Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Sunday, August 9, 2026

व्यंग्य: ए फॉर अमरुद ....

  

एक बाबा जी ने ऐलान किया है कि ‘ए’ फॉर एपल एक विदेशी अवधारणा है। हम भारतीयों को ‘ए’ फॉर एपल नहीं बल्कि ‘ए’ फॉर अमरूद पढ़ाया जाना चाहिए। मुझे यह बहुत पसंद आया। सच है हमको ये अल्फ़ाबेट दोबारा से लिखने का वक़्त आ गया है। पूरी की पूरी बारहखड़ी दुबारा लिखने का वक़्त आ गया है। पहले कभी जोक के तौर पर सुना था ‘ए’ से एपल। ‘बी’ से बड़ा एपल। ‘सी’ से छोटा एपल ‘डी’ से दो एपल ‘ई’ से एक और एपल ‘एफ’ से फिर एक एपल, ‘जी’ से गला हुआ एपल .... हम उस पीढ़ी के हैं जिसमें ज से जवाहरलाल पढ़ा है। अब मुझे लगता है कि नयी बारहखड़ी होनी चाहिए:

 

ए’ से अमरूद।  ‘बी’ से बेर, बेल पत्थर, बैंगन, बंद गोभी, भिंडी, बथुआ। ‘सी’ से कमरख, केला, चीकू। ‘डी’ से दम आलू। ‘ई’ से ईख। ‘एफ’ से फालसे। ‘जी’ से गाजर, गूलर फल, गन्ना, गोभी, ग्वार की फली। ‘एच’ से हरी मिर्च, हरा धनिया। ‘आई’ से इमली।  ‘जे’ से जामुन, जंगल जलेबी, जिमीकंद। ‘के’ से करोंदा, कंदमूल, कटहल, कीनू ,करेला, कद्दू , करी पत्ता, कमल ककड़ी।  ‘एल’ से लीची, लाल मिर्च, लौकी, लहसुन। ‘एम’ से मूली,  मौसम्बी, मेथी,  मटर। ‘एन’ से नारियल, नींबू, ‘पी’ से पपीता, प्याज, पत्ता गोभी, परवल, पालक,  पुदीना।  ‘आर’ से रामफल, रसभरी। ‘एस’ से शहतूत, शकरकंद, सहजन, संतरा, शरीफा, सिंघाड़ा, शिमला मिर्च, सरसों का साग, शकरकंदी। ‘टी’ से टमाटर, तरबूज, तोरई, टिंडा आदि।

 

अब जब हम इस टॉपिक पर हैं ही तो लगे हाथ सिलेबस के अन्य चैप्टर भी रिवाइज़ कर डाले जाएँ। मसलन सभी इंगलिश की कवितायें जो बच्चों को सिखाई जाती हैं। सब या तो झूठ सिखाती हैं या सेलफिश होना या बस खिलखिला कर हँसना। ज़िंदगी के संजीदा पहलुओं पर इन ‘पोयम्स’ से कोई मदद नहीं मिलती है। हमारे पास कविताओं, श्लोक, दोहों, चौपाइयों की कोई कमी नहीं है। एक कमेटी का गठन किया जाए। कमेटी बढ़िया-बढ़िया चौपाई छांट सकती है, ताकि हमारी भावी पीढ़ी संस्कारी बन सके।

 

इसी तरह ये जितने भी विदेशी लेखकों की कहानियाँ और उपन्यास नाटक पढ़ाये जाते हैं सब के सब तुरंत प्रभाव से बंद किए जाने चाहिए। क्या ज़रूरत है हमें ये सब शेक्सपियर, टाॅलस्टाॅय, चार्ल्स डिकन्स, मार्क ट्वेन पढ़ने-पढ़ाने की। हम ये पढ़-पढ़ कर ही अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। यूं देखा जाये तो एक बात बताओ पढ़ने की दरकार क्या है? बशीर बद्र साब का एक शेर है:

 

          जी बहुत चाहता है सच बोलें क्या करें हौसला नहीं होता

          रात का इंतिज़ार कौन करे, आज-कल दिन में क्या नहीं होता

 

बस कुछ इसी तर्ज़ पर हमारे दौर का तर्जुमा है:

 

         जी बहुत चाहता है पढ़ें-लिखें, क्या करें हौंसला नहीं होता

        डिग्री का इंतिज़ार कौन करे, आज-कल बिन डिग्री क्या नहीं होता

Thursday, August 6, 2026

व्यंग्य : हे बॉस ! डांटना आपका मूल अधिकार है (बी-20)

 

 

मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'बड़े भाई साहब' में बड़े भाई साहब को यह नैसर्गिक अधिकार प्राप्त है कि वह छोटे भाई को जब-तब, बोले तो जब चाहे, डांट सके। चाहे छोटा भाई कितना ही अच्छा कर रहा हो। कहावत है कि यदि आप अपने अधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं तो वह अधिकार 'डिसयूज़' में जाते-जाते समाप्त प्राय: हो जाता है। राजस्थान में इसे  ‘दम देना’ कहा जाता है।  कहीं-कहीं इसे 'फायरिंग करना' भी कहा जाता है।

फर्ज़ करो आप बॉस हैं और आपके मातहत एक रामलाल नामक कर्मचारी काम करता है। वह ठीक-ठाक है। मगर आप  गौर से देखेंगे तो उसमें कोई न कोई कमी ज़रूर ढूंढ लेंगे। मुझे आपकी इस प्रतिभा पर पूरा भरोसा है। आप भी अपने ऊपर भरोसा रखें। राम लाल को डांटने के निम्नलिखित ग्राउंड्स हो सकते हैं:

1. वह दफ्तर लेट आता है: भई तुम्हें पता है दफ्तर कितने बजे का है? तुम्हारे पास घड़ी है ? और अगर है तो क्या वह सही समय देती है? क्या तुम्हारी घड़ी किसी और देश का टाइम बताती है। एक तुम्हें छोड़ कर पूरा दफ्तर समय पर आ जाता है  तुम कोई निराली सवारी में आते हो ?  इसी शहर से आते हो या किसी और दूसरे शहर से आते हो? मैं तो परेशान आ गया हूँ तुम्हारी इस आदत से।

