Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Saturday, March 22, 2025

व्यंग्य: हाउस और आउट हाउस


         

                       जिन्हें नामालूम हो उनकी मालूमात के लिए बता दूँ आउट हाउस घर के बाहर, सामान्यतः पिछले हिस्से में सर्वेंट क्वाटर को कहते हैं। बड़े-बड़े बंगलों खासकर अंग्रेजों के ज़माने के विशाल बंगलों में आउट हाउस आम पाये जाते हैं। बल्कि एक से अधिक आउट हाउस होते हैं। जिनमें मुख्य हाउस में रहने वालों के बैरा, खानसामा, कपड़े धोने/प्रेस करने वाले रहते आए हैं।

 

                    जिन पाठकों को तम्बोला (हाऊसी) का पता है वो जानते हैं कि हाउस के बाद तम्बोला में आउट हाउस अथवा सेकंड हाउस होता है। जो कि हाउस में निर्धारित ईनाम की राशि से कम का होता है। आजकल जिस प्रकार की राशि आउट हाउस में पाई जा रही है। आउट हाउस की ईनाम राशि कहीं ज्यादा होनी चाहिये। बशर्ते आग- वाग ना लगे या लगाई जाये। सोचो ! लोगबाग कहने लग पड़ेंगे अपुन के तो आउट हाउस में भी करोड़ों यूं ही पड़े रहते हैं किसे फुर्सत है जो बैठ कर गिने कि कितने हैं?


         पता लगे धीरे-धीरे बिल्डर अब कार पार्किंग और गैरेज की जगह आउट हाउस के भी विज्ञापन देने लग पड़ेंगे। हमारे आउट हाउस में 'बिल्ट- इन' फायर रजिस्टेंट अलमीरा हैं। आउट हाउस में सेफ (तिज़ोरी) के विज्ञापन दिये जाया करेंगे। कोई-कोई स्मार्ट बिल्डर तो कहने भी लग पड़ेंगे 'हमारे आउट हाउस की तिज़ोरी की कैपेसिटी सौ करोड़ है। जैसे फ्रिज का 'स्पेस' नापते और विज्ञापित करते हैं। क्या समां रहेगा लोग बाग वीकेंड पर निकल पड़ा करेंगे घर बाद में देखेंगे, पहले आउट हाउस दिखाएं ! कितना बड़ा है? आग से बचने के क्या-क्या उपकरण आपने लगाए हैं? 

 

          एक शहर के बड़े अधिकारी की बंगले में जब आउट हाउस में कच्ची शराब की भट्टी पकड़ाई गई तो उस अधिकारी ने साफ कह दिया इस आउट हाऊस से मेरा क्या लेना देना। इसमें जो नौकर रहता है उसे पकड़ो। दर असल उस सूबे में शराबबन्दी थी। अब इतने बड़े अधिकारी के बंगले पर किसका शक जाएगा। सामान्यतः आउट हाउसों की एक एंट्री पीछे से भी होती है बस भाई का कारोबार उसी एंट्री से फल-फूल रहा था। 


जिस केस का मैंने ऊपर ज़िक्र किया उसमें एक थ्यौरी यह भी चल रही है कि किसी दिलजले ने बदला लेने अथवा बदनाम करने की गरज से रुपयों में आग लगा दी। इससे पहले ऐसा मैंने इंगलिश फिल्मों में देखा है। नायक क्यों कि धीरोदात्त और भीषण उच्च श्रेणी का चरित्रवान होता है अतः वह यह ‘पाप’ की कमाई छूना भी नहीं चाहता उसके लिए इनका कोई मोल नहीं। उसका जनम तो इस ‘पापी’ विलैन  को सबक सिखाने और समाज से बुराई जलाने को हुआ है अतः वह आव देखता है ना ताव और रुपयों के ढेर में आग लगा देता है। बिना पीछे मुड़े चल देता है। किसी और के ढेर में आग लगाने। 


  एक अधिकारी ने सबकी नाक में बहुत दम कर रखा था। जब अगले का ट्रांसफर हुआ तो इसी तरह के किसी दिलजले ने उसके रेल के वैगन जिसमें उस अधिकारी का घर का समस्त सामान, फर्नीचर बोले तो ‘पाप’ की कमाई जा रही थी, में एक पलीता नज़र बचा कर छोड़ दिया। जब तक अगले का सामान गंतव्य स्टेशन तक पहुंचा अंदर केवल  राख़ ही राख़ मिली। 

