Ravi ki duniya

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Thursday, October 15, 2026

ग्रेटेस्ट हैंसम पाॅपुलर हीरो- श्याम

 

                                             


                               

25 अप्रैल 1951 का वाकया है। फिल्म स्टार श्याम, फिल्मिस्तान स्टूडियो के  शशधर मुखर्जी की फिल्म 'शबिस्तान' की  शूटिंग चाइनीज़ क्रीक, घोडबंदर, थाणे में कर रहे थे। घोड़ों के साथ शूटिंग सीन खत्म हो गये थे। दोपहर लगभग 12 बजे  'पैक-अप' हो गया था। श्याम घोड़े पर सवार लौट रहे थे। अचानक, घोड़ा फिसल गया और श्याम घोड़े से गिर पड़े। वह हंसते हुए उठे और बोले कुछ नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद ही उनके कान से खून बहने लगा। दर्द बढ़ने लगा, उन्हें तुरंत सीधे बॉम्बे ले जाया गया और मरीन लाईन्स के 'बॉम्बे अस्पताल' में दिखाया गया। कुछ ही मिनटों में श्याम (श्याम सुंदर चड्डा) की मृत्यु हो गई। जिससे पूरी फिल्मी दुनिया में सदमे की लहर फैल गई। श्याम की उम्र केवल 31 बरस थी।

 

श्याम (सुंदर चड्डा) का जन्म 20 फरवरी 1920 को सियालकोट में हुआ था। चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे श्याम। वह अपने टाइम के सबसे स्टाइलिस्ट और सुशिक्षित अभिनेता थे। उन्होंने गोर्डन कॉलेज रावलपिंडी से  स्नातक की परीक्षा पास की थी। जहाँ वे ड्रामैटिक्स सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे थे। नाटकों में उनकी परफाॅर्मेंस उत्कृष्ट होती थी। उन्हें टेनिस खेलने का जुनून था। उन्होंने ‘ताजी मुमताज कुरैशी’ से शादी की थी, उनकी एक बेटी साहिरा और एक बेटा (श्याम के मरने के दो महीने बाद) मरणोपरांत हुआ था जिसका नाम शेखर (शाकिर) था। अब वह लंदन में एक मनोचिकित्सक है। बेटी साहिरा ने राहल काज़मी से निकाह किया। उनका एक बेटा अली काज़मी एक पाक-कनैडियन अभिनेता है।

                                            


1942 से शुरु करें तो श्याम ने 25 से अधिक फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया। सब एक से बढ़ कर एक। उन्होंने अपने समय की सभी टाॅप हीरोइन यथा निगार सुल्ताना, नसीम बानू, रेहाना, नरगिस, कुलदीप कौर, मीना शौरी, मुनव्वर सुल्ताना, सुरैया और रमोला के साथ काम किया। उनकी आखिरी अधूरी फिल्म शबिस्तान (1951) को 'बॉडी-डबल' की मदद से पूरा किया गया।

 

लाहौर और रावलपिंडी के दिनों से ही श्याम के सबसे करीबी दोस्तों में अभिनेता ओम प्रकाश थे। उनकी दोस्ती का बंधन विभाजन के बाद भी जारी रहा। उन्होंने यूनियन पार्क में आमने-सामने घर खरीदे थे। अभिनेता की मृत्यु के बाद इसका नाम 'श्याम पार्क' रखा गया। अब इसका नाम चैम्बूर नाका रोड से दूर फ्रेंडशिप पार्क ('मैत्रेयी पार्क') रखा गया है। एक पतली गली यूनियन पार्क रोड इलाके को आर.के. स्टूडियो से जोड़ती है। इसी सड़क के साथ अभिनेता - निर्देशक किशोर साहू, फिल्म निर्माता रमेश सैगल, त्रिलोक कपूर, अभिनेत्री नलिनी जयवंत के घर भी थे। आगे, मोड़ के पास, अशोक कुमार रहते थे।  श्याम सुसंस्कृत, पढ़े-लिखे और अंग्रेजी-उर्दू में पारंगत और धाराप्रवाह थे। वे समाचार पत्रों में दोनों भाषाओं में नियमित साप्ताहिक कॉलम भी लिखते थे।

 

वास्तव में, श्याम की मृत्यु के बाद श्याम की पत्नी अपनी बड़ी बहन, ज़ेब कुरैशी के साथ लाहौर चली गईं, बड़ी बहन ज़ेब कुरेशी बॉम्बे में एक अभिनेत्री थी। मुमताज़ ने बाद में एक अंसारी नामक सज्जन से पुनर्विवाह किया। उनके बच्चों का पालन-पोषण मुस्लिम के रूप में किया गया।

 

प्रसिद्ध लेखक सआदत हसन मंटो के साथ श्याम की दोस्ती एक लीजेंड थी। बहुत मजबूत थी। मंटो और श्याम दो शरीर एक आत्मा की तरह थे।। अपनी पुस्तक 'स्टार्स फ्रॉम अनदर स्काई' मंटो के अनुभवों के उर्दू -'मीना बाज़ार' से अनुवादित पुस्तक है।  मंटो ने सबसे मार्मिक और दिल को छू लेने वाला चैप्टर श्याम को समर्पित किया है ।  जिसका शीर्षक था श्याम: कृष्णा की बांसुरी। मंटो तब बॉम्बे टॉकीज़ के  एक 'एम्पलाॅयी' थे, जहां श्याम को एक फिल्म का काॅन्ट्रेक्ट मिल गया था। लेकिन पैसा थोड़ा-थोड़ा और बहुत धीरे-धीरे आ रहा था। वे संघर्ष भरे दिन थे और दोनों दोस्त एक अपार्टमेंट और खर्चा साझा किया करते थे।

 

