Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Saturday, September 12, 2026

व्यंग्य: तुम तो धोखेबाज़ हो

 


 

ये गाना है या तबाही है। मुझे तो लगता है पूरा का पूरा गीत ही तबाही एकदम तबाही है। समीर (पुत्र गीतकार श्री अनजान) ने जब यह गीत रचा होगा सोचा नहीं होगा। अलका याज्ञनिक और कुमार शानू ने यह गाया है। अभी हाल ही मे अलका याज्ञानिक जी  को वील-चेयर पर टी वी में देख दुख हुआ। वे बहुत मेहनत से यहाँ तक पहुंची। उनकी आवाज मोहक है। मैंने एक बार उनका लाइव कार्यक्रम मुंबई के एन सी पी ए हॉल में देखा था। कुमार शानू जी के तो अपने ही बहुत पचड़े हैं। सुकून नहीं है उनके भी रोमांटिक-कम-वैवाहिक जीवन में। अब लो संगीतकार जी की जोड़ी को। नदीम-श्रवण। ये नदीम वही हैं प्रतिभा सिन्हा वाले लफड़े के नायक बोलो, खलनायक बोलो। यह गोविंदा की फिल्म का गीत है वही गोविंदा जिनके कभी पैर में धोखे से गोली लग जाती है।  कभी कोई और रोमांटिक किस्सा लग जाता है। हमें कैसे पता चला? वो तो उनकी पत्नी जी ही खुद-ब-खुद आई एम ए बांद्रा गर्ल बता देती हैं। उनके साथ नायिका थीं करिश्मा कपूर जी। यह साजन चले ससुराल फिल्म का गीत है जो तीस साल पहले आयी थी।

 

देखिये आप भले फिल्म को भूल गए हों पर ये गीत तो कालजयी साबित हो रहा है। देसी डिस्को और बोर हो रही हाउस वाइव्ज़ के लिए यह हाथ-पाँव हिलाने का बहाना बनता है।   आजकल हम लोग बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं। कभी हम बोर होते थे, अब तो सुनने में आता है की फलां चीज़ बोर है। फलां डिश बोर है। जैसे आजकल मैं अपने जूतों से बोर हो गया हूँ। पंद्रह साल हो गए पहनते-पहनते फटने-टूटने का नाम ही नहीं ले रहे थे।  अतः एक दिन मैंने आव देखा न ताव और उन्हें फेंक ही दिया।

 

कानपुर केस में  यह सुनने में आया है कि जिस संस्कारी भारतीय नारी पर षड्यंत्र करने का शक ज़ाहिर कर हिरासत में लिया गया है वह कत्ल के वक़्त इसी गीत पर एक क्लब में नृत्य-मगन थी। यूं वह बार-बार अपने फोन को भी देख रही थी और पति महोदय भी फ़ोन पर बात कर रहे थे। अब देखिये ये फोन ही धोखेबाज़ निकला लाख डिलीट किया फिर भी सब रिकॉर्ड निकल आया है और निकल रहा है। उसी तरह सी सी टी वी ने भी धोखा दे दिया। वो जिसे आप स्मार्ट कह रहे थे वह नौकर तो तुरंत ही तोते की तरह बोलने लगा। वह भी धोखेबाज़ ही निकाला। इस्तेमाल करना था तकिया इस्तेमाल किया रामपुरिया। वह भी 26 बार। इसमें भी धोखा। छह लाख की डील बताई जाती है। उसने धोखा दे दिया। सब उगल दिया। भाड़ में जाये ऐसी स्मार्टनेस। या फिर उसने ये स्मार्टनेस दिखाई कि मैं इल्ज़ाम अपने सिर क्यूँ लूँ। मेरा क्या लेना-देना। सोसायटी के गार्ड ने भी बिना देर किए सब कह दिया  किसने इन दोनों को अंदर आने की वह भी बिना रजिस्टर पर एंट्री के इजाजत दी थी। धोखा-धोखा और धोखा। मराठी में धोखा का अर्थ खतरा होता है।

 

सत्तर के दशक में  दिल्ली में  एक विद्या जैन हत्याकांड हुआ था। जिसमें एक नेत्र स्पेशलिस्ट ने अपनी पत्नी जी को अपनी नर्स के चक्कर में  सुपारी दे मरवा दिया था। तब कहा जाता था कहने को वह आँखों का स्पेशलिस्ट था पर अपने खुद के मोतियाबिंद का इलाज़ नहीं कर पाया। ऐसे ही इस केस में  बेचारे ससुर साब यूं तो दवा के संभ्रांत सौदागर थे पर इस धोखे की दवा उनके पास भी नहीं निकली जिसकी कीमत उन्होने अपनी जान देकर चुकाई। वारदात मेन सब धोखे बाज़ ही निकल रहे हैं।  अब किस किस को कहें तुम तो धोखेबाज़ हो.....           