  

                           राख़ के ढेर में शोला है ना चिंगारी है 

     

            आज से गांठ बांध लीजिये। हाउस से कहीं बढ़कर है आउट हाउस सुने नहीं हैं:  


                    “स्वामी से सेवक बड़ा चारों जुग प्रमान

                     सेतु बांध राम गए लांघ गए हनुमान”


अतः गौर कीजिये चहुं ओर यश ही यश है। (तुम्हारे) आँचल ही ना समाये तो क्या कीजे।

Saturday, March 15, 2025

व्यंग्य: मिस्टर नेगेटिव


आपने देखा होगा जैसे लोग कुछ भी हो जाये पॉज़िटिव बने रहते हैं उसी तरह ठीक उसके उलट ऐसे लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है और आप भी बहुतों को जानते होगे जो कूट-कूट कर भयंकर रूप से नेगेटिव होते हैं। उन्हें हरदम लगता रहता है बस अब पृथ्वी का अंत होने ही वाला है। मेरे कॉलेज में एक सहपाठी था, जब टीचर ने सबसे पूछा कौन क्या बनना चाहता है तो मैंने कहा मैं टीचर बनना चाहता हूँ। पीरियड के बाद यह लड़का मेरे पास आया और बोला “टीचर की नौकरी बेकार है एकदम फिजूल है। मुझे ताज्जुब हुआ वह ऐसा क्यों कह रहा है जब पूछा तो बोला “ये भी क्या ज़िंदगी है टीचर सारी उम्र खड़िया (चाॅक) से खेलता रहता है।“ उसका ये संवाद मुझे आज भी हू ब हू याद है। 50 साल बाद पता चला वह एक एडवोकेट है। मुझे पक्का यकीन है अगर तब किसी ने वकील बनने की कहा होता तो उसने अपने पूरे ज़ोर शोर से उसे निरुत्साहित करना था। 


            ऐसे लोगों के दिमाग में निगेटिविटी के कीटाणु हर वक़्त तैरते रहते हैं। घर की वाईट वाशिंग ना कराने के वो दस कारण बता सकते हैं। इसी तरह जब रिश्ते की बात चले तो कैसे रिश्ता तुड़वाना है वो भलीभांति जानते हैं।  मसलन वो कह सकते हैं कि लड़की इतनी दूर नौकरी से कैसे आया-जाया करेगी। आप कहें कैब है, तो वे कहेंगे रात-बिरात बहुत दिक्कत होती है ये कैब ड्राइवर आजकल सब क्रिमिनल है। आप कहें आप ले आया करोगे तो उन्होने कहना है ये प्रेक्टिकल नहीं है। कब तक ये लाना ले जाना चलता रहेगा, यह ज्यादा नहीं चलता अतः इस रिश्ते में कोई भविष्य नहीं है। आप इसका भी कोई तोड़ निकाल लें तो उनके पास एक ब्रह्मास्त्र रहता है अरे ये लड़की तो ‘लियो’ है जबकि लड़का ‘सेगीटेरियस’ है। ये तो शादी चलनी ही नहीं है। ये निभेगी नही। 


ये लोग घर में इतनी निगेटिविटी फैलाते हैं कि धीरे धीरे लोग इनके घर आना ही छोड़ देते हैं। ये बात इनको सूट भी करती है। इनके बीवी बच्चे तो इनसे पहले से ही त्रस्त होते हैं।  अब बेचारे कहें तो किससे, करें तो क्या करें। हमारे एक चचा थे उन्होने अपने बच्चे का एडमिशन बहुत अच्छे मार्क्स के बावजूद किसी बेहतर कॉलेज में ना कराके अपने घर के सबसे नज़दीक के थके हुए कॉलेज में  कराया जो सड़क पार करके ही था। उसमें भी वो उसे छोड़ने जाते थे और अगर शाम को वह आने में जरा भी लेट हो जाता था तो वे सड़क के इस पार खड़े होकर उसका इंतज़ार करते रहते थे। जब उनके कॉलेज का ट्रिप शिमला गया तो उन्होने अपने बेटे को शिमला के बीसियों नुकसान और जोखिम गिना दिये थे। जैसे कि ये पहाड़-वहाड़ हम दिल्ली वालों के लिए नहीं है। वहाँ की तेज हवाएँ तुम्हें उड़ा कर ले जा सकती हैं। वहाँ की आबोहवा में तुम बीमार पड़ जाओगे, वहाँ इतनी ठंड पड़ती है कि तुम सहन नहीं कर पाओगे। पहाड़ पर चलने की तुम्हें प्रेक्टिस नहीं है। तुम सोचोगे सड़कें दिल्ली की तरह हैं जबकि कहीं भी तुम्हारा पैर फिसल सकता है और मीलों नीचे खाई में। 