उनके संस्मरण उनके उन दिनों की छोटी छोटी घटनाओं से भरे हुए रहे जो श्याम के विशाल दिल और दोनों की गहरी दोस्ती की मिसाल थे। एक दिन जब श्याम को एक ठीक-ठाक राशि मिली और मंटो पर पैसे नहीं थे, ट्रेन में लौटते समय, श्याम ने दस-दस रुपये के नोटों की गड्डी को आधा-आधा कर दिया और अपने दोस्त से एक बंडल लेने के लिए कहा। मंटो ने एक ले लिया और स्टेशन पर उतर गया। श्याम को एक और दोस्त से मिलने जाना था, जैसे ही ट्रेन जरा दूर गई, श्याम ने कुछ पैसे लहराए और चिल्लाया,  “मैंने इस गड्डी से कुछ रुपये पहले ही निकाल लिए थे”। मंटो प्यार से उस ‘अलविदा’ को याद करता है जिसे दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से कहा था, जब मंटो कराची को रवाना हुआ था। जिस दिन मंटो को जाना था, श्याम अपने दोस्त को ‘सी- ऑफ’  करने शूटिंग से जल्दी वापस आ गया था। उसने अपने दोस्त के साथ दो पैग साझा किए, एक भी शब्द बोले बिना बस कहा “चलें”? उसने सामान पैक करने में उसकी मदद की और पूरे रास्ते एक दूसरे को चुटकुले सुनाते रहे।  जब मंटो शिप की सीटी पर जैटी में सवार हो रहा था, तो श्याम ने अपने दोस्त को हाथ हिलाया, रोया और चिल्लाया "हिपतुल्ला!" फिर पीछे देखे बिना चला गया। अगर आप सोच रहे हैं कि 'हिपतुल्ला!' क्या है?, तो यह मंटो द्वारा गढ़ा गया एक टर्म था, जो किसी क्रिकेटर के अजीब नाम से बना था। जिसे उसने एक अखबार में देखा था। मंटो ने इसे एक ‘ताज्जुब’ या ‘वाह ! वाह’ ! के  रूप में इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे यह फिल्मी हलके में  लोकप्रिय हो गया। जैसे कि कुछ ऐसा जिसे "हिप्तुलाइज़" करने की आवश्यकता है या कुछ "हिप्तुल्ला पर्याप्त" नहीं है। जब एक सभा में  अशोक कुमार ने श्याम से पूछा इसका क्या मतलब है?  तो श्याम ने इसे "मंटोवाद" (मंटोवाइज़) बताया। श्याम बहुत बुलंद शख्शियत का इंसान था। उसकी हर बात, उसकी हर हरकत, उसकी हर अदा, ऊंचे बहुत ऊंचे स्तर की होती थी। जब खूब सफल होने के बाद श्याम की स्थिति (पैसे से) ठीक ठाक हो गयी तो उसने यह सुनिश्चित किया कि सनकी और बेहद खर्चीले मंटो के पास अपने छोटे बच्चों और पत्नी की देखभाल के लिए पर्याप्त पैसा होना चाहिए। मंटो के पाकिस्तान जाने के बाद, श्याम अपने दोस्त के लिए तरसता था, और उसे पत्र लिखता था। मंटो जवाब नहीं देता था। श्याम चिंतित हो उठता और अपनी फिल्म डिस्ट्रीब्युटर्स को कहला भेजता कि श्याम की तरफ से पैसे भेज दें। श्याम के भतीजे बिमल चड्डा लिखते हैं। मंटो से कभी पूछना नहीं पड़ा, श्याम सहज रूप से अपने दोस्त की जरूरतों को जान लेता था। बिमल के अनुसार "श्याम पूरी तरह से मंटो के पाकिस्तान जाने के फैसले के खिलाफ था और उसने उसे अपना मन बदलने के लिए मनाने की हरचंद  कोशिश की, लेकिन मंटो हिला नहीं। दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे से बात तक करना बंद कर दिया था।

 

जिस तरह से 'दि टाइम्स ऑफ ने इंडिया' ने श्याम की मृत्यु पर कमेंट किया वह श्याम की महान शख्सियत  को दिखाता है। उसका मुख्य पैरा स्टार की आभा-प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ बताता है। " टाॅल, प्रभावशाली और सुंदर,  श्याम, भारत में सबसे अधिक लोकप्रिय, स्क्रीन का श्रेष्ठ सितारा, पूरे भारत में लाखों फिल्म प्रेमियों का चहेता। बॉम्बे में लाखों लोगों की भीड़ लगी हुई थी। बुधवार सुबह अपने चेम्बूर घर से काम करने के लिए हँसते हुए गया था और दोपहर तक, वह मर चुका था। (स्रोतः द टाइम्स ऑफ द टाइम्स ऑफ )

 

बिमल बताते हैं, जब श्याम एक फिल्म के प्रीमियर के लिए लाहौर गए, जिस दिन वह लैंड किये, उसी दिन उन्होंने अपने दोस्त की तलाश की। उस समय तक श्याम एक स्टार बन गया था और प्रशंसक हरदम उसका पीछा करते। वह उनसे घिरा रहता। हालांकि मंटो और श्याम मिले, और दोनों दोस्तों ने खुशी से एक-दूसरे को गले लगा लिया, लेकिन आगंतुकों की बढ़ती भीड़ और प्रशंसकों की भीड़ ने उन्हें एक-दूसरे के साथ ज्यादा समय बिताने ही नहीं दिया।

 

नंदिता दास की फिल्म 'मंटो' में मंटो की भूमिका नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने की है। श्याम की भूमिका ताहिर राज भसीन ने निभाई है ।

 

श्याम की अंतिम फिल्म शबिस्तान में श्याम की नायिका नसीम बानू थीं। 1942 से 1951 तक श्याम की फिल्मों और उनके अभिनय ने फिल्म जगत में धूम मचा दी थी। श्याम को  फिल्म जगत में आला मुकाम हासिल हुआ।

 

व्यंग्य: सत्यनिष्ठा से समृद्धि


                                                            


यह इस बरस की सतर्कता थीम है। देख रहे हो बिनोद ! कैसे शब्दों के साथ 'खेला' करते हैं। थीम के अंदर छुपा विरोधाभास और विनोदाभास आप भी देख-पढ़ और समझ पा रहे होंगे। ये किस युग की बात है जब सत्यनिष्ठा से समृद्धि आती थी। आज की तारीख में तो हरगिज़ नहीं। दिल पर हाथ रख कर बताएं क्या इसका उल्टा सच नहीं है? हम रात-दिन अपने आस-पास इसका उल्टा ही सच होता देख रहे हैं। असत्य निष्ठा से समृद्धि सुलभ है और शीघ्र है।

                       कहा बड़ों ने सन्मार्ग पर  मंज़िल मिलेगी

                       किन्तु पाया मैंने कुपथ पर लक्ष्य को समीप


अब आप अध्यात्म में मत घुस जाना कि इससे मन को शांति मिलती है। रात को नींद ठीक से आती है। मैंने देखा है वो तो बेचारा ये सोच सोच के मरा जाता है बेटी की शादी कैसे होगी? बेटे की नौकरी का क्या होगा? जो दंदी-फंदी हैं उनका कन्फ़्यूजन तो बस इतना है कि पढ़ने के लिए बालक को इंग्लेंड भेजना है या अमरीका। जबकि तथाकथित ईमानदार का रोना यह है कि आगे की पढ़ाई कैसे चलेगी? मकान कहाँ कैसे बन पायेगा ? या फिर सारी उम्र किराये के मकान में ही निकल जाएगी।


