Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Tuesday, June 2, 2026

व्यंग्य: अरै गुड मॉर्निंग रे !

 

                                            


      यह तय पाया गया है कि तुरंत प्रभाव से पुलिस सुबह- सुबह पार्क के दरवाजे पर खड़ी रहा करेगी और हर वॉक करने आने वाले और सुबह की सैर करने वालों को गुड मॉर्निंग कह कर उनका अभिवादन करेगी और उनमें एक विश्वास और समाज में सुरक्षा का भाव पैदा करेगी। यह सुन कर नागरिकों में खासकर मॉर्निंग वाॅकर्स में एक अज़ब भय व्याप्त हो गया है। कई ने तो मॉर्निंग वॉक पर जाना ही छोड़ दिया है। पता चला अब उनको डर है कि उनकी घड़ी, मोबायल वैलेट कोई छीने ना छीने, पुलिस जरूर छीन लेगी। फिर वही थाने की माॅर्निंग वॉक करनी पड़ेगी। उनके दसियों सवालों का जवाब देना होगा। बार-बार थाने के चक्कर लगाने पड़ेंगे। इससे अच्छा है कि जब ये पुलिस पार्क से कहीं और डिप्लाॅय होगी तब वॉक कर लेंगे। टांगें सलामत रहें वाॅक भतेरी हैं।

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     पुलिस वाले भी नित नयी योजनाएं  बनाते रहते हैं कैसे आम पब्लिक को छकाया जाये और कैसे दोनों ओर से कमाई की जा सके। मोबाइल व चेन छीनने वालों से भी और ये 'हेल्थ-काॅन्शस' नागरिकों से भी। नागरिक भी सोचने लग पड़ेंगे कि यार हेल्थ तो बाद में भी देख ली जाएगी पहले तो अपनी जान-माल की सुरक्षा करो। मोटर साइकिल गेंग से और पुलिस की वेन से। अब अगर पुलिस ये रोज-रोज गुड मॉर्निंग करने लगेगी तो वह चिन्हित कर लेगी किस को किस केस में फंसाना है। किस पर क्या केस ठोका जाये ताकि जो चुपचाप मांगो दे जाए और देने के बाद चुप्पी लगाए रखेगा। यह एक तरह से उनका 'फील्ड वर्क' है। प्रोजेक्ट वर्क यू नो!

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धीरे-धीरे ये हाल हो जाएगा कि लोग बाग गुड मॉर्निंग सुनते ही काँपने लगेंगे। नर्वस हो जाएँगे। गुड मॉर्निंग का जवाब गुड मॉर्निंग ही हुआ करता है। गुड मॉर्निंग का जवाब गुड बाई नहीं होता और ना ही गुड नाइट होता है। आप एक बार कह के देख लें बच्चू ना गुड नाइट हवालात में गुजारनी पड़े। वो गाना है ना

                           ज़िंदगी भर न भूलेगी वो हवालात की रात ...

 

एक दृष्य मुलाहिजा कीजिये :

एक शान्तिप्रिय दब्बू नागरिक (अब नागरिक है तो शांतिपूर्ण है और शांतिपूर्ण है तो दब्बू तो  होगा ही )। जैसे ही पार्क के गेट से माॅर्निंग वाॅकर घुसने को हुआ पुलिस की रौबीली आवाज आई "अरे भई ! इत भी सुन ले! कहाँ दौड़ा जा रहा है ? कोई कांड करके आया है के ? तैने घणी जल्दी मची है! ये पाँच फुट आठ इंच का आदमी तैने दिक्खे कोई ना ? सरकार ने हमारी भी कोई ड्यूटी लगा राखी है ? तैने बेरा कोई ना ?" मॉर्निंग वाॅकर डरते-डरते हाथ जोड़ कर "नमस्ते दरोगा साब" ( वह इतना नर्वस ऑलरेडी हो गया है कि हाथ जोड़े रहा और कॉन्स्टेबल को दरोगा जी कहने लगा)

