Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Wednesday, July 15, 2026

विधायक फ़रोश

 


 (वरिष्ठ विद्वान एवं कवि श्रेष्ठ दद्दा भवानी प्रसाद मिश्र जी से क्षमा सहित) 


जी हाँ हुज़ूर मैं विधायक बेचता हूँ

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ

मैं किसिम-किसिम के विधायक बेचता हूँ

जी, माल देखिये, दाम बताऊंगा,

बेकाम नहीं हैं काम बताऊंगा

कुछ विधायक लिए हैं मस्ती में मैंने

कुछ विधायक लिए हैं बस्ती मे मैंने 

कुछ टेक्स डिफ़ाल्टर विधायक हैं मेरे पास

कुछ विधायक डिस्प्रोपेशनेट असेट वाले हैं

यह विधायक हेल्थ ग्राउंड पर आता-जाता है

यह विधायक खोखे देख खिंचा जाता है 

जी, शुरू में जरूर शर्म लगी मुझको;

पर बाद-बाद में अक़्ल जगी मुझको,

जी, लोगों ने तो बेच दिए ईमान,

जी, आप न हों सुनकर ज़्यादा हैरान—

मैं सोच समझ कर आख़िर

विधायक बेचता हूँ,

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक  बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

यह विधायक देशभक्ति के गीत सा है गाकर देखें,

यह विधायक गंदी गाली सा है गरिया कर देखें

यह विधायक वहाँ  ई डी की रिपोर्ट में लिक्खा था,

यह विधायक सी बी आई की फाइल में  रक्खा था,

यह विधायक पहाड़ी को रात-रात में समतल कराता है,

यह विधायक विकास के नाम पर बस पेड़ कटवाता है!

यह विधायक भूखा-प्यासा आमरण अनशन कराता है

जी, यह गाँव-गाँव जाकर  हिन्दू-मुसलमान कराता है,

यह विधायक रिज़ॉर्ट में ही सरकार बनवा देता है हुज़ुर,

यह विधायक दो दिन में बहुमत मुहैया कराता है हुज़ूर,

जी, और विधायक भी हैं दिखलाता हूँ,

जी, परेड कराना चाहें आप तो नचवाता हूँ।

जी, कुर्ते-पाजामे वाले पसंद करें,

ये बंडी-धोती विधायक मंत्रिपद पर तुरंत मरें!

ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,

मैं ले आता हूँ सफारी सूट वाले विधायक

इनमें से भाए नहीं ? नए पेश कर दूँ

जी नई उम्र के नहीं तो क़ब्र में पाँव वाले भी हैं

मैं नए, पुराने सभी तरह के

विधायक बेचता हूँ,

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

ये विधायक बस नाम का ज़िंदा है इसे रखूँ ?

आपके ऑर्डर में कितने विधायक लिखूँ ?

यह विधायक रा सिल्क वाला, यह खादी का है

यह विधायक पित्त का तो ये वाला बादी का है

कुछ और विधायक डिज़ाइन-टू-ऑर्डर भी हैं

यह लीजिये  चलती चीज़ एक्स फ़िल्मी,

यह सोच-सोच कर मर जाने वाला विधायक ,

यह एक दल से दूजे दल जानेवाला विधायक !

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात,

मैं बेचता-खरीदता ही तो रहता दूँ दिन-रात,

 तरह-तरह के हैं स्टॉक में विधायक

गोदाम से और मँगवाता हूँ विधायक 

जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं विधायक!

जी बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ,

गाहक की मर्ज़ी, अच्छा जाता हूँ;

या भीतर जाकर पूछ आइए आप,

है विधायक बेचना वैसे बिल्कुल पाप,

क्या करूँ मगर लाचार

जब वो खुद ही हैं बिकने को तैयार

हार कर विधायक बेचता हूँ!

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

व्यंग्य : एक आँख से अंधाधुंध

  

