Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Saturday, November 7, 2026

फर्स्ट क्लास फर्स्ट – I

 

   

1.   महीपाल : पहली फिल्म ‘अंधों की दुनिया’ 1947  राजकमल फिल्म्स

2.   पहला फिल्म पोस्टर: फिल्म ‘वत्सला-हरण’ 1920 बाबू राव पेंटर द्वारा

3.   पहली महिला फिल्म निर्माता-निर्देशक: फातिमा सुल्ताना, सचिन रियासत (सूरत, गुजरात) के नवाब की बेगम। ‘आलमारा’ फिल्म की अभिनेत्री जुबैदा, उनकी बेटी थी।

4.   पहला स्क्रीन नाम परिवर्तन: ‘अयोध्याचा राजा’ (प्रभात फिल्म कंपनी)  में अभिनेत्री कमला देवी  और सुशीला देवी ने अपने नाम गुलाब बाई और अनुसूया बाई रखे।

5.   पहली कन्या बाल-कलाकार: मंदाकिनी, दादासाहेब फाल्के की बेटी ने उन्हीं के हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म कंपनी की कालिया मर्दन फिल्म 1919 में कृष्ण के बालपन की भूमिका की थी।

6.    पहला बाल कलाकार: दादासहेब फाल्के के पुत्र भालचंद्र ने राजा हरिशचंद्र 1913 में राजा हरिश चंद्र के बेटे रोहित की भूमिका की थी।

7.   पहला हीरो: दत्तात्रेय दामोदर दाबके राजा हरिश चंद्र 1913 में राजा हरिश चंद्र की भूमिका की थी।

8.   जॉनी वाकर: पहली फिल्म बाज़ी (1951)

9.   देव आनंद: पहली फिल्म प्रभात फिल्म कंपनी की, पी एल संतोषी निर्देशित  ‘हम एक हैं’ 1946 (नायिका: कमला कोटनिस)

10.                मीना कुमारी: पहली फिल्म बतौर नायिका रमणीक प्रॉडक्शन की ‘बच्चों का खेल’ 1946  (नायक: आगा)    

 

तुमको पता है जी ? (भारत के राष्ट्रपति और उनके चुनावी प्रतिद्वंदी)

 

1.    डॉ. राजेन्द्र प्रसाद – प्रो. के. टी. शाह 

2.   डॉ. एस राधाकृष्णन – चौधरी हरि राम 

3.   डॉ. ज़ाकिर हुसैन – के. सुब्बाराव 

4.   वी. वी. गिरी – नीलम संजीव रेड्डी 

5.   फख़रुद्दीन अली अहमद – त्रिदिब चौधरी 

6.   नीलम संजीव रेड्डी --- निर्विरोध 

7.   ज्ञानी ज़ैल सिंह ---- एच. आर. खन्ना   

8.   आर. वेंकटरमन --- वी. आर. कृष्णा अय्यर    

9.   डॉ. शंकर दयाल शर्मा – जी. जी. स्वैल 

1  के. आर. नारायनन --- टी. एन. शेषन 

1  डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम --- कैप्टन लक्ष्मी सहगल 

    प्रतिभा पाटिल --- भैरों सिंह 

1  प्रणव मुखर्जी --- पी. ए. संगमा 

1  रामनाथ कोविन्द ---- मीरा कुमार 

1  द्रौपदी मुर्मु --- यशवंत सिन्हा

राजेन बाबू -सादा जीवन उच्च विचार की साक्षात मूरत


                                      


 

राजेन बाबू ( डॉ राजेन्द्र प्रसाद ) भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद का निधन 28 फरवरी 1963 को पटना (बिहार) में हुआ था।


बाबू डॉ राजेन्द्र प्रसाद बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे। उन्होने मैट्रिक में समस्त संयुक्त प्रांत बंगाल-बिहार में टॉप किया था। उन्होने अपनी स्कूल की पढ़ाई के दौरान और आगे की परीक्षाओं में शानदार प्रदर्शन किया था।


उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय (University of Calcutta) की प्रवेश परीक्षा (Entrance / Matriculation) में पहला स्थान (Top) प्राप्त किया था। इस बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उन्हें प्रति माह ₹30 की छात्रवृत्ति (Scholarship) भी मिली थी।

