Ravi ki duniya

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Sunday, November 20, 2011

व्यंग्य: कस्बे के नेता की बरसी

हमारे कस्बे के नेता पिछले बरस किसी रहस्यमय बीमारी से चल बसे थे. कुछ लोग बताते हैं कि वे मुम्बई गये थे वहां बलबीर पाशा के विज्ञापन से वे बहुत प्रभावित हुए. खोजी तबियत के थे अत: विज्ञापन की तह में चले गये और पूरी जानकारी फर्स्ट हेंड ले कर ही लौटे थे. आते ही खाट पकड़ ली. खाट ऐसी पकडी‌ कि छोडी तो दुनियां ही छोड़ दी. कस्बे का और नेता का नाम बदनाम ना हो अत: बात दबा गयी. आज इन्हीं का जलसा है. पहले इनके प्रतिद्वंदी रहे एक नेता बोलने उठे. वे सूखाग्रस्त क्षेत्र की गाय से मरियल थे मगर वाणी में ओज़ था. वो चीखे “ बहुत ही काबिल इंसान थे राम खिलावन मेरे तो उनसे सन सैंतालीस से मधुर सम्बंध थे” किसी ने पीछे से कहा आप तो यूथ कांग्रेस के जलसे में पिछले माह अपनी आयु उनतीस बरस बता रहे थे, फिर सन सैंतालीस से मधुर सम्बंध कैसे हो गये. उन्होने तुरंत बात सम्भाली ये दिल की बातें हैं हमें वो बहुत मानते थे. आप सन सैंतालीस की बात कर रहे हैं ... भैया राम खिलावन तो हमसे अक्सर कहते थे “ किसन सरूप हमारा-तुम्हारा पिछले जनम का रिश्ता है. हम तो दो प्रान एक तन.. नहीं नहीं दो तन एक प्रान थे.” पिछले चुनाव में जब उनकी जमानत जब्त हुई रही तो रोते हुए बोले थे किसना मैं हार गया इस सामंती व्यवस्था से. इस भूमंडलीकरण से. जमानत के पैसे तुमसे ही लिये थे बोलो कब दें. हम कहे “ दद्दा ! हमारे और आपके पैसे में कोनी फरक है क्या. आज कही सो कही. अब कभी हम दोनो के बीच पैसे की बात नहीं आनी चाहिये. वो बात के धनी निकले. मरते दम तक ना उन्होने जमानत के पैसे दिये ना दुबारा बात ही छेड़ी.
पिछले साल मेले में नासिक गये रहे. हमें देवलाली छोड़ वे मुम्बई घूमने गये. सुने रहे कि मुम्बई में किसी लाली-डाली के पास पार्टी और अपने हाथ मजबूत करने वास्ते डिस्कस को गयले रहे. लौटे तो खून की कै करते. मैं तो कहता हूं ये लाली-डाली कोई विपक्ष की एजेंट रही होगी. हम चाहते हैं कि रामखिलावन जी की असामयिक मौत की सी.बी.आई. से जांच कराई जाये. सरकार हमारी सुन ही नहीं रही है. बैंक घोटाले, शेयर घोटाले के चलते टाले जा रही है . यदि आप चाहते हो कि बाबू राम खिलावन की मौत की निष्पक्ष जांच हो उर दोसियों को सज़ा मिले तो भाईयो और बहनों अगले चुनाव में हमें दिल्ली भेजिये.हम दिल्ली की ईंट से ईंट बजा देंगे. सरकार सीतापुर की जनता के अबला ना समझे. सीता मैया ज़मीन में समा गयी होंगी. हम तो सरकार हो या विपक्ष ससुर की टांग पर टांग रख कर चीर देंगे. ( अभी टिकट तय नहीं है कि कौन सी पार्टी देगी ) ये जो आतंकवादी ससुरे संसद में घुसे रहे हम वहां रहे होते तो कोनी घुस पाते ? बताईये ? आप ही बताईये ? सभी बोले “ नहीं ...कतई नहीं “ ऐसे नहीं आप सब लोग अपने अपने हाथ उठा कर कहिये राम खिलावन जी की मौत की सच्चाई उजागर करने हमें.... आपके अपने किसन सरूप को मिट्टी पकड़ को जरूर ही जितायेंगे. आप जान लीजिये कि आज देस पर कितना बडा संकट मंडरा रहा है. आप क्या सोचते हो ? ये लोग हमारे हिरन-चीतल मार रहे हैं. हम चुप रहे . पेड़ काटे रहे, हम खामोश रहे. नदियों का पानी बोतलों मे बेचे रहे हम कुछ नहीं बोले पर अब पानी सर के ऊपर हो गया है. आप समझते हो कि अमरीका ईराक के बाद चुप बैठेगा. नहीं. इतिहास गवाह है देस पर सभी हमलावर क्या मुहम्मद गौरी, क्या सिकन्दर, क्या ये आतंकवादी सभी एक ही रास्ते से अंदर आये रहे. हमें ये रास्ता बंद करना है. अगर आप चाहते हो हमार धरती मैय्या पर ये अमरीका वाले नहीं आयें तो हमें वोट दें. आप भूल गये क्या ? अभी 40 बरस पहले अमरीका सातवां बेडा भेजा रहा तो हम ही ना सिस्ट्मंडल ले के दिल्ली गये थे. बाद में ये मंडल बहुत लोकप्रिय हुए रहे और देस के यूथ को नयी दिसा दिये रहे

तो भाईयो ! अगर आप चाहते हो कि आपके भाई-भतीजा, साला-साली, छोरा-छोरी पढे-लिखें, सरकारी नौकरी पायें...बड़ा बड़ा कुर्सी पर बैठें... ऊंच-ऊंचा ओहदा पायें तो हमें आपके अपने मिट्टी पकड़ को अपना कीमती वोट दें. हमें राम खिलावन जी की मौत का बदला लेना है.

