Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Wednesday, November 4, 2026

तुमको पता है जी?

 1. जे. एफ. मदान निर्देशित फिल्म ‘इन्द्रसभा’ (1932) में 71 गाने थे, जो अब तक का रिकॉर्ड है। फिल्म 3 घंटे 31 मिनट लंबी थी, जिसमें 9 ठुमरी, 4 होली-गीत, 31 गज़ल, 5 छंद, 2 चौबेला और अन्य सामान्य गीत थे।

                                      

 

                                


2. दूसरे नम्बर पर फिल्म शीरीं फरहाद (1931) (मदन थियेटर, कलकत्ता निर्मित) रही जिसमें 42 गीत थे।
                                    



3. जाॅनी वाकर, असली नाम बदरुद्दीन क़ाज़ी (1926-2003) ने बतौर मेन लीड (हीरो) भी कई फिल्में कीं थीं जैसे ‘दुनिया रंग रंगीली’ 1957, खोटा पैसा 1958, मिस्टर जाॅन 1959, मिस्टर कार्टून एम.ए. 1958, रिक्शावाला 1960 और जाॅनी वाकर 1957 ‘दुनिया रंग रंगीली’ में राजेंद्र कुमार एक साइड रोल में नज़र आये थे।
                                  


4. फिल्म पैगाम 1959 में नायिका वैजयंतीमाला की मां का रोल उनकी असली मां वसुधंरा देवी ने किया था जो अपने समय की विख्यात अभिनेत्री/नर्तकी थीं

                                                   


5. भारतीय सिने जगत काले रंग से बहुत प्रभावित मालूम देता है। बाॅस लोग मिलने-मिलाने, लेन-देन के लिये काली पहाड़ी को चुनते हैं। गौर कीजिये फिल्मों के नामों पर: काला चोर, काला पानी, काला बाज़ार, काला पत्थर, काला आदमी, काला काला समंदर, काला घोड़ा, काला जादू, काला पहाड़, काला गुलाब, काला नाग, काला सवार, काला भूत, काला जिगर, काला सोना। गिनती जारी है…

Thursday, October 22, 2026

व्यंग्य: पुलिस और पजामा

 

                                                                


 

                 एक रील देखी। पुलिस वालों ने बनाई है जनसाधारण के लिये। यह एक प्रकार का रोल रिवर्सल है। अभी तक जन-साधारण पुलिस वालों के 'सात्विक' 'सनातन' 'सदव्यवहार' की रील बनाते रहे हैं।  रील से पता चलता है कि दिल्ली को 18 अक्तूबर 1861 को भारतीय पुलिस एक्ट से परिचित कराया।  फलस्वरूप दिल्ली में पाँच थाने स्थापित किए गए। ये थे सब्जी मंडी (18.10.1861) मुंडका (नांगलोई) (29.10.1861) महरौली ( 2.11.1861 ) कोतवाली (4.11.1861) और सदर बाज़ार (31.12.1861) इसी श्रंखला में बताया गया है कि तब अपने पजामे के चोरी हो जाने की एफ.आई.आर. एक बंदे ने कराई हुई है। पजामे की कीमत आठ आने लिखाई गयी है। ये एफ.आई.आर. सब्जी मंडी थाने में कराई गयी थी। एफ.आई.आर. नं. भी दिया है- 6/36,  अगले पर मतलब पाजामा चोर पर धारा 380 लगाई गयी है। एफ.आई.आर. की तारीख है 10 मार्च 1897 पूरी रील में बस एक बात मिसिंग है कि आखिर वो पजामा बरामद हुआ या नहीं? पजामा चोर पकड़ा गया या नहीं। क्या तब भी 'मंडावली' प्रथा हुआ करती थी? अगर पजामा चोर पकड़ा गया था तो उसे क्या सज़ा मिली? यूं पुलिस के रिकॉर्ड में यह भी होना चाहिए कि जो रिपोर्ट लिखाने आया था उसकी पुलिस ने क्या खातिरदारी की हां भई पहले तो ये बता तेरे पास ये इतना.मंहगा पजामा.खरीदने को आठ आने आये कहां से? तू करता क्या है? (अब 1897 हो, 1997 हो या फिर 2097 पुलिस आपको "आप" तो कहने से रही) ये तो सीधे-सीधे डी.ए. (डिसप्रोपेशनेट असैट) का केस लगता है। चल आजा ! पजामा कहां भागा जा रहा है। पहले तेरी जांच कर लें पजामे की फिर कर लेंगे। अगर पुलिस की पकड़ में ये पजामा-चोर आया होगा तो पुलिस ने जरूर वो गीत गया होगा

