कितने
रंग भरे थे सपनों मे हम-तुमने
पता
नहीं कब में हो गई ज़िंदगी बेरंग मेरी
कभी
ज़ुल्फ बिखरा, कभी पलकें झुका
मुस्कराने
भर से जीती तुमने मुझी से जंग मेरी
साँस
लेने पे न जा, मेरे मुस्कराने पे न जा
ये
पूछ कहाँ खो गयी वो ज़िंदादिल
उमंग मेरी
मैं
अकेला कब था तेरी कायनात मे ?
बदनामी, नाकामी रही सरे-राह संग मेरी
मैं
तुम्हारे इस खेल में शामिल न था
तुमने
ढील देकर काटी है पतंग मेरी
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