जब तक सूरज चांद रहेगा....राम खिलावन तेरा नाम रहेगा......राम खिलावन अमर रहें...देस के नेता किसन सुरुप.... किसन सुरुप तुम संघर्ष करो... हम तुम्हारे साथ हैं...किसन सुरुप ज़िंदाबाद.










Saturday, November 19, 2011

व्यंग्य: खुला पत्र वीरप्पन के नाम



( यह पत्र  तब लिखा था जब वीरू भैया ने सबकी खाट खड़ी कर रखी थी )







आदरणीय वीरु भैया

सादर प्रणाम

जब से आपके चर्चे हर अखबार और हर न्यूज चैनल पर आने लगे हैं, हमें सच मानिये, बहुत ‘खुशी’ हो गयी है, हमारा दिल गार्डन—गार्डन ... नहीं ..जंगल ..जंगल हो गया है और चंदन की तरह महक रहा है. हमारे वीरु भैया ने आखिर ‘सम्भव’को ‘असम्भव’ कर दिखाया है. ‘ कर्नाटक’ वाले नाटक कर रहे हैं आपको पकड़ने का. मगर आप उनके हत्थे नहीं चढ़ रहे हैं बिल्कुल राबिन हूड की तरह. आपकी लीला नगरी कुंज वन है. कन्हैया की लीला नगरी भी कुंज वन ही थी. ना कन्हैया की लीला जनसाधारण की समझ में घुसी ना आपकी घुस पा रही है. बडे‌ लोगों की बातें, बडे लोग ही जानें. आज तक कृष्ण कथा सुना सुना कर लोगों को समझाने का प्रयास जारी है. वैसे ही आने वाली पीढि‌यां आपका गुण बखान करेंगी. बस एक ही अंतर है कन्हैया ने कुंज वनों में बंसी बजाई थी आप बांस ( चंदन ) काट रहे हैं और कर्नाटक की खाट खडी- किये हैं.

इधर तमिलनाडु में भी आपको पकडने के प्रयासों का जोर शोर से प्रचार किया जा रहा है. आप तनिक भी विचलित ना होना. ये आप तक हरगिज़ नहीं पहुंच पायेंगे. आपकी मूंछ का एक बाल भी बांका ना होगा. ऐसी मूंछें मुझे तो याद नहीं पड़ता. भारत क्या विश्व इतिहास में किसी दूसरे महापुरुष की रही हों. आप तो मूंछों के बल पर ही गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में आ जायेंगे. जितना पुलिस, अमला और गोला बारूद इन्होने आपको पकड़ने में वेस्ट किया है उतने से तो कर्नाटक के गांव-गांव, वन-वन में बिजली पहुंचाई जा सकती थी.

मुझे लगता है कि आपने बिल्ली-चूहे की रोटी वाली कहानी जो बचपन में हम सब सुनते हैं और मर्म जाने बिना भूल जाते हैं को अच्छी तरह आत्मसात कर लिया है. तभी तो तमिलनाडु और कर्नाटक की आपस की लडाई में आप खूब रोटियां तोड़ रहे हैं. कई बार मुझे लगता है कि आजकल के भूमंडलीकरण के टाइम पर आपको अपना एक वीरप्पन ब्रांड पेटेंट करा लेना चाहिये जैसे वीरप्पन ब्रांड दूरबीन, वीरप्पन ब्रांड मूंछें, वीरू राइफल, वीरु केसेट, वीरु घड़ी, वीरू टेप रिकार्डर, वीरू विस्की,मुझे पता नहीं आप शौक करते हैं या नहीं मगर इस से क्या ? हमारे स्टार लोग कितने ऐसे तेल, साबुन की माडलिंग करते फिरते हैं.


अब वक़्त आ गया है कि आप खुलकर सामने आ जायें. पहले तो एक खादी का धोती-कुरता बनवा लें. धोती-कुरता ना सही तो कुरता पाजामा तो कम्पल्सरी है. ये नंगे बदन माडलिंग तो चल सकती है, नेतागिरी नहीं चलेगी. वैसे भी अब ये गांधी का भारत तो रहा नहीं. इससे याद आया आप कोई मच्छर भगाने वाली क्रीम का एड भी कर सकते हैं. इन अभागों ने आपका कोई ‘फुल लेंथ’ फोटो नहीं लिया है. जिससे पता चलता कि आप किस कम्पनी के ब्रीफ, पतलून, मोजे, जूते पहनते हैं. आपका मनपसंद मोबाइल कौन सा है. किस ‘मेक’ की बाइक आप इस्तेमाल करते हैं. आप कौन सा मिनरल वाटर पीते हैं. आपकी पसंद कौन फूड है—इटैलियन, थाई, या चाइनीज और कौन सा रेस्टोरेंट आपका ‘फेवरिट’ है. आप झटपट अपना एक पोर्टफोलियो बनवा लें और एक अच्छा सा मैंनेजर-कम-सेक्रेटरी-कम- मार्किटिंग एक्ज्युकिटिव नियुक्त कर लें. जो आपकी नेट वर्थ बतायेगा. और आपको इंटरनेशनल बनवा देगा.