ये तथाकथित सत्यनिष्ठा वाले की लाइफ में 'वान्दे' ही 'वान्दे' होते हैं। 'लट जो संभालूँ तो घूँघट खुल जाये' टाइप।  बशीर बद्र साब ने कहा है ना :


                   ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है जमीं                                                                       

                    पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है


सत्यनिष्ठा वालों के अंतिम संस्कार के भी 'वान्दे' होते हैं। असत्यनिष्ठा वाले समृद्ध होते हैं अत: कितनी ही रकम दे कर अपने लिए पूरी की पूरी क़ब्र क्या मक़बरा बनवा सकते हैं। या फिर अपने महल के ही एक कोने में बढ़िया क़ब्र बनवा सकता है। सच तो ये है कि सत्य निष्ठा और समृद्धि परस्पर पूरक नहीं बल्कि विरोधाभाषी टर्म हैं। ये ऐसी थीम क्यों चुनी जाती है जिसे पढ़ कर बच्चा भी बता दे कि इस वाक्य में क्या गलती है। आपने शायद गांधी जी कीआत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’  नहीं पढ़ी है। चलो नहीं पढ़ी तो न सही पर आपने उनकी फोटो तो देखी है। बस समझ लो सत्य निष्ठा से आदमी को सारी उम्र एक लंगोटी में ही काटनी पड़ती है।


मैं किसी ऐसे समृद्ध व्यक्ति से मिलना चाहूँगा जो कह सके कि उसकी ये सारी समृद्धि सत्यनिष्ठा से आई है। सत्यनिष्ठा से तो आप कायदे के उपदेश भी नहीं दे सकते और ना ही एक सफल बाबा बन सकते हैं। आपने देखे हैं न आजकल के बाबा। ये पता नहीं किस युग में सत्यनिष्ठा से समृद्धि आती थी। मैं ऐसे असत्यनिष्ठ व्यक्तियों को जानता हूँ जिनकी हर महानगर में मकान-मढ़ैया  है। वो काका हाथरसी जी ने एक जगह कहा है ना:


                  क्यों काँप रहा रिश्वत लेकर    

                  पकड़ा जाये रिश्वत लेता

                  छूट जा रिश्वत दे कर


आज ऐसे इंसान को, बाबू को, अफसर को ज्यादा भाव नहीं दिया जाता जो ज्यादा सत्यनिष्ठा-सत्यनिष्ठा रटता रहता है। ऐसे बंदे को लोग संदेह से देखते हैं। या तो फौरन से पहले ट्रांसफर करवा देते हैं या फिर उसे खूब काम से लाद दिया जाता है। वह हरदम रोता ही रहता है। खुद भी तंग रहता है। बीवी बच्चों को भी परेशान रखता है। उन्हें लंबे- लंबे लैक्चर सुनाता है। वह एक गुड मैन  है। आपने ‘गुड मैन  दि लालटेन’ मुहावरा सुना है ना। तो बस जान लीजिये गुड मैन अक्सर 'गुड फॉर नथिंग' होते हैं। 

Wednesday, October 14, 2026

आलमआरा-मास्टर विट्ठल और जिन्ना

 


                                         


1913 में राजा हरिश्चन्द हिन्दुस्तान की पहली मूक फिल्म बनी। फिल्म का कोई भी प्रिंट आज उपलब्ध नहीं है। किन्तु छुटपुट चित्र (स्टिल) दिख जाते हैं। आप जानते ही हैं कि इसे बनाने में दादा साब फाल्के को कितनी मुश्किलें दरपेश आईं थीं। यहां तक कि फिल्म की नायिका की उन्होंने बहुत तलाश की मगर सफलता नहीं मिली। बदनाम गलियों की महिलाओं ने भी मना कर दिया था। अंतत: नायिका की भूमिका अन्ना सालुन्के नामक युवा पुरुष से करानी पड़ी। सालुन्के ग्रांट रोड के एक चाय के ढाबे पर 10/- रुपये मासिक के वेतन पर काम करता था। दादासाब फाल्के ने 15/- महीने पर उसे काम पर रख लिया। सालुन्के ने पाँच फिल्मों में भूमिकाएं महिला वेष में कीं। और तो और एक फिल्म ‘लंका दहन’ में तो उसने पुरुष और महिला दोनों पात्र (राम और सीता) की भूमिका निभाई। इस प्रकार यह भारतीय सिनेमा का पहला ‘डबल रोल’ था।   

 

अलाम आरा 1931 में आयी एक 'कस्टूय्म ड्रामा' थी। कामपुर के वृद्ध राजा की दो रानियाँ थीं—दिलबहार और नवबहार। एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि नवबहार राजा के उत्तराधिकारी को जन्म देगी, जिससे दोनों रानियों के बीच अनबन शुरू हो जाती है। इस भविष्यवाणी से क्रोधित होकर दिलबहार सेना प्रमुख आदिल को अपने प्रेमपाश में फंसाना चाहती है, लेकिन आदिल उसके प्रस्ताव को ठुकरा देता है। इससे नाराज़ होकर दिलबहार आदिल को कालकोठरी में कैद करवा देती है और उसकी छोटी बेटी 'आलम आरा' को राज्य से निर्वासित कर देती है। आलम आरा का पालन-पोषण बंजारों के बीच होता है। बड़ी होने पर वह वापस महल लौटती है और राजा के राजकुमार से उसे प्रेम हो जाता है। कहानी के अंत में बंजारों के सहयोग से महल की साजिशें और दिलबहार के षड्यंत्रों का पर्दाफाश होता है। आदिल को जेल से रिहा किया जाता है, दिलबहार को उसके किए की सजा मिलती है, और राजकुमार का विवाह आलम आरा से हो जाता है । जो एक हार के चारों ओर घूमता था। कहानी और संवाद जोसेफ डेविड की थे, जो उस समय के लोकप्रिय नाटककार थे, भाषा में उर्दू की बहुलता थी और पारसी नाटकीय शैली थी जिसमें आग़ा हश्र ने अपनाया और बढ़ाया था। फिल्म का निर्देशन अर्देशिर ईरानी ने किया था। आदिल ईरानी फोटोग्राफर थे। कलाकारों में मास्टर विट्ठल (नायक), जुबैदा, जिल्लो बाई, पृथ्वीराज कपूर, डब्ल्यू.एम. खान, इशरत सुल्ताना (बिब्बो) और जगदीश सेठी शामिल थे। जुबेदा की शादी हैदराबाद के महाराज नरसिंगीर धनराजगीर ज्ञान बहादुर से हुई थी। उनका एक बेटा था जिसका नाम हुमायूं धनराजगीर था। उन्होंने 1930 के दशक के अंत में फिल्मों से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। उनकी आखिरी फिल्म 'निर्दोष अबला' थी, जो 1949 में आई थी। उनकी फिल्मोग्राफी के हिसाब से उन्होने 66 से अधिक फिल्मों में काम किया। यहाँ ये उल्लेखनीय है कि ज़ुबेदा नवाब सिदी इब्राहिम और फातिमा बेगम की संतान थी। फातिमा बेगम खुद फिल्म निर्देशक, प्रोड्यूसर और स्क्रीन प्ले राइटर थी।

