Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Thursday, October 27, 2011

व्यंग्य : सार्स मुक्त देश

ऐ जी... ओ जी...लो जी..सुनो जी ! हमारा देश सार्स मुक्त हो गया जी. अखबार में बड़ी बड़ी हेड लाईन्स छपी हैं. देश में सार्स का एक भी मरीज नहीं. पढ़ कर तबियत खुश हो गयी. दिल बल्लियों उछलने लगा. ये चीन, हॉंगकॉंग सिंगापुर वाले बडा अपने आप को समझते थे. हम फ्री पोर्ट हैं, हम अमीर हैं, प्रति व्यक्ति आय जबरदस्त है. नाइट लाइफ है. पर्यटन का केद्र है. देख लिया नतीजा. एक सार्स ने सबको चारों खाने चित्त कर दिया. मुझे तो ऐसा लग रहा है मैं नाचूं गाऊं पार्टी दूं. हमारा देश सार्स मुक्त हो गया. तुमने क्या समझा था हिंदुस्तान को. ठीक है हम गरीब हैं, हमारी हर राज्य-सरकार उधार ले कर घी पी रही है. हम कामचोर हैं.हम भ्रष्ट हैं. रिश्वत लेते हैं. मगर इस से क्या ? सार्स से तो मुक्त हैं.







हम में हज़ारों ऐब सही, तुम से तो बेहतर हैं. तुम्हारे देश में लोग सार्स से लदर-पदर मर रहे हैं. मेरे देश में कोई मरा ? जो भी मरा वो या तो भुखमरी से मरा या पेड़ से लटका कर मुहब्बत करने की सज़ा बतौर समाज के ठेकेदारों ने मारा या फिर आतंकवादियों की गोली का शिकार हुआ.






माना कि मेरे भारत महान में लोग  भूख से मरते हैं. भूख से भी कहाँ वे तो कुपोषण के चलते मरते हैं. अब बेलेंस डाइट लेते नहीं हैं अतः कुपोषण का शिकार हो जाते हैं और इन मीडिया वालों को तो बस मौका मिलना चाहिये. दरअसल ये सब मीडिया की चाल है. पिछ्ले दिनों माननीया मुख्यमंत्री जी ने कहा ही था “ ये अखबार वाले ना जाने क्या क्या मनगढ़ंत छपते रह्ते हैं. इतना भव्य सचिवालय है, राजधानी में हर चौराहे पर म्युजिक बजाते रंगीन फुव्वारे हैं. कारें, सड़्कें, बार-डिस्को हैं, पर इन्हें कुछ नहीं दिखता सिवाय भुखमरी के. कितना गलत और ‘बायस्ड’ आकलन करते हैं.






देश सार्स मुक्त हो गया है. मैं चाहता हूँ इसी खुशी में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया जाये. सार्स मुक्ति दिवस. जब देश में तरह तरह के दिवस मनते हैं तो एक ये भी सही. आप क्या सोचते हो. इस से हमारी उत्पादकता कम हो जायेगी. आप हमारी अन्य किसी भी क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगा सकते हैं मगर उत्पादकता पर नहीं. हमारा लेटेस्ट स्कोर ये लेख लिखे जाने तक एक सौ दो करोड़ सत्तर लाख पंद्रह हज़ार दो सौ सेनतालीस नॉट आउट है. मेरा दिल कर रहा है कि मैं अमिताभ की तरह सबको कहूं “ चलो हो जाओ बे शुरु “ और “..शाबा.. शाबा “ कह के नाचने लगूं.






सरकार को चाहिये कि ऐसे मैं मध्यविधि चुनाव घोषित कर दे. सार्स के चलते बहुमत से जीतेगी. मेरा दावा है. “ गरीबी हटाओ” ने एक चुनाव जिताया ही था. आपको याद होगा वह भी मध्यविधि चुनाव ही था. एक चुनाव सार्स मुक्ति के नाम से भी सही. हमने सारे तथाकथित विकसित देशों को ठेंगा दिखा दिया है. बच्चू रोते रहो रोना. हम तो सार्स मुक्त हो गये. दहेज प्रथा, जातिवाद, बे-रोज़गारी, बाल-मज़दूरी इन सब से तो बाद में भी निपट लेंगे. फर्स्ट थिंग फर्स्ट. सार्स को ऐसी पटखनी दी कि सार्स सीमा छोड़ के ये जा वो जा.






मंत्री जी का काफिला कितना मनमोहक लग रहा था. सब नक़ाबपोश वेताल की तरह लग रहे थे.जिस तरह जब वेताल गोली छोड़ता है तो आंखें देख नहीं पातीं (पुरानी जंगली कहावत) सार्स भी वेताल की गोली कि तरह पलक झपकते ही देश छोड गया. कुछ लोग जो हवाई अड्डों और अस्पताल में पडे थे सार्स मुक्त होने से बड़े मायूस हुए. इतने दिनों से टी.वी पर दिख रहे थे. वी. आई.पी. बने हुए थे. अब कोई कौडियों के मोल भी नहीं पूछ रहा है. यही बाज़ारवाद है. अब वे खबर नहीं. खबर ये है कि देश सार्स मुक्त हो गया.










