Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Friday, September 22, 2023

व्यंग्य ‘झकास’ नहीं बोलने का!

 


 

       लो जी ! अब कोर्ट ने ऑर्डर कर दिया है कि झकास बोलने का नहीं। मतलब आपको नहीं बोलने का है अभिनेता महोदय बोल सकते हैं बोले तो फकत वो ही बोल सकते हैं ये नहीं कि मैं तुम बाकी लोग झकास बोलें।

 

          मैं सोच रहा हूँ अब अगर यही चलन चल पड़ा तो सोचो बेटा इधर आपने मुंह खोला नहीं और उधर आप पर किसी न किसी अभिनेता ने  मुकदमा लगाया नहीं। क्यों कि ऐसा कोई न कोई संवाद आपके मुंह से निकल ही जाएगा जिसके लिए आपको कोर्ट-कचहरी करनी पड़ सकती है जिसके लिए आप को मुंह छुपाए-छुपाए घूमना पड़ेगा और मुंह की खानी पड़ेगी। अब इस तरह के शब्द जैसे जिल्ले-इलाही, रिश्ते मैं तो हम तुम्हारे...चिनोय सेठ ! जिनके घर शीशे के बने हों... आपके पाँव देखे इन्हें ज़मीन पर मत उतारना... ऐसे कोई भी वाक्य बोलने से पहले चार बार सोचें। हमारी कोर्ट-कचहरी पर पहले से ही बहुत वर्कलोड है।

 

   सोचो ! अब इसको कोई बोल पाएगा या नहीं ? बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये... मेरे साथ ऐसा सलूक करो जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है। मुंह खोलने से पहले बहुत सोचना पड़ेगा!

  

      अब बीवी को या प्रेयसी को आई लव यू कहने से पहले भी पप्पू-पेजर को सोचना पड़ेंगा कुछ करना पड़ेंगा ! आज कोई हम पर भारी पड़ेला है।

     

Wednesday, September 13, 2023

व्यंग्य: अन्सटोपेबल भारतीय

 


            अब मुझे फुल यकीन हो चला है कि हमें सनातनी होने से वो भी वैदिक कालीन भारतीय होने से कोई नहीं रोक सकता। इंडियन भले कभी स्टोपेबल रहे हों, हम अब भारतीय हो गएले हैं और वो भी सनातनी वाली किस्म के सो अब हम सही मायनों मेंअन्सटोपेबल हो गए हैं। हमें रोक सके, हमारी क्रिएटिविटी को रोक सके ये ज़माने में दम नहीं। अबे ! क्या बात करता है ? हम डेमोक्रेसी की मॉम हैं। कहीं कोई माँ से भी बहस करता है। जो करे वो नालायक। बस बहस खत्म।


             एशियन कप हमने कैसे जीता है ये बात अब खुल गई है। ज्योतिष ने हमारे एक-एक खिलाड़ी का पंचांग देख कर चयन किया है। बोले तो ठोक-बजा कर एक-एक मोती ढूंढ कर लाये हैं। यही एक बात है जो हमें राइवल टीम से अलग करती है। प्रतिद्वंदी अब भी वही घिसे-पिटे दक़ियानूसी फार्मूले पर काम कर रहे हैं यथा खिलाड़ी का स्टेमिना, उसकी बुद्धि-कौशल, उसका रेकार्ड, उसकी खेल में दक्षता आदि आदि।

 

          मेरा सरकार से विनम्र निवेदन है, निवेदन क्या आग्रह है कि ये यू.पी.एस.सी, आर.आर.बी, बेंकिंग भर्ती बोर्ड जे..., पी.एम.टी., CUET सब बंद किए जाएँ। बस अभ्यर्थी को अपनी जन्मपत्री सबमिट करनी होगी बाकी हमारा एक पेनल होगा ज्योतिषियों का। वे सब ठीक कर लेंगे। किसके सितारे बुलंद हैंकौन ईमानदार रहेगा, दक्ष रहेगा सब शीशे की तरह साफ। वे एक क्रिस्टल-बॉल ले कर बैठा करेंगे एक अंधेरे से कमरे में।

