Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Monday, August 24, 2026

व्यंग्य: पुलिस प्लीज़ और थैंक यू


    खबर ये है कि पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वह प्लीज़ और थैंक यू बोला करे। बार-बार बोला करे। हर बार बोला करे। हमारे स्कूल में एक पाठ हुआ करता था 'ऑन सेयिंग प्लीज़' इस पाठ में प्लीज़ कहने के फायदे और प्रभाव बताए गए थे। कहते हैं कि जनता बहुत सहमी-सहमी और डरी हुई है कि ये क्या नया स्यापा है। बिना प्लीज़ और थैंक यू कहे  पुलिस का प्रेम हमने जंतर मंतर पर देखा है। हम सोच रहे हैं कि पुलिस अब डंडा मारते वक़्त कहेगी "प्लीज़ सिर्फ चार डंडे मारने दो तुम जंतर-मंतर  क्या अपना नाम तक भूल जाओगे" थैंक यू कहते-कहते दो डंडे मार ही तो दिये। यूं तो एक कोई फिल्म थी जिसमें में छोरी छोरे ने कही थी “प्यार में ना  सॉरी न  थैंक यू” पर तू मन्ने ये बता मेरे से कसम ले ले प्यार तो दूर मैं तो तन्ने जानू भी नहीं। अब तन्ने प्यार व्यार हो तो तेरी तू जाने मन्ने बैरा कोई नहीं। । सो थैंक यू और प्लीज़ ने तो किनारे राख़ दे और मेरी बात कान खोल के सुन।


     फर्ज़ करो आप सड़क पर खड़े हो और एक विद्वान विनम्र शीलवान पुलिस का सज्जन पुरुष जिसके नेम प्लेट नहीं लगी है वह आपके पास आता है। वह 'फाइबर' का डंडा आपके पृष्ठ भाग में  लगभग ठेलता हुआ पूछता है "प्लीज़ बताओ! तुम यहाँ क्यों आए हो? क्यों खड़े हो? तू कहीं कोई चोरी-डकैती की प्लानिंग तो नहीं कर रहा? अगर कर रहा है तो प्लीज़ मुझे बताओ! मैं तन्नै ढेर सा थैंक यू, प्लीज़ दे दूंगा। जितना तू कहै।  प्लीज़ अगर तुम नहीं बताओगे तो सोच लो! मैंने अपने लट्ठ में आज  तेल भी लगाया है। प्लीज़ इससे पहले कि मैं अपनी पैलट गन निकालूँ और तेरे दीदे फोड़ दूँ यहाँ से प्लीज़ तिड़ी हो जा। जंतर-मन्तर क्या? दिल्ली में भी कहीं प्लीज़ दिख मत जाना। नहीं तो प्लीज़ मुझे खुद नहीं मालूम मैं क्या कर बैठूँ। थैंक यू। इसलिए मुझ पर दया करो और मुझे प्लीज़ मजबूर मत करो कि मैं मारते-मारते तेरा भुरकस निकाल दूँ। प्लीज़ बात की नज़ाकत को समझा करो। ऐं रे तू तो पढ़ा लिखा सा लागे है? फेर यहाँ के कर रहा सै? घर जा! और कतई निकड़ियो मत ना। तू निकड़ा तो सोच ले प्लीज़ ये तेरी अंतिम यात्रा ही न बन जाये। थोड़े कहे को बहुत समझियो प्लीज़। नहीं तो मैं नहीं जानता हाँ! प्लीज़ समझा कर! या कि लगाऊँ चार डंडे ? फर्ज़ करो कहीं चौराहे का सीन है। आप अपनी मस्ती में चले जा रहे हैं। बाइक पर हेलमट बस सिर पर टोकरी की तरह रखा भर है। दिल्ली पुलिस के सज्जन हवलदार ने आपको रोक लेना है जो आपको पेड़ की आड़ की वजह से दिखा ही नहीं था। प्लीज़ अपना हेलमट कस कर बाँधिए प्लीज़। मन ही मन वह 'फाइन' की रकम और इसके एवज में फाइन को निरस्त करने की रकम जोड़ता जा रहा है। आप तेज़ चला रहे थे। बाइक के कागजात, आर. सी., पाॅल्यूशन दिखाएँ। पेट्रोल कौन सा डलवाते हैं ? जो इतना तेज़ दौड़ाए लिए जाते हो। बता दो प्लीज़ हम भी अपनी गाड़ी में डलवाएंगे। ससुरा हर जगह लेट ही पहुँचते हैं। थैंक यू। प्लीज़ बता दो। और आप कुछ बोलें तब तक दो डंडे आपके रसीद हो चुके होते हों। अब आपकी घिग्घी बंध जाना स्वाभाविक है। प्लीज़ तनिक इतै कू मर ले। थैंक यू। साइड हो जा प्लीज़ बावड़ी बूच। कै मेरी नौकरी ही खाएगा प्लीज़। प्लीज़ तनै मैं थाने ले गया तो नू बैठा ले अपने दिमाग में कि मैंने तैने खूब ही सूतना है। आई बात समझ में प्लीज़। आयी की ना? आ गई हो तो थैंक यू।


अब पुलिस आपको पीटेगी भी और प्लीज़ और थैंक यू भी बोलेगी। क्या सीन रहेगा। प्लीज़ आपके तो खून ही आ गया। प्लीज़ ये खून तो बंद ही नहीं हो रहा। प्लीज़ आप हमारे साथ चलें। थैंक यू! हमें आपको प्लीज़ हवालात में रखना पड़ेगा। हम आपको यूं खुल्ला नहीं छोड़ सकते प्लीज़। आखिर हमारा भी नागरिकों के प्रति कोई कर्तव्य है। थैंक यू। हमें अपना कर्तव्य निभाने दें नहीं तो आपने ही कहते फिरना है पुलिस अपनी ड्यूटी नहीं करती। यह कहते-कहते दो डंडे और मार ही तो दिये। मेरा प्लीज़ और थैंक यू आप तक पंहुचे। स्वीकार करें या भेजूं दो हवलदार तेरे घर? भय बिनु प्रीत नाहिं गोसाईं।  

