Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Thursday, July 6, 2023

व्यंग्य : पैर धुला लो ! पैर !

  

बचपन में गली-मुहल्ले मे ऐसी आवाजें आम थीं:

 

चारपाई बुना लो! चारपाई !

कलई करा लो! कलई !

चूढ़ियां ले लो ! चूढ़ियां !

 

         अब हमने तरक्की कर ली है। हमारा विकास इतना हो गया है कि अब हम इज़्जत घर और अटैच्ड शौचालय से बहुत ऊंचे उठ गये है। अब हम विमान में सीट पर करते हैं। ज़मीन पर हों तो बंदों के ऊपर करते हैं और फिर उससे ऐफीडेविट भी ले लेते हैं। "मैं शपथ पूर्वक कहता हूं मैंने ही रिक्वैस्ट की थी। मुझे चर्म रोग है। एक वैद्य जी ने यही नुस्खा बताया था।" या फिर  ऐसा कुछ है ही नहीं। यह दृष्टिभ्रम/माॅर्फ/फोटोशाॅप है। और हमारे प्रिय युवा नेताजी को बदनाम करने की विरोधियों की साजिश है। वो तो ये हैं ही नहीं। पूरा सीधी जिला जानता है वो कितने सीधे हैं। शराब क्या वो सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाते।

 

     पर इधर मामा जी ने पैर धोने में कुछ जल्दी मचा दी। डर था कि कहीं तब तक विरोधी दल न अगले के पैर धुला दे। सत्ता में बने रहने के लिये हमेशा पैरों का ध्यान रखना होता है। न जाने कब उखड़ जायें।

 

      आजकल पैर धुलाने की एक फैशन चल निकली है। हांलाकि यह सनातन परंपरा है। माता-पिता, गुरूजन और परम स्नेहियों के पैर धोये जाते रहे हैं। सुदामा के पैर श्रीकृष्ण ने धोये थे। हम पैर धोते-धोते और पैर उखाड़ते-उखाड़ते आज इस विश्वगुरू के आला मुक़ाम पर पहुंचे हैं।

 

         दलित के यहां भोजन ऑउट ऑफ फैशन हो गया। टिफिन पार्टी में भी वो बात नहीं आई। चुनाव सिर पर है। कुछ नवीन करना है। अत: पैर धुलवाने वालों को नेता लोग ऐसे ढूंढ रहे हैं जैसे कंजक बिठाने वाले बच्चियों को ढूंढते फिरते हैं। पैर धुलाने की पूरी वीडियो बनानी होती है। उसे मीडिया में भेजना होता है। वायरल कराना होता है। पैर धोना-धुलाना ही काफी नहीं। कुर्सी के चार पांव होते हैं मगर उसका रास्ता न जाने कितने पांवों से होकर गुजरता है। आखिर उन पांवों के साथ एक जोड़ी हाथ भी होते हैं। अपुन का टारगेट उसी हाथ की उंगली है जिस पर अगले ने बूथ पर मेरे नाम की नीली स्याही लगवानी है। इसलिये कहीं कुर्सी से हाथ न धोना पड़ जाये अत: जहां एक जोड़ी पांव दिख जायें बैठ जायें धोने के लिये। दूसरे मोड़ पर विरोधी भी बाल्टी-लोटा लिये तैयार बैठे हैं।

 

      पैर धुला लो ! पैर !

Friday, June 23, 2023

व्यंग्य: नकल योद्धाओं का सम्मान


         अब समय आ  गया है कि नकल योद्धाओं को समाज में, व्यवस्था में उनको उनका ड्यू दिलाया जाये। नकल के उद्यम में लगे लोगों को इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाये। उनको पेंशन, प्रोविडेंट फंड मेडिकल जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाएँ। यह अब कोई कुटीर उद्योग या लघु उद्योग नहीं रह गया है बल्कि एक विशाल उद्योग होयला है जिसमें लाखों लोग रोज़गार में हैं और नकल उद्योग से अपनी आजीविका चला रेले हैं।


