Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Friday, July 31, 2026

व्यंग्य: हेरिटेज घड़ी से लिमिटेड एडिशन घड़ी तक

 

 

हम बचपन में नाना-नानी दादा-दादी के घर में पुराने, बोले तो, बेहद पुराने सन्दूक रखे और फ़ोटोज़ टंगे  देखते थे। जॉर्ज पंचम का फोटो हो या रानी एलीज़ाबेथ का। स्वदेशी में नेहरू जी और गांधी जी के फोटो लोकप्रिय थे। एक फोटो मुझे याद है जिसमें नेहरू जी और केनेडी वाईट हाउस के लाॅन में टहल रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे केनेडी उन्हें कुछ इंगित कर दिखा रहे हैं और नेहरू जी ठोड़ी पर हाथ लगाए आश्चर्य से निहार रहे हैं। आपने अगर सुदर्शन की 'हार की जीत' कहानी पढ़ी हो तो उसमें ज़िक्र आता है “बाबा ने घोड़ा दिखाया घमडं से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से” वैसा ही कुछ आश्चर्य नेहरू जी के चेहरे पर था।

 

हमारे रेडियो, फ्रिज, ए.सी.  और टी.वी. 30-30 साल चले। वो भी बिना किसी हील-हुज्जत के। तब सोचो चीजों की कितनी गारंटी होती थी। दरअसल वो गारंटी चीजों की नहीं थी। वो गारंटी आदमी की थी। उसकी नीयत की थी। उसे अपनी साख बहुत प्यारी थी, प्रॉफ़िट सेकंडरी था। वारंटी शब्द ही अब आया है। पहले तो गारंटी ही चला करती थी। चीज़ खराब भी  नहीं होती थी। दुकानदार आम कहते थे 'दादा खरीदे पोता बरते'। अब कोई दुकानदार ऐसा नहीं कहता क्योंकि अब यह फैशनेबल नहीं। अब आदमी पोते के बरतने की दृष्टि से कुछ नहीं खरीदता। उसकी और पोते की पसंद मिलती - जुलती नहीं है। यहाँ हर दो महीने बाद तो नए वर्जन का लैपटाॅप और फोन मार्किट में आ जाता है। मुझे याद है जब बैल बॉटम चले थे तब कोई इंसान अगर ड्रेन पाइप वाली पेंट पहने दिख जाता था तो ऐसा मालूम देता था कि वह किसी पुरानी सभ्यता से चला आया है।

 

मेरे फ्रिज और ए.सी. ने मेरा साथ 30 साल तक निभाया। हमने बहुत सी चीजों का साथ तो महज़ इसलिए छोड़ा कि अब उसके पुर्जे मिलना बंद हो गए या अब के मकेनिक उसे समझ ही नहीं पाते और हाथ खड़े कर देते हैं। अभी चालीस साल पहले मैंने अपना ट्रान्जिस्टर की नाॅब को ठीक होने दिया तो बाद में ख्याल आया कि मैंने रसीद तो ली ही नहीं। करीब एक माह बाद मैं दुकान पर गया तो उसने एक टोकरी मेरे आगे कर दी इसमें से पहचान कर अपना ट्रान्जिस्टर ले लो। कारण कि इस बीच में बलवाईयों ने उसकी दुकान पर हमला कर लूटमार की थी। मेरी नज़रों में उस दुकानदार की इज्ज़त बहुत बढ़ गयी। मैं ये सोच रहा था कि ये कंज्यूमर कोर्ट क्यों बनाने पड़े क्यों कि कोई तो है जो इस पूरी चेन में अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा। एक और नया जुमला आजकल चला है। 'इन चीजों की इतनी ही एज होती है'। दो साल चल गया और क्या चाहिए। अब नया मॉडल ले लो। उसमें फलां फीचर भी है। हमारे यहाँ जब वो वाला फ्रिज था जिस में बर्फ (फ़्राॅस्ट) हफ्ते के हफ्ते निकालनी पड़ती थी तब कमसेकम चीज़ें कब से फ्रिज में रखी हैं, पता चलता रहता था और बहुधा खराब होने से पहले बरत ली जाती थी। लेकिन अब 'ऑटोमेटिक डिफराॅस्ट' होने वाले फ्रिज आ गए हैं। अब चीज़ें सीधे फ्रिज से डस्टबिन में जाती हैं। इस चक्कर में हमने अपने पेट को भी कमोबेशी डस्टबिन ही बना लिया है। अब रेडियो, घड़ी, ट्रान्जिस्टर, मोबाइल फोन, लैपटाॅप खराब हो जाये तो मैं इस जुगाड़ में लग जाता हूँ कि इसे कैसे चलाने लायक बनाया जाये। बच्चों को कानों कान खबर हुए बिना। क्यों कि आज के दौर में चीज़ें ऐसी नहीं बनीं हैं आजकल के बच्चे भी कम बेसबरे नहीं। वे तुरंत डिक्लेयर कर देते हैं कि "फेंको इसे! दूसरा नया ले लो"। अब उन्हे कौन समझाये कि हम उस पीढ़ी के हैं जो हवाई चप्पल की बद्दी (स्ट्रैप) टूट जाने पर ऑलपिन या सेफ़्टी पिन से चला लिया करते थे। जूते की रिपेयर तब तक कराते रहते थे जब तक हमें या जूते को शर्म ही न आने लग जाये या मोची हाथ खड़े कर दे। जो भी पहले हो। हम बड़े गर्व से बताते थे ये मेरे पिताजी की अथवा दादा जी की घड़ी है। आज भी सही टाइम बताती है। सही चल रही है। वहीं 'ग्रांड सन' का कहना है "ये लिमिटेड एडिशन घड़ी है। यह वाटर प्रूफ है, यह दिन, तारीख बताती है। आप कितना चले, कितनी कैलोरी बर्न की और आपका हार्ट रेट भी"। अब उन्हें कौन समझाये हमारे टाइम पर तो बुजुर्ग हमें देख कर ही हमारे दिल का हाल बता देते थे।

 

 

Wednesday, July 29, 2026

व्यंग्य: असली ज़ेन-जी हम हैं

 


आजकल जो है सो ज़ेन-जी का बहुत बोलबाला है। जित देखो तित ज़ेन-जी के धमाल का शोर है। उन्ही की चर्चा हो रेली है। ऐसे में मेरा और मेरे जैसे अन्य असली खालिस ज़ेन-जी का परेशान होना, 'नैगलेक्टड फील' करना 'बट-नैचुरल' है। यह तो 'कूल' नहीं। आगे दो-चार लाइन्स में ही मैंने 'प्रूव' कर देना है। देखिये! मैं और मेरे जैसे रिटायर्ड लोगों को 'एक्स' क्यों कहते हैं। बोले तो ! ये जो भी भूतपूर्व हैं उन्हें 'एक्स' कहा जाता है। रिटायर होने के पाँच-दस साल तलक आप 'वाई' समझते और कहलाते हो। अब इस 'वाई' के अनेक अर्थ हैं। जैसे अपने को अभी भी 'वाई' से यंग समझना।  यूथ समझना। वैसे ही टाइट टी-शर्ट पहन कर चहल-कदमी करना। घर में भी ये 'वाई' वाले सबको टोकते-रोकते हैं। कोई बात हो इनकी ज़ुबान पर 'वाई' (क्यों) रहता है। बात-बात में बल्कि हर बात में 'वाई' (क्यों) इसकी क्या ज़रूरत है? पंखा क्यों चल रहा है? ए.सी. बंद क्यों नहीं किया? ये इतना महंगा खरीदने की क्या ज़रूरत? इन शॉर्ट ! सब जगह 'वाई' (क्यों-क्यों) का ग़दर मचाये रखते हैं। लेकिन ये ज्यादा नहीं चलता।