2. वह दफ्तर टाइम से पहले अर्थात जल्दी आता है: क्या बात है तुम नहा-धो कर दफ्तर आते हो न? सुबह- सुबह मुंह उठाए दफ्तर चले आते हो। तुम्हें नींद ठीक से आती है न? तुम इतनी जल्दी आकर क्या फाइलें उलट-पुलट करते रहते हो?कहीं हमारे दफ़्तर की खबर हमारी 'राइवल' कंपनी  को तो नहीं देते ? इतनी जल्दी आने का क्या मतलब है? मुझे तो तुम पर शक़ पड़ने लगा है।

3. वह टाइम पर आता है: भई ऐसे टाइम पर आने का क्या ही फायदा ? यहां कोई गिनेस बुक का रिकॉर्ड नहीं बन रहा है। आदमी काम का पक्का होना चाहिए। सिर्फ एक टाइम पर आ जाना ही सबकुछ नहीं होता। यूं टाइम पर आना अच्छी बात है मगर काम में 'एफ़िशियेन्सी' होनी चाहिए। काम को प्राथमिकता के आधार पर करने की समझ होनी चाहिए। आई एम नाॅट हैपी विद यू (बीच बीच में अंग्रेज़ी बोलने से प्रभाव पड़ता है। अगला कन्फ्यूज़ रहता है कि जवाब हिन्दी में दे या अंग्रेज़ी में)

4. वह जल्दी चला जाता है: क्या भई तुम्हें अभी तक ये ही पता नहीं चला कि दफ्तर भले छह बजे तक का है मगर सब साढ़े छह जाते हैं। वे पागल नहीं हैं। अपनी सब फाइलें अलमारी में रख कर, अपनी टेबल तरतीब से लगा कर और कल की ‘टू डू लिस्ट’ बना कर ही जाते हैं। एक तुम हो इतने 'कैज्युल'! बस जाने की पड़ी रहती है। तुम्हारी नज़र काम पर कम घड़ी पर ज्यादा रहती है। कब छह बजें और भागें। भई हमारे भी बीवी बच्चे हैं। हम अनाथ नहीं हैं।

5. वह ऑफिस से लेट जाता है: क्या भाई तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? घर में कोई लड़ाई-वड़ाई चल रही है क्या? क्यों इतनी देर तक बैठे रहते हो? काम तो क्या ही करते होगे। बेकार ऑफिस की पंखा/लाइट/ए.सी. चलता रहता है। बेचारे प्यून भी तुम्हारी वजह से बैठे रहते हैं। अपने काम को ऑफिस-टाइम में खत्म करने की आदत डालो। अपनी 'प्रोडक्टविटी' बढ़ाओ। ऐसे नहीं चलेगा। टाइम से आओ टाइम से जाओ। कल को बीमार-शीमार हो गए तो सोचा है कभी काम का कितना हर्जा होगा?

6. वह टाइम से जाता है:  भई ये क्या ? मैंने सुना है तुम "छहई" बजे चले जाते हो (ये डायलाॅग एक बार मुझे अपने बॉस से सुनना पड़ा था) अगर ऐसा है तो हमें तुम्हारी पोस्ट के लिए कोई और आदमी ढूँढना होगा। तुम्हें तो आते ही बस भागने की पड़ी रहती है। कब छह बजें और मैं भागूँ। लगता है तुम्हारा काम में मन-वन नहीं लगता। 

7. वह हमेशा टार्गेट पूरा करता है: भई ये क्या ? (इससे वो कनफ्यूज़ होगा) ये अच्छी बात है तुम अपना टार्गेट पूरा करते हो। मगर ऐसे तुम कोई अनोखे नहीं हो। तुमसे पहले भी और तुम्हारे बाद भी बहुत लोग टार्गेट पूरा करेंगे। बात होती है आदमी कितना मिलनसार है। कितना सहयोग करता है। उसमें कितना सहकार है। तुमने सुना नहीं 'ऑल वर्क नो प्ले मेक्स जैक ए डल बॉय'

8. वह टार्गेट पूरा नहीं कर पता: एक टार्गेट तो तुमसे पूरा होता नहीं। क्या ही तारे तोड़ोगे तुम। तुम्हें तो बस कोई काम बता दो और निश्चिंत हो जाओ कि ये काम कभी टाइम पर पूरा होगा ही नहीं। तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है? क्या तुम्हें वेतन काम करने का मिलता है या काम न करने का या फिर घिसट-घिसट कर करने का मिलता है। मुझे शर्म आने लग पड़ी है। एक तुम हो न जाने कौन सी मिट्टी के बने हो। काम में मन लगाओ नहीं तो 'आई एम एफ्रेड मुझे तुम्हें इस दफ्तर से ट्रांसफर करने के लिए कहना पड़ेगा। 'आई एम फीलिंग बैड एवरी टाइम आई हैव टू टैल यू सच ए सिंपल थिंग'

9. वह टार्गेट से ज्यादा काम करता है: भई रिलेक्स! मुझे लगता है तुम मेरी नौकरी खा जाओगे। इतनी जल्दी जल्दी काम करने को तुमसे किसने कहा? अब क्या करोगे? बस हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहोगे। जब तक अगला असाइनमेंट नहीं आता। भई हर दफ्तर, हर काम की एक स्पीड होती है। तुम भारत में हो। अमरीका में नहीं। मैं नहीं चाहता कि तुम अपना काम तो सबसे पहले खत्म कर लो और फिर दूसरों को डिस्टर्ब करो उन्हें काम न करने दो। 

10. वह लंच में गायब हो जाता है: भाई कहाँ गायब हो जाते हो? तुम्हारी ज़रूरत थी। पूरा दफ्तर यहीं बैठ कर लंच करता है एक सिवाय तुम्हारे। तुम क्या किसी फाइव स्टार में लंच को जाते हो ?  ऐसे रोज़ रोज़ बाहर का खाना कोई अच्छी बात नहीं। तुम्हारी कभी भी ज़रूरत इमरजेंसी में पड़ सकती है। आसपास ही रहा करो प्लीज़। आई होप यू अंडरस्टेंड 

