Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Sunday, June 14, 2026

संस्मरण: टूटत टूटत पुनः - विक्टोरिया मैस-शास्त्री-कर्तव्य भवन

  


यह बात सन 1960 के आसपास की होगी। जहां शास्त्री भवन खड़ा है तब उस रोड का नाम डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड नहीं था बल्कि विक्टोरिया रोड था। जहां शास्त्री भवन बना वहाँ बैरक्स थीं और नाम था विक्टोरिया मैस। तब इस इलाके मेन तीन मैस हुआ करतीं थीं। एडवर्ड मैस जहां निर्माण भवन आदि बने, वह रोड भी तब एडवर्ड रोड कहलाती थी। कालांतर में उस रोड का नाम बादल कर मौलाना आज़ाद रोड कर दिया गया कारण मौलाना आज़ाद उसी रोड के एक बंगले में रहते थे जहां फिर विज्ञान भवन बना। विक्टोरिया मैस आपको बता चुका हूँ जहां डिफेंस के कुछ दफ्तर/रिहायशगाह थी। इसी पर आगे चल कर डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर ही सेंट्रल विस्टा मैस थी। वहाँ भी बैरक्स थीं। तीन-चार शोप्स भी थीं। जो परचून की हलवाई की और एक मीट की दुकान थी। एक साइकिल रिपेयर शॉप भी थी।

 

तब 15 जनपथ के दी टी यू बस स्टेंड का नाम विक्टोरिया मैस हुआ करता था। जनपथ और डॉ राजेंद्र प्रसाद रोड की जो क्रॉसिंग है वहाँ पहले एक गोल चक्कर (राउंड एबाउट) हुआ करता था जिसके अंदर घास हुआ करती थी। इसी क्रोस्स सेक्शन पर दो पान वाले और दूसरी टरग एक मोची बैठा करता था। जनपथ वाली साइड पर एक तरफ बहुत से नाई अपनी सन्दूकची लेकर बैठे रहते थे तो दूसरी ओर एक अच्छा खासा टेकसी स्टेंड हुआ करता था। सन 1960 की आसपास की ही बात है मुझे प्री स्कूल बोलो के जी बोलो में दाखिल कराया गया था। वह स्कूल एक कमरे में 1एसटी फ्लोर पर चला करता था। अज़ाब रिवाज था उसमें या कह लो अभी देश आज़ाद हुए बहुत साल नहीं हुए थे क्लास के मुहाने पर एक क्लास का बालक खड़ा रहता और टीचर के आता देख ज़ोर से पुकारता “क्लास स्टेंड अप” इस पर क्लास अपनी अपनी जगह खड़ी हो जाती और पूरे जोश से बोलती “ जयहिंद” एक बार क्लास्स स्टेंड अप कहने की मेरी भी बारी आई थी। तीस पर टीचर ने मुझे गोद में उठा प्यार किया था। ये किस्सा मैंने विधिवत घर आकार माता जी को सुनाया था। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे की घोषणा कर दी गयी की यह स्कूल शिफ्ट हो रहा है। बस फिर क्या था देखते-देखते विक्टोरिया मैस टूटने लगा और फिर शास्त्री भवन बन कर तैयार हुआ। वहाँ पर पहली बार सतीश गुजराल जी का मुराल देखने को मिला। स्कूल शिफ्ट होकर सतीश कुमार या चंद सांसद जी के बंगले में 2 रायसीना रोड पर आ गया। बंगले में अंदर नहीं बल्कि बंगले के बरामदे और लोन में। क्लास चलाने लगीं। जब सतीश कुमार/चंद चुनाव हार गए तो यह स्कूल जा पहुंचा उसके पीछे धोबीघात के इलाके में। फिर वहाँ से भी जल्द ही विस्थापित कर दिये गए क्यों की वहाँ दिल्ली सरकार के ग्लाइट बनाने लग पड़े थे। अब वहाँ आदित्य सदन खड़ा है। आदित्य जी से मुराद षड दिल्ली के उप-राज्यपाल से रही। यह स्कूल वहाँ से शिफ्ट हो कीलिङ्ग लें में आया वह भी एक पार्क में टेंट में। बस तब मैंने और मटा पिता अदोनों ने समवेत स्वर में तौबा कर ली। अतुल ग्रोव रोड पर पी एंड टी प्राइमरी स्कूल था। हाम्रा दाखिला वाहा करा दिया गया था। तब हम तीन भाई उसमें जाने लगे। मैं सीधा फोर्ट स्टैंडर्ड में, जबकि मैंने केवल दूसरी जमात पास की थी। गो की तीसरी क्लास कभी गए ही नहीं। छोटा भाई शायद दूसरी क्लास में था और उससे छोटा शायद के जी टाइप।

 

डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर लोकप्रिय सांसद  तारकेशवरी सिन्हा रहा करती थीं। जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय भी डॉ राजेंद्र प्रसाद रोड पर ही रहा अरते थे। यूं डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर जगजीवन राम, मोरारजी देसाई और एस के पाटील भी रहे। साथ ही सी वी सी का ऑफिस और निर्वाचन आयोग भी बहुत दिनों तक डॉ राजेन्द्र प्रसाद के ही एक बंगले से संचालित हुआ था। इस रोड से पैदल चल कर या बाद में साइकिल पर चल कर हैदराबाद हाउस मटन लेने जाते थे। वहाँ मटन की एक दुकान थी।

 

जब सुना शास्त्री भवन टूट रहा है और अब वहाँ कर्तव्य भवन की शाखा खुलेगी तो अनायास ही याद हो आया...ओल्ल्द ऑर्डर छेंजेस गिविंग वे तो न्यू। पृत्वी वही है आदमी अपने अपनी ज़रूरियात और फेनसी के कारण बनाता-तोड़ता-बनाता रहता है और खुश होता रहता है। वह मालिक समझने की भूल करता रहता है हर युग में और इतनी सी बात समझ नहीं लगती की हम सब किरायेदार हैं वो एक शेर है ना :

 

                               अपनी तो उससे यारी है

                               जिसकी दुनिया सारी है

 

( अब डॉ राजेन्द्र प्रसाद के एक हिस्से में नेशनल आर्काइव का बड़ा दफ्तर खुल गया है पहले केंद्रीय सचिवालय को बड़ा दफ्तर कह बुलाया जाता था। जहां बाबू जगजीवन राम, मोरारजी देसाई और एस के पाटिल रहे थे वह और सेंट्रल विस्टा पहले ही कर्तव्य भवन बन गए  हैं । पी. एंड टी. स्कूल प्राइमरी से टेन प्लस टू बन गया है। यूं जब हम पी.एंड टी. में पढ़ते थे तब ही किदवई भवन और खुर्शीद लाल भवन बने थे।)

 

व्यंग्य: फर्ज़ी ब्रिगेडियर

 


खबर है कि एक नकली ब्रिगेडियर पकड़े गए हैं। वह नवयुवक मात्र 21 बरस का है। केवल वर्दी ही नहीं बल्कि उसके पास से नकली आई कार्ड, दो अदद बाउंसर, एक ड्राइवर जो था तो असली ड्राइवर मगर उसका आई कार्ड नकली था। एक हैरियर गाड़ी, सायरन, नकली पिस्तौल और रेजिमेंटल केन भी उसने कबाड़ राखी थी। बाकी जो है सो है, पर देखिये 21 बरस के बंदे ने रिसरच पूरी कर राखी थी। बारीक से बारीक। लोचा बस एक था कि वह 21 वर्षीय ब्रिगेडियर बना हुआ था जबकि फौज में उससे अधिक बरस की सिनियोरिटी के बाद कोई ब्रिगेडियर बनता है। यहाँ उससे चूक हो गयी। अब ये नहीं पता कि यह नकली ब्रिगेडियर बनके उसने क्या क्या लाभ उठाया।

 

पता ये भी चला है कि वह नीट में भी दो बार फेल हुआ है।  अब वह इतनी धन संपत्ति तो रखता था कि उसने वर्दी सिल्वा राखी थी, दो-दो बाउंसर जिन्हें वह एन एस जी कमांडो बताता था एक अदद महंगी कार और ड्राइवर। ऐसा समझो ये उसका इनवेस्टमेंट था अब इनवेस्टमेंट किया था तो कुछ तो रिटर्न भी रहा होगा। वह क्या था इसकी तफसील नहीं मिली है। वह अपने रेंक को खूब एंजॉय कर रहा था। यहाँ-वहाँ अपनी खातिर-तवज्जोह करा रहा था।

 

इतनी उम्र में उसे कैप्टेन बनाना था ना कि सीधे ब्रिगेडियर ही बन जाना था। जनरली ऐसे केस आते रहे हैं मसलन कोई नकली सिपाही बन जाता है या ज्यादा से ज्यादा दरोगा। इसी तरह नकली आयकर वाले क्षेत्र में भी या तो महज़ इंस्पेक्टर या हद से हद आयकर अधिकारी बन जाता है। जैसे फिल्मों में दिखाया जाता है नकली सी.बी.आई. अधिकारी। पर ब्रिगेडियर तो कुछ ज्यादा हो गया। अब ये हो सकता है कि उसने दोस्तों से कोई शर्त लगाई हो। भाई छोटे-मोटे रेंक और ओहदे वाले तो रोज़ ही कहीं ना कहीं पकड़े ही जाते हैं जैसे रेलवे के टी।टी। बन, टाई-कोट पहन रेल यात्रा कराते रहना। नकली विधायक, नकली रेलवे अधिकारी बन फ्री यात्रा करना। या रेलवे में नौकरी दिलाने की ठगी करना। शादी की मार्किट में ऐसे फ़्रौड खून चलन में हैं। मैं एक केस को जानता हूँ जहां लड़के (भावी दूल्हे) को स्टेडियम का मैनेजर बताया गया जबकि वह था डेली वेज वाला माली। कागजात नकली होते थे, बाद में पूरे के पूरे दफ्तर नकली, थाना, बैंक, कोर्ट सब नकली। आप इस-उस की डिग्री को नकली बताते फिरते हो यहा पूरा का पूरा ब्रिगेडियर ही नकली निकला। दुल्हन नकली निकाल रही है वह दूसरे दिन ही लूट-लाट के ये जा वो जा।