                ऐसे लोग से अगर आप कहें कि आप को मुल्क का राष्ट्रपति बना देते हैं तो इस पर भी वे दस ऐसे कारण बता सकते हैं कि क्यों राष्ट्रपति बनना कोई बहुत अच्छा प्रस्ताव नहीं है। मसलन वो कह सकते हैं दिल्ली का मौसम बेकार है, ट्रैफिक बहुत है, पाॅलुशन बहुत है, आप हरदम सिक्यूरिटी गार्ड्स से घिरे रहोगे आप चाह कर भी करोल बाग जाकर गोलगप्पे नहीं खा सकते। सोचो ये भी कोई नौकरी हुई कि इंसान अपने मन का खा भी ना सके। राष्ट्रपति भवन बहुत बड़ा है ऐसी जगह भूतों का वास रहता है। भूत ना भी हों तो आपको वैसे ही इतने बड़े भवन में डर लगता रहेगा। ये भी क्या नौकरी है हरदम डर के साये में जियो, रात को चुड़ैल और भूतों का आतंक दिन में इतने पुलिस वाले आपके आगे पीछे घूमेंगे पता नहीं कब किस से भूलवश गोली चल जाये ? आजकल अभिनेताओं के घर में अपने आप पिस्टल से गोली चल जाती है और उनके पाँव में गोली लग जाती है। आज अभिनेता के लगी है, कल नेता भी हो सकता है।

Tuesday, March 11, 2025

व्यंग्य 2013 से बिन नहाये

 

                                                              


       कई बार यह देखने में आता है कि इंसान कोई फैसला कर लेता है, कोई प्रतिज्ञा कर लेता है कि फलां काम वो तभी करेगा जब यह हो जाएगा या वो हो जाएगा या ढिकाना काम हो जाएगा।  इसी श्रंखला में एक सूबे के नेताजी  ने रहस्य उदघाटन किया है कि किसी एक देश के पी.एम. 2013 में भारत आए थे गंगा स्नान करने, किन्तु गंगा में तब की गंदगी देख कर उन्होने फैसला ले लिया और वे बिन नहाये ही चले गए। 


     यह बात नेता जी ने मूलतः यह बताने को करी है कि 2013 की तब की गंगा और आज की 2025 की गंगा में बहुत अंतर आ गया है। बोले तो गंगा में बहुत पानी बह गया है। यूं कहने को तो कहा जाता है कि माँ कभी बदलती नहीं है।  चूँकि गंगा को लोगबाग माँ कहते हैं और कहना चाहिए कि माँ कहते थकते नहीं है फिर बदलने वाली बात समझ नहीं आई। खैर ! बड़े लोगों की बड़ी बातें। दुनियाँ में सब कुछ कम्परेटिव (तुलनात्मक ) होता है अतः हो सकता है 2013 की तुलना में 2025 की गंगा साफ, बोले तो स्वच्छतर हो गयी हो। कोई भुक्त भोगी जिसने गंगा स्नान 2013 और 2025 दोनों में किया हो, वही इंसान इस बात की तसदीक कर सकता है। 


             मेरी चिंता दूसरे किस्म की है। क्या जो बाहर के मुल्क के पी. एम. आए थे उन्होने 2013 के बाद स्नान किया कि नहीं। बोले तो अपने घर, अपने देश लौट कर भी स्नान किया अथवा नहाने से उनका मन ही फिर गया । अब उनकी तबीयत स्नान करने की होती ही नहीं। 2013 से तो बहुत साल हो गए वो पी.एम. साब इस बार, बोले तो 2025 में तो गंगा स्नान करने आए ही नहीं। अरे कोई देख कर बताओ वो अब पी.एम. हैं भी या नहीं। मज़े की बात ये है कि गंगा यदि गंदी हो गई है, प्रदूषित हो गई है तो इसकी जवाबदारी भी हमारी ही है। अर्थात गंदी हो या साफ दोनों हम इन्सानों ने ही करना है। मैंने तो जब से होश संभाला है यही सुना है कि गंगा को साफ करना है। तरह तरह की स्कीमें, तरह की योजनाएँ। स्थायी अस्थायी निकाय बनाए गए हैं। बोले तो मंत्री-संतरी सब ही हैं। माँ गंगा के पुण्य प्रताप से गंगा के नाम पर फंड की कोई कमी नहीं। पर फिर भी गंगा है कि सम्पट में नहीं आ रही है। 


