Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Wednesday, July 6, 2016

व्यंग्य किस्सा-ए-साला ज़ीजा

साला कोई गाली नहीं ये तो यूँ ही प्यार दुलार में कहा जाता है जब किसी को बहुत सम्मान देना हो तो इस संबोधन का प्रयोग किया जाता है। साला पूरणतः स्वदेशी है । संस्कारी है। समस्त ब्रहमांड में प्रत्येक किसी न किसी का साला है। यह संबोधन हमें विश्व से जोड़ता है। आप तो जानते ही हैं आज समस्त संसार में भारत का जो साल्सा हो रहा है। यह जीभ का योगासन है। साला कहने में जीभ पहले तालू से लगती है फिर वापस आती है। यह एक प्रकार का जीभ से किया गया सूर्य नमस्कार है।साला रिश्तों की सरगम का पहला सुर है। सा ...... ज़िन्दगी की रागिनी यहीं से शुरू होती है। महाभारत काल से ले कर मुगल काल तक और मुगल काल से ले कर वर्तमान तक तारीख गवाह है सालों ने बहुत ही महत्ती भूमिका निभाई है। फिर चाहे वह परिवार में हो। दरबार में हो। या फिर सियासत के दाँवपेच में हो। जो सत्ता में हैं जीजा तो बस वे ही हैं बाकी सब खासकर विपक्षी तो सब साले ही हैं। अब चाहे ये संबध पाँच साला ही क्यों न हों। पब्लिक चुनाव में फिर चुनती है कौन कौन जीजा बनेगा। कौन कौन साला। भाईयो और बहनों ! ये तो बस पाँच साले यानि कि पँच वर्षीय संबध हैं।
 
आदरणीय गृह मंत्री जी ने यह भी कहा है कि उनकी तो आदत है ऐसे कहने की। इसमें बुरा मानने की क्या बात हो गई। दरअसल ऐसा कह कर उन्होंने पूर्व प्रधान मंत्री की इज्जत बढ़ाई है। वे कह सकते हैं कि उनके जीजा श्री सूबे के होम मिनिस्टर हैं। साथ ही अपनी इज्जत अफजाई की है वे कह सकते हैं कि मेरा एक साला सालों तक हिन्दुस्तान का पी एम रहा है।
 
श्री श्री गुलाब चंद जी चंद दिनों की बात है फिर पब्लिक ने डिसाइड कर देना है कौन साला बनेगा कौन जीजा। ताज्जुब इस बात पर भी है कि किसी ने अभी तक ये बयान नहीं दिया कि तुमने भी तो साठ साल में कितनी बार हमें साला कहा था या साले से भी भारी भरकम डिगरियों से नवाजा था। 

जहां तक बात गुलाब की है तो मित्रो !

" गुम हो गये शख्स ईमान ओ आबरू वाले
अब गुलाब कहाँ मिलते हैं खुशबू वाले "

Saturday, May 28, 2016

Parikh Uncle !



                                                         
Essentially, he was a loner, driven to despair. His wife and he only daughter had long deserted him to migrate to USA. They kept little contact with him. He was employed in Railways and was posted on a division where I too had served. Apart from a loner and a diehard pessimist, over a period of time he became a shirker also—a classic shirker that is. He was the butt of all kind of jokes in his ‘friends’ circle. One would say ‘Sir! Parikh had once decided to go to USA..he went to the airport also just when his plane was about to take off, this air hostess recognized him and Parikh was thrown out’. Since his family was hardly keeping any contact with him, he was constantly wearing this sham..last night he had a talk with his family ..his daughter wrote a long letter to him etc. However, those who knew him knew that he is making up all these stories as Parikh would lose track as to how many times he has narrated the same story over and over again to the same audience.


One day, his immediate supervisor, a Chief Office Superintendent was on leave, so I had called Parikh—the second in command.


     Me : Parikh ! I want to give this special assignment to you


     Parikh : Sir ! My Chief OS is on leave, he will be back on Monday. I will ask him to meet you.


     Me : (sensing that he is trying to escape) No ! No! I want to give this task to YOU ONLY.


     Parikh : Sir ! I am always ready but only thing is I will be leaving for USA as my family is there

(in    early 1980s ones’ family being in USA was yet to become a commonplace thing like today, suitably impressed, I offered him to sit—a rare gesture in Railway babudom hierarchy . Nonetheless, Parikh sat with ease he had sensed that he has succeeded in impressing me with his USA story)


Me : When are you leaving for USA ?


