Ravi ki duniya

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Tuesday, October 13, 2026

पृथ्वीराज कपूर -फिल्मों की फर्स्ट फैमिली के पितामह

 

                                   



यदि आप पृथ्वीराज कपूर को गूगल पर सर्च करें तो सर्च इंजन आपको लाखों एन्ट्रीज़ दिखाता है। यही वो बात है, जिनसे लीजेंड बनते हैं। वास्तव में पृथ्वीराज कपूर अपने जीवनकाल में ही अपनी फिल्मोग्राफी, अपने सद् व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व और गर्मजोशी से एक लीजेंड बन गये थे और सदैव बने रहेंगे।


उनका जन्म 3 नवंबर, 1906 को समुंद्री लायलपुर, फैसलाबाद में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में स्थित है। उनका जन्म का नाम पृथ्वीनाथ था। उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर इंपीरियल इंडियन पुलिस में पुलिस ऑफीसर थे। पृथ्वी राज कपूर अपने दादा दीवान केशवमल से बहुत जुड़े हुए थे। पुलिस में रहते हुए, उनके पिता पेशावर में तैनात थे। पृथ्वीराज कपूर की शिक्षा पेशावर के प्रसिद्ध एडवर्ड कॉलेज में हुई थी। उन्होंने न केवल बी.ए. पास किया, बल्कि कानून की शिक्षा भी प्राप्त की। एक रिकाॅर्ड जो कपूर वंश में कोई अन्य मैच नहीं कर पाया। पृथ्वीराज कपूर के अभिनय कौशल को चमकाने का श्रेय कॉलेज फैकल्टी प्रोफेसर जय दयाल जी को जाता है। उन दिनों के चलन के अनुसार पृथ्वीराज कपूर की 18 वर्ष की उम्र में 15 वर्षीय रामसरनी राम मेहरा से शादी हो गई।

अपनी चाची से पैसे उधार ले कर पृथ्वीराज कपूर ने 1928 में बॉम्बे का रुख किया। 1929 में अपनी तीसरी ही फिल्म-‘सिनेमा गर्ल’ में वे मुख्य भूमिका (लीड रोल) में थे। कुल मिलाकर, उन्होंने 9 मूक फिल्मों में अभिनय किया। कम लोग जानते होंगे उन्होंने ‘आलम आरा’ में अभिनय किया था जो 1931 में भारत की पहली टॉकी फिल्म थी। ‘विद्यापति’-1937 में उनके अभिनय की बहुत सराहना की गई। उनके शानदार अभिनय वाली फिल्म थी सोहराब मोदी की ‘सिकंदर’ – 1941 में अलेक्जेंडर द ग्रेट के रूप में थी। बहुत कम लोगों को पता होगा कि उन्होंने 1971 में एक कन्नड़ फिल्म ‘सक्षतकारा’ में भी अभिनय किया था। उनकी विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण है फिल्म सिकंदर में जहां पृथ्वीराज जी ने 1941 में सिकंदर की भूमिका की (सोहराब मोदी पोरस बने थे) तो ‘सिकंदर-ए-आज़म’ 1965 में पोरस की भूमिका अदा की। (दारा सिंह ने सिकंदर का करैक्टर किया)

पृथ्वीराज कपूर के पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर ने भी ‘अवारा’ में एक छोटा रोल (कैमियो) किया था। पृथ्वीराज अंग्रेजी थिएटर कंपनी ‘जे. ग्रांट एंडरसन’ में शामिल हो गए थे। बाद में, उन्होंने 1944 में पृथ्वी थिएटर की मुम्बई में स्थापना की। हिंदुस्तान में आधुनिक शहरी प्रोफेशनल रंगमंच की अवधारणा को लाने, स्थापित करने और उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे। अब तक, रंगमंच अनिवार्य रूप से या तो ग्रामीण लोक कला या पारसी रंगमंचीय मानस का हिस्सा था। 16 वर्ष की अल्प अवधि में, पृथ्वी राज कपूर ने पृथ्वी थिएटर ने शहर शहर घूम कर 112 नगरों में 2662 शो किए। इसमें उन्हें 5982 दिन लगे। और, हाँ, पृथ्वी राज कपूर ने इन सभी नाटकों में मुख्य अभिनेता की भूमिका अदा की थी। उनके प्रमुख नाटक रहे शकुंतला, पठान, दीवार, गद्दार, पैसा, आहुति, कलाकार, एवं किसान। उनके ट्रूप में 150 सदस्य थे। मुख्य थे वे खुद, उनका परिवार, उज़रा मुमताज़, जोहरा सहगल, प्रेमनाथ, राजेन्द्र नाथ, सज्जन, एल. वी. प्रसाद, मोहन सैगल। बलराज साहनी, ख्वाजा अहमद अब्बास, रामानन्द सागर, राम गांगुली, प्रयाग राज, शंकर-जयकिशन।

सन् 1954 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किया गया था। भारत सरकार ने उन्हें 1969 में पद्म भूषण प्रदान किया था। उन्हें 1971 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अगर किसी से पूछा जाए कि डॉ. जाकिर हुसैन और पृथ्वीराज कपूर के बीच क्या काॅमन है, तो तुरंत जवाब नहीं सूझेगा। सच यह है कि दोनों आजाद भारत की पहली राज्यसभा के सदस्य थे। 1995 में भारत सरकार ने पृथ्वी थिएटर के 50 वर्षों की याद में पृथ्वीराज कपूर के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। और हाँ ! डाक टिकट पर उनका चित्र दिया गया है। कोई नाम नहीं है। कौन है, जो फिल्म उद्योग के इस दिग्गज को पहचान नहीं सकता।

कुल मिलाकर, उन्होंने बेजोड़ समर्पण भाव के साथ नाटकों और 100 से अधिक फिल्मों में काम किया। तब की सभी टाॅप हीरोइन के साथ काम किया यथा नसीम बानो, दुर्गा खोटे, एर्मालीन, वनमाला, ज़ुबेदा, जिल्लो, हुस्न बानो, इंदिरा देवी आदि। 29 मई, 1972 को कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के 15 दिन के अंदर उनकी पत्नी की 14 जून, 1972 को मृत्यु हो गई।