                                         


उनकी असाधारण प्रतिभा को देखते हुए, उनकी उत्तर पुस्तिका पर परीक्षक (Examiner) ने यह टिप्पणी भी लिखी थी: "परीक्षार्थी परीक्षक से अधिक योग्य है" (Examiner is better than examiner) यह एक किवदंती बन गयी कि उनके प्रश्न पत्र में लिखा था कोई से पाँच प्रश्नों के उत्तर लिखें।  उन्होने समय सीमा के अंदर सभी दस प्रश्नों के उत्तर लिखे और ऊपर लिखा कोई से पाँच उत्तर जाँचें। वह एक सौम्य अत्यंत मृदुल भाषी और सादा जीवन उच्च विचार के जीते-जागते उदाहरण थे।

                                         


वे एक प्रखर राष्ट्रवादी थे। यह उनकी असाधारण योग्यता ही थी कि जो भी उनके संपर्क में आता उनके व्यक्तित्व से गहराई से प्रभावित होता। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता, सामाजिक समरसता के प्रतीक थे। उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति में बहुत ही सद्भाव और मैत्रीपूर्ण वातावरण होता था। ईद हो या अन्य कोई भी त्योहार वे सब राष्ट्रपति भवन के कर्मियों के साथ मिल कर मनाते थे। बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी ने न केवल बिहार बल्कि भारत देश का नाम इतना ऊंचा किया और इतने ऊंचे मानक अपने व्यवहार से स्थापित किए कि वे सदा के लिए एक बेंचमार्क बन गए।  भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने से पहले (1946 में दिल्ली आने पर) डॉ. राजेंद्र प्रसाद दिल्ली में 1 नंबर  राजेंद्र प्रसाद रोड (जिसे पहले 'क्वीन विक्टोरिया रोड' के नाम से जाना जाता था) में रहते थे।

                                              


डॉ. राजेन्द्र प्रसाद साल 1934 से 1935 तक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। 1946 में हुए चुनाव के बाद उन्हें केंद्र सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री बनाया गया था। राष्ट्र के प्रति उनके योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सबसे बड़े पुरस्कार भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्वभाव से बेहद सरल और बड़े दिल वाले व्यक्ति थे। 1914 में बंगाल और बिहार में आई भयानक बाढ़ के दौरान उन्होंने पीड़ितों की खूब सहायता की। इसी प्रकार जब 1934 में बिहार भूकंप और बाढ़ की त्रासदी के बाद मलेरिया से जूझ रहा था, उस वक्त भी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने पीड़ितों को खुद से कपड़े और दवाइयां बाटीं।

                                        


जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति बने, तो उनका मासिक वेतन 10,000 रुपये तय हुआ था। लेकिन उन्होंने कहा कि एक गरीब देश के राष्ट्रपति के लिए इतनी बड़ी रकम लेना ठीक नहीं है। उन्होंने शुरुआत में केवल 50% वेतन (5,000 रुपये) लिया और बाकी हिस्सा सरकारी कोष में छोड़ दिया।


अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में तो वे केवल 2,500 रुपये महीना ही वेतन लेते थे। सेवानिवृत्त (Retire) होने के बाद मिलने वाली पेंशन को भी उन्होंने लेने से मना कर दिया था और सदाकत आश्रम (पटना) की एक साधारण सी ढहती हुई कुटिया में रहने चले गए थे। जरा ठहर कर इसकी तुलना वर्तमान वक़्त, माहौल और मनुष्यों से करेंगे तो लगेगा ये किस ग्रह की बातें हैं या फिर ये किस दौर का ज़िक्र हो रहा है। 


राष्ट्रपति के रूप में उन्हें देश-विदेश से अनगिनत कीमती उपहार मिलते थे। राजेन्द्र बाबू उन सभी उपहारों को 'तोशखाना' (सरकारी खजाने) में जमा करवा देते थे। जब उनकी पोती की शादी तय हुई, तो परिवार के लोगों ने सुझाव दिया कि उन्हें मिले उपहारों में से कुछ चीजें पोती को दी जा सकती हैं।

                                            