Paikh : (cautiously) Sir ! Next month


Me : So what ? This task is hardly of a week


Parikh: (True to his reputation) but sir I will be taking leave off and on…come for few days again take leave for preparation and packing


Me: (By now I was getting annoyed at his unashamed attitude of shirking) OK go!


Parikh : ( While leaving) Sir ! I would have done it but for my ensuing USA trip


It is said Optimism is pretty infectious; in this case, Parikh’s pessimism was quite infectious. One day a young lady staffer, a new recruit who was getting married to a guy in Bombay came to me “Sir! Please guide me I am seeking transfer to Bombay” I assured her of official cooperation. “But sir! Parikh uncle says don’t go to Bombay as the HQ itself is very soon going to be shifted from Bombay to Ahmedabad.. (There was this rumor that Gujarat is demanding to shift Western Railways HQ from Bombay to Ahmedabad) I laughed and assured the lady don’t worry there was no such move in foreseeable future. She was duly transferred to Bombay and in course of time retired from Bombay unshaken and unstirred. HQ remains in Bombay for all these decades.
  

So Parikh uncle was such a slippery and pessimistic character, took pride for all wrong things in life for example he would boast he opens his pen only for signing muster and receiving pay cheque. Often he would not carry pen and borrow from his colleague seated at the neighboring desk.


I came to know finally Parikh uncle retired and is settled very much in India only. Needless to say that he could never even once board the flight to USA… reason? May be hostile air hostess or unreasonably cruel visa authorities or due o sheer indifference of people whom he referred to as his family throughout his working life.


We all have Parikh uncles in our office, in our neighborhood and at times among our own kith and kins. No?

Monday, May 2, 2016

व्यंग्य : खुला पत्र चितचोर श्री माल्या के नाम


हे माधव ! ये मैं क्या सुन रहा हूं कि आपको डर है कि कहीं आपके दिल्ली उतरते ही लोग आपको तिहाड़ में न डाल दें. सर जी ! कर दी न दिल तोड़ने वाली बात. इसका मतलब फिर तो आप दिल्ली और हम दिल्ली वालों को समझे ही नहीं. सर जी ! तिहाड़ दिल्ली की पहचान नहीं. दिल्ली दिल वालों की है. आपका भी क्या कुसूर ? आपको वादियों में, समुद्र तटों से और सागर पर हिचकोले लेती ‘याट’ से और गगन विहार के श्रम साध्य क्रिया कलापों से दो क्षण फुरसत के मिलते, तो न दिल्ली की नब्ज़ पहचानते.

हे नंदनंदन ! मैं दिल्ली का रहने वाला हूं, मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि आपका बाल भी बाँका न होगा. आपने वो कहावत नहीं सुनी जाको राखे साईंया....कौन नासमझ और मूढ़ कहता है कि अच्छे दिन नहीं आये. हे गिरधर गोपाल ! आप खातिर जमा रहें ये लीला..ये खेल तमाशा यूँ ही चलता रहेगा कभी आपका पासपोर्ट रद्द होगा, कभी बहाल होगा.

हे कुंज विहारी ! गोया कि आपको वन-वन...कुंज कुंज केलि करने को पासपोर्ट दरकार है क्या ? ये व्यवस्था बावली आपकी लीला समझने में नितांत असमर्थ है. “होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे..” आपके केस ने इनका वही हाल किया है जैसे कि बावले गाँव में ऊंट आया समझो. सब अपनी अपनी हाँक रहे हैं. फिर इन्हें कोऊ और काम भी तो नहीं. चैनल चलने हैं. अखबार चलाने है. विपक्ष को भी कछु न कछु बोलन कू परि. परि कि न परि ?

हे राधावल्लभ ! कलैंडर सृजनहारी ! ये पैसा, ये धन सम्पति क्या है ? हाथ का मैल है. क्या तेरा क्या मेरा..दुनियां चार दिन का रैन बसेरा
.
हे चार्वाक के दर्शन वाहक ऋषिवर ! ज़माने को अभी सदियां लगेंगी पार्थसार्थी आपको और आपकी लीला को समझने में. हे प्रजापति ! कभी क्लीन शेव, कभी हाइकू, कभी फ्रेंच कट, कभी करीने से छँटी हुई फुल दाढ़ी...ये जीवन है... इस जीवन का यही है.... यही है.....