 

दस साल बाद यानि की जब आप सत्तर के लपेटे में आ जाते हो तो आप असली 'ज़ेड' तक आन पहुँचते हैं। देखिये जब आप रिटायर हो गए तब से आप 'अल्फाबेट' के 'एक्स' हो जाते हो। उसके दस साल तलक आप 'वाई' रहते हो और फिर अंग्रेजी वर्णमाला के आखिरी 'अल्फाबेट' ज़ेड तक आ जाते हो। बस उसके बाद कभी भी चला-चली की वेला रहती है। अब आप ना 'एक्स' हैं ना 'वाई'। अब आप 'ज़ेड' हो। इसीलिए मैं हुआ आप हुए (अगर आप सत्तर के ऊपर के हो) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप ‘अर्ली सेवेंटीज़’ में हो या ‘लेट सेवेंटीज़’ में आप हो तो ज़ेन-जी ही।

 

अब आप समझे! मैं क्यों अपने को और अपने जैसे ‘स्वीट सेवेंटी’ वाले सभी लोग को ज़ेन जी कहता-समझता हूं। असली 'ज़ेन-जी', खालिस 'ज़ेन-जी'। आप बिंदास हैं क्यों कि आपके पास खोने को कुछ नहीं। आप तो वैसे ही ‘डिपार्चर-लाउंज’ में बैठे हैं। न जाने कब आपकी फ्लाइट एनाउंस हो जाए। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है:

 

 

         उन किताबों को हम काबिले-जब्ती समझते हैं

         जिन्हें पढ़ कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं

 

अब इसमें दो बातें हैं। पहली तो ये कि अकबर इलाहाबादी अब रहे नहीं। नहीं तो पता नहीं वो अपना नाम अकबर प्रयागराजी कहलाना पसंद करते क्या? दूसरा, ये कि अगर बेटे (बेटी इन्क्लुडिड) बाप को खब्ती समझते हैं तो 'डेफ़िनिटली' ज़्यादातर बाप निश्चय ही खब्ती हैं। खब्ती इंसान अव्वल तो लॉजिक से काम लेता नहीं। वह अपने पूर्वाग्रहों से बुरी तरह ग्रस्त रहता है। दूसरे उनकी बहुत 'स्ट्रॉंग लाइक्स' और 'डिसलाइक्स' रहती हैं। देखिये कुछ भी बड़ा करने को जुनून चाहिए। मेरा सत्तर वालों से अनुरोध है कि आप अपने आप को कम न समझें। आप सत्तर नहीं आप 'सतर्क' हैं। आप असली के ज़ेन-जी हैं। आपकी ‘नाॅलिज़ वास्ट’ है। तजुर्बा तो विशाल है ही। एक सीरियल आता था दूरदर्शन पर ‘बुनियाद’ उसमें लाजो जी (मुख्य पात्र) एक संवाद अपने बच्चों को कहती है “मैं तब की मॉडर्न हूँ जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे”

 

Sunday, July 19, 2026

भांति भांति के लोग...

  

वह टूरिज़म विभाग में ही था। उसे रूम-अटेंडेंट का काम सौंपा हुआ था। जिन्हें होटल लाइन का ज्ञान न हो उनकी मालूमात के लिए बता दूँ रूम-अटेंडेंट अथवा हाउसमैन का काम सीढ़ी पर सबसे बॉटम पर माना जाता है। मैट्रिक फिर भी मांगा जाता था, ताकि वक़्त ज़रूरत गैस्ट से बात कर सके। समझ सके। बहरहाल इस पोस्ट (पद) पर मोटीवेशन कम ही रहता था। जहां मोटीवेशन न हो वहाँ लोगबाग अपना मोटीवेशन खुद बना लेते हैं।.तलाश कर लेते हैं। जैसे सहकर्मी के साथ आँख लड़ाना अथवा प्रेम पींग बढ़ाना। शाम को यारों की ड्रिंक पार्टी। किस गेस्ट ने किस को क्या दिया। किसका टांका किससे भिड़ा है। लेटैस्ट किसका किसके साथ क्या चल रहा है। कोई-कोई कॉल गर्ल रैकिट से भी इनडाइरेक्टली जुड़ जाते। हम सब अपने-अपने काम का एक्साइटमेंट बनाए रखने को कुछ न कुछ करते ही हैं। एक आदर्श स्टेंडर्ड होटल में मोटे-मोटे दो डिवाइड होते हैं। फ्रंट ऑफिस और बैक ऑफिस।

फ्रंट ऑफिस: जैसा नाम से ही विदित है वे विभाग होते हैं जो सामने-सामने होते है बोले तो गेस्ट के संपर्क में आते हैं। यथा रिसेप्शनिस्ट, बैल बॉय, बिल क्लर्क, दूसरे होते हैं

हाउस कीपिंग: जिसमें हाउस कीपर, रूम अटेंडेंट/हाउसमैन आते हैं। एक होता है

एफ एंड बी: फूड एंड बेवरेज ( रेस्टाॅरेंट/खाना-पीना/बार)

स्टोर एंड पर्चेज: (होटल की सामग्री खरीदना उसका रखरखाव)

सिक्यूरिटी एंड विजिलेन्स:

पर्सनेल:

एकाउंट्स:

शेफ: ( किचन/कुक/कुकिंग)

 

पता चला कि एक हाउसमैन के पिता की दुखद मृत्यु हो गयी है। वह हाउसमैन छुट्टी पर चला गया। महीने भर बाद  एक दिन वह आया। उसके हाथ में उस दौर में जो फ़ैशन थी उसके अनुरूप एक विदेशी ब्रांड का मंहगा सिगरेट का पैकेट और  गोल्डन लाइटर था। वह उस लाइटर को हाथ में घुमा-घुमा कर उसके साथ लगातार खेल रहा था। उसने अपनी गर्दन में सोने की मोटी चेन पहन रखी थी। तदनुसार बुशर्ट के ऊपर के दो बटन खुले रखे थे। आपने सोने की चेन  पहन रखी हो वो भी इतनी मोटी और उसे दिखा भी ना पाएँ तो क्या ही फायदा ऐसी चेन पहनने का? वह बिना पूछे मेरे चेम्बर मे आकर मेरे सामने लगी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया। और बोला मेरा केस अपने पिता की जगह करुणा आधार पर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी के लिए प्राॅसस हो गया है। वह यही बताने आया है। जैसे ही लैटर आयेगा वह अपना त्यागपत्र दे देगा। तब तक भागा-दौड़ी के लिए अब लीव पर ही रहेगा।

 

दो महीने बाद वह आया। अबके उसके हाथ में सिगरेट का पैकेट नहीं था। न ही लाइटर था। उसने मुझसे पूछा कि क्या वह बैठ सकता है। मुझे वह बीमार सा लग रहा था। मैंने उससे पूछा उसने जॉइन कर लिया ? किस पोस्ट पर जॉइन किया ? और उसका ऑफिस कहाँ है ? सब के उत्तर में उसने एक लंबी ठंडी आह भरी। बोला :

 

"जी हमें तो पता नहीं था पिताजी का किसी भारी वित्तीय गड़बड़ी के केस में नाम था। उसी से परेशान हो उन्होने आत्महत्या कर ली थी। ऑफिस ने सूचित किया है कि ऐसे केस में करुणामूलक नौकरी का कोई प्रावधान नहीं है। हम उनसे मिले। उनकी बहुत अनुनय-विनय की मगर उन्होने नियमों का हवाला देते हुए हमें दफ्तर से हकाल दिया। सर ! क्या मुझे मेरी हाउसमैन की नौकरी वापिस मिल सकती है ? सोचो मुझे क्या करना चाहिये था ?    