इस पर राजेन्द्र बाबू ने सख्त लहजे में कहा, "ये उपहार राजेन्द्र प्रसाद को नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रपति को मिले हैं। इस पर मेरी बेटी या परिवार का कोई हक नहीं है।" उन्होंने शादी का पूरा खर्च अपनी निजी बचत से उठाया। सान 1950 से सान 1962 तक वे भारत के राष्ट्रपति रहे। उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1962 में डाक-टिकट भी जारी किया था।


आज के दौर को देखते हुए यह विश्वास करना कठिन है कि अभी आधी सदी पहले तक राजनैतिक शुचिता और ‘पर्सनल इंटेग्रिटी’ को इतना उच्च मुकाम देने वाले और उसकी अनुपालना स्वाभाविक तौर पर करने वाले लोग हमारे देश के सार्वजनिक/ राजनैतिक  फलक पर थे।         

                                                      


Wednesday, November 4, 2026

तुमको पता है जी?

 1. जे. एफ. मदान निर्देशित फिल्म ‘इन्द्रसभा’ (1932) में 71 गाने थे, जो अब तक का रिकॉर्ड है। फिल्म 3 घंटे 31 मिनट लंबी थी, जिसमें 9 ठुमरी, 4 होली-गीत, 31 गज़ल, 5 छंद, 2 चौबेला और अन्य सामान्य गीत थे।

                                      

 

                                


2. दूसरे नम्बर पर फिल्म शीरीं फरहाद (1931) (मदन थियेटर, कलकत्ता निर्मित) रही जिसमें 42 गीत थे।
                                    



3. जाॅनी वाकर, असली नाम बदरुद्दीन क़ाज़ी (1926-2003) ने बतौर मेन लीड (हीरो) भी कई फिल्में कीं थीं जैसे ‘दुनिया रंग रंगीली’ 1957, खोटा पैसा 1958, मिस्टर जाॅन 1959, मिस्टर कार्टून एम.ए. 1958, रिक्शावाला 1960 और जाॅनी वाकर 1957 ‘दुनिया रंग रंगीली’ में राजेंद्र कुमार एक साइड रोल में नज़र आये थे।
                                  


4. फिल्म पैगाम 1959 में नायिका वैजयंतीमाला की मां का रोल उनकी असली मां वसुधंरा देवी ने किया था जो अपने समय की विख्यात अभिनेत्री/नर्तकी थीं

                                                   


5. भारतीय सिने जगत काले रंग से बहुत प्रभावित मालूम देता है। बाॅस लोग मिलने-मिलाने, लेन-देन के लिये काली पहाड़ी को चुनते हैं। गौर कीजिये फिल्मों के नामों पर: काला चोर, काला पानी, काला बाज़ार, काला पत्थर, काला आदमी, काला काला समंदर, काला घोड़ा, काला जादू, काला पहाड़, काला गुलाब, काला नाग, काला सवार, काला भूत, काला जिगर, काला सोना। गिनती जारी है…

Thursday, October 22, 2026

व्यंग्य: पुलिस और पजामा

 

                                                                


 