             यह पुराना समय नहीं है जब बस कुछ फर्रे या चिट से काम चल जाता था। अब पूरी की पूरी बुक रखने से भी काम नहीं चलेगा। अन्य फील्ड्स की तरह यह फील्ड भी एकदम हाईटैक हो गया है। एक बार मुझे एक क्रिमिनल लाॅ के वकील साब से मिलवाया गया जिनके बारे में मशहूर था कि वो पूरे केस का ठेका उठा लेते हैं। मुझे कनफ्यूज देख उन्होने बताया वो पुलिस थाने से ही काम करते हैं। एफ. आई. आर. बदलवाना उसमें दफा चेंज करना, दफा हटाना, केस में लूपहोल छोड़ना आदि। एकदम ग्रासरूट एप्रोच है। उसी तरह नकल का काम बहुत मेहनत का काम है।  पेपर लीक करना आसान नहीं होता। बहुत परसिवरेंस चाहिये। बिलकुल हिन्दी फिल्म के इश्क़ में पागल लड़की के अमीर बाप की तरह कहना होता है:

          "इस सूटकेस में इतने पैसे हैं ... ये ब्लैंक चैक़ है इस चैक़ पर जो चाहे रकम भर लो और प्रश्नपत्र वाला एक पेज़ मुझे दे दो  ग्यारह क्या ? इक्कीस मुल्क़ों की पुलिस भी तुम्हें ढूंढ नहीं पाएगी। पचास खोखे...ऑल ओ. के. ?"


       उनका काम एकदम कॉर्पोरेट स्टाइल का हो गया है। मार्केटिंग, लॉजिस्टिक, एकाउंट्स, टेक्निकल टीम, एच. आर. आदि।एच. आर. को सॉल्वर एंगेज करने पड़ते हैं उनका सी. टी. सी. तय करना होता है। एग्रीमेंट साइन कराना आदि आदि। उसी तरह मार्केटिंग टीम को उम्मीदवारों को झूठी-सच्ची उम्मीद दिला दिला कर बीमा एजेंट की तरह शीशे में उतारना पड़ता है। फीस तय करनी होती है। फीस का स्ट्रक्चर फ्लेक्सिबल रखा जाता है। किसी से कुछ, किसी से कुछ, एक की दी हुई फीस दूसरे से काॅन्फीडेंशियल रखी जाती है।  लाॅजिस्टिक वाले साॅल्वर को समय पर सेंटर पर पहुंचाने का काम करते हैं। उनके आराम का ध्यान रखते हैं। फाइव स्टार होटल में उन्हे रुकवाया जाता है। और उनके विज़िट को पूरी तरह सीक्रेट रखा जाता है। वैसे सिंगल विंडो पॉलिसी के अंतर्गत ये लोग मेडिकल आदि भी कराते हैं नहीं तो एक्स-रे वालों ने ही गड़बड़ बता कर आपको फेल कर देना है।


            अपने नवीनतम डायवर्सिफिकेशन प्लान में ये अब जनरल को एस. सी., एस. टी., ओ. बी. सी. सर्टिफिकेट भी उपलब्ध कराते हैं। ए टू ज़ेड सर्विस, कंप्लीट सैटिस्फैक्शन गारंटीड, सबका अलग- अलग रेट है। ई. डब्लू. एस. वालों के लिए आसान ई. एम. आई. का भी इंतज़ाम है। ई. एम. आई. रिकवरी की टेंशन नहीं, बस एक कम्प्लेन्ट और नौकरी गई, पोलिस का लोचा अलग। 


           मेरा सरकार से निवेदन है। निवेदन क्या आग्रह है। इस उद्योग में लगे लोगों की सुधि लें। उनकी सर्विस कंडीशन सुधारें। निष्पक्ष देखे ! वे कितने पुण्य का काम कर रहे हैं। आपके इंटरव्यू खत्म कर देने से इनके ऊपर कितना लोड आ गया है। अब सारा दारोमदार लिखित परीक्षा पर ही है। बेचारे हमेशा प्रेशर में रहते हैं। कभी इस परीक्षा का पेपर आउट कराओ, कभी उस परीक्षा का। 24 बाई 7 काम, काम, काम।  ये उच्च शिक्षित बेरोजगार साॅल्वर्स को बड़ी तादाद में नौकरी दे रहे हैं। जिन्हें आप नालायक बेरोज़गार कहते हैं उनको वो 'लायक' बना आपके दफ्तरों में बाबू, स्कूलों में टीचर, अस्पतालों को नर्स, डॉक्टर, इंजीनियर दे रहे हैं। दे रहे हैं कि नहीं ? 


