ये गाना है या तबाही है। मुझे तो लगता है
पूरा का पूरा गीत ही तबाही एकदम तबाही है। समीर (पुत्र गीतकार श्री अनजान) ने जब यह गीत रचा होगा सोचा नहीं होगा। अलका याज्ञनिक
और कुमार शानू ने यह गाया है। अभी हाल ही मे अलका याज्ञानिक जी को वील-चेयर पर टी वी में देख दुख हुआ। वे बहुत
मेहनत से यहाँ तक पहुंची। उनकी आवाज मोहक है। मैंने एक बार उनका ‘लाइव’ कार्यक्रम मुंबई के एन सी पी ए हॉल में देखा
था। कुमार शानू जी के तो अपने ही बहुत पचड़े हैं। सुकून नहीं है उनके भी रोमांटिक-कम-वैवाहिक
जीवन में। अब लो संगीतकार जी की जोड़ी को। नदीम-श्रवण। ये नदीम वही हैं प्रतिभा
सिन्हा वाले लफड़े के नायक बोलो, खलनायक बोलो। यह गोविंदा की
फिल्म का गीत है वही गोविंदा जिनके कभी पैर में धोखे से गोली लग जाती है। कभी कोई और रोमांटिक किस्सा लग जाता है। हमें
कैसे पता चला? वो तो उनकी पत्नी जी ही खुद-ब-खुद ‘आई एम ए बांद्रा गर्ल’ बता देती हैं। उनके साथ
नायिका थीं करिश्मा कपूर जी। यह ‘साजन चले ससुराल’ फिल्म का गीत है जो तीस साल पहले आयी थी।
देखिये आप भले फिल्म को भूल गए हों पर ये गीत
तो कालजयी साबित हो रहा है। देसी डिस्को और बोर हो रही हाउस वाइव्ज़ के लिए यह
हाथ-पाँव हिलाने का बहाना बनता है। आजकल
हम लोग बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं। कभी हम बोर होते थे, अब तो सुनने में आता है की फलां चीज़ बोर है। फलां डिश बोर है। जैसे आजकल
मैं अपने जूतों से बोर हो गया हूँ। पंद्रह साल हो गए पहनते-पहनते फटने-टूटने का
नाम ही नहीं ले रहे थे। अतः एक दिन मैंने
आव देखा न ताव और उन्हें फेंक ही दिया।
कानपुर केस में यह सुनने में आया है कि जिस संस्कारी भारतीय
नारी पर षड्यंत्र करने का शक ज़ाहिर कर हिरासत में लिया गया है वह कत्ल के वक़्त इसी
गीत पर एक क्लब में नृत्य-मगन थी। यूं वह बार-बार अपने फोन को भी देख रही थी और
पति महोदय भी फ़ोन पर बात कर रहे थे। अब देखिये ये फोन ही धोखेबाज़ निकला लाख डिलीट
किया फिर भी सब रिकॉर्ड निकल आया है और निकल रहा है। उसी तरह सी सी टी वी ने भी
धोखा दे दिया। वो जिसे आप स्मार्ट कह रहे थे वह ‘नौकर’ तो तुरंत ही तोते की तरह बोलने लगा। वह भी
धोखेबाज़ ही निकाला। इस्तेमाल करना था तकिया इस्तेमाल किया
रामपुरिया। वह भी 26 बार। इसमें भी धोखा। छह लाख की डील बताई जाती है। उसने धोखा
दे दिया। सब उगल दिया। भाड़ में जाये ऐसी स्मार्टनेस। या फिर उसने ये स्मार्टनेस
दिखाई कि मैं इल्ज़ाम अपने सिर क्यूँ लूँ। मेरा क्या लेना-देना। सोसायटी के गार्ड
ने भी बिना देर किए सब कह दिया किसने इन
दोनों को अंदर आने की वह भी बिना रजिस्टर पर एंट्री के इजाजत दी थी। धोखा-धोखा और
धोखा। मराठी में धोखा का अर्थ ‘खतरा’ होता है।
सत्तर के दशक में दिल्ली में एक विद्या जैन हत्याकांड हुआ था। जिसमें एक
नेत्र स्पेशलिस्ट ने अपनी पत्नी जी को अपनी नर्स के चक्कर में सुपारी दे मरवा दिया था। तब कहा जाता था ‘कहने को वह आँखों का स्पेशलिस्ट था पर अपने खुद के ‘मोतियाबिंद’ का इलाज़ नहीं कर पाया’। ऐसे ही इस केस में बेचारे ससुर साब यूं तो दवा के संभ्रांत सौदागर
थे पर इस धोखे की दवा उनके पास भी नहीं निकली जिसकी कीमत उन्होने अपनी जान देकर
चुकाई। वारदात मेन सब धोखे बाज़ ही निकल रहे हैं। अब किस किस को कहें तुम तो धोखेबाज़ हो.....
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