इस एक छोटे से शब्द के अनेक अर्थ हैं। बचपन
में हम सुनते थे 'कमेटी आई ! कमेटी आई !'
इसका अर्थ था कि वह छापामार दस्ता जो दिल्ली की गलियों-सड़कों से
फेरीवालों यथा गोलगप्पे वालों, बर्फ के गोले वालों और
चना-मुरमुरा बेचने वालों की धर-पकड़ करते थे। वे उनको नहीं पकड़ते थे बल्कि उनका
सामान ज़ब्त कर लेते थे। हम सोचते यार कुछ भी हो सबसे बढ़िया नौकरी तो इनकी है जब जो
खाने का दिल करे उसी का सारा सामान ज़ब्त कर लो। भर पेट गोलगप्पे खाओ। बर्फ के रंग-बिरंगे
गोले बना-बना कर खाओ। बर्फ के गोले छोटे, मध्यम और बड़े खांचों (कप्स) के हिसाब से होते थे और सबसे
छोटी इकाई होती थी 'थपकी' बोले तो कोई
कप नहीं बस एक मुट्ठी घिसी बर्फ को थपकी देकर चिड़िया सी बना कर पकड़ा देता था।
फिर ये कमेटी टर्म हमने सुना जब भद्र महिलाएं
जिनके घर के चौके-चूल्हे को 'बाई' देखती थी वे खाली वक़्त को कमेटी तरह बिताने लगीं। इसे वे अंग्रेजी में 'किटी' कहने लगीं। कमेटी(किटी) कई तरह की होतीं थीं।
पैसे की लॉटरी से लेकर, बोली लगाने वाली। कमेटी बजट के
अनुसार ही भद्र महिलाओं का वर्ग उस से जुड़ा होता था। यह हाई-फाई से लेकर जिसमें कार्ड्स खेले जाते, बीयर, जिन और बाहर रेस्तरां में लंच होता, कुछ गाना-वाना, जोक-शोक होते हैं। दूसरी तरफ वो लघु
बजट कमेटी जो दस-बीस हज़ार की होतीं जिनमें चाय-नाश्ता, भल्ला-पापड़ी
होती।
इन सबमें सबसे ऊपर होती हैं वे सरकारी
कमेटियाँ जिनका गठन संसद करती है। मोटा-मोटा सरकारी कमेटी। वे सरकारी दफ्तरों के
चक्कर लगाया करती हैं और तरह तरह की खामियां निकालती हैं। जितनी ज्यादा खामियां
उतनी ज्यादा खातिरदारी। बोले तो खातिरदारी बढ़ती जाएगी अगर खामियां बढ़ती जाएंगी।
इनका ज़लवा देखते ही बनता है। शहर में इनके उतरते ही कारों का काफिला पुष्प-हार से
एयरपोर्ट पर ही स्वागत के साथ साथ जबर्दस्त ग्लॉसी पेपर पर छपी सामग्री उससे भी
महंगा ब्रीफकेस, बैग, फोल्डर,
महंगे वाला पेन आदि आदि। जो भी महंगा चल रहा हो उस ब्रांड के सूटकेस
से लेकर अपने प्रोडक्ट की झलकस्वरूप प्रतीक / अनुकृति अथवा प्रोडक्ट ही। वे
सामान्यत: पाँच सितारा होटल में ठहराए जाते हैं। क्या प्रबंध निदेशक, क्या अध्यक्ष क्या निदेशक सब आतंकित से रहते हैं। ना जाने कब किसकी नस दबा
दे ये कमेटी। इस दशा में ये कमेटी उस कमेटी जैसी ही है जो गोलगप्पे वाले का सामान
ज़ब्त कर लेती थी और गोलगप्पे के पानी के घड़े को सड़क पर ही उसी निर्दयता से पटक
देती थी जैसे कभी कंस ने अपने भांजे-भाँजियों को पटका होगा। इन कमेटी मेंबर्स के
आराम का, घूमने का ख्याल रखा जाता है। असल में तो वो जो
ग्लॉसी जर्नल उन्हें पकड़ाया जाता है उसमें एक चैप्टर इस बात का ही होता है कि इस
शहर में दर्शनीय और शॉपिंग के लिए क्या क्या है। ये 'वन
डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' बहुत पुराना है। एक कमेटी के
रात्रिभोज में हम भी गए थे तथाकथित वरिष्ठ अधिकारी/विभागाध्यक्ष के तौर पर। पता
