असत्यनिष्ठा वाले समृद्ध होते हैं अत: कितनी ही रकम दे कर अपने लिए पूरी की पूरी क़ब्र क्या मक़बरा बनवा सकते हैं। या फिर अपने महल के ही एक कोने में बढ़िया क़ब्र बनवा सकता है। सच तो ये है कि सत्य निष्ठा और समृद्धि परस्पर पूरक नहीं बल्कि विरोधाभाषी टर्म हैं। ये ऐसी थीम क्यों चुनी जाती है जिसे पढ़ कर बच्चा भी बता दे कि इस वाक्य में क्या गलती है। आपने शायद गांधी जी कीआत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’  नहीं पढ़ी है। चलो नहीं पढ़ी तो न सही पर आपने उनकी फोटो तो देखी है। बस समझ लो सत्य निष्ठा से आदमी को सारी उम्र एक लंगोटी में ही काटनी पड़ती है।


मैं किसी ऐसे समृद्ध व्यक्ति से मिलना चाहूँगा जो कह सके कि उसकी ये सारी समृद्धि सत्यनिष्ठा से आई है। सत्यनिष्ठा से तो आप कायदे के उपदेश भी नहीं दे सकते और ना ही एक सफल बाबा बन सकते हैं। आपने देखे हैं न आजकल के बाबा। ये पता नहीं किस युग में सत्यनिष्ठा से समृद्धि आती थी। मैं ऐसे असत्यनिष्ठ व्यक्तियों को जानता हूँ जिनकी हर महानगर में मकान-मढ़ैया  है। वो काका हाथरसी जी ने एक जगह कहा है ना:


                  क्यों काँप रहा रिश्वत लेकर    

                  पकड़ा जाये रिश्वत लेता

                  छूट जा रिश्वत दे कर


आज ऐसे इंसान को, बाबू को, अफसर को ज्यादा भाव नहीं दिया जाता जो ज्यादा सत्यनिष्ठा-सत्यनिष्ठा रटता रहता है। ऐसे बंदे को लोग संदेह से देखते हैं। या तो फौरन से पहले ट्रांसफर करवा देते हैं या फिर उसे खूब काम से लाद दिया जाता है। वह हरदम रोता ही रहता है। खुद भी तंग रहता है। बीवी बच्चों को भी परेशान रखता है। उन्हें लंबे- लंबे लैक्चर सुनाता है। वह एक गुड मैन  है। आपने ‘गुड मैन  दि लालटेन’ मुहावरा सुना है ना। तो बस जान लीजिये गुड मैन अक्सर 'गुड फॉर नथिंग' होते हैं। 

Wednesday, October 14, 2026

आलमआरा-मास्टर विट्ठल और जिन्ना

 


                                         


1913 में राजा हरिश्चन्द हिन्दुस्तान की पहली मूक फिल्म बनी। फिल्म का कोई भी प्रिंट आज उपलब्ध नहीं है। किन्तु छुटपुट चित्र (स्टिल) दिख जाते हैं। आप जानते ही हैं कि इसे बनाने में दादा साब फाल्के को कितनी मुश्किलें दरपेश आईं थीं। यहां तक कि फिल्म की नायिका की उन्होंने बहुत तलाश की मगर सफलता नहीं मिली। बदनाम गलियों की महिलाओं ने भी मना कर दिया था। अंतत: नायिका की भूमिका अन्ना सालुन्के नामक युवा पुरुष से करानी पड़ी। सालुन्के ग्रांट रोड के एक चाय के ढाबे पर 10/- रुपये मासिक के वेतन पर काम करता था। दादासाब फाल्के ने 15/- महीने पर उसे काम पर रख लिया। सालुन्के ने पाँच फिल्मों में भूमिकाएं महिला वेष में कीं। और तो और एक फिल्म ‘लंका दहन’ में तो उसने पुरुष और महिला दोनों पात्र (राम और सीता) की भूमिका निभाई। इस प्रकार यह भारतीय सिनेमा का पहला ‘डबल रोल’ था।   

 