 

  

व्यंग्य : विद्यार्थी और हेयर स्टाइल


    पता नहीं क्यों हमारे बाप-दादा के ज़माने से ये मिथक चला आ रहा है कि पढ़ने वाले बच्चों को बड़े बाल नहीं रखने चाहिए। उनको या तो गंजे सिर रहना चाहिए या फिर बहुत छोटे-छोटे महीन बाल रखने चाहिए। जिसे मिलिटरी भाषा में क्रू-कट कहते हैं। कई लोग इसे क्रू-कट कहने के बजाय कटोरा-कट भी कहते थे। बेसिकली इसमें कैंची का कोई काम नहीं होता था। सब काम या तो उस्तरा या फिर मशीन से लिया जाता है। पहले भले बाल कम होते थे मगर बालों में तेल जरूर लगाया जाता था। वो भी कोई फ़ैन्सी खुशबू वाला तेल नहीं बल्कि सरसों का तेल जिसे पता नहीं क्यों कड़वा तेल कहा जाता था। कहीं कहीं गोले (नारियल) के तेल का भी रिवाज हुआ करता था।

 

    हद तो तब थी जब पिताश्री नाई का फुल-फुल मार्गदर्शन करते नज़र आते थे। “यहाँ से और हल्के करो” “इधर रह गए, इनको काटो”  ज़ोर इस बात पर होता था कि माथे को ‘हेयर-फ्री’ रखा जाये। मुझे लगता है पेरेंट्स को ये डर हुआ करता होगा कि बड़े बाल का अर्थ है वक़्त की कितनी बरबादी होगी। कंघी ‘बैक-पॉकेट’ में रखनी होती थी और थोड़ी थोड़ देर में उसे स्टाइल से निकाल कर बालो में फिराना  होता था। पिताश्री को बैक-पॉकेट से ही नफरत जैसी रहती थी। जब हिप्पी फैशन आया जिसमें लंबे लंबे आइंस्टाइन टाइप बोलो, सुमित्रानंदन पंत टाइप बोलो, बाल रखने का रिवाज चल निकला तो इससे सैलून के बिजनिस पर बड़ा खराब असर हो चला था। इसका तोड़ ये निकाला कि सैलून वालों ने अपने रेट खूब बढ़ा दिये। एक बार अपने पिताश्री के बार-बार टोकने पर मैंने भी ये बदतमीजी की थी।  सिर पर मशीन चलवा ली और दीदादिलेरी से उनसे ही पूछने लगा “अब ठीक है?”  आज इस ‘लिव इन’ के दौर में सोचता हूँ कि लंबे बालों और पढ़ाई की क्या ही रिलेशनशिप।

 

    बहरहाल नेपाल में, जो है सो, जेन-जी ने जो तूफान लाया वो अब स्कूल कॉलेज तक आन पहुंचा है और स्कूल ऑथारिटीज को हिदायत दे दी गयी है कि वो बच्चों को बालों को लेकर कुछ न कहें। बोले तो इस टिक-टाक के दौर में उनसे कोई टोका-टाकी न करें। मैं समझ सकता हूँ टीचर लोग कैसे कैंची लेकर बच्चों के पीछे पड़े रहते होंगे। बच्चे आगे-आगे टीचर कैंची से लैस पीछे-पीछे। टीचर लोग भी न, अपने को समाज सुधारक ही समझने लग पड़ते हैं। इससे उनके अहं को बहुत शांति मिलती शांति मिलती होगी। जहां मौका लगे, जुट जाते हैं अपना रुतबा जमाने। स्कूल के दिनों में एक ट्यूटर महाशय अपने ट्यूशन के ग्राहक बढ़ाने को मेरे पिता के सामने मुझसे बोले कि मैं उनके इस वाक्य का अनुवाद करूँ “क्या बच्चे अभी तक वहीं खेल नहीं रहे होंगे?” आजतक मैं इतना बड़ा हो गया इस सेंटेन्स को बोलने का ज़िंदगी में मौका नहीं आया।   

व्यंग्य: सवाल नहीं हल भी दें

 

                                 

नेता जी ने अपनी एक जनसभा में बहुत अच्छी बात कही है।  सिर्फ सवाल ही न उठाएँ, उन सवालों के जवाब भी बताएं। यानि कि आप न केवल समस्या बताएं उसका हल देना भी आपकी जिम्मेवारी है। मसलन आपका सवाल है “साब मेरी रोज़ी-रोटी का क्या होगा ?” अब आपको, इसे सवाल कहो, समस्या कहो, का हल भी देना है, अर्थात उत्तर भी देना है। जैसे मुझे रोज़ी की समस्या है! तो आप ये भी तो बताओ आप आय का साधन ढूंढ रहे हो, उदहारण के तौर पर या तो आप कोई काम ढूंढ रहे हो या नौकरी ढूंढ रहे हो। अतः दूसरे शब्दों में आपको अपनी समस्या का हल पता है, अपने प्रश्न का उत्तर मालूम है। रोटी की समस्या है, भोजन का प्रश्न है तो आपने कहा आपको रोज़ी-रोटी चाहिए बोले तो आपने खुद ही उसका हल भी बता दिया। रोज़ी होगी तो रोटी का प्रबंध भी हो गया समझो। प्रॉबलम तब है कि आपको अपनी समस्या तो मालूम है आपको अपने प्रश्न तो याद हैं मगर सवालों के जवाब, समस्या के हल के बारे में कोई क्लू नहीं है। आपको खुद तो पता है नहीं आप सरकार से उम्मीद करते हो कि सरकार अंतर्यामी हो जाये और आपके घट-घट की बात जाने। 

 

