Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Wednesday, July 1, 2026

व्यंग्य: दिल्ली-आई

 

 जिन्हें नहीं पता उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि लंदन में एक बहुत बड़ा, विशाल ऊंचा चरखी वाला झूला है जिसे लंदन-आई (यानि लंदन की आँख) कहा जाता है। लोगों का यह मानना है कि इस झूले पर चढ़ने के बाद पूरा का पूरा लंदन दिखता है। ये चरखड़ी वाले झूले मेलों में खूब लोकप्रिय रहते हैं खासकर बच्चों में। अंग्रेजी में शायद इसे व्हील या जायंट व्हील कहते हैं। पर जो बात चरखी वाला झूला या लंदन-आई कहने में है वह व्हील में नहीं। अब देखिये ना ये झूला लंदन देखने आने वाले पर्यटकों में खूब  लोकप्रिय है। टूरिस्ट गाइड आपको वहाँ ज़रूर ले जाता है। वैसे ही जैसे ताजमहल दिखाने वाले गाइड या रिक्शा वाले आपको एम्पोरियम दिखाने ले जाते हैं। या जिन रेस्तरां वालों से पहले से बात हो रखी होती है वे आपको उसी रेस्तरां में चाय-पानी अथवा लंच आदि को ले जाते हैं। किसी ने हाल ही में मुझे बताया कि कुछ ढाबे वाले यार दोस्तों से कह कर अपनी दो-चार कारें वहाँ ढाबे के बाहर पार्क करवा लेते हैं ताकि ढाबा चलता हुआ और लोकप्रिय जैसा लगे।

 

यह लंदन-आई जो है सो सन् 1999 से लगा हुआ है। इस

 झूले की टिकट 29 पाउंड (3650/-) है यदि ऑन लाइन

 करायें यदि काउंटर से लेंगे तो 39 पाउंड (4907/-) है  यह

135 मीटर ऊंचा है और इसमें एक बार में 800 लोग बैठ

 सकते हैं। एक राउंड 30 मिनट का होता है। ज़ाहिर है इस

 झूले के सभी कल-पुर्जे बैस्ट क्वालिटी के खरीदे गए होंगे

 ठोक-बजा कर। जब बात क्वालिटी की आती है तो पैसों से

 कोई समझौता नहीं। वे जाने-अनजाने कैसे भी आदमी की

 जान खतरे में नहीं डाल सकते। आखिर नेशनल प्राइड भी

 कोई चीज़ है। वे नहीं देख सकते कि ब्रिटेन या लंदन की नाक

 नीची हो। टिकट चाहे जितने की हो मगर सेफ़्टी से कोई

 सम्झौता नहीं। सेफ़्टी फर्स्ट। वहाँ से पर्यटक लंदन के मनोरम

 आकाश, कल-कल बहती साफ सफ्फाक थेम्स नदी, दूर दूर

 तलक फैली हरियाली और हेरिटेज बिल्डिंग्स को देख कर

 एंजॉय करते हैं। लंदनवाले खुद कहते हैं जैसे पेरिस के लिये

  एफिल टाॅवर है उसी तरह लंदन-आई उनके लिये है।

 

सरकार ने घोषणा की है कि ऐसा ही एक झूला दिल्ली में लगाया जाये। जगह भी चुन ली गयी है - मयूर विहार। सुन कर पर्यटकों या तफरीह करने वालों के मन में तो बाद में लड्डू फूटेंगे सब से पहले तो जिस विभाग को ये काम सौंपा गया है उसके अफ़सरान, डीलिंग बाबू और ठेकेदार आदि का मन-मयूर नाच उठा है। सब के सब की 'आई' अब इस दिल्ली-आई की डील पर है। इसका ठेका किसको मिलेगा ? कितने का ठेका खुलेगा? कितना कुछ हिसाब-किताब हो जाएगा आदि आदि। अब या तो सरकार सीधा-सीधा उसी को ठेका दे दें जिसने  लंदन-आई बनाया है अन्यथा हमारे यहाँ तो कोई मेला ऐसा नहीं जाता जिसमें झूला टूटता नहीं हो। आदमी मरते नहीं हों। हमारे यहाँ रोप-वे टूट जाते हैं। ट्रॉली बीच आकाश में लटक जाती है, रस्सी टूट जाती है, बन्जी जम्पिंग के केबल टूट जाते हैं। पैरा ग्लाइडिंग क्रैश लेंड कर जाती है। लाइफ सेविंग जैकेट चमकती खूब है बस 'लाइफ' ही नहीं बचा पाती। हमारे यहाँ आप किसी को एल-1 पर सलेक्ट करें या ना करें उसने मैटीरियल सबसे 'लोएस्ट क्वालिटी' का लगाना है। हमारे यहाँ जुगाड़ इज दि नेम ऑफ दि गेम। आप तो इसका नाम "आई ऑफ जुगाड़" रख दो, मैं अभी से बता रहा हूँ। दूसरे लंदन में तो आदमी झूले पर बैठ कर लंदन की शानदार इमारतें और नीला आकाश तथा हरियाली देखता है और अपना पैसा वसूल समझता है। मयूर विहार में ये  दिल्ली-आई लगा कर आप टूरिस्ट को क्या दिखाना चाहते हैं ? विकास के नाम पर काटे गये पेड़ ? स्लम और अनाधिकृत बस्तियाँ ? आड़ी-तिरछी कॉलोनियाँ, गंदे नाले, सूखती हुई मैली जमुना या फिर हमारी अपनी क्वालालंपुर सरीखी पैट्रोनस ट्विन टाॅवर्स ? नहीं समझे ? अरे भई !  गाजीपुर में कूढ़े के दो जुड़वां पहाड़ ?