अलाम आरा 1931 में आयी एक 'कस्टूय्म ड्रामा' थी। कामपुर के वृद्ध राजा की दो रानियाँ थीं—दिलबहार और नवबहार। एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि नवबहार राजा के उत्तराधिकारी को जन्म देगी, जिससे दोनों रानियों के बीच अनबन शुरू हो जाती है। इस भविष्यवाणी से क्रोधित होकर दिलबहार सेना प्रमुख आदिल को अपने प्रेमपाश में फंसाना चाहती है, लेकिन आदिल उसके प्रस्ताव को ठुकरा देता है। इससे नाराज़ होकर दिलबहार आदिल को कालकोठरी में कैद करवा देती है और उसकी छोटी बेटी 'आलम आरा' को राज्य से निर्वासित कर देती है। आलम आरा का पालन-पोषण बंजारों के बीच होता है। बड़ी होने पर वह वापस महल लौटती है और राजा के राजकुमार से उसे प्रेम हो जाता है। कहानी के अंत में बंजारों के सहयोग से महल की साजिशें और दिलबहार के षड्यंत्रों का पर्दाफाश होता है। आदिल को जेल से रिहा किया जाता है, दिलबहार को उसके किए की सजा मिलती है, और राजकुमार का विवाह आलम आरा से हो जाता है । जो एक हार के चारों ओर घूमता था। कहानी और संवाद जोसेफ डेविड की थे, जो उस समय के लोकप्रिय नाटककार थे, भाषा में उर्दू की बहुलता थी और पारसी नाटकीय शैली थी जिसमें आग़ा हश्र ने अपनाया और बढ़ाया था। फिल्म का निर्देशन अर्देशिर ईरानी ने किया था। आदिल ईरानी फोटोग्राफर थे। कलाकारों में मास्टर विट्ठल (नायक), जुबैदा, जिल्लो बाई, पृथ्वीराज कपूर, डब्ल्यू.एम. खान, इशरत सुल्ताना (बिब्बो) और जगदीश सेठी शामिल थे। जुबेदा की शादी हैदराबाद के महाराज नरसिंगीर धनराजगीर ज्ञान बहादुर से हुई थी। उनका एक बेटा था जिसका नाम हुमायूं धनराजगीर था। उन्होंने 1930 के दशक के अंत में फिल्मों से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। उनकी आखिरी फिल्म 'निर्दोष अबला' थी, जो 1949 में आई थी। उनकी फिल्मोग्राफी के हिसाब से उन्होने 66 से अधिक फिल्मों में काम किया। यहाँ ये उल्लेखनीय है कि ज़ुबेदा नवाब सिदी इब्राहिम और फातिमा बेगम की संतान थी। फातिमा बेगम खुद फिल्म निर्देशक, प्रोड्यूसर और स्क्रीन प्ले राइटर थी।

                                         


मास्टर विट्ठल (1906-1969) इन सभी में सबसे महंगे नायक थे। उनकी पगार एक हजार रुपये प्रति माह थी। आलम आरा  14 मार्च 1931 को बॉम्बे में रिलीज़ की गयी थी।  मैजेस्टिक थिएटर में भीड़ और भीड़ का जोश देखने लायक था। फिल्म की पब्लिसिटी भी अद्भुत ढंग से की गई थी। मूक फिल्मों से तुलना करते हुए लिखा गया था कि 'तस्वीर बोल उठीं हैं'। 'पात्र जिन्दा हो गये हैं' आदि।  शो दोपहर 3 बजे का था लेकिन सुबह से ही भीड़ जमा हो गई थी। भीड़ को रोकने के लिए पुलिस को बुलाना पड़ा। टिकट 50 रुपये के प्रीमियम पर ब्लैक में बेची जा रही थी। अर्देशिर ईरानी ने शो शुरू होने से पहले एक छोटा सा भाषण भी दिया। इस फिल्म में 12 गाने थे, विशेष रूप से दो गाने एकदम हिट हो गये। " बदला दिलवायेगा या रब तू सितमगरों से..." ज़ुबैदा (नायिका) पर फिल्माया और उन्हीं के द्वारा गाया "दे दे खुदा के नाम पर प्यारे , ताकत है अगर देने की"। यूं कहने को अलामारा की 14 मार्च 1931को रिलीज़ से पहले पहला गीत कलकत्ता के मदन थिएटर का था, जिसे 4 फरवरी 1931 को बॉम्बे के एम्पायर थिएटर में प्रदर्शित किया गया था। इस गीत को मुन्नी बाई ने गाया था। "अपने मौला की मैं जोगन बनूँगी"

1931 की अलामारा ने अन्य फिल्म निर्माताओं को इतना प्रेरित किया कि एक और अलामारा 1956 में बनायी गयी थी। तीसरी आलमआरा  1973 में बनाई गई।  दोनों (1956, 1973) का निर्देशन नानूभाई वकील ने किया था। आश्चर्यजनक रूप से, 1931 के आलमारा के अभिनेता  वजीर मोहम्मद खान ने 1956 आलमारा और 1973 आलमारा में भी अपनी भूमिकाएं दोहराई। आलमारा 1931 में पृथ्वीराज कपूर, इशरत सुल्ताना (बिब्बो), सोहराब मोदी, जगदीश सेठी, मास्टर विट्ठल और जुबैदा ने अभिनय किया था। 29 वर्षीय वजीर मोहम्मद खान  ने वृद्ध फकीर की भूमिका निभाई थी। अपना गीत "दे दे खुदा के नाम पे प्यारे ताकत है कुछ देने की" गाया था।

