कभी एक जमाने में 'गन-बोट' डिप्लोमेसी बहुत मशहूर हुई थी। फिर लोग-बाग 'डिनर' डिप्लोमेसी की बातें भी किया करते थे। हमें
यदा-कदा सुनने-पढ़ने को मिलता रहता है कि फलां दफ्तर में फलां नेता जी के यहाँ चाय
- पान बोलो जल-पान बोलो का बिल लाखों में आया। बहुधा रेलवे में शिकायत सुनने को
मिलती थी कि केटरिंग वाले बहुत पैसा खाते हैं। फिर किसी ने समझाया पैसा कोई खा
नहीं सकता। हो सकता है कि बेचारों को जब भूख लगती हो तो भोजन भर कर लेते हों अथवा
अपने परिवार, मित्र मंडली में भूखे को खाना खिला देते हों।
हमारे शास्त्रों के अनुसार भूखे को खाना खिलाना पुण्य का काम माना जाता रहा है।
फिर एक सीनियर ने बताया कि इस विभाग का हिन्दी नाम ही खान-पान विभाग है अब उसमें
खाने की या पाने की क्या ही शिकायत करना। हाँ अगर क्वालिटी में कोई कमी हो तो
बताओ। हमारे हाॅस्टल की मैस में इंचार्ज का पदनाम राजभाषा वालों ने लिखा था ‘मैस
प्रभारी’ हम लोग विनोद में उसे ‘मैस पर भारी’ कहते थे।
हाल ही में एक सम्मेलन में भारतीय राजनयिकों
को ड्राइफ़्रूट्स खाते देख लोगों ने तरह-तरह की बातें फैला दीं। नासमझ हैं। उन्हें
पता ही नहीं है कि अंग्रेज़ी शब्द 'मीटिंग'
में 'एम' साइलेंट होता
है। अर्थात वह होता असल में 'ईटिंग' है।
अब इन राजनयिकों को घर में अलग डांट पड़ेगी बीवी-बच्चों से। क्लोस्ट्रोल बढ़ा लेते
हो काजू खा-खा के। बच्चे पापा की अलग खबर लेंगे। हमारे दोस्त देखेंगे तो क्या
कहेंगे?
अन्य दफ्तरों के लिए यूं तो गाइडलाइंस जारी
हैं सरकार की तरफ से। इन निर्देशों में कुछ न कुछ इजाफा होता रहता है। लेटेस्ट एक
मंत्रालय ने तो नोटिस निकाल कर मेन्यू भी फिक्स कर दिया है कि शॉर्ट मीटिंग में
यह-यह मंगाना-खाना है और लंबी मीटिंग में यह मंगाना-खाना है। कोई कन्फ़्यूजन न रहे
अतः दोनों मीटिंग की परिभाषा भी दे दी गयी है। शॉर्ट वह जो शॉर्ट नोटिस पर बुलाई
जाये। लंबी वो जिसका नोटिस पहले से ही दे दिया गया हो। नौकरशाही ने एक और टर्म
निकाली है 'वर्किंग लंच'। अब इस
'वर्किंग लंच' का क्या अर्थ होता है?
वह लंच जिसके लिए आपको 'वर्क' करना पड़े। वर्किंग लंच का मेन्यू सुन कर आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे।
जैसे कि क्लब-सेंडविच, चिकन सेंडविच, फिश
पकौड़ा,फिंगर-फ्राई, पेस्ट्री अथवा
बर्फी अगर इंडियन मेन्यू रखना हो तो समोसा, पेटीज़, आलू बोंडा, वडा पाव। आजकल ढोकला भी लोग खूब चाव से
दिखा-दिखा कर खाते हैं। यूं दिल्ली में सब से पहले दक्षिण भारतीय स्नैक्स बोलो,
फास्ट फूड बोलो आये। जैसे कि वडा, इडली और
डोसा। अब तो पूरी की पूरी लिस्ट है। सत्तरह तरह के तो डोसे ही मार्किट में चल रहे
हैं, कीमा डोसा, एग डोसा, श्रेडिड चिकन डोसा। दिल्ली के नौरोजी नगर में एक खानदानी पकौड़े वाले की
दुकान है। उसकी यू.एस.पी. ही यह है कि उसे कोई भी चीज़ दो,
अगला उसका पकौड़ा बना देता है। मैंने उसकी दुकान से करेले के पकौड़े, कमल ककड़ी के पकौड़े, अंडे के पकौड़े खाये हैं। सुना है
कहीं कहीं आइसक्रीम के पकौड़े भी बनने लगे हैं।
अतः हे राजनयिको! आपको अपने इस चित्र/रील/ से
बिल्कुल नहीं घबराना है। हमारे यहाँ तो संत-महात्मा तक कह गए हैं:
"भूखे
भजन न होय गोपाला
ये लो
अपनी कंठी - माला"
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