           गंगा साफ कराते कराते न जाने कितने नेता साफ हो गए।  तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ गए। मगर गंगा जस की तस बल्कि लोग कहते हैं और अधिक प्रदूषित हो गई है। गंगा ने ना जाने कितनी फिल्में और कितने गीतों को प्रेरणा दी है। वो कहते हैं ना गुरु गुड़ ही रह गए और चेला शक्कर हो गया । गंगा के नाम पर लोग बन गए, गंगा वहीं की वहीं। आप देखो तो गंगा का काम ही लोगों को तारने का है। सो तारे जा रही है। लोग मचल रहे हैं गंगा हमें भी बुला ले।  काश: हमें भी गोद ले ले तो वारे न्यारे हो जाएँ। पर इतना आसान नहीं है। गोद लेने की प्रक्रिया बहुत क्लिष्ट होती है। नदियों पर खूब बड़े बड़े थीसिस लिखे गये हैं।  समय आ गया है कि गंगा पर भी लिखा जाये कि कैसे गंगा लोगों को तारती आ रही है। लोग गंगा स्नान करके कहाँ से कहाँ पहुँच गए। अब कोई पी.एम. नहाना ही नहीं चाहे तो उसे कौन नहला सकता है।  बचपन में माँ-बाप मुझे बाथरूम भेजते थे तो मैं बस नल चला देता था और थोड़े छींटें मारके  तौलिया से बदन पोंछता हुआ बाहर निकलता था।  सब समझते थे मैं नहा लिया। ऐसे ही ये पी.एम. महोदय जो बाहर-गाँव से आए थे उन्होने कुछ  किया होगा। मेरी जिज्ञासा और किस्म की है: ये आगंतुक पी.एम. 2013 के बाद नहाये भी हैं या नहीं ?

Wednesday, February 26, 2025

व्यंग्य : बीड़ी और बलात्कार

                   

                                              


       


             मैं समझता था बीड़ी और बलात्कार का कोई रिश्ता नहीं होता। अब पता चला कि दोनों में बहुत गहरा सम्बंध है। एक सूबे के एक पार्टी के चीफ जब बलात्कार के आरोप में अंदर हुए तो उनकी बिरादरी के लोगों ने पंचायत की और एकमत से इस बात पर सहमति हुई कि जब मौज्जिज बीड़ी भी नहीं पीता है तो वह बलात्कार कैसे कर सकता है ? 


      इससे कई बातें स्वयं सिद्ध होती है जैसे कि जो बीड़ी पीते हैं उनसे सावधान रहने की ज़रूरत है। न जाने कब अगला बीड़ी पीते-पीते बलात्कार पर उतर आए। उससे ज्यादा इस बात का भी खतरा है कि यदि कोई भद्र महिला आपके आस-पास बीड़ी पी रही हो तो आदमियों को सावधान रहने की ज़रूरत है। इस पंचायत में यह नहीं बताया गया कि कौन सी ब्रांड की बीड़ी से बलात्कार वाला निकोटीन निकलता है और किस ब्रांड की बीड़ी से संस्कारी धुआँ। हमारे बचपन में एक बाईस नंबर की, एक सत्ताईस नंबर की बीड़ी चलती थी। एक पहलवान छाप बीड़ी भी थी। जिस पर एक पहलवान की तस्वीर छपी होती थी। ऐसा प्रतीत होता था जैसे इस पहलवान सी बॉडी पाने के लिए पहलवान छाप बीड़ी का सेवन ज़रूरी है। यूं एक 501 बीड़ी भी चलती थी। बीड़ी पी कर तो पता नहीं किंतु बीड़ी बनाने वाले नाबालिगों के शोषण की खबरें आती रहतीं हैं। फिल्मी गाना "बीड़ी जलाये ले जिग़र से पिया" को आप देखें सुनें तो लगने लगता है कि बीड़ी और बलात्कार में कुछ तो वैध-अवैध संबध है। नायिका ने बीड़ी पी पी कर, पी पी कर अपने जिग़र को ऐसा अंगार माफिक कर लिया है कि वह आव्हान कर रही है कि आप चाहें तो उसके जिग़र से बीड़ी जला सकते हैं। अब जब जिग़र ऐसा अंगार माफिक है तो ज़िस्म के अंदर इसकी गर्मी का फैलना तय है। इसलिये आप बीड़ी और बलात्कार के क्लोज़ लिंक से इन्कार नहीं कर सकते। उसी ओर पंचायत ने संकेत किया।