 

                      “आप आए तो ख्याल - ए - दिले नाशाद आया

                       कितने चोरी हुए पजामों का पता याद आया”

 

वैसे पुलिस ने उसका पजामा अच्छी तरह फाड़ा होगा। ऐसी मेरी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है। 1897 में पजामा भले आठ आने का था मगर मैं सोच रहा हूँ इस आठ आने के पजामे ने पुलिस के कितने पजामों का इंतज़ाम किया होगा। पर एक बात और है इस रील में सिर्फ संतरों, पजामे और चार आने की जेब-तराशी, टट्टू चोरी के केस ही 'शो-केस' किए हैं। क्या तब बड़े-बड़े केस हुआ नहीं करते थे या फिर उन्हें तब भी रफा-दफा कर दिया जाता था। उनकी 'ऑउट-ऑफ-कोर्ट' की तरह 'ऑउट ऑफ थाना' सैटलमेंट हो जाती थी। एफ.आई.आर. लिखी ही नहीं जाती थी। तब एफ.आई.आर. लिखना-लिखवाना आसान रहा होगा। यदि हाँ तो वह कौन सा 'काल खंड' था जब एफ.आई.आर. लिखना दुरूह से दुरूह होता चला गया।

 

आज की तारीख में अगर कोई इस तरह पजामे और संतरों की एफ.आई.आर. लिखाने जाये तो पुलिस कितना हँसेगी और हो सकता है कि शिकायत करने वाले का पहना हुआ पजामा भी छीन ले। "तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की"। आप कितना ही डिजिटल हो जाओ कितना ही कंप्यूटर ले आओ। थाने और एफ.आई. आर. का कोई अन्य विकल्प नहीं है। उर्दू में एफ.आई.आर. को पर्चा कटाना कहते हैं। पुलिस का पहला और अंतिम प्रयास यही होता है कि एफ.आई. आर. लिखी ही न जाये। कारण कि एफ.आई.आर. लिखी जाएगी तो उसका निपटारा भी करना पड़ेगा/दिखाना पड़ेगा। नहीं तो ये एफ.आई.आर. पेंडिंग दिखाई जाएगी, बोले तो मुंह चिढ़ाती रहेगी। यूं एक सूत्र ये भी है कि यदि घटनाएँ/वारदातें बोर्ड पर नहीं हैं तो आप अपनी पीठ थपथपा सकते हैं और अगर खुदा न ख्वास्ता बोर्ड पर लिखी इबारत 'अनकमफ़र्टेबल' सी लगे यानि ज्यादा लगे तो भी आप अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि "पिछले वाला अमला तो केस रजिस्टर ही नहीं करता था। हम न केवल रजिस्टर करते हैं बल्कि केस साॅल्व करने की भरसक भाग-दौड़ भी करते हैं"। गो कि फिगर घटे या बढ़े वाहवाही हमेशा पुलिस की ही होती है। नहीं तो ‘प’ से पुलिस आपको  ‘प’ से पजामा पहनने लायक नहीं छोड़ेगी। आप कब तक और कहाँ तक बचोगे? उनकी 'टैग लाइन' नहीं सुनी "हमेशा आपके साथ-आपके लिए" तो हुजूर टांगें सलामत रहें! पजामे हज़ार हैं

Sunday, October 18, 2026

निर्मला देवी और कुमकुम

 

वाराणसी (बनारस) में एक तबला उस्ताद वासुदेव नारायण सिंह  रहा करते थे। वे बनारस (वाराणसी) के संगीत जगत में वासुदेव महाराज के नाम से प्रसिद्ध थे। उनकी एक बेटी निर्मला (7 जून 1927) और एक बेटा लक्ष्मण नारायण सिंह थे। जो सिंह लक्ष्मण प्रसाद सिंह एक प्रमुख तबला वादक बने  और दुनिया उन्हें लच्छू महाराज के रूप में जानती है।


                                         


 