हे यदुराज ! आपके सहस्र रूप, आपको कोटि कोटि बल्कि यूँ कहिये साथ हज़ार पाँच सौ करोड़ बार प्रणाम. लगे हाथों तिहाड़ की भी बात कर लें. हे गगन विहारी ! आपको पता नहीं तिहाड़ में क्या क्या नहीं उपल्ब्ध ? आप तो बस अपनी ‘डिजायर’ बताईयेगा वहाँ ‘हुकुम मेरे आका’ कहने वालों को आपको ढूंढने नहीं जाना पड़ेगा. वे स्वयं आपसे सम्पर्क साध लेंगे. यक़ीन न हो तो सहारा श्री से पूछ देखियेगा

हे सोमरस सौदाई ! आपके द्वारा निर्मित सोमरस के विभिन्न विभिन्न पेय पदार्थों से ही ये विश्व चलायमान है, गतिमान है, शक्तिमान है, आपसे बेहतर इसे कौन जानता है. आपने जैसे ही भृकुटि टेढ़ी की और कहा कि ओये कलम घिस्सू पत्रकारो ! वो दिन भूल गये जब चाटुकारों में प्रथम आने की रेस में शामिल थे तुम सब. वो सुरा वो सुंदरी...आपने जरा सा ही हिंट दिया था कि आपके पास सबके स्टे और पीने ठहरने का रेकार्ड है तो बस सब को साँप सूंघ गया. हे विश्वकर्मा ! सब ऐसी चुप्पी लगा गये कि जैसे आपसे वाकिफ ही नहीं. हे बंसी बजैया ! आप तो बस ऐसे ही बजाते रहो..बजाते रहो 

हे हैट, सिगार, विचित्र वस्त्र धारक ! आप किसी बैंक, किसी संस्था के ऋणी हैं ? ये मिथ्या कथन है. उल्टा ये देश, ये समाज आपका ऋणी है और सदैव ऋणी रहेगा. आपने कैसे कैसे कीर्तिमान स्थापित किये हैं. भला आप यदि करोड़ो न खर्च करते तो क्या राष्ट्र की धरोहर टीपू सुल्तान की तलवार देश में वापस आ सकती थी ? कदापि नहीं. आप देश के लिये पैसा बीयर की तरह बहा कर देश का नाम ऊँचा और ऊँचा कर रहे हैं, जबकि कुछ छुद्र मानसिकता के लोग यहाँ हाय तौबा मचाये हैं. हाय भाग गया..भाग गया. ये मूर्ख क्या जानें कि ‘वर्ल्ड इज योर ऑयस्टर’ इन्होंने ‘चेतक’ वाली कविता नहीं पढ़ी “राणा की पुतली फिरी नहीं, तब तक चेतक मुड़ जाता था।..... है यहीं रहा, अब यहां नहीं, वह वहीं रहा था यहां नहीं। थी जगह न कोई जहाँ नहीं” अगर कोहिनूर की नीलामी हो तो हे लक्ष्मीपति ! एक आप ही हैं इतने दैदिप्यमान और विशाल एवं उदार हृदय जो कोहिनूर भी देश में वापस ला सकते हैं. किसी और मैं इतना राष्ट्र प्रेम और जिगरा नहीं. पिछले 200 साल से हाथ पर हाथ रख कर खाली पीली गाल बजाते रहे हैं.

हे त्रिकालदर्शी ! अब उन अल्पतम वस्त्र धारिणी सुंदर तरुणियों का क्या होगा. न कलैंडर रहा न हवाई सुन्दरी ही बने रह पाये...अब उन्हें पिक-निक पार्टियों पर कौन ले जायेगा. वे बावली हो क्लब-क्लब, कॉकटेल-कॉकटेल साज श्रंगार विहीन हो अपनी सुधि-बुधि खो विलाप करती घूम रही हैं.

“ वीजू वीजू पुकारूं मैं वन में .....मेरा वीजू बसा मेरे मन में”

हे नटवर नागर ! तुमने माखन तो खूब ही खा लियो है. ‘ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल बीच में धरती वाह मेरे मालिक तू ने किया कमाल’ जब आकाश में आपकी विमानों की श्रंखला अठखेलियां करती थी तो बरबस यक़ीन ही नहीं होता था कि हवाई सुंदरियों की वजह से विमान हिचकोले खा रहा है या विमान की वजह से हवाई सुंदरियां अठखेलियां खा रही हैं. उसी तरह समुद्र के विशाल सीने को रौंदती आपकी आधुनिकतम श्वेत याट जैसे कि समुद्र में ताजमहल प्रकट हो गया हो.