मुझे इंतजार है उस दिन का जब अखबार की हेड लाईंस कहेंगी देश आतंकवाद से मुक्त हो गया, देश साम्प्र्दायिकतावाद से मुक्त हो गया. राम जन्म भूमि विवाद से मुक्त हो गया. भुखमरी-बेरोज़गारी से मुक्त हो गया. बाल मज़दूरी से मुक्त हो गया.






जब अखबार वाला इन हेड लाईंस का अखबार मेरे घर डाल के जायेगा वो सुबह कब आयेगी ?

Monday, October 24, 2011

कांटा लगा ....



कांटा लगा.. कांटा लगा... करके एक गाना बहुत देख-सुना जाता रहा है. देखा ज्यादा गया सुना कम. इस में एक भारतीय नाबालिग सी बाला बार बार कांटा लगा..कांटा लगा चिल्ला रही है. मटक रही है और सिसकारियां भर रही है. इस से दो बातें निकल के आती हैं. एक, मैंने कभी किसी कांटे लगे इंसान को ऐसे नाचते-गाते, मटकते और सिसकारियां भरते नहीं देखा है. या तो अगला रो रहा होता है या फिर डॉक्टर के पास ले जाया जा रहा होता है. दूसरे, लड़की गा रही है कांटा लगा. कांटे अक्सर पांव में लगते हैं. मजे की बात यह है कि पूरे गाने में सिवाय पांव के उस्ने अप्ने लगभग सभी अंग दिखा दिये हैं. हैं भई ! ये ससुरा कांटा लगा आखिर लगा कहाँ है ? और अगर पैर में नहीं लगा है तो जहाँ लगा है वहां ये पहुंचा कैसे ? शोध का मुद्दा है. या फिर कहें कि अगले री-मिक्स का मसाला है. ये री-मिक्स का ज़माना है. पिछ्ले दिनों पदमश्री नीरज की एक कैसट मार्किट में पूछी तो सेल्समैन ने पलट कर पूछा “ नया री-मिक्स है क्या ?” अब वो दिन दूर नहीं कि पुराने वे सभी जिन पर कभी जनाब नौशाद और साहिर को नाज़ रहा हो, उनके री-मिक्स मार्किट में उतरेंगे. गीतों की ऐसी भद्द पिटेगी कि नौशाद और साहिर क़ब्र में करवटें बदलेंगे. लता दीदी त्रस्त हैं कि उनके सीधे-सादे गाने की क्या गत बना दी है. “ओम जय जगदीस हरे” से लेकर “अल्ला तेरो नाम..ईश्वर तेरो नाम..” सभी गानों,भजनों कव्वालियों के रीमिक्स हमारा बॉलीवुड दे सकता है. कौन कहता है कि बॉलीवुड में मौलिक प्रतिभा और रचनात्मकता की कमी है. हां तो बात कांटे की हो रही थी. नायिका के पांव में आखिर कांटा लगता ही क्यों है. क्या बात है वो चप्पल नहीं पहनती या फिर चप्पल इतनी नाज़ुक है कि कांटा चप्पल चीर के पांव में आन घुसता है और उसे नाचने गाने पर विवश कर देता है. 








ये नायिका को क्या पडी है जो नंगे पांव ही दौडे‌ जाती है. अगलों ने भी ना जाने कितने गाने पांव पर ही लिख मारे हैं. “पांव छू लेने दो ..” से लेकर ‘सैय्यां पडू‌ पैय्यां...” तक गाडी आन पहुंची है. आगे आप समझदार हैं. कल्पना कर सकते हैं. यूं आगे आगे आपकी कल्पना के लिये अगलों ने कुछ छोड‌ना नहीं है. सब कुछ उघाड़ देना है.






सुश्री एश्वर्य राय के पांव में जब हेयर लाइन फ्रेक्चर हुआ था तो लाखों चाहने वाले अपने अपने हेयर नोंच रहे थे और एश्वर्य राय को अपनी अपनी राय देना चाहते थे. चूंकि मिस राय उनकी ताल से ताल नहीं मिला रही थीं चुनांचे वे एश्वर्य के लिये ईश्वर से दुआ कर रहे थे कि वो जल्दी से जल्दी ठीक हो कर डोला रे डोला पर नाचने लगें. जल्द ही जेम्स बॉन्ड भी बच्चू अपनी सारी जासूसी भूल कर ऐश्वर्य के इर्द गिर्द पेडो के आगे पीछे अगली फिल्म में दौड़्ता नज़र आयेगा. 