            खाली-पीली योद्धा कहने भर से योद्धा नहीं हो जाते हैं आप खुद देखें कितनी मेहनत का काम है। साला ! ये सोशल-सर्विस कभी किसी युग में आसान नहीं रही। कृपया इस असंगठित क्षेत्र की और उपेक्षा न करें। 


            नकल योद्धा ज़िंदाबाद!

Wednesday, June 21, 2023

व्यंग्य: स्टेडियम प्राइवेट को

           



         


             

                कुछ बरस पहले यह खबर अखबार में छपी कि सरकारी स्टेडियम प्राइवेट पार्टीज़ को सौंपे जाएँगे ताकि उनका उचित रखरखाव हो सके, वे आय का साधन बन सक। इससे इसमें लगे लोगों को रोज़गार मिलेगा।   स्पोर्ट्स को बल मिलेगा। आप तो जानते ही हो निर्बल के बल राम। सरकार की  इसी नीति के चलते कुश्ती संघ ने अपना दफ्तर और अभ्यास कराने के मैट-शैट अपने बंगले में ही बिछवा लिए थे। सब कुश्तीवालियों का वहीं  सांस लेने के तरीके का चेक-अप बड़े हकीम जी खुद करते हैं। तभी न सभी वहीं शरण लेते

 

                 अब देखिये स्टेडियम प्राइवेट करने के कितने फायदे हैं। एक तो उसके रखरखाव के लिए सरकारी कर्मचारी नहीं रखने पड़ेंगे। सरकारी कर्मचारी को रखने में बड़े लोचे हैं। पढ़ाई लिखाई तय करो, उम्र तय करो, विज्ञापन निकालो, लिखित मौखिक परीक्षा लो। सिफ़ारिशें देखो। पेपर आउट न हो जाये ये देखो। वेतन दो, पेंशन दो, मेडिकल दो, हिसाब रखो, सरकारी आवास दो। एक झंझट है। खर्चा ही खर्चा। स्टेडियम न हुआ सरकारी दफ्तर हो गया।  इस पर तुर्रा ये कि जब जाओ या तो बंदा छुट्टी पर है या बीमार है। रखरखाव इतना बेकार होता है कि पूछो मत। स्कैम पर स्कैम।

 

                      प्राइवेट के दे दो छुट्टी पाओ। खर्चा नहीं उल्टे आमदनी ही आमदनी। उनका एक आदमी सरकारी के पाँच के बराबर दौड़ दौड़ के काम करेगा। ये जो एथलीट वहाँ दौड़ते हैं उन्ही में से किसी को ठेके पर रख लो शाम को ठेके की रौनक देखने लायक होगी। मुंबई में स्टेडियम के अंदर जो बार हैं, रैस्टौरेंट हैं, जो शादी-ब्याह के हॉल हैं उनसे आमदनी ही आम्दानी है। कितने लोगों को रोज़गार मिला हुआ है। लोग खूब जाते हैं और धीरे धीरे उनकी स्नोब वैल्यू इतनी हो चली है कि मैम्बरशिप भी नहीं मिलती। ये वाकई एक मॉडल है जो देश भर के स्टेडियमों को अपनाना चाहिए।

 

                 स्टेडियम खेलने के लिए ही तो हुआ करते हैं। सब अपना अपना खेल खेलते हैं। पता नहीं किस खेल में तुम्हारी प्रतिभा निखर के आए  और तुम अपने क्षेत्र अपनी क़ौम का नाम रोशन करो

 

           और खेल-फेल क्या होता है जी ! यही सब न ! 

Friday, June 16, 2023

व्यंग्य: गोली खट्टी-मीठी

 

       पहले गोली केवल डॉक्टर लोग देते थे। लाल, पीली, हरी गोलियां। सिर- दर्द, पेट-दर्द की गोली, ताकत की गोली। टॉफी-चॉकलेट कहना सीखने से पहले हम बच्चे उनको गोली ही बोलते थे और गोली ही खाते थे। खट्टी मीठी गोलियां। एक और गोली होती थी जो युद्ध में चलती थीं और ग़रीब सैनिक लोग अपनी देशभक्ति का सबूत देते हुए अपने-अपने देश के लिए सीने पर खाते थे।


                सबसे आखिरी गोली वो थी जो फिल्मों में दिखाई देती थी। बॉस मारता था अपने राइवल गेंग के आदमियों को तो कभी दुश्मन को। ज़्यादातर अपने ही गैंग मेम्बर को गोली मारता था जो बॉस से बेवफाई करता था। मज़े की बात है जिस मेम्बर को गोली मारनी होती थी उसे लास्ट तक, यानि गोली चलने तक, शक भी नहीं होता था कि गोली अब आई कि तब आई।