                 एक रील देखी। पुलिस वालों ने बनाई है जनसाधारण के लिये। यह एक प्रकार का रोल रिवर्सल है। अभी तक जन-साधारण पुलिस वालों के 'सात्विक' 'सनातन' 'सदव्यवहार' की रील बनाते रहे हैं।  रील से पता चलता है कि दिल्ली को 18 अक्तूबर 1861 को भारतीय पुलिस एक्ट से परिचित कराया।  फलस्वरूप दिल्ली में पाँच थाने स्थापित किए गए। ये थे सब्जी मंडी (18.10.1861) मुंडका (नांगलोई) (29.10.1861) महरौली ( 2.11.1861 ) कोतवाली (4.11.1861) और सदर बाज़ार (31.12.1861) इसी श्रंखला में बताया गया है कि तब अपने पजामे के चोरी हो जाने की एफ.आई.आर. एक बंदे ने कराई हुई है। पजामे की कीमत आठ आने लिखाई गयी है। ये एफ.आई.आर. सब्जी मंडी थाने में कराई गयी थी। एफ.आई.आर. नं. भी दिया है- 6/36,  अगले पर मतलब पाजामा चोर पर धारा 380 लगाई गयी है। एफ.आई.आर. की तारीख है 10 मार्च 1897 पूरी रील में बस एक बात मिसिंग है कि आखिर वो पजामा बरामद हुआ या नहीं? पजामा चोर पकड़ा गया या नहीं। क्या तब भी 'मंडावली' प्रथा हुआ करती थी? अगर पजामा चोर पकड़ा गया था तो उसे क्या सज़ा मिली? यूं पुलिस के रिकॉर्ड में यह भी होना चाहिए कि जो रिपोर्ट लिखाने आया था उसकी पुलिस ने क्या खातिरदारी की हां भई पहले तो ये बता तेरे पास ये इतना.मंहगा पजामा.खरीदने को आठ आने आये कहां से? तू करता क्या है? (अब 1897 हो, 1997 हो या फिर 2097 पुलिस आपको "आप" तो कहने से रही) ये तो सीधे-सीधे डी.ए. (डिसप्रोपेशनेट असैट) का केस लगता है। चल आजा ! पजामा कहां भागा जा रहा है। पहले तेरी जांच कर लें पजामे की फिर कर लेंगे। अगर पुलिस की पकड़ में ये पजामा-चोर आया होगा तो पुलिस ने जरूर वो गीत गया होगा

 

                      “आप आए तो ख्याल - ए - दिले नाशाद आया

                       कितने चोरी हुए पजामों का पता याद आया”

 

वैसे पुलिस ने उसका पजामा अच्छी तरह फाड़ा होगा। ऐसी मेरी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है। 1897 में पजामा भले आठ आने का था मगर मैं सोच रहा हूँ इस आठ आने के पजामे ने पुलिस के कितने पजामों का इंतज़ाम किया होगा। पर एक बात और है इस रील में सिर्फ संतरों, पजामे और चार आने की जेब-तराशी, टट्टू चोरी के केस ही 'शो-केस' किए हैं। क्या तब बड़े-बड़े केस हुआ नहीं करते थे या फिर उन्हें तब भी रफा-दफा कर दिया जाता था। उनकी 'ऑउट-ऑफ-कोर्ट' की तरह 'ऑउट ऑफ थाना' सैटलमेंट हो जाती थी। एफ.आई.आर. लिखी ही नहीं जाती थी। तब एफ.आई.आर. लिखना-लिखवाना आसान रहा होगा। यदि हाँ तो वह कौन सा 'काल खंड' था जब एफ.आई.आर. लिखना दुरूह से दुरूह होता चला गया।

 

आज की तारीख में अगर कोई इस तरह पजामे और संतरों की एफ.आई.आर. लिखाने जाये तो पुलिस कितना हँसेगी और हो सकता है कि शिकायत करने वाले का पहना हुआ पजामा भी छीन ले। "तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की"। आप कितना ही डिजिटल हो जाओ कितना ही कंप्यूटर ले आओ। थाने और एफ.आई. आर. का कोई अन्य विकल्प नहीं है। उर्दू में एफ.आई.आर. को पर्चा कटाना कहते हैं। पुलिस का पहला और अंतिम प्रयास यही होता है कि एफ.आई. आर. लिखी ही न जाये। कारण कि एफ.आई.आर. लिखी जाएगी तो उसका निपटारा भी करना पड़ेगा/दिखाना पड़ेगा। नहीं तो ये एफ.आई.आर. पेंडिंग दिखाई जाएगी, बोले तो मुंह चिढ़ाती रहेगी। यूं एक सूत्र ये भी है कि यदि घटनाएँ/वारदातें बोर्ड पर नहीं हैं तो आप अपनी पीठ थपथपा सकते हैं और अगर खुदा न ख्वास्ता बोर्ड पर लिखी इबारत 'अनकमफ़र्टेबल' सी लगे यानि ज्यादा लगे तो भी आप अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि "पिछले वाला अमला तो केस रजिस्टर ही नहीं करता था। हम न केवल रजिस्टर करते हैं बल्कि केस साॅल्व करने की भरसक भाग-दौड़ भी करते हैं"। गो कि फिगर घटे या बढ़े वाहवाही हमेशा पुलिस की ही होती है। नहीं तो ‘प’ से पुलिस आपको  ‘प’ से पजामा पहनने लायक नहीं छोड़ेगी। आप कब तक और कहाँ तक बचोगे? उनकी 'टैग लाइन' नहीं सुनी "हमेशा आपके साथ-आपके लिए" तो हुजूर टांगें सलामत रहें! पजामे हज़ार हैं