कांस्टेबल: "अरे नमस्ते तो ठीक है !  हमारी भी तो गुड मॉर्निंग लेता जा। के हमारी गुड मॉर्निंग तैने पसंद कोई ना आई ?" अब मॉर्निंग वाॅकर वाकई भयभीत हो गया। "सुन तैने कोई संदिग्ध सा आदमी नज़र आए तो मन्ने बताना आखिर हम तेरी सुरक्षा को ही यहाँ मुंह अंधेरे तड़के से ठाड़े हैं। कसम ले ले ना कोई चाय पी है न कोई नाश्ता नसीब हुआ। मॉर्निंग वाॅकर ने जेब से सौ का नोट निकाला "हुज़ूर आज तो पॉकेट में इतने ही हैं आप चाय पी लेना"। "क्यूँ तू न पीएगा ?" "नहीं साब मुझे शुगर है डॉ ने मना कर रखी है।"  "फेर ठीक है।"

इस प्रकार देखते-देखते पार्क मॉर्निंग वाॅकर विहीन हो गया। अब ज़मीन तैयार थी। भले इस पर कब्जा करो, प्लॉट काटो, रातों रात बिल्डिंग खड़ी करो। महीने भर में ही या तो मॉर्निंग वाॅकर्स ने पार्क में मॉर्निंग वॉक बंद कर देंगे या फिर वो अपने घर की छत पर या अपनी सोसायटी में वॉक करने लग पड़ेंगे। आखिर हेल्थ इज़ वेल्थ।  अब वो किसी को भी गुड मॉर्निंग नहीं बोलते बस मुंह से या तो 'जय श्रीराम' निकलता है 'राम राम सा' निकलता है या फिर प्रणाम। उनको पता है पुलिस की ये गुड मॉर्निंग बहुत दुख देती है। यह गुड माॅर्निंग पुलिस के लिए ही गुड मॉर्निंग है उनके लिए नहीं।

 

गुड नाइट !!

व्यंग्य : दो कौड़ी के लोग

 

                                      


 

पहले ! बहुत पहले ! जब ना टी.वी. थे, ना यू ट्यूब था तब फूटी कौड़ी और साबुत कौड़ी चला करती थी। एक कौड़ी पूरे तीन फूटी कौड़ी के बराबर होती थी। बोले तो दो कौड़ी का अर्थ है पूरी छह फूटी कौड़ी। यूं कहने को एक फूटी कौड़ी भी चला ही करती थी। अब जबकि यू ट्यूबर्स पर दो कौड़ी का ठप्पा लग चुका है तो ज़ाहिर है यू ट्यूबर्स की वेलुएशन बोलो, नेट वर्थ बोलो  छह फूटी कौड़ी की तो हो ही गयी। नॉट बैड !  यूं कई यू- ट्यूबर्स की आमदनी और फाॅलोअर्स टी.वी. चैनल से कहीं ज्यादा है और तो और उनकी विश्वसनीयता भी इन चैनलों से कहीं अधिक है। लेकिन छह फूटी कौड़ी भी कम तो नहीं होती। ऐसे दौर में जब लोग बाग कौड़ी-कौड़ी के हो गए हैं। तब आपका छह फूटी कौड़ी का होना आपके लिए गर्व की बात है। जो काम आप 'ब्रैड' (रोटी) के लिए कर रहे हैं वह काम लोग जब 'बटर' के लिए करने लग जाएँ तो उसे अंग्रेज़ी में अच्छे नामों से नवाजने भी लगते हैं। विषय से इतर है किंतु देखिये अब एस्कॉर्ट सर्विस, सेक्स वर्कर, सोशलाइट, हाई सोसाइटी गर्ल कितने नाम मिल गए। इस वक़्त में आपका छह कौड़ी का होना बड़े फख्र की बात है। भले छह फूटी कौड़ी सही। जब इतिहास लिखा जाएगा तो आपका नाम 'निर्माण' करने वालों में लिया जाएगा। आपके जो फाॅलोअर्स हैं उनमें ना जाने कितने ही आपसे सीख कर अपनी-अपनी रोजी-रोटी से लग गए। रोजगार पा गए। आपके लिए यह क्रेडिट की बात है। बौद्ध धर्म में कहा जाता है 'अप्पो दीपो भव' अर्थात अपने दीपक स्वयं बनो। आप छह फूटी कौड़ी के यू ट्यूबर्स समाज को यही संदेश दे रहे हैं। आप उन्हें प्रकाश की ओर ले जा रहे हैं। यह बात गांठ बांध लीजिये। आप वो जुगनू हैं जो अंधेरे में मशाल बने हुए हैं। ‘लीड अस टू लाइट’  वो लीड रोल आप ही अदा कर रहे हैं। कहते हैं सही वक़्त पर सही सलाह का ही दूसरा नाम सफलता है।

