Ravi ki duniya

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Friday, August 29, 2025

व्यंग्य : एकाकी वृद्ध अशक्त

 

                                    


 

 

    किसी देश का वाकया है कि एक 87 वर्षीय महिला ने अपने इलाके के  निकटतम थाने को फोन लगाया कि वह भूखी है, घर में अकेली है। उसे अकेलापन बहुत खल रहा है और वह भूखी भी है। खाना वह खुद बना नहीं सकती। इतना सुनना था कि पुलिस के दो कांस्टेबल उस महिला के घर आ गए। मज़े की बात ये है कि उन्होने उस महिला के लिए खाना पकाया और उससे बातचीत की, साथ खाना खाया। हंसी मज़ाक हुआ। तब से मैं ये सोच रहा था कि ऐसा मेरे देश में मुमक़िन है क्या ? और अगर हाँ तो कैसे मुमक़िन है ?

 

पहले तो 87 वर्षीय महिला हमारे समाज में अकेली रह क्यूँ रही है। उसके सगे वाले कहाँ गए सब ? वह अमीर है या ग़रीब  अब तक ज़िंदा कैसे है ? चलो अगर ज़िंदा है भी तो अब तक किसी स्कैम वाले की, जामतारा वाले की, नज़र उस पर क्यों नहीं पड़ी अभी तक ? और फिर 'ऑफ-लाइन' वाले चोर, उचक्के, डकैत सब कहाँ गए। डकैत और चोरों  का उन्मूलन हो गया क्या ?

 

दूसरे शब्दों में हमारे मुल्क़ में यह मुमकिन ही नहीं है कि कोई 87 वर्षीय महिला अकेली रहे। अकेली है तो बिना चोर-उचक्के अब तक कैसे बची हुई है। अब तक उसके पास कोई उसका हमदर्द बन कर या दूर का रिश्तेदार बन कर नहीं पहुंचा ? उसके साइन करा के या नकली साइन कर उसकी दौलत से उसे अलग क्यों नहीं किया। इसी तरह के कई सवाल मन में तैरने लगते हैं।

 

सारांश ये है कि हमारे समाज में ये मुमक़िन नहीं कि आप के पास कुछ भी संपत्ति है धन दौलत या जायदाद है और आप को कोई अकेला रहने दे। आपके एकाकीपन को कम करने या मिटाने को बहुतेरे रिश्तेदार आने को तत्पर बैठे होते। और वह कहावत है न:

 

                                            रांड सांड़ सीढ़ी संन्यासी

                                           इन से बचे तो सेवे काशी

 

 सो अगर ये नानी जी या दादी जी अपने अपनों अर्थात बेटा बहू, नाती-पोतों से बच गईं हैं तो ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं। मुम्बई में एक टीनेजर ने अपनी दादी की हत्या सिर्फ इसलिये कर दी कि दादी जब भी शहर आती है तो उन्हें उसके कमरे में ही क्यों सुलाया जाता है। उसकी प्राइवेसी का क्या ? पूरे प्रकरण में अभी तो बाहर के प्लेयर्स बाकी हैं।

 

       और प्लेयर्स की प्लेयर हमारी पुलिस उसका क्या ? सोचा है आपने ? आपकी धन संपत्ति हल्की करनी हो अथवा पृथ्वी को ही आपसे हल्का करना हो हमारी पुलिस की तो घोषित पॉलिसी है:

                        

                                सदा आपके साथ..आपके लिये 

     

Wednesday, August 27, 2025

व्यंग्य : पुल टूटा नहीं बैठ गया है


 