व्यंग्य: भारत की विश्व को देन

 

 

                   अक्सर एक सवाल हवा में उछाला जाता है कि फलां देश ने ये दिया, फलां देश ने दुनिया को ये दिया। भारत ने दुनिया को क्या दिया? उन सबको जवाब के रूप में मेरा ये लेख है। आप को भी फुल-फुल गदगद होने और गर्व करने का अधिकार है। चलिये साथ-साथ गर्व करते हैं और गदगद होते हैं। श्री मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की एक फिल्म थी ‘पूरब और पश्चिम’ उसमें मदन पुरी जी एक संवाद बोलते हैं: भारत ने दुनिया को क्या दिया कुछ नहीं। भारत ज़ीरो है ज़ीरो। बस इसी पर मनोज कुमार जी एक गीत गाते हैं  जब ज़ीरो दिया भारत ने.... कुल जमा ये कि हमने विश्व को ज़ीरो दिया। इसका ये मतलब कतई नहीं निकालें कि हम ज़ीरो हैं। फैज़ साब का एक शेर है –

 

               मैं कर रहा था ग़म-ए-जहां का हिसाब

               तुम याद बेहिसाब आए

 

 तो लीजिये मेरी समझ से भारत ने विश्व को क्या-क्या दिया बल्कि ‘क्या-क्या न दिया दिलबर...’ पेश है सूची:

 

1 जुगाड़ तकनीकी: ऐसी ऐसी तरकीबें और युक्तियाँ हैं जो आपने न कहीं देखी होंगी न सुनी होंगी। मसलन वाशिंग मशीन में लस्सी बनाना। पुराने फ्रिज को अलमीरा की तरह इस्तेमाल करना। किताब की फ़ोटोस्टेट कराकर बेचना। पंप से जुगाड़ रूपी वाहन तैयार करना और उसी को वक़्त ज़रूरत खेत में काम लेना। आप सोचेंगे तो आप भी दो-चार जुगाड़ जोड़ देंगे। 

2 चुगली: हमारे यहाँ चुगली के लिए आबोहवा बहुत ही माफिक है। आप बेधड़क किसी की भी चुगली किसी से भी कर सकते हैं। जितने चुगली करने वाले हैं उससे कहीं ज्यादा चुगली सुनने को आतुर बैठे हैं। मोटा मोटा डिमांड  और सप्लाई का खेल है। डिमांड ज्यादा है सप्लाई कम है। फेसबुक से बड़ा आराम पहुंचा है फेसबुक कच्चा माल मुहैया करता है किसी के प्रोफाइल में जाकर खंगालना ऐसी ही एक ताका-झांकी है।  बेहद सुकून भरी और स्फूर्ति देने वाली। श्रेष्ठ चुगलीकार कभी अपना नाम नहीं आने देते और अगले को भी ताकीद कर देते हैं कि उनका नाम नहीं आना चाहिए। 

3 सड़क/भवन बनाने की तकनीक: हमारे यहाँ सी तकनीक दुनिया में कहीं नहीं पाई जाती। हमारा दावा भी है कि ये स्पेस टेक्नालाजी है। हमारे बनाए पुल अक्सर ‘बैठ’ जाते हैं। सच भी है कब तक खड़े रहेंगे? आपने बैठने को बोलना नहीं है। अतः हमारे पुल अगर कुछ महीने चल जाएँ तो इसे बहुत समझना चाहिए। कुछ पुलों का जीवन तो इतना क्षण भंगुर होता है कि कुछ हफ्तों में ही सिमट के रह जाता है।

 

        पानी केरा बुदबुदा अस पुल औ सड़क की जात

        पेमेंट / उदघाटन होत टूट जात, ज्यों तारा प्रभात

 

कई बार तो पुल को अपने ढहने की इतनी जल्दी होती है कि उदघाटन से पहले ही थक जाता है। आप इसे पुल ढहना न कहें ये पुल का बलिदान है ताकि इसमें लगे कामगार, सुपरवाइज़र, ठेकेदार, बिचौलिये, इंजीनीयर नेता आदि सबका चूल्हा जलता रहे। यही गुण हमारी सड़कों में भी पाया जाता है। सड़क में गड्डा है या गड्डे में सड़क है अंतर करना कठिन काम है। अभी तक बस यही गनीमत है कि सड़क पर चलने वालों पर दोषारोपण नहीं हुआ है कि ये ही नालायक हैं इन्हें वर्ल्ड क्लास सड़क पर कैसे चलना है आता ही नहीं। तमीज और तहज़ीब का नितांत अभाव है। हमारी सड़कें अक्सर उदघाटन से पहले ही बेसब्र हो जाती हैं। लेकिन पुल की तरह सड़कों का भी जीवन में उच्च आदर्श है वही इस सड़क को बनाने वाले सभी कर्मियों, नेताओं और ठेकेदारों का जीवन-यापन।

 

                 बार बार टूटो हज़ार बार टूटो

                 ये टूटने की चीज़ है मेरे शहर की सड़क दिलरुबा

 

4 मिलावट की प्रतिभा: इसमें तो दुनिया हमारा लोहा मानती है। अब खैर चीन वाले भी इसमें आन घुसे हैं। पर हमारा कोई तोड़ नहीं। हम वो जादूगर हैं कि आप हमें बताओ चेलेंज दो और हम हूबहू नकल तैयार कर देंगे। हम मिलावटी दूध, घी, चीनी, चाय, तरबूज क्या नहीं बना सकते। हम मिलावट की दुनिया के बेताज बादशाह हैं। 

