Ravi ki duniya

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Saturday, September 12, 2026

व्यंग्य: भारत की विश्व को देन

 

 

                   अक्सर एक सवाल हवा में उछाला जाता है कि फलां देश ने ये दिया, फलां देश ने दुनिया को ये दिया। भारत ने दुनिया को क्या दिया? उन सबको जवाब के रूप में मेरा ये लेख है। आप को भी फुल-फुल गदगद होने और गर्व करने का अधिकार है। चलिये साथ-साथ गर्व करते हैं और गदगद होते हैं। श्री मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की एक फिल्म थी ‘पूरब और पश्चिम’ उसमें मदन पुरी जी एक संवाद बोलते हैं: भारत ने दुनिया को क्या दिया कुछ नहीं। भारत ज़ीरो है ज़ीरो। बस इसी पर मनोज कुमार जी एक गीत गाते हैं  जब ज़ीरो दिया भारत ने.... कुल जमा ये कि हमने विश्व को ज़ीरो दिया। इसका ये मतलब कतई नहीं निकालें कि हम ज़ीरो हैं। फैज़ साब का एक शेर है –

 

               मैं कर रहा था ग़म-ए-जहां का हिसाब

               तुम याद बेहिसाब आए

 

 तो लीजिये मेरी समझ से भारत ने विश्व को क्या-क्या दिया बल्कि ‘क्या-क्या न दिया दिलबर...’ पेश है सूची:

 

1 जुगाड़ तकनीकी: ऐसी ऐसी तरकीबें और युक्तियाँ हैं जो आपने न कहीं देखी होंगी न सुनी होंगी। मसलन वाशिंग मशीन में लस्सी बनाना। पुराने फ्रिज को अलमीरा की तरह इस्तेमाल करना। किताब की फ़ोटोस्टेट कराकर बेचना। पंप से जुगाड़ रूपी वाहन तैयार करना और उसी को वक़्त ज़रूरत खेत में काम लेना। आप सोचेंगे तो आप भी दो-चार जुगाड़ जोड़ देंगे। 

2 चुगली: हमारे यहाँ चुगली के लिए आबोहवा बहुत ही माफिक है। आप बेधड़क किसी की भी चुगली किसी से भी कर सकते हैं। जितने चुगली करने वाले हैं उससे कहीं ज्यादा चुगली सुनने को आतुर बैठे हैं। मोटा मोटा डिमांड  और सप्लाई का खेल है। डिमांड ज्यादा है सप्लाई कम है। फेसबुक से बड़ा आराम पहुंचा है फेसबुक कच्चा माल मुहैया करता है किसी के प्रोफाइल में जाकर खंगालना ऐसी ही एक ताका-झांकी है।  बेहद सुकून भरी और स्फूर्ति देने वाली। श्रेष्ठ चुगलीकार कभी अपना नाम नहीं आने देते और अगले को भी ताकीद कर देते हैं कि उनका नाम नहीं आना चाहिए। 

3 सड़क/भवन बनाने की तकनीक: हमारे यहाँ सी तकनीक दुनिया में कहीं नहीं पाई जाती। हमारा दावा भी है कि ये स्पेस टेक्नालाजी है। हमारे बनाए पुल अक्सर ‘बैठ’ जाते हैं। सच भी है कब तक खड़े रहेंगे? आपने बैठने को बोलना नहीं है। अतः हमारे पुल अगर कुछ महीने चल जाएँ तो इसे बहुत समझना चाहिए। कुछ पुलों का जीवन तो इतना क्षण भंगुर होता है कि कुछ हफ्तों में ही सिमट के रह जाता है।

 

        पानी केरा बुदबुदा अस पुल औ सड़क की जात

        पेमेंट / उदघाटन होत टूट जात, ज्यों तारा प्रभात

 