पारिवारिक परंपरा के अनुरुप बेटी निर्मला ने संगीत शिक्षा को अपनाया और पटियाला घराने की एक निपुण हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका बनीं। उनका दूसरा नाम दुलारी था। हांलाकि अपनी चाची द्वारा पालने की वजह से उन्हें नाज़िम नाम भी मिला। उन्होंने फिल्मों में अभिनय भी किया और 1942 की शुरुआत में उन्होंने 1940 और 50 के दशक में एक दर्जन से अधिक फिल्में दीं। 15 जून 1996 को उनका निधन हो गया।

 उन्होंने अपनी फिल्मों के  सह-कलाकार, गुलशन सिंह आहूजा से शादी कर ली। वे अपने स्क्रीन नाम अरुण से मशहूर थे। समय के साथ  दंपति के पांच बच्चे हुए। दो बेटे और तीन बेटियां।

                                       


वासुदेव महाराज ने बाद में एक मुस्लिम महिला से भी शादी रचाई उनकी मुस्लिम पत्नी का नाम मुन्नन था।  मुन्नन से वासुदेव महाराज के दो खूबसूरत बेटियाँ हुईं। ज़ैबुन्निसा और राधा। प्रसिद्ध कत्थक नर्तक पंडित शंभू महाराज ने कत्थक नृत्य में जैबुन्निसा को प्रशिक्षित किया। उनकी बड़ी बहन राधा एक अभिनेत्री बन गईं और उन्होंने राधिका नाम से  कुछ फिल्मों में अभिनय किया। मिस्टर एंड मिसेज 55, रात के राही, लाल निशान और शोला जो भड़के।

एक बार विख्यात निर्माता निर्देशक गुरुदत्त की पारखी नज़र जैबुन्निसा पर पड़ी। उन्होंने जैबुन्निसा को अवसर दिया। स्क्रीन नाम कुमकुम से जैबुन्निसा ने 115 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वह एक श्रेष्ठ नर्तकी थीं। रामानंद सागर की फिल्मों का वह  जरूर होतीं थीं। उन्होंने भारत की पहली भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियारी चढ़ाईबो' 1963 में अभिनय किया था। उनकी  अंतिम फिल्म 'एक कुँवारी एक कुँवारा' 1977 थी। फिर वे 1975 में सज्जाद अकबर खान (लखनऊ) शादी कर सऊदी अरब चलीं गईं। 28 जुलाई 2020 को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

                 

                                          


गुलशन सिंह आहूजा ने 1939 से शुरू कर अरुण आहूजा नाम से 40 से अधिक फिल्में दीं। उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म 'सेहरा' के फ्लाॅप होने के बाद उन्हें कार्टर रोड, बान्द्रा स्थित अपना बंगला बेचना पड़ा और 1960 के दशक में वे विरार में आ बसे। माधुरी दीक्षित की पहली फिल्म 1984 में रिलीज हुई फिल्म 'अबोध' में अरुण कुमार ने अपनी आखिरी सहायक भूमिका की थी।  3 जुलाई 1998 को उनका निधन हो गया। उनके अभिनेता बेटे गोविंदा को 'विरार का छोकरा' भी कहा जाता है।                          

तुमको पता है जी?


                                        


1.         चेतन आनंद की फिल्म (राजेश खन्ना की पहली फिल्म) ‘आखिरी खत’ 1966 में जो बालक है वह मास्टर बंटी, और कोई नहीं बल्कि प्रोड्यूसर और कभी हेमा मालिनी के सचिव रहे इंदर कुमार बहल का पुत्र बंटी बहल है।

                                       



2.   “तुम अपना रंजो-गम अपनी परेशानी मुझे दे दो” (फिल्म: शगुन) में जो अभिनेत्री पियानो पर यह गीत गा रही है उसका नाम लिबी राना है, स्क्रीन नाम निवेदिता था।

  

                                                  


3.   “जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी” (फिल्म: मिस्टर एंड मिसेज 55) जॉनी वॉकर के साथ जो अभिनेत्री है उसका नाम विनीता बट्ट था, स्क्रीन नाम यासमिन था।


                                            


4.   अंग्रेज़ जैसा दिखने वाला सभी पार्टी में सूट-टाई में नीली आँखों वाला अभिनेता (पारसी) का नाम  के.सी. सुपारीवाला था।

                                              


5.   “आगे भी जाने न तू पीछे भी जाने न तू जो भी है यही एक पल है” (फिल्म वक़्त) में क्लब में पर्दे पर गाने वाली ‘सिंगर’ एरिका लाल है। जो एक रेलवे अधिकारी सी. एस. लाल की बेटी थी।

 

Friday, October 16, 2026

व्यंग्य: तेरा मुस्कराना गजब हो गया!