5 दहेज व दहेज हत्या: यह प्रतिभा हमारी विशेषता है। हम लड़की वाले के खून की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेते हैं और उसके बाद भी उनकी लड़की को जला भी सकते हैं, मार भी सकते हैं। मार कर फांसी पर भी लटका सकते हैं। 

6 ऑनर किलिंग: हम इज्ज़त वाले लोग हैं। हमें ये कतई मंजूर नहीं  कि हमारी पगड़ी उछाली जाये वो। भी हमारी अपनी घर की बहू बेटियों द्वरा अतः हम अपने ऑनर के लिए जब जी चाहे उन्हें मार देते हैं अथवा पेड़ पर लटका देते हैं। हम अपने ऑनर के लिए कुछ भी करेगा और अपने बच्चों को मारना तो सबसे आसान है। इसमें हमारी बिरादरी/हमारा समाज भी हमारा ही साथ देता है।

7 पूर्णत: सिद्धान्त विहीन राजनीतिज्ञ: सिद्धान्त सिद्धान्त है और राजनीति राजनीति है। हम कभी दोनों को मिक्स नहीं करते। वो अपनी जगह, ये अपनी जगह। हम पार्टी और लॉयल्टी ऐसे बदलते हैं जैसे मुंबई वाले बानियान बदलते हैं या दफ्तर जाने को लोकल बदलते हैं। हमारा एक ही सिद्धांत है वह है कुर्सी। प्राण जाये पर कुर्सी न जाये। आदमी जीता है कुर्सी के लिए मरता है कुर्सी के लिए। कत्ल करता है कुर्सी के लिए। कत्ल होता है कुर्सी के लिए। भारत एक कुर्सी प्रधान देश है। यहाँ तरह तरह के विषशण चलते हैं युवा हृदय सम्राट, यूथ ऑइकोन, मजदूर नेता, श्रमिक नेता। राजपूत नेता, दलित नेता। हमारा ईमान कुर्सी है। हमारा धर्म कुर्सी है। कुर्सी के आगे हम किसी को नहीं पहचानते भाई है चचा है भतीजा है।

8 भयंकर भ्रष्ट नौकरशाह: हमारे दफ्तरों की फाइल को चलाने के लिए पहिये चाहिए होते हैं।  वे पहिये होते हैं करेंसी। जितना ज्यादा कोयला डालोगे उतनी ज्यादा स्टीम बनेगी और उतनी ही तेजी से गाड़ी चलेगी। अतः दफ्तर में आप जितना ज्यादा ‘सुविधा शुल्क’ रूपी रिश्वत डालेंगे आपकी फाइल उतनी ही सुपरसोनिक स्पीड से चल पड़ेगी और आपका काम आपके ‘डोर स्टेप’ पर होकर आ जाएगा। आप नौकर शाह के नौकर पर न जाएँ आप तो पीछे लगे शाह को देखें। हम नौकर तो हैं पर आपके नहीं।  पैसे रूपी बादशाह के।  हम काले को सफ़ेद, सफ़ेद को काला करने की कला जानते हैं। हम बैक डेट में क्या नहीं कर सकते। असल में आग का आविष्कार हमने ही किया था। छांट छांट कर दफ्तर, दफ्तर के कक्ष और निर्धारित फाइलों में ही आग लगती है। अब हम भी क्या करें कुछ फाइलें होती ही इतनी ज्वलनशील हैं कि कितने ही एहतियात से रखो आग पकड़ लेती हैं बस ऐसे समझो जैसे फास्फोरस।

9 लचर मेडिकल सिस्टम: आप कभी गुमनाम बन कर सरकारी अस्पताल चले जाएँ आपका सारा वहम निकल जाएगा। दिनों दिन नंबर ही नहीं आयेगा। डॉ आपको रेफर करने की जुगाड़ में रहता है। डिस्पेन्सरी में डॉ है तो फार्मेसिस्ट नहीं, वह है तो दवा नहीं, दवा है तो पता नहीं असली है या नकली है। सरकारी मे जान से जाना और प्राइवेट मे माल से जाना तया है। गो कि आप ज़िंदा हैं ये भी किसी चमत्कार से कम नहीं।

10 अशिक्षित शिक्षा व्यवस्था: स्कूल हो या कॉलेज अव्वल तो आपका दाखिला होना नहीं है। हो गया तो फीस दे दे कर आप गरीबी की रेखा से नीचे आ जाएंगे। परीक्षा की कोई गारंटी नहीं है। पेपर कब लीक हो जाय, सुबह से शाम तक कभी भी हो सकता है।  हाँ लीक होने की गारंटी पूरी पूरी है। टीचर्स डे पर जिस प्रकार के डांस और गाने स्टेज पर चल रहे हैं वैसे हमारे टाइम पर डिस्को में भी नहीं बजते थे। कहने को बी ए पास हैं पर आप बी ए की फुल फॉर्म भी पूछ लो तो बगलें झाँकने लगेंगे। इंगलिश  छोड़िए हिन्दी की भी पाँच लाइन शुद्ध नहीं लिख सकते।