कई बार तो पुल को अपने ढहने की इतनी जल्दी होती है कि उदघाटन से पहले ही थक जाता है। आप इसे पुल ढहना न कहें ये पुल का बलिदान है ताकि इसमें लगे कामगार, सुपरवाइज़र, ठेकेदार, बिचौलिये, इंजीनीयर नेता आदि सबका चूल्हा जलता रहे। यही गुण हमारी सड़कों में भी पाया जाता है। सड़क में गड्डा है या गड्डे में सड़क है अंतर करना कठिन काम है। अभी तक बस यही गनीमत है कि सड़क पर चलने वालों पर दोषारोपण नहीं हुआ है कि ये ही नालायक हैं इन्हें वर्ल्ड क्लास सड़क पर कैसे चलना है आता ही नहीं। तमीज और तहज़ीब का नितांत अभाव है। हमारी सड़कें अक्सर उदघाटन से पहले ही बेसब्र हो जाती हैं। लेकिन पुल की तरह सड़कों का भी जीवन में उच्च आदर्श है वही इस सड़क को बनाने वाले सभी कर्मियों, नेताओं और ठेकेदारों का जीवन-यापन।

 

                 बार बार टूटो हज़ार बार टूटो

                 ये टूटने की चीज़ है मेरे शहर की सड़क दिलरुबा

 

4 मिलावट की प्रतिभा: इसमें तो दुनिया हमारा लोहा मानती है। अब खैर चीन वाले भी इसमें आन घुसे हैं। पर हमारा कोई तोड़ नहीं। हम वो जादूगर हैं कि आप हमें बताओ चेलेंज दो और हम हूबहू नकल तैयार कर देंगे। हम मिलावटी दूध, घी, चीनी, चाय, तरबूज क्या नहीं बना सकते। हम मिलावट की दुनिया के बेताज बादशाह हैं। 

5 दहेज व दहेज हत्या: यह प्रतिभा हमारी विशेषता है। हम लड़की वाले के खून की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेते हैं और उसके बाद भी उनकी लड़की को जला भी सकते हैं, मार भी सकते हैं। मार कर फांसी पर भी लटका सकते हैं। 

6 ऑनर किलिंग: हम इज्ज़त वाले लोग हैं। हमें ये कतई मंजूर नहीं  कि हमारी पगड़ी उछाली जाये वो। भी हमारी अपनी घर की बहू बेटियों द्वरा अतः हम अपने ऑनर के लिए जब जी चाहे उन्हें मार देते हैं अथवा पेड़ पर लटका देते हैं। हम अपने ऑनर के लिए कुछ भी करेगा और अपने बच्चों को मारना तो सबसे आसान है। इसमें हमारी बिरादरी/हमारा समाज भी हमारा ही साथ देता है।

7 पूर्णत: सिद्धान्त विहीन राजनीतिज्ञ: सिद्धान्त सिद्धान्त है और राजनीति राजनीति है। हम कभी दोनों को मिक्स नहीं करते। वो अपनी जगह, ये अपनी जगह। हम पार्टी और लॉयल्टी ऐसे बदलते हैं जैसे मुंबई वाले बानियान बदलते हैं या दफ्तर जाने को लोकल बदलते हैं। हमारा एक ही सिद्धांत है वह है कुर्सी। प्राण जाये पर कुर्सी न जाये। आदमी जीता है कुर्सी के लिए मरता है कुर्सी के लिए। कत्ल करता है कुर्सी के लिए। कत्ल होता है कुर्सी के लिए। भारत एक कुर्सी प्रधान देश है। यहाँ तरह तरह के विषशण चलते हैं युवा हृदय सम्राट, यूथ ऑइकोन, मजदूर नेता, श्रमिक नेता। राजपूत नेता, दलित नेता। हमारा ईमान कुर्सी है। हमारा धर्म कुर्सी है। कुर्सी के आगे हम किसी को नहीं पहचानते भाई है चचा है भतीजा है।

8 भयंकर भ्रष्ट नौकरशाह: हमारे दफ्तरों की फाइल को चलाने के लिए पहिये चाहिए होते हैं।  वे पहिये होते हैं करेंसी। जितना ज्यादा कोयला डालोगे उतनी ज्यादा स्टीम बनेगी और उतनी ही तेजी से गाड़ी चलेगी। अतः दफ्तर में आप जितना ज्यादा ‘सुविधा शुल्क’ रूपी रिश्वत डालेंगे आपकी फाइल उतनी ही सुपरसोनिक स्पीड से चल पड़ेगी और आपका काम आपके ‘डोर स्टेप’ पर होकर आ जाएगा। आप नौकर शाह के नौकर पर न जाएँ आप तो पीछे लगे शाह को देखें। हम नौकर तो हैं पर आपके नहीं।  पैसे रूपी बादशाह के।  हम काले को सफ़ेद, सफ़ेद को काला करने की कला जानते हैं। हम बैक डेट में क्या नहीं कर सकते। असल में आग का आविष्कार हमने ही किया था। छांट छांट कर दफ्तर, दफ्तर के कक्ष और निर्धारित फाइलों में ही आग लगती है। अब हम भी क्या करें कुछ फाइलें होती ही इतनी ज्वलनशील हैं कि कितने ही एहतियात से रखो आग पकड़ लेती हैं बस ऐसे समझो जैसे फास्फोरस।