 

इस मार्ग पर लोग आपको हतोत्साहित करेंगे। आपको पथच्युत/पथ भ्रष्ट  करने की कोशिशें भी करेंगे। क्या पता पत्थर भी मारने लगें। पर भला पत्थर मारने से भी कॉकरोच मरे हैं कभी ? यदि आपकी आलोचना हो रही है तो समझ लीजिये आप सही जा रहे हैं। ये हुस्नो-इश्क़ तो धोखा है। आप अपना जॉब सेटिस्फेक्शन, मिड नाइट ऑइल जला कर पाते हैं। सयाने कह गए हैं ईश्वर प्राप्ति के दो मार्ग हैं भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग। आप उसी ज्ञान मार्ग के पुरोधा हैं। समाज आपका ऋणी है। 

                                   लगे रहो यू ट्यूबर भाई !

व्यंग्य : भूसा और टीचर

 

                                  

                                          


 

भारत में टीचर और भूसे का संबंध प्राचीन काल से रहा है। टीचर को जब भी किसी स्टूडेंट को डांट-डपट करनी होती या उस पर खीज उतारनी होती तो वह कहता है “तुम्हारे सिर में क्या भूसा भरा है?” “दिमाग है ही नहीं भूसा भरा है” कहते हैं कई बार ज़ुबान पर सरस्वती विराजमान रहती है। अतः ऐसे ही किसी क्षण टीचर की सुनवाई हो गयी या समझो इन तानों से दुखी किसी विद्यार्थी की सुनवाई हो गई। सुना है शासन ने आदेश निकाला है कि टीचर अब गाय-बैल के लिए भूसा इकठ्ठा करेंगे।

 

यूं देखा जाये तो यह स्वागत योग्य कदम है। टीचर लोग खासकर सरकारी स्कूल के, अव्वल तो स्कूल आते नहीं आते हैं तो पढ़ाते नहीं। और बहुत काम करने होते हैं उन्हे, प्रिंसिपल की बुराई बोले तो निंदा। अपने सह-कर्मियों की लगाई-बुझाई, ट्यूशन की जुगाड़। लेडी टीचर की ‘गुड बुक्स’ में आना होता है। बच्चों से अब किस फंड के नाम से पैसे ऐंठे जाएँ यह तमाम योजनाएँ दिमाग में चलती रहती हैं। पीछे कुत्ते गिनने का काम भी उन्ही को सौंपा गया था। जनगणना, वोटर लिस्ट, चुनाव ड्यूटी, टीकाकरण आदि न जाने ऐसे कितने ही काम मेरे भारत महान के महान टीचर ही करते आए हैं। इससे पता चलता है कि वे कितने प्रतिभाशाली हैं और ‘इंडिस्पेंसेबल’ हैं। टीचर नहीं होते तो इस देश का क्या ही होता? यही सोच कर भूसा इकट्ठा करने का महत्ती राष्ट्रीय कार्य इनके कर-कमलों से कराने का निर्णय लिया गया है।

                                                   


वैसे देखा जाये तो जिस गति से सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं और बच्चे बजाय स्कूल के अन्य राष्ट्रीय पर्वों से ज्यादा सीख रहे हैं बोले तो लाइफ में जल्दी ही ‘हेण्ड्स-ऑन’ ले रहे हैं तो स्कूल की ज़रूरत ही कहाँ रह जाती है। हमारे संत महात्मा तो बहुत पहले ही कह गए हैं:

 

                       ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय

 