 

 

Tuesday, June 30, 2026

व्यंग्य: भिक्षावृति - हमारा राष्ट्रीय व्यवसाय

 

 

हमारे प्राचीन शास्त्रों में भिक्षावृति बोलचाल की भाषा में बोले तो भीख मांगने का खूब प्रचलन रहा है। आप "भिक्षाम देहि" से अपरिचित नहीं होंगे। दशानन ने सीता का अपहरण इसी वाक्य की सहायता से किया था। दूसरे शब्दों में हर शहर, हर गाँव में एक वर्ग ऐसा था जिसका मुख्य व्यवसाय भीख मांगना होता था। अब आप चाहें तो इसे किसी भी सम्मानजनक नाम दे दें कहलाता यह मूलतः भीख मांगना ही है। आपके गाँव, कस्बे शहर में सुबह सुबह भिक्षावृति वाले निकल पड़ते थे। जनता इन्हें कुछ न कुछ भिक्षा देना अपना सामाजिक और धार्मिक कर्तव्य समझती थी। शायद ही कोई भिक्षुक खाली हाथ भेजा जाता था। अनाज, पैसा, जो हो। अब तो भिक्षा वालों ने अपने दफ्तर ही खोल रखे हैं। जहां किसी न किसी छद्म नाम का बोर्ड लगा होगा मगर मुख्य काम भीख का ही होता है। ये भीख मांगने वाले सड़क किनारे, मंदिर-मस्जिद के रूट पर, रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में, हज के दौरान और कुम्भ जैसे विशेष अवसरों पर  प्रोफेशनल भिखारी अपनी यूनिफ़ाॅर्म पहन जा पहुँचते हैं। उनकी इस काम में अच्छी-ख़ासी आय होती है। आए दिन केस आप भी पढ़ते रहते होंगे कि अमुक भिखारी लाखों छोड़ के मर गया या भिखारी के शहर में महंगे फ्लैट हैं अथवा उसके ऑटो चल रहे हैं। कई भिखारी तो बड़े ठेकेदार टाइप बन जाते हैं बोले तो उनके अंडर में यानि उनके सिंडीकेट में अन्य भिखारियों के भी दल के दल शामिल होते हैं।

 

इन सब में भारतीय रेलवे का बहुत बड़ा योगदान है। 1853 में जब रेलवे चली थी तब किसी ने सोचा भी न होगा कि भिक्षावृति में रेलवे इतनी महत्ती भूमिका अदा करेगी। भिखारी लोग स्टेशन के आसपास मँडराते रहते हैं। ये उनके परमानेंट टाइप के अड्डे यानि कट्टे (अड्डे का मराठी अनुवाद)  होते हैं। मुंबई भीख के लिए बड़ा मुफीद है यूं तो हर वो शहर जहां खूब लोग-बाग हों, भिखारियों की पसंदीदा जगह होती है। इस मामले में वे बिलकुल नेताओं जैसे होते हैं। जैसे नेता को हर शख्स में एक अदद वोटर नज़र आता है वैसे ही भिखारी को हर चलता-फिरता मानुष दाता नज़र आता है। भीड़-भाड़ के मामले में स्टेशन से बेहतर क्या होगा। गाड़ी आ रही है...गाड़ी जा रही है...गाड़ी बुला रही है। बहुत से भिखारी प्रिंट्ड कार्ड सा भी रखते थे और सोचते थे यह एक थोड़ा सम्मानजनक तरीका है। कुछ गीत गा कर, कुछ करुणामयी आवाज निकाल कर। कुछ और तरीके का स्वांग भर के भीख मांगते हैं।

 

ये भिखारी आपको स्टेशन स्टेशन मिलेंगे। क्या स्टेशन के बाहर क्या स्टेशन के अंदर। ट्रेन में भी।  कोई ट्रेन इनसे अछूती नहीं। ना ही कोई स्टेशन इनसे दूर। मुझे लगता है कई बार ये प्लेटफॉर्म पर आने के लिए किसी न किसी को जरूर भीख देकर ही अंदर आ पाते होंगे। ऑटो-टैक्सी वालों को प्लेटफॉर्म के अंदर आने की मनाही होती है अतः वे सीढ़ियों पर खड़े आपको मिल जाते हैं और आपसे लगभग लगभग सामान छीन कर अपने ऑटो अपनी टैक्सी में बिठाना चाहते हैं ताकि आपको किसी सुनसान जगह पर जाकर लूटा जा सके और लूटा नहीं जा सके तो किराये के रूप में ही छीन लो जितना हो सके।

 

पता नहीं क्यों मगर स्टेशन का इलाका भीख मांगने वालों में बहुत लोकप्रिय होता है। एक कारण तो यह होगा की 24 घंटे स्टेशन पर रौनक-मेला रहता है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई छोड़ने आया है तो कोई लेने आया है। यह जमावड़ा ही तो भिखारी का भिक्षादान केंद्र है। वे बिंदास आपको जनरल डिब्बे में मिलेंगे, रिजर्व डिब्बे में मिलेंगे। फर्स्ट क्लास में मिलेंगे। सेकंड क्लास में मिलेंगे। अब तो स्वांग के साथ साथ टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोलते भी मिल जाते हैं दरअसल ये उनका व्यवसाय है इसके लिए जो भी समान लगता है जैसे यूनिफ़ाॅर्म, अस्पताल की पट्टी, पलस्तर, सहारा लेकर चलने को लाठी। उँगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी करना। अनेकानेक प्राॅप्स हैं इस काम में। आपका थोड़ा मरा-गिरा सुकड़ू सा होना जरूरी हैं अगर आप जिस्मानी तौर पर मजबूत कद-काठी के हैं तो आसानी से भीख नहीं मिलती। कुछ और औटपाए करने पड़ते हैं। सन् सत्तर के दशक की बात है मेरे मित्र ने कॉलेज के बाहर एक भिखारी को कहा छुट्टे नहीं हैं उसने पूछ लिया कितने का नोट है? मित्र ने कहा सौ का नोट है! उसने बैठ कर अपनी पगड़ी में से सौ के खुले दे दिये। तब सौ रुपये बहुत होते थे।