11. वह लंच करता ही नहीं:  ये क्या ? मैंने सुना है तुम लंच ही नहीं करते। तुम्हारी हैल्थ ठीक है? लास्ट एक्ज्युकिटिव हैल्थ चैक-अप कब कराया था तुमने ? क्या तुम घर से लंच करके आते हो ? लगता तो नहीं। भाई ऐसे अपनी हेल्थ नेगलेक्ट करोगे तो बीमार हो जाओगे अपना नहीं तो हमारा, हमारे दफ्तर का कुछ  ख्याल करो। अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ ? वी नीड यू मैन! लुक आफ्टर योरसेल्फ। 

12. वह लंच में सोता है: वाट इज़ दिस ? तुम दफ्तर क्या सोने 2. *वह लंच में सोता है* वाट इज़ दिस ? तुम दफ्तर क्या सोने के लिए आते हो? मैंने तो आजतक कोई नहीं देखा जो दफ्तर में सोता हो। इससे ऑफिस का एट्माॅस्फियर खराब होता है। किसी अच्छे डॉ. को दिखाओ और अपनी नींद घर में ही पूरी करके आया करो तुम्हें छुट्टी चाहिए मैं दे दूंगा बट इन फ्यूचर नो मोर स्लीपिंग इन ऑफिस।

13. वह इण्ट्रोवर्ट /एक्स्ट्रोवर्ट है:  भाई ये क्या मनहूस सूरात बनाए फिरते रहते हो? किसी से हंसना नहीं बोलचाल नहीं।, बस घुन्ने की तरह सब को देखते रहते हो। 'ऑफिस वर्क इज़ टीम वर्क' कल को तुम भी बॉस बनोगे। अपने टीम को साथ रखो (कैरी योर टीम ) ये रोनी सूरत मैं कल से नहीं देखूँ। _अगर एक्स्ट्रोवर्ट_ है: भाई ये क्या सारा दिन हा-हा, ही-ही करते रहते हो। ये कोई अच्छी आदत नहीं सबके फटे में टांग अड़ाते फिरते हो। लोगों की पर्सनल लाइफ भी कोई चीज़ होती है। ये सबके घर में घुसने की  तुमको क्या पड़ी है फलां कैसे हैं ? बच्चे कैसे है? प्लीज़! पीपुल नीड देयर पर्सनल स्पेस। प्रिवेसी भी कोई चीज होती है (प्राइवेसी मत बोलना, आजकल 'प्रिवेसी' ट्रेंड कर रहा है)

14. वह हरदम हँसता रहता है:  क्या भाई ये हरदम ऑफिस में जोक-वोक चलते रहते हैं क्या? पूरे ऑफिस में बस तुम्हारे हँसने की आवाज आती रहती है। ऑफिस में थोड़ा सीरियस होना सीखो। ऑफिस आए हो पिकनिक पर नहीं। इससे बाकी स्टाफ पर बुरा असर पड़ता है। वे काम को सीरियसली नहीं लेते। 'यू आर ए बैड इनफ्लुएंस ऑन दैम'

15. वह हरदम रोनी सूरत बनाए रखता है: भाई ये मुंह लटकाए क्यूँ घूमते रहते हो ? कौन सा ग़म है जो तुम्हें खाये जा रहा है? दफ्तर आए हो किसी ग़मी में नहीं। मैं ये नहीं कहता कि खिलखिलाते फिरो पर स्माइल तो कर लिया करो। तुमने सुना नहीं 'फेस इज़ दि इंडेक्स ऑफ माइंड' स्माइल से एक पॉज़िटिव फील आता है। पूरे दफ्तर में एक पॉज़िटिव एनर्जी का एटमाॅसफियर रहता है।  

16. वह ऑफिस के आउटडोर प्रोग्राम से कन्नी काटता है:  क्या भाई ? तुम तो जरा भी सोशल नहीं हो। मैंने जब सुना मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ पर अब जब तुम ऑफिस के प्रोग्राम में नहीं आए तो पता चला कि लोग तुम्हारे बारे में ठीक ही कहते हैं। भाई ठीक है तुम्हारी कोई प्रॉब्लम हो सकती है, हम सबकी प्रॉब्लम होती हैं। तुम्हें क्या लगता है हमारी कोई प्रॉब्लम नहीं। आखिर हम फिर भी ऑफिस के सोशल प्रोग्राम में आते-जाते हैं ना कि तुम्हारी तरह चिल्ला खींच कर बैठ जाएँ। इससे अपनी टीम को अच्छे से जानने का मौका मिलता है। कालान्तर में 'स्वैट एनालिसिस' में हेल्प मिलती है। तुम्हारे स्ट्रॉंग और वीक पॉइंट मैनेजमेंट को पता रहते हैं। 'फाॅरेन असाइनमेंट' भी यही सब देख कर दिये जाते हैं जब तुमसे इसी शहर में  कहीं आया-जाया नहीं जाता तो फाॅरेन क्या खाक जाओगे। 

17. वह ऑफिस के सभी आउटडोर प्रोग्राम में आता है:  क्या भाई तुम्हारा कोई घर-बार है भी या नहीं? जब देखो, जिस प्रोग्राम में देखो कोई हो न हो तुम जरूर होते हो...एक ही 'वेला' आदमी है। देखो हर बार हर जगह जाने की ज़रूरत नहीं होती। लोग बुलाते हैं का मतलब ये नहीं होता कि जाना कंपलसरी है। 

18. वह छुट्टी नहीं लेता: क्या भाई ? कहीं तुम बीमार न पड़ जाना मुझे तो डर ही लगा रहता है। सुना है बुखार हो, सिर दर्द हो तुम ऑफिस चले आते हो।  ये ऑफिस है हैल्थ यूनिट नहीं। अंग्रेजों ने छुट्टी चलाई इसलिए थी कि माइंड को रिलेक्सेशन मिले। हम सब आदमी हैं। मशीन नहीं। हम सबको रैस्ट की ज़रूरत होती है। आगे से ये सुपरमैन बनने की कोई ज़रूरत नहीं। जब लगे जिस्म साथ नहीं दे रहा है तो छुट्टी लें।  भूल गए ! आदमी एक 'सोशल एनिमल' है। तुम्हारी भी कोई सोशल लाइफ है या नहीं? घर में बाल- बच्चे भी कहते होंगे कैसे पापा हैं ? हमारे लिए इनके पास टाइम ही नहीं। 