अभिनेता आयेंगे। अभिनेता जायेंगे लेकिन लीजेंड हमेशा के लिए होते हैं और कपूर खानदान आने वाली कई-कई शताब्दियों तक सेल्युलॉइड के माध्यम से ‘मासज़’ और ‘क्लासज़’ दोनों को अपनी विलक्षण अभिनय प्रतिभा से पीढ़ी दर पीढ़ी मंत्रमुग्ध करते रहेंगे।

शर्मिला टैगोर- एक एवरग्रीन स्टार आर्टिस्ट

                                     



शर्मिला टैगोर जी का जन्म 8 दिसंबर 1944 को कानपुर में हुआ था, उनके पिता का नाम गीतिंद्रनाथ टैगोर और मां इरा बरुआ टैगोर थीं। उनके पिता एक ब्रिटिश इंडिया काॅर्पोरेशन (टैक्सटाइल) कंपनी में महाप्रबंधक (जी.एम.) थे।

2. उनके पिता गीतिंन्द्रनाथ टैगोर गगनेंद्रनाथ टैगोर के पोते थे, जिनके पिता गुनेन्द्रनाथ टैगोर नोबल पुरस्कार विजेता टैगोर के (कजन) चचेरे भाई थे।

3. शर्मिला टैगोर की नानी लतिका बरुआ टैगोर नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के भाई द्विजेंद्रंनाथ टैगोर की पोती थीं। शर्मिला के नाना ज्ञानदाभिराम बरुआ, अर्ल लॉ कॉलेज (अब गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, गुवाहाटी ) के पहले प्रिंसिपल रहे थे।

4. शर्मिला टैगोर तीन बहनें थीं। सबसे बड़ी शर्मिला (रिंकू) दो छोटी बहनें, स्वर्गीय ऑइंद्रिला कुंडू (टिंकू) और रोमिला सेन (चिंकी)। ओइंद्रिला फिल्म में अभिनय करने वाली परिवार में पहली थीं। उन्होंने एकमात्र भूमिका निभाई वह थी फिल्म ‘काबुलीवाला’ 1957 में ‘मिनी’ की भूमिका थी। यह तपन सिन्हा की काबुलीवाला में बाल-भूमिका थी, जो कथानक का केंद्रीय चरित्र है।

5. ऑइंद्रिला (टिंकू) एक अंतरराष्ट्रीय ब्रिज खिलाड़ी थीं। उनका विवाह दिलीप कुंडू से हुआ था। नवंबर 1991 में टिंकू की 40 साल की अल्प आयु में मृत्यु हो गई। उनकी एक बेटी मृणालिनी (मिनी) और एक बेटा मिकी है।

6. दूसरी बहन, रोमिला सेन, (चिंकी) बैंगलोर में बस गई हैं, उनके पति स्वर्गीय निखिल सेन थे, जो एक कॉर्पोरेट हैड थे। वे कई वर्षों तक ‘ब्रिटानिया’ के हैड के रूप में कार्य किया और बाद में ‘यूनिबिक फूड्स’ की स्थापना की। वह सुपर मॉडल नंदिनी सेन के भाई थे। निखिल सेन का फरवरी 2019 में निधन हो गया। चिंकी ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ से जुड़ी हुई हैं।

7. शर्मिला ने सेंट जॉन्स डायाॅसेसन गर्ल्स हायर सेकेंड्री स्कूल और लाॅरेटो कॉन्वेंट, आसनसोल में पढ़ाई की। उन्होंने अपनी फिल्मी कैरियर की शुरुआत तब की जब वे मात्र 13 वर्ष की स्कूली छात्रा थीं।

8. शर्मिला टैगोर ने माणिक दा (सत्यजीत रे) की 1959 की बांग्ला फिल्म ‘अपूर संसार’ में एक अभिनेत्री के रूप में अपना कैरियर शुरू किया।

9. जब वे ‘एन ईवनिंग इन पेरिस’ 1967 की पेरिस में शूटिंग कर रहीं थीं तब नवाब पटौदी उनसे मिलने गये ओर उन्होंने लंदन में अपनी माता जी साजिदा सुल्तान से मिलवाया। उनकी वुड बी मदर-इन-लाॅ ने इस्लाम अपनाने की शर्त रखी। शर्मिला टैगोर ने शर्त मान ली और अपनी शर्त रख दी कि वे फिल्मों में काम करना जारी रखेंगी। उन्होंने 27 दिसंबर 1968 को पटौदी के नवाब मंसूर अली खान से शादी की। निक़ाह के लिए बेगम आयशा सुल्ताना नाम अपनाया गया। नवाब पटौदी की 22 सितंबर 2011 को मृत्यु हो गई। उन्हें उनके पटौदी स्थित महल के प्रांगण में दफनाया गया।

10. शर्मिला टैगोर आजकल दिल्ली में रहतीं हैं। उनके एक बेटा और दो बेटियां हैं। सैफ (1970) एक अभिनेता हैं, सबा खान (1976) आभूषण डिजाइनर हैं। और सोहा खान (1978) एक अभिनेत्री और टी.वी. होस्ट हैं। सोहा खान ने एक्टर कुणाल खेमू से विवाह किया है। सैफ ने रुखसाना सुल्ताना की बेटी अमृता सिंह से विवाह किया था। अमृता के पिता शिवेंद्र सिंह वर्क विख्यात लेखक खुशवंत सिंह के परिवार से थे। सैफ ने पुन: विवाह लोकप्रिय अभिनेत्री करीना कपूर से किया।

11. शर्मिला टैगोर की फिल्मोग्राफी से पता चलता है कि उन्होंने अब तक 100 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया है। इसमें बांग्ला, हिंदी की फिल्में शामिल हैं।

12. हिंदी फिल्म जगत में शर्मिला टैगोर ने शक्ति सामंत की ‘कश्मीर की कली’ 1964 से किया। उनकी लेटेस्ट 2025 की फिल्म ‘पुरावतन’ है। ‘कश्मीर की कली’ में उनके नायक थे शम्मी कपूर। जो नई-नई नायिकाओं को लांच करने के लिए जाने जाते रहे हैं।