                पीछे किसी नेता जी की एक क्लिप देखने में आई जिसमें वे कह रहे थे लोग व्यर्थ में शोर मचा रहे हैं और ग़लत शोर मचा रहे हैं कि पुल टूट गया! पुल टूट गया !  पुल टूटा ही नहीं है बल्कि बैठ गया है। अब पुल क्यों बैठ गया है इसके कारणों का पता लगाना चाहिए कि ऐसा क्यूँ हो रहा है ? लोग बालू का अवैध खनन कर रहे हैं। अतः ज़मीन पोली हो गयी है। फिर पुल ने बैठना ही था। आखिर कोई भी पुल कब तक खड़ा रहेगा। थक नहीं जाएगा। बेचारा पुल न जाने कितने महीने से खड़ा था। क्या आप और मैं खड़े हो सकते हैं ? सच तो ये है कि हम ऐसा नहीं कर सकते। हमें कुछ ही घंटों में बैठना पड़ेगा। इस हिसाब से पुल बहुत खड़े हो लिए। बेचारा थोड़ा सुस्ताने को क्या बैठा नादान लोगों ने ने शोर ही मचा दिया पुल टूट गया..... पुल टूट गया ! जरा धूप आने दीजिये, सूख कर फिर खड़ा हो जायेगा। आपको वो दीवाली की काली टिकिया याद नहीं जिसमें आग लगने से वो सांप की तरह भड़भड़ा के भले टेढ़ी मेढ़ी सही खड़ी हो जाती थी।

 

      खबरदार जो ऐसे 'मिसकोट' किया तो। पुल टूटा नहीं है। पुल साबुत है बस बैठा हुआ है। जिसे यक़ीन नहीं जाकर देख आये न कोई क्रैक न कोई और टूट फूट। एकदम साबुत है समूचा पुल। बस बैठा हुआ है। आप बैठे हों या लेटे हुए हों तो क्या ये कहना उचित है कि आप टूट गये हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे रुपया गिरा नहीं , बल्कि डॉलर ऊपर उठ गया है। कोई भी वस्तु चोरी नहीं होती है। जेब कतरे ने जेब नहीं काटी है बस उस संपति, उस पर्स का मालिक बदल जाता है। बदलाव प्रकृति का नियम है। इसे न मैं, न आप रोक सकते हैं। इसी तर्क से महंगाई बढ़ी नहीं है बल्कि आपके देखने का नज़रिया पुराना है। विश्वव्यापी सोच और दृष्टि रखिए फिर आपको कोई मंहगाई नहीं दिखेगी। हो सकता है उल्टा चीज़ें सस्ती दिखने लग जाएँ।

 

अब आप खुश हो सकते हैं कि आप मोटे नहीं है बाकी लोग पतले हैं। कुपोषण का शिकार हैं। आप तो स्वस्थ्य हैं। आप की गाड़ी चाहे कोई भी हो वो स्लो नहीं है बाकियों की स्पीड ज्यादा है। और अगर आपकी गाड़ी तेज़ है तो फिकर नोट बाकी लोग स्लो हैं। आपका बच्चा पढ़ाई में कमजोर कतई नहीं है। वो तो दूसरे बच्चे ब्रिलियेंट हैं। आपकी पत्नी किंचित भी कर्कषा नहीं, न कोई क्लेश, न कोई शाॅपिंग की झिकझिक। ये तो बस ये है कि आजकल बाकी लोगों की बीवियां स्वीट हैं।

 