      किसी भी प्रदेश का नाम बिगाड़ना नहीं चाहिए। उत्तर प्रदेश का नाम अंग्रेजों के टाइम में यूनाइटेड प्राॅविन्स था। बाद में हमारी अपनी भारत सरकार ने इसका नाम उत्तर प्रदेश कर दिया। उत्तर में है तो उत्तर प्रदेश। जनसंख्या तो तब भी सार्वाधिक रही होगी। अतः उत्तर प्रदेश वालों को भी पता रहा होगा प्रश्न चाहे कोई हो उत्तर हमारे ही पास है। कितने ही प्राइम मिनिस्टर, शायर, कवि, ताज महल। बड़े-बड़े पागलखाने उत्तर प्रदेश की ही देन है। कहते हैं कि अगर आप प्यार में सफल हो जाते हैं तो आपके लिए ताजमहल है और अगर असफल हो जाते हैं तो घबराएँ नहीं आपके लिए पागलखाना आगरा में ही खिदमत में हाजिर है। यू.पी. को यूं कहने वाले उल्टा प्रदेश भी कहते हैं। लेटेस्ट टीचर्स के लिए एक पात्रता परीक्षा 2026 का आयोजन किया गया। इस प्रश्नपत्र में एक प्रश्न था 'एक आँख से देखना' का अर्थ क्या होता है। इसके लिए मल्टीपल उत्तर दिये गए थे यथा सभी को एक समान दृष्टि से देखना/व्यवहार करना। दूसरा विकल्प था अंधाधुंध करना आदि आदि। अब अभी तक जो हमने पढ़ा-समझा था उसके अनुसार उत्तर बनता है समान दृष्टि से देखना/व्यवहार करना। किन्तु जब आयोग ने उत्तर कुंजी जारी की तो उसमें सही उत्तर  अंधाधुंध करना बताया गया। अब परीक्षार्थियों में इसे लेकर बेहद रोष है क्यों कि उन्होने भी यही समझा था कि सही उत्तर है एक समान व्यवहार करना। इस आँख ने और भी कहर ढाये हैं। एक बच्चे ने मम्मी को बताया “मम्मी ! पापा आंटियों से बहुत डरते हैं उन्हें देख कर अपनी एक आँख बंद कर लेते हैं”

 

दरअसल, ये नयी पीढ़ी अभी तक समझी ही  नहीं। भाई लोग अब आज के युग में इस का अर्थ अंधाधुंध करना ही है। ये जो अंधेरगर्दी चल रही है ये आपको दिखती नहीं है या आप जानबूझ कर एक आँख क्या दोनों आँखें बंद कर असलियत से दूर हैं। भाई लोग गांठ बांध लें अब एक आँख से देखने का अर्थ अंधाधुंध करना ही है। आप एक आँख की कह रहे हो मैं कहता हूँ एक क्या दोनों आँखों का अर्थ भी आजकल अंधाधुंध करना है। क्या कर लोगे तुम ? खामोश ! नहीं तो अभी दस साल के लिए डिबार कर देंगे तब समझ लगेगी। देखो! शब्द अपने अर्थ, देश-काल अनुसार अदलते-बदलते रहते हैं। जब होता होगा तब होता होगा कि गुरु आदर का सम्बोधन था, अब नहीं। अब किसी को गुरु कहना ऐसे कहना है जैसे वह कोई महा मक्कार, धूर्त व्यक्ति है बोले तो गुरुघंटाल। किसी की अच्छी मरम्मत करना और बुरी तरह पीटना, एक ही बात है। यानि की बुरी तरह कुटाई करना और अच्छी तरह धुनाई करना एक ही हो गया। ये ही क्या और ऐसी बहुत सी कहावतें और मुहावरे निकल आएंगे जिनको आज के संदर्भ में देखना और उनके अर्थ में तब्दीली करना जरूरी है। , मसलन एक मुहावरा था नेकी कर कुएं में डाल। अब कुएं नहीं हैं अतः लोग नेकी भी नहीं करते। नेकी कर कहाँ कुआं ढूंढते फिरेंगे? अतः या तो नेकी नहीं करते या नेकी इतनी सूक्ष्म करते हैं जिसे फ्लश किया जा सके। अतः नया मुहावरा है नेकी कर जूते खा। क्यों कि जिसके साथ आप नेकी कर रहे हैं वह आपको मुंह पर कुछ भी कहे, समझता आपको बुड़बक ही है। घर आए मेहमान को भगवान का रूप समझिए।  ‘होम स्टे’ के इस  जमाने में पता नहीं आप किस जमाने में जी रहे हैं। झूठ बोलने पर कान पक जाते हैं।  शेक्सपियर बहुत पहले कह गए थे 'नथिंग इज़ गुड और बेड थिंकिंग मेक्स इट सो'। अतः जो आयोग ने उत्तर प्रदेश में जो उत्तर दिया है उसी को पत्थर की लकीर समझिए। नहीं तो एक क्या दो आँखों से भी अंधाधुंध करने-करवाने के लिए तैयार रहें। इस पर जरा दोनों आँखें बंद कर सोचिए !     