13. शर्मिला टैगोर बहुमुखी प्रतिभाशाली अभिनेत्री रही हैं। उनका अभिनय एकदम जीवंत और ‘कन्विंसिंग’ रहता है। उन्होंने सदैव अपनी भूमिका के साथ न्याय किया। उन्होंने अतने दौर के सभी टाॅप कलाकारों के साथ काम किया जैसे धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, शम्मी कपूर, शशि कपूर, उत्तम कुमार, संजीव कुमार, जाॅय मुखर्जी, देव आनंद, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, राजेंद्र कुमार, सौमित्र चटर्जी, सुनील दत्त, मार्क जुबेर के साथ कीं। उन्होंने एक से बढ़ कर एक हिट फिल्म दी।

14. उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार 1969 की फिल्म ‘आराधना’ के लिए मिला।

15. अक्टूबर 2004 से मार्च 2011 तक वे केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष रहीं।

16. दिसंबर 2005 में वे यूनिसेफ की ‘गुडविल एम्बेसडर’ नामित हुईं।

17. 2013 में शर्मिला टैगोर को पद्म भूषण से नवाजा गया।

18. फिल्म ‘मौसम’ 1975 के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।

19. फिल्म ‘अबर अरेण्य’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार 2003 में मिला।
20. फिल्मफेयर का ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’

21. इंटरनेशनल कान फिल्म महोत्सव 2009 में वे जूरी सदस्य रहीं।

22. इंटरनेशनल मैक्स (सौंदर्य प्रसाधन) के निदेशक मंडल में निदेशक।

23. न्यूयॉर्क में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार 2025 (‘पुरावतन’ के लिए)

24. बाॅलीवुड ‘वाॅक ऑफ दि स्टार्स’ बैंडस्टेंड, बांद्रा, में भारत के विख्यात कलाकारों में उनको शामिल किया गया है। उनकी हथेली के निशान, नाम और सिगनेचर उकेरे गये हैं।

25. शर्मिला टैगोर ने बांग्ला की 25 फिल्में, 2 मराठी की, एक-एक मलयालम और अंग्रेजी की फिल्में की हैं। उनकी फिल्मों की संख्या 100 से ऊपर है।
                                                                   


उनके अभिनय के लोग कायल हैं। वे प्रतिभाशाली, खुशमिजाज के व्यक्तित्व की मालकिन हैं। उनके आज भी करोड़ों फैन हैं। यह आश्चर्य की बात है कि अभी तक उन्हें न तो दादा साहब फाल्के सम्मान मिला है न ही संसद की सदस्यता और न ही पद्म विभूषण। शर्मिला टैगोर एक बेहतरीन कलाकार हैं। वे एक ऑल टाइम स्टाइलिश फिल्म स्टार ही नहीं एक नफीस फिल्म आर्टिस्ट भी हैं। अपने कैरियर और ज़िन्दगी की इस स्टेज पर उन्हें दिया गया कोई भी एवार्ड, कोई भी सम्मान उनसे कहीं ज्यादा खुद उस ‘एवार्ड’ का सम्मान होगा। 

तुझे बिब्बो कहूँ या सुलोचना ...

 

                             



बिब्बो का असली नाम फरहत जहां था और स्क्रीन नाम इशरत सुल्ताना था। इशरताबाद, चावड़ी बाज़ार, दिल्ली में 1906 में दुनिया में उनका आगमन हुआ। इनकी माँ का नाम हफीज़न बेगम (बाई) था। हफीज़न बाई अपने समय की मशहूर गायिका थीं। बिब्बो ने भी इस क्षेत्र में ट्रेनिंग पाई और गायन, नृत्य और संगीत में पारंगता हासिल की। वे बला की खूबसूरत थीं। जल्द ही उनको फिल्मों में ब्रेक मिला। इसकी शुरुआत हुई जब हिंदुस्थान की पहली बोलती फिल्म अर्देशर ईरानी के निर्देशन में ‘आलम आरा’ बनी उसमें यद्यपि मास्टर विट्ठल नायक और जुबेदा नायिका थीं। पृथ्वीराज कपूर और बिब्बो को भी इस फिल्म में अवसर मिला। अतः कहा जा सकता है कि न केवल पृथ्वीराज कपूर बल्कि बिब्बो भी ‘आलम आरा’ की प्रतिभागी बनी। 1931 से 1947 तक बिब्बो ने एक से बढ़ कर एक फिल्म में अपना जलवा बिखेरा और 1947 के बाद पाकिस्तान जाने पर वहां भी उन्होने 50 से अधिक फिल्मों में काम किया।

                                                      


1933 में अजंता सिने टोन के झंडे तले बतौर लीड रोल से अपना केैरियर शुरू करने वाली बिब्बो ने उस दौर के बड़े से बड़े डाइरेक्टर्स के साथ काम किया मसलन महबूब खान, मोहन भवनानी, शांति दवे, ए.पी. कपूर। जल्दी ही बिब्बो दिग्गज नायिकाओं की प्रथम पंक्ति में देविका रानी, दुर्गा खोटे, सुलोचना, मेहताब शांता आप्टे, नसीम बानू, सबीता देवी और लीला देसाई के साथ खड़ी नज़र आती हैं। बिब्बो पहली नायिका थीं जिनके नाम को शुमार कर के रफी कश्मीरी ने सगीर आसिफ के संगीत में फिल्म ‘गरीब के लाल’ 1939 में मिर्ज़ा मुशर्रफ और कमला कर्नाटकी से गीत गवाया था: “तुझे बिब्बो कहूं या सुलोचना…” सुलोचना एक यहूदी नायिका थीं, जिनका असली नाम रूबी मेयर्स था। सोचिए दस साल से भी कम समय में बिब्बो ने ऐसी धूम मचा दी, तब जबकि न इंटरनेट था, न पब्लिसिटी के आज जैसे माध्यम।
 
                                                                 