19. वह बहुत छुट्टी लेता है:  क्या भाई मुझे तो लगता है तुम को नौकरी की क्या ज़रूरत है? जब देखो तब छुट्टी। जब तुम्हारी ज़रूरत हो मजाल है जो तुम ऑफिस में हो। पता चलता है हुज़ूर छुट्टी पर हैं। अब रोजी-रोटी को इतने केज्युल भी मत लो। नौकरी है ये। एक बार छूट गई तो दूसरी इस उम्र में मिलनी भी नहीं। देखा नहीं बाहर क्या हाल चल रहा है। अब नौकरी मिली है तो उसकी इज्ज़त करना सीखो। प्लीज़ छुट्टी मिलती है का मतलब ये नहीं होता कि छुट्टी लेनी भी है। तुम्हारी छुट्टी है कोई और नहीं लेके भागा जा रहा तुम्हारे खाते में ही रहेगी। 

20. वह वेतन बढ़ाने की मांग करता/नहीं करता है: एक बात बताओ ये क्या जब देखो तब तुम सेलेरी बढ़ाने की कहते रहते हो। सरकार भी दस साल में एक बार बढ़ाती है एक तुम हो जो हर छह महीने बाद सूरत लटकाये चले आते हो। भूल गए अभी तीन साल पहले ही तुम्हारी सेलेरी बढ़ाई थी। तुमसे आधी तनख्वाह पर आने को लोग लाइन लगाए खड़े हैं। गो ! अब कुछ काम भी कर लो जब वह वेतन बढ़ाने की मांग ही न करे: क्या भाई तुम्हारे बाल-बच्चे हैं या नहीं? चुपचाप काम करते रहते हो दफ़्तर में सबके रिप्रेजेंटेशन आ गए वेतन बढ़ाने को। एक तुम हो तुम्हारा कोई आवेदन ही नहीं है। क्या तुम्हारी तनख्वाह बस है। पूरी पड़ जाती है? अगर नहीं तो कहाँ है तुम्हारा रिप्रजेंटेशन? अपनी नहीं तो अपनी टीम की, दफ्तर के अपने कुलीग्स का कुछ तो ख्याल करो। कुछ तो को-ऑपरेट करा करो। माना तुम्हें बढ़े हुए वेतन की कोई ज़रूरत नहीं और दफ़्तर में सब तो तुम्हारी संतोषी जीव नहीं। सबकी अपनी ज़रूरत होतीं हैं। उनका तो ख्याल करो 'डोंट ऑलवेज बी सैल्फिश'

Friday, July 31, 2026

व्यंग्य: हेरिटेज घड़ी से लिमिटेड एडिशन घड़ी तक

 

 

हम बचपन में नाना-नानी दादा-दादी के घर में पुराने, बोले तो, बेहद पुराने सन्दूक रखे और फ़ोटोज़ टंगे  देखते थे। जॉर्ज पंचम का फोटो हो या रानी एलीज़ाबेथ का। स्वदेशी में नेहरू जी और गांधी जी के फोटो लोकप्रिय थे। एक फोटो मुझे याद है जिसमें नेहरू जी और केनेडी वाईट हाउस के लाॅन में टहल रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे केनेडी उन्हें कुछ इंगित कर दिखा रहे हैं और नेहरू जी ठोड़ी पर हाथ लगाए आश्चर्य से निहार रहे हैं। आपने अगर सुदर्शन की 'हार की जीत' कहानी पढ़ी हो तो उसमें ज़िक्र आता है “बाबा ने घोड़ा दिखाया घमडं से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से” वैसा ही कुछ आश्चर्य नेहरू जी के चेहरे पर था।

 

हमारे रेडियो, फ्रिज, ए.सी.  और टी.वी. 30-30 साल चले। वो भी बिना किसी हील-हुज्जत के। तब सोचो चीजों की कितनी गारंटी होती थी। दरअसल वो गारंटी चीजों की नहीं थी। वो गारंटी आदमी की थी। उसकी नीयत की थी। उसे अपनी साख बहुत प्यारी थी, प्रॉफ़िट सेकंडरी था। वारंटी शब्द ही अब आया है। पहले तो गारंटी ही चला करती थी। चीज़ खराब भी  नहीं होती थी। दुकानदार आम कहते थे 'दादा खरीदे पोता बरते'। अब कोई दुकानदार ऐसा नहीं कहता क्योंकि अब यह फैशनेबल नहीं। अब आदमी पोते के बरतने की दृष्टि से कुछ नहीं खरीदता। उसकी और पोते की पसंद मिलती - जुलती नहीं है। यहाँ हर दो महीने बाद तो नए वर्जन का लैपटाॅप और फोन मार्किट में आ जाता है। मुझे याद है जब बैल बॉटम चले थे तब कोई इंसान अगर ड्रेन पाइप वाली पेंट पहने दिख जाता था तो ऐसा मालूम देता था कि वह किसी पुरानी सभ्यता से चला आया है।

 

