वह टूरिज़म विभाग में ही था। उसे रूम-अटेंडेंट
का काम सौंपा हुआ था। जिन्हें होटल लाइन का ज्ञान न हो उनकी मालूमात के लिए बता
दूँ रूम-अटेंडेंट अथवा हाउसमैन का काम सीढ़ी पर सबसे बॉटम पर माना जाता है।
मैट्रिक फिर भी मांगा जाता था, ताकि वक़्त ज़रूरत गैस्ट
से बात कर सके। समझ सके। बहरहाल इस पोस्ट (पद) पर मोटीवेशन कम ही रहता था। जहां
मोटीवेशन न हो वहाँ लोगबाग अपना मोटीवेशन खुद बना लेते हैं।.तलाश कर लेते हैं।
जैसे सहकर्मी के साथ आँख लड़ाना अथवा प्रेम पींग बढ़ाना। शाम को यारों की ड्रिंक पार्टी।
किस गेस्ट ने किस को क्या दिया। किसका टांका किससे भिड़ा है। लेटैस्ट किसका किसके
साथ क्या चल रहा है। कोई-कोई कॉल गर्ल रैकिट से भी इनडाइरेक्टली जुड़ जाते। हम सब
अपने-अपने काम का एक्साइटमेंट बनाए रखने को कुछ न कुछ करते ही हैं। एक आदर्श
स्टेंडर्ड होटल में मोटे-मोटे दो डिवाइड होते हैं। फ्रंट ऑफिस और बैक ऑफिस।
फ्रंट ऑफिस:
जैसा नाम से ही विदित है वे विभाग होते हैं जो सामने-सामने होते है बोले तो गेस्ट
के संपर्क में आते हैं। यथा रिसेप्शनिस्ट, बैल बॉय,
बिल क्लर्क, दूसरे होते हैं
हाउस कीपिंग:
जिसमें हाउस कीपर, रूम अटेंडेंट/हाउसमैन आते
हैं। एक होता है
एफ एंड बी:
फूड एंड बेवरेज ( रेस्टाॅरेंट/खाना-पीना/बार)
स्टोर एंड पर्चेज:
(होटल की सामग्री खरीदना उसका रखरखाव)
सिक्यूरिटी एंड विजिलेन्स:
पर्सनेल:
एकाउंट्स:
शेफ: (
किचन/कुक/कुकिंग)
पता चला कि एक हाउसमैन के पिता की दुखद
मृत्यु हो गयी है। वह हाउसमैन छुट्टी पर चला गया। महीने भर बाद एक दिन वह आया। उसके हाथ में उस दौर में जो
फ़ैशन थी उसके अनुरूप एक विदेशी ब्रांड का मंहगा सिगरेट का पैकेट और गोल्डन लाइटर था। वह उस लाइटर को हाथ में
घुमा-घुमा कर उसके साथ लगातार खेल रहा था। उसने अपनी गर्दन में सोने की मोटी चेन
पहन रखी थी। तदनुसार बुशर्ट के ऊपर के दो बटन खुले रखे थे। आपने सोने की चेन पहन रखी हो वो भी इतनी मोटी और उसे दिखा भी ना
पाएँ तो क्या ही फायदा ऐसी चेन पहनने का? वह बिना
पूछे मेरे चेम्बर मे आकर मेरे सामने लगी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया। और बोला
मेरा केस अपने पिता की जगह करुणा आधार पर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी के लिए प्राॅसस
हो गया है। वह यही बताने आया है। जैसे ही लैटर आयेगा वह अपना त्यागपत्र दे देगा।
तब तक भागा-दौड़ी के लिए अब लीव पर ही रहेगा।
दो महीने बाद वह आया। अबके उसके हाथ में
सिगरेट का पैकेट नहीं था। न ही लाइटर था। उसने मुझसे पूछा कि क्या वह बैठ सकता है।
मुझे वह बीमार सा लग रहा था। मैंने उससे पूछा उसने जॉइन कर लिया ? किस पोस्ट पर जॉइन किया ? और उसका ऑफिस कहाँ है ?
सब के उत्तर में उसने एक लंबी ठंडी आह भरी। बोला :
"जी हमें तो पता नहीं था पिताजी का
किसी भारी वित्तीय गड़बड़ी के केस में नाम था। उसी से परेशान हो उन्होने आत्महत्या
कर ली थी। ऑफिस ने सूचित किया है कि ऐसे केस में करुणामूलक नौकरी का कोई प्रावधान
नहीं है। हम उनसे मिले। उनकी बहुत अनुनय-विनय की मगर उन्होने नियमों का हवाला देते
हुए हमें दफ्तर से हकाल दिया। सर ! क्या मुझे मेरी हाउसमैन की नौकरी वापिस मिल
सकती है ? सोचो मुझे क्या करना चाहिये था ?