                  फिर परिदृश्य बदला और पटल पर आए नेता लोग, तरह-तरह के नेता, किसिम-किसिम के नेता, छोटे नेता, बड़े नेता, गाँव के नेता, कस्बे के नेता, गोया कि ग्राम पंचायत से लेकर दुनियाँ के कोने कोने में एड्स की तरह फैल गए ये नेता। बिलकुल माफिया के माफिक। माफिया जैसे हर क्षेत्र में हैं वाटर टेंकर माफिया, किडनी माफिया, ब्लड बेंक माफिया, पार्किंग माफिया, टेंडर माफिया, एक्जाम माफिया, नकल माफिया, पेपर आउट कराने वाला माफिया, विदेश भिजवाने वाला माफिया आदि आदि। इसी तरह कोई अपने आप को गाँव का नेता बताता तो कोई अपने आप को दुनियाँ का। नेताओं की एक हॉबी होती है गोली देने की। वो हर समय हर मीटिंग में हर चुनाव में आवाम को गोली देते हैं। बस गोली के रंग और तासीर बदलती रहती है। बदलती क्या रहती है वो यकीन दिलाते हैं ये गोली आपकी ग़रीबी हटा देगी, दूसरा आता है बताता है कि उसकी गोली इंडिया को शाइनिंग बना देगी.  मूरख ! जब इंडिया शाइनिंग होगा तो तुम, तुम्हारा गाँव, तुम्हारा शहर, तुम्हारी बिरादरी अपने आप ही शाइनिंग करने लगेगी।


                   कोई कहता जो हुआ सो हुआ बस ! अब तुम्हें ऐसे अंधेरे में, पेड़ पर नहीं रहने देंगे, न ये पेड़ की छाल पहनने देंगे आओ बेझिझक पेड़ से नीचे उतरो, ये रथ तुम्हें मंदिर होते हुए मतदान बूथ तक ले जाएगा जब तक लौटोगे अच्छे दिन आ चुके होंगे।

                       इस तरह चुनाव दर चुनाव गोली बदलती रहती है। आवाम

 है कि हर बार नई गोली का यकीन कर लेता है। पिछले 75 साल से तो कर ही रहा है।

Wednesday, June 14, 2023

व्यंग्य: उड़ेगा आम नागरिक

                                 यह बहुत प्रभावकारी टैगलाइन है, अब आप इसे नारा बोलो, आव्हान बोलो, चेतावनी बोलो मगर है तो है। आगे आपकी श्रद्धा। 'उड़ेगा आम आदमी' कितना रोमांचकारी और रोमानी ख्याल है। अब इसी की परिपूर्ति के लिए सरकार ने एक के बाद एक उड़ान अड्डे प्राइवेट को दे दिये हैं। अज्ञानी लोग इसी को बेच दिया ! बेच दिया ! कह कर शोर मचा रहे हैं। आप हाल-फ़िलहाल यदि एयरपोर्ट गए हों तो देखा होगा कि आपकी टैक्सी, आपकी कैब और आपकी अपनी कार के साथ पार्किंग के, इंतज़ार करने के कितने सारे इशू हो गए हैं और सबका लक्ष्य एक ही है कि आपकी जेब कैसे काटी जाये। अब इस जेब काटने को कोई भी भारी भरकम नाम दिया जा सकता है यथा डी-क्लटरिंग, डी-कंजेशन, रेगुलेशन, एजुकेशन-सेस, देश-प्रेम शुल्क, करोना रिलीफ़ फंड, वेक्सिन डव्लपमेंट निधि, कुश्ती केयर फंड आदि आदि।

 

                 इन बातों का क्या अर्थ है आपका मूल किराया या एलीमेंटरी किराया कितना भी कम है। बाकी जितने भी टैक्स हैं, फंड, सेस, शुल्क हैं। भई ! पैसे तो यात्री ने ही देने हैं। अब आप नाम कुछ भी कर दें। अभी तक हम सोचते थे मल्टीप्लेक्स की तरह पानी, चाय-कॉफी, पॉप कॉर्न, समोसा ही महंगे हैं। कहाँ पहले एयर इंडिया में कितनी टॉफी, चॉकलेट देते, खिलाते-पिलाते ले जाते थे। कब मंज़िल आ गई पता भी न चलता था।