बिब्बो को पहली बोलती फिल्म में काम करने का एजाज ही नहीं हासिल, बल्कि वह हिंदुस्तान की पहली फिल्म संगीतकार भी बनीं। उन्हें यह क्रेडिट नर्गिस जी की माताजी जद्दन बाई से पहले हासिल हुआ। जद्दन बाई दूसरी महिला फिल्म संगीतकार बनीं। बिब्बो ने 1934 की फिल्म ‘अदल-ए-जहांगीर’ के लिए संगीत दिया था। जबकि जद्दन बाई की संगीत दी हुई फिल्म ‘तलाश-ए-हक़’ 1935 में आई। यही वह फिल्म थी, जिसमें नर्गिस ने बेबी फातिमा के नाम से बाल-कलाकार के रूप में काम किया था। फातिमा उनका असली नाम था। ‘मायाजाल’ 1933 में बिब्बो नायिका थीं। ‘कज्जाक की लड़की’ 1936 में भी बिब्बो ने लीड रोल किया था और म्यूजिक भी दिया था। फिल्म ‘रंगीला राजपूत’ (1933) इससे उनकी प्रतिभा का अंदाज़ लगाया जा सकता है। उन्होने अपने वक़्त के दिग्गज कद्दावर अभिनेताओं के साथ काम किया यथा मास्टर निसार, सुरेंदर, एम. कुमार, मोतीलाल आदि। सुरेंदर और बिब्बो की जोड़ी ने कई सफल हिट फिल्में दीं : मनमोहन (1936), जागीरदार (1937) ग्रामोफोन सिंगर, डायनामाइट (1938) और लेडीज ओनली (1939) तब के वक़्त में बिब्बो का नाम कभी मास्टर निसार के साथ जोड़ा जाता कभी सुरेंदर के साथ। 1930 के अंत तक आते-आते बिब्बो ने अपनी फिल्म ‘अदल-ए-जहांगीर’ के निर्देशक खलील सरदार से निक़ाह कर लिया था। दोनों ने मिल कर लाहौर में 1937 में जब ‘कज्जाक की लड़की’ बनाई और रिलीज की। वह फिल्म फ्लॉप हो गयी। इस के बाद बिब्बो वापिस हिंदुस्तान लौट आयीं और खलील सरदार से तलाक हो गया। खलील सरदार वहीं लाहौर में ही रह गए।


बिब्बो के शौक निराले थे। उनकी समकालीन अभिनेत्रियां उनसे ईर्ष्या रखती थीं। बिब्बो का बिंदास रवैया, लाइफ स्टाइल सभी के लिए रश्क का बायस था। वे बिब्बो को लालची कहतीं। कारण कि जब अपने मियां खलील सरदार के निर्देशन में बनी फिल्म ‘कज्जाक की लड़की’ नहीं चली तो न केवल उन्होंने लाहौर छोड़ दिया बल्कि खाविन्द को भी छोड़ दिया था। बिब्बो घोड़ों की रेस में खूब जानकारी और रुचि रखती थीं। उन्हें रुमाल संग्रह करने की हॉबी थी। शानो-शौकत का आलम ये था कि वे अपने कपड़ों और जूतों तक में हीरे-मोती टाँकती थी।


बिब्बो जी का जूनागढ़ राजघराने में आना-जाना था। ऐसा कहा जाता है कि बिब्बो ने जूनागढ़ प्रिंसली स्टेट के प्राइम मिनिस्टर सर शाहनवाज़ भुट्टो (ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) से निक़ाह कर लिया था। हालांकि सर शाहनवाज़ भुट्टो पहले से ही एक हिंदू महिला लखी बाई (इस्लाम अपनाने के बाद खुर्शीद बेगम) से विवाहित थे। दूसरा, यह भी कहा जाता है कि बिब्बो का निक़ाह सर शाहनवाज भुट्टो नहीं, इमदाद अली भुट्टो के साथ हुआ था। वे ज़ुल्फिकार भुट्टो के बड़े भाई थे। बहरहाल यह सर्वविदित था कि बिब्बो ने ‘भुट्टो’ से निकाह किया हुआ था। सन् 1947 में भारत के विभाजन के वक़्त सर शाहनवाज़ भुट्टो और उनका परिवार ही नहीं बल्कि बिब्बो भी पाकिस्तान चली गईं, वहां उन्होने लगभग 50 फिल्मों में काम किया ज़्यादातर चरित्र रोल किए। ऐसा कहा जाता है कि जब सर शाहनवाज भुट्टो बीमार पड़े तब बिब्बो उनसे मिलने उन्हें देखने रिक्शे से आया-जाया करती थीं। 19 नवंबर 1957 को शाहनवाज भुट्टो का इंतकाल हो गया।
पाकिस्तान का प्रतिष्ठित फिल्म जगत का सर्वोच्च एवार्ड ‘निगार एवार्ड’ 1958 में बिब्बो को मिला अपनी फिल्म ‘ज़हर-ए-इश्क़’ के लिए (इसकी तुलना हाॅलीवुड के एकेडमी एवार्ड अथवा हिंदुस्खान के दादा साब फाल्के एवार्ड से की जाती है) प्रसंगवश ज्ञात रहे कि यह पुरस्कार 1957 से ही आरम्भ हुआ था और अगले बरस ही बिब्बो ने अपनी प्रतिभा से यह पुरस्कार प्राप्त किया। बिब्बो की फिल्मोग्राफी के अनुसार 1931 से 1947 तक 40 फिल्में हिंदुस्थान में और 1950 से 50 फिल्में पाकिस्तान में कीं। सन् 1972 में 25 मई को बिब्बो का टी.बी. से निधन हो गया।

विभाजन का भारत-पाक फिल्म उद्योग पर प्रभाव

 



(शर्मीन चिनॉय निर्देशक, सुल्तान राही, नदीम बेग, माहिरा खान)

विभाजन की विभीषिका से जो झंझावात दोनों देशों के राजनैतिक, सामाजिक, औद्योगिक जीवन में आये उनसे पूछो तो दोनों ही देश के जन-मानस आज तक उबर नहीं पाये हैं। कितने परिवारों ने कितने ही अपनों को खोया। वह भी अमानवीय दुर्दान्त और दिल दहला देने वाली हिंसा से।