आपने फिर क्या सोचा है. राजनीति में कदम रखेंगे या फिल्मों में ? दोनो जगहों की ज़रूरतें एक सी हैं. दोनों में अंतर बहुत कम है. देखो जी जब तो फिल्मों में आना हो वीरू नाम बहुत माकूल है . एक्टर, डाइरेक्टर, प्रोडुसर, राइटर, विलैन.... आल इन वन ...वीरू पेश करते हैं वीरप्पन इंटरनेशनल का ‘ चंदन का तस्कर’, ‘जंगल में चंदन’ ‘चंदन मेरी बाहों में’ ‘ हाथी का हत्यारा कौन ?’ ‘ दो आंखें बारह दांत’ मुझे यक़ीन है कि ये फिल्में बाक्स ऑफिस पर बाकी सब फिल्मों को पीछे छोड- देंगी.

और जब पॉलिटिक्स में आना हो तो आप आकर तो देखो... छा जाओगे..छा. आप देखोगे यहाँ तो पेड़ काटने की ज़रूरत ही नहीं बल्कि पेड़ लगाने के प्रोजेक्टों में ही आप चांदी काटने लगोगे.

मैं तो कल्पना कर रहा हूँ माननीय वीरप्पन जी वन मंत्री . फिर देखना जो वनों की ओर कोई टेढी- आंख से भी देख सके. जो वनों की देखभाल ठीक से ना करे या उन्हें नुकसान पहुंचाये उसी आदमी के दांत निकलवा लिये जायें. आपको तो तज़ुर्बा भी है. फिर देखना वन-वन आपका ही नाम गूंजेगा. ऐसा वन मंत्री... ना भूतो... ना भविष्यति. आपके आगे कोई जंगल में छिपने की हिमाकत नहीं कर सकता. आप फौरन उसे ऐसे पकड‌ लेंगे जैसे बच्चे आपस में आइस-पाइस के खेल में एक-दूसरे को पकड़ लेते हैं. बढा मज़ा आयेगा. आपका कैबिनेट रेंक तो पक्का है. वन मंत्री ...अतिरिक्त भार पशु कल्याण. थोडे‌ लिखे को बहुत समझना और इस सेवक को डेपुटेशन पर लेना ना भूलना.



आपका शुभचिंतक



पुनश्च: रिवाज़ के मुताबिक मैं इस पत्र की एक प्रति प्रेस को भी लीक कर रहा हूँ. प्लीज माइंड मत करना.









Friday, November 11, 2011

Adieu Blackie





My parents in Delhi found a puppy wagging her tail at our doorstep early in the morning. My mother gave shelter and food to her and Blackie (so named, after her jet black shining beautiful coat) rest as they say is a history. Blackie was to become our family member..(That was about 15 years back). Few years back, she developed severe arthritis, my mother got worried, as worried as a mother could get, we all brothers were frantically looking for cure. I was surfing net and zeroed on to a vet in Delhi itself specializing in her ailment. My mother refused to go out of Delhi as her love for Blackie was turning in obsession, no sooner she would board a train she would start worrying about her. Her visits to us in Mumbai were always cut short, courtesy Blackie. Her condition deteriorated. Vet would discourage and break my mother’s heart “Aunty she is now hundred years old”…. During her serious illness days my mother, herself in her seventies, would lift Blackie in her lap and take her to nearby Park so that she could relieve herself. By and by, Blackie gave up food and would lie still for days together. Vet’s visits were proving futile. She would stare blankly at my mother and visitors. During her last days night long she will cry in pain. Fearing her plight during Delhi’s Diwali, senseless crackers / bomb spree, also responding to neighbors growing complaints and lastly on our persuasion, she reluctantly agreed to take Blackie to her final journey (euthanasia). Later, my mother sobbing inconsolably, gave heart rending account… when Vet made Blackie lie on the table for giving that lethal injection…Blackie turned her neck for the last time, and gave my mother such looks that my mother could not bear to look into her eyes and rushed out of clinic…crying all the way back home…..She did not eat for several days and this year (2011) no Diwali for her.

Thursday, October 27, 2011

व्यंग्य : सार्स मुक्त देश

ऐ जी... ओ जी...लो जी..सुनो जी ! हमारा देश सार्स मुक्त हो गया जी. अखबार में बड़ी बड़ी हेड लाईन्स छपी हैं. देश में सार्स का एक भी मरीज नहीं. पढ़ कर तबियत खुश हो गयी. दिल बल्लियों उछलने लगा. ये चीन, हॉंगकॉंग सिंगापुर वाले बडा अपने आप को समझते थे. हम फ्री पोर्ट हैं, हम अमीर हैं, प्रति व्यक्ति आय जबरदस्त है. नाइट लाइफ है. पर्यटन का केद्र है. देख लिया नतीजा. एक सार्स ने सबको चारों खाने चित्त कर दिया. मुझे तो ऐसा लग रहा है मैं नाचूं गाऊं पार्टी दूं. हमारा देश सार्स मुक्त हो गया. तुमने क्या समझा था हिंदुस्तान को. ठीक है हम गरीब हैं, हमारी हर राज्य-सरकार उधार ले कर घी पी रही है. हम कामचोर हैं.हम भ्रष्ट हैं. रिश्वत लेते हैं. मगर इस से क्या ? सार्स से तो मुक्त हैं.