 

खाते-पीते कट

जाते थे रस्ते

 

             अब ऐसा नहीं है। आप को समोसा 350/- का और हेम्बर्गर 700/- का खरीदने पर या न खरीदने पर मन मसोसते-मसोसते मंज़िल दूर मालूम देने लगती है।

 

               वक़्त आ गया है कि अब एयरलाइंस आदमी को उसके वजन के हिसाब से किराया वसूल करे। एक मिनिमम वजन 30 किलो रखा जाये और इसके बाद हर एक किलो पर डायनामिक फेयर के अंतर्गत इतने रुपये लिए जाएँ, इतने रुपये लिए जाएँ कि या तो आदमी अपना वजन कम करे या फिर टिकट पैसे देने में ही वह सूख जाये। 'स्वस्थ्य भारत' बनाने में एयरलाइंस के इस योगदान को भारत हमेशा याद रखेगा।

 

                      यह डायनामिक फेयर भी 'आपदा में अवसर' का बहुत सही उदाहरण है। अब देखिये ना ! इधर बालासोर की रेल दुर्घटना हुई उधर उस दिशा में जाने वाली सब एयरलाइंस ने अपने-अपने किराये को दस गुना बढ़ा दिया। वो जरूर आपदा की दुआ मनाते होंगे ताकि उनकी आय बढ़ सके। उनके बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स की मीटिंग में ये बातें डिस्कस होती होंगी "हाँ भाई अगर कुछ और आपदाएँ हो जाएँ तो आपका वेतन बढ़ा दिया जाएगा, अथवा स्टाफ को 20% बोनस दे दिया जाएगा अभी तो 8.33% से ही काम चलाओ और अगर कोई आपदा नहीं हुई तो अगले वित्त वर्ष छँटनी भी करनी पड़ सकती है।"

 

                       वैसे सोचने वाली बात ये है कि हवाई चप्पल पहनने वाला क्या एयरपोर्ट में घुस भी सकता है कारण कि अब नया मालिक उसको घुसने नहीं देगा। घुसने का शुल्क ही इतना है कि आम आदमी की हवाई चप्पल तक बिक जाएगी, और जो कहीं डायनामिक फेयर की चपेट में आ गया तो घर-बार गिरवी रखने की नौबत आ जायेगी।

 

                    इसके बाद भी यह पक्का नहीं है कि वह टाइम पर पहुँच पाएगा। हवाई उड़ान अब इतनी लेट हो जाती हैं जितनी कि कभी रेल होती थी। रेल तो आप भागते-भागते भी पकड़ सकते थे। हवाई यात्रा में ऐसा नहीं है। यहाँ आपको बहुत सारे प्रोटोकॉल के चलते 3-4 घंटे पहले पहुँचना पड़ता है। जबकि भारत में कहीं भी यात्रा दो ढाई घंटे की ही होती है। तो जब आप एययपोर्ट पर रुक रहे हैं तो कुछ तो खाएँगे- पीएंगे इसलिए वहाँ पूरा बाज़ार खोल दिया है अगलों ने आपके वास्ते । जहां मिठाई से लेकर बिरयानी और किताब से लेकर बीयर-शराब तक सब मिलता है, केक-पेस्ट्री, कहीं कहीं तो मैंने कार भी खड़ी देखी हैं।

 

                    हवाई चप्पल वालों को उड़ाने का वादा किया था सो उड़ा दिया। इतनी महंगाई, पेट्रोल के दाम, गैस के दाम, बेरोजगारी कोई विरला ही हवाई चप्पल वाला होगा जो परिदृश्य से उड़ ना गया होगा। उड़ाने का वादा किया था सो उड़ा दिया पटल से ही, फ़लक से ही। कल्पना में उड़ो, धरती से आकाश को निहारो और भले आदमी उड़ना क्या होता है? यही सब तो। उसकी छोड़ो अब अच्छे-अच्छे सूट-बूट वाले उड़ना तो दूर हवाई अड्डे में घुसने न पाएंगे।

 

               इस सब रेल-पेल में सोच रहा था रेल मंत्री के पास रेल है। अब जैसी भी है, हाउसिंग मिनिस्टर के पास हाउस हैं। हमारे एयरलाइंस के मंत्री के पास ? न एयरलाइंस हैं न एयरपोर्ट। सब हवा हवाई (चप्पल) है।

 

            तो भाईजान ! अब देर किस बात की है। मालिक एयरपोर्ट पलक पांवड़े बिछाए आपका इंतज़ार कर रहे हैं।

 

पधारो म्हारे एयरपोर्ट !