 

यह एरिया किन्ही कारणोंवश सरकार से वैसी मान्यता और सुविधाएं नहीं पा रहा जैसी कि ये डिजर्व करता है। मसलन फौरन से पेश्तर भिखारियों को बाकायदा लाइसेन्स दिये जाएँ ताकि उनके आपस में क्षेत्राधिकार के झगड़े न हों। बागपत में किन्नर लोग की शिकायत है  सोनीपत के किन्नर आ कर हमारे बिजनिस में हिस्सा-बाँट कर रहे हैं। इसी तरह जब क्षेत्राधिकार तय हो जाएँगे तो यह समस्या नहीं रह जाएगी। उनसे आयकर भी लिया जा सकता है। उनके भीख मांगने के टाइमिंग्स भी रेगुलेट किए जा सकते हैं। वे हमेशा अपने पास आई.डी. कार्ड रखेंगे। सरकार बी.डी.ओ. नियुक्त करे भिखारी डवलपमेंट ऑफिसर। इस मद को समवर्ती सूची (कनकरंट लिस्ट)  में रखा जाये ताकि राज्य सरकार इसकी देखा देखी अपने नियम-अधिनियम बना सके। कुछ बरस बाद रिव्यू करके इनको इजाजत दी जाये कि अन्य देशों के भिखारियों के साथ ये जाॅइंट वेंचर कर सकें और अपने आई.पी.ओ. जारी कर सकें दूसरे शब्दों में इसे फुल फ्लैज्ड इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाये। भिखारियों के लिये पी.एफ., ग्रेच्युटी और पेंशन पर भी विचार किया जाये। देखें इन्हें इसके लिए अपनी कोई भिखारी पार्टी न बनानी पड़े। रेलवे तो सबसे पहले इनके साथ फिफ़्टी फिफ़्टी की पार्टनरशिप पर पार्टनरशिप डीड साइन कर ले। ये सॉफ्ट स्किल आपको ढूँढे नहीं मिलेगा। राजस्व की प्राप्ति होगी सो अलग। भिक्षाम देहि ?

Monday, June 29, 2026

व्यंग्य: तौबा ये कमेटी

                                                


इस एक छोटे से शब्द के अनेक अर्थ हैं। बचपन में हम सुनते थे 'कमेटी आई ! कमेटी आई !' इसका अर्थ था कि वह छापामार दस्ता जो दिल्ली की गलियों-सड़कों से फेरीवालों यथा गोलगप्पे वालों, बर्फ के गोले वालों और चना-मुरमुरा बेचने वालों की धर-पकड़ करते थे। वे उनको नहीं पकड़ते थे बल्कि उनका सामान ज़ब्त कर लेते थे। हम सोचते यार कुछ भी हो सबसे बढ़िया नौकरी तो इनकी है जब जो खाने का दिल करे उसी का सारा सामान ज़ब्त कर लो। भर पेट गोलगप्पे खाओ। बर्फ के रंग-बिरंगे गोले बना-बना कर खाओ। बर्फ के गोले छोटे, मध्यम और बड़े  खांचों (कप्स) के हिसाब से होते थे और सबसे छोटी इकाई होती थी 'थपकी' बोले तो कोई कप नहीं बस एक मुट्ठी घिसी बर्फ को थपकी देकर चिड़िया सी बना कर पकड़ा देता था।

 

फिर ये कमेटी टर्म हमने सुना जब भद्र महिलाएं जिनके घर के चौके-चूल्हे को 'बाई' देखती थी वे खाली वक़्त को कमेटी तरह बिताने लगीं। इसे वे अंग्रेजी में 'किटी' कहने लगीं। कमेटी(किटी) कई तरह की होतीं थीं। पैसे की लॉटरी से लेकर, बोली लगाने वाली। कमेटी बजट के अनुसार ही भद्र महिलाओं का वर्ग उस से जुड़ा होता था। यह हाई-फाई से लेकर  जिसमें कार्ड्स खेले जाते, बीयर, जिन और बाहर रेस्तरां में लंच होता, कुछ गाना-वाना, जोक-शोक होते हैं। दूसरी तरफ वो लघु बजट कमेटी जो दस-बीस हज़ार की होतीं जिनमें चाय-नाश्ता, भल्ला-पापड़ी होती।

 