हे त्रिपुरारी ! भारतीय सदैव आपके ऋणी रहेंगे आपने उन्हें एक नयी जीवन शैली से परिचित कराया है. ये ज़ाहिल लोग न तो ज़िंदगी जीना जानते हैं न ही जीवन की रंगीनियों से वाक़िफ हैं. आपने सहज ही इन्हें शिक्षा दी है कि जीवन का असली ध्येय क्या है. आज को पूरी तरह जी लेना ही जीवन है. कल किसने देखा है. ये एक आधुनिकतम और नवीनतम जीवन दर्शन है.

हे मधुसूदन ! मेरी राय मानें तो अब वक़्त आ गया है कि आप अपनी एक नयी पार्टी बना लें. क्या रखा है महज़ एम.पी.गिरी में . पार्टी का नाम होगा बी.एम.पी. ( भारतीय मौज़ा पार्टी ) हर राज्य, हर ज़िले में इसके ऑफिस होंगे और आपकी कलैंडर गर्ल्स तथा हवाई सुंदरियां जो वैसे ही आपके विदेश गमन से व्याकुल और बेरोज़गार हो गई हैं को सदस्य बनाने का काम सौंपा जायेगा. देखते देखते पार्टी की सदस्य संख्या आकाश न छू ले तो कहना. आपने महान कार्यों को सम्पन्न करने को जन्म लिया है. 

हे चतुर्भुज ! अजेंडा में पहला आइटम होगा ये मद्य निषेध, शराब बंदी जैसे काले कानून का खात्मा. यह बचकाना क़ानून है, मानव प्रकृति के खिलाफ है, व काऊंटर प्रोडक्टिव है फिर अपने को अगले चुनाव की स्ट्रैटेजी बनानी है. सभी सीटों पर पार्टी अपने कैंडिडेट्स उतारेगी. जहां ये 30 प्रतिशत को रो रहे हैं और आज तक अचीव नहीं कर पाये हैं वहीं हमारी पार्टी 70 प्रतिशत भद्र महिलाओं को टिकट देगी. मर्दों की एंट्री कमसेकम रखें. वैसे ही रौला पाते रहते हैं. इससे आपकी छवि और निखरेगी. अबला, लाचार और ज़रूरतमंद महिलाओं के एक मात्र उद्धारक एक मात्र मसीहा बन के उभरोगे आप.

हे देवकी नंदन ! चुनाव 2019 में होना है. बड़ा काम पड़ा है. शाम को वीडियो कॉन्फ्रेसिंग में तफसील से बातें होंगी.

पी.एस. : हे कंजलोचन ! आप हमें करते हो कि नहीं ये तो पता नहीं लेकिन हम आपको और आपके जैसों को ही डिजर्व करने को अभिशप्त हैं इस बात का हमें पूरा यक़ीन है

Thursday, April 14, 2016

व्यंग्य : अहा ग्राम जीवन


आज सुबह सुबह हवा में बहुत ताजगी थी. आप पॉल्यूशन की बात कर रहे हो जबकि हवा ऐसी ताज़ा ताज़ा थी कि लगता था किसी गाँव की फिंज़ा में सांस ले रहे हैं. कोई धुआँ नहीं. सड़क साफ सुथरी...न कोई ट्रैफिक जाम न कोई और ट्रैफिक प्रॉब्लम. गाड़ियों की भरमार की बात कर रहे हो आप, वहाँ इक्का दुक्का कोई कोई कार दिख जाये तो दिख जाये नहीं तो दूर दूर तलक गाड़ियों का कोई नामोनिशान नहीं था. सब जगह ग्रामीण परिवेश नज़र आ रहा था. आप मॉल, ऑफिस और क्लब की बात कर रहे हो वहाँ पूछा तो सब बता रहे थे नहीं नहीं ये सब यहाँ नहीं चलता. यहाँ मंदिर है. माता का मंदिर है. शिवजी का मंदिर है. हनुमान मंदिर भी है. मगर ये होटल क्लब संस्कृति यहां देखने को भी नहीं मिलेगी अब.

आप साप्ताहिक हाट की बात करो तो वो तो है. शाम होते ही लोग-बाग घरों में घुस जाते हैं. पूजा पाठ में समय बिताते हैं. चारों ओर से कीर्तन और सत्संग की आवाजें घंटों और आरती की ध्वनियां ही सुनाई देती हैं.