Monday, June 12, 2023

व्यंग्य: दलित खाने से टिफिन राजनीति तक

 


             पुरानी कहावत है जिन्हें अपना समझते हैं उनसे रोटी-बेटी का संबंध बनाया जाता है। कहने - सुनने में आता है अमुक गाँव से, अमुक बिरादरी से हमारा रोटी-बेटी का नाता है अथवा नहीं है। जिनसे नाता तोड़ा जाता था खासकर जिन लोगों को समाज से निकाल दिया जाता था, छेक दिया जाता था उनके बारे में कहते थे कि अमुक का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया है। बात घूम-फिर कर शादी-ब्याह, खाने-पीने पर ही आकर रुकती। अब शहरीकरण और होटल, रेस्टोरेन्ट कल्चर के आने से खाने-पीने की वर्जनाएं शिथिल हुई हैं। बाद बाकी कसर स्विगी, जमेटो के चलते समाप्त प्राय: हो गईं।

 

                    इन सबसे नेताओं में चिंता होना स्वाभाविक है। अब वो क्या अनोखा करें कि न्यूज बने और वो भी ऐसी कि जिससे यह प्रोजेक्ट हो सके कि दलित वर्ग के सबसे बड़े हितैषी वही हैं, कोई दूसरा नहीं। खासकर, विपक्षी तो हरगिज़ नहीं। आप इफ्तार पार्टी को भी कुछ-कुछ इसी वर्ग में रख सकते हैं। जहां ग़ैर-मुस्लिम लोग रोज़ा तो रखते नहीं हाँ मगर इफ्तार पार्टी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। अपनी नेटवर्किंग करते हैं। इफ्तार पार्टी को बाहुबली लोग अपनी शक्ति प्रदर्शन का एक माध्यम बना लेते हैं। फोटो खिंचाते हैं जो फ्रंट पेज़ नहीं तो पेज़ तीन के खूब काम आतीं हैं।

 

                 पिछले कुछ सालों से दलित के घर खाने का फैशन चल निकला मगर फैशन तो फैशन है। अदलता-बदलता रहता है। कभी तंग मोहरी, कभी बैल बॉटम, फिर तंग मोहरी आदि-आदि। देखा-देखी सबने वो ट्रेंड फैशन की तरह अपना लिया। जिस दल को देखो वही किसी न किसी दलित के घर डेरा डाल लेता। अलबता इसका पहले खूब प्रचार-प्रसार किया जाता कि इससे कैसे दलित सशक्तिकरण को एक नई दिशा मिलेगी असल में इससे नेता जी का अपना ही सशक्तिकरण हो रहा होता है, प्रेस-काॅन्फरेंस की जाती, फोटोग्राफर जमाये जाते। बैठने के एंगल सेट किए जाते। पकवानों की सूची बनती। फिर पत्तल मंगाए जाते। ताकि दलित, दलित सा तो लगे। ग़रीब और वंचित। जिस पर प्लेट, थाली-कटोरी के भी पैसे नहीं। दरअसल फोटो ही खींचना है कोई असल में खाना थोड़े ही खाना है। फिर उनके बर्तन में ? न बाबा न ! कोई इन्फेक्शन हो गया तो ? डर्टी पीपुल। अभी कितने इलाके कवर करने हैं। खाना शहर के सबसे टॉप होटल से मंगाया जाता। कई बार तो बिल के पैसे बेचारे दलित से ही वसूले जाते। अबे ! देख नहीं रहा तेरे घर खुद नारायण चल कर आए हैं। शबरी के बाद ऐसा कभी देखा सुना था तूने ? चार पैसे नहीं खर्च सकता। इस भोज के बाद तेरा गाँव में कितना नाम होगा। गाँव के सैकड़ों घरों मे से तेरा घर चुना गया है। तुझे तो उत्सव मनाना चाहिए। आज के इस भोज के बाद अब तू गाँव में राजा भोज हो गया है, गंगू तेली नहीं रहा।

 

