Ravi ki duniya

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Saturday, September 12, 2026

व्यंग्य: मांजरी (बिल्ली) मुंबई और मेट्रो

 


 

                     खबर आई है कि मुंबई-मेट्रो स्टेशन के एक स्टेशन गुंडावलि पर  एक बिल्ली बड़े अरसे से आते-जाते यात्रियों को अपनी पैनी नज़र से देखती, परखा करती थी। वह बिला नागा अपनी ड्यूटी पर आ जाती थी और अपना निर्धारित स्थान ग्रहण कर अपनी ड्यूटी पर लग जाती थी। यात्री उस से और वह यात्रियों से भलीभाँति परिचित थे। वे अपनी अपनी भाषा में एक दूसरे का अभिवादन कर ‘प्लेज्नट्रीज़’ भी एक्सचेंज करते थे। अच्छा खुशनुमा माहौल रहता था। मुंबई में बिल्लियों का विशेष स्थान है। वे स्नेह की पात्र होती हैं। बहुत तादाद में उन्हें पालते हैं। उनसे लाड़  लड़ाते हैं। हालांकि बिल्ली बहुत डिमांडिंग होती हैं, खासकर डॉगी बिरादरान के मुक़ाबले। एक कहावत भी है ना : जब आप अपने पालतू डॉगी की आवभगत करते हैं  तो वह मन ही मन कहता है मेरा मालिक मेरे लिए भगवान है। जब आप अपनी पालतू बिल्ली की आवभगत करते हैं तो वह मन ही मन कहती है अपुन हीच भगवान है। मुंबई प्रवास के दौरान कोलाबा में मेरे आस-पड़ोस में बाकायदा लोग बाग बिल्लियों को खाना खिलाते थे। एक भद्र दयालु महिला तो बिल्लियों को भोजन देने सुबह-सुबह तड़के ही निकल पड़ती थी। बिल्लियाँ उसकी प्रतीक्षा करती थी, एक बार उन ‘मैडम’ से बात हुई तो मैंने नोट किया उनकी अपनी आँखें बिल्ली की तरह ग्रीन, स्थिर, ठंडी और एक हद तक डरावनी सी थीं। फिल्मों में भी बिल्ली का खूब महिमामंडन किया गया है। अक्सर हीरो, हीरोइन अथवा बॉस बिल्ली से खेलता दिखाया जाता, फिल्मों के टाइटल भी ‘ब्लेक कैट’ जैसे होते हैं।

 

मुंबई में ये बिल्ली पालने का रिवाज शायद अंग्रेजों से आया होगा। जब मेट्रो के यात्रियों को गुंडावली स्टेशन पर बिल्ली दिखाई नहीं दी तो उन्होने पूछताछ की और मेट्रो के अधिकारियों से अनुरोध किया कि अब उनको इस बिल्ली की इतनी आदत सी पड़ गई है। अब उसे कृपया भगाया न जाये। मुंबई मेट्रो के अधिकारीगण, यात्रियों से भी चार कदम आगे निकले। उन्होने बिल्ली को ‘अपाइंट’ ही कर लिया और उसे भन्नाट  पदनाम (डेजिंग्नेशन) भी दे दिया -चीफ फ्लाइन ऑफिसर, बोले तो सी.एफ.ओ. । बिल्ली भी खूब खुश होगी। आज के इस संविदा और अग्निवीर के दौर में सीधे चीफ की पोस्ट। वाओ वाओ! नो नो म्याऊँ!म्याऊँ! मुंबई के मेरे ऑफिस में बहुत बिल्लियाँ थीं। मुझे बताया गया कि ये पीढ़ियों से यहाँ हैं इनके ग्रेट ग्रेट ग्रेट ग्रांड फादर भी यहीं के डोमिसाइल थे। पता लगा कि फाइलों को चूहे कुतर जाते थे अतः ऑफिस में बिल्लियाँ पाले जाने लगीं। उनके दूध-बिस्किट के लिए ऑफिस सुपेर्टेंडेंट के पास एक इम्प्रेस्ट भी होता था। अब जब चहुं ओर बिल्लियों का राज हो तो चूहे क्या खा कर फाइल खाएँगे।

 

                            ये बंद अलमीरा और फिर उसके बाद डिजिटल रिकॉर्ड होने पर बिल्लियों की लापरवाही होने लगीं। कभी जहां हृष्ट-पुष्ट बिल्लियाँ कॉरीडोर के चक्कर लगाती थीं। अब बिल्ली इतनी मरगिल्ली हो गयी कि युवा बिल्लियाँ भी शिशु जैसी नन्ही-मुन्नी लगने लग पड़ी हैं। हो सकता है वो भी आजकल के दौर के अनुसार स्लिम-ट्रिम रहना पसंद करती हों यूं भी अब उनके लिए दूध कहाँ यहाँ आदमी को तो दूध नसीब नहीं हो रहा बेचारों को केमिकल मिला नकली दूध, नकली चाय में दाल के पीना पड़ रहा है। गुंडावलि की बिल्ली निश्वय ही तक़दीर वाली है। वरना आदमी लोग को तो सी.एफ.ओ. क्या कोई संविदा या ठेके पर लेने वाला कोई नहीं। वक़्त है कि अब बिल्ली दो-चार लोगों के परिवार को पाल ले। आखिर हमारी दिल्ली में लंगूर अपने ‘मालिक’ के परिवार का पेट पाल ही रहा है।

 

नोट: अभी इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है ये गुंडावलि स्टेशन पर

        मांजलि (बिल्ली) है अथवा बोका (बिलौटा)

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