 अब ये प्रेम का पाठ गाय-बैल से अधिक कौन समझा सकता है। मुंशी प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ पढ़ कर देखिये। आए दिन गाय के वात्सल्य और बैल की मेहनत के किस्से आम होते रहते हैं। फिर टीचर को क्या ग़म है। उन्हें तो उल्टे खुश होना चाहिए कि गऊ माता की सेवा का पुनीत अवसर उन्हें मिला है। वे यह भूल जाते हैं कि उनकी बी.एड. में, बी.टी. में ‘बी’ जो है सो भूसे के लिए ही है। रही बात एम.एड. और पी.जी.टी. की तो मास्स साब ! ये समझ लो और गांठ बांध लो कि ‘एम’ से मवेशी और पी.जी.टी. में जो ‘जी’ है वह गाय ही है। हां भूसे के बदले में आप चाहें तो दूध/गोबर में से कुछ गुरु-दक्षिणा की आशा रख सकते हैं।

 

व्यंग्य : नीट के लिए मंगल ग्रह की सेवाएँ


     सारे जतन कर के देख लिए, नौकरी की परीक्षा हो, शिक्षा की परीक्षा हो, पेपर लीक हो ही जाता है। पेपर लीक न हो इसके लिए क्या क्या कोशिशें नहीं की गईं। मगर पेपर है कि लीक हो ही जाता है। दरअसल हमारी भारत की पावन भूमि की जलवायु ही ऐसी है कि पेपर को बिना लीक कराये रखना नामुमकिन हो गया है। बड़े से बड़ा अधिकारी हो, अध्यापक हो, सभी इसी में मुब्तला मालूम देते हैं।

 

                      लीक व्याप्त देश में जित देखूँ तित लीक

                    लीक रोकन मैं गया मैं भी हो गया लीक

 

     मुझे हार्दिक खुशी हुई जब पता चला कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत अब सभी परीक्षाएँ यथा नीट, सी. बी.एस.ई. स्टाफ सलेक्शन और यू.पी.एस.सी. सब की सब का ग्लोबल ठेका मंगल ग्रह की एक एजेंसी को दे दिया गया है। उनकी उड़न तश्तरियाँ बोले तो यू.एफ.ओ. का इस्तेमाल किया जाएगा। वैसे देखा जाये तो अब वे यू. एफ.ओ. रही कहाँ अर्थात 'अनआइडेंटिफाइड' कहाँ रहीं? अब तो हम भारतीयों की कुशाग्र बुद्धि ने उनको ना केवल आइडेंटिफ़ाई कर लिया है अपितु काम पर भी जोत दिया है। 'मिस यूनिवर्स' एक 'मिसनोमर' है। भाई जब सब सुंदरियाँ पृथ्वी से ही हैं तो यूनिवर्स तो बस नाम का हुआ। जैसे आजकल स्कूल अपने नाम के आगे 'इन्टरनेशनल' लिखने लग पड़े हैं। अब जब कमान मंगल ग्रह की एजेंसी के हाथों में रहेगी तो पेपर लीक हो कर बताए।

 

इस श्रंखला में मंगल ग्रह वालों ने एक एस.ओ.पी. दिया है। हमें उसका आई.एस.ओ. की तरह पालन करना होगा। कुछ हाईलाइट्स प्रस्तुत हैं:

 

1. पेपर मंगल ग्रह से ही बन कर आयेगा। जितनी भाषाओं में चाहिए वे खुद ही ट्रांसलेट करेंगे। देखा ये गया है कि ट्रांसलेशन स्टेज पर पेपर लीक होने की संभावना  रहती है। अब हो सकता है लीक कहीं और किसी और ने किया हो और बेचारे गरीब ट्रांसलेटर के सिर दोष मढ़ दिया जाता हो

2. पेपर बना कर सीधे अरेबियन सी अथवा बंगाल की खाड़ी या हिन्द महासागर में मंगल यान से आयेगा। कहां आयेगा ये बात अंत तक सीक्रेट रखी जायेगी। आई.एस.टी. अनुसार किस समय और तारीख को आयेगा ये क्रिपटिक भाषा में कोड वर्ड में बता दिया जाएगा।