आलमआरा 1956, में चित्रा, दलजीत और डब्ल्यू.एम. खान (फकीर) थे।

आलमआरा 1973 में नाजिमा, अजीत, जयराज और डब्ल्यू.एम. खान ने अभिनय किया।

आलमआरा ने ऐसा तूफानी ट्रैंड चलाया कि 1931 में ही 28 टॉकी फिल्में बनीं/रिलीज़ हुईं। जैसे शकुंतला, दौलत का नशा, गृह लक्ष्मी। इनमें हिंदी फिल्में (23) बांग्ला (3) तमिल (1) तेलुगू (1) थी।

1932 में बोलती फिल्मों का प्रोडक्शन लगभग दोगुना हो गया।  

पहली बोलती फिल्म के नायक थे मास्टर विट्ठल, जिन्होंने अपनी शुरुआत  एक बाल कलाकार के रूप में की थी। बाद में बाबूराव पेंटर की मदद से उनको मूक फिल्में एक के बाद एक मिलतीं गईं। वे अपने वक़्त के खूब पाॅपुलर नायक थे। वे बाद में विजय और शंकर भट्ट भाईयों और शांति लाल दवे के स्टूडियो शारदा स्टुडियो में शामिल हो गये थे। उन्होंने सुवर्ण कमल 1926, हीरा सुंदरी 1928 चिराग-ए-कोहिस्तान 1929।  मास्टर विट्ठल कसरती बदन के पहलवान टाइप व्यक्ति थे। फिल्मों में स्टंट भूमिकाएं भी उन्होंने निभाईं। जब पता चला अर्देशर ईरानी अपनी बोलती फिल्म के लिये नायक की तलाश में हैं तो सभी (प्रमुख प्रतिस्पर्धी थे महबूब खान) इस ऐतहासिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना चाहते थे। जब वे सागर मूवी टोन (अर्देशर ईरानी) के  आलम आरा 1931 प्रोजेक्ट का हिस्सा बने तो  शारदा स्टूडियो (जिसके अनुबंध में वे थे) ने उनके खिलाफ मुकदमा कर दिया।  उनके मामले का बचाव किसी और ने नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना ने किया था। मास्टर विट्ठल ने केस जीत लिया । लेकिन जल्द ही उनको अपनी गलती का एहसास हो गया। उनकी जो भी ख्याति, महिमा और स्टारडम था वह मूक फिल्मों का था। यहां उन्हें न केवल डाॅयलाॅग बोलने थे बल्कि गीत भी गाने थे। उनका उच्चारण मराठी बहुल था। गीत गाने के लिये सर्वथा अयोग्य साबित हुए। दरअसल उनकी स्टंटमैन की छवि मूक फिल्मों की देन थी। कुछ और फिल्मों के बाद उन्होंने फिर मराठी फिल्मों का रुख कर लिया। आलमआरा में भी उनकी खराब हिन्दी और खराब डाॅयलाॅग डिलीवरी के कारण पूरी फिल्म में जादू के असर से उन्हें बेहोशी, अर्ध चेतन/ट्रान्स की हालत में दिखाया गया था। यूं उन की तुलना हाॅलीवुड के अभिनेता डगलस फेयरबैंक्स से की जाती थी।

                                       


मास्टर विट्ठल 1924 से मूक/ मराठी सिनेमा में सक्रिय रहे थे। रतन मंजरी (1926) में मुख्य भूमिका निभाने से पहले एक फिल्म तकनीशियन और नर्तक के रूप में भी उन्होंने काम किया था। मूक स्टंट फिल्मों में शानदार भूमिकाएं की थीं जिसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया था। जब 1956 में बाॅम्बे में भारतीय सिनेमा की सिल्वर जुबिली (25 बरस) मनाई गई तब वे और उनकी नायिका ज़ुबेदा विशेष अतिथि थे। उसके बाद 1966 में अपनी अंतिम फिल्म तक उन्होंने हिन्दी फिल्मों की तरफ पलट कर नहीं देखा।

                                  


1924 से 1966 तक के अपने 42 साल के करियर के दौरान वे 90 से अधिक फिल्मों में दिखाई दिए, दो फिल्मों का निर्देशन भी किया, और एक फिल्म के लिए संगीत की रचना भी की। हिन्दी फिल्मों की बात करें तो मास्टर विट्ठल, 1944 की ब्लॉकबस्टर फिल्म रामशास्त्री में एक साइड रोल में नज़र आये थे। उनकी आखिरी मराठी फिल्म 1966 में थी।