         अदालत में एक नया अध्याय इस दलील से जुड़ेगा कि जब एक इंसान बीड़ी नहीं पीता है तो वह बलात्कार कैसे कर सकता है ?  यह एक नवीनतम विषय है सभी मनोवैज्ञानिकों, मेडिकल वालों और बीड़ी मेनुफ़ेक्चररों के लिए। इस को वो अपनी टैग लाइन भी बना सकते हैं: 


हमारी बीड़ी बलात्कार के कीटाणुओं से मुक्त है।


नई जापानी टेकनीक से बलात्कारी कीटाणुओं को मशीन से अलग किया जाता है। 


     जबकि अंडरग्राउंड / ग्रे-मार्किट में धड़ाधड़ बलात्कारी बीड़ी बिका करेगी। सरकार प्रतिबंध पर प्रतिबंध लगाया करेगी। बड़े-बड़े होर्डिंग लगा करेंगे। 


सावधान बीड़ी बलात्कार को बढ़ावा देती है। बीड़ी को न कहें। संस्कारी बनें


         मुझे पता नहीं अदालत ने इस दलील को कैसे लिया और नेता जी को इस बीड़ी न पीने का कोई लाभ इस बलात्कार के केस में मिलेगा अथवा नहीं। यदि मिला तो फैसले में लिखा जाएगा क्योंकि मुल्ज़िम के बीड़ी पीने के कोई सबूत नहीं मिले हैं अतः उसे बलात्कार के इल्ज़ाम से बाइज्जत बरी किया जाता है। अदालतों में बड़ा रोचक माहौल रहा करेगा। दूसरे पक्ष का वकील गवाह पेश करेगा, जिसमें वो कहेंगे हमने मुल्ज़िम को सरेआम बीड़ी पीते देखा अतः बलात्कार इसी ने किया है। फिर मुल्ज़िम का वकील अपना गवाह पेश करेगा जैसे हिन्दी फिल्मों में लास्ट निर्णायक गवाह ऐन मौके पर अदालत में घुसता है “ रुक जाइए मी लॉर्ड ! मुल्ज़िम के मोहल्ले में मेरी पान बीड़ी की इकलौती दुकान है और मैंने अपनी बीस साल की दूकानदारी में मुल्ज़िम को कभी अपनी दुकान पर नहीं देखा ” 


             इस सारे केस में एक टेक्निकल मुद्दा ये है कि क्या यह बलात्कार और बीड़ी का ही चोली-दामन का साथ है या फिर सिगरेट, पाइप, सिगार, तंबाकूवाला पान और गुटखे का भी कोई लेना-देना है। इस पर अनुसंधान की आवश्यकता है। हो सकता है किसी यूरोपीय देश की कोई स्टडी सामने आ जाये जैसे कि बीड़ी पीने से उल्टा नपुसंकता आ जाती है और आदमी बलात्कार क्या, सम्बंध बनाने से ही दूर भागता है। धीरे-धीरे वो उस ‘निर्वाण’ की स्थिति में पहुँच जाता है  जहां वह बलात्कार से ज्यादा बीड़ी प्रेफर करता है।




 

व्यंग्य: चुनावी रेवड़ी

 

 

                 एक फिल्मी गीत है “जब चली ठंडी हवा... जब घिरी

 काली घटा... मुझको ऐ जाने वफा तुम याद आए”। बस इसी तर्ज़

 पर जब चलती है चुनावी हवा सियासतदानों को रेवड़ी याद आती हैं

 तरह तरह की रेवड़ी, किसम किसम की रेवड़ी। सब अपनी रेवड़ी को दूसरे की रेवड़ी से मीठी और पौष्टिक बताते हैं। वैसे कहावत तो यूं थी कि ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर फिर अपने को दे’। मगर ये सियासतदान वोटर को अंधा समझते हैं या बनाते हैं। वे खुद अंधे नहीं होते।

 