 

व्यंग्य : अगले जनम मोहे साँप से मत डसवाईयो

 


    सयाने कह गए हैं हर अपराध के पीछे तीन चीजों में से एक न एक का हाथ होता है: जर, जोरू, ज़मीन। आजकल जैसा सब कुछ चल रहा है अखबार के अखबार भरे पड़े रहते हैं ऐसे ही न्यूज चैनल एक के बाद एक खबर देते रहते हैं जैसे कोई कंपटीशन सा चल रहा हो। अब प्रिये! मेरी समस्या ये है कि मुझे साँपों से बहुत डर लगता है। साँप तो साँप मुझे तो केंचुए से भी डर लगता है। अतः तुम कुछ भी करना पर वादा करो तुम मुझे साँप से नहीं डसवाओगी। सुनते हैं जब साँप डस लेता है तो ज़हर से पूरा जिस्म नीला पड़ जाता है। वैसा ही नीला जैसा नीला प्लास्टिक ड्रम होता है। अब मैं नहीं चाहता कि मेरा जिस्म नीला पड़े। पहले ही मेरा रंग काला बोलो, सांवला बोलो है। नीला होकर तो और भी ना जाने कैसा-कैसा लगेगा। भले तुम्हें साँप और सपेरे आराम से 'ईजीली' मिल जाएँगे। पर देखो मेरी आखिरी इच्छा यही समझो कि मुझे साँप से मत डसवाना। सिर्फ इसलिए कि मुझे साँप से डर लगता है बहुत डर लगता है। हो सकता है सांप को देखने मात्र से ही मेरा दम निकल जाये। कहावत है न जब गुड़ से मरता हो तो ज़हर क्यों दिया जाये।

 

अब तुम अगर ये सोचो कि तुम मुझे किसी पहाड़ पर ले जाने का प्लान बना रही हो जैसे कि नॉर्थ ईस्ट के इलाके में होते हैं। पर प्रिये ! मुझे हाइट्स से डर लगता है। बोले तो मैं वर्टिगो से ग्रस्त हूँ। अक्रोफोबिया है मुझे। हाइट्स पर जाने का दूर हाइट्स का नाम सुन कर ही जी मिचलाने लगता है। मुझे चक्कर आने लगते हैं। अतः हे प्रिये! मुझे कभी पहाड़ पर ले चलने का ज़िक्र भी मत कर देना। और सुनो प्रिये! मुझे इन पुराने किलों और महलों में भी कोई रुचि नहीं है। मैं अपने टू बी.एच.के. के क्वाटर में बहुत खुश हूं। अतः प्लीज़ मुझे कभी किसी भी क़िले या महल ले जाने की ज़िद मत करना। जब भी तुम इसका ज़िक्र भर करोगे मेरा जिस्म सुन्न पड़ जाएगा। जाना तो दूर मैं इन भूतहा किलों का नाम सुन कर ही  सहम जाता हूं।

 

अब आजकल ये छुरी-चक्कू बोलो, तमंचा-कट्टा बोलो आसानी से सुलभ हैं। इनको चलाने वाले भी आजकल बहुत सस्ते में मिल जाते हैं। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं दूर ढूंढो पास मिलते हैं। फिल्मों- सीरियलों में गोली चलते, गोली लगते देखना एक बात है मगर मेरे को गोली लगे सुन कर ही पसली में सिहरन दौड़ जाती है। मैं जानता हूँ अगर एक बार तुम ठान लो तो ऐसी कोई बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं बनी जो मुझे तुम्हारी बुलेट से बचा ले।

 

 निष्कर्ष यही छोटा सा है प्रियवर कि जब तुम्हारा मन मुझ से ऊब जाये तो बस कह भर देना मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा। असल में जान है तो जहान है। जान सलामत रहे जाने-मन बहुत मिल जाने हैं। जब जान ही नहीं रहेगी तो काय बात की जाने-मन? तुम बेशक सातों वचन भुला दो वांदा नहीं।  बस तुम तो मेरा यही एक वचन, मेरे लिये  निभाने का वादा करो कि जब तुम्हें किसी भी स्टेज पर ऐसा लगे कि अब बस हो गया तो मुझे बता भर देना। मनी बैक गारंटी की तरह ये दूल्हा बना माल वापिस हो जायेगा। भूल चूक लेनी देनी।  

अनुकंपा नौकरियां -फैमिली वैलफेयर या फ्राॅड

 

ज्ञात हो कि भारतीय रेलवे भारत में सबसे बड़ा नियोक्ता है। एक समय की बात है कि इसमें लगभग 18 लाख कर्मचारी थे, जिनमें दो लाख आकस्मिक श्रमिक भी शामिल थे। चूंकि रेलवे की अपनी संख्या इतनी बड़ी रही है, तदनुसार, सेवानिवृत्ति/त्यागपत्र/ मृत्यु भी आनुपातिक रूप से बड़ी है। रेलवे के विपरीत अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की सीमा अन्य केंद्र सरकार के मंत्रालयों में 5 प्रतिशत है। यह कुल 5 प्रतिशत रिक्तियों/स्वीकृत पद तक सीमित है।

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अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान अंग्रेजों द्वारा बनाई पाॅलिसी के रूप में है। 'क्लोज-शॉप' कई संगठनों में भर्ती का एक वैध तरीका रहा है। उनका मानना है कि इस प्रकार वफादारी और समर्पण, आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं। यह अनुकंपा नियुक्ति  संकट में शोक संतप्त परिवार को सहायता प्रदान करने के लिए था। समय के साथ यह 'एक मौत = एक नौकरी' बन के रह गया। सरकारी रोजगार की आवश्यकता सभी को होती है, वह भी यदि  रेलवे में है तो बल्ले बल्ले ! चिकित्सा सुविधा, सरकारी आवास और उदार पेंशन लाभों के साथ। इसलिए सरकारी नौकरी के लिये परिवार अपने को 'संकट' में घिरा पाता है।  कर्मचारी यूनियन सदैव एक शुल्क पर आपकी सहायता को तत्पर मिलेंगे।

 

 देखा गया है कि परिवार अपने बेटों में से सबसे नालायक को रेलवे को प्रदान करता है। उनका मानना है कि 'योग्य' तो अपनी योग्यता के आधार पर कहीं और भी नौकरी हासिल करने में सक्षम होगा। इसके अलावा, बेटा उनकी स्वाभाविक पसंद होती है क्योंकि पुत्री तो अंततः शादी कर लेगी और परिवार को छोड़ देगी। एक आसान सी लिखित परीक्षा आयोजित की जाती है, जो आम तौर पर मैट्रिक स्तर की होती है। अफ़सोस! बी ए और एम ए इसे पास करने में विफल रहते हैं। फिर वे आँसू भरे दूसरा मौका देने की गुहार लगाते हैं क्योंकि उनके अनुसार वे भावनात्मक आघात से गुजर रहे होते हैं। आम तौर पर, एक दूसरा मौका दे दिया जाता है। जहां तक ग्रुप डी (क्लास IV) नौकरियों का संबंध है; कोई लिखित परीक्षा आयोजित नहीं की जाती है, उम्मीदवार का चयन साक्षात्कार के आधार पर किया जाता है। 99 प्रतिशत लोग इस नौकरी को पा जाते हैं। "ग्रुप डी कार्यालय में जो एम.टी.एस. (मल्टी-टास्किंग स्टाफ) की है, मांग अधिक होती है। न कि श्रम साध्य फील्ड जाॅब्स की। जब तक कि कोई तकनीकी रूप से योग्य न हो और तकनीकी क्षेत्र में अपना भविष्य (कैरियर) बनाने का उत्सुक न हो। कुछ उम्मीदवार बहुत अच्छे और भविष्य को लेकर गंभीर होते हैं। वे समर्पण के साथ कड़ी मेहनत करते हैं। जैसे-जैसे रोजगार बाजार सिकुड़ रहा है, रेलवे में नौकरियां कीमती होती जा रही हैं।

