Ravi ki duniya

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Saturday, June 27, 2026

व्यंग्य भालू बनाओ मोर बनाओ पर नौकरी दिलाओ

 

                                                       


एक समाचार के अनुसार चीन के एक चिड़ियाघर ने भालू की वेकेंसी निकाली हैं। आप सोचते होंगे भालू कौन समाचार पत्र पढ़ता है या टी.वी. देखता अथवा वोट देता है जो सुनेगा,समझेगा और नौकरी का सुन कर आपको वोट देने दौड़ पड़ेगा। हुज़ूर ये वेकेंसी आदमियों के लिए ही निकाली हैं। उन्हें भालू के भेष में चिड़ियाघर में अज़ीब अज़ीब भालू सी हरकतें करके दर्शकों का मनोरंजन करना है। शर्त ये है कि जब वे भालू के भेष में होंगे तब आदमी की भाषा में बोलने का नहीं है। बस खों-खों करना है। इन्सानों की भाषा में बोलना सर्वथा वर्जित है। वेतन होगा पूरे 14 लाख सालाना। सैकड़ों आवेदन आए और देखते-देखते सभी पद भर गए। सिर्फ दिन में 6 घंटे की ड्यूटी और महीने की चार छुट्टियां आलग से मिला करेंगी।

मैं सोच रहा हूँ अगर भारत के चिड़ियाघर भी ऐसी ही रोजगार योजना निकालें तो इस 'वनरेगा' का कोई जवाब न होगा। हम एक कदम और आगे जा सकते हैं। भालू ही क्यों, हम कुत्ता, बिल्ली, ऊंट, गधा, घोड़ा सब बनने को तैयार हैं। 14 लाख के इस पैकेज के लिए आज भी भारत की नवजवान पीढ़ी क्या-क्या नहीं कर रही। आप भालू की एक खों-खों की बात करते हो यहाँ रोजगार मार्किट में हाहाकार मची हुई है। दस-दस, बारह-बारह हज़ार के लिए न जाने क्या-क्या रें-रें खें-खें नहीं करनी पड़ रही है। अब तो कहते हैं हमारे यहाँ की आई.आई.टी. से निकले बच्चों का सी.टी.सी. भी बहुत नीचे आ गया है। शिक्षा का रोजगार से जुड़ा होना सुनते आए थे। अब तो दोनों ही क्षेत्र लस्त-पस्त बरबाद से पड़े हैं। पता नहीं इस क्षेत्र में रिनेसां कब आयेगा? आयेगा भी या नहीं?

प्राइवेट का क्या हाल है आप को भनक नहीं होगी। क्या बच्चे, क्या माताएं-बहनें सब बंधुआ मजदूर से लगे हुए हैं। न दिन दिखता है न रात। काम-काम बस काम। वह भी इतने कम वेतन पर। सिने अभिनेता मनोज कुमार जी की फिल्म उपकार का इन्दीवर जी के गीत की एक लाइन है:

                     ये हाल रहा तो दुनिया में भारत की कहानी क्या होगी

                     जिस देश का बचपन भूखा हो उसकी जवानी क्या होगी

जैसे-तैसे दूसरे देश चले जाओ तो वहाँ भी 'इंडियन' हो सुन कर कोई भालू भी नहीं बनाता। अब हमीं को योजनाबद्ध तरीके से शिक्षित बेरोजगारों के लिए नई-नई स्कीमें लानी पड़ेंगी यथा: अग्निभालू, अग्नि गधा, अग्नि कुत्ता। तरुणाई का इस युग में इतना अनादर है कि सुन-सुन कलेजा मुंह को आता है। क्या नई पीढ़ी को अब बस भालू-कुत्ता-गधा बना कर ही छोड़ेंगे।

                           डेढ़ आखर खों-खों का

                           पढ़े सो भालू होय


भालू महान है। वह कॉकरोच से बड़ा होता है। वह परजीवी नहीं होता बल्कि उल्टे मदारी और उसके परिवार का पेट पालता है।

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