11 दलालगीरी: हमारे देश की रीढ़ की हड्डी कोई है तो वे ये दलाल भाई ही हैं। दफ्तर दफ्तर इनका बोलबाला है। बल्कि इनका ही बोलबाला है। आप ड्राइविंग लाइसेन्स हो, राशन कार्ड हो आधार हो पासपोर्ट हो, बिजली का बिल माफ कराना हो, किसी फायदे की स्कीम में अपना नाम डलवाना हो, सब जगह इनका ही वर्चस्व है। ये सर्वव्यापी हैं। ये सर्वशक्तिशाली हैं। 

12 डायनासोर व केंचुआ बनने की कला: हमारे नौकरशाह हों या मंत्री-संतरी सब इस कला के धुरंधर होते हैं। पल में तोला पल में माशा की तर्ज़ पर ये अपने से कमजोर के आगे डायनासोर बन जाते हैं और अपने से बलशाली के आगे तुरंत खींसे निपोरने लगते हैं और केंचुआ बन जाते हैं। रीढ़ की हड्डी है ही नहीं। ये बैंगन के गुण दोष आपकी हैसियत देख कर बताते हैं, बैंगन की नहीं। 

13 चमचागीरी: इस कला में हम विश्व में नंबर वन हैं। पता नहीं इसका कोई इंडेक्स अभी तक क्यों नहीं बनाया गया है। हम रिकॉर्ड तोड़ चमचागीरी करते हैं। इस कला को हमने नैक्स्ट लेवल पर पहुंचाया है। इसे हमने ‘फाइन आर्ट’ में पदोन्नत किया है। यह अब एक ललित कला है। बारीक और इतनी अंतरंग कि चमचागीरी हो रही है ऐसा लगे बिना ही चमचागीरी करना। हमने इसे ऐसे समझो ‘मास्टर’ कर लिया है। मेरा मानना है कि हमें आई. आई. सी., आई. आई. ए. सी. खोलने चाहिए जिससे पूरा विश्व हमारी इस कला से लाभन्वित हो सके।

 

                  भारत डेमोक्रेसी की ही माँ नहीं और कितने ही चीजों का बाप है तुम क्या जानो रमेश बाबू। 

व्यंग्य: मांजरी (बिल्ली) मुंबई और मेट्रो

 


 

                     खबर आई है कि मुंबई-मेट्रो स्टेशन के एक स्टेशन गुंडावलि पर  एक बिल्ली बड़े अरसे से आते-जाते यात्रियों को अपनी पैनी नज़र से देखती, परखा करती थी। वह बिला नागा अपनी ड्यूटी पर आ जाती थी और अपना निर्धारित स्थान ग्रहण कर अपनी ड्यूटी पर लग जाती थी। यात्री उस से और वह यात्रियों से भलीभाँति परिचित थे। वे अपनी अपनी भाषा में एक दूसरे का अभिवादन कर ‘प्लेज्नट्रीज़’ भी एक्सचेंज करते थे। अच्छा खुशनुमा माहौल रहता था। मुंबई में बिल्लियों का विशेष स्थान है। वे स्नेह की पात्र होती हैं। बहुत तादाद में उन्हें पालते हैं। उनसे लाड़  लड़ाते हैं। हालांकि बिल्ली बहुत डिमांडिंग होती हैं, खासकर डॉगी बिरादरान के मुक़ाबले। एक कहावत भी है ना : जब आप अपने पालतू डॉगी की आवभगत करते हैं  तो वह मन ही मन कहता है मेरा मालिक मेरे लिए भगवान है। जब आप अपनी पालतू बिल्ली की आवभगत करते हैं तो वह मन ही मन कहती है अपुन हीच भगवान है। मुंबई प्रवास के दौरान कोलाबा में मेरे आस-पड़ोस में बाकायदा लोग बाग बिल्लियों को खाना खिलाते थे। एक भद्र दयालु महिला तो बिल्लियों को भोजन देने सुबह-सुबह तड़के ही निकल पड़ती थी। बिल्लियाँ उसकी प्रतीक्षा करती थी, एक बार उन ‘मैडम’ से बात हुई तो मैंने नोट किया उनकी अपनी आँखें बिल्ली की तरह ग्रीन, स्थिर, ठंडी और एक हद तक डरावनी सी थीं। फिल्मों में भी बिल्ली का खूब महिमामंडन किया गया है। अक्सर हीरो, हीरोइन अथवा बॉस बिल्ली से खेलता दिखाया जाता, फिल्मों के टाइटल भी ‘ब्लेक कैट’ जैसे होते हैं।

 