तब के संयुक्त हिंदुस्तान में फिल्म निर्माण के तीन केंद्र हुआ करते थे। लाहौर, तब का कलकत्ता, मुंबई और मद्रास। कालांतर में तीनों ही क्रमश: मुंबई, कोलकता और चेन्नई हो गए। लाहौर, कोलकता और मुंबई में प्रमुख स्टुडियो हुआ करते थे। उस वक़्त के लाहौर स्थित तीन बड़े-बड़े स्टुडियो के मालिक दलसुख पंचोली, ए.आर. कारदार और रूप के. शौरी थे। बँटवारे में तीनों ही हिंदुस्तान लौट आए। बहुत से कलाकार पहले से ही लाहौर से आकर यहाँ मुंबई और कोलकता में सक्रिय थे, यथा पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, राजकुमार, कामिनी कौशल, पुष्पा हंस, श्यामा, खुर्शीद, सुरैया, मुमताज़ शांति, मुनव्वर सुल्ताना, स्वर्ण लता, वीणा, मनोरमा, मीना शौरी, बेगम पारा, चाँद बर्क, गीता बाली, बीना राय, आशा माथुर, कुलदीप कौर, शमीम बानो, शमशाद बेगम, मोहम्मद रफी, बी आर चोपड़ा, ओ पी नय्यर, देव आनन्द, नक्श लायलपुरी, राजेन्द्र सिंह बेदी,

विभाजन अपने साथ लाया, सुनील दत्त, मनोज कुमार, प्राण, कुलदीप कौर, विभाजन बेला में जाने वालों की सूची में प्रमुख रहे नूरजहां उनके पति शौकत हुसैन रिजवी, एहसान उल हक़ (नसीम बानो के पति/सायरा बानो के पिता) विख्यात लेखक सआदत हसन मंटो, नज़ीर अहमद खान, स्वर्ण लता, लारी लप्पा गर्ल मीना शौरी, पति रूप के शौरी, खुर्शीद एवं मुमताज़ शांति, नज़ीर (के आसिफ के जीजा/सितारा देवी के पति) जिया सरहदी, रतन कुमार (सैय्यद नज़ीर अली) एम. कुमार, (सैय्यद अली हसन ज़ैदी, ये वही हैं जिन्हें निर्देशक देबकी कुमार बोस ने अपने नाम में से 'कुमार' निकाल कर दिया और इन्हें एम. कुमार बना दिया। 'कुमार' नाम देबकी बोस ने फिर कभी अपने नाम के साथ नहीं लगाया, इनकी देखा-देखी अनेक फिल्म कलाकार अपने नाम के पीछे कुमार लगाने लगे) अजूरी, ( अपने वक़्त की मशहूर डांस क्वीन, इनकी डांस में उत्तराधिकारी बनी कुक्कू और कुक्कू से डांस का चार्ज मिला हेलन जी को) बेगम पारा (वापिस आ गईं थीं) शेख मुख्तार (विभाजन के कई बरस बाद गये) रेहाना, बिब्बो उर्फ इशरत सुल्ताना।


लाहौर न केवल संयुक्त पंजाब की राजधानी रहा अपितु फिल्म निर्माण का मुख्य केंद्र भी रहा। लाहौर आज भी पाकिस्तान की साइड वाले पंजाब की राजधानी है। संयुक्त पंजाब तो इतना विशाल था कि क्या अमृतसर, क्या रावलपिंडी, क्या शिमला, अमृतसर, रावलपिंडी, मुलतान, सियालकोट, गुजरवालां, फैसलाबाद, फ़िरोज़पुर, लुधियाना, जालंधर सभी इलाके, पंजाब के उर्वरा और समृद्ध सूबे का हिस्से थे। यद्यपि इसके अलावा बलोचिस्तान, सिंध, नॉर्थ वेस्ट फ़्रंटियर, प्रिंसली स्टेट जैसे कि बहावलपुर, खैरपुर। अभिनेत्री वीणा और अभिनेता राजकुमार बलोचिस्तान से ही थे। जबकि मनोज कुमार एबटाबाद से थे।

हिन्दुस्तान से पाक हिजरत करने वाले फिल्मी लोग बहुत सारी उम्मीदें और प्रत्याशा के साथ आए थे। उसे टूटते देर न लगी। यहाँ तक कि जब शेख मुख्तार अपनी फिल्म अनारकली को लेकर पाक गए तो वहाँ उन्हें लंबी मुक़दमेबाज़ी का सामना करना पड़ा। ऐसे में उनकी आँखों की रोशनी भी चली गयी। विडम्बना ये है कि जब वे वहाँ की अदालत से केस जीत गए और फिल्म रिलीज़ हुई और हिट हुई उसको देखने के लिए शेख मुख्तार ज़िंदा नहीं थे। बाकी हिजरत कर पाक जाने वाले फिल्म वाले कई कारणों से फुस्स हो गए। उनकी प्रतिभा में कोई कमी नहीं थी बस वहाँ अनुकूल माहौल नहीं मिला। न वो संभावनाएं मिलीं जिनके ख्वाबों का पीछा करते वे वहाँ गए थे।