 

मार्किट में कितने नकली डॉ., नकली बाबा भरे पड़े हैं। यह देश है वीर मुन्ना भाईयों का, मुल्क में बंटियों का, बबलियों का बोलबाला है। बस अब तो  कसर ये रह गयी है कि कहीं संसार में कोई पूरा का पूरा मुल्क ही नकली ना निकल आए       

 

व्यंग्य: मैं कंप्रोमाइज्ड हूँ

 

 

          किशोर कुमार जी का एक लोकप्रिय गीत है “मैं हूँ  झुम-झुम-झुम झुमरू फक्कड़  घूमूँ बन के घुँमरू...”   बस मैं भी कुछ इसी तर्ज़ पर कंप्रोमाइज्ड हूँ। यह एक पॉज़िटिव कांसेप्ट है। पहले कंप्रोमाइज़ होने को/कंप्रोमाइज़ करने को अच्छा माना जाता था। पता नहीं कब में यह निगेटिव हो गया। जब आप कहते हैं “प्यार बांटते चलो...  हो...  क्या हिन्दू क्या मुसलमान सब हैं भाई भाई। इस में भी इसी कंप्रोमाइज़ की बात कही गयी है।  कंप्रोमाइज़ की महिमा बताई गयी है।


पता नहीं ये बावेला क्यूँ मचाया हुआ है। फलां कमीशन कंप्रोमाइज़ है...ढिकानी एजेंसी कंप्रोमाइज़ है। भाई आप अपनी बताओ? यह देश-काल के अनुरूप शब्द अपने अर्थ बनाते-बिगाड़ते रहते हैं। अब देखो एक शब्द है 'राजीनामा', हिन्दी में इसका अर्थ है सहमत होना, कुट्टी खत्म और अब्बा हो गयी। लेकिन मराठी में इसका अर्थ है त्यागपत्र दे देना। अतः ऐसा ही कुछ इस टर्म के साथ है।  कंप्रोमाइज़ हो जाने को हाथों हाथ ले लेना चाहिए था। क्या पति-पत्नी कंप्रोमाइज़ नहीं करते। क्या मित्र लोग आए दिन नाराज़ होते  और कंप्रोमाइज़ नहीं करते। ये इंग्लिस में कुछ तो लोचा है। लड़ाई हो जाये। तलाक़ का मुकदमा दायर कर रखा हो तो अगर कंप्रोमाइज़ हो जाये तो कितनी खुशी होती है। चलो जी कंप्रोमाइज़ हो गया। कोर्ट भी बढ़ावा देते हैं कि आउट ऑफ कोर्ट ही कंप्रोमाइज़/सेटलमेंट हो जाये। उनका एक केस कम हो जाएगा। हम बच्चे थे तब भी कहा करते थे लड़ाई-लड़ाई माफ करो कुत्ते की .... यह क्या है ? यह और कुछ नहीं महज़ कंप्रोमाइज़ है।


मैं  अपने आपको कंप्रोमाइज़्ड मानता हूँ। दूसरों की मदद को सदैव सहर्ष तैयार रहता हूँ। कोई गाइडेंस मांगे मैं जेनुइन सलाह देता हूँ। कोई पूछे तो किसी भी विषय के इंपोर्टेन्ट सवाल ‘ऑफ-हेंड’ बता देता हूँ। किसी का भी किसी भी परीक्षा के लिए 'मेंटर' बनने को राज़ी हूँ। ठीक-ठाक लिख-लिखा लेता हूँ। पता नहीं लोग ये क्यूँ कहते हैं कि सरकार और देश दो अलग अलग चीज़ें हैं। अगर ऐसा है तो जब भी सरकार के विरुद्ध कोई धरना/प्रदर्शन होता है नुकसान अंग्रेजों के ज़माने से देश की संपत्ति का ही करते आए हैं। जैसे रेल / रेल की पटरी/ थाना जला देना/ पोस्ट ऑफिस लूट लेना। वाहनों की तोड़ फोड़ करना। ये सब देश के ‘असेट’ हैं न कि किसी सरकार विशेष के। कहनेवाले सी.बी.एस.ई. को भी कंप्रोमाइज्ड बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन कहने लग पड़े हैं। रही बात ‘नीट’ की, (नेशनल एलिजिबिलिटी-कम- एंट्रेस टैस्ट' में कहीं   कंप्रोमाइज़ नहीं आता है। अत: 'सी' से कॉकरोच आया है। 'सी' से कॉकरोच 'सी' से कंप्रोमाइज़। यह ऐसी कोई खराब बात भी नहीं। आप जान नहीं रहे हैं, सच तो ये है हम सब कंप्रोमाइज्ड हैं, पाॅश्चराइज़्ड हैं, फाॅसिलाइज़्ड हैं।