            जब हम देते हैं तो वह ‘सम्मान राशि’ कहलाती है। जब विरोधी पक्ष देता है तो वो गरीब की गरीबी का मज़ाक उड़ा रहा होता है। उन्हें ये ‘रेवड़ी’ बांटता है। गरीब खूब ही खुश है क्योंकि वह दोनों से दोनों हाथों से रेवड़ियाँ लूट रहा है। वोट वह अपने विवेक अनुसार देता है। मेरा मतलब है कि वह देखता है किस की रेवड़ी में दम है। किसकी रेवड़ी लॉन्ग लास्टिंग है। यह रेवड़ी आजकल की  शादी-ब्याहों की तरह हो गई है। जैसे आजकल लोग बाग शादी में जाने से पहले ही पूछ लेते हैं कि कॉकटेल कब है उसी तरह अगर कोई उम्मीदवार रेवड़ी नहीं दे रहा है तो उसको भीड़ जुटाने के भी लाले पड़ जाते हैं। वोटर चुस्त है। वो वायदों का यकीन कम करता है। उसे हाथ में रेवड़ी रूपी एक चिड़िया चाहिए ना की झाड़ी में छुपी दो चिड़िया का वादा।

 

इसमें वो रेवड़ी शामिल नहीं जो छदम वोटर को मिलती है। एक से ज्यादा वोट डालने की। वोटर को घर से बूथ तक लेकर आने की। वोटर का आजकल नेताओं की तरह ही कोई भरोसा नहीं रह गया है। वो कंबल एक से, शराब दूसरे से और नगद तीसरे से लेकर वोट किसी चौथे को दे आता है और बाकी तीनों का ‘चौथा’ सम्पन्न कर देता है। अब उम्मीदवार ने ऐसे में भगवान का, गंगाजल का, इसकी-उसकी सौगंध का सहारा लेना शुरू कर दिया है। वोटर को चेतावनी के तौर पर डराने-धमकाने का रिवाज भी चल निकला है। जैसे अगर हमें वोट नहीं दिया तो हमें सब पता चल जाएगा फिर देखना। भीरू वोटर वैसे अपने बाल-बच्चों की कसम से या गंगाजली उठाने मात्र से मन ही मन ठान लेता है कि वोट अमुक पार्टी को ही देना है। हमारे देश में डेमोक्रेसी बहुत आगे तक आ गई है। अब ये पीछे लौटने से रही। ईमानदार और ग़रीब उम्मीदवार अब सिर्फ वोट कटवा के काम आते हैं या फिर पैसे लेकर ऐन मौके पर फलां उम्मीदवार के फ़ेवर में बैठने के।

 

               अब तो कोर्ट कचहरी भी कहने लगे हैं कि रेवड़ी से परजीवी वर्ग पैदा होता है। हमारे देश में तरह तरह के ‘जीवी’ पाये जाते हैं। मसलन परजीवी, केमराजीवी, आन्दोलनजीवी। ऐसा सुनते हैं कि चीन के एक नेता कहा करते थे कि जब मैं ‘कल्चर’ शब्द सुनता हूँ तो अपनी बंदूक की तरफ बढ़ता हूँ। उसी तरह भारत में ‘विकास’ शब्द का बहुत ‘मिसयूज’ हुआ है। ‘कुछ भी’ और ‘सब कुछ’ विकास कहलाने लगा है। आप विकास के नाम पर पेड़ लगा सकते हो, पेड़ काट सकते हो। आप मकान गिरा सकते हो, आप मकान बना सकते हो। आप ज़मीन से बेदखल कर सकते हो, आप शौचालय बना सकते हो। गोया कि आप कुछ भी करो वो कहलाएगा विकास ही और जो आपके इस ‘विकास’  को विकास ना समझे आप जानते हो ऐसे इंसान को क्या कहते हैं ?  ठीक समझे ‘एंटी-नेशनल’।

Tuesday, January 14, 2025

व्यंग्य: बीवी को घूरने में बरकत है


 

       अब यह बात मैं आपको कैसे समझाऊं कि बीवी को घूरने में ही बरकत है। बस इतना ख्याल रखें कि वह आपकी अपनी बीवी हो। मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता जो कॉर्पोरेट हेड होंचो जी ने कही कि आप अपनी बीवी को कब तक घूरेंगे। सर जी ! पूरी पूरी उम्र गुजर जाती है। लोग पागल नहीं हैं जो यूं ही शादी की सिल्वर जुबिली और गोल्डन एनिवर्सरी मनाते फिरते हैं। वो दरअसल घूरने की ही एनिवर्सरी मना रहे होते हैं। आपने शम्मी कपूर जी का वो गाना नहीं सुना :

