Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Friday, July 17, 2026

satire: You are an Indian:

 

There is lot of debate going on as to what (document) will determine your citizenship.
Forget the paper work, the unflinching test would be:
You will be made to walk on a road and videographed confidentially, you are an Indian if you:
1. Cross the road jay walking
2. Spit on the road
3. litter the road
4. talk loudly with fellow walkers or on phone
5. laugh no end.
6. Haggle with shopkeepeer and insist for discount/free gift
7. Want two polythene bags fearing that single one will tear off
8. Eat making strange sound and fill up ur tummy with freebies, if any.
9. Ogle at passers by
10. Over eat your breakfast so as to save expenses of lunch
11. Seeing a long queue, instead of standing in the queue you get bust how to break the queue so that your turn comes first
12. If someone speaks in English, you start speaking in English without knowing much, also if someone speaks in Hindi then you MUST speak in English.

व्यंग्य: आप एक भारतीय हैं:

 

इस बात पर बहुत बहस चल रही है कि कौन सा (दस्तावेज़) आपकी नागरिकता निर्धारित करेगा।
अब कागज को भूल जाओ, अडिग परीक्षण हाथ लगा है अब से वही होगा:
आपको सड़क पर छोड़ दिया जाएगा और गोपनीय रूप से वीडियोग्राफ किया जाएगा, आप निश्चय ही एक हार्ड कोर भारतीय हैं यदि आप:
1. सड़क पार करते वक़्त जेबरा क्राॅसिंग की बजाय कहीं से भी टेढ़े मेढ़े चल कर पार करें।
2. सड़क पर थूकें
3. सड़क पर कूड़ा फैलायें
4. साथ चल रहे साथियों से या फोन पर जोर-जोर से बात करें
5. हँसो तो हँसते ही रहो वो भी खूब जोर से।
6. शॉपकीपर के साथ सौदेबाजी करें और छूट/मुफ्त उपहार के लिए जोर दें
7. दो पॉलीथीन बैग की डिमांड करें इस डर से कि एक है तो जरुर फट जाएगा
8. अजब गजब आवाज़ निकालते हुए खाना खाओ और अपने गले तक खायें विशेषत: यदि कुछ नि:शुल्क हो।
9. राहगीरों खासकर महिलाओं को घूर घूर कर देखें।
10. अपना नाश्ता जरुरत से ज़्यादा खाओ ताकि दोपहर के भोजन के खर्च को बचाया जा सके।
11. यदि कहीं 'क्यू' लगी हो तो इस जुगाड़ में लग जाओ कि कैसे इसे तोड़ कर अपना नम्बर लगाया जाये
12. कोई अंग्रेजी बोले तो न आते हुए भी अंग्रेजी की टांग तोड़ें और कोई हिन्दी बोले तो उससे तो जरुर ही अंग्रेजी बोलें।

J.N. Marshall - a memoir

 


The marshy piece of vacant land on Mala Road in Kota junction always gave me an impression of an abandoned plot, abdicated in hurry. Broken sheds, temporary structures and knee length grass haphazardly growing all over. During 1980s I was posted on Kota division of the then W.R. Upon inquiry, no body could tell me clearly about it. They would simply disclose what they knew rather were told by their elders " Oh ! some ANGREJ had set up a factory of compressors..." and that was about all. Then one day i decided to explore myself, no not the marshy plot of land but the history of J.N. Marshall.
J.N. Marshall stands for Jahangir Nusserwanji Marshall. A Parsi. He founded the trading company in Ahmedabad in 1926, which later expanded into the multinational engineering and steam solutions group. The firm was later developed into its manufacturing and corporate form by his nephew, Darius Minocher Forbes.
It was in 1946 Darius M Forbes joined his uncle J.N. Marshall and they began trading in various energy saving steam equipment as well as imported boilers. A foreign exchange payment crisis struck India in 1957 and the Govt did not renew J.N. Marshall’s import license. The only way forward was to manufacture. Hence, the first factory was set up in Kasarwadi, Pune and manufacturing began in 1959. The second unit was set up in Hyderabad in 1985 for manufacturing gauges. The third factory was set up in Pimpri near Pune in 1986 for the manufacturing of control instrumentation.
Today the company by name Forbes Marshall provides innovative solutions to help business to improve their energy and process efficiency and be more environmentally responsible, their customers are spread over across India, North and South America, Africa, the Middle East, South east Asia and Europe.
After the economy opened in 1991, they needed to compete with global companies to remain in business, manufacture products of world standards. In 1992 sales to Sri Lanka were made. In 1998 an office was opened in Sri Lanka.
Today they have two manufacturing units in UK and Singapore along with four in India. 8000 customers are catered to worldwide.
Could not get a photo of J.N. Marshall, photo with this article is that of Darius Forbes the nephew. He passed away on 11th August 2023 at the age of 97 years.