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

                           (बशीर बद्र जी से मुआफी के साथ)


अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

जिसको उधार दिया वो दूर हो गया

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के 

क्वेश्चन-पेपर लीक जब से मशहूर हो गया

स्कूल कॉलेज दफ्तर बंद कर दिये हैं हमने 

गो कि मंदिर का चन्दा मंदिर से दूर हो गया

‘एवार्ड्स’ की भूख ने तोड़ दी उनकी अना

चुनाव नज़दीक देख ग़लत-सही का फर्क काफ़ुर हो गया

अपने नाती-पोतों को उसकी कहानी सुनाना

जब मेरे मुल्क का आवाम मुफ्तखोर हो गया

सुब्ह-ए-विसाल पूछ रही अज़ब सवाल

इंसानी-हुकूक में मुल्क पास हुआ या कोसों दूर हो गया

उस दिन से मेहनत करेगा आवाम

खैरात का बस्ता जिस दिन उसे नामंज़ूर हो गया

 

Thursday, July 9, 2026

व्यंग्य : अंकों का राजा – आठ

 


 

पहले आप ये जान लें कि जब बड़े आदमी कुछ.बोलते हैं.उसके बहुत गहरे अर्थ होते हैं। जरुरी नहीं कि वह हमारी-आपकी समझ में तभी के तभी आ ही जाये। कई बार बरसों लग जाते हैं। आपने ऐसे लोग देखे होंगे जो सोमवार को नॉन वैज़ नहीं खाते फिर वो देखे होंगे जो मंगलवार को नहीं खाते गो कि हर एक का कोई न कोई दिन होता है जब वह इन चीजों से परहेज करता है। इस परहेज के चक्कर में, मैं एक ऐसे शख्स को जानता हूँ जो मंगलवार को रात के बारह बजे तक प्रतीक्षा करके बारह बज कर एक मिनट पर छक के पीना शुरू कर देता था। इसी श्रंखला में एक सज्जन ऐसे थे जो मंगलवार का पूर्ण व्रत रखते थे। जब किसी ने पूछा कि आप तो कम्यूनिस्ट हैं आप भी ये सब मानते हैं ?  उनका जवाब था  मैं हेल्थ रीज़न्स से एक दिन का व्रत रखता हूँ अब मैं किसी दिन का भी व्रत रखता लोगों ने कुछ न कुछ कहना ही था। किसी देश में जब आठ अक्षरों की आइस क्रीम (Ice cream) से होने वाली गंदगी (आइस क्रीम की डंडी, पेपर कप इधर उधर पड़े रहते थे) से कैसे निपटें इस पर ब्रेन स्टाॅर्मिंग हो रही थी आप जानते हैं ब्रेन स्टाॅर्मिंग के दो सिद्धान्त हैं एक, आपके पास ब्रेन होना चाहिए दूसरे, आप किसी भी सुझाव पर हँसेंगे नहीं अर्थात उसका उपहास नहीं करेंगे। तभी यह संभव हो पाया कि क्यों न ऐसी आइस क्रीम बनाई जाये जिसके कंटेनर को भी खाया जा सके और इस तरह कोन वाली (साॅफ्टी) की शुरुआत हुई।

 

अंकों में अंकेन्द्र आठ है। देखिये क्यों कि मेरा ये लेख आठ की प्रशंसा में है अतः मैं यह बताना जरूरी समझता हूँ कि आठ जैसा कोई दूसरा अंक नहीं। अन्यथा ये शराब वाले '8 पी.एम.' नाम से शराब नहीं चलाते। यहाँ पी.एम. का अर्थ रात्रि के पहर से है। कृपया पाठक अन्यथा न समझें। कहते हैं कि भारत में सार्वाधिक जूता आठ नंबर का चलता है। अर्थात अधिकतर के पैर का साइज़ आठ नंबर है। हमारी माइथाॅलाॅजी में अष्टावक्र का ज़िक्र मिलता है जिनका शरीर आठ जगह से मुड़ा-तुड़ा था, असल में उनका नाम इसीलिए अष्टावक्र पड़ा था। कहते हैं ईश्वर ने दुनिया छह दिन में बना दी थी सातवें दिन गाॅड ने केवल विश्राम किया था। बोले तो आठवें दिन गाॅड ने क्या किया ? यह आज तक पता नहीं चला। आठ अंक का यही रहस्य है। यही अनसुलझी पहेली है।

 