                यह दिल को बहलाने को बहुत बढ़िया ख्याल है।

Sunday, August 24, 2025

व्यंग्य: प्लूटो से वोट देने का अधिकार छिना



      यह बात 1930 की है जब इन्टरनेशनल ऑस्ट्रोनॉमी यूनियन ने एक पिंड देखा और उन्हें वो ग्रह जैसा लगा और उसको ग्रहों की श्रेणी में शामिल कर लिया गया। बड़े ज़ोर शोर से इस नयी खोज को प्रचारित किया गया। प्लूटो की तो बनावट ही कुछ अलग सी  लगती है। बहरहाल अभी 75 साल ही हुए थे कि उसी इंटेरनेशनल ऑस्ट्रोनॉमी यूनियन ने प्लूटो को बुलाया और स्पष्ट शब्दो में अल्टिमेटम दे दिया "भई ! हमने तुम्हें ग्रह का दर्जा दिया ज़रूर था मगर तुम में ग्रह के लक्षण दिख नहीं रहे अतः तुमसे चुनावों में वोट देने का अधिकार छीना जाता है।  अब तुम्हारा ग्रह का दर्जा वापिस लिया जाता है। इसको अपने अखिल यूनिवर्सल गज़ट में छाप भी दिया। आज से हर खास ओ आम को ये सूचना दी जाती है कि प्लूटो को उसकी एन्टी ग्रह वाली हरकतों की वजह से  आए दिन होने वाले विवाद से हमें मानसिक कष्ट पहुंचा है अतः आज से हम इसे जाति बाहर करते हैं। इसका हुक्का पानी बंद। यह क्यों कि हमारे प्राधिकार में नहीं अतः इसे तड़ीपार नहीं कर रहे। आज से कोई भी इसे अपने जोखिम पर ही ग्रह समझे। इसके लिए हम कतई ज़िम्मेवार नहीं।


यह सुन कर बेचारा प्लूटो मुंह लटका कर दफ़्तर से बाहर आ गया। उसके पास और कोई चारा भी नहीं था। यह 2006 की बात है। अब सैकड़ों बरस इंतज़ार करो फिर कोई अपील सुन न्याय करेगा। हो सकता है ग्रह का दर्जा बहाल हो जाये, हो सकता है उसे महज़ सितारा का ही दर्जा मिल पाये। भविष्य यदि इतनी दूर हो तो वैसे ही अनिश्चित लगने लगता है। यह साल दो साल का नहीं सैकड़ों हजारों साल का मसला है। अब इन्टरनेशनल ऑस्ट्रोनॉमी यूनियन के मिस्टर क्लाइड टामबा ने क्या सोच कर, क्या देख कर 1930 में ग्रह की 'डिग्री' दी और अब 2006 में कह रहे हैं कि आप खरे नहीं उतरे। प्लूटो को तो ऐसा लगा जैसे उसका कोर्ट मार्शल कर दिया हो और भरी सभा में उसकी वर्दी से सितारे और पेटी उतरवा ली हो। प्लूटो का नाराज़ होना स्वाभाविक है। किसी को इस तरह छेक देने से उसका जीवन आसान नहीं रह जाता। अब वह ग्रहों की बिरादरी से बाहर कर दिया गया है। गैलेक्सी में उसकी सारी इज्ज़त धूल में मिल गयी। अब फिर से न जाने कितने 'प्रकाश वर्ष' प्रतीक्षा करनी पड़े दुबारा ग्रहों की बिरादरी में शामिल होने में। फिर पंचायत, बोले तो, खप बैठेगी, केस को कन्सीडर करेगी। 


   कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ के सर होने तक

 

यह राहू और केतु कितने खुश दिख रहे थे। सब इनका ही किया-धरा लग रहा था। बेचारे मार्स और वीनस को तो बोलने ही नहीं दिया जो प्लूटो के फ़ेवर में दो शब्द कहते। बस इतनी सी बात पर प्लूटो को दर-ब-दर कर दिया।

  

1. तुम्हारा तो कोई निर्धारित रूट ही नहीं। सबके अपने-अपने पाथ हैं  तुम्हारा कोई फिक्स पाथ नहीं है। 

2. तुम्हारा पाथ क्लीयर भी नहीं है ।

3. तुम सूरज के आसपास चक्कर नहीं लगाते हो।


 तुम बजाय शक्तिशाली और विशाल होने के, सिकुड़ते जा रहे हो। प्लूटो का कितना दिल दु:खा होगा जब उसे बौना कहा कर चिढ़ाया गया। और अब ये उसकी चेंट उससे चिपक के ही रह गई है। जिसे देखो वह बौना कह कर बुलाता है। 