मेरे फ्रिज और ए.सी. ने मेरा साथ 30 साल तक निभाया। हमने बहुत सी चीजों का साथ तो महज़ इसलिए छोड़ा कि अब उसके पुर्जे मिलना बंद हो गए या अब के मकेनिक उसे समझ ही नहीं पाते और हाथ खड़े कर देते हैं। अभी चालीस साल पहले मैंने अपना ट्रान्जिस्टर की नाॅब को ठीक होने दिया तो बाद में ख्याल आया कि मैंने रसीद तो ली ही नहीं। करीब एक माह बाद मैं दुकान पर गया तो उसने एक टोकरी मेरे आगे कर दी इसमें से पहचान कर अपना ट्रान्जिस्टर ले लो। कारण कि इस बीच में बलवाईयों ने उसकी दुकान पर हमला कर लूटमार की थी। मेरी नज़रों में उस दुकानदार की इज्ज़त बहुत बढ़ गयी। मैं ये सोच रहा था कि ये कंज्यूमर कोर्ट क्यों बनाने पड़े क्यों कि कोई तो है जो इस पूरी चेन में अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा। एक और नया जुमला आजकल चला है। 'इन चीजों की इतनी ही एज होती है'। दो साल चल गया और क्या चाहिए। अब नया मॉडल ले लो। उसमें फलां फीचर भी है। हमारे यहाँ जब वो वाला फ्रिज था जिस में बर्फ (फ़्राॅस्ट) हफ्ते के हफ्ते निकालनी पड़ती थी तब कमसेकम चीज़ें कब से फ्रिज में रखी हैं, पता चलता रहता था और बहुधा खराब होने से पहले बरत ली जाती थी। लेकिन अब 'ऑटोमेटिक डिफराॅस्ट' होने वाले फ्रिज आ गए हैं। अब चीज़ें सीधे फ्रिज से डस्टबिन में जाती हैं। इस चक्कर में हमने अपने पेट को भी कमोबेशी डस्टबिन ही बना लिया है। अब रेडियो, घड़ी, ट्रान्जिस्टर, मोबाइल फोन, लैपटाॅप खराब हो जाये तो मैं इस जुगाड़ में लग जाता हूँ कि इसे कैसे चलाने लायक बनाया जाये। बच्चों को कानों कान खबर हुए बिना। क्यों कि आज के दौर में चीज़ें ऐसी नहीं बनीं हैं आजकल के बच्चे भी कम बेसबरे नहीं। वे तुरंत डिक्लेयर कर देते हैं कि "फेंको इसे! दूसरा नया ले लो"। अब उन्हे कौन समझाये कि हम उस पीढ़ी के हैं जो हवाई चप्पल की बद्दी (स्ट्रैप) टूट जाने पर ऑलपिन या सेफ़्टी पिन से चला लिया करते थे। जूते की रिपेयर तब तक कराते रहते थे जब तक हमें या जूते को शर्म ही न आने लग जाये या मोची हाथ खड़े कर दे। जो भी पहले हो। हम बड़े गर्व से बताते थे ये मेरे पिताजी की अथवा दादा जी की घड़ी है। आज भी सही टाइम बताती है। सही चल रही है। वहीं 'ग्रांड सन' का कहना है "ये लिमिटेड एडिशन घड़ी है। यह वाटर प्रूफ है, यह दिन, तारीख बताती है। आप कितना चले, कितनी कैलोरी बर्न की और आपका हार्ट रेट भी"। अब उन्हें कौन समझाये हमारे टाइम पर तो बुजुर्ग हमें देख कर ही हमारे दिल का हाल बता देते थे।

 

 

Wednesday, July 29, 2026

व्यंग्य: असली ज़ेन-जी हम हैं

 


आजकल जो है सो ज़ेन-जी का बहुत बोलबाला है। जित देखो तित ज़ेन-जी के धमाल का शोर है। उन्ही की चर्चा हो रेली है। ऐसे में मेरा और मेरे जैसे अन्य असली खालिस ज़ेन-जी का परेशान होना, 'नैगलेक्टड फील' करना 'बट-नैचुरल' है। यह तो 'कूल' नहीं। आगे दो-चार लाइन्स में ही मैंने 'प्रूव' कर देना है। देखिये! मैं और मेरे जैसे रिटायर्ड लोगों को 'एक्स' क्यों कहते हैं। बोले तो ! ये जो भी भूतपूर्व हैं उन्हें 'एक्स' कहा जाता है। रिटायर होने के पाँच-दस साल तलक आप 'वाई' समझते और कहलाते हो। अब इस 'वाई' के अनेक अर्थ हैं। जैसे अपने को अभी भी 'वाई' से यंग समझना।  यूथ समझना। वैसे ही टाइट टी-शर्ट पहन कर चहल-कदमी करना। घर में भी ये 'वाई' वाले सबको टोकते-रोकते हैं। कोई बात हो इनकी ज़ुबान पर 'वाई' (क्यों) रहता है। बात-बात में बल्कि हर बात में 'वाई' (क्यों) इसकी क्या ज़रूरत है? पंखा क्यों चल रहा है? ए.सी. बंद क्यों नहीं किया? ये इतना महंगा खरीदने की क्या ज़रूरत? इन शॉर्ट ! सब जगह 'वाई' (क्यों-क्यों) का ग़दर मचाये रखते हैं। लेकिन ये ज्यादा नहीं चलता।

 

दस साल बाद यानि की जब आप सत्तर के लपेटे में आ जाते हो तो आप असली 'ज़ेड' तक आन पहुँचते हैं। देखिये जब आप रिटायर हो गए तब से आप 'अल्फाबेट' के 'एक्स' हो जाते हो। उसके दस साल तलक आप 'वाई' रहते हो और फिर अंग्रेजी वर्णमाला के आखिरी 'अल्फाबेट' ज़ेड तक आ जाते हो। बस उसके बाद कभी भी चला-चली की वेला रहती है। अब आप ना 'एक्स' हैं ना 'वाई'। अब आप 'ज़ेड' हो। इसीलिए मैं हुआ आप हुए (अगर आप सत्तर के ऊपर के हो) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप ‘अर्ली सेवेंटीज़’ में हो या ‘लेट सेवेंटीज़’ में आप हो तो ज़ेन-जी ही।

 

अब आप समझे! मैं क्यों अपने को और अपने जैसे ‘स्वीट सेवेंटी’ वाले सभी लोग को ज़ेन जी कहता-समझता हूं। असली 'ज़ेन-जी', खालिस 'ज़ेन-जी'। आप बिंदास हैं क्यों कि आपके पास खोने को कुछ नहीं। आप तो वैसे ही ‘डिपार्चर-लाउंज’ में बैठे हैं। न जाने कब आपकी फ्लाइट एनाउंस हो जाए। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है:

 

 

         उन किताबों को हम काबिले-जब्ती समझते हैं

         जिन्हें पढ़ कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं

 