 न्यूमरोलाॅजी में आठ का अंक शनि का प्रतीक माना गया है। अब भाई शनि से कौन नहीं डरता। जो नहीं डरता था उसे वैसे डरा दिया गया है। शनि से डराने के अनेकानेक रूप हैं यथा शनि की ढैया, शनि की साढ़े साती। बच्चू अब कहाँ तक दौड़ लगाओगे। नौ दिन में चले अढ़ाई कोस...यहाँ भी शनि की ढैया है। एक दिन में आठ पहर होते हैं आपको पता है ना। यूं कहने को दिशाएँ भी आठ ही होतीं हैं मगर ऊपर आकाश की ओर और नीचे पाताल को ओर इंगित कर इन्हें दस बनाया गया है। साष्टांग प्रणाम आप सुने ही होंगे। बोले तो जब मस्तक, दोनों हाथ, वक्ष, दोनों घुटने, दोनों पैर शामिल हों अतः जब कोई बड़ा आदमी आठ की बात करे तो ध्यान से सुनना चाहिए। पढ़ाई लिखाई वालों ने भी कुछ सोच समझ कर ही आठवीं क्लास को बोर्ड की परीक्षा बनाया था। हमारी बात छोड़िए हम उस पीढ़ी के हैं की हमने तो पांचवीं भी बोर्ड दिया था। बाई दि वे, हमारी ही नहीं बल्कि जापानी और चीनी संस्कृति में भी आठ का बहुत धार्मिक महत्व है। माइंड इट। आठ एक पूर्ण अंक है। आपने कभी इसकी फिगर पर गौर किया है। एक दम कंप्लीट। कहीं कोई लूज एंड नहीं। दूर से देखो तो बिलकुल हम्पटी-डम्पटी मालूम देता है बस एक हैट की कसर है।  हमें आज़ादी भी आठवें महीने में मिली थी।  संगीत के आठ लय, आठ तत्व होते हैं। 

 

जिन्हें न पता हो उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि भारत के

 स्वतत्रता संग्राम में इस आठ के अंक का बहुत बड़ा महत्व है।

 क्विट इंडिया मूवमेंट (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो) की शुरुआत

 आठवें महीने की आठ तारीख को ही हुई थी। इसी प्रकार

 अंतराष्ट्रीय महिला दिवस भी आठ तारीख को ही मनाया

 जाता है। आठ मार्च को। आठ के गुणगान में अब और क्या

 कहूँमेरे नाम में ही देख लो आठ अक्षर हैं (इंगलिश के)

 क्या 'हिन्दुत्व' क्या 'सनातनी' सब आठ लैटर से मिल कर

 बने हैं। अतः कृपया आठ का अथवा इससे संबन्धित अंक

 गणित का मज़ाक ना उड़ाया जाये। यूं भी अंकगणित हर

 किसी के बस की बात नहीं। सबसे ज्यादा आठ अक्षर से

 चलने वाली 'कोचिंग' भी इसी विषय की होती है। अब मेरा

 आठ लैटर का 'जय राम जी' स्वीकार करें।

Sunday, July 5, 2026

व्यंग्य : भर्ती हम करेंगे

 

जब से केंद्र सरकार को पता चला है कि उनके इतने प्रयास के बावजूद अभी भी भारत में ऐसी कुछ जगहें हैं जहां सरकारी तंत्र अपनी मनमर्ज़ी से भर्तियाँ कर रहा है। वह भी परीक्षा ले ले कर, बिना कोई फीस लिए और तो और उनका भर्ती करने का क्राइटेरिया भी बहुत भौंडा और ऑउटडेट्ड है। वही घिसा पिटा फाॅर्मूला लिखित परीक्षा ट्रेड टेस्ट बोले तो दौड़ के दिखाओ गीत गा कर सुनाओ ये बाजा बजा कर दिखाओ। अरे भई! दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी आप अभी तक इन्हीं एपटिच्युड टेस्ट और इंटरव्यू में उलझे हुए हो। ऐसे तो कर ली भारत ने तरक्की। क्या इसी बलबूते पर आप भारत को 2047 में ले जाओगे ? हमारे रहते हरगिज़ नहीं !

 

मंत्रालय दुनिया भर के कोटे भरता है। कहीं स्काउट एंड गाइड कोटा है तो कहीं कल्चरल कोटा है। तो कहीं अनुकंपा आधार पर नियुक्तियाँ हैं। अब होता ये है कि किसी स्थान विशेष पर तुरंत के तुरंत रिजल्ट निकाल कर भर्ती प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। कहीं महीनों तक कोई काम नहीं होता है। कहीं प्रश्न पत्र इतना कठिन होता है कि कोई बिना साॅल्वर पास हो ही नहीं सकता कहीं प्रश्नपत्र इतना आसान होता है कि पता नहीं प्रश्न पत्र रखा ही क्यूँ गया था। दूसरे शब्दों में कोई एकरूपता बोले तो यूनिफ़ाॅर्मिटी नहीं है। चल लिया जितना चलना था अब ऐसा हरगिज़ नहीं चलेगा। हमारे रहते तो कदापि नहीं। ये क्या ? हमारा कोई कंट्रोल नहीं। हम केंद्र हैं । बोले तो हर चीज़ हर गतिविधि के केंद्र में हम रहना मांगते हैं। हमारे बिना ना पेपर सेट होगा, ना पेपर लीक होगा। कौन पेपर कितना आसान करना है ? कितना कठिन करना है ? ये हम डिसाइड करेंगे। आखिर को तो हम केंद्र हैं। अब ये भी बताना पड़ेगा कि केंद्र का काम क्या होता है? केंद्र की क्या भूमिका होती है?