मुंबई में ये बिल्ली पालने का रिवाज शायद अंग्रेजों से आया होगा। जब मेट्रो के यात्रियों को गुंडावली स्टेशन पर बिल्ली दिखाई नहीं दी तो उन्होने पूछताछ की और मेट्रो के अधिकारियों से अनुरोध किया कि अब उनको इस बिल्ली की इतनी आदत सी पड़ गई है। अब उसे कृपया भगाया न जाये। मुंबई मेट्रो के अधिकारीगण, यात्रियों से भी चार कदम आगे निकले। उन्होने बिल्ली को ‘अपाइंट’ ही कर लिया और उसे भन्नाट  पदनाम (डेजिंग्नेशन) भी दे दिया -चीफ फ्लाइन ऑफिसर, बोले तो सी.एफ.ओ. । बिल्ली भी खूब खुश होगी। आज के इस संविदा और अग्निवीर के दौर में सीधे चीफ की पोस्ट। वाओ वाओ! नो नो म्याऊँ!म्याऊँ! मुंबई के मेरे ऑफिस में बहुत बिल्लियाँ थीं। मुझे बताया गया कि ये पीढ़ियों से यहाँ हैं इनके ग्रेट ग्रेट ग्रेट ग्रांड फादर भी यहीं के डोमिसाइल थे। पता लगा कि फाइलों को चूहे कुतर जाते थे अतः ऑफिस में बिल्लियाँ पाले जाने लगीं। उनके दूध-बिस्किट के लिए ऑफिस सुपेर्टेंडेंट के पास एक इम्प्रेस्ट भी होता था। अब जब चहुं ओर बिल्लियों का राज हो तो चूहे क्या खा कर फाइल खाएँगे।

 

                            ये बंद अलमीरा और फिर उसके बाद डिजिटल रिकॉर्ड होने पर बिल्लियों की लापरवाही होने लगीं। कभी जहां हृष्ट-पुष्ट बिल्लियाँ कॉरीडोर के चक्कर लगाती थीं। अब बिल्ली इतनी मरगिल्ली हो गयी कि युवा बिल्लियाँ भी शिशु जैसी नन्ही-मुन्नी लगने लग पड़ी हैं। हो सकता है वो भी आजकल के दौर के अनुसार स्लिम-ट्रिम रहना पसंद करती हों यूं भी अब उनके लिए दूध कहाँ यहाँ आदमी को तो दूध नसीब नहीं हो रहा बेचारों को केमिकल मिला नकली दूध, नकली चाय में दाल के पीना पड़ रहा है। गुंडावलि की बिल्ली निश्वय ही तक़दीर वाली है। वरना आदमी लोग को तो सी.एफ.ओ. क्या कोई संविदा या ठेके पर लेने वाला कोई नहीं। वक़्त है कि अब बिल्ली दो-चार लोगों के परिवार को पाल ले। आखिर हमारी दिल्ली में लंगूर अपने ‘मालिक’ के परिवार का पेट पाल ही रहा है।

 

नोट: अभी इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है ये गुंडावलि स्टेशन पर

        मांजलि (बिल्ली) है अथवा बोका (बिलौटा)

व्यंग्य : शामत बिचौलियों की

                          

                        लो जी 'क्राइम पेट्रोल' में इसी बात की कमी रह गयी थी। लेटेस्ट ये है कि जब प्रेमी को पता चला कि उसकी प्रेमिका के घरवाले प्रेमिका की शादी प्रेमी से कराने को राज़ी नहीं है तो उसे बहुत दुख हुआ। वो गाना है ना
 
                    "तुम अगर मुझको न चाहो तो 
                     कोई बात नहीं! 
                    किसी और को चाहोगी 
                    तो मुश्किल होगी" 


 बस कुछ इसी तर्ज़ पर जब पागल-प्रेमी महोदय को पता चला कि न केवल प्रेमिका के घरवाले प्रेमिका की शादी प्रेमी से यानि उससे करने को तैयार नहीं बल्कि वो उसकी शादी कहीं और करने की जुगाड़ में है। यह जान पागल प्रेमी और ज्यादा पागल हो गया। फिर उसे पता चला कि इस प्रस्तावित शादी का बिचौलिया बोलो, मध्यस्थ बोलो, विचोला बोलो, मिडल मैन बोलो घोटक बोलो या फिर ईडानीलअकरन बोलो वह कोई और नहीं बल्कि उसका दोस्त ही है। बस ये सुनना था कि हीरो हीरालाल का पागलपन चरम पर पहुँच गया।