                                                 


 

     भले आप कुछ भी कहें परंतु हम सब अपने पूर्वाग्रहों से बंधे रहते हैं। यद्यपि इसका कोई ठोस कारण या लॉजिक नहीं है पर कुछ लोग आपको शकल से अच्छे लगने लगते हैं और उसी तर्क से कुछ लोग आपको अपने चेहरे और बॉडी लेंग्वेज़ से बिलकुल नहीं भाते। इसको और 'वेलिडेशन' मिलता है जब वह जैसा इम्प्रेशन था वैसा ही निकलता है तो और बन आती है। "मैं तो शकल देख कर ही पहचान गया था। यह बदमाश/ठग/चोर/ बेईमान है।" कभी-कभी यह भी सुनने को मिलता है फलां "शकल से ही खानदानी लगता है। भला आदमी लगता है"। आपने अगर फिल्म डाॅन देखी हो तो अमिताभ बच्चन अपनी गेंग के एक साथी को गोली मार देता है। दूसरे साथी गेंगस्टर के पूछने पर डाॅन बताता है “मुझे इसके जूते अच्छे नहीं लगे” दरअसल जूते की हील में छिपा कर वह खबर/प्लान इधर से उधर करता था।

 

जब एक सूबे में आई.जी. साब अपने मातहतों की मीटिंग ले रहे थे। किसी बड़े संजीदा टॉपिक पर बात चल रही थी, उन्होने नोटिस किया  एक दरोगा जबसे वो आये हैं मुस्कराए ही जा रहा है। पहले उन्हें अटपटा लगा। फिर उन्होने देखा उसका मुस्कराना रुक ही नहीं रहा है। बड़ी गंभीर बात हो रही है। लाॅ एंड ऑर्डर पर चर्चा चल रही है। लोग मर रहे हैं, कट रहे हैं। एक ये दरोगा बाबू हैं कि हर बात पर सतत् मुस्कराए ही जा रहे हैं। वो एक 'स्लोगन' है ना 'हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में मुस्कराना हमारा नारा है'। पद्मभूषण नीरज जी  ने लिखा है: “जिन मुश्किलों में मुस्कराना हो मना उन मुश्किलों में मुस्कराना धर्म है” मगर इन दरोगा जी का मुस्कराना इन पर भारी पड़ गया। इन्हें मुश्किल में डाल गया।

 

जब आई.जी. साब ने देखा कि अगले का मुस्कराना  थम ही नहीं रहा है तो उन्हें 'अनक्मफ़र्टेबल फीलिंग'  होने लगी। आप मर्डर और डकैती रोकने की बात कर रहे हैं और अगले का मुस्कराना ही नहीं रुक रहा। मुस्कराना रुके तो मर्डर/डकैती रुके। मैं तेरे चेहरे से नज़र हटाऊं तो दुनियां देखूं।

 

होना क्या था आई.जी. साब ने इसे पर्सनली ले लिया और एकदम खफा हो गए। वे फुल-फुल फायरिंग मूड में आ गए। लगे उसे भला-बुरा कहने। उन्होने देखा कि अगला अब भी मुस्कराए जा रहा है। बस उन्होने आव देखा न ताव और उसको तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर कर छोड़ा। जिसे पुलिसिया भाषा में लाइन हाजिर कहना कहते हैं। जब दरोगा जी को अपने इस ट्रांसफर का पता चला तो उन्हें भान हुआ कि उनकी क़ातिल मुस्कान ने तो उनको ही मुश्किल में डाल दिया। उन्हें अपने मुस्कराने का ग़म नहीं। ग़म ये है कि उनकी मुस्कान को बेदर्द ज़माने की तरह आई.जी. साब भी नहीं समझे। जब वह थाने में अपराधियों से पूछताछ करता या फिर ‘कड़ी’ पूछताछ करता, कंबल परेड अथवा ‘भैरों बाबा के प्रसाद’ के वक़्त भी दरोगा जी मुस्कराते रहते। दरोगा जी ने हाथ जोड़ कर आई.जी. साब को बताया हुज़ूर मेरी इतनी जुर्रत कि आपके इगलास में मुस्कराऊँ? भगवान जानता है और एस.पी. साब से पूछ लीजिये सर मेरी शक्ल ही ऐसी है। ऐसा कहते वक़्त भी दरोगा जी मुस्करा रहे थे। अब पुलिस विभाग सोच रहा है कि दरोगा जी को अपने पी.आर. डिपार्ट में शिफ्ट कर दे। वो 'मोटो' है ना “सर्विस विद स्माइल” उसके जीते-जागते प्रमाण (मास्कट) साबित होंगे हमारे दरोगा जी।  