लोग बाग बहुत ही धार्मिक किस्म के हो गये हैं. सब ओर ग्रामीण वस्त्रों में ही दिखाई देते हैं. बेहद ईमानदार हो गये हैं. पानी पीने को माँगो तो लस्सी देते हैं दूध माँगो तो खीर देते हैं. सब दिन भर खेत पर खटते हैं. या पशु चराने दूध दुहने में अपना अपना समय बिताते हैं. सब जगह खुशहाली ही खुशहाली है. कोई आपा धापी नहीं है. ज़िंदगी 35 किलो मीटर की रफ्तार से चल रही है. जब से मिला संतोष धन सब धन धूल समान हो गये हैं.


आप क्राइम की बात कर रहे हो यहाँ थानों को बंद करने की नौबत आ गयी है. कोई क्राइम नहीं, कोई चोरी चकारी, डकैती, नहीं. बलात्कार ? बलात्कार ? वे के होवै सै ? बावला हो रहे कै ?. यहाँ छोरियों की तरफ देखैं भी न हैं लोग. यहाँ कोई किसी को छेड़ै भी न हैं. अब तो नौबत ये आन पहुंची है कि छोरा छोरियां को छेड़ने छिड़ाने को दिल्ली जाणा पड़ै है.


मैंने पूछा ये सब चमत्कार कैसे हो गया ? उन्होंने बताया आप अखबार टी.वी न देखते दीखै ..... अरे बावड़ी बूच ! इब ये गुड़ग़ाँवा कोई न रह गया इब ये गुरू ग्राम हो गया सै...आई बात समझ मैं या बजाऊँ लठ्ठ दो ?

Monday, January 11, 2016

HUMOR: LTC…… Lage Raho !



Government in general and its Babus in particular never cease to amuse you. They assure and reassure you so that you are never disappointed on their account. The latest novelty is a lofty idea floated; I am sure, by some Babu endorsed and accepted by other Babus as a panacea that now onward it would be compulsory to enclose photographs of places you visited on Government LTC for LTC claim. Ha...ha... I am sure only a brilliant Babu can come up with such a grand and glorious idea. The idea is taller than Qutab Minar,whiter than Taj Mahal, larger than Periyar sanctuary, prettier than Goa beaches and wilder than Andaman & Nicobar.

LTC has always been a source of enjoyment and entertainment in more ways than one. The great turning point in this field came when a creative Babu expanded the scheme, hitherto, limited to train services to accommodate buses to avail of the bonanza called LTC. Overnight in the by lanes of busy bazars pigeon hole cabins of travel & transport firms mushroomed offering you most comfortable ride of your life to sea shore of Kanyakumari to wilds of Andaman plus pilgrimage to all the holy and not so holy places.

On a close parley behind closed doors it was divulged that you need not go anywhere, all the paper work will be fuzzed by your friendly travel agent for you on a nominal fee. The paper work would be complete and so impeccable that the best of sleuths in babudom can’t pick holes. I was really impressed and amazed at the ingenuity. For ultra timid babus, there was this ‘receipt’ of darshan & prasadam of a far flung popular temple in southernmost tip of south India. Of course, on payment of extra fees. It didn’t end there. If you so desired, even a police challan of some obscure traffic violation could be arranged of the desired/visited city.


Now this is what I call ‘Future technology’ even NASA would be envious of. Without moving from the comforts of your abode you have visited and seen so many distant places of tourist interest. In an office, I know of, two travel agents had reaped the moolah by supplying forged tickets and documents to hundreds of arm chair travel enthusiasts. The truth was these travel agents had just one rickety bus each in their fleet. The bus was too aged and junkie to move about. When this LTC scam was discovered (more than 30 years back) it was simply swept under the carpet in a hush hush manner because ‘judge & jury’ too had availed of the similar facility from the same tour operators.

Then came an initiative first by private sector and later some progressive PSUs too adopted it. You take certain lump sum amount and be done with it. You go ...don’t go, not our look out. Case closed.

Latest innovation in LTC series (like you have had PSLV series) is that you are required to attach photographs of the places you claim to have visited. Bravo! But in today’s graphic design and photo shop age it just goes on to show that we have not learnt from Happy Singh of Lage Raho Munna bhai. A real pin head scheme bound to result in far too many happy happy Happy Singhs.

Monday, November 16, 2015

व्यंग्य: ये कैसा धमाका...कैसी रिपोर्टिंग ?