अतः आज से, बल्कि तुरंत प्रभाव से कोई भी अगर कोई समस्या बताता है।  प्रश्न करता है तो यह भी उसकी जिम्मेवारी होगी कि वह उस समस्या का निदान भी बताए। अब से ऐसी कोई समस्या को एंटरटेन ही नहीं किया जाएगा जिसमें साथ में उत्तर/हल न हो। आप बीमार हैं तो उसका इलाज़ भी आपसे बेहतर कौन जानेगा। आपको बारिश में  भीग जाने से ठंड लग गयी है। तो आप ही इसका हल भी जानते हैं।  गरम-गरम चाय लीजिये। कंबल ओढ़िए। गरम-गरम सूप पीजिए। फिर भी ठंड लगना जारी रहे तो ब्रांडी का सेवन करें। इसी साइकिल को रिपीट करते रहें जब तक आपकी ठंड दूर न हो जाये या फिर ब्रांडी पी-पी कर आपको नशा न हो जाये और आप सो न जाएँ। उठने के बाद फिर इसी साइकिल को रिपीट करें। देखिये कैसे आप दो-चार दिन में एकदम भले चंगे होकर दुबारा भीगने को तैयार हो जाएँगे। एक कहावत है ‘अगर आप ड्रिंक करते हो तो आपको नशा होता है, आपको नशा होता है तो आप सो जाते हो, आप सो जाते हो तो पाप नहीं कर पाते हो और जो पाप नहीं करते वे स्वर्ग जाते हैं । अतः ड्रिंक करो और स्वर्ग जाओ। 

 

पता आपको सब है बस आप को सरकार से सवाल कर के सरकार को असहज करने की आदत पड़ गयी है। अब ऐसे नहीं चलेगा।  आपको खुद ही हल भी बताना पड़ेगा। आप वो गाना नहीं सुने हैं “तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना... ग़रीब जानकर दिल से न भुला देना” देखिये हमने तो भुलाया नहीं बल्कि आपकी समस्या को सिम्प्लीफाई करने को, आपकी समस्याओं के हल खोजने को कितनी  ‘आर एंड डी’ सतत करते रहते हैं। समझो कोई परीक्षा का पेपर लीक हो गया है तो उसका उत्तर/हल भी तो आपने ही देना है। जैसे कि इस एक्ज़ाम को दुबारा लिया जाये। जब ये परीक्षा देनी होगी, तो भी तो दोगे तो आप ही। अतः आप देश के ज़िम्मेवार नागरिक होने के प्रमाण दें और आगे से जब भी कोई समस्या/कोई प्रश्न आप उठाएँ बी श्योर कि आप हल, उत्तर, जवाब भी दे रहे हैं और हाँ जवाब, जवाब जैसा दीजिये। ना कि  कोई फेंटास्टिक जवाब देने लग जाएँ। अब कोई मंगल ग्रह से एलियन तो आयेगा नहीं आप में से ही किसी न किसी को हल करने वाली टीम में     लगाया जाएगा। अब अगर वो भी कमबख्त पहले वालों जैसा निकल गया तो इसका क्या हल है? बताओ? नहीं... नहीं आप तो बताओ? आप ऐसे भाग नहीं सकते। दुष्यंत कुमार तक ने कहा:

 

          “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

           मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए”      

 

 देखिये हमें पता है इसीलिए हम तस्वीर अदलते-बदलते रहते हैं।  शुक्रवार के शुक्रवार फिल्म बदल देते हैं । ओ टी टी प्लेटफॉर्म पर नयी-नयी  सीरिज लाते हैं ताकि तस्वीर मुसलसल बदलती रहे। अब और क्या बच्चे की जान लोगे?

 

Sunday, August 9, 2026

व्यंग्य: ए फॉर अमरुद ....

  

एक बाबा जी ने ऐलान किया है कि ‘ए’ फॉर एपल एक विदेशी अवधारणा है। हम भारतीयों को ‘ए’ फॉर एपल नहीं बल्कि ‘ए’ फॉर अमरूद पढ़ाया जाना चाहिए। मुझे यह बहुत पसंद आया। सच है हमको ये अल्फ़ाबेट दोबारा से लिखने का वक़्त आ गया है। पूरी की पूरी बारहखड़ी दुबारा लिखने का वक़्त आ गया है। पहले कभी जोक के तौर पर सुना था ‘ए’ से एपल। ‘बी’ से बड़ा एपल। ‘सी’ से छोटा एपल ‘डी’ से दो एपल ‘ई’ से एक और एपल ‘एफ’ से फिर एक एपल, ‘जी’ से गला हुआ एपल .... हम उस पीढ़ी के हैं जिसमें ज से जवाहरलाल पढ़ा है। अब मुझे लगता है कि नयी बारहखड़ी होनी चाहिए:

 

ए’ से अमरूद।  ‘बी’ से बेर, बेल पत्थर, बैंगन, बंद गोभी, भिंडी, बथुआ। ‘सी’ से कमरख, केला, चीकू। ‘डी’ से दम आलू। ‘ई’ से ईख। ‘एफ’ से फालसे। ‘जी’ से गाजर, गूलर फल, गन्ना, गोभी, ग्वार की फली। ‘एच’ से हरी मिर्च, हरा धनिया। ‘आई’ से इमली।  ‘जे’ से जामुन, जंगल जलेबी, जिमीकंद। ‘के’ से करोंदा, कंदमूल, कटहल, कीनू ,करेला, कद्दू , करी पत्ता, कमल ककड़ी।  ‘एल’ से लीची, लाल मिर्च, लौकी, लहसुन। ‘एम’ से मूली,  मौसम्बी, मेथी,  मटर। ‘एन’ से नारियल, नींबू, ‘पी’ से पपीता, प्याज, पत्ता गोभी, परवल, पालक,  पुदीना।  ‘आर’ से रामफल, रसभरी। ‘एस’ से शहतूत, शकरकंद, सहजन, संतरा, शरीफा, सिंघाड़ा, शिमला मिर्च, सरसों का साग, शकरकंदी। ‘टी’ से टमाटर, तरबूज, तोरई, टिंडा आदि।

