पूरे राज्य में ये खबर केंटीन के चूल्हे की आग की तरह फैल गयी है कि किसी स्टेशन मास्टर ने ये हिमाकत, बोले तो ये दुस्साहस किया है कि अपने स्टेशन की केंटीन का उदघाटन खुद ही कर डाला। लोग-बाग अब उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जगह-जगह, नुक्कड़ नुक्कड़, चैनल-चैनल यही ब्रेकिंग न्यूज़ गरम है कि इस स्टेशन मास्टर को ये सूझी तो सूझी क्या। ये क्या बात हुई ? अब ऐसी भी क्या मजबूरी आन पड़ी कि मास्साब ने खुद ही केंटीन का फीता काट डाला। यह तो सरासर बेईमानी है। नाइंसाफी है। अब ये ऐरे गैरे मास्टर फीता काटने लगेंगे तो हाकिम बेचारा क्या करेगा? जिस तरह हुकम हाकिम का उसी तरह यह विशेषाधिकार भी हाकिम का है कि वह जी चाहे जिसको काटे। जहां चाहे जिसका फीता काटे, उदघाटन करे। वह केवल उसी सूरत में किसी और को उदघाटन की इजाजत देता है जब उसका नामकरण उसी के नाम से हो। क्या इन मास्टर साब को पता नहीं की हर गाँव-खेड़ा में सभी जगहों का उदघाटन हाकिम ने करना होता है। ये खेकड़ा स्टेशन क्या भारत से अलग है? बसंत कुमार को साफ-साफ शब्दों में बता दिया जाये वह बस नाम का बसंत है। काम का बसंत हर मौसम में हाकिम होता है।
इतने सालों में इस स्टेशन मास्टर को ये भी
नहीं पता चला कि स्टेशन पर क्या करना होता है क्या नहीं। माना कि ट्रेन को हरी
झंडी उसी ने दिखानी है और सारी उम्र दिखानी है। फिर क्यों वह नामाकूल, नाकारा, नालायक एक दिन की ये विजुअल खुशी हाकिम से
छीन लेना चाहता है। हो न हो ये किसी दुश्मन राज्य का जासूस तो नहीं जिसने हमारे
राज्य में अराजकता फैलाने का ये तरीका निकाला हो। मगर हाकिम उसके इन मंसूबों को
कामयाब नहीं होने देगा। उसके सभी पतों पर लोग पूछताछ को भेज दिये गए हैं वे सब
दल-बल के साथ पहुँचते ही होंगे और उसकी अगली-पिछली सात पीढ़ियों का हिसाब निकाल कर
ले आएंगे। आज तक का रिकॉर्ड है कि हाकिम की टीम कभी खाली हाथ नहीं लौटी।
बच्चू ! स्टेशन मास्टर जब दो-चार बरस कारावास
में रहेगा तो सारी मास्टरी भूल जाएगा। अब से कारावास ही उसका स्टेशन होगा। इस
मास्टर ने डाकिये से भी कुछ न सीखा। भई कैसा मास्टर है? अब देखो ठेके की नौकरियों के रुक्के भी हाकिम खुद दे रहा है। किसी डाकिये
ने आवाज़ उठाई। हरगिज़ नहीं। वे समझदार हैं। उन्हें पता है पहले ही ये कूरियर वाले ,
ई मेल और वाट्स अप से उनकी नौकरी पर बन आई है। चुपचाप अपने दिन
काटिए। चूँ चाँ की तो आपको बैरंग घर भेज दिया जाएगा। और पूरा डिपार्ट ही बंद कर
दिया जाएगा फिर डाकिया-डाकिया आपस में ही खेलते रहना। अरे हाकिम आखिर हाकिम होता
है वह चाहे तो नेज़ा फेंकने वाले से उसका नेज़ा ले कर नीलाम कर दे। यह उस नेजेवाले
की खुशकिस्मती है। उसे तो उलटा खुश होना चाहिए और हाकिम का सौ सौ बार शुक्राना अदा
करना चाहिए। अब अगर वो नेजे वाला अपना नेज़ा देने में आना-कानी करता तो क्या वह
दुबारा नेज़ा फेंकने लायक रह जाता। वह जानता है बांह सलामत रहे नेजे हज़ार। महज़ हुकम
हाकिम का नहीं होता, हुकूमत हाकिम कि नहीं होती... कायनात
हाकिम की होती है।