किसी देश का वाकया है कि एक 87 वर्षीय
महिला ने अपने इलाके के निकटतम थाने को
फोन लगाया कि वह भूखी है, घर में अकेली है। उसे अकेलापन बहुत
खल रहा है और वह भूखी भी है। खाना वह खुद बना नहीं सकती। इतना सुनना था कि पुलिस
के दो कांस्टेबल उस महिला के घर आ गए। मज़े की बात ये है कि उन्होने उस महिला के
लिए खाना पकाया और उससे बातचीत की, साथ खाना खाया। हंसी मज़ाक
हुआ। तब से मैं ये सोच रहा था कि ऐसा मेरे देश में मुमक़िन है क्या ? और अगर हाँ तो कैसे मुमक़िन है ?
पहले तो 87 वर्षीय
महिला हमारे समाज में अकेली रह क्यूँ रही है। उसके सगे वाले कहाँ गए सब ? वह अमीर है या ग़रीब अब तक ज़िंदा
कैसे है ? चलो अगर ज़िंदा है भी तो अब तक किसी स्कैम वाले की,
जामतारा वाले की, नज़र उस पर क्यों नहीं पड़ी
अभी तक ? और फिर 'ऑफ-लाइन' वाले चोर, उचक्के, डकैत सब
कहाँ गए। डकैत और चोरों का उन्मूलन हो गया
क्या ?
दूसरे शब्दों में हमारे मुल्क़ में यह मुमकिन
ही नहीं है कि कोई 87 वर्षीय महिला अकेली रहे।
अकेली है तो बिना चोर-उचक्के अब तक कैसे बची हुई है। अब तक उसके पास कोई उसका
हमदर्द बन कर या दूर का रिश्तेदार बन कर नहीं पहुंचा ? उसके
साइन करा के या नकली साइन कर उसकी दौलत से उसे अलग क्यों नहीं किया। इसी तरह के कई
सवाल मन में तैरने लगते हैं।
सारांश ये है कि हमारे समाज में ये मुमक़िन
नहीं कि आप के पास कुछ भी संपत्ति है धन दौलत या जायदाद है और आप को कोई अकेला
रहने दे। आपके एकाकीपन को कम करने या मिटाने को बहुतेरे रिश्तेदार आने को तत्पर
बैठे होते। और वह कहावत है न:
रांड सांड़ सीढ़ी संन्यासी
इन से बचे तो सेवे काशी
सो
अगर ये नानी जी या दादी जी अपने अपनों अर्थात बेटा बहू, नाती-पोतों से बच गईं हैं तो ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं। मुम्बई में
एक टीनेजर ने अपनी दादी की हत्या सिर्फ इसलिये कर दी कि दादी जब भी शहर आती है तो
उन्हें उसके कमरे में ही क्यों सुलाया जाता है। उसकी प्राइवेसी का क्या ? पूरे प्रकरण में अभी तो बाहर के प्लेयर्स बाकी हैं।
और प्लेयर्स की प्लेयर हमारी पुलिस उसका क्या ? सोचा है आपने ? आपकी धन संपत्ति हल्की करनी हो अथवा
पृथ्वी को ही आपसे हल्का करना हो हमारी पुलिस की तो घोषित पॉलिसी है:
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