9 लचर मेडिकल सिस्टम: आप कभी गुमनाम बन कर सरकारी अस्पताल चले जाएँ आपका सारा वहम निकल जाएगा। दिनों दिन नंबर ही नहीं आयेगा। डॉ आपको रेफर करने की जुगाड़ में रहता है। डिस्पेन्सरी में डॉ है तो फार्मेसिस्ट नहीं, वह है तो दवा नहीं, दवा है तो पता नहीं असली है या नकली है। सरकारी मे जान से जाना और प्राइवेट मे माल से जाना तया है। गो कि आप ज़िंदा हैं ये भी किसी चमत्कार से कम नहीं।

10 अशिक्षित शिक्षा व्यवस्था: स्कूल हो या कॉलेज अव्वल तो आपका दाखिला होना नहीं है। हो गया तो फीस दे दे कर आप गरीबी की रेखा से नीचे आ जाएंगे। परीक्षा की कोई गारंटी नहीं है। पेपर कब लीक हो जाय, सुबह से शाम तक कभी भी हो सकता है।  हाँ लीक होने की गारंटी पूरी पूरी है। टीचर्स डे पर जिस प्रकार के डांस और गाने स्टेज पर चल रहे हैं वैसे हमारे टाइम पर डिस्को में भी नहीं बजते थे। कहने को बी ए पास हैं पर आप बी ए की फुल फॉर्म भी पूछ लो तो बगलें झाँकने लगेंगे। इंगलिश  छोड़िए हिन्दी की भी पाँच लाइन शुद्ध नहीं लिख सकते।

11 दलालगीरी: हमारे देश की रीढ़ की हड्डी कोई है तो वे ये दलाल भाई ही हैं। दफ्तर दफ्तर इनका बोलबाला है। बल्कि इनका ही बोलबाला है। आप ड्राइविंग लाइसेन्स हो, राशन कार्ड हो आधार हो पासपोर्ट हो, बिजली का बिल माफ कराना हो, किसी फायदे की स्कीम में अपना नाम डलवाना हो, सब जगह इनका ही वर्चस्व है। ये सर्वव्यापी हैं। ये सर्वशक्तिशाली हैं। 

12 डायनासोर व केंचुआ बनने की कला: हमारे नौकरशाह हों या मंत्री-संतरी सब इस कला के धुरंधर होते हैं। पल में तोला पल में माशा की तर्ज़ पर ये अपने से कमजोर के आगे डायनासोर बन जाते हैं और अपने से बलशाली के आगे तुरंत खींसे निपोरने लगते हैं और केंचुआ बन जाते हैं। रीढ़ की हड्डी है ही नहीं। ये बैंगन के गुण दोष आपकी हैसियत देख कर बताते हैं, बैंगन की नहीं। 

13 चमचागीरी: इस कला में हम विश्व में नंबर वन हैं। पता नहीं इसका कोई इंडेक्स अभी तक क्यों नहीं बनाया गया है। हम रिकॉर्ड तोड़ चमचागीरी करते हैं। इस कला को हमने नैक्स्ट लेवल पर पहुंचाया है। इसे हमने ‘फाइन आर्ट’ में पदोन्नत किया है। यह अब एक ललित कला है। बारीक और इतनी अंतरंग कि चमचागीरी हो रही है ऐसा लगे बिना ही चमचागीरी करना। हमने इसे ऐसे समझो ‘मास्टर’ कर लिया है। मेरा मानना है कि हमें आई. आई. सी., आई. आई. ए. सी. खोलने चाहिए जिससे पूरा विश्व हमारी इस कला से लाभन्वित हो सके।

 

                  भारत डेमोक्रेसी की ही माँ नहीं और कितने ही चीजों का बाप है तुम क्या जानो रमेश बाबू। 

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