 "दोस्त! दोस्त न रहा" की  तर्ज़ पर उसने एक दारू पार्टी अपने इस विचोले दोस्त के ऑनर में घोषित कर दी। इसी पार्टी में हीरो ने उस बेचारे बिचोलियो को गोली मार दी। अब ऐसा भी कोई करता है। जिसे देखो वो 'साइको-किलर' ही बना जा रहा है। जितना प्यार, उस से दस गुना ‘हेट’ समाज में चल रेली है। अब इस घटना से दूसरे बिचोलियों में 'पैनिक' फैलना ही था। पहले ही समाज में इस जमात का बहुत टोटा चल रहा है। ये तो बेचारे पहले के ही चले आ रहे हैं जिन्हें समाज का, उसके रीतिरिवाज का, आपके लाड़ले और बिटिया का ख्याल हुआ करता था। वे पूरी सूची की सूची रखते थे। किसका लड़का क्या कर रहा है? किसकी लड़की सयानी हो रही है? अब तो जहां देखो विज्ञापन की बहार है। पाणिग्रहण के लिए विज्ञापन 'पान-बहार' की तरह दिये जाने लगे हैं। सबसे बड़ी बात सच-झूठ का पता लगाने का कोई मकेनिज़्म नहीं है। अभी तक एक ट्राइंगल बना हुआ था -पति-पत्नी और वो। अब इस ट्राइंगल में एक कोण बिचोलिए का भी आन जुड़ा। दूसरे शब्दों में अब ये ट्राइंगल नहीं रह गया है बल्कि स्क्वाॅयर बोलो, रेक्टेंगल बोलो हो गया है। 180 डिग्री से सीधे 360 डिग्री। 


 बिचोलियो! अब तुम्हारी खैर नहीं। कुछ तो अभी से अपने लिए ज़ेड-प्लस सिक्युरिटी रख लेंगे या फिर बंदूक के लाइसेन्स के लिए आवेदन देने लग पड़ेंगे। यह पहली बार होगा कि अब प्रेमी/प्रेमिका,पति,पत्नी के मिडल में मिडलमैन भी आ गया है। वो कहावत है न ‘दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय’। बहुत तुमने झूठी सच्ची कहानियाँ सुना ली। अब ये खूनी कहानी है। पहले ही बिचोलियों की कमी है। जो हैं वो भी लगभग बेरोजगार बैठे हैं। कारण ली।लिव-इन में कोई बिचोलिया दरकार नहीं है। ये तो दो कबाबों का मिलन है इसमें हड्डी नहीं मांगता। उस पर तुर्रा ये कि अब जान के लाले भी पड़ने लग जाएँगे। बेचारे ऐसे तो वे 'एक्सटिंक्ट' हो जाएंगे। मिडल-मैन हमारे समाज का अभिन्न अंग है। हमें उनकी ज़रूरत है। उन्हें ऐसे न मारो। एक मिडल-मैन के मर्डर का मतलब है न जाने कितनी ही प्रस्तावित मैरिज की हत्या। जीव हत्या पाप होती है। 

                       सास-ससुर-फूफा हाजिर हैं 
                      सज़ा पाने को कोई गोली से 
                      ना मारे मेरे ‘बिचोलिए’ को

Wednesday, August 26, 2026

व्यंग्य: फर्स्ट ए.सी. में चूहे ने बुजुर्ग को काटा

 

    एक प्रीमियम ट्रेन में चंडीगढ़ से इंदौर जा रहे बुजुर्ग को एक चूहे ने नाक पर काट लिया। वे फर्स्ट ए. सी. में ट्रेवल कर रहे थे।  पहला ताज्जुब तो उन्हें यही हुआ होगा कि आखिर चूहे भी अब फर्स्ट ए.सी. एफोर्ड करने लग गए हैं। यह कितनी सुखद स्थिति है। नहीं तो बेचारे गुड्स ट्रेन अथवा जनरल कोच में ही मुंह मारते फिरते थे। या फिर ले दे कर वही पिट-लाइन, वही क्लोक रूम, केंटीन तथा ट्रैक। बहरहाल, बुजुर्ग की नाक से खून बह रहा था वे किसी सेमिनार के मूड में नहीं थे। अतःवह चीखते-चिल्लाते रहे मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। तभी किसी सुजान ने सुझाया: आप ये सब छोड़ें आप तो एक्स पर शिकायत करें और मंत्री महोदय को टैग करें। तब होगी सुनवाई। और ऐसा नहीं है सुनवाई नहीं हुई। सुनवाई हुई। बस ये है कि सुनवाई होते-होते ट्रेन आगरा आ गयी। उनका तुरंत से पहले प्राथमिक उपचार किया गया। रेलवे में आप जनरल कोच के यात्री हों, सेकंड क्लास के यात्री हो अथवा फर्स्ट ए.सी. के ही क्यों न हों। आप सबको मिलती फर्स्ट क्लास फर्स्ट-एड ही है। जिसे हिन्दी में प्राथमिक उपचार कहते हैं। बोले तो सबको बिना भेदभाव प्रथम।


    अब ये भी है कि जो एक्स पर शिकायत करना जानता है वह चुप तो बैठेगा नहीं। जरूर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा। नहीं तो किसी जान-पहचान के या पड़ोसी पत्रकार को अपनी ‘चूहा-कहानी’ बताएगा। पत्रकार ने उठा कर छाप देना है। अतः सबने सलाह की, क्या किया जाये? इस चूहा स्थिति से कैसे निपटा जाये। तुरंत से पहले जनसम्पर्क अधिकारी का बयान आ गया वह भी लिखित में प्रेस विज्ञप्ति के तौर पर। दरअसल आजकल बात बात में ब्रांड एम्बेस्डर बनाने की प्रतियोगिता सी चल पड़ी है। कोई काय चीज़ का ब्रांड एम्बेस्डर है तो कोई और काय चीज़ का। आप तो ये बताओ! किस चीज़ का ब्रांड एम्बेस्डर इस बाजारवाद ने हमें मुहैया नहीं कराया। एक बेचारे चूहे ही हैं जिन का कोई ब्रांड एम्बेस्डर नहीं है। जो उनके हक़ में बयानबाजी कर सके।