संस्मरण: जे.एन. मार्शल


                                     


 

राजस्थान के कोटा रेलवे जंक्शन स्टेशन के समीप माला रोड पर खाली भूमि के दलदली टुकड़े ने हमेशा मुझे एक लावारिस से, क़ानूनी दांव-पेच में फंसे भूखंड की छाप दी, जैसे ये जल्दबाजी में त्याग दिया गया था। टूटे हुए शेड, अस्थायी ढांचे और जगह-जगह बेतरतीब ढंग से बढ़ रही घुटने तक की घास। मैं 1980 के दशक में कोटा में.पदस्थ था और मेरा सरकारी आवास समीप ही था। पूछने के बाद भी मुझे इसके बारे में स्पष्ट रूप से कोई नहीं बता सका। वे बस वही खुलासा करते थे जो वे जानते थे बल्कि उनके बुजुर्गों द्वारा जो बताया गया थे। "ओह! कोई अंग्रेज ने कंप्रेसरों का एक कारखाना कभी स्थापित किया था..." एक दिन मैंने खुद पता लगाने का फैसला किया, भूमि के दलदली भूखंड के बारे में नहीं बल्कि जे. एन. मार्शल के खुद के इतिहास के बारे में।

 

जे. एन. मार्शल का पूरा नाम जहांगीर नौशेरवानजी मार्शल था। वह अंग्रेज नहीं, एक पारसी थे। उन्होंने 1926 में अहमदाबाद में व्यापारिक कंपनी की स्थापना की, जो बाद में बहुराष्ट्रीय इंजीनियरिंग और भाप के साजो-सामान/ समाधान के समूह में विस्तारित हुई। बाद में इस फर्म को उनके भतीजे डेरियस मिनोचर फोर्ब्स द्वारा इसे विनिर्माण और कॉर्पोरेट रूप में विकसित किया गया था।

 

1946 में डेरियस एम फोर्ब्स अपने चाचा जे. एन. मार्शल के साथ शामिल हो गए और उन्होंने विभिन्न ऊर्जा बचत भाप उपकरणों के साथ-साथ आयातित बॉयलरों का व्यापार शुरू किया। 1957 में भारत में विदेशी मुद्रा भुगतान संकट आया और सरकार ने जे. एन. मार्शल के आयात लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं किया। आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता निर्माण करना था। इसलिए, पहला कारखाना कासरवाड़ी, पुणे में स्थापित किया गया था और विनिर्माण 1959 में शुरू हुआ था। दूसरी इकाई 1985 में हैदराबाद में विनिर्माण गेज के लिए स्थापित की गई थी। तीसरा कारखाना 1986 में पुणे के पास पिंपरी में नियंत्रण उपकरण के निर्माण के लिए स्थापित किया गया था।

 

आज 'फोर्ब्स मार्शल' नाम की कंपनी व्यवसाय को अपनी ऊर्जा और प्रक्रिया दक्षता में सुधार करने और अधिक पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार होने में मदद करने के लिए अभिनव समाधान प्रदान करती है, उनके ग्राहक भारत, उत्तरी और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप में फैले हुए हैं।

1991 में अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद, उन्हें व्यापार में बने रहने के लिए वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता थी, विश्व मानकों के उत्पादों का निर्माण करना था। 1992 में श्रीलंका को बिक्री की गई थी। 1998 में श्रीलंका में एक कार्यालय खोला गया था।

 