चला कमेटी के अध्यक्ष और मेम्बरान पी कर टल्ली हुए पड़े हैं। बस एक अदद मेम्बर जो
शायद सबसे जूनियर रहा होगा/पीता न होगा उसके सान्निध्य में हमने अपना डिनर लिया
था। ये कमेटी मेम्बर भी कम नहीं होते एक अध्यक्ष महाराज तो मुझसे बोले "कल
रात मेरा पर्स आपके गेस्ट हाउस से कहीं गिर गया"। अब हमारे तो हाथ पाँव फूल
गए। लेकिन किसी तरह बात संभाली गयी कि सबसे पूछताछ की जाएगी और सी.सी.टी.वी. की
सहायता से चोर को पकड़ लिया जाएगा और पर्स आप तक पहुंचा दिया जाएगा। आगे आप जानते
ही हैं सी.सी.टी.वी. का सुन उन्होने बात बढ़ाई नहीं।
सरकार ने लेटेस्ट निर्देश दिये है जिसके
अनुसार अब से कमेटी मेम्बर पाँच सितारा होटल में नहीं रुक कर सरकारी गेस्ट हाउस/
डाक बंगला/सर्किट हाउस में रहा करेंगे। इसमें एक ही पतली गली है सरकार ने पाँच
सितारा होटल को मना किया है आजकल तो होटल छह/सात सितारा भी होते हैं। और तो और
कितनों के तो ऑफिशियल गैस्ट हाऊस या गैस्ट हाऊस के एक्सटेंशन इन होटलों में ही
होते हैं। बाई दि वे होटल पाँच सितारा डीलक्स
भी होते हैं । पांच सितारा प्रतिबंध किये हैं। पांच सितारा डीलक्स नहीं।
मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि मित्र लोग मिल कर इसका तोड़ निकाल ही लेंगे।
खानपान पर भी प्रतिबंध लगाए हैं मसलन आप महंगा भोजन नहीं करेंगे। हमारी विभागीय
मीटिंग्स के लिए जब लंच के लिए 25-30 रुपये प्रति
व्यक्ति सीमा रेखा आई तो हम लोग ने
अतिथियों की संख्या कागज पर ही बढ़ा ली और हमारे पनीर-पकोड़ा, कॉफी- काजू-बादाम बदस्तूर जारी रहे। भला इनके बिना भी कोई मीटिंग होती है
कमेटी मीटिंग तो कदापि नहीं। अब से कमेटी मेंबर्स को महंगे गिफ्ट्स देने की भी मनाही है। अब ये ‘महंगा’ एक सब्जैक्टिव टर्म है कोई चीज़
मेरे लिए महंगी हो सकती है आपके लिए नहीं। इसमें एक अपवाद है- आप उन्हें 'प्रशासनिक किट' (भगवान जाने इसका क्या अर्थ होता है)
डायरी, पेन, स्टेशनरी आइटम दे सकते हैं
अतः ये जो बाज़ार में लाखों के पेन हैं ये आपको कागज काले करने को नहीं बेच रहे
हैं। ये तो बिक ही इसलिये रहे हैं कि आप इन्हें उपहार स्वरूप दे सकें। बजट अनुसार
पेन उपलब्ध हैं। करोड़ों से लेकर पाँच रुपये वाले। सरकार ने चांदी के सिक्कों और
इलेक्ट्रॉनिक्स गेजेट्स को देना सर्वथा वर्जित किया है। अतः अब से आप केवल सोने के
सिक्के ही दे सकेंगे। नो चांदी प्लीज़। हां आप चाहें तो हीरे-मोती-लाल-जवाहर दे
सकते हैं। उनका ज़िक़्र नहीं है। दूसरे ये इलेक्ट्रॉनिक्स गेजेट्स क्या होता है जी?
क्या चीज़ है जो गेजेट्स में नहीं आती। हमारे टीचर कहते थे ये जो
शेविंग रेज़र है ये भी एक मशीन ही है। अतः हम इसका भी कोई हल निकाल लेंगे इस विषय
पर तुरंत एक कमेटी का गठन कर दिया जाये। सरकार ने नोट किया है और घोषणा की है कि
अबसे "कमेटी के दौरे शाही नहीं बल्कि सादगी भरे होंगे"। चचा ग़ालिब कह
गये हैं:
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

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