हम में हज़ारों ऐब सही, तुम से तो बेहतर हैं. तुम्हारे देश में लोग सार्स से लदर-पदर मर रहे हैं. मेरे देश में कोई मरा ? जो भी मरा वो या तो भुखमरी से मरा या पेड़ से लटका कर मुहब्बत करने की सज़ा बतौर समाज के ठेकेदारों ने मारा या फिर आतंकवादियों की गोली का शिकार हुआ.






माना कि मेरे भारत महान में लोग  भूख से मरते हैं. भूख से भी कहाँ वे तो कुपोषण के चलते मरते हैं. अब बेलेंस डाइट लेते नहीं हैं अतः कुपोषण का शिकार हो जाते हैं और इन मीडिया वालों को तो बस मौका मिलना चाहिये. दरअसल ये सब मीडिया की चाल है. पिछ्ले दिनों माननीया मुख्यमंत्री जी ने कहा ही था “ ये अखबार वाले ना जाने क्या क्या मनगढ़ंत छपते रह्ते हैं. इतना भव्य सचिवालय है, राजधानी में हर चौराहे पर म्युजिक बजाते रंगीन फुव्वारे हैं. कारें, सड़्कें, बार-डिस्को हैं, पर इन्हें कुछ नहीं दिखता सिवाय भुखमरी के. कितना गलत और ‘बायस्ड’ आकलन करते हैं.






देश सार्स मुक्त हो गया है. मैं चाहता हूँ इसी खुशी में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया जाये. सार्स मुक्ति दिवस. जब देश में तरह तरह के दिवस मनते हैं तो एक ये भी सही. आप क्या सोचते हो. इस से हमारी उत्पादकता कम हो जायेगी. आप हमारी अन्य किसी भी क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगा सकते हैं मगर उत्पादकता पर नहीं. हमारा लेटेस्ट स्कोर ये लेख लिखे जाने तक एक सौ दो करोड़ सत्तर लाख पंद्रह हज़ार दो सौ सेनतालीस नॉट आउट है. मेरा दिल कर रहा है कि मैं अमिताभ की तरह सबको कहूं “ चलो हो जाओ बे शुरु “ और “..शाबा.. शाबा “ कह के नाचने लगूं.






सरकार को चाहिये कि ऐसे मैं मध्यविधि चुनाव घोषित कर दे. सार्स के चलते बहुमत से जीतेगी. मेरा दावा है. “ गरीबी हटाओ” ने एक चुनाव जिताया ही था. आपको याद होगा वह भी मध्यविधि चुनाव ही था. एक चुनाव सार्स मुक्ति के नाम से भी सही. हमने सारे तथाकथित विकसित देशों को ठेंगा दिखा दिया है. बच्चू रोते रहो रोना. हम तो सार्स मुक्त हो गये. दहेज प्रथा, जातिवाद, बे-रोज़गारी, बाल-मज़दूरी इन सब से तो बाद में भी निपट लेंगे. फर्स्ट थिंग फर्स्ट. सार्स को ऐसी पटखनी दी कि सार्स सीमा छोड़ के ये जा वो जा.






मंत्री जी का काफिला कितना मनमोहक लग रहा था. सब नक़ाबपोश वेताल की तरह लग रहे थे.जिस तरह जब वेताल गोली छोड़ता है तो आंखें देख नहीं पातीं (पुरानी जंगली कहावत) सार्स भी वेताल की गोली कि तरह पलक झपकते ही देश छोड गया. कुछ लोग जो हवाई अड्डों और अस्पताल में पडे थे सार्स मुक्त होने से बड़े मायूस हुए. इतने दिनों से टी.वी पर दिख रहे थे. वी. आई.पी. बने हुए थे. अब कोई कौडियों के मोल भी नहीं पूछ रहा है. यही बाज़ारवाद है. अब वे खबर नहीं. खबर ये है कि देश सार्स मुक्त हो गया.










मुझे इंतजार है उस दिन का जब अखबार की हेड लाईंस कहेंगी देश आतंकवाद से मुक्त हो गया, देश साम्प्र्दायिकतावाद से मुक्त हो गया. राम जन्म भूमि विवाद से मुक्त हो गया. भुखमरी-बेरोज़गारी से मुक्त हो गया. बाल मज़दूरी से मुक्त हो गया.






जब अखबार वाला इन हेड लाईंस का अखबार मेरे घर डाल के जायेगा वो सुबह कब आयेगी ?

Monday, October 24, 2011

कांटा लगा ....