पांव का हमारे देश में महत्वपूर्ण स्थान है. नायिका के नख-शिख वर्णन से लेकर पांव गलत पडे‌ नहीं कि भारी हुए नहीं. सर पर पांव रख कर भागना. अब आप ही बताइये जब पांव सर पर ही रख लेंगे तो भागेंगे काय से ? जाके पांव ना फटी बिवाई ... पूत के पांव आदि ना जाने क्या क्या.क्या.पांव पूजे जाते हैं. पांव बिछुए, मेहंदी महावर से रचाये-सजाये जाते हैं. पांव के महत्व को स्वीकारते हुए ही बाटा ने ये जिम्मेवारी अपने सर पर ली थी कि पूरे विश्व को चप्पल- जूते हम ही पहनायेंगे. बाटा को टाटा कह्ने की पूरी तैयारी के साथ अब बहुत सी कम्पनियां भी इस मैदान में आ कूदी हैं. करोडो‌ अरबो‌ का व्यवसाय है ये. पर कांटा है कि फिर भी लग जाता है और नायिका को नाचने पर विवश कर देता है.ये कांटा है...पैसा है...या फिर मश्हूर होने की अनबुझ प्यास है.पह्ले कहते थे कि ये कुछ नहीं जनरेशन गैप है या पिछ्ली पीढी का रोना है. मुझे तो लगता है कि हम लोग एलबम टू एलबम बूढे होते जा रहे हैं और बच्चे एलबम टू एलबम एडल्ट। 

Saturday, October 22, 2011

मेरा भारत महान ओ याह

सुनने में आया था कि एक पेरेंट टीचर्स एसोसियेशन की बैठक में पेरेंट टीचर्स की तू तू मैं मैं इस कदर बढ गयी कि टीचर्स ने स्कूल की छत पर चढ पेरेंट्स पर पत्थर बरसाने शुरु कर दिये. मॉ बाप जैसे तैसे जान बचाकर भागे. कई पेरेंटो के सिर फट गये. टीचर्स ने कहा पह्ले हमने तुम्हारी जेबे फाडी, अब खोपडी फाडी. सरदार मैंने आपका नमक खाया है. ले अब गोली खा. मैं कहुंगा टीचर्स ने बहुत अच्छा किया. ये पेरेंट हैं ही इस लायक. बच्चो को अंग्रेजी स्कूल में भी पढाना चाहते हैं मगर इंटरव्यू और फीस देने में आनाकानी.प्यार करते हो शेरी से और दूध लाते हो डेरी से.







जिस तरह झोंपडी वालो का एक ख्वाब होता है कि एक अदद पक्का मकान बन जाये. उसी तरह ‘हम लोग’ जो सर्कारी स्कूल में टाट-पट्टी पर टेंटो के नीचे बैठ कर पढे और पले बडे हैं हमारे मन में एक कसक रह जाती है कि अपना पेट काट कर भी बच्चो को अंग्रेजी स्कूल में पढाना है. व्यवस्था बदलने से कही‌ आसान काम है व्यवस्था से बद्ला लिया जाये. कोई गुड से मरता हो तो उसे जहर क्यो दिया जाये. आप भी कुछ लेते क्यो नही.






आज की तारीख में अंग्रेजी स्कूलो के लिये ऐसे भगदड मची हुई है जैसे पिछ्ले दिनो शहर के एक अस्पताल में देखने को मिली थी. हुआ यूं कि शाम को जब मरीजो से मिलने का समय था और मरीज लोग आं..आं..हाय मरा...हाय...कराह रहे थे और उन से मिलने वाले उन्हें मौसमी, सेब और सांत्वना दे रहे थे तभी अचानक किसी ने खबर उड़आ दी कि अस्पताल में बम है. बस फिर क्या था आनन-फानन में सब दौड़ पड़े. मरीज पलस्तर लगाये ही भाग छूटे. कई ग्लुकोज की शीशी समेत दौड़े जा रहे थे. कई मरीजों के तो मिलने वाले भी पीछे छूट गये और मरीज लोग ये जा वो जा.घर जा कर ही दम लिया. जान सलामत रहे अस्पतालों की क्या कमी है. जान है तो जहान है.बस इसी तरह हम लोग अंग्रेजी स्कूलों पर टूट पड़े हैं.अंग्रेजों से दो सौ साल की गुलामी और अत्याचारों का बदला ले रहे हैं. तुम अंग्रेज अंग्रेजी और गोरी चमड़ी के बल पर हमारे माई बाप बने रहे. अब हम ब्राउन माई बाप अपनी पीडियों को अंग्रेजी पढाते है ताकि दे केन टाक इंग्लिश..वाक इंग्लिश..एंड लाफ इंग्लिश.