 

    बार बार देखो हज़ार बार देखो ये देखने की चीज़ है हमारा दिलरुबा

 

      लव मैरिज में यह कोई मुश्किल काम भी नहीं। हमारे माता-पिता और दादा-दादी के ज़माने में तो बिना देखे ही शादियाँ होतीं थी और ये घूरने घारने का प्रोग्राम शादी के बाद जीवन पर्यंत चलता था। आप एक इतवार की बात करते हैं यहाँ थोड़ी सी देर होने पर पत्नी परेशान हो जाती है। आप कहाँ रह गए थे ? देखो मैंने कितनी अच्छी साड़ी आपकी लिए पहनी है ! प्लीज आओ और मुझे घूरो। घूरने को आप एक तरह से साइकाॅलाॅजी का 'पॉज़िटिव स्ट्रोक' समझो। जब घूरने वाला ही ना हो तो सजने-सँवरने का अर्थ क्या है ? किसके लिए? अतः घूरना हमारी कोई समस्या नहीं है। बल्कि राष्ट्रीय हॉबी है। घूरने से प्यार बढ़ता है। ना घूरने से मन में कई तरह के शक़ पैदा होने शुरु हो जाते हैं ? ये मेरी तरफ क्यूँ नहीं देख रहा है ? हो ना हो कोई और कलमुँही तो नहीं आ गई इसकी ज़िंदगी में ?

 

           हम भारतीय तो घूरने के लिए कितनी दूर-दूर तक का सफर करते हैं कभी गोआ के बीच कभी पटाया बीच। ये आँखें ईश्वर ने घूरने के लिए ही दी हैं। ये फाइलों में कागज काले करने और बेफिज़ूल के टार्गेट के पीछे दीदे फोड़ने को नहीं दी हैं। मनुष्य आदिकाल से घूरता रहा है, कहते हैं जब जंगली जानवर सामने आ जाये तो आप उसकी आँखों में आँखें डाल कर घूरें। वह खुदबखुद चला जाएगा। मनोज कुमार जी से बड़ा कौन भारतीय होगा। उन्होंने तो अपना नाम तक भारत रख लिया। वे अपनी फिल्म में संदेश देते हैं:

 

             तेरी दो टकियां दी नौकरी...

 

          इस नौकरी के पीछे आप हमें हमारे नैसर्गिक घूरने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते। मेरी सरकार से अपील है घूरने के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल किया जाये। ताकि इस घूरने को लेकर कोई कितना भी बड़ा कॉर्पोरेट हेड हो, लूज़ टाॅक ना कर सके।

 

     हमारे जीवन में और है क्या ? अब अगर हम घूरें भी नहीं तो क्या अपनी आँखें फोड़ लें? हम तो घूरेंगे। यह कोई ग़ैर कानूनी काम नहीं है। मैं पूछता हूँ भगवान ने आंखे दी किस वास्ते हैं ?  आप नहीं घूरना चाहते मत घूरो कोई आपसे घूरने को कह भी नहीं रहा है। असकी बात तो ये है कि अब आपकी उम्र सिवाय घूरने के और किसी काम की रह भी नहीं गई है। अतः आपको अन्य लोग जो घूरने से आगे बढ़ जाते हैं उन्हें लेकर आपके मन में ईर्ष्या का भाव है, आप तो असल में अब बस घूर ही सकते है। चचा ग़ालिब ने एक जगह लिखा है:

      गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है

     रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे

 

 

मृत्यु के वक़्त भी कहते हैं आँखें सबसे लास्ट में घूरना बंद करती हैं:

 

कागा सब तन खाइयो ये दो नैना मत खाइयो जिनमें पिया मिलन की आस

 

 या फिर

 

मरने के बाद भी आँखें खुली रही उन्हें आदत थी इंतज़ार की

 

      शायरों ने इस देखने, घूरने, निहारने पर दीवान के दीवान लिख रखे हैं। कभी इस ऑफिस के जंजाल से फुरसत निकाल कर उन्हें पढ़िये। आपको घूरने के फवायद समझ आ जाने हैं। आप कितने ग़ैर रोमांटिक इंसान होंगे समझ आ रहा है।

 

इन फाइलों और टारगेट्स ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

 