 

              जहां कठिनाई आएगी वे केंडीडेट के तिल आदि देख लेंगे, हस्त रेखाविशेषज्ञ हाथ की लकीर देख बता देंगे इसके हाथ में कितनी दौलत, शोहरतइज्ज़त लिखी है ये दिन भर में कितनी फाइलें क्लियर कर पाएगा। क्या ये फाइलों पर वक़्त ज़रूरत बैठ सकता है/सो सकता है या फिर इमरजेन्सी आए तो फाइलें जला सकता है। इस पर अग्नि भारी तो नहीं।

 

                     साथ ही पेनल पर फेस-रीडर रखे जाया करेंगे जो आपके माथे की लकीर देख कर पता लगा लेंगे ये जजमान कितने आगे तक जाएगा। ये असेट बनेगा अथवा लायबिलिटी। टैरो वाले भी अपनी-अपनी राय देंगे। उसी तरह न्यूमरोलोजिस्ट अपनी अपनी गणना करेंगे। जन्म तिथि और जन्म के समय से नाम के अक्षरों से। हस्त लिपि वाले अपने-अपने लेंस लेकर आएंगे।

 

                भाई साहब ! इन सबकी एक राय से उन मेधावी प्रतिभाओं की भर्ती होगी कि अव्वल तो उन्हें किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत पड़ेगी नहीं और यदि थोड़ी बहुत हुई भी तो मामूली सा एक सेशन इन सब आचार्यों के साथ पर्याप्त है।

 

         आप तो ये सोचो इससे कितने समय और फंड्स की बचत होगी। वैसे तो इस चयन प्रणाली में गलती की कोई गुंजायश है नहीं फिर भी एक फ़ाइनल राउंड में आप शॉर्ट-लिस्टड केंडीडेट्स से उनके घर का नक्शा नत्थी करा सकते है। इसमें मुखर्जी नगर और ओल्ड राजिन्द्र नगर में पी.जी. में रहने वाले बच्चों को डरने की ज़रूरत नहीं क्यों कि नक्शा उनके परमानेंट निवास का मांगा जाएगा। यदि किसी कारणवश वह उपलब्ध नहीं हो तो वो अपने पैतृक निवास का, या माता-पिता से एफ़िडेविट करा सकते हैं कि केंडीडेट मकान के किस कोने में रहता, सोता-जागता था। रसोई किस कोण पर थी और इज्ज़त घर किस दिशा में था। इसका विस्तृत अध्ययन वास्तु के विशारद करेंगे और उसी आधार पर मेरिट बन जाएगी। फिर देखना आप ! भारत को सोने की चिड़िया बनने से दुनियाँ की कोई ताकत रोक नहीं पाएगी। सोने से यहाँ मेरा अर्थ गोल्ड से है न कि नींद से जिसमें डरावने सपने आते हैं।

 

Friday, September 8, 2023

व्यंग्य: चाहिए क्रॉस कंट्री वधू


 

मैं भी सोच रहा हूँ कोई तो बात होगी इन क्रॉस कंट्री दुल्हनों में। काश कोई सीमा हैदर, कोई हनी, पाकिस्तान छोड़, बांग्लादेश छोड़ सीधे हमसे आन मिले। सोचा जाये तो बहुत विन-विन सिचुएशन है जी। न कोई दहेज का टंटा न कोई जात-धर्म का पुंछेला। बस मैं “... मैं आया.. आया....”  गाते मैं एयरपोर्ट/बस-अड्डा/रेलवे स्टेशन अब जिस साधन से भी वो मेरे दिल की मलिका आ रही हैं पहुँच जाता उधर वो “..मैं आई.. आई..” कहती आ जातीं। बस फिर शुरू होता हमारा प्रैस से, चैनल से इंटरव्यू टाइप हनीमून।