3. पेपर को तुरंत भारतीय सबमरीन में नेवी द्वारा निकटतम आर्मी स्टेशन लाया जाएगा

4. आर्मी स्टेशन में वायु सेना का विमान रन-वे पर इंजन चालू हालत में रखे खड़ा होगा। तुरंत से पहले वह वायु सेना का विमान पेपर्स ले उड़ेगा। सेंटर की तरफ नहीं बल्कि जिस शहर जाना है उसके अपने आर्मी केंट में।

5. वहाँ से टैंक और बख्तरबंद गाड़ियों में इसे सेंटर तक पहुंचाया जाएगा। इसके लिए एक डेडीकेटिड रूट पहले से लगा दिया जाएगा जैसे आजकल 'दिल' को ट्रांसप्लांट को लाते ले जाते हैं ताकि रास्ता साफ मिले और स्पीड से समय रहते पहुंचाया जा सके।सावधानी के तौर पर पूरे रुट पर कर्फ्यू रहेगा और 'शूट एट साइट' लागू रहेगा।

6. इस सब की निगरानी को 'रियल टाइम' में हमारे इसरो द्वारा विकसित उपग्रह ऊपर से चौकस निगरानी रखेंगे ताकि जरा भी कहीं 'डेविएशन' ना होने पाये। आपने बहुधा अंग्रेज़ी फिल्मों में देखे होंगे ऐसे सीन।

7. मंगल यान उतरते के साथ ही वहाँ हेंड हेल्ड टारपीडो गन लेकर अपने पानी के अंदर पहने जाने वाले स्पेशल सूट में 'साल्सा' तैनात रहेगी। नहीं समझे ? स्पेशल एंटी लीक स्क्वैड

8. यह पूरा प्राॅसीजर प्रयोगात्मक तौर पर किया जाएगा और माॅक ड्रिल आयोजित की जाएंगी। जिसे एक कमेटी ऑब्जर्व करेगी।

9. स्टॉप वाच से मिनट और सेकन्ड का हिसाब रखा जाएगा। कहाँ किस स्टेज पर 'बाॅटलनैक' है कोई और अडचन है उसको रेक्टिफ़ाई किया जाएगा। बस यूं समझो इतना तो केंडीडेट परीक्षा देने की तैयारी नहीं करेगा जितनी हम परीक्षा लेने की करेंगे।

10. इतनी सब सावधानियाँ बरतने के बाद भी अगर पेपर लीक हो गया ) आपने जेम्स बॉन्ड की फिल्मों में देखा होगा कैसे पानी के अंदर से ही पूरी की पूरी यूरेनियम की खेप या फिर ऑटोमिक बम्ब को दूसरी पार्टी ले उड़ती है आई मीन ले तैरती है। अतः हमने अपने विकल्प खुले रखे हैं हम अगली बार अन्य ग्रहों को भी अवसर देंगे ताकि कोई हम पर मंगल ग्रह पर 'अननेसेसरी' फ़ेवरटिज्म का आरोप ना लगा सके। इसके लिए अलग-अलग ग्रहों पर हमारे शिष्ट मण्डल गए हुए हैं।  वीनस, जुपिटर और और यूरेनस वालों से वार्ता चल रही है।

 

Monday, May 25, 2026

व्यंग्य: रुपये को गिरने से बचाने के उपाय

 

     जब बच्चा साइकिल चलाना सीखता है तो यह लाजिमी है कि वह साइकिल से गिरे। सयाने कहते हैं बिना साइकिल से गिरे साइकिल चलाना आ ही नहीं सकता। अतः पहली बात तो ये कि रुपये के गिरने को सीरियसली नहीं लेना है। बिलकुल उसी तरह जैसे बच्चे के साइकिल से गिरने को सीरियसली नहीं लिया जाता। मरहम-पट्टी कर दुबारा फिर साइकिल। एक विशेषज्ञ ने तो कह ही दिया कि 100 बस एक नंबर है उसको दिल पर नहीं लेना है।

 