अभी पीछे मैंने किसी किताब में पढा था कि सिकन्दर अपनी सेना ले कर भारत से क्यों चला गया. कह्ते हैं कि यहां की महंगाई देख कर उस के सिपाहियों के होश उड़ गये. वे भागे भागे सिकंदर के पास गये कि हम इन्हें लूटने आये थे ये तो हमें ही लूटे ले रहे हैं और कुछ दिन रहे तो यहाँ के दुकानदार हमें कंगाल ही कर देंगे. सिकंदर भी समझ गया कि इस से पह्ले कि सैनिक बगावत कर दें यहाँ से भाग जाने में ही समझदारी है. है.इस तरह समय रह्ते अप्ने सैनिकों की जान-माल कओ बचा ले जाने के कारण ही उस्का नाम सिकंदर महान पड़ गया. बाद में इतिहासकारों ने इस में पोरस के डायलॉग जोड़ के लीपापोती कर दी. सच तो ये है कि सिकंदर को योद्धाओं ने नहीं बल्कि दुकानदारों ने हरा दिया.






आप को तो पता ही है कि आजकल लोग नॉन रेजिडेंट इंडियन बनने की चाह में भाग भाग कर दूसरे देशों में सेटल हो रहे हैं. क्यों कि उनका कह्ना है कि ये स्कूल वाले ब्राउन साब हमें लूटें इस से तो अच्छा है कि गोरों के हाथों लुटें. इस में भी एक स्टेटस सिम्बल होता है. जो आधुनिकता से करते प्यार वो अंग्रेजी से कैसे करें इंकार. गोरे रंग का ज़माना कभि होगा ना पुराना. वैसे भी हम लोग इंडियन तो कभी रहे ही नहीं. हम हिंदु हैं, मुसलमान हैं, राजस्थानी हैं, बंगाली हैं, ब्राह्म्ण हैं, क्षत्रिय हैं, थोडे‌ और पढ लिख गये तो साऊथ इंडियन – नॉर्थ इंडियन हो गये. जब कुछ ना बचा और हाथ में पैसा आ गया तो नॉन रेजीडेंट इंडियन हो गये. अब सामान्य इंडियंस को कौन पूछ्ता है. टके में सौ मिलते हैं. किसी भी गली, चौराहे, झौपड़ पट्टी और एम्प्लोय्मेंट एक्स्चेंज में उपलब्ध हैं.






हम लोग हवा महल और बिनाका गीत माला सुन कर बडे‌ हुए हैं आज की पीढी मोबायल फोन और इंटर नेट के माध्यम से डिस्को और पब में पल-बढ रही हैं. इनके चलते मार्किट में इतने ड्रेस डिजायनर हैं किंतु कपडे‌ हैं कि छोटे से छोटे होते जा रहे हैं. डिजायनर लोग ड्रेस डिजाइन नहीं करते बल्कि नई डिजाइन से शरीर को दिखाने का इंतजाम कर रहे हैं. जितने ज्यादा ड्रेस डिजाइनर उतने छोटे कपड़े. मुझे डर है कि कहीं ये कच्छा‌‌ बनियान गिरोह वाले पेंट कमीज को आउट ऑफ फैशन ही ना करा दे‌. फिर सोचिये हम सब लोग कच्छे बनियान में ऑफिस में बैठे कैसे लगेंगे इस्मेन एक फायदा है जब लोगो‌ की जेबे‌ ही नही‌ होंगी तो बस में रेल में जेबे‌ कटेंगी भी नही‌ . गांधी जी का सपना साकार हो जायेगा कि जब तक प्रत्येक भारतीय को तन ढॉपने को पर्याप्त वस्त्र ना हो वे लंगोटी ही पह्नेंगे. उन्हे‌ अच्छा लगेगा कि सारा देश अब जल्द ही डिजाइनर्स लंगोटी पह्नेगा. आप सोचेंगे इस्मेन क्या अंतर है. अंतर यह है कि पह्ले आदमी ईमांनदार हुआ करते थे अब कमीजे‌ ईमानदार होती हैं. सोचिये बे‌ईमान बनियान, गुंडा पजामा कैसा लगेगा.










एक ही युनीफॉर्म पूरे देश के स्कूलो‌ में लागू करेंगे तो क्या विश्व बैंक प्रतिबंध लगा देगा. हम जैसे ट्रांसफर वाले लोगों की बहुत बचत होगी नहीं तो पूरा वेतन युनिफॉर्म, टाई जूते मोजे बैल्ट आदि खरीदने में ही निकल जाता है उसी तरह फीस सिलेबस और किताबों में एकरूपता लाई जा सकती है. कस्बे के एक स्कूल में बच्चों से अचानक कम्प्यूटर फीस ली जाने लगी. जानकारी मिली कि एक साफ सुथरे कमरे में सफेद चादर से ढके हुए कम्प्यूटर जी विराजमान हैं. उस कमरे में बच्चों को जाने की सख्त मनाही थी. वे कम्यूटर को कांच की खिड़्की से ही स्ट्डी कर सकते थे. उन्हें समझा दिया गया था कि अगली सदी कम्प्यूटर की सदी होगी तब वे छू सकेंगे. हां तब तक वे मोबाईल और एम टी.वी. से काम चलायें यह भी भव सागर को पार कराने में सहायक हैं