फ्रांस में गोली बारी से सैकड़ों लोगों ने जान गँवा दी. आतंकवादी ढेर हो गये और उनके साथियों की पकड़-धकड़ जारी है. मगर न जाने क्यूं मुझे लगा कि कोई रिपोर्टिंग ठीक से नहीं हुई. फ्रांस के रिपोर्टरों को हमारे काबिल, रिपोर्टरों से अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है. जैसे कि “ आपको कैसा लग रहा है ? “ आपने क्या देखा ? उसके दाढ़ी थी या नहीं ? वो कितने लोग थे. ? आपको क्या लगता है वो किस पार्टी, आई मीन किस देश के लग रहे थे ? किस भाषा में बात कर रहे थे. ? चलिये अपने संवाददाता जो घटनास्थल पर सुबह तड़के से ही हैं से बात करते हैं. आप हमें सुन पा रहे हैं ...राम खिलावन ..क्या देख रहे हैं आप ? अब कसा माहौल है वहाँ ? हमारी किसी चश्मदीद से बात कराइये. लगता है हमारी आवाज उन तक पहुंच नहीं पा रही है.

उधर दूसरे चैनल पर कुछ सफेद बालों वाले, वेले किस्म के पेशेवर बुद्धिजीवी जो 50 साल पहले रिटायर हो गये थे, बैठे आँकड़ों की जुगाली कर रहे हैं. “ जब दक्षिण पूर्व एशिया में सन चौरासी में ऐसी ही घटना पहली बार हुई थी......मैंने खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री को कहा था......”


तीसरे चैनल पर प्रमुख राजनैतिक दलों के स्पोक्स पर्सन एक दूसरे के कपड़े फाड़ने को तत्पर थे. आप 50 साल से सत्ता में आपने क्या किया ? आज हमसे हिसाब माँगने चले हैं . कितने ही हज़ारों बेगुनाहों कि जान गई. आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे. बल्कि कुछ में तो आपके बड़े बड़े नेता खुद ही आज तक फँसे हुए हैं. हमारे कार्यकाल में तो महज़ कुछ सैकड़ों की ही जानें गई हैं. जाँच चल रही है. गुनाहगारों को बख्शा नहीं जायेगा. हम छोटे राजन को ले आये हैं बाकी के राजनों बड़ा राजन, मंझला राजन उन सब को भी लायेंगे. आपकी तरह नहीं.
 


चौथे चैनल पर कुछ लेखक, कलाकार बैठे अपने अपने पुरस्कार वापस करने आये थे जबकि कुछ उन्हें किसी न किसी पार्टी का दलाल बता रहे थे. आप तब कहां थे जब नादिरशाह ने दिल्ली में क़त्ले आम मचाया था ? आपने तब क्यों चुप्पी साध ली थी ? . तब पुरस्कार वापस क्यों नहीं किया ? . जब रज़िया सुल्ताना को बेरहम डकैत मार गये थे ? . देखिये देखिये आप मिक्स मत करिये इसमें सेंटर का क्या लेना देना. लॉ एंड ऑर्डर स्टेट का सब्जेक्ट है. जनता सब जानती है. आप की बिहार चुनाव में क्या गत हुई है वैसे ही पूरे देश में होगी.


पांचवे चैनल पर “ आपको पता भी है अरहर का क्या भाव है. प्याज किस भाव बिक रही है. आपकी ग्रोथ रेट को क्या आम आदमी ओढ़े या बिछाये.”

छठे चैनल पर “ हम बहस से भटक गये हैं ... बात फ्रांस के पेरिस शहर में गोलीबारी की हो रही थी. ये प्रधान मंत्री को क्या पड़ी है इतने विदेशी दौरे करने की. वो भारत के प्रधानमंत्री हैं या ब्रिटेन के ? . जहां जहां जाते हैं आतंकवाद पर ऊल ज़लूल बयानबाज़ी होती है, उस से आतंकवादी और चेंट जाते हैं और नाराज़ हो कर, चिढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. हमें बेकार की बयानबाजी से बचना चाहिये. हम हिंदुस्तानी हैं. हमारे देश के नाम में ही हिंदु शब्द है. जो अपने आपको हिंदु नहीं समझता वह देश छोड़ कर जाने को तैयार रहे. मंदिर का निर्माण हो कर रहेगा. हम इसके लिये प्रतिबद्ध हैं.”