Sunday, October 18, 2026

निर्मला देवी और कुमकुम

 

वाराणसी (बनारस) में एक तबला उस्ताद वासुदेव नारायण सिंह  रहा करते थे। वे बनारस (वाराणसी) के संगीत जगत में वासुदेव महाराज के नाम से प्रसिद्ध थे। उनकी एक बेटी निर्मला (7 जून 1927) और एक बेटा लक्ष्मण नारायण सिंह थे। जो सिंह लक्ष्मण प्रसाद सिंह एक प्रमुख तबला वादक बने  और दुनिया उन्हें लच्छू महाराज के रूप में जानती है।


                                         


 

पारिवारिक परंपरा के अनुरुप बेटी निर्मला ने संगीत शिक्षा को अपनाया और पटियाला घराने की एक निपुण हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका बनीं। उनका दूसरा नाम दुलारी था। हांलाकि अपनी चाची द्वारा पालने की वजह से उन्हें नाज़िम नाम भी मिला। उन्होंने फिल्मों में अभिनय भी किया और 1942 की शुरुआत में उन्होंने 1940 और 50 के दशक में एक दर्जन से अधिक फिल्में दीं। 15 जून 1996 को उनका निधन हो गया।

 उन्होंने अपनी फिल्मों के  सह-कलाकार, गुलशन सिंह आहूजा से शादी कर ली। वे अपने स्क्रीन नाम अरुण से मशहूर थे। समय के साथ  दंपति के पांच बच्चे हुए। दो बेटे और तीन बेटियां।

                                       


वासुदेव महाराज ने बाद में एक मुस्लिम महिला से भी शादी रचाई उनकी मुस्लिम पत्नी का नाम मुन्नन था।  मुन्नन से वासुदेव महाराज के दो खूबसूरत बेटियाँ हुईं। ज़ैबुन्निसा और राधा। प्रसिद्ध कत्थक नर्तक पंडित शंभू महाराज ने कत्थक नृत्य में जैबुन्निसा को प्रशिक्षित किया। उनकी बड़ी बहन राधा एक अभिनेत्री बन गईं और उन्होंने राधिका नाम से  कुछ फिल्मों में अभिनय किया। मिस्टर एंड मिसेज 55, रात के राही, लाल निशान और शोला जो भड़के।

एक बार विख्यात निर्माता निर्देशक गुरुदत्त की पारखी नज़र जैबुन्निसा पर पड़ी। उन्होंने जैबुन्निसा को अवसर दिया। स्क्रीन नाम कुमकुम से जैबुन्निसा ने 115 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वह एक श्रेष्ठ नर्तकी थीं। रामानंद सागर की फिल्मों का वह  जरूर होतीं थीं। उन्होंने भारत की पहली भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियारी चढ़ाईबो' 1963 में अभिनय किया था। उनकी  अंतिम फिल्म 'एक कुँवारी एक कुँवारा' 1977 थी। फिर वे 1975 में सज्जाद अकबर खान (लखनऊ) शादी कर सऊदी अरब चलीं गईं। 28 जुलाई 2020 को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

                 

                                          


गुलशन सिंह आहूजा ने 1939 से शुरू कर अरुण आहूजा नाम से 40 से अधिक फिल्में दीं। उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म 'सेहरा' के फ्लाॅप होने के बाद उन्हें कार्टर रोड, बान्द्रा स्थित अपना बंगला बेचना पड़ा और 1960 के दशक में वे विरार में आ बसे। माधुरी दीक्षित की पहली फिल्म 1984 में रिलीज हुई फिल्म 'अबोध' में अरुण कुमार ने अपनी आखिरी सहायक भूमिका की थी।  3 जुलाई 1998 को उनका निधन हो गया। उनके अभिनेता बेटे गोविंदा को 'विरार का छोकरा' भी कहा जाता है।