शेक्सपियर ने लिखा है:


       "एज़ फ्लाईज़ टू वान्टन बाॅयज़ आर वी टू दि गाॅड्स, दे किल अस फाॅर देयर स्पोर्ट"

(जैसे शरारती लड़कों के लिये मक्खियां होती हैं वैसे ही देवताओं के लिये हम हैं; वे अपने मनोरंजन के लिए हमें मार डालते हैं)

Friday, June 12, 2026

व्यंग्य: ब्रिटेन में बेडमिंटन खेलत नंदलाल

       

कोई अगर न्यायिक अधिकारी बन जाये तो इसका अर्थ ये तो नहीं कि वह खेलकूद बंद कर दे। वह भी इंसान है। उसका भी दिल करता होगा कि वह स्पोर्ट्स खेले। ज्यादा कुछ करना भी नहीं है कारण कि ये एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट भर जाना है। बोले तो कोर्ट (न्यायालय) से बेडमिंटन कोर्ट। क्या आप नहीं चाहते कि आपके न्यायिक अधिकारी साहिबान हृष्ट-पुष्ट रहें। बोले तो एकदम फिटफ़ाट रहें। आपने सुना नहीं एक सेहतमंद ज़िस्म में ही एक सेहतमंद दिमाग का वास होता है। स्पोर्ट्स हम सब के लिए एक जरूरी चीज़ है। वरना समझ लो क्या होगा। अच्छा है चिड़िया (शटलकाॅक) को ही इधर से उधर फेंकें अगर ये आपका केस हुआ तब। अब कुछ लोग तो ये भी कह रहे हैं कि इससे शटल कॉक


फेंक-फेंक केस फेंकने में आसानी हो जाएगी। एक बात बताईये मुकदमे आप लड़ें और दोष जुडियशरी का कैसे हो गया? अगर करोड़ों केस पेंडिंग हैं तो ये महाराज आपकी गलती है ना कि कोर्ट की। वो तो बेचारे निपटा ही रहे हैं, जितने केस निपट जाएँ। आप ही लोग लड़ाके किस्म के हैं जो जरा-जरा सी बात पर कोर्ट भागते हैं और फिर भिनभिनाने लगते हैं तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख।


देखिये ये बेडमिंटन ही है जिसे सभी, क्या बूढ़े, क्या जवान खेल सकते हैं। हद से हद क्या होगा आप हार जाएँगे पर वो भी तो खेल का हिस्सा है। एक हारेगा तभी न दूसरा जीतेगा। सर्विस उठी या नहीं उठी इसका कोई मतलब नहीं है। इस बार नहीं उठी अगली बार उठेगी।


               लंदन आवत जात से साॅउथहाॅल पर पड़त निशान


 उस से अगली बार उठेगी। कब तक शटल कॉक (चिड़िया) नहीं उड़ेगी। बेडमिंटन की एक बात मुझे सबसे अच्छी लगती है और हो न हो इसलिए इसे चुना गया होगा इस में 'लव-ऑल' आता है। बाकी फिर टेनिस में है अब टेनिस कुछ ज्यादा भागा-दौड़ी मांगता है। मैं इस बात को नहीं मानता कि अब से 'बार' के या 'बेंच' के दो खेमे हो जाएँगे और केस देने से पहले पूछने लगेंगे कि केस बेडमिंटन वाले वकील को देना है या फिर...। एक बेडमिंटन कोर्ट ने पूरे कोर्ट को दो भागों में बाँट दिया है। 'बेडमिंटन-वकील' और 'नॉन बेडमिंटन-वकील'। हो सकता है कुछ वकील लोग अपने अपने क्लाइंट को कहने लगें कि अभी तो जेट-लैग में चल रहा हूँ। लंदन में बेडमिंटन कुछ ज्यादा ही हो गया। वो तो अच्छा हुआ कि आसपास पेरिस-रोम वगैरा घूमने से थोड़ा चित्त शांत हुआ है।