 

कल्चरल कोटा की भर्ती में सुना है कि गायक-गायिका चाहिये तो उनसे गाना सुना जाता है। ये क्या बात हुई हमारी बहन-बेटियों से गाना सुनना यह सनातन संस्कृति के बिलकुल विरुद्ध है। हम ऐसे कोई भी गाना सुनता पाया गया तो उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे। संगीतकार चाहिए तो सुना है उससे बाजा बजवाया जाता है। ये क्या बदतमीजी है? हम सब जानते हैं। कहीं कोई बाजा लोकप्रिय है कहीं कोई बाजा। भारत अखंड है। भारत एक है। अतः इन क्षेत्रीय बाजों को बजने से रोका जाएगा। 'वन नेशन वन बाजा'। ये क्या कोई बांसुरी बजा रहा है तो कोई इकतारा बजा कर ही नौकरी पा जा रहा है। कोई हारमोनियम बजा कर भी फेल हुआ जाता है। कोई पियानो जो कि सरासर अपसंस्कृति का द्योतक है उसे बजा कर नौकरी पा ले रहा है। ये अंधेरगर्दी अब नहीं चलने की। अब 'हम' डिसाइड करेंगे बिलकुल 'नीट' के माफिक। नीट पेपर रहा करेगा। पाँच हज़ार की फीस ली जाएगी प्रत्येक आवेदक से। उसे यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि वह भारत का नागरिक है। उसके लिए ये आधार कार्ड। पैन कार्ड, पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेन्स नहीं चलेगा। शैक्षिक योग्यता पर बल नहीं है। यहाँ उसकी भारतीय संस्कृति में कितनी पैठ है यह देखा जाएगा। ताकि एक सनातनी पीढ़ी का निर्माण हो सके। ना कि पाश्चात्य अपसंस्कृति लादनी है। ढो चुके जितना ढोनी थी। ये नया भारत है यह घर में घुस कर मारता है।

 

कौन पेपर कितना आसान बनाना है, बनाना भी है या नहीं। ये हम डिसाइड करेंगे। कौन पेपर कब किसको लीक करना है ये हम डिसाइड करेंगे। कौन से कल्चरल कोटा में कौन सा वाद्य यंत्र बजेगा ये भी हम डिसाइड करेंगे। हो सकता है कोई वाद्य यंत्र बजवाएं ही नहीं। यह अंत तक गोपनीय रखा जाएगा। इससे एक रूपता आएगी। पेपर में भी और उसके लीक में भी। अब से कोई यह शिकायत नहीं कर सकेगा कि जयपुर में पेपर लीक हो गया मगर बिलासपुर में लीक नहीं हुआ। अब यह लीक भी अखिल भारतीय स्तर पर होगा। यह केंद्र सुनिश्चित करेगा। अतः सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया है कि क्षेत्रीय बैलेन्स बनाए रखने के लिए 70 साल में पहली बार ये सभी स्काउट एंड गाइड, अनुकंपा और कल्चरल कोटा केंद्र से गवर्न होंगे ना कि क्षेत्रीय दफ़तरों से। आखिर हम केंद्र हैं। हमें ये हक़ पंहुचता है कि हम परीक्षा कराएं, कराएं ना कराएं। पेपर आसान बनाएँ, कठिन बनाएँ, लीक कराएं। परीक्षा जैसे तैसे हो भी जाये तो उसका रिजल्ट जारी करें, करें ना करें। यह हमारा विशेषाधिकार है। इस विषय पर कोई सुझाव अथवा ऑबजेक्शन एंटरटेन नहीं किया जाएगा। हमें पता है अर्बन नक्सल और एंटी नेशनल को हमारे ये निर्णय फूटी आँख नहीं सुहायेगा। ज़ाहिर है इनमें विज़न का अभाव है। 

 

 

Saturday, July 4, 2026

12वीं फेल

 