 

डार्क पक्ष:

बेरोजगार बच्चों और लालची पत्नियों ने इसे एक लूट के रूप में देखना शुरू कर दिया। परिणाम विनाशकारी रहे। रेलवे में भर्ती होने वाली श्रमशक्ति की गुणवत्ता घटी, जबकि पारिवारिक झगड़े बढ़ गए। आप सबसे खराब, भयावह, घिनौने परिदृश्य की कल्पना करें और मेरा विश्वास करें, यह इस अनुकंपा आधार नियुक्ति के नाम पर हुआ है। पिता को मारना, पति को जहर देना जैसे अब कोई पाप ही नहीं रह गया है। एक मामला आया जहां एक मौत (पिता की) और तीन बेटों को नौकरी दे दी गई थी। कैसे? कोई भी अधिकारी उस कार्यालय में लंबे समय तक नहीं रहता था। नया अधिकारी आता, नया अधिकारी.. नई केस फाइल, नया बेटा दर्ज हो जाता। जब अनुकंपा नियुक्तियों की बात आती है, तो आश्चर्यजनक रूप से इसमें शामिल सभी लोग जरुरत से ज्यादा 'दयालु' हो उठते हैं, जैसे इसके सहारे वे स्वंय के लिये स्वर्ग में स्थान सुरक्षित कर लेना चाहते हैं।  यहां तक कि मौत का नाटक भी असामान्य नहीं रहा है। एक मामला ध्यान में आया; एक लड़का सिर मुंडा कर आता है और अपनी 'दुख भरी' कहानी सुनाता है कि कैसे उसके रेलकर्मी पिता पैतृक गांव गए और सांप के काटने के कारण वहां उनकी मृत्यु हो गई। अब चिकित्सा प्रमाण पत्र और ग्राम प्रधान की रिपोर्ट पर निर्भर रहने के अलावा ऑफिस क्या कर सकता है। ऐसी नियुक्ति के मामलों में आश्चर्यजनक रूप से, कागज पूरे होते/रिकॉर्ड एकदम क्लियर, एक-एक पेपर सावधानीपूर्वक रखा जाता। अब ऐसे संगठन/संस्थान हैं जो एकमुश्त अनुदान देते हैं और बस इतना ही। उनके पास ऐसी कोई योजना नहीं है जहां अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की आवश्यकता/प्रावधान हो।

 

भोले-भाले परिवार के गरीब अशिक्षित लोग प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ नहीं होते हैं, वे शुभचिंतकों की आड़ में भेड़ियों का शिकार हो जाते हैं। एक मामला देखा गया जहां गरीब अनपढ़ महिला के पास कुछ कागज थे, ये नकली प्रमाण पत्र और अंक पत्र थे। उसने अपनी लिखित परीक्षा में सौ में से शून्य हासिल किया था। मैंने उससे पूछा कि उसने अपनी मैट्रिक कहाँ से पास की ? वह कनफ्यूज सी ताकती रही। बाद में नम्रता से उसने जवाब दिया "ये कागजात तो मुझे बाबू जी ने बेचे थे"

 

एक अधेड़ उम्र का आदमी अपनी एडवोकेट की पोशाक में मेरे निवास पर आता है; उसे कार्यालय में मिलने के लिए कहा गया। जाते जाते उसने कहा, "अर्जेंट मिलना है हमारे परिवार में महिलाएं काम नहीं करती हैं, इसलिए इसके बजाय मृतक के छोटे भाई को नौकरी दे दी जाये। जब जांच की गई तो पता चला कि इस आदमी ने ऑफिस से पत्राचार के नाम पर अपनी विधवा पुत्र वधू से सादे कागजात पर हस्ताक्षर करा लिये थे। महिला ने मांग की कि यदि अनुकंपा आधार पर नियुक्ति का कोई प्रावधान है तो वह इसे लेना चाहेगी क्योंकि वह इंटरमीडिएट पास है। इस प्रकार, जो उसका हक़ था उसे मिला।

 

जहाँ पैसा (रिश्वत) चलता है, वहाँ भर्ती हुआ युवक जल्द ही छोटी- मोटी हेराफेरी और भ्रष्टाचार की तकनीकें सीखने में लग जाता है। नई उक्ति यह प्रतीत होती है: 'मुहब्बत, जंग और अनुकंपा  नियुक्ति में सब फेयर है' घृणित साजिशें और जानलेवा योजनाएं इतनी बार सामने आती हैं कि लगता है इस योजना को बंद कर देना बेहतर होगा। कल्पना कीजिए कि यह परिवार विशेष और समाज में कैसी कैसी कलह को ला रहा है। हम मुंह फेर कर अन्यत्र देखने का नाटक नहीं कर.सकते बोले तो जोखिम नहीं उठा सकते।

 

Humor: You are an Indian:

 

There is lot of debate going on as to what (document) will determine your citizenship.

Forget the paper work, the unflinching test would be:

You will be made to walk on a road and video graphed confidentially, you are an Indian if you:

1. Cross the road jay walking

2. Spit on the road

3. litter the road

4. talk loudly with fellow walkers or on phone

5. laugh no end.

6. Haggle with shopkeeper and insist for discount/free gift

7. Want two polythene bags fearing that single one will tear off

8. Eat making strange sound and fill up your tummy with freebies, if any.

9. Ogle at passers by

10. Over eat your breakfast so as to save expenses of lunch

11. Seeing a long queue, instead of standing in the queue you get bust how to break the queue so that your turn comes first

12. If someone speaks in English, you start speaking in English without knowing much, also if someone speaks in Hindi then you MUST speak in English.