मेरा तो ये अनुरोध है कि इस प्रकार के टूर्नामेंट दुनिया के इसी तरह के अच्छे अच्छे देशों में कराये जाया करें। कभी बेडमिंटन, कभी क्रिकेट, कभी टेनिस, कभी चैस, कभी खो-खो। अगली बार वाइस चांसलर्स को भेजा जाये। फिर अन्य स्तंभों को। सुना है मैच बार और बेंच के बीच होगा। न जाने कितने 'बार' वाले तो बेंच से हारने में ही अपना फ्यूचर देखने लगेंगे। मोटा-मोटा ये समझ लें कि ये जो शटल काॅक है वह फरियादी है। उसे कभी बार वाले बेंच की तरफ फेंकेंगे कभी बेंच वाले बार वाले की तरफ। इसी तरह


                          हँसते-हँसते कट जाएँ रस्ते


वे लोग जरूर कुढ़ रहे होंगे जो या तो बेडमिंटन खेलना नहीं जानते या फिर जिन्होंने लंदन नहीं देखा। इससे स्पोर्ट्स खासकर बेडमिंटन को बड़ा प्रचार-प्रसार मिलेगा। यह स्पोर्ट्स की सेहत के लिए जरूरी है। बस अब 'लव-ऑल' और 'गेम-पॉइंट' आदि के बारे में पढ़ाई शुरू कर दें। क्या पता कब आप टीम में शामिल हो जाएँ और लंदन की फ्लाइट में दिखें।


 कुछ तो अपने चेम्बर में बेडमिंटन का बल्ला बोले तो रेकिट रखना शुरू कर देंगे। पता नहीं कब शॉर्ट नोटिस पर जाना पड़ जाये। जैसे न्याय के लिए कहा जाता है कि न्याय न केवल करना चाहिए बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। बस उसी तर्ज़ पर बेडमिंटन न केवल आपको आना चाहिए बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए कि आप बेडमिंटन खेल सकते हैं। बस चिड़िया (शटल-काॅक) को समझें यह आपका क्लाइंट है फिर सब आसान हो जाएगा।                        

 

Thursday, June 11, 2026

दि हिस्ट्री ऑफ एंग्लो-इंडियन्स

 

                                      


दि हिस्ट्री ऑफ एंग्लो-इंडियन्स एक ग्राफिक उपन्यास है। यह मूलतः एक ऐतिहासिक पुस्तक है। मैंने हाल ही में इसे पढ़ा। इस पुस्तक को कीथ बटलर और हैरी मैक्ल्युर, दोनों एंग्लो-इंडियन लेखकों ने लिखा और चित्रित किया है। यह पुस्तक इतनी दिलचस्प है कि इसे शुरू करने के बाद बिना पूरी पढ़े आप इसे छोड़ नहीं सकते। यह पुस्तक अपनी कॉमिक्स-टाइप स्टोरीलाइन के कारण आपकी आँखों और मस्तिष्क, दोनों पर सहज प्रभाव डालती है।



इस पुस्तक ने मेरे अनेक ‘डाउट’ साफ करने में मदद की है। मैं अपनी अज्ञानता में सोचता था कि एंग्लो-इंडियन वे व्यक्ति होते हैं, जिनके माता-पिता, दादा या परदादा में से कोई एक ब्रिटिश रहा हो, लेकिन यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि उनके पूर्वज पुर्तगाली, फ्रांसीसी या डच भी हो सकते हैं। वे भी एंग्लो-इंडियन ही कहलाते हैं।
यह पुस्तक न केवल एंग्लो-इंडियनों के इतिहास और भूगोल का विवरण देती है, बल्कि उनके समाजशास्त्र और नृविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) का भी विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करती है। मुझे यकीन है कि यह पुस्तक स्वयं एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए भी अनेक दृष्टियों से शिक्षाप्रद सिद्ध होगी, विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए, जिसे अपने इतिहास, विरासत और आनुवंशिकता को जानने का एक सरल माध्यम प्राप्त होगा।
मैं लेखक-द्वय के कार्य से प्रभावित हूँ। हैरी मैक्ल्युर एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सम्मानित सेलिब्रिटी हैं। भारत में पारसियों के इतिहास तथा अन्य जातीय समूहों और अल्पसंख्यक समुदायों पर बहुत-सी पुस्तकें उपलब्ध हैं, लेकिन एंग्लो-इंडियनों पर प्रामाणिक सामग्री का अभाव है। विकास कुमार झा द्वारा लिखित मैक्लुस्कीगंज पर मैंने एक पुस्तक पढ़ी थी, जो हिन्दी में है। वह अब ‘भूतिया शहर’ मैक्लुस्कीगंज का एक प्रामाणिक विवरण मानी जाती है।


