25 अप्रैल 1951
का वाकया है। फिल्म स्टार श्याम, फिल्मिस्तान
स्टूडियो के शशधर मुखर्जी की फिल्म 'शबिस्तान' की शूटिंग चाइनीज़ क्रीक, घोडबंदर, थाणे
में कर रहे थे। घोड़ों के साथ शूटिंग सीन खत्म हो गये थे। दोपहर लगभग 12
बजे 'पैक-अप' हो
गया था। श्याम घोड़े पर सवार लौट रहे थे। अचानक, घोड़ा
फिसल गया और श्याम घोड़े से गिर पड़े। वह हंसते हुए उठे और बोले कुछ नहीं हुआ।
थोड़ी देर बाद ही उनके कान से खून बहने लगा। दर्द बढ़ने लगा, उन्हें
तुरंत सीधे बॉम्बे ले जाया गया और मरीन लाईन्स के 'बॉम्बे
अस्पताल' में दिखाया गया। कुछ ही मिनटों में श्याम (श्याम सुंदर
चड्डा) की मृत्यु हो गई। जिससे पूरी फिल्मी दुनिया में सदमे की लहर फैल गई। श्याम
की उम्र केवल 31 बरस थी।
श्याम (सुंदर चड्डा)
का जन्म 20 फरवरी 1920
को सियालकोट में हुआ था। चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे श्याम। वह अपने
टाइम के सबसे स्टाइलिस्ट और सुशिक्षित अभिनेता थे। उन्होंने गोर्डन कॉलेज
रावलपिंडी से स्नातक की परीक्षा पास की
थी। जहाँ वे ड्रामैटिक्स सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे थे। नाटकों में उनकी
परफाॅर्मेंस उत्कृष्ट होती थी। उन्हें टेनिस खेलने का जुनून था। उन्होंने ‘ताजी
मुमताज कुरैशी’ से शादी की थी, उनकी
एक बेटी साहिरा और एक बेटा (श्याम के मरने के दो महीने बाद) मरणोपरांत हुआ था
जिसका नाम शेखर (शाकिर) था। अब वह लंदन में एक मनोचिकित्सक है। बेटी साहिरा ने
राहल काज़मी से निकाह किया। उनका एक बेटा अली काज़मी एक पाक-कनैडियन अभिनेता है।
1942 से शुरु करें तो श्याम ने 25
से अधिक फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया। सब एक से बढ़ कर एक। उन्होंने अपने
समय की सभी टाॅप हीरोइन यथा निगार सुल्ताना, नसीम
बानू, रेहाना, नरगिस, कुलदीप
कौर, मीना शौरी, मुनव्वर
सुल्ताना, सुरैया और रमोला के साथ काम किया। उनकी आखिरी अधूरी
फिल्म शबिस्तान (1951)
को 'बॉडी-डबल' की
मदद से पूरा किया गया।
लाहौर और रावलपिंडी
के दिनों से ही श्याम के सबसे करीबी दोस्तों में अभिनेता ओम प्रकाश थे। उनकी
दोस्ती का बंधन विभाजन के बाद भी जारी रहा। उन्होंने यूनियन पार्क में आमने-सामने
घर खरीदे थे। अभिनेता की मृत्यु के बाद इसका नाम 'श्याम
पार्क' रखा गया। अब इसका नाम चैम्बूर नाका रोड से दूर फ्रेंडशिप
पार्क ('मैत्रेयी पार्क') रखा
गया है। एक पतली गली यूनियन पार्क रोड इलाके को आर.के. स्टूडियो से जोड़ती है। इसी
सड़क के साथ अभिनेता - निर्देशक किशोर साहू, फिल्म
निर्माता रमेश सैगल, त्रिलोक कपूर, अभिनेत्री
नलिनी जयवंत के घर भी थे। आगे, मोड़ के पास, अशोक