 

अब जब हम इस टॉपिक पर हैं ही तो लगे हाथ सिलेबस के अन्य चैप्टर भी रिवाइज़ कर डाले जाएँ। मसलन सभी इंगलिश की कवितायें जो बच्चों को सिखाई जाती हैं। सब या तो झूठ सिखाती हैं या सेलफिश होना या बस खिलखिला कर हँसना। ज़िंदगी के संजीदा पहलुओं पर इन ‘पोयम्स’ से कोई मदद नहीं मिलती है। हमारे पास कविताओं, श्लोक, दोहों, चौपाइयों की कोई कमी नहीं है। एक कमेटी का गठन किया जाए। कमेटी बढ़िया-बढ़िया चौपाई छांट सकती है, ताकि हमारी भावी पीढ़ी संस्कारी बन सके।

 

इसी तरह ये जितने भी विदेशी लेखकों की कहानियाँ और उपन्यास नाटक पढ़ाये जाते हैं सब के सब तुरंत प्रभाव से बंद किए जाने चाहिए। क्या ज़रूरत है हमें ये सब शेक्सपियर, टाॅलस्टाॅय, चार्ल्स डिकन्स, मार्क ट्वेन पढ़ने-पढ़ाने की। हम ये पढ़-पढ़ कर ही अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। यूं देखा जाये तो एक बात बताओ पढ़ने की दरकार क्या है? बशीर बद्र साब का एक शेर है:

 

          जी बहुत चाहता है सच बोलें क्या करें हौसला नहीं होता

          रात का इंतिज़ार कौन करे, आज-कल दिन में क्या नहीं होता

 

बस कुछ इसी तर्ज़ पर हमारे दौर का तर्जुमा है:

 

         जी बहुत चाहता है पढ़ें-लिखें, क्या करें हौंसला नहीं होता

        डिग्री का इंतिज़ार कौन करे, आज-कल बिन डिग्री क्या नहीं होता

Thursday, August 6, 2026

व्यंग्य : हे बॉस ! डांटना आपका मूल अधिकार है (बी-20)

 

 

मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'बड़े भाई साहब' में बड़े भाई साहब को यह नैसर्गिक अधिकार प्राप्त है कि वह छोटे भाई को जब-तब, बोले तो जब चाहे, डांट सके। चाहे छोटा भाई कितना ही अच्छा कर रहा हो। कहावत है कि यदि आप अपने अधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं तो वह अधिकार 'डिसयूज़' में जाते-जाते समाप्त प्राय: हो जाता है। राजस्थान में इसे  ‘दम देना’ कहा जाता है।  कहीं-कहीं इसे 'फायरिंग करना' भी कहा जाता है।

फर्ज़ करो आप बॉस हैं और आपके मातहत एक रामलाल नामक कर्मचारी काम करता है। वह ठीक-ठाक है। मगर आप  गौर से देखेंगे तो उसमें कोई न कोई कमी ज़रूर ढूंढ लेंगे। मुझे आपकी इस प्रतिभा पर पूरा भरोसा है। आप भी अपने ऊपर भरोसा रखें। राम लाल को डांटने के निम्नलिखित ग्राउंड्स हो सकते हैं:

1. वह दफ्तर लेट आता है: भई तुम्हें पता है दफ्तर कितने बजे का है? तुम्हारे पास घड़ी है ? और अगर है तो क्या वह सही समय देती है? क्या तुम्हारी घड़ी किसी और देश का टाइम बताती है। एक तुम्हें छोड़ कर पूरा दफ्तर समय पर आ जाता है  तुम कोई निराली सवारी में आते हो ?  इसी शहर से आते हो या किसी और दूसरे शहर से आते हो? मैं तो परेशान आ गया हूँ तुम्हारी इस आदत से।

2. वह दफ्तर टाइम से पहले अर्थात जल्दी आता है: क्या बात है तुम नहा-धो कर दफ्तर आते हो न? सुबह- सुबह मुंह उठाए दफ्तर चले आते हो। तुम्हें नींद ठीक से आती है न? तुम इतनी जल्दी आकर क्या फाइलें उलट-पुलट करते रहते हो?कहीं हमारे दफ़्तर की खबर हमारी 'राइवल' कंपनी  को तो नहीं देते ? इतनी जल्दी आने का क्या मतलब है? मुझे तो तुम पर शक़ पड़ने लगा है।

3. वह टाइम पर आता है: भई ऐसे टाइम पर आने का क्या ही फायदा ? यहां कोई गिनेस बुक का रिकॉर्ड नहीं बन रहा है। आदमी काम का पक्का होना चाहिए। सिर्फ एक टाइम पर आ जाना ही सबकुछ नहीं होता। यूं टाइम पर आना अच्छी बात है मगर काम में 'एफ़िशियेन्सी' होनी चाहिए। काम को प्राथमिकता के आधार पर करने की समझ होनी चाहिए। आई एम नाॅट हैपी विद यू (बीच बीच में अंग्रेज़ी बोलने से प्रभाव पड़ता है। अगला कन्फ्यूज़ रहता है कि जवाब हिन्दी में दे या अंग्रेज़ी में)

4. वह जल्दी चला जाता है: क्या भई तुम्हें अभी तक ये ही पता नहीं चला कि दफ्तर भले छह बजे तक का है मगर सब साढ़े छह जाते हैं। वे पागल नहीं हैं। अपनी सब फाइलें अलमारी में रख कर, अपनी टेबल तरतीब से लगा कर और कल की ‘टू डू लिस्ट’ बना कर ही जाते हैं। एक तुम हो इतने 'कैज्युल'! बस जाने की पड़ी रहती है। तुम्हारी नज़र काम पर कम घड़ी पर ज्यादा रहती है। कब छह बजें और भागें। भई हमारे भी बीवी बच्चे हैं। हम अनाथ नहीं हैं।

5. वह ऑफिस से लेट जाता है: क्या भाई तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? घर में कोई लड़ाई-वड़ाई चल रही है क्या? क्यों इतनी देर तक बैठे रहते हो? काम तो क्या ही करते होगे। बेकार ऑफिस की पंखा/लाइट/ए.सी. चलता रहता है। बेचारे प्यून भी तुम्हारी वजह से बैठे रहते हैं। अपने काम को ऑफिस-टाइम में खत्म करने की आदत डालो। अपनी 'प्रोडक्टविटी' बढ़ाओ। ऐसे नहीं चलेगा। टाइम से आओ टाइम से जाओ। कल को बीमार-शीमार हो गए तो सोचा है कभी काम का कितना हर्जा होगा?