भारत के निर्माण में एंग्लो-इंडियनों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। आप किसी भी ऐसे क्षेत्र का नाम नहीं ले सकते, जिसमें कोई न कोई एंग्लो-इंडियन चमकदार सितारे की तरह न चमका हो। चाहे वह भारतीय फिल्मों का क्षेत्र हो, राजनीति, शिक्षा, साहित्य या संगीत का। भारतीय रेलवे रोजगार के लिए उनकी पहली पसंद हुआ करती थी। रेलवे के पुराने कर्मचारियों के बीच एंग्लो-इंडियनों के अनेक किस्से मशहूर रहे हैं। उन्हें अपने काम, अपने रोजगार और अपनी जीवनशैली पर गर्व होता था। उनकी वफादारी और जीवनशैली दूसरों के लिए ईर्ष्या का विषय होती थी। 1947 तक आते-आते उनमें से अनेक परिवार ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड चले गए।
मैं सत्तर वर्ष का हूँ और दिल्ली में रहता हूँ। मैंने भारतीय संसद में फ्रैंक एंथनी को थ्री-पीस सूट और उनकी पसंदीदा टाई में भाषण देते देखा है। मैं दिल्ली के फ्रैंक एंथनी पब्लिक स्कूल भी एक-दो बार गया हूँ। मैंने अपनी बेटियों के लिए इस स्कूल में प्रवेश दिलाने का असफल प्रयास किया था। स्कूल की लॉबी में फ्रैंक एंथनी एस्क्वायर का एक आदमकद तैलचित्र शोभा बढ़ाता है।


प्रथम दृष्टया यह पुस्तक 1150 रुपये की महंगी प्रतीत हो सकती है, लेकिन उत्कृष्ट गुणवत्ता वाला चमकदार कागज और सुंदर चित्र, जिनमें बारीक विवरण दिए गए हैं, इसकी कीमत को उचित ठहराते हैं। प्रकाशक एंग्लो-इंक बुक्स, चेन्नई, ऐसी कलात्मक और ऐतिहासिक महत्व की उत्कृष्ट कृति को प्रकाशित करने के लिए सराहना के पात्र हैं। कीथ बटलर और हैरी मैक्ल्युर ने संयुक्त रूप से इतिहास और विरासत प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज रचा है। अब यह सभी पुस्तक प्रेमियों तथा इतिहास और विरासत के संरक्षकों का कर्तव्य है कि वे इसे भावी पीढ़ियों के लिए संजोकर रखें।

व्यंग्य: आप दो आपके दो

 

  

परिवार नियोजन के टाइम पर हमारे देश में एक नारा बहुत चला था - हम दो हमारे दो। तब आज की तरह नहीं था। 5-7 बच्चे होना ईश्वर का प्रसाद समझा जाता था। अतः इसीलिए पहले नारा दिया था 'दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे'। इसमें दिक्कत यह थी कि लोग समझे दो और तीन को जोड़ कर अर्थात पाँच बच्चे करने हैं। यह नई राष्ट्रीय पॉलिसी है। इसके बाद सिर्फ दो बच्चे वाला नारा मार्किट में लाया गया। अब तो ज़माना बिल्कुल बदल गया है। अव्वल तो अब शादी ही नहीं करनी होती। शादी अगर जैसे-तैसे हो भी जाये तो बच्चे नहीं करने। बच्चे करने हैं तो बस एक।

 

जो बात दो में है वह ना एक में है ना तीन में। आप अपने आसपास नज़र दौड़ाएँ सब चीज़ जोड़े से बोले तो दो होती हैं। दो आँखें, दो हाथ, दो पैर। इससे आगे बढ़ो तो देश-विदेश, रात-दिन, प्रोज-पोयट्री, लेखक-पाठक, दोस्त-दुश्मन। यह दो का अंक ऊपर से ही लिख कर 'आयेला' है। इसलिए सब चीज़ आप पाएंगे जोड़े/जोड़ी से ही हैं। क्या जीवन क्या मृत्यु। क्या पति क्या पत्नी, क्या प्रेमी क्या प्रेमिका। आप देखो ना पढ़ाई में भी टैन प्लस टू है। गोया कि इसमें भी दो है। फिर क्या बी.ए. क्या एम.ए. क्या बी.ई., क्या सी.ए.। अब यह गुरु-शिष्य परंपरा है ही ऐसी। क्या क्लास रूम-क्या कोचिंग। ये 'लड़की तीन कपड़ों में चाहिए' को भी बदल कर दो कपड़ों में कर देना चाहिए। ओढ़नी अब कौन पहनता है। यह केवल कस्ट्यूम ड्रामा/फिल्मऔर फिल्मी गीतों में रह गयी है।  दो ही दिन तो जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं एक दिन इस संसार में आने का दूसरा इस संसार से विदा का। अद्भुत बात ये है कि दोनों के बारे में ही आदमी बेखबर रहता है। ये तो दूसरे ही हैं जो खुशी या ग़म मना रहे होते हैं। अब विपदाओं को ही देख लो या तो सूखा पड़ता है या बाढ़। तीर है तो कमान है। राइफल है तो गोली है। सब जोड़े से है। तलवार है तो म्यान है। डॉ. है तो मरीज़ है।

 