 

    लोग छाती पीटते, रोते चिल्लाते रहें खासकर समाज के और देश के सेल्फ-अपोइंटिड ठेकेदार। अपुन तो वी.आई.पी. बने घूमेंगे-फिरेंगे। हम पर रातों-रात कितने मीम बन जाएँगे , कितने लोग तो हमारे बारे में बात कर-कर के ही वायरल हो जाएँगे। फेमस हो जाएँगे।

 

     देखो जी कोई ढंग का रोजगार है नहीं। देश में सब जानते हैं हम जैसे शिक्षित नौजवान मुहब्बत-वीरों की हालत। सो यहाँ तो कोई अपनी लड़की देने से रहा। आखिर कौन माँ-बाप अपनी लड़की को जान बूझ कर कुएं में धकेलेगा।


या अली !  अब तो मुहब्बत तेरा ही आसरा है। सुन रहे हो ! नेपाल..बांग्लादेश..पाकिस्तान..भूटान..श्रीलंका वालो!! या फिर तुम सब इस ग़रीब वीरू को टंकी से कुदा कर ही मानोगे ? देखो मैं सारे सिग्नल तोड़-ताड़ कर टंकी पर चढ़ गया हूँ।  इतने पर तो हेमा मालिनी ने न केवल फिल्म में बल्कि असल ज़िंदगी में भी धर्मेंद्र से शादी कर ली थी। मैं भी दिल की खातिर दिलावर बनने को तत्पर बैठा हूँ, दिलबर नज़र तो आए। 

 

कोटा सुसाइड का

 

         

हम अपने बच्चे को वो नहीं बनने देना चाहते जो वो बनना चाहता है हम बच्चे को वो बनाना चाहते हैं जो हम उसे बनाना चाहते हैं। मैं इंजीनियर नहीं बन पाया तो क्या ? मेरा बेटा/बेटी बनेगी। और दिखा देगी दुनियां को कि शर्मा जी/गुप्ता जी के बच्चे भी किसी से कम नहीं। चाहे उसमें इस लाइन का एप्टीच्यूड है या नहीं उससे क्या?

           भले अपनी ज़मीन खेत गिरवीं रखने पड़े या महाजन से औने पौने  रेट पर कर्ज़ा लेना पड़े। बस कोटा के सुसाइड्स का यही लब्बोलुआब है। बाकी सब सेंसलैस डिफेंस के असफल प्रयास हैं। हम अपनी संतान को इस रेस में पीछे नहीं रहने देंगे। इंजीनियर बना कर ही मानेंगे। एक मोठा पैकेज लेने का ही है उसे।

 

हमारी बेवक़ूफियों का आप अंदाज़ भी नहीं लगा सकते:

1.   सीलिंग पंखा हटा दो उसकी जगह टेबल फैन लगाओ। बच्चू अब लटक के दिखा

2.  पंखे की रॉड इतनी कमजोर बनाओ कि जरा से बोझ से ही टूट जाए और नीचे आ जाए।

3.  पंखे में रॉड की जगह स्प्रिंग लगाओ सो पूरा पंखा ही नीचे आ जायेगा।

 

             जितने भी कोचिंग केंद्र हैं उनकी भी मजबूरी है उनको अपना सेंटर चलाना है अतः भले हर हफ्ते दो टेस्ट लेने पड़े भले बच्चे दिन रात एक कर दें मगर सब कम है। दाखिले की पर्सेंटेज 100 पहुँच चुकी है। और मज़े की बात है कि यूनिवर्सिटी में कई कोर्स में दाखिला 100% पर फुल/बंद हो जाता है। तो ऐसी मार-काट वाली स्थिति में जो न हो थोड़ा है।

जानकार लोग बताते हैं कि कोटा के सुसाइड्स को मोटा-मोटा दो श्रेणी में रख सकते हैं:

 