एक ज़माना था जब पाकिस्तान संसार में फिल्म बनाने की प्रक्रिया में चौथे नम्बर पर था। (पहला भारत, दूसरा अमेरिका, तीसरा जापान) अभी तक पाकिस्तान ने 14000 फिल्में उर्दू में दी हैं जबकि 10,000 पंजाबी में, 8,000 पश्तो, 4000 सिंधी भाषा में, 1000 फिल्में बलोच भाषा में बनीं हैं। इस सबके बावजूद दुखद ये है कि जहां हिंदुस्तान में अब तक पृथ्वीराज कपूर से आरंभ हो 20 फिल्मी लोग राज्य सभा में नामित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त अनेक मुख्यमंत्री, मंत्री, और लोक सभा के सदस्य रहे हैं और अभी भी हैं। भारत रत्न, व अन्य पद्म एवार्ड्स की तो हिन्दुस्तान में लम्बी सूची है जो फिल्म से बावस्ता लोगों को मिले हैं और साल-दर-साल मिल रहे हैं। इसके बरक्स पाक में केवल दो उदाहरण मिलते हैं एक तारिक अज़ीज़ और दूसरा उदाहरण है कंवल नाॅमेन का। यह इसलिए संभव हो पाया कि न केवल समाज, बल्कि राजकीय स्वीकार्यता और प्रश्रय मिला है वैसा पाकिस्तान में संभव नहीं हो पाया। इसके मुख्यतः धार्मिक, मिलिटरी, राजकीय कारण रहे हैं। पाक में 1960 और 1970 का दशक फिल्म निर्माण में गोल्डन पीरियड रहा है। जबकि 1980 का दशक खासकर जनरल जिया के समय से फिल्म उद्योग का पतन शुरू हुआ। 1965 भारत-पाक युद्ध के बाद भारत की फिल्में पाक में पूरी तरह बैन हो गईं। कुछ ऊटपटाँग किस्म की शर्तें यथा हिदायतकार (डाइरेक्टर) का डिग्री होल्डर होना चाहिए, रॉ मेटेरियल और इक्विपमेंट के आयात को कठिन से कठिनतर करना। रजिस्ट्रेशन के नए दुरूह नियम। फंडिंग की कड़ी शर्तें, नए-नए टैक्स और सिंगल स्क्रीन सिनेमा हाॅल को जबरन बंद कराना। रही बची कसर पाइरेसी और वी.सी.आर. ने पूरी कर दी। एक के बाद एक न केवल थियेटर बल्कि स्टुडियो भी बंद होने लगे। लाहौर से फिल्म उद्योग पेशावर (पश्तो फिल्मों के लिए) चला गया। जिसे बड़ी संख्या में अफगानिस्तान शरणार्थी पसंद करते थे। इसी तरह टेली-प्ले, ड्रामा, सीरियल कराची जा पहुंचा है और खूब फल-फूल रहा है।


जिस तरह हिंदुस्तान में भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री, दादा साब फाल्के एवार्ड हैं जो फिल्मों से जुड़े लोगों को समय-समय पर नियमित रूप से सम्मानित करता रहा है। पाक में भी एवार्ड तो हैं मगर वे उतने व्यापक नहीं हैं यथा निगार एवार्ड, प्राइड ऑफ परफ़ाॅर्मेंस, सितारा-ए-इम्तियाज़, निशान-ए-इम्तियाज़ आदि हैं। हमारे फिल्मफेयर एवार्ड की तर्ज़ पर वहाँ 'लक्स स्टाइल एवार्ड' है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में दो डाॅकुमेंट्री फिल्मों को ऑस्कर एवार्ड भी मिला है। 2012 की सेविंग फेस ( एसिड अटैक पर) दूसरी 2016 की ए गर्ल इन दि रिवर (ऑनर किलिंग पर) दोनों ही डॉक्युमेंट्री महिला डाइरेक्टर शर्मित ओबैद चिनाॅय द्वारा बनाई गईं हैं।


किसी भी कला को पनपने के लिए माकूल माहौल, सुविधाएं और सामाजिक-राजकीय स्वीकार्यता चाहिए, पैट्रोनेज़ रूपी पर्याप्त खाद-पानी चाहिए। पाक में इसका अभाव रहा है। कहावत है कि जब एक दरवाजा बंद होता है दूसरी खिड़की खुल जाती है। पाक के टेली-प्ले, सीरियल और स्टेज के नाटक असाधारण रूप से बेजोड़ हैं और बेहद पसंद किए जाते हैं। पूरी दुनिया में एक दर्शक वर्ग पाक के नाटकों, टेली-प्ले और सीरियलों का दीवाना है। उनका इंतजार करते हैं।


सिने तारिकाएं कान, नाक, गले, बाजू में हीरे-मोती पहनती हैं। आगामी किस्त में आपको परिचित करायेंगे बेहद खूबसूरत बिब्बो (इशरत सुल्ताना) से जिसका शौक रुमाल संग्रह से लेकर हाॅर्स रेस था। सबसे अद्भुत शौक था हीरे-मोती का जो बिब्बो अपनी ड्रेस एवं शूज़ में फिक्स कराती थी।

पुस्तक समीक्षा: 1947 विभाजन के शेष सवाल’ -विवेक शुक्ला

 


विवेक शुक्ला जी की नवीनतम पुस्तक मात्र एक पुस्तक नहीं बल्कि अपने दौर का एक दस्तावेज़ है। त्रासदी और मानव इतिहास में इतनी बड़ी तादाद में दोनों तरफ के लोगों के जीवन में झंझावात, जबरन, डर, स्वेच्छा से स्थान परिवर्तन दूसरा नहीं दिखता। कितने ही परिवार बरबाद हुए। कितने ही परिवार उस त्रासदी से कभी उबर ही नहीं पाये। हम अक्सर या तो ‘सक्सेस स्टोरीज़’ सुनते हैं या फिर इस बात पर विनोद करते हैं कि वहाँ से जो भी आया वो यही कहता है कि वहाँ हम महल में रहते थे, सोना-चांदी भरपूर था। सच्चाई इन दोनों के बीच में कहीं है। अब उनके पास खोने को कुछ नहीं था उन्होने दिन रात मेहनत कर और अपनी कुशाग्र बुद्धि से अपने-अपने व्यवसाय को चमकाया।

श्री विवेक शुक्ला जी ने इस विभाजन की त्रासदी के स्पेक्ट्रम से तरह-तरह के रंग उठाए हैं। भले वे राजनीति के क्षेत्र के हों। व्यवसायी हों। आम परिश्रमी लोग हों।फिल्म स्टार हों। कैसे उन्होने तिनका-तिनका कर अपने नशेमन को फिर बसाया-बनाया। विभाजन के चलते उसके दुष्परिणाम सभी क्षेत्र में दिखाई दिये। अफसोस ! मुंबई के फिल्म जगत का ‘लॉस’ पाकिस्तान का ‘गेन’ नहीं बन सका। जो भी लोग वहाँ सुनहरे सपने लेकर गए वे निराश ही हुए और गुमनामी के अंधेरे में खो गए। जबकि मुंबई का फिल्म जगत तरक्की करता गया। इसमें बहुत बड़ा हाथ वहाँ की शासन व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं का भी रहा। कहने को कायदे-आजम ने ‘सेकुलर’ और सभी धर्मों के इबादत की बात कही अपने भाषण में किन्तु ऐसा हो न सका। गांधी जी और जिन्ना दोनों ही 1948 में इस दुनिया को अलविदा कह गए।