इस प्रकार के शीर्षक ऐसा आभास देते हैं जैसे आई.ए.एस. और आई.पी.एस. के लिए किसी शैक्षिक योग्यता अर्थात पढ़ाई-लिखाई की ज़रूरत नहीं है बस सीधे-सीधे आपका इंटरव्यू लिया जाएगा और आपको तैनाती दे दी जाएगी। अभी मेरी नज़रों से एक और हैडलाइन गुजरी जो 12वीं भी नहीं बल्कि कह रही है फलां '5वीं फेल' आई.ए.एस. बन गयी। बोले तो अगर 12वीं फेल आई.पी.एस. बन सकता है यह तो एक कदम और आगे की बात है जहां मोहतरमा महज़ 5वीं फेल हैं और आई. ए.एस. बन गईं हैं। सच तो यह है कि ये हैडलाइन्स गुमराह करने वालीं हैं। दरअसल कभी अपने शैक्षिक कैरियर में वो कभी 5 वीं जमात में अथवा 12 वीं जमात में फेल हुए होंगे, मगर इसका मतलब ये नहीं कि फिर वे सीधे यू.पी.एस. सी. ही जा पहुंचे कि अब हमें आई.ए.एस./ आई.पी.एस. बनाओ।

 

जिन्हें ना पता हो उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि इस सिविल सर्विस की परीक्षा के लिए आपका ग्रेजुएट होना न्यूनतम योग्यता है। अब चाहे वह आपने बी.ए. किया हो बी. कॉम. किया हो या बी.एस. सी. किया हो। मोटा-मोटा आपका ग्रेजुएट होना मिनिमम है। फिर आप डॉक्टर हों, इंजीनियर हों, बी.डी.एस. हों, बी.फार्म हों या बी.बी.ए./बी.सी.ए. हों। ये शैक्षिक योग्यता किसी रिकाॅग्नाइज़ यूनिवर्सिटी से होनी चाहिए । अर्थात ना केवल आपकी डिग्री बल्कि संस्थान जहां से किया है दोनों मान्यता प्राप्त होने चाहिए। हाँ उम्र आप 32 साल तक दे सकते हैं इसमें 5 साल एस.सी./एस.टी. के 3 साल ओ.बी.सी. के जोड़ दीजिये। इसी तरह कितने चांस मिलेंगे यह भी निर्धारित है।

 

अब यह कहना कि फलां 12 वीं पास कालांतर में आई.पी.एस. बन गया या फलां 5वीं पास आई.ए.एस. बन गयी ये सही है मगर मिनिमम स्नातक बनाने के बाद। ये वैसे ही है जैसे कोई कहे कि निमोनिया ग्रस्त ने रेस जीती अरे भाई निमोनिया अगले को बचपन में हुआ था अब वो रेस जीतने लायक है सो जीत ली। ये नहीं कि जब वो दौड़ रहा था तब निमोनिया से पीड़ित था। एक और बीमारी आजकल चल पड़ी है फलां के पिता तांगा चलाते थे। उनका लड़का आई.ए. एस. बन गया। फलां मजदूर का बेटा आई.पी.एस. बन गया अथवा फलां की मां  बर्तन माँजती थीं और बेटी ने आई.ए.एस. बन कर दिखाया। यह ऐसी खबरें इसीलिए चलाई जातीं हैं कि आप भी प्रेरित हों। इम्तहान देने को। इस आई.ए.एस. की परीक्षा ने इतने घर बसाये नहीं हैं जितने यूथ लाइन से बे-लाइन बोले तो डिरेल किए हैं। एक तो हमेशा को ये दर्द दे दिया है कि हाये हम क्यूँ ना बन पाये, फलां तो मुझ से भी ज्यादा नालायक था, वह बन गया। दूसरे उनके विचारों में एक प्रकार का टेढ़ापन आ जाता है। बहुधा वे आई.ए. एस. को गाली ही देने लग पड़ते हैं। एक सज्जन बोले कि रामलाल मेरे बैच का आई.ए.एस. है। मैं असंजमस में था कि ये सज्जन तो आई.ए.एस. हैं नहीं। फिर वे बोले जिस साल मैंने इम्तिहान दिया था मैं रह गया था और ये रामलाल पास हो गया था। तो हुआ ना मेरे बैच का।

 

