Ravi ki duniya

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Monday, August 24, 2026

व्यंग्य : विद्यार्थी और हेयर स्टाइल


    पता नहीं क्यों हमारे बाप-दादा के ज़माने से ये मिथक चला आ रहा है कि पढ़ने वाले बच्चों को बड़े बाल नहीं रखने चाहिए। उनको या तो गंजे सिर रहना चाहिए या फिर बहुत छोटे-छोटे महीन बाल रखने चाहिए। जिसे मिलिटरी भाषा में क्रू-कट कहते हैं। कई लोग इसे क्रू-कट कहने के बजाय कटोरा-कट भी कहते थे। बेसिकली इसमें कैंची का कोई काम नहीं होता था। सब काम या तो उस्तरा या फिर मशीन से लिया जाता है। पहले भले बाल कम होते थे मगर बालों में तेल जरूर लगाया जाता था। वो भी कोई फ़ैन्सी खुशबू वाला तेल नहीं बल्कि सरसों का तेल जिसे पता नहीं क्यों कड़वा तेल कहा जाता था। कहीं कहीं गोले (नारियल) के तेल का भी रिवाज हुआ करता था।

 

    हद तो तब थी जब पिताश्री नाई का फुल-फुल मार्गदर्शन करते नज़र आते थे। “यहाँ से और हल्के करो” “इधर रह गए, इनको काटो”  ज़ोर इस बात पर होता था कि माथे को ‘हेयर-फ्री’ रखा जाये। मुझे लगता है पेरेंट्स को ये डर हुआ करता होगा कि बड़े बाल का अर्थ है वक़्त की कितनी बरबादी होगी। कंघी ‘बैक-पॉकेट’ में रखनी होती थी और थोड़ी थोड़ देर में उसे स्टाइल से निकाल कर बालो में फिराना  होता था। पिताश्री को बैक-पॉकेट से ही नफरत जैसी रहती थी। जब हिप्पी फैशन आया जिसमें लंबे लंबे आइंस्टाइन टाइप बोलो, सुमित्रानंदन पंत टाइप बोलो, बाल रखने का रिवाज चल निकला तो इससे सैलून के बिजनिस पर बड़ा खराब असर हो चला था। इसका तोड़ ये निकाला कि सैलून वालों ने अपने रेट खूब बढ़ा दिये। एक बार अपने पिताश्री के बार-बार टोकने पर मैंने भी ये बदतमीजी की थी।  सिर पर मशीन चलवा ली और दीदादिलेरी से उनसे ही पूछने लगा “अब ठीक है?”  आज इस ‘लिव इन’ के दौर में सोचता हूँ कि लंबे बालों और पढ़ाई की क्या ही रिलेशनशिप।

 

    बहरहाल नेपाल में, जो है सो, जेन-जी ने जो तूफान लाया वो अब स्कूल कॉलेज तक आन पहुंचा है और स्कूल ऑथारिटीज को हिदायत दे दी गयी है कि वो बच्चों को बालों को लेकर कुछ न कहें। बोले तो इस टिक-टाक के दौर में उनसे कोई टोका-टाकी न करें। मैं समझ सकता हूँ टीचर लोग कैसे कैंची लेकर बच्चों के पीछे पड़े रहते होंगे। बच्चे आगे-आगे टीचर कैंची से लैस पीछे-पीछे। टीचर लोग भी न, अपने को समाज सुधारक ही समझने लग पड़ते हैं। इससे उनके अहं को बहुत शांति मिलती शांति मिलती होगी। जहां मौका लगे, जुट जाते हैं अपना रुतबा जमाने। स्कूल के दिनों में एक ट्यूटर महाशय अपने ट्यूशन के ग्राहक बढ़ाने को मेरे पिता के सामने मुझसे बोले कि मैं उनके इस वाक्य का अनुवाद करूँ “क्या बच्चे अभी तक वहीं खेल नहीं रहे होंगे?” आजतक मैं इतना बड़ा हो गया इस सेंटेन्स को बोलने का ज़िंदगी में मौका नहीं आया।   

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