       मेरा विचार है सबसे पहले तो ये जो सिक्के हैं इनकी डिजाइन फौरन चेंज कर देनी चाहिए। ये गोल बनने ही नहीं चाहिए। गोल होने के कारण यह लुढ़कता है। आप एक बार रोक लेंगे, दो बार रोक लेंगे पर गोल है तो इसने घूमना ही है और साइंस का बेसिक रूल है जहां ढलान है वहाँ की तरफ ही जाएगा इसी को आप लोग कहते हैं रुपया गिर रहा है। जब डिजाइन गोल ना होकर वर्गाकार, त्रिभुजाकार, आयताकार अथवा पंचमुखी रुद्राक्ष की तरह पेंटागनी होगी तो गिरने का सवाल ही नहीं। आई मीन ! लुढ़केगा तो नहीं ही। पहले सिक्के स्क्वायर डिजाइन के होते थे अतः कहाँ गिरते/लुढ़कते थे?

 

      दूसरा, आपको रुपये को देखने का नज़रिया बदलना होगा। रुपया गिर नहीं रहा ये जो डॉलर, पॉन्ड, यूरो हैं वो ऊपर जा रहे हैं। जैसे मैं मूर्ख-निकम्मा नहीं हूँ। ये तो बस ये है कि मेरे आसपास के लोग, मेरे दोस्त ज्यादा ज़हीन हैं। इस तरह के दृष्टिकोण से लाइफ आसान हो जाती है। हम काले नहीं हैं। ये तो बस ये है कि अंग्रेज़ गोरे हैं। हम बेईमान और कामचोर नहीं ये तो बस ये है कि बाहर-गाँव के लोग ज्यादा काम करते हैं और ईमानदारी का मुजाहिरा करते हैं। हम भारतीय लोग दिखावे में विश्वास नहीं रखते। जो हमारे मन में है वही हमारे मुंह पर है और वही शफ़क़त हमारे रुपये में है।

 

          एक योजना यह भी चल रही है कि सिक्के।करेंसी नोट के एक तरफ गोंद लगाया जाया करेगा, सेल्फ-एडहैजिव टाइप जैसे डाक-टिकटों पर लगा होता था। ताकि रुपया जहां है वहाँ से टस से मस न हो। अब गिर के दिखाये बच्चू ! एक पुराना गाना है ‘मिलने की खुशी ना मिलने का ग़म खत्म ये झगड़े हो जाएँ। तू तू ना रहे मैं मैं ना रहूं’ अतः रुपये को इतना सिर ही मत चढ़ाओ कि वह गिरे या उसके गिरने का ग़म हो। इसका साफ सुथरा तरीका ये है कि हम पुराने टाइम-टेस्टड सिस्टम ‘बारटर सिस्टम’ को अपना लें। तू मेरा नमक ले मुझे अपना प्लास्टिक दे। तू मेरी चाय पी मैं तेरी स्कॉच। इससे कोई झंझट ही नहीं। रुपया गिरे, उठे, चले, भागे-दौड़े अपनी बला से।  ये गिरना उठना सब बिधि हाथ है। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं। जनाब ज़ौक़ से माफी के साथ:

 

                 लाई उठान उट्ठे ...मंदी गिरा चली, गिरे!

                 न अपनी खुशी उट्ठे, न अपनी खुशी गिरे

 

    आप एक बार ये फंडा समझ गए तो ज़िंदगी में कभी ये बेकार की छोटी-मोटी शिकायतें नहीं करेंगे। आपकी ज़िंदगी किसी भी रुपये/डॉलर और पॉन्ड से ज्यादा कीमती है। माइंड इट !