कांटा लगा.. कांटा लगा... करके एक गाना बहुत देख-सुना जाता रहा है. देखा ज्यादा गया सुना कम. इस में एक भारतीय नाबालिग सी बाला बार बार कांटा लगा..कांटा लगा चिल्ला रही है. मटक रही है और सिसकारियां भर रही है. इस से दो बातें निकल के आती हैं. एक, मैंने कभी किसी कांटे लगे इंसान को ऐसे नाचते-गाते, मटकते और सिसकारियां भरते नहीं देखा है. या तो अगला रो रहा होता है या फिर डॉक्टर के पास ले जाया जा रहा होता है. दूसरे, लड़की गा रही है कांटा लगा. कांटे अक्सर पांव में लगते हैं. मजे की बात यह है कि पूरे गाने में सिवाय पांव के उस्ने अप्ने लगभग सभी अंग दिखा दिये हैं. हैं भई ! ये ससुरा कांटा लगा आखिर लगा कहाँ है ? और अगर पैर में नहीं लगा है तो जहाँ लगा है वहां ये पहुंचा कैसे ? शोध का मुद्दा है. या फिर कहें कि अगले री-मिक्स का मसाला है. ये री-मिक्स का ज़माना है. पिछ्ले दिनों पदमश्री नीरज की एक कैसट मार्किट में पूछी तो सेल्समैन ने पलट कर पूछा “ नया री-मिक्स है क्या ?” अब वो दिन दूर नहीं कि पुराने वे सभी जिन पर कभी जनाब नौशाद और साहिर को नाज़ रहा हो, उनके री-मिक्स मार्किट में उतरेंगे. गीतों की ऐसी भद्द पिटेगी कि नौशाद और साहिर क़ब्र में करवटें बदलेंगे. लता दीदी त्रस्त हैं कि उनके सीधे-सादे गाने की क्या गत बना दी है. “ओम जय जगदीस हरे” से लेकर “अल्ला तेरो नाम..ईश्वर तेरो नाम..” सभी गानों,भजनों कव्वालियों के रीमिक्स हमारा बॉलीवुड दे सकता है. कौन कहता है कि बॉलीवुड में मौलिक प्रतिभा और रचनात्मकता की कमी है. हां तो बात कांटे की हो रही थी. नायिका के पांव में आखिर कांटा लगता ही क्यों है. क्या बात है वो चप्पल नहीं पहनती या फिर चप्पल इतनी नाज़ुक है कि कांटा चप्पल चीर के पांव में आन घुसता है और उसे नाचने गाने पर विवश कर देता है. 








ये नायिका को क्या पडी है जो नंगे पांव ही दौडे‌ जाती है. अगलों ने भी ना जाने कितने गाने पांव पर ही लिख मारे हैं. “पांव छू लेने दो ..” से लेकर ‘सैय्यां पडू‌ पैय्यां...” तक गाडी आन पहुंची है. आगे आप समझदार हैं. कल्पना कर सकते हैं. यूं आगे आगे आपकी कल्पना के लिये अगलों ने कुछ छोड‌ना नहीं है. सब कुछ उघाड़ देना है.






सुश्री एश्वर्य राय के पांव में जब हेयर लाइन फ्रेक्चर हुआ था तो लाखों चाहने वाले अपने अपने हेयर नोंच रहे थे और एश्वर्य राय को अपनी अपनी राय देना चाहते थे. चूंकि मिस राय उनकी ताल से ताल नहीं मिला रही थीं चुनांचे वे एश्वर्य के लिये ईश्वर से दुआ कर रहे थे कि वो जल्दी से जल्दी ठीक हो कर डोला रे डोला पर नाचने लगें. जल्द ही जेम्स बॉन्ड भी बच्चू अपनी सारी जासूसी भूल कर ऐश्वर्य के इर्द गिर्द पेडो के आगे पीछे अगली फिल्म में दौड़्ता नज़र आयेगा. 







पांव का हमारे देश में महत्वपूर्ण स्थान है. नायिका के नख-शिख वर्णन से लेकर पांव गलत पडे‌ नहीं कि भारी हुए नहीं. सर पर पांव रख कर भागना. अब आप ही बताइये जब पांव सर पर ही रख लेंगे तो भागेंगे काय से ? जाके पांव ना फटी बिवाई ... पूत के पांव आदि ना जाने क्या क्या.क्या.पांव पूजे जाते हैं. पांव बिछुए, मेहंदी महावर से रचाये-सजाये जाते हैं. पांव के महत्व को स्वीकारते हुए ही बाटा ने ये जिम्मेवारी अपने सर पर ली थी कि पूरे विश्व को चप्पल- जूते हम ही पहनायेंगे. बाटा को टाटा कह्ने की पूरी तैयारी के साथ अब बहुत सी कम्पनियां भी इस मैदान में आ कूदी हैं. करोडो‌ अरबो‌ का व्यवसाय है ये. पर कांटा है कि फिर भी लग जाता है और नायिका को नाचने पर विवश कर देता है.ये कांटा है...पैसा है...या फिर मश्हूर होने की अनबुझ प्यास है.पह्ले कहते थे कि ये कुछ नहीं जनरेशन गैप है या पिछ्ली पीढी का रोना है. मुझे तो लगता है कि हम लोग एलबम टू एलबम बूढे होते जा रहे हैं और बच्चे एलबम टू एलबम एडल्ट। 

Saturday, October 22, 2011

मेरा भारत महान ओ याह

सुनने में आया था कि एक पेरेंट टीचर्स एसोसियेशन की बैठक में पेरेंट टीचर्स की तू तू मैं मैं इस कदर बढ गयी कि टीचर्स ने स्कूल की छत पर चढ पेरेंट्स पर पत्थर बरसाने शुरु कर दिये. मॉ बाप जैसे तैसे जान बचाकर भागे. कई पेरेंटो के सिर फट गये. टीचर्स ने कहा पह्ले हमने तुम्हारी जेबे फाडी, अब खोपडी फाडी. सरदार मैंने आपका नमक खाया है. ले अब गोली खा. मैं कहुंगा टीचर्स ने बहुत अच्छा किया. ये पेरेंट हैं ही इस लायक. बच्चो को अंग्रेजी स्कूल में भी पढाना चाहते हैं मगर इंटरव्यू और फीस देने में आनाकानी.प्यार करते हो शेरी से और दूध लाते हो डेरी से.