Thursday, September 29, 2011

मेरा भारत महान




अमेरिकन एयरलाईन्स में प्रति विमान 128 कर्मचारी हैं और मेरे भारत महान की महान एयरलाईन्स में प्रति विमान कुल 588 कर्मचारी. एक से बढ़ कर एक महान भारतीय कर्मचारी. मंत्री महोदय ने यह खुलासा किया है. इस खुलासे को अखबारों ने चटखारे ले लेकर मुख पृष्ठ पर छापा. इसमें ताज़्ज़ुब कैसा. अमरीका में तो बंदे हैं ही नहीं और मेरा भारत महान इस मामले में हीरो नम्बर वन है. भला अमरीका क्या खा के हम सवा सौ करोड़ का मुक़ाबला करेगा. अमरीका में सब काम ऑटोमेटिक है. हमारे देश में ऑटोमेटिक चीजें चलाने, बंद करने, और उनकी रख-रखाव, निगरानी को भी ढेर सारे लोग रखने पड़ते हैं. 

सरकारी मकान में बल्ब बदलने को भी तीन आदमी जाते हैं. एक रौब-दाब वाला सुपरवाइजर. एक बल्ब का झोला पकड़े और तीसरा सीढ़ी उठाये उठाये चलता है. तो ये ठाठ हैं. अब क्या अमरीका वाले ऐसे ठाठ कर सकते हैं. वो तो ये एफोर्ड ही नहीं कर सकते. कहते हैं वहाँ के डिपार्टमेंटल स्टोर्स में भी सैल्फ सर्विस है. हमारे यहाँ सरकारी सुपर बज़ार में भी सैल्फ सर्विस रखी थी. मगर हिंदुस्तानियों ने उसका ग़लत मतलब निकाल लिया. उसके चलते इतने सैल्फ सर्विस की कि तमाम सुपर बाज़ार को अपने घर ही ले गये. सुपर बाज़ार वाले नारा ही ऐसा देते थे सुपर बाज़ार—अपना बाज़ार सुपर बाज़ार नुकसान में जाते जाते तबाह हो गये. अब सरकार उनका निजीकरण करेगी. सुपर बाज़ार वाले जो न जाने कब से उसका निजीकरण करे बैठे थे इसका विरोध कर रहे हैं. विरोध तो पर्यटन विकास निगम वाले भी कर रहे हैं कि निजीकरण करना ठीक नहीं.फिर उनके विकासका क्या होगा. उनके एक होटल में सरकारी अमला है पाँच सौ का और गैस्ट हैं पाँच. यानि कि पर गैस्ट सौ कर्मचारी अतिथि की सेवा में रहते हैं. हो भी क्योंन. भारतमें अतिथि सेवा की एक दीर्घ परम्परा जो है. अतिथि देवो भव. ये बात अमरीकावाले सौ जन्म में भी नहीं कर सकते. वो तो बस पीठ पर अपना सामान ढोये ढोये भिखारियों की तरह दुनियां घूमते-फिरते हैं.

136 तरह के तेल शैम्पू और 256 तरह के साबुन बापरने के बाद जो मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड निखर कर आ रही हैं उनसे जो मार्किट चलनी थी सो चल ली. अब किसी दिन लेटेस्ट एड आयेगा कि मैं पेप्सी से नहाती हूं या फिर कोकाकोला से सिर धोती हूं. इससे न केवल बाल रेशमी, घने मुलायम रहते हैं बल्कि ताज़गी भी पहुँचती है. ठन्डा यानि कोकाकोला.

बहुराष्ट्रीय कम्पन्यां जल्द ही हवा और पानी पर अपना क़ब्ज़ा कर लेंगी. पानी पर तो एक तरह से कर ही लिया है. छोटी बोतल, मीडियम बोतल, बड़ा जार अब छोटी छोटी दो घूंट पानी वाले सेशै भी मार्किट में उतरेंगे ताकि झोंपड़-पट्टी वाले भी आठ आने में ये मिनरल वाटर पी सकें. साफ पानी पर उनका भी तो कुछ हक़ है. जिस तरह पानी के बड़े बड़े जार की सप्लाई दफ्तरों में होती है उसी तरह ऑक्सीजन के सिलेन्डर घर-घर जाया करेंगे. कुकिंग गैस के  सिलेंडर के साथ हरे रंग के बायो-फ्रेंडली क्यूट से ब्रीदिंग सिलेंडर. घर भर के लिये महीने भर का ऑक्सीजन का कोटा. पड़ोसनें एक दूसरे से कहेंगी “ बहन ! एक सिलेंडर स्पेयर में पड़ा है क्या?” बच्चों के लिये छोटे छोटे स्वीट से मिनी सिलेंडर चलेंगे जिसे वो वॉकमैन की तरह लटकाये लटकाये फिरेंगे.