अब इसमें दो बातें हैं। पहली तो ये कि अकबर इलाहाबादी अब रहे नहीं। नहीं तो पता नहीं वो अपना नाम अकबर प्रयागराजी कहलाना पसंद करते क्या? दूसरा, ये कि अगर बेटे (बेटी इन्क्लुडिड) बाप को खब्ती समझते हैं तो 'डेफ़िनिटली' ज़्यादातर बाप निश्चय ही खब्ती हैं। खब्ती इंसान अव्वल तो लॉजिक से काम लेता नहीं। वह अपने पूर्वाग्रहों से बुरी तरह ग्रस्त रहता है। दूसरे उनकी बहुत 'स्ट्रॉंग लाइक्स' और 'डिसलाइक्स' रहती हैं। देखिये कुछ भी बड़ा करने को जुनून चाहिए। मेरा सत्तर वालों से अनुरोध है कि आप अपने आप को कम न समझें। आप सत्तर नहीं आप 'सतर्क' हैं। आप असली के ज़ेन-जी हैं। आपकी ‘नाॅलिज़ वास्ट’ है। तजुर्बा तो विशाल है ही। एक सीरियल आता था दूरदर्शन पर ‘बुनियाद’ उसमें लाजो जी (मुख्य पात्र) एक संवाद अपने बच्चों को कहती है “मैं तब की मॉडर्न हूँ जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे”

 

Sunday, July 19, 2026

भांति भांति के लोग...

  

वह टूरिज़म विभाग में ही था। उसे रूम-अटेंडेंट का काम सौंपा हुआ था। जिन्हें होटल लाइन का ज्ञान न हो उनकी मालूमात के लिए बता दूँ रूम-अटेंडेंट अथवा हाउसमैन का काम सीढ़ी पर सबसे बॉटम पर माना जाता है। मैट्रिक फिर भी मांगा जाता था, ताकि वक़्त ज़रूरत गैस्ट से बात कर सके। समझ सके। बहरहाल इस पोस्ट (पद) पर मोटीवेशन कम ही रहता था। जहां मोटीवेशन न हो वहाँ लोगबाग अपना मोटीवेशन खुद बना लेते हैं।.तलाश कर लेते हैं। जैसे सहकर्मी के साथ आँख लड़ाना अथवा प्रेम पींग बढ़ाना। शाम को यारों की ड्रिंक पार्टी। किस गेस्ट ने किस को क्या दिया। किसका टांका किससे भिड़ा है। लेटैस्ट किसका किसके साथ क्या चल रहा है। कोई-कोई कॉल गर्ल रैकिट से भी इनडाइरेक्टली जुड़ जाते। हम सब अपने-अपने काम का एक्साइटमेंट बनाए रखने को कुछ न कुछ करते ही हैं। एक आदर्श स्टेंडर्ड होटल में मोटे-मोटे दो डिवाइड होते हैं। फ्रंट ऑफिस और बैक ऑफिस।

फ्रंट ऑफिस: जैसा नाम से ही विदित है वे विभाग होते हैं जो सामने-सामने होते है बोले तो गेस्ट के संपर्क में आते हैं। यथा रिसेप्शनिस्ट, बैल बॉय, बिल क्लर्क, दूसरे होते हैं

हाउस कीपिंग: जिसमें हाउस कीपर, रूम अटेंडेंट/हाउसमैन आते हैं। एक होता है

एफ एंड बी: फूड एंड बेवरेज ( रेस्टाॅरेंट/खाना-पीना/बार)

स्टोर एंड पर्चेज: (होटल की सामग्री खरीदना उसका रखरखाव)

सिक्यूरिटी एंड विजिलेन्स:

पर्सनेल:

एकाउंट्स:

शेफ: ( किचन/कुक/कुकिंग)

 

पता चला कि एक हाउसमैन के पिता की दुखद मृत्यु हो गयी है। वह हाउसमैन छुट्टी पर चला गया। महीने भर बाद  एक दिन वह आया। उसके हाथ में उस दौर में जो फ़ैशन थी उसके अनुरूप एक विदेशी ब्रांड का मंहगा सिगरेट का पैकेट और  गोल्डन लाइटर था। वह उस लाइटर को हाथ में घुमा-घुमा कर उसके साथ लगातार खेल रहा था। उसने अपनी गर्दन में सोने की मोटी चेन पहन रखी थी। तदनुसार बुशर्ट के ऊपर के दो बटन खुले रखे थे। आपने सोने की चेन  पहन रखी हो वो भी इतनी मोटी और उसे दिखा भी ना पाएँ तो क्या ही फायदा ऐसी चेन पहनने का? वह बिना पूछे मेरे चेम्बर मे आकर मेरे सामने लगी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया। और बोला मेरा केस अपने पिता की जगह करुणा आधार पर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी के लिए प्राॅसस हो गया है। वह यही बताने आया है। जैसे ही लैटर आयेगा वह अपना त्यागपत्र दे देगा। तब तक भागा-दौड़ी के लिए अब लीव पर ही रहेगा।

 

दो महीने बाद वह आया। अबके उसके हाथ में सिगरेट का पैकेट नहीं था। न ही लाइटर था। उसने मुझसे पूछा कि क्या वह बैठ सकता है। मुझे वह बीमार सा लग रहा था। मैंने उससे पूछा उसने जॉइन कर लिया ? किस पोस्ट पर जॉइन किया ? और उसका ऑफिस कहाँ है ? सब के उत्तर में उसने एक लंबी ठंडी आह भरी। बोला :

 

"जी हमें तो पता नहीं था पिताजी का किसी भारी वित्तीय गड़बड़ी के केस में नाम था। उसी से परेशान हो उन्होने आत्महत्या कर ली थी। ऑफिस ने सूचित किया है कि ऐसे केस में करुणामूलक नौकरी का कोई प्रावधान नहीं है। हम उनसे मिले। उनकी बहुत अनुनय-विनय की मगर उन्होने नियमों का हवाला देते हुए हमें दफ्तर से हकाल दिया। सर ! क्या मुझे मेरी हाउसमैन की नौकरी वापिस मिल सकती है ? सोचो मुझे क्या करना चाहिये था ?    