आप एक भारतीय हैं:

 

इस बात पर बहुत बहस चल रही है कि कौन सा (दस्तावेज़) आपकी नागरिकता निर्धारित करेगा।

अब कागज को भूल जाओ, अडिग परीक्षण हाथ लगा है अब से वही होगा:

आपको सड़क पर छोड़ दिया जाएगा और गोपनीय रूप से वीडियोग्राफ किया जाएगा, आप निश्चय ही एक हार्ड कोर भारतीय हैं यदि आप:

1. सड़क पार करते वक़्त जेबरा क्राॅसिंग की बजाय कहीं से भी टेढ़े मेढ़े चल कर पार करें।

2. सड़क पर थूकें

3. सड़क पर कूड़ा फैलायें

4. साथ चल रहे साथियों से या फोन पर जोर-जोर से बात करें

5. हँसो तो हँसते ही रहो वो भी खूब जोर से।

6. शॉपकीपर के साथ सौदेबाजी करें और छूट/मुफ्त उपहार के लिए जोर दें

7. दो पॉलीथीन बैग की डिमांड करें इस डर से कि एक है तो जरुर फट जाएगा

8. अजब गजब आवाज़ निकालते हुए खाना खाओ और अपने गले तक खायें विशेषत: यदि कुछ नि:शुल्क हो।

9. राहगीरों खासकर महिलाओं को घूर घूर कर देखें।

10. अपना नाश्ता जरुरत से ज़्यादा खाओ ताकि दोपहर के भोजन के खर्च को बचाया जा सके।

11. यदि कहीं 'क्यू' लगी हो तो इस जुगाड़ में लग जाओ कि कैसे इसे तोड़ कर अपना नम्बर लगाया जाये

12. कोई अंग्रेजी बोले तो न आते हुए भी अंग्रेजी की टांग तोड़ें और कोई हिन्दी बोले तो उससे तो जरुर ही अंग्रेजी बोलें।

J.N. Marshall -a memoir

 

                                                          

The marshy piece of vacant land on Mala Road in Kota junction always gave me an impression of an abandoned plot, abdicated in hurry. Broken sheds, temporary structures and knee length grass haphazardly growing all over. During 1980s I was posted on Kota division of the then W.R. Upon inquiry, nobody could tell me clearly labor it. They would simply disclose what they knew rather were told by their elders " Oh! some ANGREJ had set up a factory of compressors..." and that was about all. Then one day i decided to explore myself, no not the marshy plot of land but the history of J.N. Marshall.

J.N. Marshall stands for Jahangir Nusserwanji Marshall. A Parsi. He founded the trading company in Ahmedabad in 1926, which later expanded into the multinational engineering and steam solutions group. The firm was later developed into its manufacturing and corporate form by his nephew, Darius Minocher Forbes.

 It was in 1946 Darius M Forbes joined his uncle J.N. Marshall and they began trading in various energy saving steam equipment as well as imported boilers.  A foreign exchange payment crisis struck India in 1957 and the Govt did not renew J.N. Marshall’s import license.  The only way forward was to manufacture. Hence, the first factory was set up in Kasarwadi, Pune and manufacturing began in 1959. The second unit was set up in Hyderabad in 1985 for manufacturing gauges. The third factory was set up in Pimpri near Pune in 1986 for the manufacturing of control instrumentation.

 Today the company by name Forbes Marshall provides innovative solutions to help business to improve their energy and process efficiency and be more environmentally responsible, their customers are spread over across India, North and South America, Africa, the Middle East, South east Asia and Europe.

After the economy opened in 1991, they needed to compete with global companies to remain in business, manufacture products of world standards. In 1992 sales to Sri Lanka were made. In 1998 an office was opened in Sri Lanka.

Today they have two manufacturing units in UK and Singapore along with four in India. 8000 customers are catered to worldwide.

Could not get a photo of J.N. Marshall, photo with this article is that of Darius Forbes the nephew. He passed away on 11th August 2023 at the age of 97 years.

Friday, July 17, 2026

संस्मरण: जे.एन. मार्शल


                                     


 

राजस्थान के कोटा रेलवे जंक्शन स्टेशन के समीप माला रोड पर खाली भूमि के दलदली टुकड़े ने हमेशा मुझे एक लावारिस से, क़ानूनी दांव-पेच में फंसे भूखंड की छाप दी, जैसे ये जल्दबाजी में त्याग दिया गया था। टूटे हुए शेड, अस्थायी ढांचे और जगह-जगह बेतरतीब ढंग से बढ़ रही घुटने तक की घास। मैं 1980 के दशक में कोटा में.पदस्थ था और मेरा सरकारी आवास समीप ही था। पूछने के बाद भी मुझे इसके बारे में स्पष्ट रूप से कोई नहीं बता सका। वे बस वही खुलासा करते थे जो वे जानते थे बल्कि उनके बुजुर्गों द्वारा जो बताया गया थे। "ओह! कोई अंग्रेज ने कंप्रेसरों का एक कारखाना कभी स्थापित किया था..." एक दिन मैंने खुद पता लगाने का फैसला किया, भूमि के दलदली भूखंड के बारे में नहीं बल्कि जे. एन. मार्शल के खुद के इतिहास के बारे में।

 

जे. एन. मार्शल का पूरा नाम जहांगीर नौशेरवानजी मार्शल था। वह अंग्रेज नहीं, एक पारसी थे। उन्होंने 1926 में अहमदाबाद में व्यापारिक कंपनी की स्थापना की, जो बाद में बहुराष्ट्रीय इंजीनियरिंग और भाप के साजो-सामान/ समाधान के समूह में विस्तारित हुई। बाद में इस फर्म को उनके भतीजे डेरियस मिनोचर फोर्ब्स द्वारा इसे विनिर्माण और कॉर्पोरेट रूप में विकसित किया गया था।

 

1946 में डेरियस एम फोर्ब्स अपने चाचा जे. एन. मार्शल के साथ शामिल हो गए और उन्होंने विभिन्न ऊर्जा बचत भाप उपकरणों के साथ-साथ आयातित बॉयलरों का व्यापार शुरू किया। 1957 में भारत में विदेशी मुद्रा भुगतान संकट आया और सरकार ने जे. एन. मार्शल के आयात लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं किया। आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता निर्माण करना था। इसलिए, पहला कारखाना कासरवाड़ी, पुणे में स्थापित किया गया था और विनिर्माण 1959 में शुरू हुआ था। दूसरी इकाई 1985 में हैदराबाद में विनिर्माण गेज के लिए स्थापित की गई थी। तीसरा कारखाना 1986 में पुणे के पास पिंपरी में नियंत्रण उपकरण के निर्माण के लिए स्थापित किया गया था।

 

आज 'फोर्ब्स मार्शल' नाम की कंपनी व्यवसाय को अपनी ऊर्जा और प्रक्रिया दक्षता में सुधार करने और अधिक पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार होने में मदद करने के लिए अभिनव समाधान प्रदान करती है, उनके ग्राहक भारत, उत्तरी और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप में फैले हुए हैं।

1991 में अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद, उन्हें व्यापार में बने रहने के लिए वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता थी, विश्व मानकों के उत्पादों का निर्माण करना था। 1992 में श्रीलंका को बिक्री की गई थी। 1998 में श्रीलंका में एक कार्यालय खोला गया था।

 

आज उनके पास ब्रिटेन और सिंगापुर में दो विनिर्माण इकाइयां हैं और भारत में चार इकाइयां हैं। दुनिया भर में 8000 ग्राहकों की ज़रुरतों को संतोषजनक तरीके से पूरा किया जाता है। आज इस कंपनी का वार्षिक टर्न ओवर 1500/- करोड़ है। मुझे चाचा जे. एन. मार्शल का कोई चित्र पब्लिक डोमेन में नहीं मिला। अत: उनके भतीजे डेरियस फोर्ब्स की तस्वीर साझा की है जिनका 97 बरस की आयु में 11 अगस्त 2023 को निधन हुआ।

व्यंग्य: सब (रेलवे स्टेशनों) का मालिक एक –आर.पी.एफ.