इन दिनों स्वदेशी नारे का क्या हुआ ? अब सुनाई नहीं पड़ता. दरअसल स्वदेशी की आड़ में इतनी विदेशी कम्पनियां आगईं हैं कि बस कुछ मत पूछो. कौनसा क्षेत्र है जिसमें वो नहीं घुसी हुईं. पैन-पेंसिल, कच्छा-बनियान, जूते-चप्पल, साबुन-तेल. जल्द ही अब वो कुल्हड़,पत्तल, छप्पर, भूसा, गन्ने का रस, गुड़ सब का उत्पादन करने लगेंगी. लोग शान से बताया करेंगे कि फलाँ की शादी में स्वीडन के कुल्हड़ में चाय मिली थी. हमनें अपनी बिटिया की शादी में जापान से पत्तलें मँगवाई थीं. हमारी गाय, भूसा सिर्फ मेड इन जर्मनी ही खाती है. ऐसा दूध देती है कि एक लोटा पीते ही हम लोग फर्राटेदार जर्मन बोलने लगते हैं. दुनियां इसी का नाम है. पहले देश का मंडलीकरण हो रहा था. फिर कमंडलीकरण और अब भूमंडलीकरण हो रहा है. आप पानी गंगा का नहीं वोल्गा का पियें. वो भी 120/- फी गिलास. गुड़ आप यू.पी. का नहीं यू.के. का खायें और इतरायें “हाऊ स्वीट” 

अब तो भिखारी भी ट्रेफिक सिग्नल पर एक-दूसरे से मोबाइल पर बात करते हैं.
” ये जो नीले रंग की गाड़ी आयेली है उसे जाने दे भिडू उससे माँगने का नहीं, अपुन लियेला है ” पहले फिल्मों में एक-आध रील भी विदेश की होती थी तो जोर-शोर से प्रचार किया जाता था  एराउंड दि वर्ल्ड का विज्ञापन मुझे याद है “ राजकपूर ने 8 डॉलर में दुनियां देखी आप सवा रुपये में देखिये”. अब विज्ञापन और सीरियलों की शूटिंग भी विदेश में होती है. अब सीरियलों की भली चलाई. सभी सीरियल्स के नाम कहानी, पात्र, घर सब एक से. और वही एक से लिपे-पुते चेहरे, रोना-धोना. आने वाले कुछ सीरियल्स के नाम ये भी हो सकते हैं.

ननद भी कभी भाभी बनेगी

भांजी भी किसी की मामी है

मैंने प्यार किया मिस यूनिवर्स से

हम आपकी सोसायटी में रहते हैं

देश में गई होगी बिजली सप्लाई

हाय दैया, हाय राम

राम से याद पड़ते हैं गाँधी, गाँधीवाद और राम जन्म भूमि विवाद. पर वो किस्सा फिर कभी.

Saturday, July 30, 2011

व्यंग्य : हिना या खार



पाक और हिन्दुस्तान के बीच एक बात में तो समानता है दोनों देशों में नेता लोग बहुत शौकीन और महंगी-महंगी चीजें ‘वापरने’ वाले हैं. आखिर देश की छवि बोले तो ‘इमेज’ का सवाल है. हम विदेशों से उधार माँगने भी चार्टर्ड जेट में शिष्ट मंडल अर्थात 180 लोग जाते हैं. जब पाक नेता हिंदुस्तान उतरी तो पता नहीं क्यूँ ये इंप्रेशन फैला दिया गया कि अख़बार वालों, टी.वी. वालों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. अरे भैया इतनी गंभीरता से तो ये पत्रकार भारत के नेताओं को भी नहीं लेते. वो बात दीगर है कि वे गंभीरता से लेने लायक हैं भी नहीं. आपने उनके फिजूल के सवाल नहीं सुने मसलन बाढ़ में डूबनेवाले से या रेल दुर्घटना में मृत प्राय से “आपको कैसा लग रहा है ? आप क्या महसूस कर रहे हैं ?”




देखिये सभी पत्रकारों ने इतनी बारीकी से और गंभीरता से हिना खार को लिया है कि उन्होने साउथ सी पर्ल की सुचचे मोतियों की माला पहनी हुई थी ( किसी अख़बार या टी.वी चेनल पर यह नहीं सुना कि मोती कितने थे 31..51... या 108) रोबर्ट कारवेली का चश्मा इतने लाख का पहने थी, बर्किन पर्स इतने लाख का था अब देखी है आपने इतनी खोजी पत्रकारिता, इतनी पैनी,इतनी जबर्दस्त पत्रकारिता. बस एक बात रह गयी कि उनका बीयूटिशन कौन है ? साथ आया / आई है ? या नहीं और बीयूटिशन के दल में कितने सदस्य हैं और उनके चश्मे, पर्स कितने लाख/कितने हज़ार के हैं. अब जहाँ इतना सूक्ष्म’ विश्लेषण चल रेला हो वहाँ ‘स्थूल’ बातें जैसे आतंकवाद,बम फोड़ना, समझौता एक्सप्रेस, बस सेवा, हथियार, केंप, लश्कर की बातें थोड़ी हट के हैं और इस मेनू में फिट नहीं बैठती, बिल्कुल वैसे ही जैसे मुगलाई खाने में उड़द की दाल या लौकी की सब्जी.