 

व्यंग्य : अगले जनम मोहे साँप से मत डसवाईयो

 


    सयाने कह गए हैं हर अपराध के पीछे तीन चीजों में से एक न एक का हाथ होता है: जर, जोरू, ज़मीन। आजकल जैसा सब कुछ चल रहा है अखबार के अखबार भरे पड़े रहते हैं ऐसे ही न्यूज चैनल एक के बाद एक खबर देते रहते हैं जैसे कोई कंपटीशन सा चल रहा हो। अब प्रिये! मेरी समस्या ये है कि मुझे साँपों से बहुत डर लगता है। साँप तो साँप मुझे तो केंचुए से भी डर लगता है। अतः तुम कुछ भी करना पर वादा करो तुम मुझे साँप से नहीं डसवाओगी। सुनते हैं जब साँप डस लेता है तो ज़हर से पूरा जिस्म नीला पड़ जाता है। वैसा ही नीला जैसा नीला प्लास्टिक ड्रम होता है। अब मैं नहीं चाहता कि मेरा जिस्म नीला पड़े। पहले ही मेरा रंग काला बोलो, सांवला बोलो है। नीला होकर तो और भी ना जाने कैसा-कैसा लगेगा। भले तुम्हें साँप और सपेरे आराम से 'ईजीली' मिल जाएँगे। पर देखो मेरी आखिरी इच्छा यही समझो कि मुझे साँप से मत डसवाना। सिर्फ इसलिए कि मुझे साँप से डर लगता है बहुत डर लगता है। हो सकता है सांप को देखने मात्र से ही मेरा दम निकल जाये। कहावत है न जब गुड़ से मरता हो तो ज़हर क्यों दिया जाये।

 

अब तुम अगर ये सोचो कि तुम मुझे किसी पहाड़ पर ले जाने का प्लान बना रही हो जैसे कि नॉर्थ ईस्ट के इलाके में होते हैं। पर प्रिये ! मुझे हाइट्स से डर लगता है। बोले तो मैं वर्टिगो से ग्रस्त हूँ। अक्रोफोबिया है मुझे। हाइट्स पर जाने का दूर हाइट्स का नाम सुन कर ही जी मिचलाने लगता है। मुझे चक्कर आने लगते हैं। अतः हे प्रिये! मुझे कभी पहाड़ पर ले चलने का ज़िक्र भी मत कर देना। और सुनो प्रिये! मुझे इन पुराने किलों और महलों में भी कोई रुचि नहीं है। मैं अपने टू बी.एच.के. के क्वाटर में बहुत खुश हूं। अतः प्लीज़ मुझे कभी किसी भी क़िले या महल ले जाने की ज़िद मत करना। जब भी तुम इसका ज़िक्र भर करोगे मेरा जिस्म सुन्न पड़ जाएगा। जाना तो दूर मैं इन भूतहा किलों का नाम सुन कर ही  सहम जाता हूं।

 

अब आजकल ये छुरी-चक्कू बोलो, तमंचा-कट्टा बोलो आसानी से सुलभ हैं। इनको चलाने वाले भी आजकल बहुत सस्ते में मिल जाते हैं। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं दूर ढूंढो पास मिलते हैं। फिल्मों- सीरियलों में गोली चलते, गोली लगते देखना एक बात है मगर मेरे को गोली लगे सुन कर ही पसली में सिहरन दौड़ जाती है। मैं जानता हूँ अगर एक बार तुम ठान लो तो ऐसी कोई बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं बनी जो मुझे तुम्हारी बुलेट से बचा ले।

 

 निष्कर्ष यही छोटा सा है प्रियवर कि जब तुम्हारा मन मुझ से ऊब जाये तो बस कह भर देना मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा। असल में जान है तो जहान है। जान सलामत रहे जाने-मन बहुत मिल जाने हैं। जब जान ही नहीं रहेगी तो काय बात की जाने-मन? तुम बेशक सातों वचन भुला दो वांदा नहीं।  बस तुम तो मेरा यही एक वचन, मेरे लिये  निभाने का वादा करो कि जब तुम्हें किसी भी स्टेज पर ऐसा लगे कि अब बस हो गया तो मुझे बता भर देना। मनी बैक गारंटी की तरह ये दूल्हा बना माल वापिस हो जायेगा। भूल चूक लेनी देनी।  

अनुकंपा नौकरियां -फैमिली वैलफेयर या फ्राॅड

 

ज्ञात हो कि भारतीय रेलवे भारत में सबसे बड़ा नियोक्ता है। एक समय की बात है कि इसमें लगभग 18 लाख कर्मचारी थे, जिनमें दो लाख आकस्मिक श्रमिक भी शामिल थे। चूंकि रेलवे की अपनी संख्या इतनी बड़ी रही है, तदनुसार, सेवानिवृत्ति/त्यागपत्र/ मृत्यु भी आनुपातिक रूप से बड़ी है। रेलवे के विपरीत अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की सीमा अन्य केंद्र सरकार के मंत्रालयों में 5 प्रतिशत है। यह कुल 5 प्रतिशत रिक्तियों/स्वीकृत पद तक सीमित है।

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अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान अंग्रेजों द्वारा बनाई पाॅलिसी के रूप में है। 'क्लोज-शॉप' कई संगठनों में भर्ती का एक वैध तरीका रहा है। उनका मानना है कि इस प्रकार वफादारी और समर्पण, आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं। यह अनुकंपा नियुक्ति  संकट में शोक संतप्त परिवार को सहायता प्रदान करने के लिए था। समय के साथ यह 'एक मौत = एक नौकरी' बन के रह गया। सरकारी रोजगार की आवश्यकता सभी को होती है, वह भी यदि  रेलवे में है तो बल्ले बल्ले ! चिकित्सा सुविधा, सरकारी आवास और उदार पेंशन लाभों के साथ। इसलिए सरकारी नौकरी के लिये परिवार अपने को 'संकट' में घिरा पाता है।  कर्मचारी यूनियन सदैव एक शुल्क पर आपकी सहायता को तत्पर मिलेंगे।

 