यह दो का अंक का इतना विकास हुआ है इतना विकास हुआ है कि लोग दो जून की रोटी कमाने को मारे-मारे घूमते हैं। 'प्रेम गली अति साँकरी जा में दो ना समाय'। किसी को बेकार का साबित करना होता है तो उसे दो कौड़ी का बताया जाता है। यूं कहने को एक कौड़ी का अथवा एक फूटी कौड़ी का भी कहा जा सकता है। पर दो कौड़ी का कहने का ही रिवाज है। यहाँ तक तो ठीक था पर सोचो दो की महिमा कितनी है कि मानहानि के मुकदमे भी दो करोड़ के ही होने लग पड़े हैं हालांकि ये हानि आराम से एक करोड़ अथवा तीन करोड़ की  हो सकती थी। पर जो बात दो में है वह एक-डेढ़ में या ढाई-तीन में नहीं। दो की महिमा ही निराली है।

ना कैसे कहें


 

ऐसी एक लोकप्रिय कहावत है "अगर कोई भद्र महिला 'ना' कहती है, तो उसका मतलब होता है 'शायद', अगर वह शायद  कहती है, तो इसका अर्थ होता है 'हाँ' और अगर वह हाँ कहती है, तो वह भद्र महिला है ही नहीं। यदि कोई राजदूत (डिप्लोमैट) हाँ कहता है, तो इसका मतलब है शायद, अगर वह शायद कहता है तो इसका मतलब होता है नहीं और अगर वह नहीं कहता है, तो वह राजदूत है ही नहीं " आप क्यों कि  राजदूत (डिप्लोमैट) नहीं हैं अत: आईये  हम अपने दौर की एक बड़ी समस्या पर ध्यान दें कि गैर-अपमानजनक और सुखद तरीके से 'ना' कैसे कहें। हम खुद को कई बार एक ऐसे गतिरोध, मानसिक, सामाजिक दबाव में पाते हैं जहां हमारा एकमात्र जवाब 'ना' होना चाहिये  फिर भी हम संकोच करते हैं, परिणामों की शंका/ आशंका हमारी दृष्टि धुंधला देती है, हमारे निर्णय को बदल देती है और हमारी जीभ को अकड़ा देती है। वास्तव में, यह आपकी गलती नहीं है, हम सभी एक ऐसे वातावरण के  पले बढ़े हैं जहां सकारात्मकता सर्वोच्च हुआ करती थी। सामाजिक रूप से हम हाँ / हां जी वाली संस्कृति के हैं।

 

आइए हम उन स्थितियों पर चर्चा करें जहां आप केवल एक ही जवाब 'ना' देना चाहते हैं। वह एक मुखर उत्तर है, फिर भी आपको 'ना' कहना वह भी पॉइंट ब्लैंक रेंज से कहना बहुत मुश्किल लगता है। यहाँ उन तरीकों की चर्चा करेंगे जिनसे आप सामने वाले को इस तरह ना कह सकें जिससे दोनों का सम्मान बना रहे। कमसेकम आपका तो जरुर ही बना रहे कारण आपके लिये सम्मान से और भी अधिक दांव पर होता है। आपकी रेपुटेशन, आपकी जाॅब-सिक्युरिटी, आपके लिये ना कहने के कुछ सुझाव हैं जिनका सहारा ले आप थोड़े सुविधाजनक तरीके से 'ना' कह सकते हैं:

1.    पहली बार में ही 'फेवर' चाहने वालों को 'ऑब्लाइज़न करें। फोन स्क्रीन पर उनका नाम     देखकर ही आप जानते हैं कि यह कोई न कोई काम के लिए होगा। इसलिए समय लें, बाद में आप वापस कॉल कर सकते हैं यदि वह व्यक्ति महत्वपूर्ण है या फिर इसे एक अच्छा छुटकारा मान फोन न ही करें।

2.    हमेशा यह कहने की आदत डालें 'मुझे देखने दें', 'मैं वहाँ एक व्यक्ति को पहले जानता था, वह अब वहाँ नहीं है, स्थानांतरित हो गया है'

3.    "अगर मैं कहूंगा तो ये सुनिश्चित जानें कि काम नहीं होगा, मेरे उसके साथ अच्छे संबंध नहीं है आजकल। बेहतर तो ये होगा कि उस पर कोई दबाव ना ही डालें। इसका कोई फायदा नहीं होगा और काम नहीं होगा पक्का समझें"।

4.    "ओह! यह हमारे हाथ में था लेकिन अब नहीं, पिछले महीने ही इस कार्य को, इन शक्तियों को मुख्यालय/अलग कार्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया है"।

5.    'मैंने पहले ही इसके लिए किसी और के लिये बात/अनुशंसा कर चुका हूं। अगर आपने मुझे पिछले हफ्ते कहा होता तो मैं निश्चित रूप से कुछ मदद कर सकता था"।

6.    "मुझे देखने दो मैं क्या कर सकता हूँ, वैसे आप देर से आये हैं"