    जनसम्पर्क अधिकारी ने बड़े नाप-तौल के साथ, सावधानी से ड्राफ्ट किया बयान जारी किया। उनका कहना है कि ट्रेन में चूहेरोधी उपाय किए गए थे। उन्होने न तो चूहेरोधी उपायों की संख्या दी है, न ही चूहों की अनुमानित अथवा कनफर्म संख्या दी है। लगता है अन्य वैज्ञानिक प्रयोगों की तरह एस.आई.आर. का प्रयोग चूहों पर पहले ही किया जा चुका है और सफल पाया गया होगा। तभी केवल मताधिकार वाले चूहे ही ट्रेन में वो भी फर्स्ट ए.सी. में यात्रा कर पा रहे होंगे। बाकी अभी भी अपने-अपने स्टेशनों पर यात्रियों द्वारा और केंटीन से फेंके हुए भोजन को खाने को बहिष्कृत हैं। जनसम्पर्क अधिकारी राजदूत की तरह वह ईमानदार शख्स है जिसे अपनी रेलवे के लिए सच्चा-झूठा बोलने का गुरुत्तर भार दिया जाता है। उसकी सफलता का राज़ यही है कि वह कैसे बात को बात-बात में बात ही न रहने दे। बात तो तब है जब बात करते करते बात बन जाये।  इसका मतलब उस अधिकारी में वह बात अभी आई नहीं। अंत में ज.स. अधिकारी ने सारी गलती यात्री/यात्रियों पर डाल दी है।  दरवाजा खुला छोड़ दिया चूहे ने तो आना ही था। वो अंग्रेज़ी में कहावत है न ‘एक खुला दरवाजा संत को भी बुलावा है’। अब चूहा  कोई संत भी नहीं। ज. स. अधिकारी ने जो नहीं कहा वह ये है:


    चूहे को कल सुबह ग्यारह बजे ऑफिस में बुलाया गया. उसकी काउन्सलिन्ग की गयी। उसे बताया गया वह आगे से कृपया ध्यान रखे फर्स्ट ए.सी. में नहीं चढ़ना है। अगर चढ़ भी गया है तो बुजुर्ग को नहीं काटना है। अगर बुजुर्ग को काटा भी है तो बुजुर्ग की  बुजुर्गियत से भरी नाक पर नहीं काटना है। और नाक पर काटने की इतनी ही चुल मची थी तो काट कर तुरंत बिहारी हो जाना चाहिए था ताकि हम इसे  विवादास्पद बना सकते। यह चूहा नहीं है यह तो आपकी नकसीर फूट गयी है अथवा आपकी नाक के अंदर ही कोई फुंसी रही होगी जो आपने नींद में खुजा ली और अब लगे रेलवे को भला बुरा कहने।


               आगे से लिखना होगा “यात्री अपनी नाक की रक्षा स्वयं करें। रेलवे अपनी नाक                 की रक्षा करे या आपकी?”

पतंग मेरी

 

कितने रंग भरे थे सपनों मे हम-तुमने

पता नहीं कब में हो गई ज़िंदगी बेरंग मेरी

कभी ज़ुल्फ बिखरा, कभी पलकें झुका

मुस्कराने भर से जीती तुमने मुझी से जंग मेरी

साँस लेने पे न जा, मेरे मुस्कराने पे न जा

ये पूछ कहाँ खो गयी वो ज़िंदादिल उमंग मेरी 

मैं अकेला कब था तेरी कायनात मे ?

बदनामी, नाकामी रही सरे-राह संग मेरी

मैं तुम्हारे इस खेल में शामिल न था

तुमने ढील देकर काटी है पतंग मेरी

Monday, August 24, 2026

व्यंग्य: पुलिस प्लीज़ और थैंक यू


    खबर ये है कि पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वह प्लीज़ और थैंक यू बोला करे। बार-बार बोला करे। हर बार बोला करे। हमारे स्कूल में एक पाठ हुआ करता था 'ऑन सेयिंग प्लीज़' इस पाठ में प्लीज़ कहने के फायदे और प्रभाव बताए गए थे। कहते हैं कि जनता बहुत सहमी-सहमी और डरी हुई है कि ये क्या नया स्यापा है। बिना प्लीज़ और थैंक यू कहे  पुलिस का प्रेम हमने जंतर मंतर पर देखा है। हम सोच रहे हैं कि पुलिस अब डंडा मारते वक़्त कहेगी "प्लीज़ सिर्फ चार डंडे मारने दो तुम जंतर-मंतर  क्या अपना नाम तक भूल जाओगे" थैंक यू कहते-कहते दो डंडे मार ही तो दिये। यूं तो एक कोई फिल्म थी जिसमें में छोरी छोरे ने कही थी “प्यार में ना  सॉरी न  थैंक यू” पर तू मन्ने ये बता मेरे से कसम ले ले प्यार तो दूर मैं तो तन्ने जानू भी नहीं। अब तन्ने प्यार व्यार हो तो तेरी तू जाने मन्ने बैरा कोई नहीं। । सो थैंक यू और प्लीज़ ने तो किनारे राख़ दे और मेरी बात कान खोल के सुन।