6. वह टाइम से जाता है:  भई ये क्या ? मैंने सुना है तुम "छहई" बजे चले जाते हो (ये डायलाॅग एक बार मुझे अपने बॉस से सुनना पड़ा था) अगर ऐसा है तो हमें तुम्हारी पोस्ट के लिए कोई और आदमी ढूँढना होगा। तुम्हें तो आते ही बस भागने की पड़ी रहती है। कब छह बजें और मैं भागूँ। लगता है तुम्हारा काम में मन-वन नहीं लगता। 

7. वह हमेशा टार्गेट पूरा करता है: भई ये क्या ? (इससे वो कनफ्यूज़ होगा) ये अच्छी बात है तुम अपना टार्गेट पूरा करते हो। मगर ऐसे तुम कोई अनोखे नहीं हो। तुमसे पहले भी और तुम्हारे बाद भी बहुत लोग टार्गेट पूरा करेंगे। बात होती है आदमी कितना मिलनसार है। कितना सहयोग करता है। उसमें कितना सहकार है। तुमने सुना नहीं 'ऑल वर्क नो प्ले मेक्स जैक ए डल बॉय'

8. वह टार्गेट पूरा नहीं कर पता: एक टार्गेट तो तुमसे पूरा होता नहीं। क्या ही तारे तोड़ोगे तुम। तुम्हें तो बस कोई काम बता दो और निश्चिंत हो जाओ कि ये काम कभी टाइम पर पूरा होगा ही नहीं। तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है? क्या तुम्हें वेतन काम करने का मिलता है या काम न करने का या फिर घिसट-घिसट कर करने का मिलता है। मुझे शर्म आने लग पड़ी है। एक तुम हो न जाने कौन सी मिट्टी के बने हो। काम में मन लगाओ नहीं तो 'आई एम एफ्रेड मुझे तुम्हें इस दफ्तर से ट्रांसफर करने के लिए कहना पड़ेगा। 'आई एम फीलिंग बैड एवरी टाइम आई हैव टू टैल यू सच ए सिंपल थिंग'

9. वह टार्गेट से ज्यादा काम करता है: भई रिलेक्स! मुझे लगता है तुम मेरी नौकरी खा जाओगे। इतनी जल्दी जल्दी काम करने को तुमसे किसने कहा? अब क्या करोगे? बस हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहोगे। जब तक अगला असाइनमेंट नहीं आता। भई हर दफ्तर, हर काम की एक स्पीड होती है। तुम भारत में हो। अमरीका में नहीं। मैं नहीं चाहता कि तुम अपना काम तो सबसे पहले खत्म कर लो और फिर दूसरों को डिस्टर्ब करो उन्हें काम न करने दो। 

10. वह लंच में गायब हो जाता है: भाई कहाँ गायब हो जाते हो? तुम्हारी ज़रूरत थी। पूरा दफ्तर यहीं बैठ कर लंच करता है एक सिवाय तुम्हारे। तुम क्या किसी फाइव स्टार में लंच को जाते हो ?  ऐसे रोज़ रोज़ बाहर का खाना कोई अच्छी बात नहीं। तुम्हारी कभी भी ज़रूरत इमरजेंसी में पड़ सकती है। आसपास ही रहा करो प्लीज़। आई होप यू अंडरस्टेंड 

11. वह लंच करता ही नहीं:  ये क्या ? मैंने सुना है तुम लंच ही नहीं करते। तुम्हारी हैल्थ ठीक है? लास्ट एक्ज्युकिटिव हैल्थ चैक-अप कब कराया था तुमने ? क्या तुम घर से लंच करके आते हो ? लगता तो नहीं। भाई ऐसे अपनी हेल्थ नेगलेक्ट करोगे तो बीमार हो जाओगे अपना नहीं तो हमारा, हमारे दफ्तर का कुछ  ख्याल करो। अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ ? वी नीड यू मैन! लुक आफ्टर योरसेल्फ। 

12. वह लंच में सोता है: वाट इज़ दिस ? तुम दफ्तर क्या सोने 2. *वह लंच में सोता है* वाट इज़ दिस ? तुम दफ्तर क्या सोने के लिए आते हो? मैंने तो आजतक कोई नहीं देखा जो दफ्तर में सोता हो। इससे ऑफिस का एट्माॅस्फियर खराब होता है। किसी अच्छे डॉ. को दिखाओ और अपनी नींद घर में ही पूरी करके आया करो तुम्हें छुट्टी चाहिए मैं दे दूंगा बट इन फ्यूचर नो मोर स्लीपिंग इन ऑफिस।

13. वह इण्ट्रोवर्ट /एक्स्ट्रोवर्ट है:  भाई ये क्या मनहूस सूरात बनाए फिरते रहते हो? किसी से हंसना नहीं बोलचाल नहीं।, बस घुन्ने की तरह सब को देखते रहते हो। 'ऑफिस वर्क इज़ टीम वर्क' कल को तुम भी बॉस बनोगे। अपने टीम को साथ रखो (कैरी योर टीम ) ये रोनी सूरत मैं कल से नहीं देखूँ। _अगर एक्स्ट्रोवर्ट_ है: भाई ये क्या सारा दिन हा-हा, ही-ही करते रहते हो। ये कोई अच्छी आदत नहीं सबके फटे में टांग अड़ाते फिरते हो। लोगों की पर्सनल लाइफ भी कोई चीज़ होती है। ये सबके घर में घुसने की  तुमको क्या पड़ी है फलां कैसे हैं ? बच्चे कैसे है? प्लीज़! पीपुल नीड देयर पर्सनल स्पेस। प्रिवेसी भी कोई चीज होती है (प्राइवेसी मत बोलना, आजकल 'प्रिवेसी' ट्रेंड कर रहा है)