यह परीक्षा कोई तुक्का नहीं है। ना ही इसे गंभीर केंडीडेट्स को कैज्युली लेना चाहिए। ये एक साधना की तरह है। आपको दीन-दुनिया की दुनियावी बातों से दूर एक ऐसी गुफा में जाना है। ना कोई सोशल मीडिया ना कोई दोस्त-यार। यह दो से तीन साल की तपस्या मांगती है कमसेकम। आप उनसे अपनी तुलना ना करें जो जीनियस हैं, गाॅड गिफ़्ट्ड हैं अथवा लकी हैं। मेहनत पहली शर्त है दूसरे आपका लक है वह भी मात्र इतना है कि आपके अच्छे से याद किए सवाल आ जायें। जैसा मैंने कहा कोई तुक्का काम नहीं आता। इतनी जगह आपकी लियाकत देखी जाती है कि तुक्के की या चांस की कोई जगह रह नहीं जाती। प्रेलिमिनरी (जिसमें नेगेटिव मार्किंग होती है) सवाल ज्यादा, टाइम कम। फिर मेन परीक्षा वह भी नौ पेपर्स:

1. सामान्य हिन्दी (300 अंक)

2. सामान्य अंग्रेजी (300 अंक)

(यह दोनों पेपर क्वालिफाइंग है। अर्थात पास करना अनिवार्य

 है। इसमें फेल तो बाकी पेपर्स जांचे ही नहीं जायेंगे। मार्क्स

 मैरिट निर्धारण में नहीं जुड़ेंगे)

 

3. निबंध (250)

4. सामान्य ज्ञान I (250) (इतिहास/हेरीटेज/सोसायटी)

5. सामान्य ज्ञान II (250) पाॅलिटी/गवर्नेंस /अंतराष्ट्रीय

 संबध)

6. सामान्य ज्ञान-III (250) अर्थशास्त्र/विज्ञान/सुरक्षा

7. सामान्य ज्ञान-IV (250) Ethics नैतिक शास्त्र/

सत्यनिष्ठा/एप्टीच्यूड

8. वैकल्पिक विषय पेपर-1 (250)

9. वैकल्पिक विषय पेपर-II (250)

(एक वैकल्पिक विषय 48 विषयों की दी गई सूची में से चुनना

 होता है। उसी के दो पेपर होते हैं)

 

आपका कोई दांव काम नहीं आयेगा सिर्फ मेहनत काम आएगी। फिर 40-45 मिनट का 5 से 7 वरिष्ठ एक्सपर्टों द्वारा आपका इंटरव्यू (275 मार्क्स) और फिर कड़ी मेडिकल जांच। मेडिकल में आपको कोई रेस नहीं लगानी है ना दंड-बैठक पेलने हैं। बस वे मानक पूरे करने हैं जो पूर्व निर्धारित हैं। आपका चयन हो जाने पर आपको सर्विस कौन सी मिलेगी यह निर्भर करता है आपकी रेंक -कम - वेकेन्सी -कम -चाॅइस पर। याद रखें जो चुने जाते हैं वह भी हमारी आपकी तरह ही होते हैं। आपको तो बस एक सीट भर चाहिये। आप यह फाॅर्मूला समझिये कि किसी बरस अगर एक हजार रिक्ति का विज्ञापन है तो प्रेलिमनरी में भले 8 लाख केंडीडेट्स बैठें या दस लाख बैठें पास केवल रिक्तियों का दस गुना मतलब दस हजार पास किये जायेंगे। ये दस हजार मेन परीक्षा देंगे। इंटरव्यू के लिये इन दस हजार में से केवल दो हजार पास किये जायेंगे। अंत में इंटरव्यू में इन दो हजार में से एक हजार पास होंगे। 

Wednesday, July 1, 2026

व्यंग्य: दिल्ली-आई

 

 जिन्हें नहीं पता उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि लंदन में एक बहुत बड़ा, विशाल ऊंचा चरखी वाला झूला है जिसे लंदन-आई (यानि लंदन की आँख) कहा जाता है। लोगों का यह मानना है कि इस झूले पर चढ़ने के बाद पूरा का पूरा लंदन दिखता है। ये चरखड़ी वाले झूले मेलों में खूब लोकप्रिय रहते हैं खासकर बच्चों में। अंग्रेजी में शायद इसे व्हील या जायंट व्हील कहते हैं। पर जो बात चरखी वाला झूला या लंदन-आई कहने में है वह व्हील में नहीं। अब देखिये ना ये झूला लंदन देखने आने वाले पर्यटकों में खूब  लोकप्रिय है। टूरिस्ट गाइड आपको वहाँ ज़रूर ले जाता है। वैसे ही जैसे ताजमहल दिखाने वाले गाइड या रिक्शा वाले आपको एम्पोरियम दिखाने ले जाते हैं। या जिन रेस्तरां वालों से पहले से बात हो रखी होती है वे आपको उसी रेस्तरां में चाय-पानी अथवा लंच आदि को ले जाते हैं। किसी ने हाल ही में मुझे बताया कि कुछ ढाबे वाले यार दोस्तों से कह कर अपनी दो-चार कारें वहाँ ढाबे के बाहर पार्क करवा लेते हैं ताकि ढाबा चलता हुआ और लोकप्रिय जैसा लगे।