सातवें चैनल पर “फ्रांस ने बहुत अत्याचार किये हैं. हज़ारों स्वतंत्रता सेनानियों को बैस्टिल की जेल में बंद कर दिया था. भोली भाली जनता के ऊपर गिलोटिन चला दी थी. मेरी एंटॉयनेट ने तो लोगों की ग़रीबी मज़ाक बनाते हुए यहाँ तक कह दिया था कि अगर उनके पास रोटी नहीं है तो वे केक क्यों नहीं खाते हैं. लोग भूले नहीं हैं वो सब अत्याचार.


आठवें चैनल पर “ हम सबको आतंकवाद से लड़ना है. इसके लिये हमें एक होना है. और आतंकवाद की लड़ाई पड़ोस से ही शुरू करनी है. हम सहन नहीं करेंगे. हम कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हैं. आप चाहें तो हम पेरिस जा कर भी ये बात कह सकते हैं ! बाई द वे कब की फ्लाइट है ? . सुना है आप स्पॉन्सर कर रहे हैं ? ख्याल रखियेगा. पिछली बार मेरा हमनाम एक मद्रासी रविंद्रन चला गया था. मैं दिल्ली वाला रविंदर हूं., ...जैसे धरमेंदर, सुरेंदर और हाँ ! अच्छा याद दिलाया.... नरेंदर

Tuesday, November 10, 2015

व्यंग्य : शत्रुघ्न अकेले नहीं


जी हाँ शत्रुघ्न सिन्हा अकेले नहीं जिन्हें मोदी और अमित शाह जी ने बिहार चुनाव के दौरान बुलाया नहीं. मुझे भी नहीं बुलाया. और अब रिजल्ट देख लो. पार्टी में वरिष्ठों (बूढ़े नहीं) की अनदेखी करोगे तो यही होना है. मैंने इत्तिला भी भिजवाई कई बार कि इन दिनों मैं खाली हूं, पार्टी चाहे तो चुनाव प्रचार के लिये, प्रचार सभाओं में मेरी ओज़मयी वाणी और लटकों झटकों का इस्तेमाल कर सकती है. मगर न जी ! वहाँ न रेंगनी थी, न रेंगी किसी के भी कान पर जूँ . अब भुगतो नतीज़ा. मैंने भतेरा कहा था कि मैं पिछली बार की तरह आप की शान में कवितायें सुनाऊंगा. प्रतिद्वंदी की हास्य रस की चुटकियों से ऐसी तैसी कर छोड़ूंगा, पर नहीं, पता नहीं क्यों किसी को भी इस बार ये आइडिया भाया ही नहीं और बात–बात में मेरा ही मखौल उड़ा दिया यह कह-कह कर कि “ वाट एन आइडिया ”.

मैंने कहा भी था कि मुझ जैसे इंसान पर भी नैतिकता के चलते प्रेशर आ रहा है कि मैं अपना पुरस्कार वापस कर दूं... वो तो भला हो व्यव्स्था कि मैंने कोई पुरस्कार कभी लिया ही नहीं (सच तो यह है मुझे कोई पुरस्कार मिला ही नहीं) कि जिसे लौटाने का कोई कैसा भी दबाव रहता


अमित अपने को अमिताभ बच्चन ही समझने लग पड़े हैं . अरे भैया फिल्मों में ठीक है. ऊ कहा कहते हैं “ हम जहाँ खड़े हो जाते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है ” यह पोलिंग बूथवा की लाइन है. यहाँ ऊ सब नहीं चलबे करता है. कितनौ ही बार इशारा तो दिये थे पर आप न जाने कौन दुनियाँ में थे. “ पीटर ! अब ये ताला मैं तुम्हारी जेब से चाबी निकाल कर ही खोलुंगा” यहाँ ये सब नहीं न चलता है. जब अपना ही ‘बिकास’ के लाले पड़े हों तब स्टेट के बिकास की बात समझ से परे है.


अच्छा हम तो यहाँ तक कह दिये थे कि आप को कविता कहानी का शौक़ नहीं कोऊ बात नहीं हम ‘बिरोधी’ खेमा में जा के सुना आते हैं अपने बोट नहीं पड़ेंगे तो ससुरा बिरोधियन के बोट तो काटबे का परि कि न परि. बो क्या कहते हैं कि ‘अटैक इझ धि भैस्ट डिफेंस’. जब हमें पक्का हो गया कि इस बार यहाँ दाल न गले तब हम ‘अंडर ग्राऊंड’ हो गये. कनसुआ लेते रहे थे कि कोई अब आये कि अब आये, हमें बूझता हुआ. मगर न जी ! अथि न कोई आना था ना आया. अब करो अपनी हार पर चिंतन. दाल से याद आया कि आपने दाल का किया क्या ये ? ‘....दाल को दाल ही रहने दो ड्राई फ्रूटका नाम न दो..... सिर्फ गरीब-गुरबा के पास है ये.... थालिया से न दूर करो, दाम बढ़ा कर ड्राईफ्रूट का नाम न दो...’