कुमार रहते थे। श्याम सुसंस्कृत, पढ़े-लिखे
और अंग्रेजी-उर्दू में पारंगत और धाराप्रवाह थे। वे समाचार पत्रों में दोनों
भाषाओं में नियमित साप्ताहिक कॉलम भी लिखते थे।
वास्तव में, श्याम
की मृत्यु के बाद श्याम की पत्नी अपनी बड़ी बहन, ज़ेब
कुरैशी के साथ लाहौर चली गईं, बड़ी बहन ज़ेब कुरेशी
बॉम्बे में एक अभिनेत्री थी। मुमताज़ ने बाद में एक अंसारी नामक सज्जन से
पुनर्विवाह किया। उनके बच्चों का पालन-पोषण मुस्लिम के रूप में किया गया।
प्रसिद्ध लेखक सआदत
हसन मंटो के साथ श्याम की दोस्ती एक लीजेंड थी। बहुत मजबूत थी। मंटो और श्याम दो
शरीर एक आत्मा की तरह थे।। अपनी पुस्तक 'स्टार्स
फ्रॉम अनदर स्काई' मंटो के अनुभवों के उर्दू -'मीना
बाज़ार' से अनुवादित पुस्तक है। मंटो ने सबसे मार्मिक और दिल को छू लेने वाला
चैप्टर श्याम को समर्पित किया है । जिसका
शीर्षक था श्याम: कृष्णा की बांसुरी। मंटो तब बॉम्बे टॉकीज़ के एक 'एम्पलाॅयी' थे, जहां
श्याम को एक फिल्म का काॅन्ट्रेक्ट मिल गया था। लेकिन पैसा थोड़ा-थोड़ा और बहुत
धीरे-धीरे आ रहा था। वे संघर्ष भरे दिन थे और दोनों दोस्त एक अपार्टमेंट और खर्चा
साझा किया करते थे।
उनके संस्मरण उनके
उन दिनों की छोटी छोटी घटनाओं से भरे हुए रहे जो श्याम के विशाल दिल और दोनों की
गहरी दोस्ती की मिसाल थे। एक दिन जब श्याम को एक ठीक-ठाक राशि मिली और मंटो पर
पैसे नहीं थे, ट्रेन में लौटते समय, श्याम
ने दस-दस रुपये के नोटों की गड्डी को आधा-आधा कर दिया और अपने दोस्त से एक बंडल
लेने के लिए कहा। मंटो ने एक ले लिया और स्टेशन पर उतर गया। श्याम को एक और दोस्त
से मिलने जाना था, जैसे ही ट्रेन जरा दूर गई, श्याम
ने कुछ पैसे लहराए और चिल्लाया, “मैंने इस गड्डी से कुछ रुपये पहले ही निकाल लिए थे”। मंटो
प्यार से उस ‘अलविदा’ को याद करता है
जिसे दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से कहा था, जब
मंटो कराची को रवाना हुआ था। जिस दिन मंटो को जाना था, श्याम
अपने दोस्त को ‘सी- ऑफ’ करने शूटिंग से जल्दी वापस आ गया था। उसने अपने
दोस्त के साथ दो पैग साझा किए, एक भी शब्द बोले
बिना बस कहा “चलें”? उसने सामान पैक करने
में उसकी मदद की और पूरे रास्ते एक दूसरे को चुटकुले सुनाते रहे। जब मंटो शिप की सीटी पर जैटी में सवार हो रहा
था, तो श्याम ने अपने दोस्त को हाथ हिलाया, रोया
और चिल्लाया "हिपतुल्ला!" फिर पीछे देखे बिना चला गया। अगर आप सोच रहे
हैं कि 'हिपतुल्ला!' क्या
है?, तो यह मंटो द्वारा गढ़ा गया एक टर्म था, जो
किसी क्रिकेटर के अजीब नाम से बना था। जिसे उसने एक अखबार में देखा था। मंटो ने
इसे एक ‘ताज्जुब’
या ‘वाह ! वाह’ !