क.  ग़रीब / निम्न मध्यम वर्ग के लोग अपनी मकान/ज़मीन अपना खेत रहन रख कर हाई रेट पर कोचिंग की मोटी फीस भरते हैं। यह बात बच्चे को पता होती है उस पर अपनी पढ़ाई के अलावा इस बात का भी बहुत दबाव होता है खासकर जब वह वांक्षित अंक वीकली टेस्ट में नहीं ला पाता। यह दबाव बढ़ता ही जाता है। और किस घड़ी ब्रेकिंग पॉइंट पर पहुँच जाता है पता भी नहीं लगता। यहाँ बच्चे की मदद को कोई नहीं। बच्चा डिप्रेसन में चला जाता है।

 

ख. जगह-जगह के स्कूल में/बोर्ड में अंक प्रणाली अलग अलग होती हैं। बच्चा अपनी बैकग्राउंड से कोटा का सामंजस्य नहीं बना पता है। जिस प्रकार की मेहनत वहाँ कराई जाती है वह बहुत निर्दयी किस्म की होती है। टेस्ट पर टेस्ट। कदम कदम पर आपकी परख हो रही होती है। अब पता नहीं आपके बच्चे की रुचि है भी या नहीं। उसकी उतनी क्षमता है भी या नहीं बस औरों की देखा देखी हम अपने बच्चे को झोंक आते हैं। फीस के पैसे देकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। आप देखते ही हैं न केवल कोचिंग सेंटर में बल्कि कॉलेज जाकर भी सुसाइड का दर सतत बना रहता है। अतः हमने अपने बच्चों को नया दौर फिल्म का घोडा बना दिया है।

 

             वक़्त आ गया है कि आप सोचें आखिर इंजीनीयरिंग ही एकमात्र क्षेत्र नहीं है और भी विषय हैं जिनमें चमकने की उतनी ही या अधिक संभावनाएं हैं। आखिर मात्र पैसा कमाना ही तो जीवन का मुख्य या एकमात्र उद्देश्य नहीं। सफलता को मनाना हमें आता है मगर अपने बच्चे को असफलता से सामंजस्य बिठाना भी सिखाएँ। उसे मशीन न बनने दें। उसे न बताएं कि पड़ोसी का बच्चा या फिर आपकी  रिश्तेदारी में फलां का लड़का या लड़की ने झण्डा लगा दिया है अब उसकी बारी है।

 

          आप अपने बच्चे के दोस्त नहीं बन सकते न बनें पर उसके दुश्मन तो न बनें  

Wednesday, August 9, 2023

व्यंग्य : फ्लाइंग किस

 

‘किस’ कैसी भी हो प्रेम, वात्सल्य और स्नेह की प्रतीक होती है।  वैज्ञानिक मानते हैं कि ‘किस’ की तुलना में हाथ मिलाने से कहीं अधिक जीवाणु ट्रांसफर होते हैं अतः हाथ मिलाना किस की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक है। मगर वैज्ञानिकों की बात हम मानते कहाँ हैं। और गाहे-बगाहे किस करते फिरते हैं। शम्मी कपूर जी कि फिल्म का एक गाना है “किस किस किस किस को प्यार करूँ” कहते हैं कभी हिन्दी फिल्मों में ‘किस’ आम बात थी देविका रानी और हिमांशु राय की किस आजतक याद की जाती है। वो और बात है कि देविका-हिमांशु पति-पत्नी थे। किन्तु क्यों कि ये किस पर्दे के पीछे न होकर परदे पर थी अतः मात्र रिकार्ड की ही बात बन कर रह गयी। सुना है विदेशों में लंबी किस की प्रतियोगिताएं होतीं हैं खैर भारत में ऐसी प्रतियोगिताओं का कोई महत्व या  भविष्य नहीं हैं। हमारे यहाँ किस को एक अलग अंदाज़ से देखा जाता है। यदि आपको किस करते हुए किसी पुलिस के सिपाही ने या समाज के स्वघोषित सिपाही ने देख लिया तो आपकी पिटाई तय है। हो सकता है मुकदमा चले और जेल हो जाये। हमारे यहाँ आप खुले में लड़-भिड़ सकते हैं, खून-खराबा कर सकते हैं मर्डर, आगजनी कर सकते हैं मगर किस ? ना बाबा ना। हमारे यहाँ किस ‘किस ऑफ ड्रेगन’ मानी जाती है घातक और जानलेवा। देख लीजिये खजुराहो के देश में हम कहाँ से कहाँ आ गए।