     फर्ज़ करो आप सड़क पर खड़े हो और एक विद्वान विनम्र शीलवान पुलिस का सज्जन पुरुष जिसके नेम प्लेट नहीं लगी है वह आपके पास आता है। वह 'फाइबर' का डंडा आपके पृष्ठ भाग में  लगभग ठेलता हुआ पूछता है "प्लीज़ बताओ! तुम यहाँ क्यों आए हो? क्यों खड़े हो? तू कहीं कोई चोरी-डकैती की प्लानिंग तो नहीं कर रहा? अगर कर रहा है तो प्लीज़ मुझे बताओ! मैं तन्नै ढेर सा थैंक यू, प्लीज़ दे दूंगा। जितना तू कहै।  प्लीज़ अगर तुम नहीं बताओगे तो सोच लो! मैंने अपने लट्ठ में आज  तेल भी लगाया है। प्लीज़ इससे पहले कि मैं अपनी पैलट गन निकालूँ और तेरे दीदे फोड़ दूँ यहाँ से प्लीज़ तिड़ी हो जा। जंतर-मन्तर क्या? दिल्ली में भी कहीं प्लीज़ दिख मत जाना। नहीं तो प्लीज़ मुझे खुद नहीं मालूम मैं क्या कर बैठूँ। थैंक यू। इसलिए मुझ पर दया करो और मुझे प्लीज़ मजबूर मत करो कि मैं मारते-मारते तेरा भुरकस निकाल दूँ। प्लीज़ बात की नज़ाकत को समझा करो। ऐं रे तू तो पढ़ा लिखा सा लागे है? फेर यहाँ के कर रहा सै? घर जा! और कतई निकड़ियो मत ना। तू निकड़ा तो सोच ले प्लीज़ ये तेरी अंतिम यात्रा ही न बन जाये। थोड़े कहे को बहुत समझियो प्लीज़। नहीं तो मैं नहीं जानता हाँ! प्लीज़ समझा कर! या कि लगाऊँ चार डंडे ? फर्ज़ करो कहीं चौराहे का सीन है। आप अपनी मस्ती में चले जा रहे हैं। बाइक पर हेलमट बस सिर पर टोकरी की तरह रखा भर है। दिल्ली पुलिस के सज्जन हवलदार ने आपको रोक लेना है जो आपको पेड़ की आड़ की वजह से दिखा ही नहीं था। प्लीज़ अपना हेलमट कस कर बाँधिए प्लीज़। मन ही मन वह 'फाइन' की रकम और इसके एवज में फाइन को निरस्त करने की रकम जोड़ता जा रहा है। आप तेज़ चला रहे थे। बाइक के कागजात, आर. सी., पाॅल्यूशन दिखाएँ। पेट्रोल कौन सा डलवाते हैं ? जो इतना तेज़ दौड़ाए लिए जाते हो। बता दो प्लीज़ हम भी अपनी गाड़ी में डलवाएंगे। ससुरा हर जगह लेट ही पहुँचते हैं। थैंक यू। प्लीज़ बता दो। और आप कुछ बोलें तब तक दो डंडे आपके रसीद हो चुके होते हों। अब आपकी घिग्घी बंध जाना स्वाभाविक है। प्लीज़ तनिक इतै कू मर ले। थैंक यू। साइड हो जा प्लीज़ बावड़ी बूच। कै मेरी नौकरी ही खाएगा प्लीज़। प्लीज़ तनै मैं थाने ले गया तो नू बैठा ले अपने दिमाग में कि मैंने तैने खूब ही सूतना है। आई बात समझ में प्लीज़। आयी की ना? आ गई हो तो थैंक यू।


अब पुलिस आपको पीटेगी भी और प्लीज़ और थैंक यू भी बोलेगी। क्या सीन रहेगा। प्लीज़ आपके तो खून ही आ गया। प्लीज़ ये खून तो बंद ही नहीं हो रहा। प्लीज़ आप हमारे साथ चलें। थैंक यू! हमें आपको प्लीज़ हवालात में रखना पड़ेगा। हम आपको यूं खुल्ला नहीं छोड़ सकते प्लीज़। आखिर हमारा भी नागरिकों के प्रति कोई कर्तव्य है। थैंक यू। हमें अपना कर्तव्य निभाने दें नहीं तो आपने ही कहते फिरना है पुलिस अपनी ड्यूटी नहीं करती। यह कहते-कहते दो डंडे और मार ही तो दिये। मेरा प्लीज़ और थैंक यू आप तक पंहुचे। स्वीकार करें या भेजूं दो हवलदार तेरे घर? भय बिनु प्रीत नाहिं गोसाईं।