इन सबमें सबसे ऊपर होती हैं वे सरकारी कमेटियाँ जिनका गठन संसद करती है। मोटा-मोटा सरकारी कमेटी। वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाया करती हैं और तरह तरह की खामियां निकालती हैं। जितनी ज्यादा खामियां उतनी ज्यादा खातिरदारी। बोले तो खातिरदारी बढ़ती जाएगी अगर खामियां बढ़ती जाएंगी। इनका ज़लवा देखते ही बनता है। शहर में इनके उतरते ही कारों का काफिला पुष्प-हार से एयरपोर्ट पर ही स्वागत के साथ साथ जबर्दस्त ग्लॉसी पेपर पर छपी सामग्री उससे भी महंगा ब्रीफकेस, बैग, फोल्डर, महंगे वाला पेन आदि आदि। जो भी महंगा चल रहा हो उस ब्रांड के सूटकेस से लेकर अपने प्रोडक्ट की झलकस्वरूप प्रतीक / अनुकृति अथवा प्रोडक्ट ही। वे सामान्यत: पाँच सितारा होटल में ठहराए जाते हैं। क्या प्रबंध निदेशक, क्या अध्यक्ष क्या निदेशक सब आतंकित से रहते हैं। ना जाने कब किसकी नस दबा दे ये कमेटी। इस दशा में ये कमेटी उस कमेटी जैसी ही है जो गोलगप्पे वाले का सामान ज़ब्त कर लेती थी और गोलगप्पे के पानी के घड़े को सड़क पर ही उसी निर्दयता से पटक देती थी जैसे कभी कंस ने अपने भांजे-भाँजियों को पटका होगा। इन कमेटी मेंबर्स के आराम का, घूमने का ख्याल रखा जाता है। असल में तो वो जो ग्लॉसी जर्नल उन्हें पकड़ाया जाता है उसमें एक चैप्टर इस बात का ही होता है कि इस शहर में दर्शनीय और शॉपिंग के लिए क्या क्या है। ये 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' बहुत पुराना है। एक कमेटी के रात्रिभोज में हम भी गए थे तथाकथित वरिष्ठ अधिकारी/विभागाध्यक्ष के तौर पर। पता चला कमेटी के अध्यक्ष और मेम्बरान पी कर टल्ली हुए पड़े हैं। बस एक अदद मेम्बर जो शायद सबसे जूनियर रहा होगा/पीता न होगा उसके सान्निध्य में हमने अपना डिनर लिया था। ये कमेटी मेम्बर भी कम नहीं होते एक अध्यक्ष महाराज तो मुझसे बोले "कल रात मेरा पर्स आपके गेस्ट हाउस से कहीं गिर गया"। अब हमारे तो हाथ पाँव फूल गए। लेकिन किसी तरह बात संभाली गयी कि सबसे पूछताछ की जाएगी और सी.सी.टी.वी. की सहायता से चोर को पकड़ लिया जाएगा और पर्स आप तक पहुंचा दिया जाएगा। आगे आप जानते ही हैं सी.सी.टी.वी. का सुन उन्होने बात बढ़ाई नहीं।

 

सरकार ने लेटेस्ट निर्देश दिये है जिसके अनुसार अब से कमेटी मेम्बर पाँच सितारा होटल में नहीं रुक कर सरकारी गेस्ट हाउस/ डाक बंगला/सर्किट हाउस में रहा करेंगे। इसमें एक ही पतली गली है सरकार ने पाँच सितारा होटल को मना किया है आजकल तो होटल छह/सात सितारा भी होते हैं। और तो और कितनों के तो ऑफिशियल गैस्ट हाऊस या गैस्ट हाऊस के एक्सटेंशन इन होटलों में ही होते हैं। बाई दि वे होटल पाँच सितारा डीलक्स  भी होते हैं । पांच सितारा प्रतिबंध किये हैं। पांच सितारा डीलक्स नहीं। मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि मित्र लोग मिल कर इसका तोड़ निकाल ही लेंगे। खानपान पर भी प्रतिबंध लगाए हैं मसलन आप महंगा भोजन नहीं करेंगे। हमारी विभागीय मीटिंग्स के लिए जब लंच के लिए 25-30 रुपये प्रति व्यक्ति  सीमा रेखा आई तो हम लोग ने अतिथियों की संख्या कागज पर ही बढ़ा ली और हमारे पनीर-पकोड़ा, कॉफी- काजू-बादाम बदस्तूर जारी रहे। भला इनके बिना भी कोई मीटिंग होती है कमेटी मीटिंग तो कदापि नहीं। अब से कमेटी मेंबर्स को महंगे गिफ्ट्स  देने की भी मनाही है।  अब ये ‘महंगा’ एक सब्जैक्टिव टर्म है कोई चीज़ मेरे लिए महंगी हो सकती है आपके लिए नहीं। इसमें एक अपवाद है- आप उन्हें 'प्रशासनिक किट' (भगवान जाने इसका क्या अर्थ होता है) डायरी, पेन, स्टेशनरी आइटम दे सकते हैं अतः ये जो बाज़ार में लाखों के पेन हैं ये आपको कागज काले करने को नहीं बेच रहे हैं। ये तो बिक ही इसलिये रहे हैं कि आप इन्हें उपहार स्वरूप दे सकें। बजट अनुसार पेन उपलब्ध हैं। करोड़ों से लेकर पाँच रुपये वाले। सरकार ने चांदी के सिक्कों और इलेक्ट्रॉनिक्स गेजेट्स को देना सर्वथा वर्जित किया है। अतः अब से आप केवल सोने के सिक्के ही दे सकेंगे। नो चांदी प्लीज़। हां आप चाहें तो हीरे-मोती-लाल-जवाहर दे सकते हैं। उनका ज़िक़्र नहीं है। दूसरे ये इलेक्ट्रॉनिक्स गेजेट्स क्या होता है जी? क्या चीज़ है जो गेजेट्स में नहीं आती। हमारे टीचर कहते थे ये जो शेविंग रेज़र है ये भी एक मशीन ही है। अतः हम इसका भी कोई हल निकाल लेंगे इस विषय पर तुरंत एक कमेटी का गठन कर दिया जाये। सरकार ने नोट किया है और घोषणा की है कि अबसे "कमेटी के दौरे शाही नहीं बल्कि सादगी भरे होंगे"। चचा ग़ालिब कह गये हैं:

 

                इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा

                लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं 

Sunday, June 28, 2026

व्यंग्य: पता है मेरा बाप कौन है सिंड्रोम

 


अब ये नहीं पता कि क्या ये 'मेरा बाप कौन है सिंड्रोम' भारत के बाहर भी किसी मुल्क में है क्या। हमारे देश में तो इस सिंड्रोम का खूब बोलबाला है। रोड से लेकर गली-मोहल्ले तक। पॉलिटिक्स हो, बिजनिस हो ये वाली बीमारी हमारे मुल्क़ में महामारी की हद तक फैली है। भारत यूं भी मिडियाॅकर्स (औसत दर्जे/साधारण) लोगों की धरती है। अतः पूरी पीढ़ी की श्रंखला में अगर कोई एक औसत से थोड़ा ज्यादा/साधारण से तनिक ऊपर रिश्तेदार हुआ होता है तो पूरा का पूरा खानदान उसी के पुण्य-प्रताप से जाना जाता है।  वे ये सुनिश्चित करते हैं कि फलां ‘महान’ आत्मा उन के ही रिश्तेदार, बाप, चाचा, ताऊ, मामू, भाई-भतीजा-भांजे हैं अतः उनका भी कुछ-कुछ महान होना तो बनता ही है। सेम-सेम डी.एन.ए. यू सी! (डी.एन.ए. की कोई 'भैलू' है या नहीं?) फिर 'वो' रिश्तेदार कितने ही दूर का हो या आप को मुंह भी नहीं लगाता हो ये आपकी प्रतिभा है कि उसे आप नज़दीक एकदम नजदीक ले आयें ताकि मुंह से मुंह लग जाये।

 

इसे दूसरे शब्दों में 'रिफ़्लेक्टड ग्लोरी' कहते हैं। जिन्हें नहीं मालूम उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि जैसे चंद्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं होती वह सूरज की रोशनी से चमकता फिरता है। कुछ यही हाल इन लोगों का होता है वह गाहे-बगाहे, जगह-जगह इसी मंत्र का जाप करते रहते हैं। इसमें वे कुछ सच्चे-झूठे किस्से भी जोड़ लेते हैं उन किस्सों में मुख्य पात्र वे खुद अथवा उनके ये बाबा, जीजा जी, चाचा-भतीजा होते हैं। वे सभी 'सक्सेस-स्टोरीज़' होती हैं। जिनमें वे खुद अथवा उनका ही अपना ‘वो’  जन्मजात हीरो बन कर निकलता है। यह बड़ी सुखद स्थिति होती है। यह भारत में बड़े काम की चीज़ है। आप यहाँ-वहाँ उनके नाम की जुगाली करते फिरते हैं। इसे अंग्रेज़ी में 'नेम-ड्रॉपिंग' कहते हैं। दरअसल! ग़लती उनकी भी नहीं। शेक्सपियर बहुत पहले कह गए थे:

 

    सम आर बाॅर्न ग्रेट, सम एचीव ग्रेटनेस, सम हैव ग्रेटनेस थर्स्ट अपाॅन दैम

 

तो ये इसी तीसरी किस्म के ग्रेट होते हैं। अब अगर उनका जीजा, साला, भाई-भतीजा ग्रेट है, तो है। इससे उनका रुतबा कम तो नहीं हो जाता। अब अगर समझो किसी का यही भाई-भतीजा भयंकर वाला अपराधी, क़ातिल या स्मगलर निकल जाये तो लोग सब पता लगा लेते है आप बताएं या नहीं। उसी प्रकार अगर उनके ‘वो’ बड़े आदमी बन गए तो इसका कुछ क्रेडिट तो उनको भी दिया जाना चाहिए। यह सब डर और ज़रूरियात का कारोबार है। डर ये कि अगर आपने उनका काम नहीं किया या उनका चालान कर ही दिया तो देख लें हमारे ‘वो’ आपका क्या हाल करेंगे। दूसरे अगर आप हमें छोड़ देते हैं/हमारी मदद करते हैं तो कल को हम आपका काम भी अपने ‘वो’ से कह कर हाथों-हाथ करवा देंगे। मुंबई में रेलवे वाले कहा करते हैं कि एक बार को ट्रैफिक पुलिस भी यह जानकर कि वो रेलवे में हैं फोन नंबर के आदान-प्रदान के बाद छोड़ देती है। यह वादा लेकर कि अगली बार ट्रेन में वी.आई.पी. कोटे से उनकी बर्थ पक्की है। अब अपने बाहर-गाँव कौन नहीं जाना चाहता। सीट की मारा-मारी/सरगर्मी, गर्मी की छुट्टियाँ पड़ते ही दर-साल होनी ही है। यह पचास साल पहले भी थी आज भी है।

 