बस फिर क्या था देखते-देखते ग्रहों के 'प्लेनेट क्लब' से प्लूटो को दरवाजा दिखा दिया।  बौना कह अपमान अलग किया गया। सच है छोटे होने के नुकसान ही नुकसान हैं। आने दो प्लूटो का वक़्त। वह भी दिखा देगा अपना दम-खम। 


प्लूटो को बौना कहने से पहले तुमने यह भी नहीं सोचा आजकल 'स्माल इज़ ब्युटीफुल' का ज़माना है।


 

Tuesday, August 19, 2025

satire : Vigilance - Our shared Responsibility

 

 

This is the theme of ‘Vigilance’ this year. Therefore, masses and classes let all stay informed that it is no more the responsibility of bribe taker alone, it is our shared responsibility. You may argue that you were no where in picture or were not a beneficiary of a single penny/schilling/Euro/Dollar/Pound as the case may be. Hitherto, the bribe takers have been seeking refuge “…It is not mine…I don’t know what is in it…I was taking it for my superiors…” No more now, all senior-junior and peers will be hunted, hauled and humiliated after all it is our shared responsibility. There is a saying 'Death with friends is a festival'. So now onwards it would be Jail for All.  

 

             This theme could also mean that catch the whistle blower first. These days another theme widely prevalent is ‘Shoot the messenger’ so forget all about the message. Whistle blower is  equally responsible. It will be amusing to see all hand cuffed ones claiming each other’s hand and blaming the world. For example, you buy best Californian dry fruit box for the boss and hide agreed upon bribe in it  in lieu of the tender.  So, if caught red handed, it would not be you alone, box maker, dry fruit seller, giver-taker all will be held responsible.

 

This shared responsibility is a tricky term. Shared responsibility simply means no body’s responsibility. God in heaven all is well with the world. Take another scenario, suppose the bribe giver enters an office, Public Park or a Restaurant wherever the rendezvous has been fixed. Would the peon, receptionist, watchman, steward as per this theme, will be arrested being close accomplice/equal partner in the crime.

 

It can be successfully argued that when you knew bribe is going to be offered/received why didn’t you red flagged. You could have prevented this heinous crime against the society/nation/humanity (as you please) what is your interest? You are either with us or against us. All need to be given third degree. You will understand better through this simple illustration. You give a shirt to tailor for stitching. Tailor has spoiled it completely without salvage. Now the shared responsibility begins. Your fabric was like that only - sub- standard, the cloth was inadequate or more than required. The button hole guy made mess of button holes, button guy could not get proper matching buttons, collar guy procured a collar which was below par. The scissors sold by scissor seller was of lowest quality and blunt. The inch tape was not properly calibrated. This is the shared responsibility. Whom will you catch now? Obviously, all the 22 guys involved. Would you be able to catch? or will it once again be Catch-22?

 

 

 

Saturday, August 16, 2025

व्यंग्य : सतर्कता: हमारी साझा जिम्मेदारी

 


 

     अब के बरस सतर्कता वालों ने थीम निकाली है।  सभी खास ओ आम को इत्तिला दी जाती है कि इस बरस से सतर्कता हम सबकी साझी जिम्मेवारी होगी। दूसरे शब्दों मे घूस लेते हुए जो कहा जाता है ऊपर वाले के लिए ले रहे हैं तो अब उस ऊपर वाले को भी लपेटा जाएगा। भई ! सब की साझी जिम्मेवारी है अतः पकड़े जाने पर सबकी सज़ा भी साझी होगी। अंग्रेजी में एक कहावत है 'डैथ विद फ्रेंड्स इज फेस्टिवल'। जब सारे दफ्तर की साझी जिम्मेवारी है तो चलो अब से दफ्तर जेल में ही लगेगा।

 