 

इस आगरा की घटना से पहले, बहुत पहले से लोग बाग कहते और विश्वास करते आये हैं कि आर.पी.एफ.  की फुल फाॅर्म 'राशन पानी फ्री' है। रेलवे स्टेशन पर आप ऐसे समझो मोटा-मोटी कितने ही विभाग के रेल कर्मी कार्यरत होते हैं।

वाणिज्य विभाग: बुकिंग क्लर्क, टी.टी./ टी.सी. खान-पान के स्टॉल, अन्य सभी स्टॉल, कुली (लाइसेन्स दिया जाता है वे रेलकर्मी नहीं होते)

ऑपरेटिंग विभाग: असिस्टेंट स्टेशन मास्टर, स्टेशन मास्टर, स्टेशन सुपरिटेंडेंट, स्टेशन डाइरेक्टर, गार्ड

विद्युत विभाग: स्टेशन की लाइट/पंखे/पंप/ रेल का इंजन/ रेल की लाइट/पंखे/ए. सी./ लोको पायलट (इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन)

मकैनिकल: रेल का इंजन, रेल के कोच/डिब्बों के पहिये/लोको पायलट (डीजल) बर्थ

सिग्नल एंड टेलिकॉम विभाग: सिग्नल सिस्टम, टेलीफोन

इजीनियरिंग विभाग: गेंगमेन, पी.वे. इंस्पेक्टर

 

 लास्ट बट नाॅट लीस्ट आर. पी.एफ. ये तो हो गए औपचारिक मान्यता प्राप्त विभाग। इसके बाद और इन सबसे बड़े होते हैं अनऔपचारिक विभाग। नहीं समझे ? बताइये ये जो भिखारी लोग होते हैं स्टेशन के अंदर-बाहर ? वो किसकी मेहरबानी से ? फूड स्टॉल पर औने-पौने दाम। पानी की बोतल महंगे दाम पर बेचना। जेबकट, उठाईगीरे, ऑटो टैक्सी वाले, बेटिकट यात्रियों की पकड़-धकड़ में महत्ती भूमिका। आप ट्रैक पार करते हो या पार करते पकड़े जाते हो तो आर.पी.एफ. के सौजन्य से। यद्यपि आर.पी.एफ. की ऑफिशियल भूमिका रेलवे की प्रॉपर्टी की सुरक्षा करना है बस। न इससे कम इससे ज्यादा। अब समझ गए आप क्यों ये कुत्ता लेकर डिब्बे डिब्बे घूमते हैं। बेचारे कुत्ते को भी हलकान करते हैं। दरअसल ये अपने शिकार की रेकी करते होते हैं। पिछली सदी की बात है। एक शहर में अफीम की खेती होती थी। अब इस अफीम को बाहर भी भेजना होता है इसके लिए वे 'म्यूल' बोले तो कैरियर की तलाश में रहते और उनके थ्रू ये खेप दूसरे शहरों में भेजी जाती थी। अब इसके लिए रेलवे सबसे सुरक्षित और सस्ता साधन। आर.पी.एफ. वाले इन्हें पकड़ लेते थे। जब बार-बार ये होने लगा तो आर.पी.एफ. ने अफीम वालों को सलाह दी भैये ! आप लोगों को भेजते हो, हम उन्हें पकड़ते हैं आपका माल ज़ब्त करते हैं फिर आपको उन्हें छुड़वाने को मारे-मारे घूमना पड़ता है। कोर्ट-कचहरी करनी पड़ती है और माल भी जाता है, पैसे का खर्चा अलग। तो क्यों न आप हमारी सेवायें लेते। हम पहुंचा दिया करेंगे। काहे को बिचौलिये लाते हो। बस उसके बाद सभी सुख से रहने लगे।

 

एक लड़की अपने बूढ़े माता-पिता के साथ यात्रा कर रही थी। एक स्टेशन पर उनक लिए कुछ लेने उतरी और ट्रेन चल दी तो माता-पिता ने ज़ंजीर खींच दी। जैसे ही लड़की ट्रेन में चढ़ने लगी आर.पी.एफ. ने पकड़ लिया। ले गए अपनी चौकी। फिर दुनिया भर की सिफारिश के बाद उसे अगली ट्रेन से रवाना किया। यदि उसकी जान-पहचान न होती तो पता नहीं कितने दिन हवालात में रहना पड़ता और कितना 'जुर्माना' देना पड़ता। ये जवान दूसरे बेटिकट यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम भी करते हैं।     अब यूं ही तो नहीं रेलवे की नौकरी को इतनी अहमियत दी जाती रही है। आप को पता होगा रेलवे को एक ‘स्टेट’ का दर्जा होता है। अपना टेलीफोन सिस्टम, अपने स्कूल/कॉलेज, अपनी दुकानें, क्लब, अपने रोड्स, अपनी कॉलोनी, अपना बिजली घर अपना पानी का सिस्टम। फिर बचा क्या? रेलवे अपने हर कर्मचारी को इतना 'एम्पाॅवर' कर देती है और उसमें कूट कूट कर सैंस ऑफ बिलाॅगिंग भर देती है कि हर कर्मचारी यही सोचता है कि रेल उसी के कंधों पर चल रही है। एक जबर्दस्त जिम्मेवारी का भाव देती है। इसी जिम्मेवारी के भाव से निकलता है अपने ऑर्गनाइज़ेशन पर गर्व।

 

अब यह कहा और माना जाता है कि रेलवे स्टेशन का मालिक स्टेशन मास्टर होता है। मगर आर.पी.एफ. को इस तरह का हिस्सा-बाँट पसंद नहीं। नेपोलियन का एक कथन है “या तो मैं खामोश रहता हूँ या कमांड करता हूँ” आर.पी.एफ. के ऑफिसर पहले कमांडर ही कहलाते थे अब कमिश्नर (सुरक्षा आयुक्त) है। खाकी वर्दी में कुछ ऐसी ही सिफ़त है कि आदमी एक बार चोर-उचक्कों से नहीं डरता पर खाकी से डरता है। यूं ख़ाकी, ख़ाक का (मिट्टी का) रंग है। आर.पी.एफ. ने वह शेर जरुर सुना होगा:

 

                    मिटा दे अपनी हस्ती अग़र कुछ मर्तबा चाहे

                   कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ओ-गुलज़ार होता है

अतः आपको गुल-ओ-गुलज़ार कराने का महत्वपूर्ण काम आर.पी. एफ. ने अपने ऊपर ले लिया है। अब आप चाहे कितनी ही सफाई दें या गुल-ओ-गुलज़ार बनने से मना करें आर.पी. एफ. के चार जवानों ने आपको टांग/बाजू पकड़ के गुल-ओ-गुलज़ार कर ही देना है। माइंड इट।

 

Wednesday, July 15, 2026

विधायक फ़रोश

 


 (वरिष्ठ विद्वान एवं कवि श्रेष्ठ दद्दा भवानी प्रसाद मिश्र जी से क्षमा सहित) 


जी हाँ हुज़ूर मैं विधायक बेचता हूँ

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ

मैं किसिम-किसिम के विधायक बेचता हूँ

जी, माल देखिये, दाम बताऊंगा,

बेकाम नहीं हैं काम बताऊंगा

कुछ विधायक लिए हैं मस्ती में मैंने

कुछ विधायक लिए हैं बस्ती मे मैंने 

कुछ टेक्स डिफ़ाल्टर विधायक हैं मेरे पास

कुछ विधायक डिस्प्रोपेशनेट असेट वाले हैं

यह विधायक हेल्थ ग्राउंड पर आता-जाता है

यह विधायक खोखे देख खिंचा जाता है 

जी, शुरू में जरूर शर्म लगी मुझको;

पर बाद-बाद में अक़्ल जगी मुझको,

जी, लोगों ने तो बेच दिए ईमान,

जी, आप न हों सुनकर ज़्यादा हैरान—

मैं सोच समझ कर आख़िर

विधायक बेचता हूँ,

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक  बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

यह विधायक देशभक्ति के गीत सा है गाकर देखें,

यह विधायक गंदी गाली सा है गरिया कर देखें

यह विधायक वहाँ  ई डी की रिपोर्ट में लिक्खा था,

यह विधायक सी बी आई की फाइल में  रक्खा था,

यह विधायक पहाड़ी को रात-रात में समतल कराता है,

यह विधायक विकास के नाम पर बस पेड़ कटवाता है!