जिस तरह झोंपडी वालो का एक ख्वाब होता है कि एक अदद पक्का मकान बन जाये. उसी तरह ‘हम लोग’ जो सर्कारी स्कूल में टाट-पट्टी पर टेंटो के नीचे बैठ कर पढे और पले बडे हैं हमारे मन में एक कसक रह जाती है कि अपना पेट काट कर भी बच्चो को अंग्रेजी स्कूल में पढाना है. व्यवस्था बदलने से कही‌ आसान काम है व्यवस्था से बद्ला लिया जाये. कोई गुड से मरता हो तो उसे जहर क्यो दिया जाये. आप भी कुछ लेते क्यो नही.






आज की तारीख में अंग्रेजी स्कूलो के लिये ऐसे भगदड मची हुई है जैसे पिछ्ले दिनो शहर के एक अस्पताल में देखने को मिली थी. हुआ यूं कि शाम को जब मरीजो से मिलने का समय था और मरीज लोग आं..आं..हाय मरा...हाय...कराह रहे थे और उन से मिलने वाले उन्हें मौसमी, सेब और सांत्वना दे रहे थे तभी अचानक किसी ने खबर उड़आ दी कि अस्पताल में बम है. बस फिर क्या था आनन-फानन में सब दौड़ पड़े. मरीज पलस्तर लगाये ही भाग छूटे. कई ग्लुकोज की शीशी समेत दौड़े जा रहे थे. कई मरीजों के तो मिलने वाले भी पीछे छूट गये और मरीज लोग ये जा वो जा.घर जा कर ही दम लिया. जान सलामत रहे अस्पतालों की क्या कमी है. जान है तो जहान है.बस इसी तरह हम लोग अंग्रेजी स्कूलों पर टूट पड़े हैं.अंग्रेजों से दो सौ साल की गुलामी और अत्याचारों का बदला ले रहे हैं. तुम अंग्रेज अंग्रेजी और गोरी चमड़ी के बल पर हमारे माई बाप बने रहे. अब हम ब्राउन माई बाप अपनी पीडियों को अंग्रेजी पढाते है ताकि दे केन टाक इंग्लिश..वाक इंग्लिश..एंड लाफ इंग्लिश.






अभी पीछे मैंने किसी किताब में पढा था कि सिकन्दर अपनी सेना ले कर भारत से क्यों चला गया. कह्ते हैं कि यहां की महंगाई देख कर उस के सिपाहियों के होश उड़ गये. वे भागे भागे सिकंदर के पास गये कि हम इन्हें लूटने आये थे ये तो हमें ही लूटे ले रहे हैं और कुछ दिन रहे तो यहाँ के दुकानदार हमें कंगाल ही कर देंगे. सिकंदर भी समझ गया कि इस से पह्ले कि सैनिक बगावत कर दें यहाँ से भाग जाने में ही समझदारी है. है.इस तरह समय रह्ते अप्ने सैनिकों की जान-माल कओ बचा ले जाने के कारण ही उस्का नाम सिकंदर महान पड़ गया. बाद में इतिहासकारों ने इस में पोरस के डायलॉग जोड़ के लीपापोती कर दी. सच तो ये है कि सिकंदर को योद्धाओं ने नहीं बल्कि दुकानदारों ने हरा दिया.






आप को तो पता ही है कि आजकल लोग नॉन रेजिडेंट इंडियन बनने की चाह में भाग भाग कर दूसरे देशों में सेटल हो रहे हैं. क्यों कि उनका कह्ना है कि ये स्कूल वाले ब्राउन साब हमें लूटें इस से तो अच्छा है कि गोरों के हाथों लुटें. इस में भी एक स्टेटस सिम्बल होता है. जो आधुनिकता से करते प्यार वो अंग्रेजी से कैसे करें इंकार. गोरे रंग का ज़माना कभि होगा ना पुराना. वैसे भी हम लोग इंडियन तो कभी रहे ही नहीं. हम हिंदु हैं, मुसलमान हैं, राजस्थानी हैं, बंगाली हैं, ब्राह्म्ण हैं, क्षत्रिय हैं, थोडे‌ और पढ लिख गये तो साऊथ इंडियन – नॉर्थ इंडियन हो गये. जब कुछ ना बचा और हाथ में पैसा आ गया तो नॉन रेजीडेंट इंडियन हो गये. अब सामान्य इंडियंस को कौन पूछ्ता है. टके में सौ मिलते हैं. किसी भी गली, चौराहे, झौपड़ पट्टी और एम्प्लोय्मेंट एक्स्चेंज में उपलब्ध हैं.






