Ravi ki duniya

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Monday, May 25, 2026

व्यंग्य: रुपये को गिरने से बचाने के उपाय

 

     जब बच्चा साइकिल चलाना सीखता है तो यह लाजिमी है कि वह साइकिल से गिरे। सयाने कहते हैं बिना साइकिल से गिरे साइकिल चलाना आ ही नहीं सकता। अतः पहली बात तो ये कि रुपये के गिरने को सीरियसली नहीं लेना है। बिलकुल उसी तरह जैसे बच्चे के साइकिल से गिरने को सीरियसली नहीं लिया जाता। मरहम-पट्टी कर दुबारा फिर साइकिल। एक विशेषज्ञ ने तो कह ही दिया कि 100 बस एक नंबर है उसको दिल पर नहीं लेना है।

 

       मेरा विचार है सबसे पहले तो ये जो सिक्के हैं इनकी डिजाइन फौरन चेंज कर देनी चाहिए। ये गोल बनने ही नहीं चाहिए। गोल होने के कारण यह लुढ़कता है। आप एक बार रोक लेंगे, दो बार रोक लेंगे पर गोल है तो इसने घूमना ही है और साइंस का बेसिक रूल है जहां ढलान है वहाँ की तरफ ही जाएगा इसी को आप लोग कहते हैं रुपया गिर रहा है। जब डिजाइन गोल ना होकर वर्गाकार, त्रिभुजाकार, आयताकार अथवा पंचमुखी रुद्राक्ष की तरह पेंटागनी होगी तो गिरने का सवाल ही नहीं। आई मीन ! लुढ़केगा तो नहीं ही। पहले सिक्के स्क्वायर डिजाइन के होते थे अतः कहाँ गिरते/लुढ़कते थे?

 

      दूसरा, आपको रुपये को देखने का नज़रिया बदलना होगा। रुपया गिर नहीं रहा ये जो डॉलर, पॉन्ड, यूरो हैं वो ऊपर जा रहे हैं। जैसे मैं मूर्ख-निकम्मा नहीं हूँ। ये तो बस ये है कि मेरे आसपास के लोग, मेरे दोस्त ज्यादा ज़हीन हैं। इस तरह के दृष्टिकोण से लाइफ आसान हो जाती है। हम काले नहीं हैं। ये तो बस ये है कि अंग्रेज़ गोरे हैं। हम बेईमान और कामचोर नहीं ये तो बस ये है कि बाहर-गाँव के लोग ज्यादा काम करते हैं और ईमानदारी का मुजाहिरा करते हैं। हम भारतीय लोग दिखावे में विश्वास नहीं रखते। जो हमारे मन में है वही हमारे मुंह पर है और वही शफ़क़त हमारे रुपये में है।

 

          एक योजना यह भी चल रही है कि सिक्के।करेंसी नोट के एक तरफ गोंद लगाया जाया करेगा, सेल्फ-एडहैजिव टाइप जैसे डाक-टिकटों पर लगा होता था। ताकि रुपया जहां है वहाँ से टस से मस न हो। अब गिर के दिखाये बच्चू ! एक पुराना गाना है ‘मिलने की खुशी ना मिलने का ग़म खत्म ये झगड़े हो जाएँ। तू तू ना रहे मैं मैं ना रहूं’ अतः रुपये को इतना सिर ही मत चढ़ाओ कि वह गिरे या उसके गिरने का ग़म हो। इसका साफ सुथरा तरीका ये है कि हम पुराने टाइम-टेस्टड सिस्टम ‘बारटर सिस्टम’ को अपना लें। तू मेरा नमक ले मुझे अपना प्लास्टिक दे। तू मेरी चाय पी मैं तेरी स्कॉच। इससे कोई झंझट ही नहीं। रुपया गिरे, उठे, चले, भागे-दौड़े अपनी बला से।  ये गिरना उठना सब बिधि हाथ है। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं। जनाब ज़ौक़ से माफी के साथ:

 

                 लाई उठान उट्ठे ...मंदी गिरा चली, गिरे!

                 न अपनी खुशी उट्ठे, न अपनी खुशी गिरे

 

    आप एक बार ये फंडा समझ गए तो ज़िंदगी में कभी ये बेकार की छोटी-मोटी शिकायतें नहीं करेंगे। आपकी ज़िंदगी किसी भी रुपये/डॉलर और पॉन्ड से ज्यादा कीमती है। माइंड इट !

 

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