आपको ऐसे लोगों पर दया करनी चाहिए कि उसके पास सिवाय यह कहने के और कुछ भी नहीं। ना अपनी लियाकत ना अपना नाम। उसकी योग्यता ही यह है कि वह आपका भाई-भतीजा है। उसकी रोज़ी/रोटी/प्रतिष्ठा या तीनों आपके नाम से ही चल रेली है। मैंने एक समारोह में शिरकत की जिसमें नामी फिल्म अभिनेता नहीं आ पाया तो भाई लोग उसकी बहन को ही ले आए। वो बेचारी सीधी-सादी गृहिणी समारोह की चीफ गेस्ट बनी और बचपन से लेकर अब तक के कुछ असली कुछ मनगढ़ंत किस्से सुनाती रही। जिससे दर्शकों को ये पता चले कि 'एक्टिंग' उसमें जन्म से ही थी। कैसे वह रोता भी फुल फुल एक्टिंग के साथ था। ये बेचारे 'मेरा बाप कौन सिंड्रोम' से ग्रस्त लोग भी ऐसे ही होते हैं। इनमें ये प्रतिभा होती है कि कौन से कहानी, कौन सी लघु कथा, कौन सा प्रकरण कहाँ डालना है। जो कहीं उनका सुरक्षा कर्मी या उनकी गाड़ी मिल जाये तो उस दिन तो वे शहर में अपने किसी काम को नहीं छोड़ते। यहाँ जा, वहाँ जा। इससे मिल, उससे मिल। अतः आप से निवेदन है कि ऐसे लोगों की हँसी न उड़ाएं। उनका मज़ाक नहीं बनाना है उनके साथ सहानुभूति रखें। वो कहावत है न कि अगर आपकी कुल जमा संपत्ति एक अदद हथौड़ा मात्र है तो आपको हर चीज़ कील दिखने लगती है। तो उनके पास यही एक अदद हथौड़ा ही तो है आप उनसे ये भी छीन लेना चाहते हैं। शेक्सपियर जो रोमियो-जूलियट में पूछते हैं "वाट्स इन नेम..."  गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो उसकी खुशबू वही रहनी है।  वही शेक्सपियर खुद ऑथेलो में कहते हैं - मेरे पास एक नाम ही तो है।

 

Saturday, June 27, 2026

व्यंग्य भालू बनाओ मोर बनाओ पर नौकरी दिलाओ

 

                                                       


एक समाचार के अनुसार चीन के एक चिड़ियाघर ने भालू की वेकेंसी निकाली हैं। आप सोचते होंगे भालू कौन समाचार पत्र पढ़ता है या टी.वी. देखता अथवा वोट देता है जो सुनेगा,समझेगा और नौकरी का सुन कर आपको वोट देने दौड़ पड़ेगा। हुज़ूर ये वेकेंसी आदमियों के लिए ही निकाली हैं। उन्हें भालू के भेष में चिड़ियाघर में अज़ीब अज़ीब भालू सी हरकतें करके दर्शकों का मनोरंजन करना है। शर्त ये है कि जब वे भालू के भेष में होंगे तब आदमी की भाषा में बोलने का नहीं है। बस खों-खों करना है। इन्सानों की भाषा में बोलना सर्वथा वर्जित है। वेतन होगा पूरे 14 लाख सालाना। सैकड़ों आवेदन आए और देखते-देखते सभी पद भर गए। सिर्फ दिन में 6 घंटे की ड्यूटी और महीने की चार छुट्टियां आलग से मिला करेंगी।

मैं सोच रहा हूँ अगर भारत के चिड़ियाघर भी ऐसी ही रोजगार योजना निकालें तो इस 'वनरेगा' का कोई जवाब न होगा। हम एक कदम और आगे जा सकते हैं। भालू ही क्यों, हम कुत्ता, बिल्ली, ऊंट, गधा, घोड़ा सब बनने को तैयार हैं। 14 लाख के इस पैकेज के लिए आज भी भारत की नवजवान पीढ़ी क्या-क्या नहीं कर रही। आप भालू की एक खों-खों की बात करते हो यहाँ रोजगार मार्किट में हाहाकार मची हुई है। दस-दस, बारह-बारह हज़ार के लिए न जाने क्या-क्या रें-रें खें-खें नहीं करनी पड़ रही है। अब तो कहते हैं हमारे यहाँ की आई.आई.टी. से निकले बच्चों का सी.टी.सी. भी बहुत नीचे आ गया है। शिक्षा का रोजगार से जुड़ा होना सुनते आए थे। अब तो दोनों ही क्षेत्र लस्त-पस्त बरबाद से पड़े हैं। पता नहीं इस क्षेत्र में रिनेसां कब आयेगा? आयेगा भी या नहीं?

प्राइवेट का क्या हाल है आप को भनक नहीं होगी। क्या बच्चे, क्या माताएं-बहनें सब बंधुआ मजदूर से लगे हुए हैं। न दिन दिखता है न रात। काम-काम बस काम। वह भी इतने कम वेतन पर। सिने अभिनेता मनोज कुमार जी की फिल्म उपकार का इन्दीवर जी के गीत की एक लाइन है:

                ये हाल रहा तो दुनिया में भारत की कहानी क्या होगी

               जिस देश का बचपन भूखा हो उसकी जवानी क्या होगी

जैसे-तैसे दूसरे देश चले जाओ तो वहाँ भी 'इंडियन' हो सुन कर कोई भालू भी नहीं बनाता। अब हमीं को योजनाबद्ध तरीके से शिक्षित बेरोजगारों के लिए नई-नई स्कीमें लानी पड़ेंगी यथा: अग्निभालू, अग्नि गधा, अग्नि कुत्ता। तरुणाई का इस युग में इतना अनादर है कि सुन-सुन कलेजा मुंह को आता है। क्या नई पीढ़ी को अब बस भालू-कुत्ता-गधा बना कर ही छोड़ेंगे।