आज उनके पास ब्रिटेन और सिंगापुर में दो विनिर्माण इकाइयां हैं और भारत में चार इकाइयां हैं। दुनिया भर में 8000 ग्राहकों की ज़रुरतों को संतोषजनक तरीके से पूरा किया जाता है। आज इस कंपनी का वार्षिक टर्न ओवर 1500/- करोड़ है। मुझे चाचा जे. एन. मार्शल का कोई चित्र पब्लिक डोमेन में नहीं मिला। अत: उनके भतीजे डेरियस फोर्ब्स की तस्वीर साझा की है जिनका 97 बरस की आयु में 11 अगस्त 2023 को निधन हुआ।

व्यंग्य: सब (रेलवे स्टेशनों) का मालिक एक –आर.पी.एफ.

 

इस आगरा की घटना से पहले, बहुत पहले से लोग बाग कहते और विश्वास करते आये हैं कि आर.पी.एफ.  की फुल फाॅर्म 'राशन पानी फ्री' है। रेलवे स्टेशन पर आप ऐसे समझो मोटा-मोटी कितने ही विभाग के रेल कर्मी कार्यरत होते हैं।

वाणिज्य विभाग: बुकिंग क्लर्क, टी.टी./ टी.सी. खान-पान के स्टॉल, अन्य सभी स्टॉल, कुली (लाइसेन्स दिया जाता है वे रेलकर्मी नहीं होते)

ऑपरेटिंग विभाग: असिस्टेंट स्टेशन मास्टर, स्टेशन मास्टर, स्टेशन सुपरिटेंडेंट, स्टेशन डाइरेक्टर, गार्ड

विद्युत विभाग: स्टेशन की लाइट/पंखे/पंप/ रेल का इंजन/ रेल की लाइट/पंखे/ए. सी./ लोको पायलट (इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन)

मकैनिकल: रेल का इंजन, रेल के कोच/डिब्बों के पहिये/लोको पायलट (डीजल) बर्थ

सिग्नल एंड टेलिकॉम विभाग: सिग्नल सिस्टम, टेलीफोन

इजीनियरिंग विभाग: गेंगमेन, पी.वे. इंस्पेक्टर

 

 लास्ट बट नाॅट लीस्ट आर. पी.एफ. ये तो हो गए औपचारिक मान्यता प्राप्त विभाग। इसके बाद और इन सबसे बड़े होते हैं अनऔपचारिक विभाग। नहीं समझे ? बताइये ये जो भिखारी लोग होते हैं स्टेशन के अंदर-बाहर ? वो किसकी मेहरबानी से ? फूड स्टॉल पर औने-पौने दाम। पानी की बोतल महंगे दाम पर बेचना। जेबकट, उठाईगीरे, ऑटो टैक्सी वाले, बेटिकट यात्रियों की पकड़-धकड़ में महत्ती भूमिका। आप ट्रैक पार करते हो या पार करते पकड़े जाते हो तो आर.पी.एफ. के सौजन्य से। यद्यपि आर.पी.एफ. की ऑफिशियल भूमिका रेलवे की प्रॉपर्टी की सुरक्षा करना है बस। न इससे कम इससे ज्यादा। अब समझ गए आप क्यों ये कुत्ता लेकर डिब्बे डिब्बे घूमते हैं। बेचारे कुत्ते को भी हलकान करते हैं। दरअसल ये अपने शिकार की रेकी करते होते हैं। पिछली सदी की बात है। एक शहर में अफीम की खेती होती थी। अब इस अफीम को बाहर भी भेजना होता है इसके लिए वे 'म्यूल' बोले तो कैरियर की तलाश में रहते और उनके थ्रू ये खेप दूसरे शहरों में भेजी जाती थी। अब इसके लिए रेलवे सबसे सुरक्षित और सस्ता साधन। आर.पी.एफ. वाले इन्हें पकड़ लेते थे। जब बार-बार ये होने लगा तो आर.पी.एफ. ने अफीम वालों को सलाह दी भैये ! आप लोगों को भेजते हो, हम उन्हें पकड़ते हैं आपका माल ज़ब्त करते हैं फिर आपको उन्हें छुड़वाने को मारे-मारे घूमना पड़ता है। कोर्ट-कचहरी करनी पड़ती है और माल भी जाता है, पैसे का खर्चा अलग। तो क्यों न आप हमारी सेवायें लेते। हम पहुंचा दिया करेंगे। काहे को बिचौलिये लाते हो। बस उसके बाद सभी सुख से रहने लगे।

 

एक लड़की अपने बूढ़े माता-पिता के साथ यात्रा कर रही थी। एक स्टेशन पर उनक लिए कुछ लेने उतरी और ट्रेन चल दी तो माता-पिता ने ज़ंजीर खींच दी। जैसे ही लड़की ट्रेन में चढ़ने लगी आर.पी.एफ. ने पकड़ लिया। ले गए अपनी चौकी। फिर दुनिया भर की सिफारिश के बाद उसे अगली ट्रेन से रवाना किया। यदि उसकी जान-पहचान न होती तो पता नहीं कितने दिन हवालात में रहना पड़ता और कितना 'जुर्माना' देना पड़ता। ये जवान दूसरे बेटिकट यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम भी करते हैं।     अब यूं ही तो नहीं रेलवे की नौकरी को इतनी अहमियत दी जाती रही है। आप को पता होगा रेलवे को एक ‘स्टेट’ का दर्जा होता है। अपना टेलीफोन सिस्टम, अपने स्कूल/कॉलेज, अपनी दुकानें, क्लब, अपने रोड्स, अपनी कॉलोनी, अपना बिजली घर अपना पानी का सिस्टम। फिर बचा क्या? रेलवे अपने हर कर्मचारी को इतना 'एम्पाॅवर' कर देती है और उसमें कूट कूट कर सैंस ऑफ बिलाॅगिंग भर देती है कि हर कर्मचारी यही सोचता है कि रेल उसी के कंधों पर चल रही है। एक जबर्दस्त जिम्मेवारी का भाव देती है। इसी जिम्मेवारी के भाव से निकलता है अपने ऑर्गनाइज़ेशन पर गर्व।

 

अब यह कहा और माना जाता है कि रेलवे स्टेशन का मालिक स्टेशन मास्टर होता है। मगर आर.पी.एफ. को इस तरह का हिस्सा-बाँट पसंद नहीं। नेपोलियन का एक कथन है “या तो मैं खामोश रहता हूँ या कमांड करता हूँ” आर.पी.एफ. के ऑफिसर पहले कमांडर ही कहलाते थे अब कमिश्नर (सुरक्षा आयुक्त) है। खाकी वर्दी में कुछ ऐसी ही सिफ़त है कि आदमी एक बार चोर-उचक्कों से नहीं डरता पर खाकी से डरता है। यूं ख़ाकी, ख़ाक का (मिट्टी का) रंग है। आर.पी.एफ. ने वह शेर जरुर सुना होगा:

 

                    मिटा दे अपनी हस्ती अग़र कुछ मर्तबा चाहे

                   कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ओ-गुलज़ार होता है

अतः आपको गुल-ओ-गुलज़ार कराने का महत्वपूर्ण काम आर.पी. एफ. ने अपने ऊपर ले लिया है। अब आप चाहे कितनी ही सफाई दें या गुल-ओ-गुलज़ार बनने से मना करें आर.पी. एफ. के चार जवानों ने आपको टांग/बाजू पकड़ के गुल-ओ-गुलज़ार कर ही देना है। माइंड इट।

 

Wednesday, July 15, 2026

विधायक फ़रोश

 


 (वरिष्ठ विद्वान एवं कवि श्रेष्ठ दद्दा भवानी प्रसाद मिश्र जी से क्षमा सहित) 


जी हाँ हुज़ूर मैं विधायक बेचता हूँ

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ

मैं किसिम-किसिम के विधायक बेचता हूँ

जी, माल देखिये, दाम बताऊंगा,

बेकाम नहीं हैं काम बताऊंगा

कुछ विधायक लिए हैं मस्ती में मैंने

कुछ विधायक लिए हैं बस्ती मे मैंने 

कुछ टेक्स डिफ़ाल्टर विधायक हैं मेरे पास

कुछ विधायक डिस्प्रोपेशनेट असेट वाले हैं

यह विधायक हेल्थ ग्राउंड पर आता-जाता है

यह विधायक खोखे देख खिंचा जाता है 

जी, शुरू में जरूर शर्म लगी मुझको;

पर बाद-बाद में अक़्ल जगी मुझको,

जी, लोगों ने तो बेच दिए ईमान,

जी, आप न हों सुनकर ज़्यादा हैरान—

मैं सोच समझ कर आख़िर

विधायक बेचता हूँ,

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक  बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

यह विधायक देशभक्ति के गीत सा है गाकर देखें,

यह विधायक गंदी गाली सा है गरिया कर देखें

यह विधायक वहाँ  ई डी की रिपोर्ट में लिक्खा था,

यह विधायक सी बी आई की फाइल में  रक्खा था,

यह विधायक पहाड़ी को रात-रात में समतल कराता है,

यह विधायक विकास के नाम पर बस पेड़ कटवाता है!

यह विधायक भूखा-प्यासा आमरण अनशन कराता है

जी, यह गाँव-गाँव जाकर  हिन्दू-मुसलमान कराता है,

यह विधायक रिज़ॉर्ट में ही सरकार बनवा देता है हुज़ुर,

यह विधायक दो दिन में बहुमत मुहैया कराता है हुज़ूर,

जी, और विधायक भी हैं दिखलाता हूँ,

जी, परेड कराना चाहें आप तो नचवाता हूँ।

जी, कुर्ते-पाजामे वाले पसंद करें,

ये बंडी-धोती विधायक मंत्रिपद पर तुरंत मरें!

ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,

मैं ले आता हूँ सफारी सूट वाले विधायक

इनमें से भाए नहीं ? नए पेश कर दूँ

जी नई उम्र के नहीं तो क़ब्र में पाँव वाले भी हैं

मैं नए, पुराने सभी तरह के

विधायक बेचता हूँ,

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

ये विधायक बस नाम का ज़िंदा है इसे रखूँ ?

आपके ऑर्डर में कितने विधायक लिखूँ ?

यह विधायक रा सिल्क वाला, यह खादी का है

यह विधायक पित्त का तो ये वाला बादी का है

कुछ और विधायक डिज़ाइन-टू-ऑर्डर भी हैं

यह लीजिये  चलती चीज़ एक्स फ़िल्मी,

यह सोच-सोच कर मर जाने वाला विधायक ,

यह एक दल से दूजे दल जानेवाला विधायक !

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात,

मैं बेचता-खरीदता ही तो रहता दूँ दिन-रात,

 तरह-तरह के हैं स्टॉक में विधायक

गोदाम से और मँगवाता हूँ विधायक 

जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं विधायक!

जी बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ,

गाहक की मर्ज़ी, अच्छा जाता हूँ;

या भीतर जाकर पूछ आइए आप,

है विधायक बेचना वैसे बिल्कुल पाप,

क्या करूँ मगर लाचार

जब वो खुद ही हैं बिकने को तैयार

हार कर विधायक बेचता हूँ!

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

व्यंग्य : एक आँख से अंधाधुंध

  

      किसी भी प्रदेश का नाम बिगाड़ना नहीं चाहिए। उत्तर प्रदेश का नाम अंग्रेजों के टाइम में यूनाइटेड प्राॅविन्स था। बाद में हमारी अपनी भारत सरकार ने इसका नाम उत्तर प्रदेश कर दिया। उत्तर में है तो उत्तर प्रदेश। जनसंख्या तो तब भी सार्वाधिक रही होगी। अतः उत्तर प्रदेश वालों को भी पता रहा होगा प्रश्न चाहे कोई हो उत्तर हमारे ही पास है। कितने ही प्राइम मिनिस्टर, शायर, कवि, ताज महल। बड़े-बड़े पागलखाने उत्तर प्रदेश की ही देन है। कहते हैं कि अगर आप प्यार में सफल हो जाते हैं तो आपके लिए ताजमहल है और अगर असफल हो जाते हैं तो घबराएँ नहीं आपके लिए पागलखाना आगरा में ही खिदमत में हाजिर है। यू.पी. को यूं कहने वाले उल्टा प्रदेश भी कहते हैं। लेटेस्ट टीचर्स के लिए एक पात्रता परीक्षा 2026 का आयोजन किया गया। इस प्रश्नपत्र में एक प्रश्न था 'एक आँख से देखना' का अर्थ क्या होता है। इसके लिए मल्टीपल उत्तर दिये गए थे यथा सभी को एक समान दृष्टि से देखना/व्यवहार करना। दूसरा विकल्प था अंधाधुंध करना आदि आदि। अब अभी तक जो हमने पढ़ा-समझा था उसके अनुसार उत्तर बनता है समान दृष्टि से देखना/व्यवहार करना। किन्तु जब आयोग ने उत्तर कुंजी जारी की तो उसमें सही उत्तर  अंधाधुंध करना बताया गया। अब परीक्षार्थियों में इसे लेकर बेहद रोष है क्यों कि उन्होने भी यही समझा था कि सही उत्तर है एक समान व्यवहार करना। इस आँख ने और भी कहर ढाये हैं। एक बच्चे ने मम्मी को बताया “मम्मी ! पापा आंटियों से बहुत डरते हैं उन्हें देख कर अपनी एक आँख बंद कर लेते हैं”

 

दरअसल, ये नयी पीढ़ी अभी तक समझी ही  नहीं। भाई लोग अब आज के युग में इस का अर्थ अंधाधुंध करना ही है। ये जो अंधेरगर्दी चल रही है ये आपको दिखती नहीं है या आप जानबूझ कर एक आँख क्या दोनों आँखें बंद कर असलियत से दूर हैं। भाई लोग गांठ बांध लें अब एक आँख से देखने का अर्थ अंधाधुंध करना ही है। आप एक आँख की कह रहे हो मैं कहता हूँ एक क्या दोनों आँखों का अर्थ भी आजकल अंधाधुंध करना है। क्या कर लोगे तुम ? खामोश ! नहीं तो अभी दस साल के लिए डिबार कर देंगे तब समझ लगेगी। देखो! शब्द अपने अर्थ, देश-काल अनुसार अदलते-बदलते रहते हैं। जब होता होगा तब होता होगा कि गुरु आदर का सम्बोधन था, अब नहीं। अब किसी को गुरु कहना ऐसे कहना है जैसे वह कोई महा मक्कार, धूर्त व्यक्ति है बोले तो गुरुघंटाल। किसी की अच्छी मरम्मत करना और बुरी तरह पीटना, एक ही बात है। यानि की बुरी तरह कुटाई करना और अच्छी तरह धुनाई करना एक ही हो गया। ये ही क्या और ऐसी बहुत सी कहावतें और मुहावरे निकल आएंगे जिनको आज के संदर्भ में देखना और उनके अर्थ में तब्दीली करना जरूरी है। , मसलन एक मुहावरा था नेकी कर कुएं में डाल। अब कुएं नहीं हैं अतः लोग नेकी भी नहीं करते। नेकी कर कहाँ कुआं ढूंढते फिरेंगे? अतः या तो नेकी नहीं करते या नेकी इतनी सूक्ष्म करते हैं जिसे फ्लश किया जा सके। अतः नया मुहावरा है नेकी कर जूते खा। क्यों कि जिसके साथ आप नेकी कर रहे हैं वह आपको मुंह पर कुछ भी कहे, समझता आपको बुड़बक ही है। घर आए मेहमान को भगवान का रूप समझिए।  ‘होम स्टे’ के इस  जमाने में पता नहीं आप किस जमाने में जी रहे हैं। झूठ बोलने पर कान पक जाते हैं।  शेक्सपियर बहुत पहले कह गए थे 'नथिंग इज़ गुड और बेड थिंकिंग मेक्स इट सो'। अतः जो आयोग ने उत्तर प्रदेश में जो उत्तर दिया है उसी को पत्थर की लकीर समझिए। नहीं तो एक क्या दो आँखों से भी अंधाधुंध करने-करवाने के लिए तैयार रहें। इस पर जरा दोनों आँखें बंद कर सोचिए !