                   ऐसा जब तक चुनाव की वेला रहती किसी न किसी गाँव में किसी न किसी दल द्वारा यह जारी रहता और प्रचार थमते ही सब थम जाता। मैं अपने बंगले, तू अपनी झोंपड़ी। अगले चुनाव में फिर मिलेंगे। एक के बाद एक ऐसे आयोजनों ने इस दलित-भोज की चमक फीकी कर दी। हरेक ऐरा-गैरा मुंह उठाए दलित के घर खाने पहुँच जाता इससे इसमें जो 'यूनिकनेस' थी वो खत्म हो गई। वो क्या कहते हैं 'क्लिशे' बनते बनते रूटीन हो गया। जब आपके जादू की पोल खुल जाये तो खेल जमाये रखने के लिये जरूरी हो जाता है कि मदारी ट्रिक बदल ले। कोई दूसरा खेल दिखाने लग पड़ता है। इस बीच दलित गुहार लगा रहे हैं "साब जी ! कभी खाने पर अपने घर भी तो बुलाईये"। अब उसे कौन समझाये पहले तो फैमिली तैयार नहीं होगी, हो भी गई तो वो 'एम्बियन्स' कहाँ से आ पाएगी और सबसे बड़ी बात अब चुनाव खत्म हो गये इसे घुसने किसे दिया चौखट पर ?

 

                  इसलिए अब लेटेस्ट है टिफिन राजनीति। याद है पहले एक चलती थी डिनर डिप्लोमेसी। टिफिन मीटिंग में बहुत सुभीता है। भैया सब अपने-अपने घर से टिफिन लेकर आओ, खुद खाओ, हमें खिलाओ, बैठो हमारे साथ, फोटो खिंचाओ और फूटो यहाँ से। दिखाई मत देना दूर-दूर तक। मैं सोच रहा था ! सबके टिफिन एक जैसे होते हैं ये टिफिन पार्टी दफ्तर ने परमानेंट खरीद लिए हैं या फिर इसका ठेका किसी पार्टी वर्कर के भाई या मैडम को मिल गया है जिन्हें टिफिन सर्विस का तजुरबा पहले से होगा ही।

 

                   अब मैं सोच रहा हूँ टिफिन सर्विस के बाद अगला ईवेंट क्या हो सकता है। भारत में बहुत व्यंजन हैं। मेरे कुछ सुझाव हैं:

 

पानी-पूरी पार्टी

चाट-चर्चा

समोसा सेमीनार

दही-भल्ला सम्मेलन

छोले-भटूरे संवाद

चूरमा-बाटी कॉन्फ्रेंस

पुलाव-वार्ता

                

                 आखिर यूं ही तो नहीं मेरे भारत महान में 'मल्टी पार्टी सिस्टम' बताया जाता थोड़ा वेट करिये पास्ता, नूडल, मेक्रोनी, मोमोज, सभी आएंगे ! सुना नहीं अब हम विश्वगुरु हो गयेले हैं।

Sunday, June 11, 2023

व्यंग्य : सेफ़्टी-फंड, फुट मसाजर, क्रॉकरी और विंटर जैकिट

 

सुनने में आया है कि ऑडिटर्स ने एक रपट दी है जिसके अनुसार रेलवे को जो फंड सेफ़्टी के नाम से दिया था उससे रेलवे ने फुट मसाजर, क्रॉकरी और विंटर जैकिट खरीद ली हैं। इस बात को इस तरह से पेश किया गया है जैसे कि इन चीजों का रेलवे सेफ़्टी से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि ऐसा नहीं है। मैं साबित कर सकता हूँ कि तीनों ही चीज़ें रेलवे की सेफ़्टी के लिए अनिवार्य हैं। इनमें से एक का भी न होना सेफ़्टी के साथ खिलवाड़ है। सेफ़्टी को नज़र अंदाज़ करना है।

 

           आप अपने घर में फुट-मसाजर पता नहीं रखते हैं या नहीं। नहीं रखते तो कभी न कभी अपने बच्चे, अपने छोटे भाई या अपने किसी न किसी पारिवारिक सदस्य को अपने शरीर पर खड़ा कर दबवाते तो होंगे। जो दबवाते हैं उन्हे यह भान है कि इससे कितना आराम मिलता है। कितनी स्फूर्ति मिलती है। और आप पुनः काम पर जाने को तैयार हो जाते हैं। ऐसी ही कुछ ताज़गी का संचार होता है। अब बात लीजिये रेलवे के सेफ़्टी स्टाफ की। वे बेचारे सर्दी-गर्मी, बारिश-लू, रात-दिन पेट्रोलिंग करते हैं। एक ट्रैक मेंटेनर कितना पैदल चलता है आपको अंदाज़ा भी नहीं होगा। अतः फुट-मसाजर कोई आराम की या विलासिता की वस्तु, यंत्र या उपकरण नहीं बल्कि एक आवश्यक किट है। मैं तो कहूँगा अनिवार्य है।