 

         ‘किस’ के भी आदाब हुआ करते हैं ग़ालिब ये नहीं कि बगैर देश-काल का ख्याल आप किस करने लग जाएँ। हमारे यहाँ प्रेम करना एक अपराध है और किस उसी के प्रदर्शन का एक माध्यम है। मुझे लगता नहीं किस का आविष्कार या खोज हुई होगी यह तो एक सहज मानवीय भावना है। अब जीवाणु अपना-अपना देख लें यहीं रहेंगे या पार्टनर के साथ जाएँगे। 

 

         ‘किस’ अनेक तरह की होती होंगी कोई विशेषज्ञ ने इस पर ज़रूर अपनी रिसर्च लिखी होगी भारत में नहीं तो विदेश में। किन्तु इस बात की ज्यादा संभावना है कि इस पर मौलिक काम देश में हुआ होगा कारण हमारे यहाँ इस विषय पर बहुत अंधकार है अतः रिसर्च और नवीन खोज की अपार संभावनाएं हैं।

 

         विदेश में सुपरमैन और स्पाइडरमैन हुए हैं जो फ्लाई करते हैं । हमारे यहाँ फ्लाइंग सिख हुए हैं। फ्लाइंग रानी ट्रेन है। उड़ता पंजाब हुआ है। जितनी भी ‘किस’ होंगी उसमें ‘फ्लाइंग किस’ मैं समझता हूँ सबसे अधिक निरापद है। लेकिन यह किसी को ‘ऑफेंड’ भी कर सकती है। जब किसी से ‘फ्लाइंग किस’ के बारे में विचार पूछे तो उत्तर था “मैं ऐसे निहायत आलसी लोगों से सख्त नफरत करता हूँ।“  आहा ! नफरत ! नफरत हमारी राष्ट्रीय हॉबी है। हम किस-किस से नफरत करते हैं इस पर हर भारतीय ‘माई हॉबी’ टाइप एक निबंध लिख सकता है। टीचर, पड़ोसी, ऑफिस का कुलीग, बॉस, रिश्तेदार आपका लोकल नेता।  कहाँ तक गिनाऊँ।  

Thursday, July 6, 2023

व्यंग्य : पैर धुला लो ! पैर !

  

बचपन में गली-मुहल्ले मे ऐसी आवाजें आम थीं:

 

चारपाई बुना लो! चारपाई !

कलई करा लो! कलई !

चूढ़ियां ले लो ! चूढ़ियां !

 

         अब हमने तरक्की कर ली है। हमारा विकास इतना हो गया है कि अब हम इज़्जत घर और अटैच्ड शौचालय से बहुत ऊंचे उठ गये है। अब हम विमान में सीट पर करते हैं। ज़मीन पर हों तो बंदों के ऊपर करते हैं और फिर उससे ऐफीडेविट भी ले लेते हैं। "मैं शपथ पूर्वक कहता हूं मैंने ही रिक्वैस्ट की थी। मुझे चर्म रोग है। एक वैद्य जी ने यही नुस्खा बताया था।" या फिर  ऐसा कुछ है ही नहीं। यह दृष्टिभ्रम/माॅर्फ/फोटोशाॅप है। और हमारे प्रिय युवा नेताजी को बदनाम करने की विरोधियों की साजिश है। वो तो ये हैं ही नहीं। पूरा सीधी जिला जानता है वो कितने सीधे हैं। शराब क्या वो सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाते।

 

     पर इधर मामा जी ने पैर धोने में कुछ जल्दी मचा दी। डर था कि कहीं तब तक विरोधी दल न अगले के पैर धुला दे। सत्ता में बने रहने के लिये हमेशा पैरों का ध्यान रखना होता है। न जाने कब उखड़ जायें।

 

      आजकल पैर धुलाने की एक फैशन चल निकली है। हांलाकि यह सनातन परंपरा है। माता-पिता, गुरूजन और परम स्नेहियों के पैर धोये जाते रहे हैं। सुदामा के पैर श्रीकृष्ण ने धोये थे। हम पैर धोते-धोते और पैर उखाड़ते-उखाड़ते आज इस विश्वगुरू के आला मुक़ाम पर पहुंचे हैं।

 

         दलित के यहां भोजन ऑउट ऑफ फैशन हो गया। टिफिन पार्टी में भी वो बात नहीं आई। चुनाव सिर पर है। कुछ नवीन करना है। अत: पैर धुलवाने वालों को नेता लोग ऐसे ढूंढ रहे हैं जैसे कंजक बिठाने वाले बच्चियों को ढूंढते फिरते हैं। पैर धुलाने की पूरी वीडियो बनानी होती है। उसे मीडिया में भेजना होता है। वायरल कराना होता है। पैर धोना-धुलाना ही काफी नहीं। कुर्सी के चार पांव होते हैं मगर उसका रास्ता न जाने कितने पांवों से होकर गुजरता है। आखिर उन पांवों के साथ एक जोड़ी हाथ भी होते हैं। अपुन का टारगेट उसी हाथ की उंगली है जिस पर अगले ने बूथ पर मेरे नाम की नीली स्याही लगवानी है। इसलिये कहीं कुर्सी से हाथ न धोना पड़ जाये अत: जहां एक जोड़ी पांव दिख जायें बैठ जायें धोने के लिये। दूसरे मोड़ पर विरोधी भी बाल्टी-लोटा लिये तैयार बैठे हैं।

 

      पैर धुला लो ! पैर !

Friday, June 23, 2023

व्यंग्य: नकल योद्धाओं का सम्मान


         अब समय आ  गया है कि नकल योद्धाओं को समाज में, व्यवस्था में उनको उनका ड्यू दिलाया जाये। नकल के उद्यम में लगे लोगों को इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाये। उनको पेंशन, प्रोविडेंट फंड मेडिकल जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाएँ। यह अब कोई कुटीर उद्योग या लघु उद्योग नहीं रह गया है बल्कि एक विशाल उद्योग होयला है जिसमें लाखों लोग रोज़गार में हैं और नकल उद्योग से अपनी आजीविका चला रेले हैं।


             यह पुराना समय नहीं है जब बस कुछ फर्रे या चिट से काम चल जाता था। अब पूरी की पूरी बुक रखने से भी काम नहीं चलेगा। अन्य फील्ड्स की तरह यह फील्ड भी एकदम हाईटैक हो गया है। एक बार मुझे एक क्रिमिनल लाॅ के वकील साब से मिलवाया गया जिनके बारे में मशहूर था कि वो पूरे केस का ठेका उठा लेते हैं। मुझे कनफ्यूज देख उन्होने बताया वो पुलिस थाने से ही काम करते हैं। एफ. आई. आर. बदलवाना उसमें दफा चेंज करना, दफा हटाना, केस में लूपहोल छोड़ना आदि। एकदम ग्रासरूट एप्रोच है। उसी तरह नकल का काम बहुत मेहनत का काम है।  पेपर लीक करना आसान नहीं होता। बहुत परसिवरेंस चाहिये। बिलकुल हिन्दी फिल्म के इश्क़ में पागल लड़की के अमीर बाप की तरह कहना होता है:

          "इस सूटकेस में इतने पैसे हैं ... ये ब्लैंक चैक़ है इस चैक़ पर जो चाहे रकम भर लो और प्रश्नपत्र वाला एक पेज़ मुझे दे दो  ग्यारह क्या ? इक्कीस मुल्क़ों की पुलिस भी तुम्हें ढूंढ नहीं पाएगी। पचास खोखे...ऑल ओ. के. ?"


       उनका काम एकदम कॉर्पोरेट स्टाइल का हो गया है। मार्केटिंग, लॉजिस्टिक, एकाउंट्स, टेक्निकल टीम, एच. आर. आदि।एच. आर. को सॉल्वर एंगेज करने पड़ते हैं उनका सी. टी. सी. तय करना होता है। एग्रीमेंट साइन कराना आदि आदि। उसी तरह मार्केटिंग टीम को उम्मीदवारों को झूठी-सच्ची उम्मीद दिला दिला कर बीमा एजेंट की तरह शीशे में उतारना पड़ता है। फीस तय करनी होती है। फीस का स्ट्रक्चर फ्लेक्सिबल रखा जाता है। किसी से कुछ, किसी से कुछ, एक की दी हुई फीस दूसरे से काॅन्फीडेंशियल रखी जाती है।  लाॅजिस्टिक वाले साॅल्वर को समय पर सेंटर पर पहुंचाने का काम करते हैं। उनके आराम का ध्यान रखते हैं। फाइव स्टार होटल में उन्हे रुकवाया जाता है। और उनके विज़िट को पूरी तरह सीक्रेट रखा जाता है। वैसे सिंगल विंडो पॉलिसी के अंतर्गत ये लोग मेडिकल आदि भी कराते हैं नहीं तो एक्स-रे वालों ने ही गड़बड़ बता कर आपको फेल कर देना है।


            अपने नवीनतम डायवर्सिफिकेशन प्लान में ये अब जनरल को एस. सी., एस. टी., ओ. बी. सी. सर्टिफिकेट भी उपलब्ध कराते हैं। ए टू ज़ेड सर्विस, कंप्लीट सैटिस्फैक्शन गारंटीड, सबका अलग- अलग रेट है। ई. डब्लू. एस. वालों के लिए आसान ई. एम. आई. का भी इंतज़ाम है। ई. एम. आई. रिकवरी की टेंशन नहीं, बस एक कम्प्लेन्ट और नौकरी गई, पोलिस का लोचा अलग। 


           मेरा सरकार से निवेदन है। निवेदन क्या आग्रह है। इस उद्योग में लगे लोगों की सुधि लें। उनकी सर्विस कंडीशन सुधारें। निष्पक्ष देखे ! वे कितने पुण्य का काम कर रहे हैं। आपके इंटरव्यू खत्म कर देने से इनके ऊपर कितना लोड आ गया है। अब सारा दारोमदार लिखित परीक्षा पर ही है। बेचारे हमेशा प्रेशर में रहते हैं। कभी इस परीक्षा का पेपर आउट कराओ, कभी उस परीक्षा का। 24 बाई 7 काम, काम, काम।  ये उच्च शिक्षित बेरोजगार साॅल्वर्स को बड़ी तादाद में नौकरी दे रहे हैं। जिन्हें आप नालायक बेरोज़गार कहते हैं उनको वो 'लायक' बना आपके दफ्तरों में बाबू, स्कूलों में टीचर, अस्पतालों को नर्स, डॉक्टर, इंजीनियर दे रहे हैं। दे रहे हैं कि नहीं ? 


            खाली-पीली योद्धा कहने भर से योद्धा नहीं हो जाते हैं आप खुद देखें कितनी मेहनत का काम है। साला ! ये सोशल-सर्विस कभी किसी युग में आसान नहीं रही। कृपया इस असंगठित क्षेत्र की और उपेक्षा न करें। 


            नकल योद्धा ज़िंदाबाद!