हम लोग हवा महल और बिनाका गीत माला सुन कर बडे‌ हुए हैं आज की पीढी मोबायल फोन और इंटर नेट के माध्यम से डिस्को और पब में पल-बढ रही हैं. इनके चलते मार्किट में इतने ड्रेस डिजायनर हैं किंतु कपडे‌ हैं कि छोटे से छोटे होते जा रहे हैं. डिजायनर लोग ड्रेस डिजाइन नहीं करते बल्कि नई डिजाइन से शरीर को दिखाने का इंतजाम कर रहे हैं. जितने ज्यादा ड्रेस डिजाइनर उतने छोटे कपड़े. मुझे डर है कि कहीं ये कच्छा‌‌ बनियान गिरोह वाले पेंट कमीज को आउट ऑफ फैशन ही ना करा दे‌. फिर सोचिये हम सब लोग कच्छे बनियान में ऑफिस में बैठे कैसे लगेंगे इस्मेन एक फायदा है जब लोगो‌ की जेबे‌ ही नही‌ होंगी तो बस में रेल में जेबे‌ कटेंगी भी नही‌ . गांधी जी का सपना साकार हो जायेगा कि जब तक प्रत्येक भारतीय को तन ढॉपने को पर्याप्त वस्त्र ना हो वे लंगोटी ही पह्नेंगे. उन्हे‌ अच्छा लगेगा कि सारा देश अब जल्द ही डिजाइनर्स लंगोटी पह्नेगा. आप सोचेंगे इस्मेन क्या अंतर है. अंतर यह है कि पह्ले आदमी ईमांनदार हुआ करते थे अब कमीजे‌ ईमानदार होती हैं. सोचिये बे‌ईमान बनियान, गुंडा पजामा कैसा लगेगा.










एक ही युनीफॉर्म पूरे देश के स्कूलो‌ में लागू करेंगे तो क्या विश्व बैंक प्रतिबंध लगा देगा. हम जैसे ट्रांसफर वाले लोगों की बहुत बचत होगी नहीं तो पूरा वेतन युनिफॉर्म, टाई जूते मोजे बैल्ट आदि खरीदने में ही निकल जाता है उसी तरह फीस सिलेबस और किताबों में एकरूपता लाई जा सकती है. कस्बे के एक स्कूल में बच्चों से अचानक कम्प्यूटर फीस ली जाने लगी. जानकारी मिली कि एक साफ सुथरे कमरे में सफेद चादर से ढके हुए कम्प्यूटर जी विराजमान हैं. उस कमरे में बच्चों को जाने की सख्त मनाही थी. वे कम्यूटर को कांच की खिड़्की से ही स्ट्डी कर सकते थे. उन्हें समझा दिया गया था कि अगली सदी कम्प्यूटर की सदी होगी तब वे छू सकेंगे. हां तब तक वे मोबाईल और एम टी.वी. से काम चलायें यह भी भव सागर को पार कराने में सहायक हैं


Thursday, September 29, 2011

मेरा भारत महान




अमेरिकन एयरलाईन्स में प्रति विमान 128 कर्मचारी हैं और मेरे भारत महान की महान एयरलाईन्स में प्रति विमान कुल 588 कर्मचारी. एक से बढ़ कर एक महान भारतीय कर्मचारी. मंत्री महोदय ने यह खुलासा किया है. इस खुलासे को अखबारों ने चटखारे ले लेकर मुख पृष्ठ पर छापा. इसमें ताज़्ज़ुब कैसा. अमरीका में तो बंदे हैं ही नहीं और मेरा भारत महान इस मामले में हीरो नम्बर वन है. भला अमरीका क्या खा के हम सवा सौ करोड़ का मुक़ाबला करेगा. अमरीका में सब काम ऑटोमेटिक है. हमारे देश में ऑटोमेटिक चीजें चलाने, बंद करने, और उनकी रख-रखाव, निगरानी को भी ढेर सारे लोग रखने पड़ते हैं. 

सरकारी मकान में बल्ब बदलने को भी तीन आदमी जाते हैं. एक रौब-दाब वाला सुपरवाइजर. एक बल्ब का झोला पकड़े और तीसरा सीढ़ी उठाये उठाये चलता है. तो ये ठाठ हैं. अब क्या अमरीका वाले ऐसे ठाठ कर सकते हैं. वो तो ये एफोर्ड ही नहीं कर सकते. कहते हैं वहाँ के डिपार्टमेंटल स्टोर्स में भी सैल्फ सर्विस है. हमारे यहाँ सरकारी सुपर बज़ार में भी सैल्फ सर्विस रखी थी. मगर हिंदुस्तानियों ने उसका ग़लत मतलब निकाल लिया. उसके चलते इतने सैल्फ सर्विस की कि तमाम सुपर बाज़ार को अपने घर ही ले गये. सुपर बाज़ार वाले नारा ही ऐसा देते थे सुपर बाज़ार—अपना बाज़ार सुपर बाज़ार नुकसान में जाते जाते तबाह हो गये. अब सरकार उनका निजीकरण करेगी. सुपर बाज़ार वाले जो न जाने कब से उसका निजीकरण करे बैठे थे इसका विरोध कर रहे हैं. विरोध तो पर्यटन विकास निगम वाले भी कर रहे हैं कि निजीकरण करना ठीक नहीं.फिर उनके विकासका क्या होगा. उनके एक होटल में सरकारी अमला है पाँच सौ का और गैस्ट हैं पाँच. यानि कि पर गैस्ट सौ कर्मचारी अतिथि की सेवा में रहते हैं. हो भी क्योंन. भारतमें अतिथि सेवा की एक दीर्घ परम्परा जो है. अतिथि देवो भव. ये बात अमरीकावाले सौ जन्म में भी नहीं कर सकते. वो तो बस पीठ पर अपना सामान ढोये ढोये भिखारियों की तरह दुनियां घूमते-फिरते हैं.

