Ravi ki duniya

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Friday, June 12, 2026

व्यंग्य: ब्रिटेन में बेडमिंटन खेलत नंदलाल

       

कोई अगर न्यायिक अधिकारी बन जाये तो इसका अर्थ ये तो नहीं कि वह खेलकूद बंद कर दे। वह भी इंसान है। उसका भी दिल करता होगा कि वह स्पोर्ट्स खेले। ज्यादा कुछ करना भी नहीं है कारण कि ये एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट भर जाना है। बोले तो कोर्ट (न्यायालय) से बेडमिंटन कोर्ट। क्या आप नहीं चाहते कि आपके न्यायिक अधिकारी साहिबान हृष्ट-पुष्ट रहें। बोले तो एकदम फिटफ़ाट रहें। आपने सुना नहीं एक सेहतमंद ज़िस्म में ही एक सेहतमंद दिमाग का वास होता है। स्पोर्ट्स हम सब के लिए एक जरूरी चीज़ है। वरना समझ लो क्या होगा। अच्छा है चिड़िया (शटलकाॅक) को ही इधर से उधर फेंकें अगर ये आपका केस हुआ तब। अब कुछ लोग तो ये भी कह रहे हैं कि इससे शटल कॉक


फेंक-फेंक केस फेंकने में आसानी हो जाएगी। एक बात बताईये मुकदमे आप लड़ें और दोष जुडियशरी का कैसे हो गया? अगर करोड़ों केस पेंडिंग हैं तो ये महाराज आपकी गलती है ना कि कोर्ट की। वो तो बेचारे निपटा ही रहे हैं, जितने केस निपट जाएँ। आप ही लोग लड़ाके किस्म के हैं जो जरा-जरा सी बात पर कोर्ट भागते हैं और फिर भिनभिनाने लगते हैं तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख।


देखिये ये बेडमिंटन ही है जिसे सभी, क्या बूढ़े, क्या जवान खेल सकते हैं। हद से हद क्या होगा आप हार जाएँगे पर वो भी तो खेल का हिस्सा है। एक हारेगा तभी न दूसरा जीतेगा। सर्विस उठी या नहीं उठी इसका कोई मतलब नहीं है। इस बार नहीं उठी अगली बार उठेगी।


               लंदन आवत जात से साॅउथहाॅल पर पड़त निशान


 उस से अगली बार उठेगी। कब तक शटल कॉक (चिड़िया) नहीं उड़ेगी। बेडमिंटन की एक बात मुझे सबसे अच्छी लगती है और हो न हो इसलिए इसे चुना गया होगा इस में 'लव-ऑल' आता है। बाकी फिर टेनिस में है अब टेनिस कुछ ज्यादा भागा-दौड़ी मांगता है। मैं इस बात को नहीं मानता कि अब से 'बार' के या 'बेंच' के दो खेमे हो जाएँगे और केस देने से पहले पूछने लगेंगे कि केस बेडमिंटन वाले वकील को देना है या फिर...। एक बेडमिंटन कोर्ट ने पूरे कोर्ट को दो भागों में बाँट दिया है। 'बेडमिंटन-वकील' और 'नॉन बेडमिंटन-वकील'। हो सकता है कुछ वकील लोग अपने अपने क्लाइंट को कहने लगें कि अभी तो जेट-लैग में चल रहा हूँ। लंदन में बेडमिंटन कुछ ज्यादा ही हो गया। वो तो अच्छा हुआ कि आसपास पेरिस-रोम वगैरा घूमने से थोड़ा चित्त शांत हुआ है।


मेरा तो ये अनुरोध है कि इस प्रकार के टूर्नामेंट दुनिया के इसी तरह के अच्छे अच्छे देशों में कराये जाया करें। कभी बेडमिंटन, कभी क्रिकेट, कभी टेनिस, कभी चैस, कभी खो-खो। अगली बार वाइस चांसलर्स को भेजा जाये। फिर अन्य स्तंभों को। सुना है मैच बार और बेंच के बीच होगा। न जाने कितने 'बार' वाले तो बेंच से हारने में ही अपना फ्यूचर देखने लगेंगे। मोटा-मोटा ये समझ लें कि ये जो शटल काॅक है वह फरियादी है। उसे कभी बार वाले बेंच की तरफ फेंकेंगे कभी बेंच वाले बार वाले की तरफ। इसी तरह


                          हँसते-हँसते कट जाएँ रस्ते


वे लोग जरूर कुढ़ रहे होंगे जो या तो बेडमिंटन खेलना नहीं जानते या फिर जिन्होंने लंदन नहीं देखा। इससे स्पोर्ट्स खासकर बेडमिंटन को बड़ा प्रचार-प्रसार मिलेगा। यह स्पोर्ट्स की सेहत के लिए जरूरी है। बस अब 'लव-ऑल' और 'गेम-पॉइंट' आदि के बारे में पढ़ाई शुरू कर दें। क्या पता कब आप टीम में शामिल हो जाएँ और लंदन की फ्लाइट में दिखें।


 कुछ तो अपने चेम्बर में बेडमिंटन का बल्ला बोले तो रेकिट रखना शुरू कर देंगे। पता नहीं कब शॉर्ट नोटिस पर जाना पड़ जाये। जैसे न्याय के लिए कहा जाता है कि न्याय न केवल करना चाहिए बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। बस उसी तर्ज़ पर बेडमिंटन न केवल आपको आना चाहिए बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए कि आप बेडमिंटन खेल सकते हैं। बस चिड़िया (शटल-काॅक) को समझें यह आपका क्लाइंट है फिर सब आसान हो जाएगा।                        

 

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