व्यंग्य: दो सौ शोध प्रबंध कबाड़ में बेचे

 

                                         


       

मेरा भारत महान है। इसमें जिसको तनिक भी शक़ हो उसके लिए ये खबर है कि मेरे भारत महान की, महानतम यूनिवर्सिटी के दो चपरासियों ने अलमारी में रखी दो सौ थीसिस कबाड़ीवाले को बतौर रद्दी बेच दी। पता ये चला है कि ये दोनों मल्टी-टास्किंग स्टाफ संविदा कर्मी थे। बहुत संभव है कि वे रोज की मच-मच से तंग आ गए हो गए हों। दूसरे संविदा कर्मचारियों को अपने अनुबंध के नवीनीकरण पर संदेह हो या पता हो कि अब उनका डेरा-डंडा इस यूनिवर्सिटी से उठ रहा है। एक भानगढ़ और है, हो सकता है इनको कई महीनों से अनुबंध राशि मिली ही न हो। संविदा कर्मचारियों में से ज्यादातर को समय पर वेतन नहीं मिलता है। कई महीने के एरियर हो जाते हैं। और फिर बाबू लोग, जिनकी मुट्ठी ठंडी पड़ी होती है उसको क्रियाशील बनाने को मुट्ठी गरम करनी पड़ती है। तब हाथ चलते हैं और तब कहीं जाकर कलम चलती है।

 

एक बात और है जिस बात को यूनिवर्सिटी के बड़े-बड़े प्रोफेसर नहीं समझ पाये वह 'ज्ञान' इन दो संविदा कर्मियों को हो गया था। अब ज्ञान की प्राप्ति तो किसी को, कभी भी, हो सकती है। ये संविदाकर्मी समझ गए थे ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ हमारे संत कह- कह के थक गए पर यह 'रियालाइज़ेशन' इन दो ‘संत’ संविदाकर्मियों को हुआ वह तमाम प्रोफेसरों की फौज में से किसी को भी नहीं हो पाया। 

 

अब आप सोचो ‘प्रेम’ का ढाई अक्षर लिखने को कितनी जगह चाहिए। दो सौ थीसिस रखने और संभाल के लिए कितनी जगह, कितनी अलमारियां चाहिए। और इस यूनिवर्सिटी में न जाने कितनी थीसिस पड़ी होंगी जो अंततः दीमक का भोजन बनने को शापित हैं। चलो किसी की रोटी तो इन थीसिस से चली। एक बात और है यह ‘ज्ञान’ जो इन थीसिस के माध्यम से अर्जित किया जाएगा वह किस काम का? न रोजगार है! न उद्योग! बाकी जितने भी काम-धंधे और उद्योग धंधे हैं उनमें ये 'थीसिस' काम नहीं आनी। अतः  अधिक से अधिक ये थीसिस 'स्वांतै: सुखाय' हो सकती हैं। समय आ गया है कि ये शोध-प्रबंध, ये स्कूल-कॉलेज ये यूनिवर्सिटी किस काम के? बेकार जगह घेरे हुए हैं। कितने चमक-दमक वाले मॉल और मल्टीप्लेक्स यहाँ बन सकते हैं। सोचा है कभी?

 

अतः मैं समझता हूँ इन दो सौ थीसिस से वाकई कोई लाभान्वित हुआ है तो केवल ये दोनों संविदा कर्मी ही हैं। बेच कर एक जून की रोटी या दो टाइम की झालमूड़ी तो चल ही जायेगी। यूनिवर्सिटी वाले भी अब चैन से सो सकेंगे। वैसे ही जैसे डाकू खड्ग सिंह के 'सुल्तान' नामक घोड़े को छल से ले जाने के बाद बाबा भारती सोने लगे थे।