मुद्दा नंबर 1. भारतीय क़ैदी, मछुआरे जो पाक जेलों में सड़ रहे हैं उसका सवाल किसी ने उठाया या नहीं या फिर सब ज़ुल्फ़ के पेचो-खम में और लट में ही उलझ के रह गए. हाय!




‘हम हुए, तुम हुए, मीर हुए

सब उनकी जुल्फों के असीर(क़ैदी) हुए’




मुद्दा नंबर 2. हथियार ?


अजी छोड़िये आप यह लेटेस्ट हथियार देखिये. ये देखिये ये पर्स 18 लाख का, ये देखिये ये चश्मा 16 लाख का, चाहो तो आँखों पर लगाओ, चाहे माथे पर, चाहो तो हाथों में अदा से घुमाओ.




मुद्दा नंबर 3. समझौता एक्सप्रेस/बम फोडू दस्ते/लश्कर ?


ये जेट युग है आप अभी तक सड़क-रेल की बातें करते हैं हाउ ओल्ड फैशन. निकलिए अपनी इस दकियानूसी सोच से बाहर आइये. आप उस लश्कर को छोड़िए हमारा लश्कर देखिये.


मुद्दा नंबर 4 26/11


26/11 ? ये क्या है, ये कैसी फिगर है ? किसकी फिगर है ये. फोरगेट इट. आप जो आपके सामने है वो फिगर देखिये. फिगर के मामले में भी आप अभी बहुत पीछे हैं आई एम थर्टी फोर यू आर एटी फोर हा..हा..


मुद्दा नंबर 5 आप किस कंपनी की लिपस्टिक, लिप ग्लॉस और मेकपात का अन्य सामान खरीदती हैं. इंडिया में उसकी फ्रेंचाइजी है या नहीं. ये बर्किन और रॉबर्टो वालों ने अपने सेल्ज़ काउंटर इंडिया में खोले या नहीं.. नहीं खोले तो कब खोलेंगे मुए ?


टूर बहुत सक्सेस गया.. कम अगेन 


Friday, July 15, 2011

व्यंग्य : खून दो ... बेटा लो


एक जमाना था जब आज़ाद हिन्द फौज के महानायक, वीर सेनानी नेताजी सुभाष चन्द बोस ने हुंकार भरी थी तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा. अभी आधी सदी भी न गुजरी थी कि हमारे नेता कह रहे हैं मैं तो खून का एक कतरा भी नहीं दूंगा. क्या कर लोगे. मामला अदालत तक जा पहुँचा. अदालत ने फटकार अलग लगायी. जनता का इतना खून पीया है एक आध बूँद दे दोगे तो क्या हो जायेगा. सो भैया जी ! डी.एन.ए. तो होगा ही. एक बात और है डी.एन.ए तो जब होगा, तब होगा उसकी रिपोर्ट जब आएगी, तब आएगी पर पूरे देश को तो रिपोर्ट पहले से ही पता है. ये आपकी ही कारस्तानी है. ये बरखुरदार आपके ही नूरे नज़र, लख्ते जिगर हैं. एक बात बताइये जब ये बात उठी थी तब ही आपने क्यों नहीं भलमनसाहत से इसे मान लिया. आपके पास विकल्प थे. या तो आप मान लेते या पार्टी को कुछ ले दे के मौन करा देते.

देखिये आपने बेचारे को गोद लेने से भी इंकार कर दिया. अब आपको भी कहाँ गुमान था कि आपके जीते जी साइंस इतनी तरक्की कर लेगी कि ये डी.एन.ए. टेस्ट ढूँढ निकालेंगे. वैसे तो आपने सी.डी. केस में कह ही दिया है कि ये साज़िश है और ये मैं हूँ ही नहीं. अब आप कुछ भी भी कहते रहिए पूरा देश आपकी रिपोर्ट को पहले ही पॉज़िटिव मान चुका है. देश को ताज्जुब तब भी नहीं होगा अगर ये डी.एन.ए. आपका नहीं निकलेगा, देश आपको बरी नहीं कर देगा. बल्कि इसे आपकी जुगाड़ बताएगा.

दरअसल आप जितनी कोर्ट-कचहरी करते रहेंगे और खून देने में आना-कानी  करते रहेंगे उतना ही देश का यकीन पुख्ता होता चला जायेगा कि हो न हो आप ही उसके नाजायज़ पिता हैं (अमिताभ बच्चन की फिल्म त्रिशूल याद करें) मुहब्बत की है तो निभानी चाहिए थी जी. आप मुहब्बत को चुनावी वादे की तरह भूल नहीं सकते. वो दिन याद करो.. वो तारों की छैया...वो मौसम सुहाना.... तो सर जी अपने पुरुषार्थ को जगाइए और उठ खड़े होईये, अपना लीजिये, आखिर आपका ही बच्चा है. दुनियाँ को दिखा दीजिये कि आप नारायण ही नहीं, नर भी हैं.