यह विधायक भूखा-प्यासा आमरण अनशन कराता है

जी, यह गाँव-गाँव जाकर  हिन्दू-मुसलमान कराता है,

यह विधायक रिज़ॉर्ट में ही सरकार बनवा देता है हुज़ुर,

यह विधायक दो दिन में बहुमत मुहैया कराता है हुज़ूर,

जी, और विधायक भी हैं दिखलाता हूँ,

जी, परेड कराना चाहें आप तो नचवाता हूँ।

जी, कुर्ते-पाजामे वाले पसंद करें,

ये बंडी-धोती विधायक मंत्रिपद पर तुरंत मरें!

ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,

मैं ले आता हूँ सफारी सूट वाले विधायक

इनमें से भाए नहीं ? नए पेश कर दूँ

जी नई उम्र के नहीं तो क़ब्र में पाँव वाले भी हैं

मैं नए, पुराने सभी तरह के

विधायक बेचता हूँ,

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

ये विधायक बस नाम का ज़िंदा है इसे रखूँ ?

आपके ऑर्डर में कितने विधायक लिखूँ ?

यह विधायक रा सिल्क वाला, यह खादी का है

यह विधायक पित्त का तो ये वाला बादी का है

कुछ और विधायक डिज़ाइन-टू-ऑर्डर भी हैं

यह लीजिये  चलती चीज़ एक्स फ़िल्मी,

यह सोच-सोच कर मर जाने वाला विधायक ,

यह एक दल से दूजे दल जानेवाला विधायक !

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात,

मैं बेचता-खरीदता ही तो रहता दूँ दिन-रात,

 तरह-तरह के हैं स्टॉक में विधायक

गोदाम से और मँगवाता हूँ विधायक 

जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं विधायक!

जी बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ,

गाहक की मर्ज़ी, अच्छा जाता हूँ;

या भीतर जाकर पूछ आइए आप,

है विधायक बेचना वैसे बिल्कुल पाप,

क्या करूँ मगर लाचार

जब वो खुद ही हैं बिकने को तैयार

हार कर विधायक बेचता हूँ!

जी हाँ हुज़ूर, मैं विधायक बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के विधायक बेचता हूँ,

मैं क़िसिम-क़िसिम के विधायक बेचता हूँ!

व्यंग्य : एक आँख से अंधाधुंध

  

      किसी भी प्रदेश का नाम बिगाड़ना नहीं चाहिए। उत्तर प्रदेश का नाम अंग्रेजों के टाइम में यूनाइटेड प्राॅविन्स था। बाद में हमारी अपनी भारत सरकार ने इसका नाम उत्तर प्रदेश कर दिया। उत्तर में है तो उत्तर प्रदेश। जनसंख्या तो तब भी सार्वाधिक रही होगी। अतः उत्तर प्रदेश वालों को भी पता रहा होगा प्रश्न चाहे कोई हो उत्तर हमारे ही पास है। कितने ही प्राइम मिनिस्टर, शायर, कवि, ताज महल। बड़े-बड़े पागलखाने उत्तर प्रदेश की ही देन है। कहते हैं कि अगर आप प्यार में सफल हो जाते हैं तो आपके लिए ताजमहल है और अगर असफल हो जाते हैं तो घबराएँ नहीं आपके लिए पागलखाना आगरा में ही खिदमत में हाजिर है। यू.पी. को यूं कहने वाले उल्टा प्रदेश भी कहते हैं। लेटेस्ट टीचर्स के लिए एक पात्रता परीक्षा 2026 का आयोजन किया गया। इस प्रश्नपत्र में एक प्रश्न था 'एक आँख से देखना' का अर्थ क्या होता है। इसके लिए मल्टीपल उत्तर दिये गए थे यथा सभी को एक समान दृष्टि से देखना/व्यवहार करना। दूसरा विकल्प था अंधाधुंध करना आदि आदि। अब अभी तक जो हमने पढ़ा-समझा था उसके अनुसार उत्तर बनता है समान दृष्टि से देखना/व्यवहार करना। किन्तु जब आयोग ने उत्तर कुंजी जारी की तो उसमें सही उत्तर  अंधाधुंध करना बताया गया। अब परीक्षार्थियों में इसे लेकर बेहद रोष है क्यों कि उन्होने भी यही समझा था कि सही उत्तर है एक समान व्यवहार करना। इस आँख ने और भी कहर ढाये हैं। एक बच्चे ने मम्मी को बताया “मम्मी ! पापा आंटियों से बहुत डरते हैं उन्हें देख कर अपनी एक आँख बंद कर लेते हैं”

 

दरअसल, ये नयी पीढ़ी अभी तक समझी ही  नहीं। भाई लोग अब आज के युग में इस का अर्थ अंधाधुंध करना ही है। ये जो अंधेरगर्दी चल रही है ये आपको दिखती नहीं है या आप जानबूझ कर एक आँख क्या दोनों आँखें बंद कर असलियत से दूर हैं। भाई लोग गांठ बांध लें अब एक आँख से देखने का अर्थ अंधाधुंध करना ही है। आप एक आँख की कह रहे हो मैं कहता हूँ एक क्या दोनों आँखों का अर्थ भी आजकल अंधाधुंध करना है। क्या कर लोगे तुम ? खामोश ! नहीं तो अभी दस साल के लिए डिबार कर देंगे तब समझ लगेगी। देखो! शब्द अपने अर्थ, देश-काल अनुसार अदलते-बदलते रहते हैं। जब होता होगा तब होता होगा कि गुरु आदर का सम्बोधन था, अब नहीं। अब किसी को गुरु कहना ऐसे कहना है जैसे वह कोई महा मक्कार, धूर्त व्यक्ति है बोले तो गुरुघंटाल। किसी की अच्छी मरम्मत करना और बुरी तरह पीटना, एक ही बात है। यानि की बुरी तरह कुटाई करना और अच्छी तरह धुनाई करना एक ही हो गया। ये ही क्या और ऐसी बहुत सी कहावतें और मुहावरे निकल आएंगे जिनको आज के संदर्भ में देखना और उनके अर्थ में तब्दीली करना जरूरी है। , मसलन एक मुहावरा था नेकी कर कुएं में डाल। अब कुएं नहीं हैं अतः लोग नेकी भी नहीं करते। नेकी कर कहाँ कुआं ढूंढते फिरेंगे? अतः या तो नेकी नहीं करते या नेकी इतनी सूक्ष्म करते हैं जिसे फ्लश किया जा सके। अतः नया मुहावरा है नेकी कर जूते खा। क्यों कि जिसके साथ आप नेकी कर रहे हैं वह आपको मुंह पर कुछ भी कहे, समझता आपको बुड़बक ही है। घर आए मेहमान को भगवान का रूप समझिए।  ‘होम स्टे’ के इस  जमाने में पता नहीं आप किस जमाने में जी रहे हैं। झूठ बोलने पर कान पक जाते हैं।  शेक्सपियर बहुत पहले कह गए थे 'नथिंग इज़ गुड और बेड थिंकिंग मेक्स इट सो'। अतः जो आयोग ने उत्तर प्रदेश में जो उत्तर दिया है उसी को पत्थर की लकीर समझिए। नहीं तो एक क्या दो आँखों से भी अंधाधुंध करने-करवाने के लिए तैयार रहें। इस पर जरा दोनों आँखें बंद कर सोचिए !     