 देखा गया है कि परिवार अपने बेटों में से सबसे नालायक को रेलवे को प्रदान करता है। उनका मानना है कि 'योग्य' तो अपनी योग्यता के आधार पर कहीं और भी नौकरी हासिल करने में सक्षम होगा। इसके अलावा, बेटा उनकी स्वाभाविक पसंद होती है क्योंकि पुत्री तो अंततः शादी कर लेगी और परिवार को छोड़ देगी। एक आसान सी लिखित परीक्षा आयोजित की जाती है, जो आम तौर पर मैट्रिक स्तर की होती है। अफ़सोस! बी ए और एम ए इसे पास करने में विफल रहते हैं। फिर वे आँसू भरे दूसरा मौका देने की गुहार लगाते हैं क्योंकि उनके अनुसार वे भावनात्मक आघात से गुजर रहे होते हैं। आम तौर पर, एक दूसरा मौका दे दिया जाता है। जहां तक ग्रुप डी (क्लास IV) नौकरियों का संबंध है; कोई लिखित परीक्षा आयोजित नहीं की जाती है, उम्मीदवार का चयन साक्षात्कार के आधार पर किया जाता है। 99 प्रतिशत लोग इस नौकरी को पा जाते हैं। "ग्रुप डी कार्यालय में जो एम.टी.एस. (मल्टी-टास्किंग स्टाफ) की है, मांग अधिक होती है। न कि श्रम साध्य फील्ड जाॅब्स की। जब तक कि कोई तकनीकी रूप से योग्य न हो और तकनीकी क्षेत्र में अपना भविष्य (कैरियर) बनाने का उत्सुक न हो। कुछ उम्मीदवार बहुत अच्छे और भविष्य को लेकर गंभीर होते हैं। वे समर्पण के साथ कड़ी मेहनत करते हैं। जैसे-जैसे रोजगार बाजार सिकुड़ रहा है, रेलवे में नौकरियां कीमती होती जा रही हैं।

 

डार्क पक्ष:

बेरोजगार बच्चों और लालची पत्नियों ने इसे एक लूट के रूप में देखना शुरू कर दिया। परिणाम विनाशकारी रहे। रेलवे में भर्ती होने वाली श्रमशक्ति की गुणवत्ता घटी, जबकि पारिवारिक झगड़े बढ़ गए। आप सबसे खराब, भयावह, घिनौने परिदृश्य की कल्पना करें और मेरा विश्वास करें, यह इस अनुकंपा आधार नियुक्ति के नाम पर हुआ है। पिता को मारना, पति को जहर देना जैसे अब कोई पाप ही नहीं रह गया है। एक मामला आया जहां एक मौत (पिता की) और तीन बेटों को नौकरी दे दी गई थी। कैसे? कोई भी अधिकारी उस कार्यालय में लंबे समय तक नहीं रहता था। नया अधिकारी आता, नया अधिकारी.. नई केस फाइल, नया बेटा दर्ज हो जाता। जब अनुकंपा नियुक्तियों की बात आती है, तो आश्चर्यजनक रूप से इसमें शामिल सभी लोग जरुरत से ज्यादा 'दयालु' हो उठते हैं, जैसे इसके सहारे वे स्वंय के लिये स्वर्ग में स्थान सुरक्षित कर लेना चाहते हैं।  यहां तक कि मौत का नाटक भी असामान्य नहीं रहा है। एक मामला ध्यान में आया; एक लड़का सिर मुंडा कर आता है और अपनी 'दुख भरी' कहानी सुनाता है कि कैसे उसके रेलकर्मी पिता पैतृक गांव गए और सांप के काटने के कारण वहां उनकी मृत्यु हो गई। अब चिकित्सा प्रमाण पत्र और ग्राम प्रधान की रिपोर्ट पर निर्भर रहने के अलावा ऑफिस क्या कर सकता है। ऐसी नियुक्ति के मामलों में आश्चर्यजनक रूप से, कागज पूरे होते/रिकॉर्ड एकदम क्लियर, एक-एक पेपर सावधानीपूर्वक रखा जाता। अब ऐसे संगठन/संस्थान हैं जो एकमुश्त अनुदान देते हैं और बस इतना ही। उनके पास ऐसी कोई योजना नहीं है जहां अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की आवश्यकता/प्रावधान हो।

 

भोले-भाले परिवार के गरीब अशिक्षित लोग प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ नहीं होते हैं, वे शुभचिंतकों की आड़ में भेड़ियों का शिकार हो जाते हैं। एक मामला देखा गया जहां गरीब अनपढ़ महिला के पास कुछ कागज थे, ये नकली प्रमाण पत्र और अंक पत्र थे। उसने अपनी लिखित परीक्षा में सौ में से शून्य हासिल किया था। मैंने उससे पूछा कि उसने अपनी मैट्रिक कहाँ से पास की ? वह कनफ्यूज सी ताकती रही। बाद में नम्रता से उसने जवाब दिया "ये कागजात तो मुझे बाबू जी ने बेचे थे"

 

एक अधेड़ उम्र का आदमी अपनी एडवोकेट की पोशाक में मेरे निवास पर आता है; उसे कार्यालय में मिलने के लिए कहा गया। जाते जाते उसने कहा, "अर्जेंट मिलना है हमारे परिवार में महिलाएं काम नहीं करती हैं, इसलिए इसके बजाय मृतक के छोटे भाई को नौकरी दे दी जाये। जब जांच की गई तो पता चला कि इस आदमी ने ऑफिस से पत्राचार के नाम पर अपनी विधवा पुत्र वधू से सादे कागजात पर हस्ताक्षर करा लिये थे। महिला ने मांग की कि यदि अनुकंपा आधार पर नियुक्ति का कोई प्रावधान है तो वह इसे लेना चाहेगी क्योंकि वह इंटरमीडिएट पास है। इस प्रकार, जो उसका हक़ था उसे मिला।

 

जहाँ पैसा (रिश्वत) चलता है, वहाँ भर्ती हुआ युवक जल्द ही छोटी- मोटी हेराफेरी और भ्रष्टाचार की तकनीकें सीखने में लग जाता है। नई उक्ति यह प्रतीत होती है: 'मुहब्बत, जंग और अनुकंपा  नियुक्ति में सब फेयर है' घृणित साजिशें और जानलेवा योजनाएं इतनी बार सामने आती हैं कि लगता है इस योजना को बंद कर देना बेहतर होगा। कल्पना कीजिए कि यह परिवार विशेष और समाज में कैसी कैसी कलह को ला रहा है। हम मुंह फेर कर अन्यत्र देखने का नाटक नहीं कर.सकते बोले तो जोखिम नहीं उठा सकते।