                           डेढ़ आखर खों-खों का

                           पढ़े सो भालू होय


भालू महान है। वह कॉकरोच से बड़ा होता है। वह परजीवी नहीं होता बल्कि उल्टे मदारी और उसके परिवार का पेट पालता है।

Monday, June 22, 2026

व्यंग्य: 45 मिनट्स एट पालम

 

 

हम कितने खुशकिस्मत हैं हमें ऐसे ऐसे नेता मिले हैं कि हमारा सीना गर्व से फूल जाता है। सिर ऊंचा उठ कर आकाश की तरफ बढ़ा जाता है। हिन्दुस्तानी क़ौम अपने लीडरान से त्याग की तवक़्क़ो करती है। हमारे नेता भी एक के बाद एक त्याग की घोषणाएँ करते ही रहते हैं। अब यह हमारे नेताओं की आदत सी हो गयी है। आपने सुना नहीं कितनी ही बार खबर आती है कि फलां ने 'चिल्ला' खींचा है बोले तो बीड़ा उठाया है कि जब तक ढिकाने की सरकार नहीं आ जाती है वह दाढ़ी नहीं काटेगा, अथवा वह जूता-चप्पल नहीं पहनेगा।  कुछ बरस पहले एक नेता जी को जब ये पता चला कि कैसे उनके कारों के काफिले के लिए लगाई गयी ट्रैफिक की रोक-टोक की वजह से बच्चे बोर्ड की परीक्षा देने से वंचित रह गए। यह सुन कर वह इतने द्रवित हुए इतने द्रवित हुए कि दर्जनों तौलिये तो उनके आंसुओं से भीग गए। फिर उन्होने खुद को संभाला और तुरंत ऐलान किया कि अब से वे वायुयान/हेलिकाॅप्टर  से यात्रा किया करेंगे। वे ये कदापि नहीं चाहेंगे कि उनकी वजह से बच्चों का जिनको वे देश का मुस्तकबिल समझते हैं को कोई तनिक सी भी कठिनाई आए।

 

कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है। अभी फिर ऐसा वाकया आया है जहां नेताजी को जैसे ही पता चला कि आज महत्वपूर्ण परीक्षा है उन्होने तुरत फुरत राष्ट्रीय हित में यह फैसला लिया कि वे परीक्षा शुरू होने तक यहीं एयरपोर्ट पर रुकेंगे ताकि उनके लिए लगाए गए 'रूट' से किसी भी स्टूडेंट को कठिनाई ना आए। कहीं वह अपने सेंटर जाने में लेट न हो जायें। आपको दोस्ती फिल्म का वो गीत याद है ना मेरा तो जो भी कदम है वो तेरी राह में है बस यूं समझिए नेता जो भी निर्णय लेता है या जो भी निर्णय नहीं लेता है सब राष्ट्रीय हित  में होता है। उफ़्फ़ वो 45 मिनट्स जो देश की तकदीर बदल देंगे। कैसे ? अरे भाई सब जानते हैं आज के ये बच्चे कल का भविष्य हैं। एक किताब प्रकाशित होनी चाहिए बाद में उस पर फिल्म भी बनाई जा सकती है। अगर '90 मिनट्स एट एंटेबी'  बन सकती है तो '45 मिनट्स एट पालम' क्यों नहीं। सोचिए कितनी चलेगी। एक के बाद एक राज्य, टैक्स फ्री अलग कर देंगे।

 

दिखाया जाएगा कि कैसे नेता जी को जैसे ही पता चला आज देश में इतनी बड़ी परीक्षा है वे एयरपोर्ट से बाहर निकल कर फिर उल्टे पाँव लौट गए। उनका 'एंग्री यंगमैन' रूप पब्लिक ने देखा कमसकम उनके स्टाफ ने तो देखा ही। कहते हैं उन्होने कुछ  बड़बड़ाया कि "नालयको ! ये बात पहले ही बता देते तो विदेश प्रवास का एक दिन और बढ़ा सकते थे"। लेकिन उन्होने तुरंत अपने सेक्रेटरी को बुलाया और बताया कि वह प्रेस में विज्ञप्ति जारी कर दे कि कैसे नेता जी ने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने सभी काम, जरूरी अपाॅइन्टमेंट मुल्तवी करते हुए 45 मिनट्स एयरपोर्ट पर ही रुकने का ऐतहासिक फैसला लिया है। ऐतहासिक इसलिए कि इससे पहले 70 सालों में किसी भी नेता ने यह फैसला नहीं लिया। इसी के साथ ही इस तरह वे भारत के पहले ऐसे नेता बन गए।

 

तभी किसी मुखालिफ पार्टी के छुटभैये नेता ने सवाल खड़ा कर रंग में भंग डाल दिया। ये ऐसे निगेटिव लोगों की, ऐसे बिना सिर-दुम के सवाल पूछने वालों की ज़ुबान जला क्यों नहीं दी जाती। पूछते हैं: प्रधानमंत्री चुपचाप चले जाते किसी को पता भी नहीं चलना था। आप खुद ही शोर मचायंगे तो डिस्टर्ब तो होना ही है। दूसरे उनका कहना है कि विदेश में तो ऐसे कोई विशेष इंतजामात होते नहीं उल्टे वो तो कभी साइकिल पर कभी पैदल, कभी बस या मेट्रो में अकेले ही घूमते फिरते हैं। ना कोई उन्हे डिस्टर्ब करता है ना वो किसी को। विपक्षी नेता ने एक बात और पूछी कि किसी ने ये पता लगाया भी क्या एयरपोर्ट से नेताजी के घर के रूट पर कोई एक्जाम सेंटर था भी या नहीं। हमने तो सुना था की नेता जी के आवास पर हेलिकाॅप्टर के लिए हेलीपैड भी है फिर क्यों नहीं वे एयरपोर्ट से हेलीपैड की ओर रवाना हो गए ? अब ऐसे ही कुछ बेसिरपैर के सवाल थे जिन्हें पूछने की गंदी आदत विपक्षियों को लग गयी है। देश के विकास के लिए इनके पास कोई ठोस अजेंडा तो है नहीं। इसीलिए इन्हें चुनाव दर चुनाव पब्लिक नकार रही है। पता नहीं इन्हें कब अक़ल आएगी।