इसी प्रकार व्यवसाय और नौकरी आदि के जो अवसर हिंदुस्तान फराहम करा पाया वह पाकिस्तान न कर सका। अँग्रेजी में कहावत है ‘यू कैन नॉट लिव ऑन लव एंड फ्रेश एयर एलोन ’ उसी तरह शासन चलाने को एक विज़न चाहिए, बहुत परिपक्व योजनाएं चाहिए। राष्ट्र निर्माण का एक जज्बा चाहिए। जिस प्रकार का मिलिटरी और धार्मिक उन्माद सरहद पार देखने को मिलता है उससे यही लगता रहा कि ये मुल्क तरक्की कब करेगा और अपने लोगों को कब वो सब दे पाएगा जिस की तलाश में वे सैकड़ों मील दूर चल कर आए थे। मुनव्वर राना अपनी किताब ‘मुहाजिर’ में लिखते हैं :

‘'मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं"

जैसा कि विवेक शुक्ला जी ने भी उल्लेख किया है आम जन दोनों तरफ का अपने को कितनी ही चीजों में कॉमन पाता है। रीति रिवाज, भोजन, भाषा, कहावतें, पहनावा, सिंगार। इसी की नुमायान्दगी करते रहे हैं। मुशायरे, ग़ज़ल कंसर्ट, मगर जब हवा ही ज़हरीली हो तो कुछ पनप नहीं पाता। जनाब जिगर मुरादाबादी साब का कलाम है:

उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे

मैं विवेक शुक्ला जी की किताब ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ को उसी दिशा में एक कदम मानता हूँ। सियासतदान सियासत करते रहे हैं करते रहेंगे। मगर आम जन यहाँ भी, वहाँ भी एक से हैं। उनके ग़म एक हैं उनकी खुशियाँ एक हैं और तो और उनके मसाइल एक हैं। हम अंग्रेजों की ‘डिवाइड एंड रूल’ को अब तक ढोते आ रहे हैं। अन्यथा सोचिए उस एकीकृत इंडिया की ताकत दुनिया में क्या होती।

184 पृष्ठ की यह पुस्तक ‘प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग इंडिया’ ने प्रकाशित की है। छपाई बहुत सुंदर है। कीमत 390/- है। प्रूफ रीडिंग वर्ड क्लास है। (बोले तो त्रुटिहीन है, आजकल वर्ड क्लास कहने का रिवाज चल निकला है) यह एक संग्रहणीय पुस्तक है क्यों कि जैसा कि मैंने कहा यह उस दौर की और उसके बाद के हालातों का मात्र लेखा-जोखा नहीं बल्कि एक दस्तावेज़ है उस दौर का और उसके बाद की ज़िंदगियों का।

Saturday, October 3, 2026

जंतर-मंतर-छूमंतर

 

मेरा भारत महान एक बहुत वाइब्रेन्ट डेमोक्रेसी है। जिसे कहते हैं हैपनिंग बस आप ठीक समझे हिंदुस्तान को आप हल्के में न लें। हिंदुस्तान हैपनिंग प्लेस है। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के जानकार ये बात जानते हैं कि भारत की आज़ादी में स्टूडेंट्स की बहुत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका रही है। लॉर्ड एक्टन बहुत पहले कह गए हैं “शक्ति का रुझान भ्रष्ट करने की तरफ होता है और सम्पूर्ण /अबाध शक्ति सम्पूर्ण तौर पर भ्रष्ट कर देती है” यह बहुत अच्छी सीख है किन्तु सभी सीखों की तरह यह बस उद्धरण करने के काम आती है। हम इससे कुछ सीखते नहीं है खासकर वे जिन पर शक्ति होती है। सत्ता का मद कहिए या सत्ता में ऐसी ही कुछ सिफ़त होती है कि आपको ये भान ही नहीं रहता कि ये आनी-जानी चीज़ है। आपको अगर पता भी है तो यह आप इसके लिए प्रेरित नहीं  हो पाते कि जन-कल्याण किया जाये, जिसके लिए उन्हें चुना गया है। इसके उलट आप समेटने और बटोरने में लग जाते हैं। बिना इस बात को याद किए कि जब शतरंज का खेल खत्म हो जाता है तो बादशाह हो या प्यादा दोनों एक ही डिब्बे में जाने हैं।

 

बहुधा यह कहा-सुना जाता रहा है कि महिलाएं ईमानदार होती हैं वे भ्रष्टाचार में नहीं पड़ती हैं। हमारे भारत महान ने इस मिथक को तोड़ा है। आप पिछले पचास साल की राजनीति पर नज़र डालेंगे तो पाएंगे ऐसा कुछ नहीं है महिलाएं अधिक नहीं तो पुरुषों से इस मामले में भी दोयम दर्जे पर नहीं रहना चाहतीं। आप इसे नाम कुछ भी दे दें। मकसद तो एक ही है। (जैसे स्कूल-कॉलेज किसी न किसी फंड के नाम से अथवा डोनेशन, मेनेजमेंट सीट, एन आर आई कोटा केपिटेशन-फी आप पुकारें किसी भी नाम से गुलाब की खुशबू वही है, जो आप चाहते हैं)

 

इसी तरह यह भी एक मिथक रहा है कि फलां तो अकेला है छड़ा-छांट है उसे पैसे से क्या लेना-देना। उसके ना आगे कोई है ना पीछे कोई है। ये मिथक प्रजा को बहलाने के बड़े काम आता है हालांकि इसमें ज़्यादातर केस में प्रजा को असलियत का पता होता है। यह उसी तरह से है जैसे आपको बंबईया फिल्म में ‘एंड’ पता होता है पर आप पिक्चर पूरी देखते हो। अतः मेरे भारत महान ने ये दो मिथक बुरी तरह झुठलाए है। हबीब जालिब साब ने फरमाया है:

 

               "तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था

                 उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।"

 