     आप घूरें और खूब घूरें इससे डेफ़िनिटली प्यार बढ़ता है। आप आज से ही इस पर अमल करना शुरू करें और अपने घर में ही इस अमृत काल में अमृत चख कर देखें

Saturday, January 11, 2025

व्यंग्य : ना कोई घुसा है ना कोई घुसा हुआ है

 


     

        बचपन में जब भी मेरे कम मार्क्स आते थे घर में माता-पिता और स्कूल में टीचर दोनों एक सुर में कहते थे इसके दिमाग में तो ना जाने कौन घुसा हुआ है ? ना जाने दिमाग में क्या है ? कहाँ ध्यान रहता है ? घर में माता-पिता थोड़ा 'स्पेसिफिक' डांटते और बताते जाते इसकी खोपड़ी में गोबर भरा हुआ है अथवा भूसा घुसा हुआ है। मैंने तभी से ये वाक्य रट लिया था और पूरे जतन से उनको यक़ीन दिलाने की कोशिश करता ना कोई घुसा है, ना कोई घुसा हुआ है।

 

       टीनएज आते-आते जब कविता-वविता लिखने लगा तो घरवालों को पूरा-पूरा शक पड़ना शुरू हो गया कि हो ना हो वो पड़ोस की लड़की मेरे दिलो दिमाग में घुसी हुई है और जब तलक वो नहीं निकलेगी मेरा कुछ भी नहीं हो सकता। मैं फिर उनको कहता- ना कोई घुसा है ना कोई घुसा हुआ है। पर मेरे माता-पिता भी आजकल के देशवासियों की तरह ही थे उनको इस बात पर कतई विश्वास ना होता। अब इससे ज्यादा मैं क्या कर सकता था।

 

     फिर और बड़े हुए और नौकरी करने लगे तो सब पूछते कितनी सेलेरी मिलती है मैं बताता तो बहुतों को वो बहुत ज्यादा मालूम देती। वो कहते ये ना जाने अपने आप को क्या समझता है इतने ऊंचे-ऊंचे ख्वाब देखता है। इसके अंदर ना जाने किसका भूत घुसा हुआ है। मैं कहता ना कोई घुसा है ना कोई घुसा हुआ है। पर वो मेरी इस बात पर हँस देते। यक़ीन हरगिज़ नहीं करते। अब बताओ मैं ऐसे में क्या कर सकता था ? मेरे को तो ऐसी बातें नकारनी ही थीं।

 

                  पर फिर मेरे आलस में भी ऐसी ही कुछ बातें आने लग पड़ीं जैसे घर वाले कहते लगता है घर में चूहा है, रसोई से आवाजें आ रही थीं। मैं उन्हें यक़ीन दिलाता हो ही नहीं सकता ना कोई घुसा है... अब कोई मेरे से इस तरह की बातें करता मैं ये  रटा रटाया जवाब देने लग गया। एक स्टेज ऐसी आई कि लोगों ने, क्या घर, क्या बाहर मुझसे सवाल ही करना छोड़ दिया। ना ही वो किसी काम की उम्मीद मुझसे करते। मैं अब एक तरह से केयर फ्री हो गया। कोई दफ्तर में कहता आपकी मेज पर फाइलों का ढेर लगा है और ना जाने कितनी ही जरूरी और अरजेंट फाइल तुम्हारी अलमारी में घुसी हुई हैं। बस ये सुनते ही मुझे याद हो आता और मैं शुरू हो जाता ना कोई घुसा है....

 

     पर फिर ये एक सेंटेन्स मुझे कब तक ढाल बनके बचाता। धीरे धीरे मेरी कलई खुलने लगी। मेरे अलमारी में वे सब फाइलें निकल आयीं जो मिल नहीं रही थीं। घर में एक आध नहीं चूहों की पूरी की पूरी कॉलोनी निकल आई और तो और मेरी पुरानी गर्ल फ्रेंड का भी बीवी को पता लग गया। अब मैं यह कह ही नहीं सकता था कि ना कोई घुसा ... मैं एक तरह से, क्या कहते हैं उसे, रंगे हाथों पकड़ा गया था। लोग मेरे मुंह पर तो कुछ नहीं बोलते पर वो समझ गए थे कि मैं जो कहता हूं उसका उल्टा सच होता है। एक मशहूर शायर का शेर है:

 

       मांगा करेंगे दुआ अबसे हिज़्रे यार की

       आखिर तो दुश्मनी है दुआ को अमल के साथ