Saturday, June 20, 2026

व्यंग्य: पर्ची बम



दीवाली पर अनेक तरह के बम मार्किट में आते रहे हैं। एक से बढ़ कर एक। समर्थ लोग पूरी 'लड़ी' भी जलाया करते थे। पतले बम, छोटे बम, बड़े बम, दरमियाने बम। मोटे बम। इन सबसे अलग और विशिष्ट होते थे सुतली बम। बहुत जानदार और शानदार आवाज वाले। पलीते में आग लगाने वाले के थोड़ी देर को तो कान ही सुन्न पड़ जाते थे। ये सब बम एक तरफ क्यों कि ये मौसमी बम होते, वही दो-चार दिन के पटाखे। इधर 'पर्ची बम' निकल कर आया है जो पहले तो उन राज्यों में प्रकट होता है जहां चुनाव आदि हुआ करते हैं। डेमोक्रेसी एक खर्चीली शासन प्रणाली है। अब जैसे-तैसे चुनाव अगर डेमोक्रेटिक्ली करा लिए गए हैं तो सी.एम. पर्ची से चुने जाने लगे। आप छोटी सी पर्ची पर न जाएँ इसके पीछे कितनी आर. एंड डी. जाती है आपको पता नहीं।

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अब लोग 'पोल' (चुनाव)  से इतना नहीं डरते। क्यों कि जो है सो, टिकट भी पर्ची से ही मिलने लगी है। पर्ची-खर्ची एक नया टर्म है जो आज के प्रजातन्त्र ने हमें दिया है। प्रजातन्त्र नित नयी शब्दावली हमें देता है। बैलट था तो बूथ था, बूथ था तो बूथ केप्चरिंग थी। अब ई.वी.एम. है बोले तो ई. से इलेक्शन वी. से वोटिंग और एम. से मशीन। अब मशीन है तो मशीनें खराब होतीं हैं। मशीनें ऑटोमैटिक भी होती हैं। सैल्फ-सफिशियंट टाइप। स्कूल-कॉलेज में हम लोग नकल के लिए चिट/फर्रे इस्तेमाल करते थे। बहुधा पकड़े जाने पर चिट ज़ब्त हो जाती थी। गोया कि हिंदुस्तान में पर्ची का वजूद बहुत पहले से रहा है। मुग़ल काल में इसी को 'रुक्का' कहा जाता था। अब क्यों कि ज़्यादातर परीक्षाएँ लीक हो जाती हैं अतः चिट/फर्रे का चलन मृतप्राय: हो गया है। जहां सफलतापूर्वक परीक्षा हो भी जाये तो वह क्यों कि ऑन-लाइन होने लगी है अतः पर्ची चल नहीं पाती। ठीक है यहाँ नहीं चल पाती न चले और भी क्षेत्र हैं जहां यह अभी भी खूब ही प्रासंगिक है। बल्कि चलन ही पर्ची का है। पर्ची कभी आउट ऑफ फैशन नहीं होगी।

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आपने पीछे देखा है किस तरह सूबे के वज़ीर-ए-आला पर्ची से निकलने लगे हैं। पहले मतदान के बाद कहा जाता था इनका भविष्य मतपेटी या ई. वी.एम. में क़ैद हो गया है। अब ऐसा नहीं है अब तो यूं कहिए अगले का मुस्तकबिल पर्ची में क़ैद है। पर्ची खुलने पर ये बात खुलेगी कि आपकी किस्मत खुली भी है या नहीं। ये पी.ए. लोग भी पर्ची भेजते हैं मगर उस पर्ची की शब्दावली देखने लायक होती है “मुझे यह कहने का आदेश हुआ है कि.....कृपया इनके आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाये” इसका अर्थ ये होता है कि काम नहीं हुआ तो आप अपनी छुट्टी समझें और आपके केस पर सहानुभूति पूर्वक विचार तो दूर कोई नामलेवा भी नहीं होगा। एफ.आई.आर. को उर्दू में 'पर्चा' कहा जाता है चुनांचे अगर आप पर्ची का यथोचित आदर-सम्मान नहीं करते हैं तो अपना पर्चा कटाने को तैयार रहें। फिर भी तो पर्ची की शरण में ही आना पड़ेगा। अब समझे हुज़ूर !! पर्ची की अहमियत।


उसने मुझे बताया मेरे नाम की है पर्ची

फिर कैसे निकाली उसने रक़ीब की पर्ची

मुझे भरोसा था अपनी वफा पर

जाने कब आगई दरमियाँ में पर्ची

तिजारत से तंग हो,आई सियासत में पर्ची

ऐ ! खुदा मत भेजना मेरी मुहब्बत में पर्ची

महबूब की इस अदा पर निसार हर पर्ची

कसम खा हर बार कहती है -- 

'दिल से मैं तुम्हारी हूँ भले निकले किसी के नाम की पर्ची