ऐसा सुना जाता है कि हर वह शख्स ईमानदार है जिसे मौका नहीं मिला। क्या ऐसा है? देखिये आप जंगल में रहें और अपने ब्रह्मचारी होने का ढिंढोरा पीटें। बात तो तब है जब आप आबादी में रहें जहां फिसलने के अवसर हैं वह है आपके ब्रह्मचर्य का ‘लिटमस टेस्ट’ है। इससे याद आया कि ‘आप बहुत अच्छे हैं’ ये बात तो दूसरे ने कहनी है।  ये क्या बात हुई कि ‘मैं अच्छा हूँ’ यह आपको ही कहना पड़ रहा है या फिर इश्तिहार और अखबार के अखबार में पेज़ दर पेज़ बड़े-बड़े विज्ञापन देने पड़ें। किराये की भीड़ इकठ्ठा करनी पड़े। कहा जाता है कि नेशनल फलक पर लास्ट दो ही नेता रहे हैं जिन्हें लोग सुनने खुद-ब-खुद आते थे।  वे थे इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी।

 

इस रेलम-पेल में आप ये मत भूल जाना कि संत कबीर कह गए हैं “ माया महाठगिनी हम जानि...त्रिगुण फांस लिए बोल मीठी बानि” आपको यह फिक्र भी होनी चाहिए कि लोग आपको कैसे याद रखते हैं। गांधी जी ने अगर सविनय अवज्ञा (सिविल डिसओबीडियेन्स) आंदोलन चलाया तो उन्होने ही ‘अंग्रेज़ो भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का आव्हान किया था। 

Tuesday, September 29, 2026

व्यंग्य: पोर्टेबल सड़कें

 

                                             


 

एक ज़माना था कि उन सभी चीजों से बहुत विस्मय हुआ करता था और वो पोर्टेबल वस्तुएं हाथों-हाथ बिका करती थीं। जैसे टू-इन-वन, थ्री-इन-वन। ट्रांजिस्टर भी एक तरह का पोर्टेबल रेडियो ही था। पेज़र हुआ, मोबाइल हुआ सब एक तरह के पोर्टेबल उपकरण ही हैं। लोग-बाग कार में लाइटर, फ्रिज, टी वी., ए.सी. आम लगाने लगे। हद तो तब हो गयी जब सुना कि अब चलता-फिरता ओ-यो भी मार्किट में आ गया है। आगे न जाने क्या-क्या और पोर्टेबल देखने को मिलेगा। मैंने सुना है कि किसी-किसी देश में प्लेटफॉर्म नाम की कोई चीज़ नहीं होती है। बल्कि पोर्टेबल प्लेटफॉर्म ट्रेन के साथ-साथ ही चलता है। जैसे विमान का लेंडिंग-गियर खुलता बंद होता है वैसे ही ये पोर्टेबल प्लेटफॉर्म खुल जाता है। बोले तो सीढ़ियाँ नीचे गिर जाती हैं और यात्री उतर जाते हैं तो सीढ़ियाँ वापिस फ़ोल्ड होकर कोच से लग जाती हैं।

 

इसी श्रंखला में अब आ गयी है पोर्टेबल सड़क। इस नवाचार (इनोवेशन) के लिए भारत की पावन पवित्र भूमि को चुना गया है। यह भी अपने आप में कोई कम गर्व करने की बात नहीं है। अभी तक हम सिर्फ डेमोक्रेसी की मम्मी थे। अब हम सड़कों के पापा भी हो जाएँगे। कैसा लगेगा जब लोग कहेंगे 'पापा सड़क का'। दुनिया में हमारा नाम होगा। यह सड़क कुछ इस नवीनतम तकनीक से बनाई जाया करेंगी कि जहां भी दरकार हो, जहां वी.आई.पी. मूवमेंट हो वहाँ ही रात-रात में यह कार्पेट की तरह खोल दी जाया करेगी और ईवेंट समाप्त होते ही कार्पेट की तरह ही फ़ोल्ड करके किसी भी दूसरे स्थान पर ले जायी जा सकेगी। कितना अद्भुत नज़ारा होगा। बिलकुल महारणा प्रताप के घोड़े चेतक की तरह। चेतक की विद्युत सी चपलता पर कवि श्री श्यामनारायण पाण्डेय जी ने 'चेतक की वीरता' नामक कविता में लिखा था:

 

                             राणा की पुतली फिरी नहीं

                             तब तक चेतक मुड़ जाता था

                             है यहीं रहा, अब यहाँ नहीं

                             वह वहीं रहा, है वहाँ नहीं

                             थी जगह न कोई जहाँ नही

.

इसी भांति हमारी ये पोर्टेबल सड़क जहां जाएगी ईवेंट होने तक तो समां बांध ही देगी। अज्ञानी लोग ना जाने क्यूँ जीवन के मर्म को समझने से इंकार कर देते हैं। ये जीवन क्षण-भंगुर है। यहाँ कुछ भी परमानेन्ट नहीं। ना तो सड़क, ना सड़क बनाने वाले और ना ही सड़क पर चलने वाले

 

अतः आप तो सड़क के इस नवीनतम भारतीय नवाचार पर गर्व करें। यह आपका अधिकार भी है और कर्तव्य भी है। लोग तो आलोचना करते ही रहेंगे। आप क्या समझते हो लोगों ने शाहजहाँ की आलोचना नहीं की होगी जब अगला ताजमहल बना रहा था। अरे बेकार क्यों इतना खर्चा करना, वो भी जमुना के किनारे, सीलन रहेगी। मजबूती नहीं आएगी। पहले ही क्या मकबरों की कमी  है जो एक और बना दिया आदि आदि। अतः ये ना देखें कि सड़क कितने सेंटीमीटर मोटी बननी थी इतनी सी ही बनी है। यह तो हाथ से ही उखड़ जाती है। यह तो दो हफ्ते भी नहीं चली आदि आदि शिकायतें वही लोग कर रहे हैं जो इस असलियत से परिचित नहीं हैं कि ये विश्व में सड़क निर्माण के कौशल की अनूठी मिसाल है। अब लगता है कि ये तभी मानेंगे जब विश्व में कोई देश हमें इस उपलब्धि पर भारी भरकम पुरस्कार हमारे गले में डाल देगा। वरिष्ठ नागरिकों को याद होगा टेलीफोन आबंटन में एक ओ.वाई.टी. श्रेणी हुआ करती थी। 'ओन योर टेलीफोन'। उसी तरह अब आ गई है ओ.वाई.आर. । नहीं समझे ?  ओन योर रोड