 

Monday, May 18, 2026

व्यंग्य: जीजा ने सपने में छेड़ा था

 

                                            





एक मशहूर शेर है:

 

                   क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए

                   हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का

 

ये जो सपने हैं ये बहुत ज़ालिम होते हैं। ना ये सोने देते हैं ना ये शांति से जीने देते हैं। बस सपने में दम होना चाहिए उस से कहीं ज्यादा सपने देखने वाले में दम होना चाहिए। एक कहावत है 'सपने सच नहीं होते उन्हें सच करना पड़ता है'। अर्थात उसके लिए बहुत मेहनत करनी होती है तब कहीं जाकर सपने सच होते हैं। एक सूबे में आधी रात को सोते-सोते साली साहिबा जाग गईं और लगी चीखने-चिल्लाने। किस्सा कोताह ये कि साली साहिबा ने रोते-रोते आरोप लगाया कि जीजा जी ने उसे छेड़ा और 'मिसबिहेव' किया। इतना सुनना था कि बीवी ने ही पुलिस को फोन कर दिया। वो अपने पति को अच्छे से जानती थी। लो जी पुलिस आ गयी। मगर ये क्या ? जीजा जी तो फरार हो गये। जिसे पुलिस छेड़ने पर आ जाये वह कितनी देर तक बचता फिरेगा? पुलिस ने जीजा को पकड़ ही लिया। जीजा जी की किस्मत! पुलिस ने फिर जीजा जी को, जी भर के छेड़ा, और ऐसा-ऐसा 'मिसबिहेव' किया जितना जीजा ने साली को भी न छेड़ा था। जीजा थे  एयरफोर्स में। सो खबर सुनते ही लंबी जेल /केस हो गया।  इस चक्कर में नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा।

 

ऐसे केस लंबे चलते हैं। ये केस भी खूब ही चला। जीजा जी को पक्का पता था कि बड़ी मुश्किल है बाबा।  नौकरी तो जानी ही जानी है जेल और सज़ा अलग। तारीख पे तारीख मिलती गई। सच तो ये है कि भले नाबालिग सही, जीजा जी की नियत डोली तो जरूर थी। अब वो नाबालिग बालिग हो अपने जीवन में ठीक-ठाक सैटल थी। उसे जीजा पर दया आ गयी। आखिर अपनी खुद की बहन के घर का सवाल था। मराठी में एक जुमला है ‘नको दाजिबा’ हंसी-ठिठोली में साली जीजा को कह रही है ‘ना जीजा’ मुझे लगता है वकील से सलाह कर के और अपनी जीजी के घर का ख्याल रखते हुए साली ने जो बयान दिया वह चौंकाने वाला था। साली ने अदालत में कह दिया "मी लॉर्ड ! मुझे भ्रम हुआ था। दरअसल जीजा ने मुझे छेड़ा जरूर था मगर सपने में। ख्वाब में छेड़ा था, मैं डर गयी, बाली उम्र मेरी! मैं भला क्या जानूं ख्वाब और असलियत में अंतर। वो उम्र ही ऐसी होती है कहाँ किसको होश रहता है मी लाॅर्ड ये सपना है या हक़ीक़त। मेरे आदरणीय जीजा जी ने मुझे सपने में छेड़ा, मैं डर गयी। मेरी ख्वाब में ही चीख निकल गयी। जिसे सुनकर घरवाले इकट्ठे हो गए और ये सारा कांड हो गया। जीजा से ये पूछो ये मेरे सपने में क्या कर रहे थे ?" जीजा कह रहा है "भई ! सपना तेरा, तू डिसाइड कर क्या देखना है क्या नहीं" मी लॉर्ड! भी सारा माजरा समझ गए। आखिर उन्होंने इस दु:स्वप्न को अंत करने का डिसाइड किया और मामला रफा-दफा कर दिया। ये मामला लीगल से ज्यादा मामला ख्वाब का निकला।

 

                                ज़िंदगी ख्वाब है!

                                ख्वाब में सच है क्या

                                और भला झूठ है क्या

व्यंग्य: आओ कॉकरोच कॉकरोच खेलें !