के रूप में इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे यह
फिल्मी हलके में लोकप्रिय हो गया। जैसे कि
कुछ ऐसा जिसे "हिप्तुलाइज़" करने की आवश्यकता है या कुछ "हिप्तुल्ला
पर्याप्त" नहीं है। जब एक सभा में
अशोक कुमार ने श्याम से पूछा इसका क्या मतलब है? तो श्याम ने इसे "मंटोवाद" (मंटोवाइज़) बताया।
श्याम बहुत बुलंद शख्शियत का इंसान था। उसकी हर बात, उसकी
हर हरकत, उसकी हर अदा, ऊंचे
बहुत ऊंचे स्तर की होती थी। जब खूब सफल होने के बाद श्याम की स्थिति
(पैसे से) ठीक ठाक हो गयी तो उसने यह सुनिश्चित किया कि सनकी और बेहद खर्चीले मंटो
के पास अपने छोटे बच्चों और पत्नी की देखभाल के लिए पर्याप्त पैसा होना चाहिए। मंटो
के पाकिस्तान जाने के बाद, श्याम अपने दोस्त के लिए तरसता था, और
उसे पत्र लिखता था। मंटो जवाब नहीं देता था। श्याम चिंतित हो उठता और अपनी फिल्म
डिस्ट्रीब्युटर्स को कहला भेजता कि श्याम की तरफ से पैसे भेज दें। श्याम के भतीजे बिमल
चड्डा लिखते हैं। मंटो से कभी पूछना नहीं पड़ा, श्याम
सहज रूप से अपने दोस्त की जरूरतों को जान लेता था। बिमल के अनुसार "श्याम
पूरी तरह से मंटो के पाकिस्तान जाने के फैसले के खिलाफ था और उसने उसे अपना मन
बदलने के लिए मनाने की हरचंद कोशिश की, लेकिन
मंटो हिला नहीं। दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से बात तक करना बंद कर दिया था।
जिस तरह से 'दि
टाइम्स ऑफ ने इंडिया' ने श्याम की मृत्यु पर कमेंट किया वह श्याम की महान
शख्सियत को दिखाता है। उसका मुख्य पैरा
स्टार की आभा-प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ बताता है। " टाॅल, प्रभावशाली
और सुंदर, श्याम, भारत
में सबसे अधिक लोकप्रिय, स्क्रीन का श्रेष्ठ सितारा, पूरे
भारत में लाखों फिल्म प्रेमियों का चहेता। बॉम्बे में लाखों लोगों की भीड़ लगी हुई
थी। बुधवार सुबह अपने चेम्बूर घर से काम करने के लिए हँसते हुए गया था और दोपहर तक, वह
मर चुका था। (स्रोतः द टाइम्स ऑफ द टाइम्स ऑफ )
बिमल बताते हैं, जब
श्याम एक फिल्म के प्रीमियर के लिए लाहौर गए, जिस
दिन वह लैंड किये, उसी दिन उन्होंने अपने दोस्त की तलाश की। उस समय तक
श्याम एक स्टार बन गया था और प्रशंसक हरदम उसका पीछा करते। वह उनसे घिरा रहता।
हालांकि मंटो और श्याम मिले, और दोनों दोस्तों ने खुशी से एक-दूसरे को गले लगा लिया, लेकिन
आगंतुकों की बढ़ती भीड़ और प्रशंसकों की भीड़ ने उन्हें एक-दूसरे के साथ ज्यादा
समय बिताने ही नहीं दिया।
नंदिता दास की फिल्म
'मंटो' में मंटो की भूमिका नवाजुद्दीन
सिद्दीकी ने की है। श्याम की भूमिका ताहिर राज भसीन ने निभाई है ।
श्याम की अंतिम
फिल्म शबिस्तान में श्याम की नायिका नसीम बानू थीं। 1942 से 1951 तक श्याम की फिल्मों
और उनके अभिनय ने फिल्म जगत में धूम मचा दी थी। श्याम को फिल्म जगत में आला मुकाम हासिल हुआ।
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