ये तंतर मंतर हमारे दैनिक जीवन का अंग है. हम छींक से घबरा जाते हैं. हम कुत्ता के कान फड़फड़ाने से लेकर बिल्ली के रास्ता काटने से भी अपने काम के प्रति आशंकित हो जाते हैं. हम मंगल को मीट नहीं खाते. कार में नींबू और मिर्च लटकाते हैं. हम ‘बिधी बिधान’ से टोना- टोटका सब करते हैं . हम दिन तिथी बाँच कर ही घर से बाहर कदम रखते हैं. और आप हमारी इसी संस्कृति का भरी सभा में मज़ाक बना दिये. तब क्या रही जब आप ही के फोटू बेजान दारूवाला और बापू आसाराम के साथ के उजागर हो गये.


आरक्षन पर कहना चाहिये थे कि 100% आरक्षन होगा, आप उल्टा बोल दिये कि इसकी समीक्षा करेंगे..अब कोनू बुड़बक हैं क्या मनई.... वो जानते हैं कि आप इतने भोले तो हैं नहीं. समीक्षा आप लोग बढ़ाने को तो करेंगे नहीं ज़रूर से ज़रूर घटाने को ही करेंगे. आप को कहना चाहिये था कि 100% का 100% भारतीयों के लिये आरक्षन रहेगा. और हर जात को आरक्षन मिलबे करि. भारत तो पूरा का पूरा गरीब, पिछड़ा हुआ है. इसमें सब ही तो पिछड़े, दलित और महादलित हैं. अत: ये अब कोई दलित रहेगा न महा दलित सब भारतीय हैं. पॉपुलेशन की गिनती दुबारा से कराए के पड़ि. तब तक न कोई क्रीमी लेयर न कोई नॉन क्रीमी लेयर. सब सपरेटा है.

और ये गाय-कुत्ता से ऊपर उठिये. ये गाय-बैल में कुछ नहीं रखा है सिवाय फज़ीहत के. कॉन्ग्रेस क्या पागल है जो अपना चुनाव चिन्ह गाय बछड़ा से बदल कर हाथ रखी है. जिसको गाय खाये के परि वो खाये और जिसे पालने का परि, माता मौसी बनाय का परि वो वैसी श्रद्धा रखे. ये स्टेट का टॉपिक ही नहीं. आप नॉन इशू को इशू बना दिये और इशू को नॉन इशू. आपके जितना नेता लोग लूज़ टॉक करते हैं सबको एक दिन बुलाकर कह दीजिये “ खामोश....जली को आग कहते हैं...बुझी को राख कहते हैं...” वगैरा वगैरा


आप सहयोगी दल भी तो ऐसे रखे कि लोग बाग हँसते थे. आप को क्या ज़रूरत आन पड़ी पासवान या मांझी जी की ?. आप वो गीत नहीं सुने हैं ? “मांझी जो नाव डुबोये.... तो कौन बचाये”. आप परधान मंतरी हैं आप को ये स्टेट के चुनाव में गली गली घूमना... पैकेज पर पैकेज एनाऊंस करना भाता नहीं है. तनिक इतिहास उठा कर देखिये तो सही, कोई और प्रधान मंत्री ऐसे किये रहा क्या कभी ?

अब कहा बताई. गलती तो आप कर दिये. एक ठौ बात तो आप गाँठ बांध लीजिये कि ये अमित शाह कोई सुपर स्टार नहीं हैं. ये इस सदी के महानायक भी नहीं हैं. महानायक का ? ये नायक भी नहीं. वो तो एक बार तुक्का लग गया... तो क्या बार बार लगी ?. इन्हें चलता कीजिये ! और कहिये अब आप ‘कुछ दिन तो गुजारिये गुजरात में’. अपने साथ कुछ पढ़े लिक्खे लोग रखिये. जानकार लोग रखिये, समझदार लोग रखिये. अब क्या हमारे मुँह से ही कहलवाई कि हमें रखिये