 


      ये जो तिलचट्टा है उसी को अंग्रेजी में कॉकरोच कहते हैं। यह लगभग-लगभग हर घर में पाया जाता है। कभी किचन में कभी बाथरूम में। कई बार यह आपके 'लिविंग रूम' और 'कोर्ट यार्ड' में भी दिख जाता है। यह एक शाश्वत प्राणी है। ये था, है और रहेगा। कहते हैं 320 मिलियन साल पहले से कॉकरोच हमारे साथ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि परमाणु बम से दुनिया नष्ट भी हो जाती है तो भी कॉकरोच जीवित रहेगा, देखी है ऐसी जिजीविषा किसी और में ? आपने गौर से देखा हो तो इसके आगे मुंह के पास दो डंक जैसे एंटीना लगे होते हैं जो हरदम हिलते से नज़र आते हैं गोया कि एंटीना सक्रिय है। ऐसा कहा जाता है  ‘दि मीक शैल इन्हेरिट दि अर्थ’। गोया कि जब कोई नहीं रहेगा तब भी 'एक्स-पार्टे' स्टे के चलते हमारा कॉकरोच रहने वाला है। कोई कुछ भी कहे एक औसत कॉकरोच बस छह माह से एक बरस तक जीता है और उतने में ही तबाही मचा देता है। वह एक 'एक्साइटिंग' जीवन जीता है, जितना भी जीता है। मज़े की बात ये है कि उसे कोई डिग्री  नहीं लेनी पड़ती।

 

कोई मेरे दफ्तर में मुझ से मिलने आया। मुझे खबर दी गई कि दो कॉकरोच मुझ से मिलने आए हैं। पता चला वे आर.टी.आई. वाले थे। उन्होने बताया  "जी! आर.टी.आई. का जो 'टी' है वो हमारा ही परिचय है 'टी' बोले तो तिलचट्टा।  पता नहीं आपने 'कॉकरोच-सिंड्रोम' सुना है कि नहीं। कहते हैं अगर आपको एक कॉकरोच दिख जाये तो यह मान लीजिये कि वह अकेला नहीं बल्कि आस-पास ही उनकी पूरी की पूरी कॉलोनी है। सुना है कॉकरोच के राजा ने एक सभा बुलाई है यह जानने को कि ये क्या 'भानगढ़' चल रेली है?

 

अब भर्ती के विज्ञापन आया करेंगे। जैसे आपने सिक्यूरिटी गार्ड्स के विज्ञापन देखे होंगे। फलां दफ्तर में सौ कॉकरोच की आवश्यकता है। एक अच्छी बात ये है कि कॉकरोच को कोई 'नीट' एक्जाम नहीं देना पड़ता नहीं तो बेचारे छोटे से जीवन में कितना कुछ सहना पड़ता। न उनके लिए कोई स्कूल-कॉलेज है ना कोई यूनिवर्सिटी। अब चारों ओर कॉकरोच ही कॉकरोच नज़र आएंगे। उनके लिए मल्टीप्लेक्स होंगे, उनके लिए मॉल हुआ करेंगे। रेस्टोरेंट और होटल पर तो पहले ही उनका कब्जा है। फिल्मे भी उनके लिए बना करेंगी। 'दिलवाले कॉकरोच ले जाएँगे', 'कॉकरोच फाइल्स' और गीत भी उनके लिए बनाए जाएँगे। 'अंखियों के झरोखे से देखा जो सांवरे मुझे कॉकरोच नज़र आए', 'कोई चप्पल से न मारे कॉकरोच को'

 

एक बात और है कॉकरोच को करेंसी नोटों से कोई लेना-देना नहीं अतः रुपया पैसा रखने में उनका विश्वास ही नहीं। दीमक नोट खा जाते हैं पर कॉकरोच तो वह भी नहीं खाता। लोग नाहक ही काॅकरोच को बुरा भला कहते हैं। कॉकरोच 'ह्यूमन-फ़्रेंडली' है। मनुष्य नाम की प्रजाति अपने को कितना ही फन्ने खां समझे वे आयेंगे-जायेंगे। कॉकरोच परमानेंट है। वह था, वह है और रहेगा।  आप कॉकरोच को ‘विश-अवे’ नहीं कर सकते। कॉकरोच को ‘को-एक्ज़िस्ट’ करना आता है फिर चाहे आदमियों के साथ रहना हो, कीड़े-मकौड़ों- दीमकों के साथ।

 

                   जब तक सूरज चांद रहेगा

                  काॅकरोच तेरा नाम रहेगा