14. वह हरदम हँसता रहता है:  क्या भाई ये हरदम ऑफिस में जोक-वोक चलते रहते हैं क्या? पूरे ऑफिस में बस तुम्हारे हँसने की आवाज आती रहती है। ऑफिस में थोड़ा सीरियस होना सीखो। ऑफिस आए हो पिकनिक पर नहीं। इससे बाकी स्टाफ पर बुरा असर पड़ता है। वे काम को सीरियसली नहीं लेते। 'यू आर ए बैड इनफ्लुएंस ऑन दैम'

15. वह हरदम रोनी सूरत बनाए रखता है: भाई ये मुंह लटकाए क्यूँ घूमते रहते हो ? कौन सा ग़म है जो तुम्हें खाये जा रहा है? दफ्तर आए हो किसी ग़मी में नहीं। मैं ये नहीं कहता कि खिलखिलाते फिरो पर स्माइल तो कर लिया करो। तुमने सुना नहीं 'फेस इज़ दि इंडेक्स ऑफ माइंड' स्माइल से एक पॉज़िटिव फील आता है। पूरे दफ्तर में एक पॉज़िटिव एनर्जी का एटमाॅसफियर रहता है।  

16. वह ऑफिस के आउटडोर प्रोग्राम से कन्नी काटता है:  क्या भाई ? तुम तो जरा भी सोशल नहीं हो। मैंने जब सुना मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ पर अब जब तुम ऑफिस के प्रोग्राम में नहीं आए तो पता चला कि लोग तुम्हारे बारे में ठीक ही कहते हैं। भाई ठीक है तुम्हारी कोई प्रॉब्लम हो सकती है, हम सबकी प्रॉब्लम होती हैं। तुम्हें क्या लगता है हमारी कोई प्रॉब्लम नहीं। आखिर हम फिर भी ऑफिस के सोशल प्रोग्राम में आते-जाते हैं ना कि तुम्हारी तरह चिल्ला खींच कर बैठ जाएँ। इससे अपनी टीम को अच्छे से जानने का मौका मिलता है। कालान्तर में 'स्वैट एनालिसिस' में हेल्प मिलती है। तुम्हारे स्ट्रॉंग और वीक पॉइंट मैनेजमेंट को पता रहते हैं। 'फाॅरेन असाइनमेंट' भी यही सब देख कर दिये जाते हैं जब तुमसे इसी शहर में  कहीं आया-जाया नहीं जाता तो फाॅरेन क्या खाक जाओगे। 

17. वह ऑफिस के सभी आउटडोर प्रोग्राम में आता है:  क्या भाई तुम्हारा कोई घर-बार है भी या नहीं? जब देखो, जिस प्रोग्राम में देखो कोई हो न हो तुम जरूर होते हो...एक ही 'वेला' आदमी है। देखो हर बार हर जगह जाने की ज़रूरत नहीं होती। लोग बुलाते हैं का मतलब ये नहीं होता कि जाना कंपलसरी है। 

18. वह छुट्टी नहीं लेता: क्या भाई ? कहीं तुम बीमार न पड़ जाना मुझे तो डर ही लगा रहता है। सुना है बुखार हो, सिर दर्द हो तुम ऑफिस चले आते हो।  ये ऑफिस है हैल्थ यूनिट नहीं। अंग्रेजों ने छुट्टी चलाई इसलिए थी कि माइंड को रिलेक्सेशन मिले। हम सब आदमी हैं। मशीन नहीं। हम सबको रैस्ट की ज़रूरत होती है। आगे से ये सुपरमैन बनने की कोई ज़रूरत नहीं। जब लगे जिस्म साथ नहीं दे रहा है तो छुट्टी लें।  भूल गए ! आदमी एक 'सोशल एनिमल' है। तुम्हारी भी कोई सोशल लाइफ है या नहीं? घर में बाल- बच्चे भी कहते होंगे कैसे पापा हैं ? हमारे लिए इनके पास टाइम ही नहीं। 

19. वह बहुत छुट्टी लेता है:  क्या भाई मुझे तो लगता है तुम को नौकरी की क्या ज़रूरत है? जब देखो तब छुट्टी। जब तुम्हारी ज़रूरत हो मजाल है जो तुम ऑफिस में हो। पता चलता है हुज़ूर छुट्टी पर हैं। अब रोजी-रोटी को इतने केज्युल भी मत लो। नौकरी है ये। एक बार छूट गई तो दूसरी इस उम्र में मिलनी भी नहीं। देखा नहीं बाहर क्या हाल चल रहा है। अब नौकरी मिली है तो उसकी इज्ज़त करना सीखो। प्लीज़ छुट्टी मिलती है का मतलब ये नहीं होता कि छुट्टी लेनी भी है। तुम्हारी छुट्टी है कोई और नहीं लेके भागा जा रहा तुम्हारे खाते में ही रहेगी। 