इस थीम का दूसरा अर्थ ये भी हो सकता है कि 'विशिल ब्लोअर' को ही धर लो। बेटा ये साझी जिम्मेवारी है। तुम भी दोषी हो। हम सतर्क हैं। साझे की हांडी चौराहे पर फूटती है। सब एक दूसरे पर इल्ज़ामकशी करेंगे। बड़े मनोरंजक दृश्य रहा करेंगे। समझो आपने बॉस को देने को ड्राई फ्रूट का डिब्बा खरीदा और उस में वो रिश्वत की रकम भी छुपा दी जो अगले को देनी है। उस टेंडर के बदले में जो उसने मांगी है। अब पकड़े जाने पर डिबा बनाने वाला, ड्राई फ्रूट वाला, देने वाला, लेने वाला, सब की पकड़-धकड़ हुआ करेगी।

 

 

साझा जिम्मेवारी बड़ा ट्रिकी लफ्ज है। साझी जिम्मेवारी मतलब किसी कि जिम्मेवारी नहीं। सब चंगा सी। मेरी समझ में ये नहीं आता कि जब घूस देने वाला किसी दफ्तर में घुसा या पार्क में या किसी रेस्टोरेन्ट में जहां का भी 'रन्देवू'  तय पाया गया हो तो क्या वहाँ के चपरासी, रिसेप्शनिस्ट, चौकीदार, वेटर, सब की साझा ज़िम्मेदारी बननी चाहिए आखिर इस थीम के अनुसार ये सभी लोग ज़ुर्म में बराबर के शरीक़ हैं। बोले तो 'पार्टनर इन क्राइम'

 

 

इसका उल्टा ये भी हो सकता है कि जब तुम्हें पता था ये घूस लेने वाला /देने वाला है तो तुमने बताया क्यों नहीं, तुमने रोका क्यों नहीं ? तुम्हारा क्या इन्टरेस्ट है ? हो न हो तुम भी मिले हुए हो। या तो तुम हमारे साथ हो, नहीं तो दुश्मन के साथ हो। पकड़ो सबको। इसको आसान भाषा में यूं समझा जा सकता है कि आपने टेलर को शर्ट दी सिलने को। टेलर ने उसका सत्यानाश कर दिया। अब शुरू हुई साझी जिम्मेवारी। मसलन आपका कपड़ा ही ऐसा था, कम था, या ज्यादा था, काज वाले ने काज गलत काट दिये, बटन वाले ने बटन मैचिंग नहीं लगाये। काॅलर वाले की बुकरम ही खराब थी। घटिया क्वालिटी की। कैंची वाले ने कैंची सही नहीं दी। कहीं की कहीं चल जाती है। इंच टेप गड़बड़ है। यह है साझी जिम्मेवारी। अब आप किस को पकड़ेंगे ? ज़ाहिर है सबको ...पकड़ पाएंगे ?

Tuesday, August 12, 2025

एफ़िडेविट के बाद

         

तुझसे मिलने आऊँगा मैं आधी रात के बाद

तेरा ये कहना “ज़रूर ! पर एफ़िडेविट के बाद”

तुझे यूं मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता हूँ

तेरी ये ज़िद “यकीं आयेगा एफ़िडेविट के बाद”

ये कैसा दौर आ गया हमारे देखते देखते

ज़ुबां की कोई कीमत ही न रही ज़माने में

निक़ाह हो कर्ज़ हो या नेताओं की खरीद फरोख्त 

सब काम अब होने लगे एफ़िडेविट के बाद

ये चलन है तो यूं ही सही आज के बाद ! 