                                         


मास्टर विट्ठल (1906-1969) इन सभी में सबसे महंगे नायक थे। उनकी पगार एक हजार रुपये प्रति माह थी। आलम आरा  14 मार्च 1931 को बॉम्बे में रिलीज़ की गयी थी।  मैजेस्टिक थिएटर में भीड़ और भीड़ का जोश देखने लायक था। फिल्म की पब्लिसिटी भी अद्भुत ढंग से की गई थी। मूक फिल्मों से तुलना करते हुए लिखा गया था कि 'तस्वीर बोल उठीं हैं'। 'पात्र जिन्दा हो गये हैं' आदि।  शो दोपहर 3 बजे का था लेकिन सुबह से ही भीड़ जमा हो गई थी। भीड़ को रोकने के लिए पुलिस को बुलाना पड़ा। टिकट 50 रुपये के प्रीमियम पर ब्लैक में बेची जा रही थी। अर्देशिर ईरानी ने शो शुरू होने से पहले एक छोटा सा भाषण भी दिया। इस फिल्म में 12 गाने थे, विशेष रूप से दो गाने एकदम हिट हो गये। " बदला दिलवायेगा या रब तू सितमगरों से..." ज़ुबैदा (नायिका) पर फिल्माया और उन्हीं के द्वारा गाया "दे दे खुदा के नाम पर प्यारे , ताकत है अगर देने की"। यूं कहने को अलामारा की 14 मार्च 1931को रिलीज़ से पहले पहला गीत कलकत्ता के मदन थिएटर का था, जिसे 4 फरवरी 1931 को बॉम्बे के एम्पायर थिएटर में प्रदर्शित किया गया था। इस गीत को मुन्नी बाई ने गाया था। "अपने मौला की मैं जोगन बनूँगी"

1931 की अलामारा ने अन्य फिल्म निर्माताओं को इतना प्रेरित किया कि एक और अलामारा 1956 में बनायी गयी थी। तीसरी आलमआरा  1973 में बनाई गई।  दोनों (1956, 1973) का निर्देशन नानूभाई वकील ने किया था। आश्चर्यजनक रूप से, 1931 के आलमारा के अभिनेता  वजीर मोहम्मद खान ने 1956 आलमारा और 1973 आलमारा में भी अपनी भूमिकाएं दोहराई। आलमारा 1931 में पृथ्वीराज कपूर, इशरत सुल्ताना (बिब्बो), सोहराब मोदी, जगदीश सेठी, मास्टर विट्ठल और जुबैदा ने अभिनय किया था। 29 वर्षीय वजीर मोहम्मद खान  ने वृद्ध फकीर की भूमिका निभाई थी। अपना गीत "दे दे खुदा के नाम पे प्यारे ताकत है कुछ देने की" गाया था।

आलमआरा 1956, में चित्रा, दलजीत और डब्ल्यू.एम. खान (फकीर) थे।

आलमआरा 1973 में नाजिमा, अजीत, जयराज और डब्ल्यू.एम. खान ने अभिनय किया।

आलमआरा ने ऐसा तूफानी ट्रैंड चलाया कि 1931 में ही 28 टॉकी फिल्में बनीं/रिलीज़ हुईं। जैसे शकुंतला, दौलत का नशा, गृह लक्ष्मी। इनमें हिंदी फिल्में (23) बांग्ला (3) तमिल (1) तेलुगू (1) थी।

1932 में बोलती फिल्मों का प्रोडक्शन लगभग दोगुना हो गया।  

पहली बोलती फिल्म के नायक थे मास्टर विट्ठल, जिन्होंने अपनी शुरुआत  एक बाल कलाकार के रूप में की थी। बाद में बाबूराव पेंटर की मदद से उनको मूक फिल्में एक के बाद एक मिलतीं गईं। वे अपने वक़्त के खूब पाॅपुलर नायक थे। वे बाद में विजय और शंकर भट्ट भाईयों और शांति लाल दवे के स्टूडियो शारदा स्टुडियो में शामिल हो गये थे। उन्होंने सुवर्ण कमल 1926, हीरा सुंदरी 1928 चिराग-ए-कोहिस्तान 1929।  मास्टर विट्ठल कसरती बदन के पहलवान टाइप व्यक्ति थे। फिल्मों में स्टंट भूमिकाएं भी उन्होंने निभाईं। जब पता चला अर्देशर ईरानी अपनी बोलती फिल्म के लिये नायक की तलाश में हैं तो सभी (प्रमुख प्रतिस्पर्धी थे महबूब खान) इस ऐतहासिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना चाहते थे। जब वे सागर मूवी टोन (अर्देशर ईरानी) के  आलम आरा 1931 प्रोजेक्ट का हिस्सा बने तो  शारदा स्टूडियो (जिसके अनुबंध में वे थे) ने उनके खिलाफ मुकदमा कर दिया।  उनके मामले का बचाव किसी और ने नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना ने किया था। मास्टर विट्ठल ने केस जीत लिया । लेकिन जल्द ही उनको अपनी गलती का एहसास हो गया। उनकी जो भी ख्याति, महिमा और स्टारडम था वह मूक फिल्मों का था। यहां उन्हें न केवल डाॅयलाॅग बोलने थे बल्कि गीत भी गाने थे। उनका उच्चारण मराठी बहुल था। गीत गाने के लिये सर्वथा अयोग्य साबित हुए। दरअसल उनकी स्टंटमैन की छवि मूक फिल्मों की देन थी। कुछ और फिल्मों के बाद उन्होंने फिर मराठी फिल्मों का रुख कर लिया। आलमआरा में भी उनकी खराब हिन्दी और खराब डाॅयलाॅग डिलीवरी के कारण पूरी फिल्म में जादू के असर से उन्हें बेहोशी, अर्ध चेतन/ट्रान्स की हालत में दिखाया गया था। यूं उन की तुलना हाॅलीवुड के अभिनेता डगलस फेयरबैंक्स से की जाती थी।

                                       


मास्टर विट्ठल 1924 से मूक/ मराठी सिनेमा में सक्रिय रहे थे। रतन मंजरी (1926) में मुख्य भूमिका निभाने से पहले एक फिल्म तकनीशियन और नर्तक के रूप में भी उन्होंने काम किया था। मूक स्टंट फिल्मों में शानदार भूमिकाएं की थीं जिसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया था। जब 1956 में बाॅम्बे में भारतीय सिनेमा की सिल्वर जुबिली (25 बरस) मनाई गई तब वे और उनकी नायिका ज़ुबेदा विशेष अतिथि थे। उसके बाद 1966 में अपनी अंतिम फिल्म तक उन्होंने हिन्दी फिल्मों की तरफ पलट कर नहीं देखा।

                                  


1924 से 1966 तक के अपने 42 साल के करियर के दौरान वे 90 से अधिक फिल्मों में दिखाई दिए, दो फिल्मों का निर्देशन भी किया, और एक फिल्म के लिए संगीत की रचना भी की। हिन्दी फिल्मों की बात करें तो मास्टर विट्ठल, 1944 की ब्लॉकबस्टर फिल्म रामशास्त्री में एक साइड रोल में नज़र आये थे। उनकी आखिरी मराठी फिल्म 1966 में थी।

Tuesday, October 13, 2026

पृथ्वीराज कपूर -फिल्मों की फर्स्ट फैमिली के पितामह

 

                                   



यदि आप पृथ्वीराज कपूर को गूगल पर सर्च करें तो सर्च इंजन आपको लाखों एन्ट्रीज़ दिखाता है। यही वो बात है, जिनसे लीजेंड बनते हैं। वास्तव में पृथ्वीराज कपूर अपने जीवनकाल में ही अपनी फिल्मोग्राफी, अपने सद् व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व और गर्मजोशी से एक लीजेंड बन गये थे और सदैव बने रहेंगे।


उनका जन्म 3 नवंबर, 1906 को समुंद्री लायलपुर, फैसलाबाद में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में स्थित है। उनका जन्म का नाम पृथ्वीनाथ था। उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर इंपीरियल इंडियन पुलिस में पुलिस ऑफीसर थे। पृथ्वी राज कपूर अपने दादा दीवान केशवमल से बहुत जुड़े हुए थे। पुलिस में रहते हुए, उनके पिता पेशावर में तैनात थे। पृथ्वीराज कपूर की शिक्षा पेशावर के प्रसिद्ध एडवर्ड कॉलेज में हुई थी। उन्होंने न केवल बी.ए. पास किया, बल्कि कानून की शिक्षा भी प्राप्त की। एक रिकाॅर्ड जो कपूर वंश में कोई अन्य मैच नहीं कर पाया। पृथ्वीराज कपूर के अभिनय कौशल को चमकाने का श्रेय कॉलेज फैकल्टी प्रोफेसर जय दयाल जी को जाता है। उन दिनों के चलन के अनुसार पृथ्वीराज कपूर की 18 वर्ष की उम्र में 15 वर्षीय रामसरनी राम मेहरा से शादी हो गई।

अपनी चाची से पैसे उधार ले कर पृथ्वीराज कपूर ने 1928 में बॉम्बे का रुख किया। 1929 में अपनी तीसरी ही फिल्म-‘सिनेमा गर्ल’ में वे मुख्य भूमिका (लीड रोल) में थे। कुल मिलाकर, उन्होंने 9 मूक फिल्मों में अभिनय किया। कम लोग जानते होंगे उन्होंने ‘आलम आरा’ में अभिनय किया था जो 1931 में भारत की पहली टॉकी फिल्म थी। ‘विद्यापति’-1937 में उनके अभिनय की बहुत सराहना की गई। उनके शानदार अभिनय वाली फिल्म थी सोहराब मोदी की ‘सिकंदर’ – 1941 में अलेक्जेंडर द ग्रेट के रूप में थी। बहुत कम लोगों को पता होगा कि उन्होंने 1971 में एक कन्नड़ फिल्म ‘सक्षतकारा’ में भी अभिनय किया था। उनकी विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण है फिल्म सिकंदर में जहां पृथ्वीराज जी ने 1941 में सिकंदर की भूमिका की (सोहराब मोदी पोरस बने थे) तो ‘सिकंदर-ए-आज़म’ 1965 में पोरस की भूमिका अदा की। (दारा सिंह ने सिकंदर का करैक्टर किया)

पृथ्वीराज कपूर के पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर ने भी ‘अवारा’ में एक छोटा रोल (कैमियो) किया था। पृथ्वीराज अंग्रेजी थिएटर कंपनी ‘जे. ग्रांट एंडरसन’ में शामिल हो गए थे। बाद में, उन्होंने 1944 में पृथ्वी थिएटर की मुम्बई में स्थापना की। हिंदुस्तान में आधुनिक शहरी प्रोफेशनल रंगमंच की अवधारणा को लाने, स्थापित करने और उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे। अब तक, रंगमंच अनिवार्य रूप से या तो ग्रामीण लोक कला या पारसी रंगमंचीय मानस का हिस्सा था। 16 वर्ष की अल्प अवधि में, पृथ्वी राज कपूर ने पृथ्वी थिएटर ने शहर शहर घूम कर 112 नगरों में 2662 शो किए। इसमें उन्हें 5982 दिन लगे। और, हाँ, पृथ्वी राज कपूर ने इन सभी नाटकों में मुख्य अभिनेता की भूमिका अदा की थी। उनके प्रमुख नाटक रहे शकुंतला, पठान, दीवार, गद्दार, पैसा, आहुति, कलाकार, एवं किसान। उनके ट्रूप में 150 सदस्य थे। मुख्य थे वे खुद, उनका परिवार, उज़रा मुमताज़, जोहरा सहगल, प्रेमनाथ, राजेन्द्र नाथ, सज्जन, एल. वी. प्रसाद, मोहन सैगल। बलराज साहनी, ख्वाजा अहमद अब्बास, रामानन्द सागर, राम गांगुली, प्रयाग राज, शंकर-जयकिशन।

सन् 1954 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किया गया था। भारत सरकार ने उन्हें 1969 में पद्म भूषण प्रदान किया था। उन्हें 1971 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अगर किसी से पूछा जाए कि डॉ. जाकिर हुसैन और पृथ्वीराज कपूर के बीच क्या काॅमन है, तो तुरंत जवाब नहीं सूझेगा। सच यह है कि दोनों आजाद भारत की पहली राज्यसभा के सदस्य थे। 1995 में भारत सरकार ने पृथ्वी थिएटर के 50 वर्षों की याद में पृथ्वीराज कपूर के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। और हाँ ! डाक टिकट पर उनका चित्र दिया गया है। कोई नाम नहीं है। कौन है, जो फिल्म उद्योग के इस दिग्गज को पहचान नहीं सकता।

कुल मिलाकर, उन्होंने बेजोड़ समर्पण भाव के साथ नाटकों और 100 से अधिक फिल्मों में काम किया। तब की सभी टाॅप हीरोइन के साथ काम किया यथा नसीम बानो, दुर्गा खोटे, एर्मालीन, वनमाला, ज़ुबेदा, जिल्लो, हुस्न बानो, इंदिरा देवी आदि। 29 मई, 1972 को कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के 15 दिन के अंदर उनकी पत्नी की 14 जून, 1972 को मृत्यु हो गई।

अभिनेता आयेंगे। अभिनेता जायेंगे लेकिन लीजेंड हमेशा के लिए होते हैं और कपूर खानदान आने वाली कई-कई शताब्दियों तक सेल्युलॉइड के माध्यम से ‘मासज़’ और ‘क्लासज़’ दोनों को अपनी विलक्षण अभिनय प्रतिभा से पीढ़ी दर पीढ़ी मंत्रमुग्ध करते रहेंगे।

शर्मिला टैगोर- एक एवरग्रीन स्टार आर्टिस्ट

                                     



शर्मिला टैगोर जी का जन्म 8 दिसंबर 1944 को कानपुर में हुआ था, उनके पिता का नाम गीतिंद्रनाथ टैगोर और मां इरा बरुआ टैगोर थीं। उनके पिता एक ब्रिटिश इंडिया काॅर्पोरेशन (टैक्सटाइल) कंपनी में महाप्रबंधक (जी.एम.) थे।

2. उनके पिता गीतिंन्द्रनाथ टैगोर गगनेंद्रनाथ टैगोर के पोते थे, जिनके पिता गुनेन्द्रनाथ टैगोर नोबल पुरस्कार विजेता टैगोर के (कजन) चचेरे भाई थे।

3. शर्मिला टैगोर की नानी लतिका बरुआ टैगोर नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के भाई द्विजेंद्रंनाथ टैगोर की पोती थीं। शर्मिला के नाना ज्ञानदाभिराम बरुआ, अर्ल लॉ कॉलेज (अब गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, गुवाहाटी ) के पहले प्रिंसिपल रहे थे।

4. शर्मिला टैगोर तीन बहनें थीं। सबसे बड़ी शर्मिला (रिंकू) दो छोटी बहनें, स्वर्गीय ऑइंद्रिला कुंडू (टिंकू) और रोमिला सेन (चिंकी)। ओइंद्रिला फिल्म में अभिनय करने वाली परिवार में पहली थीं। उन्होंने एकमात्र भूमिका निभाई वह थी फिल्म ‘काबुलीवाला’ 1957 में ‘मिनी’ की भूमिका थी। यह तपन सिन्हा की काबुलीवाला में बाल-भूमिका थी, जो कथानक का केंद्रीय चरित्र है।

5. ऑइंद्रिला (टिंकू) एक अंतरराष्ट्रीय ब्रिज खिलाड़ी थीं। उनका विवाह दिलीप कुंडू से हुआ था। नवंबर 1991 में टिंकू की 40 साल की अल्प आयु में मृत्यु हो गई। उनकी एक बेटी मृणालिनी (मिनी) और एक बेटा मिकी है।

6. दूसरी बहन, रोमिला सेन, (चिंकी) बैंगलोर में बस गई हैं, उनके पति स्वर्गीय निखिल सेन थे, जो एक कॉर्पोरेट हैड थे। वे कई वर्षों तक ‘ब्रिटानिया’ के हैड के रूप में कार्य किया और बाद में ‘यूनिबिक फूड्स’ की स्थापना की। वह सुपर मॉडल नंदिनी सेन के भाई थे। निखिल सेन का फरवरी 2019 में निधन हो गया। चिंकी ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ से जुड़ी हुई हैं।

7. शर्मिला ने सेंट जॉन्स डायाॅसेसन गर्ल्स हायर सेकेंड्री स्कूल और लाॅरेटो कॉन्वेंट, आसनसोल में पढ़ाई की। उन्होंने अपनी फिल्मी कैरियर की शुरुआत तब की जब वे मात्र 13 वर्ष की स्कूली छात्रा थीं।

8. शर्मिला टैगोर ने माणिक दा (सत्यजीत रे) की 1959 की बांग्ला फिल्म ‘अपूर संसार’ में एक अभिनेत्री के रूप में अपना कैरियर शुरू किया।

9. जब वे ‘एन ईवनिंग इन पेरिस’ 1967 की पेरिस में शूटिंग कर रहीं थीं तब नवाब पटौदी उनसे मिलने गये ओर उन्होंने लंदन में अपनी माता जी साजिदा सुल्तान से मिलवाया। उनकी वुड बी मदर-इन-लाॅ ने इस्लाम अपनाने की शर्त रखी। शर्मिला टैगोर ने शर्त मान ली और अपनी शर्त रख दी कि वे फिल्मों में काम करना जारी रखेंगी। उन्होंने 27 दिसंबर 1968 को पटौदी के नवाब मंसूर अली खान से शादी की। निक़ाह के लिए बेगम आयशा सुल्ताना नाम अपनाया गया। नवाब पटौदी की 22 सितंबर 2011 को मृत्यु हो गई। उन्हें उनके पटौदी स्थित महल के प्रांगण में दफनाया गया।

10. शर्मिला टैगोर आजकल दिल्ली में रहतीं हैं। उनके एक बेटा और दो बेटियां हैं। सैफ (1970) एक अभिनेता हैं, सबा खान (1976) आभूषण डिजाइनर हैं। और सोहा खान (1978) एक अभिनेत्री और टी.वी. होस्ट हैं। सोहा खान ने एक्टर कुणाल खेमू से विवाह किया है। सैफ ने रुखसाना सुल्ताना की बेटी अमृता सिंह से विवाह किया था। अमृता के पिता शिवेंद्र सिंह वर्क विख्यात लेखक खुशवंत सिंह के परिवार से थे। सैफ ने पुन: विवाह लोकप्रिय अभिनेत्री करीना कपूर से किया।

11. शर्मिला टैगोर की फिल्मोग्राफी से पता चलता है कि उन्होंने अब तक 100 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया है। इसमें बांग्ला, हिंदी की फिल्में शामिल हैं।

12. हिंदी फिल्म जगत में शर्मिला टैगोर ने शक्ति सामंत की ‘कश्मीर की कली’ 1964 से किया। उनकी लेटेस्ट 2025 की फिल्म ‘पुरावतन’ है। ‘कश्मीर की कली’ में उनके नायक थे शम्मी कपूर। जो नई-नई नायिकाओं को लांच करने के लिए जाने जाते रहे हैं।

13. शर्मिला टैगोर बहुमुखी प्रतिभाशाली अभिनेत्री रही हैं। उनका अभिनय एकदम जीवंत और ‘कन्विंसिंग’ रहता है। उन्होंने सदैव अपनी भूमिका के साथ न्याय किया। उन्होंने अतने दौर के सभी टाॅप कलाकारों के साथ काम किया जैसे धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, शम्मी कपूर, शशि कपूर, उत्तम कुमार, संजीव कुमार, जाॅय मुखर्जी, देव आनंद, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, राजेंद्र कुमार, सौमित्र चटर्जी, सुनील दत्त, मार्क जुबेर के साथ कीं। उन्होंने एक से बढ़ कर एक हिट फिल्म दी।

14. उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार 1969 की फिल्म ‘आराधना’ के लिए मिला।

15. अक्टूबर 2004 से मार्च 2011 तक वे केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष रहीं।

16. दिसंबर 2005 में वे यूनिसेफ की ‘गुडविल एम्बेसडर’ नामित हुईं।

17. 2013 में शर्मिला टैगोर को पद्म भूषण से नवाजा गया।

18. फिल्म ‘मौसम’ 1975 के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।

19. फिल्म ‘अबर अरेण्य’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार 2003 में मिला।
20. फिल्मफेयर का ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’

21. इंटरनेशनल कान फिल्म महोत्सव 2009 में वे जूरी सदस्य रहीं।

22. इंटरनेशनल मैक्स (सौंदर्य प्रसाधन) के निदेशक मंडल में निदेशक।

23. न्यूयॉर्क में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार 2025 (‘पुरावतन’ के लिए)

24. बाॅलीवुड ‘वाॅक ऑफ दि स्टार्स’ बैंडस्टेंड, बांद्रा, में भारत के विख्यात कलाकारों में उनको शामिल किया गया है। उनकी हथेली के निशान, नाम और सिगनेचर उकेरे गये हैं।

25. शर्मिला टैगोर ने बांग्ला की 25 फिल्में, 2 मराठी की, एक-एक मलयालम और अंग्रेजी की फिल्में की हैं। उनकी फिल्मों की संख्या 100 से ऊपर है।
                                                                   


उनके अभिनय के लोग कायल हैं। वे प्रतिभाशाली, खुशमिजाज के व्यक्तित्व की मालकिन हैं। उनके आज भी करोड़ों फैन हैं। यह आश्चर्य की बात है कि अभी तक उन्हें न तो दादा साहब फाल्के सम्मान मिला है न ही संसद की सदस्यता और न ही पद्म विभूषण। शर्मिला टैगोर एक बेहतरीन कलाकार हैं। वे एक ऑल टाइम स्टाइलिश फिल्म स्टार ही नहीं एक नफीस फिल्म आर्टिस्ट भी हैं। अपने कैरियर और ज़िन्दगी की इस स्टेज पर उन्हें दिया गया कोई भी एवार्ड, कोई भी सम्मान उनसे कहीं ज्यादा खुद उस ‘एवार्ड’ का सम्मान होगा। 

तुझे बिब्बो कहूँ या सुलोचना ...

 

                             



बिब्बो का असली नाम फरहत जहां था और स्क्रीन नाम इशरत सुल्ताना था। इशरताबाद, चावड़ी बाज़ार, दिल्ली में 1906 में दुनिया में उनका आगमन हुआ। इनकी माँ का नाम हफीज़न बेगम (बाई) था। हफीज़न बाई अपने समय की मशहूर गायिका थीं। बिब्बो ने भी इस क्षेत्र में ट्रेनिंग पाई और गायन, नृत्य और संगीत में पारंगता हासिल की। वे बला की खूबसूरत थीं। जल्द ही उनको फिल्मों में ब्रेक मिला। इसकी शुरुआत हुई जब हिंदुस्थान की पहली बोलती फिल्म अर्देशर ईरानी के निर्देशन में ‘आलम आरा’ बनी उसमें यद्यपि मास्टर विट्ठल नायक और जुबेदा नायिका थीं। पृथ्वीराज कपूर और बिब्बो को भी इस फिल्म में अवसर मिला। अतः कहा जा सकता है कि न केवल पृथ्वीराज कपूर बल्कि बिब्बो भी ‘आलम आरा’ की प्रतिभागी बनी। 1931 से 1947 तक बिब्बो ने एक से बढ़ कर एक फिल्म में अपना जलवा बिखेरा और 1947 के बाद पाकिस्तान जाने पर वहां भी उन्होने 50 से अधिक फिल्मों में काम किया।

                                                      


1933 में अजंता सिने टोन के झंडे तले बतौर लीड रोल से अपना केैरियर शुरू करने वाली बिब्बो ने उस दौर के बड़े से बड़े डाइरेक्टर्स के साथ काम किया मसलन महबूब खान, मोहन भवनानी, शांति दवे, ए.पी. कपूर। जल्दी ही बिब्बो दिग्गज नायिकाओं की प्रथम पंक्ति में देविका रानी, दुर्गा खोटे, सुलोचना, मेहताब शांता आप्टे, नसीम बानू, सबीता देवी और लीला देसाई के साथ खड़ी नज़र आती हैं। बिब्बो पहली नायिका थीं जिनके नाम को शुमार कर के रफी कश्मीरी ने सगीर आसिफ के संगीत में फिल्म ‘गरीब के लाल’ 1939 में मिर्ज़ा मुशर्रफ और कमला कर्नाटकी से गीत गवाया था: “तुझे बिब्बो कहूं या सुलोचना…” सुलोचना एक यहूदी नायिका थीं, जिनका असली नाम रूबी मेयर्स था। सोचिए दस साल से भी कम समय में बिब्बो ने ऐसी धूम मचा दी, तब जबकि न इंटरनेट था, न पब्लिसिटी के आज जैसे माध्यम।
 
                                                                 


बिब्बो को पहली बोलती फिल्म में काम करने का एजाज ही नहीं हासिल, बल्कि वह हिंदुस्तान की पहली फिल्म संगीतकार भी बनीं। उन्हें यह क्रेडिट नर्गिस जी की माताजी जद्दन बाई से पहले हासिल हुआ। जद्दन बाई दूसरी महिला फिल्म संगीतकार बनीं। बिब्बो ने 1934 की फिल्म ‘अदल-ए-जहांगीर’ के लिए संगीत दिया था। जबकि जद्दन बाई की संगीत दी हुई फिल्म ‘तलाश-ए-हक़’ 1935 में आई। यही वह फिल्म थी, जिसमें नर्गिस ने बेबी फातिमा के नाम से बाल-कलाकार के रूप में काम किया था। फातिमा उनका असली नाम था। ‘मायाजाल’ 1933 में बिब्बो नायिका थीं। ‘कज्जाक की लड़की’ 1936 में भी बिब्बो ने लीड रोल किया था और म्यूजिक भी दिया था। फिल्म ‘रंगीला राजपूत’ (1933) इससे उनकी प्रतिभा का अंदाज़ लगाया जा सकता है। उन्होने अपने वक़्त के दिग्गज कद्दावर अभिनेताओं के साथ काम किया यथा मास्टर निसार, सुरेंदर, एम. कुमार, मोतीलाल आदि। सुरेंदर और बिब्बो की जोड़ी ने कई सफल हिट फिल्में दीं : मनमोहन (1936), जागीरदार (1937) ग्रामोफोन सिंगर, डायनामाइट (1938) और लेडीज ओनली (1939) तब के वक़्त में बिब्बो का नाम कभी मास्टर निसार के साथ जोड़ा जाता कभी सुरेंदर के साथ। 1930 के अंत तक आते-आते बिब्बो ने अपनी फिल्म ‘अदल-ए-जहांगीर’ के निर्देशक खलील सरदार से निक़ाह कर लिया था। दोनों ने मिल कर लाहौर में 1937 में जब ‘कज्जाक की लड़की’ बनाई और रिलीज की। वह फिल्म फ्लॉप हो गयी। इस के बाद बिब्बो वापिस हिंदुस्तान लौट आयीं और खलील सरदार से तलाक हो गया। खलील सरदार वहीं लाहौर में ही रह गए।


बिब्बो के शौक निराले थे। उनकी समकालीन अभिनेत्रियां उनसे ईर्ष्या रखती थीं। बिब्बो का बिंदास रवैया, लाइफ स्टाइल सभी के लिए रश्क का बायस था। वे बिब्बो को लालची कहतीं। कारण कि जब अपने मियां खलील सरदार के निर्देशन में बनी फिल्म ‘कज्जाक की लड़की’ नहीं चली तो न केवल उन्होंने लाहौर छोड़ दिया बल्कि खाविन्द को भी छोड़ दिया था। बिब्बो घोड़ों की रेस में खूब जानकारी और रुचि रखती थीं। उन्हें रुमाल संग्रह करने की हॉबी थी। शानो-शौकत का आलम ये था कि वे अपने कपड़ों और जूतों तक में हीरे-मोती टाँकती थी।


बिब्बो जी का जूनागढ़ राजघराने में आना-जाना था। ऐसा कहा जाता है कि बिब्बो ने जूनागढ़ प्रिंसली स्टेट के प्राइम मिनिस्टर सर शाहनवाज़ भुट्टो (ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) से निक़ाह कर लिया था। हालांकि सर शाहनवाज़ भुट्टो पहले से ही एक हिंदू महिला लखी बाई (इस्लाम अपनाने के बाद खुर्शीद बेगम) से विवाहित थे। दूसरा, यह भी कहा जाता है कि बिब्बो का निक़ाह सर शाहनवाज भुट्टो नहीं, इमदाद अली भुट्टो के साथ हुआ था। वे ज़ुल्फिकार भुट्टो के बड़े भाई थे। बहरहाल यह सर्वविदित था कि बिब्बो ने ‘भुट्टो’ से निकाह किया हुआ था। सन् 1947 में भारत के विभाजन के वक़्त सर शाहनवाज़ भुट्टो और उनका परिवार ही नहीं बल्कि बिब्बो भी पाकिस्तान चली गईं, वहां उन्होने लगभग 50 फिल्मों में काम किया ज़्यादातर चरित्र रोल किए। ऐसा कहा जाता है कि जब सर शाहनवाज भुट्टो बीमार पड़े तब बिब्बो उनसे मिलने उन्हें देखने रिक्शे से आया-जाया करती थीं। 19 नवंबर 1957 को शाहनवाज भुट्टो का इंतकाल हो गया।
पाकिस्तान का प्रतिष्ठित फिल्म जगत का सर्वोच्च एवार्ड ‘निगार एवार्ड’ 1958 में बिब्बो को मिला अपनी फिल्म ‘ज़हर-ए-इश्क़’ के लिए (इसकी तुलना हाॅलीवुड के एकेडमी एवार्ड अथवा हिंदुस्खान के दादा साब फाल्के एवार्ड से की जाती है) प्रसंगवश ज्ञात रहे कि यह पुरस्कार 1957 से ही आरम्भ हुआ था और अगले बरस ही बिब्बो ने अपनी प्रतिभा से यह पुरस्कार प्राप्त किया। बिब्बो की फिल्मोग्राफी के अनुसार 1931 से 1947 तक 40 फिल्में हिंदुस्थान में और 1950 से 50 फिल्में पाकिस्तान में कीं। सन् 1972 में 25 मई को बिब्बो का टी.बी. से निधन हो गया।