20. वह वेतन बढ़ाने की मांग करता/नहीं करता है: एक बात बताओ ये क्या जब देखो तब तुम सेलेरी बढ़ाने की कहते रहते हो। सरकार भी दस साल में एक बार बढ़ाती है एक तुम हो जो हर छह महीने बाद सूरत लटकाये चले आते हो। भूल गए अभी तीन साल पहले ही तुम्हारी सेलेरी बढ़ाई थी। तुमसे आधी तनख्वाह पर आने को लोग लाइन लगाए खड़े हैं। गो ! अब कुछ काम भी कर लो जब वह वेतन बढ़ाने की मांग ही न करे: क्या भाई तुम्हारे बाल-बच्चे हैं या नहीं? चुपचाप काम करते रहते हो दफ़्तर में सबके रिप्रेजेंटेशन आ गए वेतन बढ़ाने को। एक तुम हो तुम्हारा कोई आवेदन ही नहीं है। क्या तुम्हारी तनख्वाह बस है। पूरी पड़ जाती है? अगर नहीं तो कहाँ है तुम्हारा रिप्रजेंटेशन? अपनी नहीं तो अपनी टीम की, दफ्तर के अपने कुलीग्स का कुछ तो ख्याल करो। कुछ तो को-ऑपरेट करा करो। माना तुम्हें बढ़े हुए वेतन की कोई ज़रूरत नहीं और दफ़्तर में सब तो तुम्हारी संतोषी जीव नहीं। सबकी अपनी ज़रूरत होतीं हैं। उनका तो ख्याल करो 'डोंट ऑलवेज बी सैल्फिश'

Friday, July 31, 2026

व्यंग्य: हेरिटेज घड़ी से लिमिटेड एडिशन घड़ी तक

 

 

हम बचपन में नाना-नानी दादा-दादी के घर में पुराने, बोले तो, बेहद पुराने सन्दूक रखे और फ़ोटोज़ टंगे  देखते थे। जॉर्ज पंचम का फोटो हो या रानी एलीज़ाबेथ का। स्वदेशी में नेहरू जी और गांधी जी के फोटो लोकप्रिय थे। एक फोटो मुझे याद है जिसमें नेहरू जी और केनेडी वाईट हाउस के लाॅन में टहल रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे केनेडी उन्हें कुछ इंगित कर दिखा रहे हैं और नेहरू जी ठोड़ी पर हाथ लगाए आश्चर्य से निहार रहे हैं। आपने अगर सुदर्शन की 'हार की जीत' कहानी पढ़ी हो तो उसमें ज़िक्र आता है “बाबा ने घोड़ा दिखाया घमडं से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से” वैसा ही कुछ आश्चर्य नेहरू जी के चेहरे पर था।

 

हमारे रेडियो, फ्रिज, ए.सी.  और टी.वी. 30-30 साल चले। वो भी बिना किसी हील-हुज्जत के। तब सोचो चीजों की कितनी गारंटी होती थी। दरअसल वो गारंटी चीजों की नहीं थी। वो गारंटी आदमी की थी। उसकी नीयत की थी। उसे अपनी साख बहुत प्यारी थी, प्रॉफ़िट सेकंडरी था। वारंटी शब्द ही अब आया है। पहले तो गारंटी ही चला करती थी। चीज़ खराब भी  नहीं होती थी। दुकानदार आम कहते थे 'दादा खरीदे पोता बरते'। अब कोई दुकानदार ऐसा नहीं कहता क्योंकि अब यह फैशनेबल नहीं। अब आदमी पोते के बरतने की दृष्टि से कुछ नहीं खरीदता। उसकी और पोते की पसंद मिलती - जुलती नहीं है। यहाँ हर दो महीने बाद तो नए वर्जन का लैपटाॅप और फोन मार्किट में आ जाता है। मुझे याद है जब बैल बॉटम चले थे तब कोई इंसान अगर ड्रेन पाइप वाली पेंट पहने दिख जाता था तो ऐसा मालूम देता था कि वह किसी पुरानी सभ्यता से चला आया है।

 

मेरे फ्रिज और ए.सी. ने मेरा साथ 30 साल तक निभाया। हमने बहुत सी चीजों का साथ तो महज़ इसलिए छोड़ा कि अब उसके पुर्जे मिलना बंद हो गए या अब के मकेनिक उसे समझ ही नहीं पाते और हाथ खड़े कर देते हैं। अभी चालीस साल पहले मैंने अपना ट्रान्जिस्टर की नाॅब को ठीक होने दिया तो बाद में ख्याल आया कि मैंने रसीद तो ली ही नहीं। करीब एक माह बाद मैं दुकान पर गया तो उसने एक टोकरी मेरे आगे कर दी इसमें से पहचान कर अपना ट्रान्जिस्टर ले लो। कारण कि इस बीच में बलवाईयों ने उसकी दुकान पर हमला कर लूटमार की थी। मेरी नज़रों में उस दुकानदार की इज्ज़त बहुत बढ़ गयी। मैं ये सोच रहा था कि ये कंज्यूमर कोर्ट क्यों बनाने पड़े क्यों कि कोई तो है जो इस पूरी चेन में अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा। एक और नया जुमला आजकल चला है। 'इन चीजों की इतनी ही एज होती है'। दो साल चल गया और क्या चाहिए। अब नया मॉडल ले लो। उसमें फलां फीचर भी है। हमारे यहाँ जब वो वाला फ्रिज था जिस में बर्फ (फ़्राॅस्ट) हफ्ते के हफ्ते निकालनी पड़ती थी तब कमसेकम चीज़ें कब से फ्रिज में रखी हैं, पता चलता रहता था और बहुधा खराब होने से पहले बरत ली जाती थी। लेकिन अब 'ऑटोमेटिक डिफराॅस्ट' होने वाले फ्रिज आ गए हैं। अब चीज़ें सीधे फ्रिज से डस्टबिन में जाती हैं। इस चक्कर में हमने अपने पेट को भी कमोबेशी डस्टबिन ही बना लिया है। अब रेडियो, घड़ी, ट्रान्जिस्टर, मोबाइल फोन, लैपटाॅप खराब हो जाये तो मैं इस जुगाड़ में लग जाता हूँ कि इसे कैसे चलाने लायक बनाया जाये। बच्चों को कानों कान खबर हुए बिना। क्यों कि आज के दौर में चीज़ें ऐसी नहीं बनीं हैं आजकल के बच्चे भी कम बेसबरे नहीं। वे तुरंत डिक्लेयर कर देते हैं कि "फेंको इसे! दूसरा नया ले लो"। अब उन्हे कौन समझाये कि हम उस पीढ़ी के हैं जो हवाई चप्पल की बद्दी (स्ट्रैप) टूट जाने पर ऑलपिन या सेफ़्टी पिन से चला लिया करते थे। जूते की रिपेयर तब तक कराते रहते थे जब तक हमें या जूते को शर्म ही न आने लग जाये या मोची हाथ खड़े कर दे। जो भी पहले हो। हम बड़े गर्व से बताते थे ये मेरे पिताजी की अथवा दादा जी की घड़ी है। आज भी सही टाइम बताती है। सही चल रही है। वहीं 'ग्रांड सन' का कहना है "ये लिमिटेड एडिशन घड़ी है। यह वाटर प्रूफ है, यह दिन, तारीख बताती है। आप कितना चले, कितनी कैलोरी बर्न की और आपका हार्ट रेट भी"। अब उन्हें कौन समझाये हमारे टाइम पर तो बुजुर्ग हमें देख कर ही हमारे दिल का हाल बता देते थे।