मिलने की सोचूंगा अब तेरे एफ़िडेविट के बाद

Saturday, August 9, 2025

व्यंग्य: नकल की महिमा

 


 

     नकल का इतिहास कब शुरू हुआ यह पता नहीं चलता है। लोग कहते हैं यह आदम-ईव के वक़्त से ही चालू है। बहरहाल ! नकल का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। नकल कई प्रकार की होती है। कई क्षेत्रों में होती है। इस पर निसंदेह अनुसंधान की आवश्यकता है। आसानी से पी.एच.डी. की जा सकती है। किन्तु यहाँ हम इस लेख में केवल क्लास रूम की नकल, स्कूल-कॉलेज की हो अथवा नौकरी की लिखित परीक्षा हो पर ही फोकस रखेंगे। इस के दो वर्ग हैं। एक, 'सामूहिक नकल' जिसमें सभी को नकल सुलभ कराई जाती है। जैसे मेगाफोन से परीक्षा भवन से उत्तर की उदघोषणा करना। इससे सभी परीक्षार्थी समान रूप से लाभान्वित होते हैं। दूसरे, 'एकल' (इंडिविजुअल) ईवेंट। जहां सामूहिक नकल की तकनीक (नो-हाऊ) में ज्यादा विकास नहीं हुआ है किन्तु एकल केस में महत्वपूर्ण विकास हुआ है बल्कि बहुमुखी विकास हुआ है।

 

        फर्रे/चिट/स्लिप पुराने परंपरावादी अस्लाह रहे हैं। किन्तु उसकी सीमाएं बहुत संकुचित हैं। आप कितने फर्रे कहाँ-कहाँ छुपा कर ले जा सकते हैं। अलबत्ता इसमें सुभीता ये था कि सामन्यात: पकड़े जाने पर भी केवल वही फर्रा ज़ब्त किया जाता था बाकी फर्रे सुरक्षित रहते थे। कमीज़ की कफ पर भी लिखने का रिवाज रहा है अथवा उसकी सिलाई थोड़ी उधेड़ कर उसमें भी फर्रे छुपाने के लिए पर्याप्त स्थान रहता है। दूसरे एक तरीका यह निकाला गया की टॉइलेट में किताब/कुंजी पहले ही ले जा कर रख दी जाती है। आप टॉइलेट जाने के बहाने उसे कंसल्ट कर सकते हैं। फिर कई लोग जुर्राब में खोंस कर ही किताब/कुंजी ले जाने लगे। मगर इसमें कोई बहुत ज्यादा सुविधा नहीं थी फिर इनविजिलेटर से आँख बचा कर यह सब करना कठिन होता था। इसका तोड़ ये निकाला गया कि इनविजिलेटर को ही अपने में मिला लो। चाहे पैसे से या डरा-धमका कर। 

 

एक केस ऐसा पकड़ में आया जिसमें केंडीडेट की चप्पल में ही पूरा वाई-फाई सिस्टम फिट था और साॅल्वर जो है सो, जासूसी फिल्मों की तरह काली पहाड़ी पर बैठा जवाब बताता जा रहा था। जिसे परीक्षार्थी ब्लू टूथ के जरिये अपने कान में सुन पा रहे थे। फिर एक ऐसी डिवाइस मार्किट में आई कि कमीज कि कॉलर में ही वायरिंग हो रखी थी और ब्लू टूथ के जरिये विद्यार्थी अथवा नौकरी के अभ्यर्थी की सहायता की जाने लगी। यद्यपि सामूहिन नकल योजना में केंडीडेट्स को एक रात पहले ही पर्चा दे दिया जाता अथवा उनकी परीक्षा ही करा दी जाती

 

मुझे पूरा पूरा विश्वास है कि यह नकल उद्योग का अमृत काल चल रहा है। जहां वाट्स अप पर ही एक दिन पहले उत्तर मिल जाते हैं। वो बात दीगर है कि बहुधा जानते बूझते या जेनुइन गफलत से परीक्षा रद्द करनी पड़ती है। नकल उद्योग ने समय के साथ बहुत तरक्की की है अब प्रोफेशनल ‘साॅल्वर’ मार्किट में आ चुके हैं। वे एक निर्धारित फीस लेकर आपकी जगह परीक्षा दे आएंगे और आपके पास होने की गारंटी है। आप को तो बस नौकरी जॉइन करने वाले दिन ही नमूदार होना है।