136 तरह के तेल शैम्पू और 256 तरह के साबुन बापरने के बाद जो मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड निखर कर आ रही हैं उनसे जो मार्किट चलनी थी सो चल ली. अब किसी दिन लेटेस्ट एड आयेगा कि मैं पेप्सी से नहाती हूं या फिर कोकाकोला से सिर धोती हूं. इससे न केवल बाल रेशमी, घने मुलायम रहते हैं बल्कि ताज़गी भी पहुँचती है. ठन्डा यानि कोकाकोला.

बहुराष्ट्रीय कम्पन्यां जल्द ही हवा और पानी पर अपना क़ब्ज़ा कर लेंगी. पानी पर तो एक तरह से कर ही लिया है. छोटी बोतल, मीडियम बोतल, बड़ा जार अब छोटी छोटी दो घूंट पानी वाले सेशै भी मार्किट में उतरेंगे ताकि झोंपड़-पट्टी वाले भी आठ आने में ये मिनरल वाटर पी सकें. साफ पानी पर उनका भी तो कुछ हक़ है. जिस तरह पानी के बड़े बड़े जार की सप्लाई दफ्तरों में होती है उसी तरह ऑक्सीजन के सिलेन्डर घर-घर जाया करेंगे. कुकिंग गैस के  सिलेंडर के साथ हरे रंग के बायो-फ्रेंडली क्यूट से ब्रीदिंग सिलेंडर. घर भर के लिये महीने भर का ऑक्सीजन का कोटा. पड़ोसनें एक दूसरे से कहेंगी “ बहन ! एक सिलेंडर स्पेयर में पड़ा है क्या?” बच्चों के लिये छोटे छोटे स्वीट से मिनी सिलेंडर चलेंगे जिसे वो वॉकमैन की तरह लटकाये लटकाये फिरेंगे.

इन दिनों स्वदेशी नारे का क्या हुआ ? अब सुनाई नहीं पड़ता. दरअसल स्वदेशी की आड़ में इतनी विदेशी कम्पनियां आगईं हैं कि बस कुछ मत पूछो. कौनसा क्षेत्र है जिसमें वो नहीं घुसी हुईं. पैन-पेंसिल, कच्छा-बनियान, जूते-चप्पल, साबुन-तेल. जल्द ही अब वो कुल्हड़,पत्तल, छप्पर, भूसा, गन्ने का रस, गुड़ सब का उत्पादन करने लगेंगी. लोग शान से बताया करेंगे कि फलाँ की शादी में स्वीडन के कुल्हड़ में चाय मिली थी. हमनें अपनी बिटिया की शादी में जापान से पत्तलें मँगवाई थीं. हमारी गाय, भूसा सिर्फ मेड इन जर्मनी ही खाती है. ऐसा दूध देती है कि एक लोटा पीते ही हम लोग फर्राटेदार जर्मन बोलने लगते हैं. दुनियां इसी का नाम है. पहले देश का मंडलीकरण हो रहा था. फिर कमंडलीकरण और अब भूमंडलीकरण हो रहा है. आप पानी गंगा का नहीं वोल्गा का पियें. वो भी 120/- फी गिलास. गुड़ आप यू.पी. का नहीं यू.के. का खायें और इतरायें “हाऊ स्वीट” 

अब तो भिखारी भी ट्रेफिक सिग्नल पर एक-दूसरे से मोबाइल पर बात करते हैं.
” ये जो नीले रंग की गाड़ी आयेली है उसे जाने दे भिडू उससे माँगने का नहीं, अपुन लियेला है ” पहले फिल्मों में एक-आध रील भी विदेश की होती थी तो जोर-शोर से प्रचार किया जाता था  एराउंड दि वर्ल्ड का विज्ञापन मुझे याद है “ राजकपूर ने 8 डॉलर में दुनियां देखी आप सवा रुपये में देखिये”. अब विज्ञापन और सीरियलों की शूटिंग भी विदेश में होती है. अब सीरियलों की भली चलाई. सभी सीरियल्स के नाम कहानी, पात्र, घर सब एक से. और वही एक से लिपे-पुते चेहरे, रोना-धोना. आने वाले कुछ सीरियल्स के नाम ये भी हो सकते हैं.

ननद भी कभी भाभी बनेगी

भांजी भी किसी की मामी है

मैंने प्यार किया मिस यूनिवर्स से

हम आपकी सोसायटी में रहते हैं

देश में गई होगी बिजली सप्लाई

हाय दैया, हाय राम

राम से याद पड़ते हैं गाँधी, गाँधीवाद और राम जन्म भूमि विवाद. पर वो किस्सा फिर कभी.