 

 

Wednesday, July 29, 2026

व्यंग्य: असली ज़ेन-जी हम हैं

 


आजकल जो है सो ज़ेन-जी का बहुत बोलबाला है। जित देखो तित ज़ेन-जी के धमाल का शोर है। उन्ही की चर्चा हो रेली है। ऐसे में मेरा और मेरे जैसे अन्य असली खालिस ज़ेन-जी का परेशान होना, 'नैगलेक्टड फील' करना 'बट-नैचुरल' है। यह तो 'कूल' नहीं। आगे दो-चार लाइन्स में ही मैंने 'प्रूव' कर देना है। देखिये! मैं और मेरे जैसे रिटायर्ड लोगों को 'एक्स' क्यों कहते हैं। बोले तो ! ये जो भी भूतपूर्व हैं उन्हें 'एक्स' कहा जाता है। रिटायर होने के पाँच-दस साल तलक आप 'वाई' समझते और कहलाते हो। अब इस 'वाई' के अनेक अर्थ हैं। जैसे अपने को अभी भी 'वाई' से यंग समझना।  यूथ समझना। वैसे ही टाइट टी-शर्ट पहन कर चहल-कदमी करना। घर में भी ये 'वाई' वाले सबको टोकते-रोकते हैं। कोई बात हो इनकी ज़ुबान पर 'वाई' (क्यों) रहता है। बात-बात में बल्कि हर बात में 'वाई' (क्यों) इसकी क्या ज़रूरत है? पंखा क्यों चल रहा है? ए.सी. बंद क्यों नहीं किया? ये इतना महंगा खरीदने की क्या ज़रूरत? इन शॉर्ट ! सब जगह 'वाई' (क्यों-क्यों) का ग़दर मचाये रखते हैं। लेकिन ये ज्यादा नहीं चलता।

 

दस साल बाद यानि की जब आप सत्तर के लपेटे में आ जाते हो तो आप असली 'ज़ेड' तक आन पहुँचते हैं। देखिये जब आप रिटायर हो गए तब से आप 'अल्फाबेट' के 'एक्स' हो जाते हो। उसके दस साल तलक आप 'वाई' रहते हो और फिर अंग्रेजी वर्णमाला के आखिरी 'अल्फाबेट' ज़ेड तक आ जाते हो। बस उसके बाद कभी भी चला-चली की वेला रहती है। अब आप ना 'एक्स' हैं ना 'वाई'। अब आप 'ज़ेड' हो। इसीलिए मैं हुआ आप हुए (अगर आप सत्तर के ऊपर के हो) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप ‘अर्ली सेवेंटीज़’ में हो या ‘लेट सेवेंटीज़’ में आप हो तो ज़ेन-जी ही।

 

अब आप समझे! मैं क्यों अपने को और अपने जैसे ‘स्वीट सेवेंटी’ वाले सभी लोग को ज़ेन जी कहता-समझता हूं। असली 'ज़ेन-जी', खालिस 'ज़ेन-जी'। आप बिंदास हैं क्यों कि आपके पास खोने को कुछ नहीं। आप तो वैसे ही ‘डिपार्चर-लाउंज’ में बैठे हैं। न जाने कब आपकी फ्लाइट एनाउंस हो जाए। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है:

 

 

         उन किताबों को हम काबिले-जब्ती समझते हैं

         जिन्हें पढ़ कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं

 

अब इसमें दो बातें हैं। पहली तो ये कि अकबर इलाहाबादी अब रहे नहीं। नहीं तो पता नहीं वो अपना नाम अकबर प्रयागराजी कहलाना पसंद करते क्या? दूसरा, ये कि अगर बेटे (बेटी इन्क्लुडिड) बाप को खब्ती समझते हैं तो 'डेफ़िनिटली' ज़्यादातर बाप निश्चय ही खब्ती हैं। खब्ती इंसान अव्वल तो लॉजिक से काम लेता नहीं। वह अपने पूर्वाग्रहों से बुरी तरह ग्रस्त रहता है। दूसरे उनकी बहुत 'स्ट्रॉंग लाइक्स' और 'डिसलाइक्स' रहती हैं। देखिये कुछ भी बड़ा करने को जुनून चाहिए। मेरा सत्तर वालों से अनुरोध है कि आप अपने आप को कम न समझें। आप सत्तर नहीं आप 'सतर्क' हैं। आप असली के ज़ेन-जी हैं। आपकी ‘नाॅलिज़ वास्ट’ है। तजुर्बा तो विशाल है ही। एक सीरियल आता था दूरदर्शन पर ‘बुनियाद’ उसमें लाजो जी (मुख्य पात्र) एक संवाद अपने बच्चों को कहती है “मैं तब की मॉडर्न हूँ जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे”