Ravi ki duniya

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Wednesday, August 26, 2026

व्यंग्य: फर्स्ट ए.सी. में चूहे ने बुजुर्ग को काटा

 

    एक प्रीमियम ट्रेन में चंडीगढ़ से इंदौर जा रहे बुजुर्ग को एक चूहे ने नाक पर काट लिया। वे फर्स्ट ए. सी. में ट्रेवल कर रहे थे।  पहला ताज्जुब तो उन्हें यही हुआ होगा कि आखिर चूहे भी अब फर्स्ट ए.सी. एफोर्ड करने लग गए हैं। यह कितनी सुखद स्थिति है। नहीं तो बेचारे गुड्स ट्रेन अथवा जनरल कोच में ही मुंह मारते फिरते थे। या फिर ले दे कर वही पिट-लाइन, वही क्लोक रूम, केंटीन तथा ट्रैक। बहरहाल, बुजुर्ग की नाक से खून बह रहा था वे किसी सेमिनार के मूड में नहीं थे। अतःवह चीखते-चिल्लाते रहे मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। तभी किसी सुजान ने सुझाया: आप ये सब छोड़ें आप तो एक्स पर शिकायत करें और मंत्री महोदय को टैग करें। तब होगी सुनवाई। और ऐसा नहीं है सुनवाई नहीं हुई। सुनवाई हुई। बस ये है कि सुनवाई होते-होते ट्रेन आगरा आ गयी। उनका तुरंत से पहले प्राथमिक उपचार किया गया। रेलवे में आप जनरल कोच के यात्री हों, सेकंड क्लास के यात्री हो अथवा फर्स्ट ए.सी. के ही क्यों न हों। आप सबको मिलती फर्स्ट क्लास फर्स्ट-एड ही है। जिसे हिन्दी में प्राथमिक उपचार कहते हैं। बोले तो सबको बिना भेदभाव प्रथम।


    अब ये भी है कि जो एक्स पर शिकायत करना जानता है वह चुप तो बैठेगा नहीं। जरूर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा। नहीं तो किसी जान-पहचान के या पड़ोसी पत्रकार को अपनी ‘चूहा-कहानी’ बताएगा। पत्रकार ने उठा कर छाप देना है। अतः सबने सलाह की, क्या किया जाये? इस चूहा स्थिति से कैसे निपटा जाये। तुरंत से पहले जनसम्पर्क अधिकारी का बयान आ गया वह भी लिखित में प्रेस विज्ञप्ति के तौर पर। दरअसल आजकल बात बात में ब्रांड एम्बेस्डर बनाने की प्रतियोगिता सी चल पड़ी है। कोई काय चीज़ का ब्रांड एम्बेस्डर है तो कोई और काय चीज़ का। आप तो ये बताओ! किस चीज़ का ब्रांड एम्बेस्डर इस बाजारवाद ने हमें मुहैया नहीं कराया। एक बेचारे चूहे ही हैं जिन का कोई ब्रांड एम्बेस्डर नहीं है। जो उनके हक़ में बयानबाजी कर सके।


    जनसम्पर्क अधिकारी ने बड़े नाप-तौल के साथ, सावधानी से ड्राफ्ट किया बयान जारी किया। उनका कहना है कि ट्रेन में चूहेरोधी उपाय किए गए थे। उन्होने न तो चूहेरोधी उपायों की संख्या दी है, न ही चूहों की अनुमानित अथवा कनफर्म संख्या दी है। लगता है अन्य वैज्ञानिक प्रयोगों की तरह एस.आई.आर. का प्रयोग चूहों पर पहले ही किया जा चुका है और सफल पाया गया होगा। तभी केवल मताधिकार वाले चूहे ही ट्रेन में वो भी फर्स्ट ए.सी. में यात्रा कर पा रहे होंगे। बाकी अभी भी अपने-अपने स्टेशनों पर यात्रियों द्वारा और केंटीन से फेंके हुए भोजन को खाने को बहिष्कृत हैं। जनसम्पर्क अधिकारी राजदूत की तरह वह ईमानदार शख्स है जिसे अपनी रेलवे के लिए सच्चा-झूठा बोलने का गुरुत्तर भार दिया जाता है। उसकी सफलता का राज़ यही है कि वह कैसे बात को बात-बात में बात ही न रहने दे। बात तो तब है जब बात करते करते बात बन जाये।  इसका मतलब उस अधिकारी में वह बात अभी आई नहीं। अंत में ज.स. अधिकारी ने सारी गलती यात्री/यात्रियों पर डाल दी है।  दरवाजा खुला छोड़ दिया चूहे ने तो आना ही था। वो अंग्रेज़ी में कहावत है न ‘एक खुला दरवाजा संत को भी बुलावा है’। अब चूहा  कोई संत भी नहीं। ज. स. अधिकारी ने जो नहीं कहा वह ये है:


    चूहे को कल सुबह ग्यारह बजे ऑफिस में बुलाया गया. उसकी काउन्सलिन्ग की गयी। उसे बताया गया वह आगे से कृपया ध्यान रखे फर्स्ट ए.सी. में नहीं चढ़ना है। अगर चढ़ भी गया है तो बुजुर्ग को नहीं काटना है। अगर बुजुर्ग को काटा भी है तो बुजुर्ग की  बुजुर्गियत से भरी नाक पर नहीं काटना है। और नाक पर काटने की इतनी ही चुल मची थी तो काट कर तुरंत बिहारी हो जाना चाहिए था ताकि हम इसे  विवादास्पद बना सकते। यह चूहा नहीं है यह तो आपकी नकसीर फूट गयी है अथवा आपकी नाक के अंदर ही कोई फुंसी रही होगी जो आपने नींद में खुजा ली और अब लगे रेलवे को भला बुरा कहने।


               आगे से लिखना होगा “यात्री अपनी नाक की रक्षा स्वयं करें। रेलवे अपनी नाक                 की रक्षा करे या आपकी?”

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