 

        अब बात करते हैं क्रॉकरी की। भई इंसान ड्यूटी पर चाय-पानी पिएगा या नहीं। जब हाड़ कंपाने वाली ठंड पड़ती है, जब कप में डालते-डालते चाय ठंडी हो जाती है, जब हाथ जेब से बाहर निकालना भी दूभर होता है ऐसे में कोई गरीब क्रॉकरी में चाय-पानी भी न पिये। या क्या आप उसको यह कहेंगे कि कप-प्लेट चम्मच गिलास अपने घर से लेकर आओ या कहोगे कि जाओ ड्यूटी छोड़ो अपने घर से चाय-पानी पी कर आओ।सेफ्टी के साथ खिलवाड़ तो आप कर रहे हैं। सर जी ! क्रॉकरी उतनी ही ज़रूरी है सेफ़्टी के लिए जितने अन्य कोई हाई-फ़ाई उपकरण। आप इसे नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। याद है न एक कील की वजह से युद्ध हार गए थे। (बैटल वाज लॉस्ट ड्यू टू ए नेल) तो कप-प्लेट को आप इतने हल्के में न लें प्लीज़। कप यानि प्याले पर उर्दू शायरी में दीवान के दीवान लिखे जा चुके हैं। क्या उमर ख़ैयाम,

क्या मधुशाला। कप अर्थात प्याले से शुरू हो प्याले पर खत्म हैं। कभी एक प्याली चाय सेफ़्टी स्टाफ के साथ पी कर तो देखें आपको यकीन आ जाएगा क्रॉकरी की महत्ता का।

            अगली मद है विंटर जैकिट की। यह भी खूब रही। आप क्या चाहते हैं बेचारा गैंगमैन ठंड से ठिठुर कर ही मर जाये। आप तो अपने ड्राइंग रूम में बैठे हैं, हीटर लगा कर। उस बंदे से पूछो जिसे पूरी रात दिसंबर की सर्दी में खुले आकाश के नीचे पेट्रोलिंग करनी है। सिग्नल देना है। लैवल क्राॅसिंग गेट को हर ट्रेन के लिये बंद करना, खोलना है। लाइन क्लियर देनी है। यह ऑब्जेक्सन वगैरह लगाना आसान है ज़मीनी हक़ीक़त जानना भी ज़रूरी होता है सरकार। जिन्हें लगता हो आवश्यक नहीं है उनको मुझे याद है जब एक बार जॉर्ज फर्नान्डिज़ के रक्षा मंत्री के टाइम पर जब उनके मंत्रालय में से किसी ने सेना के लिए विंटर जैकिट पर आपत्ति की थी उन्होंने उस स्टाफ को बार्डर पर भेज दिया कहा कि खुद देख कर आओ, महसूस करके आओ, ज़रूरत है या नहीं। कहना न होगा कि तुरंत आनन-फानन में सब आपत्तियां उसी तरह पिघल गईं जैसे सूर्य के आने से स्नो पिघल जाती है।

 

        एक फुट- मसाजर को छोड़ भी दें तो बाकी चीज़ें इन पर अंग्रेजों के ज़माने से हैं। वो तो उन्होने आपसे फुट-मसाजर भी नहीं मांगना था। आपने अर्थात आपके अधिकारियों ने ज़रूरी समझा होगा तब न सैंक्शन किया होगा। एक कारण यह भी है कि अब आपने भर्ती तो लगभग-लगभग बंद ही कर दी है। अतः आपके ये फुट-सोल्जर अपने फुट की मसाज किस से कराएं ? पहले तो केजुअल लेबर होती थी, खलासी होते थे  प्यून होते थे। आपने सब बंद कर दिये। अब आपकी 'अच्छी नज़र' इन चरण दासों के चरणों पर बोले तो फुट-मसाजर पर है। क्या यह भारत जैसे विश्वगुरु को शोभा देता है कि जिसके चरणों में विश्व लोटने को लालायित हो उसके कर्मयोगियों को फुट मसाजरों के लिए तरसना पड़े।