7.    "इस केस के लिए किसी भी सिफारिश का मतलब है निश्चित रूप से अस्वीकृति, अगर आप अभी भी चाहते हैं कि मैं बोलूं तो मैं करूँगा लेकिन मैंने सोचा कि एक दोस्त होने के नाते मुझे आपको ये बात बता देनी चाहिए"।

8.    "मैं इसमें पार्टी नहीं हो सकता; मुझे बहुत खेद है कि पहली बार (भले ही यह 100वीं बार हो) आपने कोई काम बताया और मैं कर नहीं पा रहा हूं। क्यों? जब हम मिलेंगे तो मैं बाद में समझाऊंगा। फोन पर नहीं बता सकता"।

9.    "क्षमा करें! काश मैं आपकी मदद कर पाता, वर्तमान में यह संभव नहीं है"

10.                  "मैं ऐसा कर सकता हूँ लेकिन यह मुझे बहुत महंगा पड़ेगा। मेरा तबादला भी हो सकता है। (मैं एक ऐसे अधिकारी को जानता हूं जो कहता था कि मेरा वेतन पांच अंकों में है आपके मामूली वेतन से कहीं अधिक है अब आपके इतने से वेतन के लिये मैं अपनी पांच अंकों की नौकरी पर खतरा नहीं लेना चाहता। अब टाइम बदल गया है")

11.                  "हमारे दफ्तर के फोn टैप किये जा रहे हैं इसलिए कृपया ऐसा अनुरोध न करें मैं नहीं चाहता कि आपके फोन की वजह से या मुझसे बस बात करने की वजह से आप किसी भी परेशानी में पड़ें। ना आप ये चाहेंगे कि मुझे कोई परेशानी हो"।

12.                  "मैं कह दूंगा पर काम की गारंटी नहीं है"।

13.                   "बेहतर होगा आप श्री रामलाल से मिलें। संभवत: वह इसमें आपकी मदद कर पाये। आपके मिलने के बाद मैं भी उसे बोलने की कोशिश करुंगा"।

14.                  "संभव नहीं है इस केस में वे 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार/योग्यता/वरिष्ठता के नियम का सख्ती से पालन करते हैं"।

15.                  "यह काम तो पहले ही पिछले सप्ताह/कल शाम फाइनल हो गया है"

16.                  कुछ लोग दूसरे के काम को अपना काम बता कर या अपने निकटतम संबधी /मित्र का काम बता उससे आपके नाम से सौदा कर लेते हैं। अत: उस मित्र/संबधी को साथ बुला कर साफ साफ मना कर दें।

17.                  कुछ लोग अपने दोस्तों/संबधियों में आपके नाम से रौब जमाने को फोन पर काम बताने लगते हैं उनको साफ कह दें यह कतई संभव नहीं है।

18.                  पहले वाक्य में ही कोशिश करके ना कह दें।

19.                   बता दें कि "आजकल के 'ऑन-लाइन' और आर. टी.आई. के ज़माने में मैं ही क्या कोई भी रिस्क नहीं लेगा"।

20.                  जो फोन पर आपको काम बता/आपको काम पर लगा खुद मज़े लेते हैं या सोचते हैं कैसे आसानी से काम बन गया/बन जाता है। उन्हें भी काम पर लगा दिया करें। कहें कि "आप ये सब 'फैक्स' से भेजें। पूरे कागजात और आधार कार्ड/पैन कार्ड के साथ"। कभी-कभी उनसे कहें "इसके लिये आपको दफ्तर आना होगा, रजिस्टर पर कुछ एन्ट्रीज़ भरनी होंगी"। और कुछ नहीं तो कहें "आप एक बार मुझे फलां दिन रिमाइंड करा देना"। तब की तब देखी जायेगी न रिमाइंड करे तो आपको करना ही नहीं है।

 

हिंदी में कहावत है "सखी से  सूम भला, जो तुरत दे जवाब" अर्थात उस धनी मित्र से (जो टालमटोल करता है) कहीं अच्छा है कंजूस मित्र जो हाथ के हाथ तुरन्त ना कर देता है। किस्सा खत्म।

 

एक जोक है- जब एक आदमी अपने दोस्त से मिलने गया तो वह अपनी टीनेज बेटी को पढ़ाने में व्यस्त था, उसने अपने दोस्त से पूछा तो दोस्त ने कहा, "मेरी बेटी वर्ल्ड टूर पर जा रही है, मैं उसे विश्व की भाषाएँ सिखा रहा हूँ", हैरान दोस्त ने कहा "लेकिन यह दुनिया की तमाम भाषाओं को सीखना तो बहुत कठिन काम होगा और वक्त भी बहुत लगेगा आदमी ने जवाब दिया "नहीं मैं सिर्फ अलग-अलग भाषाओं में 'ना' कहना सिखा रहा हूं"