Wednesday, July 13, 2011

व्यंग्य मुझे पानी औरों को जाम

वो दिन गए जब लोग पानी पिलाने को पुण्य का कार्य समझते थे. जगह-जगह लोग-बाग अपनी सामर्थ्य अनुसार कुएं खुदवाते थे, प्याऊ लगवाते थे. तब पानी बेचा नहीं जाता था. प्यासों को पानी पिलाना धर्म का कार्य माना जाता था. आजकल के पेज थ्री वाले सोशल वर्कर नहीं बल्कि लोग वाकई धर्म सेवा, समाज सेवा करते थे, वो भी फोटो छपवाना तो दूर अपना नाम सामने आए बिना. बहुत हुआ तो अपने दिवंगत माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम की प्याऊ होती थी.
समय बदला और तेजी से बदला. यहाँ तक कि पानी के मटके-सुराही की जगह मशीनें आ गयीं. दिल्ली में दो पैसे का ग्लास पानी बिकता था. आज वह बढ़ते –बढ़ते एक रुपये प्रति ग्लास से अधिक हो गया है. बोतल बंद पानी तो 12 रुपये से 120 रुपये प्रति बोतल धड़ल्ले से बिक रहा है. पानी का धंधा ज़ोर-शोर से फलने-फूलने लगा है. सब अपने पानी को सीधा हिमालय से निकला ही बता रहे हैं. पानी के बिकने के साथ ही देशी-विदेशी कंपनियां अपना अपना पानी उतार के बाज़ार में उतार आए हैं. पहले घड़ा-सुराही दो ही आइटम थे, आज सैकड़ों चीज़ें इससे जुड़ गयीं हैं. प्लांट, फ़िल्टर, कैन्डल, कार्बन, टैंकर, एक्टर, ट्रक, प्लास्टिक बोतल, जार, नकली पानी, नकली सील (ढक्कन), खतरनाक

केमीकल्स, हानिकारक प्लास्टिक, गैस्ट्रो, लेप्टो, कैंसर और न जाने क्या क्या. पानी का खाकर पेयजल का बिजनस बहुत ही फलता-फूलता बिजनस है. इसमें असीम संभावनाएं हैं. धर्म का धर्म, लाभ का लाभ, इसे कहते हैं शुभ-लाभ. लेकिन इन सबसे नेताजी कतई प्रभावित नहीं हुए बल्कि ‘पेयजल’ सुन कर वह शहर ही छोड़ कर मुंबई रवाना हो गए. पहले भी लोग घर छोड़ कर भागते थे तो मुंबई आकर ही दम लेते थे. आज भी वही परंपरा कायम है.कहाँ गए वो लोग जो गंगा मैया की शपथ लेते थे. वह सबसे बड़ी महान और पवित्रतम शपथ मानी जाती थी. आज हालत यह है कि नेताजी को पता चला कि उन्हें पेयजल मंत्रालय मिल रहा है तो उन्होने शपथ लेने से ही इंकार कर दिया और सबको प्यासा ही छोड़ गए

तो साहब ये फर्क है कल और आज में. कल तक पेयजल उपलब्ध कराना धर्म-कर्म था आज पेयजल मंत्रालय ‘फालतू’ मान नेताजी रूठ गए और पार्टी सेवा का निर्जला व्रत ले बैठे हैं. उन्हें याद ही नहीं जो रहीम ने कहा था :

रहिमन पानी राखिये...पानी बिन सब सून...

पार्टी ने नेताजी को ‘उबारा’नहीं बल्कि नेताजी का पानी उतारने में पार्टी ने जरा भी देर नहीं लगायी. और ताबड़तोड़ त्यागपत्र स्वीकार कर नेता जी का रहा-सहा पानी भी उतार दिया.नेताजी अरब सागर के किनारे मुंबई में अपने कोप भवन में आँसू बहाते रहे
वाटर... .वाटर एवरीवेयर...नौट ए ड्रॉप टू ड्रिंक
ऐसा सुनते हैं कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा लेकिन हमारे नेता तो अभी से पानी को ले के लड़ने लग पड़े हैं. प्रैक्टिस मेक्स ए मेन परफेक्ट. मेरी चिंता दूसरी है. अब पेयजल मंत्रालय का क्या होगा ? अब पेयजल का क्या होगा ? इस सब से ऊपर अब नेताजी का क्या होगा ?

“प्यासे आए, प्यासे तेरे दर से यार चले
तेre शहर में हमारी गुजर मुमकिन नहीं
जाने कब तक सितमगरतेरा ये बाज़ार चले.........”