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

                           (बशीर बद्र जी से मुआफी के साथ)


अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

जिसको उधार दिया वो दूर हो गया

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के 

क्वेश्चन-पेपर लीक जब से मशहूर हो गया

स्कूल कॉलेज दफ्तर बंद कर दिये हैं हमने 

गो कि मंदिर का चन्दा मंदिर से दूर हो गया

‘एवार्ड्स’ की भूख ने तोड़ दी उनकी अना

चुनाव नज़दीक देख ग़लत-सही का फर्क काफ़ुर हो गया

अपने नाती-पोतों को उसकी कहानी सुनाना

जब मेरे मुल्क का आवाम मुफ्तखोर हो गया

सुब्ह-ए-विसाल पूछ रही अज़ब सवाल

इंसानी-हुकूक में मुल्क पास हुआ या कोसों दूर हो गया

उस दिन से मेहनत करेगा आवाम

खैरात का बस्ता जिस दिन उसे नामंज़ूर हो गया

 

Thursday, July 9, 2026

व्यंग्य : अंकों का राजा – आठ

 


 

पहले आप ये जान लें कि जब बड़े आदमी कुछ.बोलते हैं.उसके बहुत गहरे अर्थ होते हैं। जरुरी नहीं कि वह हमारी-आपकी समझ में तभी के तभी आ ही जाये। कई बार बरसों लग जाते हैं। आपने ऐसे लोग देखे होंगे जो सोमवार को नॉन वैज़ नहीं खाते फिर वो देखे होंगे जो मंगलवार को नहीं खाते गो कि हर एक का कोई न कोई दिन होता है जब वह इन चीजों से परहेज करता है। इस परहेज के चक्कर में, मैं एक ऐसे शख्स को जानता हूँ जो मंगलवार को रात के बारह बजे तक प्रतीक्षा करके बारह बज कर एक मिनट पर छक के पीना शुरू कर देता था। इसी श्रंखला में एक सज्जन ऐसे थे जो मंगलवार का पूर्ण व्रत रखते थे। जब किसी ने पूछा कि आप तो कम्यूनिस्ट हैं आप भी ये सब मानते हैं ?  उनका जवाब था  मैं हेल्थ रीज़न्स से एक दिन का व्रत रखता हूँ अब मैं किसी दिन का भी व्रत रखता लोगों ने कुछ न कुछ कहना ही था। किसी देश में जब आठ अक्षरों की आइस क्रीम (Ice cream) से होने वाली गंदगी (आइस क्रीम की डंडी, पेपर कप इधर उधर पड़े रहते थे) से कैसे निपटें इस पर ब्रेन स्टाॅर्मिंग हो रही थी आप जानते हैं ब्रेन स्टाॅर्मिंग के दो सिद्धान्त हैं एक, आपके पास ब्रेन होना चाहिए दूसरे, आप किसी भी सुझाव पर हँसेंगे नहीं अर्थात उसका उपहास नहीं करेंगे। तभी यह संभव हो पाया कि क्यों न ऐसी आइस क्रीम बनाई जाये जिसके कंटेनर को भी खाया जा सके और इस तरह कोन वाली (साॅफ्टी) की शुरुआत हुई।

 

अंकों में अंकेन्द्र आठ है। देखिये क्यों कि मेरा ये लेख आठ की प्रशंसा में है अतः मैं यह बताना जरूरी समझता हूँ कि आठ जैसा कोई दूसरा अंक नहीं। अन्यथा ये शराब वाले '8 पी.एम.' नाम से शराब नहीं चलाते। यहाँ पी.एम. का अर्थ रात्रि के पहर से है। कृपया पाठक अन्यथा न समझें। कहते हैं कि भारत में सार्वाधिक जूता आठ नंबर का चलता है। अर्थात अधिकतर के पैर का साइज़ आठ नंबर है। हमारी माइथाॅलाॅजी में अष्टावक्र का ज़िक्र मिलता है जिनका शरीर आठ जगह से मुड़ा-तुड़ा था, असल में उनका नाम इसीलिए अष्टावक्र पड़ा था। कहते हैं ईश्वर ने दुनिया छह दिन में बना दी थी सातवें दिन गाॅड ने केवल विश्राम किया था। बोले तो आठवें दिन गाॅड ने क्या किया ? यह आज तक पता नहीं चला। आठ अंक का यही रहस्य है। यही अनसुलझी पहेली है।

 

 न्यूमरोलाॅजी में आठ का अंक शनि का प्रतीक माना गया है। अब भाई शनि से कौन नहीं डरता। जो नहीं डरता था उसे वैसे डरा दिया गया है। शनि से डराने के अनेकानेक रूप हैं यथा शनि की ढैया, शनि की साढ़े साती। बच्चू अब कहाँ तक दौड़ लगाओगे। नौ दिन में चले अढ़ाई कोस...यहाँ भी शनि की ढैया है। एक दिन में आठ पहर होते हैं आपको पता है ना। यूं कहने को दिशाएँ भी आठ ही होतीं हैं मगर ऊपर आकाश की ओर और नीचे पाताल को ओर इंगित कर इन्हें दस बनाया गया है। साष्टांग प्रणाम आप सुने ही होंगे। बोले तो जब मस्तक, दोनों हाथ, वक्ष, दोनों घुटने, दोनों पैर शामिल हों अतः जब कोई बड़ा आदमी आठ की बात करे तो ध्यान से सुनना चाहिए। पढ़ाई लिखाई वालों ने भी कुछ सोच समझ कर ही आठवीं क्लास को बोर्ड की परीक्षा बनाया था। हमारी बात छोड़िए हम उस पीढ़ी के हैं की हमने तो पांचवीं भी बोर्ड दिया था। बाई दि वे, हमारी ही नहीं बल्कि जापानी और चीनी संस्कृति में भी आठ का बहुत धार्मिक महत्व है। माइंड इट। आठ एक पूर्ण अंक है। आपने कभी इसकी फिगर पर गौर किया है। एक दम कंप्लीट। कहीं कोई लूज एंड नहीं। दूर से देखो तो बिलकुल हम्पटी-डम्पटी मालूम देता है बस एक हैट की कसर है।  हमें आज़ादी भी आठवें महीने में मिली थी।  संगीत के आठ लय, आठ तत्व होते हैं। 

 

जिन्हें न पता हो उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि भारत के

 स्वतत्रता संग्राम में इस आठ के अंक का बहुत बड़ा महत्व है।

 क्विट इंडिया मूवमेंट (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो) की शुरुआत

 आठवें महीने की आठ तारीख को ही हुई थी। इसी प्रकार

 अंतराष्ट्रीय महिला दिवस भी आठ तारीख को ही मनाया

 जाता है। आठ मार्च को। आठ के गुणगान में अब और क्या

 कहूँमेरे नाम में ही देख लो आठ अक्षर हैं (इंगलिश के)

 क्या 'हिन्दुत्व' क्या 'सनातनी' सब आठ लैटर से मिल कर

 बने हैं। अतः कृपया आठ का अथवा इससे संबन्धित अंक

 गणित का मज़ाक ना उड़ाया जाये। यूं भी अंकगणित हर

 किसी के बस की बात नहीं। सबसे ज्यादा आठ अक्षर से

 चलने वाली 'कोचिंग' भी इसी विषय की होती है। अब मेरा

 आठ लैटर का 'जय राम जी' स्वीकार करें।