 

यह लंदन-आई जो है सो सन् 1999 से लगा हुआ है। इस

 झूले की टिकट 29 पाउंड (3650/-) है यदि ऑन लाइन

 करायें यदि काउंटर से लेंगे तो 39 पाउंड (4907/-) है  यह

135 मीटर ऊंचा है और इसमें एक बार में 800 लोग बैठ

 सकते हैं। एक राउंड 30 मिनट का होता है। ज़ाहिर है इस

 झूले के सभी कल-पुर्जे बैस्ट क्वालिटी के खरीदे गए होंगे

 ठोक-बजा कर। जब बात क्वालिटी की आती है तो पैसों से

 कोई समझौता नहीं। वे जाने-अनजाने कैसे भी आदमी की

 जान खतरे में नहीं डाल सकते। आखिर नेशनल प्राइड भी

 कोई चीज़ है। वे नहीं देख सकते कि ब्रिटेन या लंदन की नाक

 नीची हो। टिकट चाहे जितने की हो मगर सेफ़्टी से कोई

 सम्झौता नहीं। सेफ़्टी फर्स्ट। वहाँ से पर्यटक लंदन के मनोरम

 आकाश, कल-कल बहती साफ सफ्फाक थेम्स नदी, दूर दूर

 तलक फैली हरियाली और हेरिटेज बिल्डिंग्स को देख कर

 एंजॉय करते हैं। लंदनवाले खुद कहते हैं जैसे पेरिस के लिये

  एफिल टाॅवर है उसी तरह लंदन-आई उनके लिये है।

 

सरकार ने घोषणा की है कि ऐसा ही एक झूला दिल्ली में लगाया जाये। जगह भी चुन ली गयी है - मयूर विहार। सुन कर पर्यटकों या तफरीह करने वालों के मन में तो बाद में लड्डू फूटेंगे सब से पहले तो जिस विभाग को ये काम सौंपा गया है उसके अफ़सरान, डीलिंग बाबू और ठेकेदार आदि का मन-मयूर नाच उठा है। सब के सब की 'आई' अब इस दिल्ली-आई की डील पर है। इसका ठेका किसको मिलेगा ? कितने का ठेका खुलेगा? कितना कुछ हिसाब-किताब हो जाएगा आदि आदि। अब या तो सरकार सीधा-सीधा उसी को ठेका दे दें जिसने  लंदन-आई बनाया है अन्यथा हमारे यहाँ तो कोई मेला ऐसा नहीं जाता जिसमें झूला टूटता नहीं हो। आदमी मरते नहीं हों। हमारे यहाँ रोप-वे टूट जाते हैं। ट्रॉली बीच आकाश में लटक जाती है, रस्सी टूट जाती है, बन्जी जम्पिंग के केबल टूट जाते हैं। पैरा ग्लाइडिंग क्रैश लेंड कर जाती है। लाइफ सेविंग जैकेट चमकती खूब है बस 'लाइफ' ही नहीं बचा पाती। हमारे यहाँ आप किसी को एल-1 पर सलेक्ट करें या ना करें उसने मैटीरियल सबसे 'लोएस्ट क्वालिटी' का लगाना है। हमारे यहाँ जुगाड़ इज दि नेम ऑफ दि गेम। आप तो इसका नाम "आई ऑफ जुगाड़" रख दो, मैं अभी से बता रहा हूँ। दूसरे लंदन में तो आदमी झूले पर बैठ कर लंदन की शानदार इमारतें और नीला आकाश तथा हरियाली देखता है और अपना पैसा वसूल समझता है। मयूर विहार में ये  दिल्ली-आई लगा कर आप टूरिस्ट को क्या दिखाना चाहते हैं ? विकास के नाम पर काटे गये पेड़ ? स्लम और अनाधिकृत बस्तियाँ ? आड़ी-तिरछी कॉलोनियाँ, गंदे नाले, सूखती हुई मैली जमुना या फिर हमारी अपनी क्वालालंपुर सरीखी पैट्रोनस ट्विन टाॅवर्स ? नहीं समझे ? अरे भई !  गाजीपुर में कूढ़े के दो जुड़वां पहाड़ ?