Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Tuesday, March 5, 2024

डिबिया दियासलाई की

 


    

         माचिस का आविष्कार आपको जानकार आश्चर्य होगा कि लाइटर के बाद हुआ। ऐसा कहा जाता है कि माचिस ने अपना वजूद सन 577 के लगभग चीन देश से बनाया। आपने पुरानी अंग्रेज़ी फिल्में देखी हों तो आपको पता होगा कैसे दियासलाई को हीरो कहीं भी रगड़ कर अपनी सिगरेट या अपना चुरुट जला लेता था। इन माचिस को सल्फर माचिस कहा जाता था। वे कहीं भी जरा सी रगड़ से जल जाया करती थी। इसमें दिक्कत ये थी कि बहुधा इस माचिस में खुदबखुद हिलने-ढुलने/घर्षण से आग लग जाती थी। बाद के बरसों में रसायन अलग-अलग किए गए और फास्फोरस को माचिस की डिबिया से स्ट्रिप रूप में चस्पा किया जाने लगा। अब जब तक आप सजग हो कर माचिस खोलेंगे, एक दियासलाई निकालेंगे और फिर उसे जब तक अपने उँगलियों से पकड़ कर स्ट्रिप पर रगड़ेंगे नहीं आग नहीं लगेगी। इस्तेमाल में सेफ थी। अतः इसको सेफ़्टी मैच भी कहा जाने लगा।

 

      आपकी जानकारी के लिए सन् 1870 में भारत में माचिस आई। ये माचिस जापान, स्वीडन, आस्ट्रिया से आयीं। लाने वाले वही थे आपने ठीक पहचाना ‘टाटा एंड सन्स’ (जापान) यह कहीं भी रगड़ कर इस्तेमाल करने वाली थी। एक अन्य ब्रांड था ‘दि सुन्दरी’     स्वीडन) यह सेफ़्टी मैच थी। इस पर पोस्टर भारतीय लगाए जाते थे। जैसे कि भारतीय वेषभूषा में भारतीय नारी या शेर का चित्र। 1895 आते आते साहसिक व्यापारियों ने  अहमदाबाद (गुजरात) में माचिस उत्पादन का ‘गुजरात इस्लाम मैच कारख़ाना’ डाला। परंतु यह उपक्रम किन्ही कारणो से सफल नहीं रहा।

 

         जापानी प्रवासियों ने 1910 में कोलकाता में मैच बनाना शुरू किया। एक स्थानीय व्यापारी पूर्ण चंद रॉय ने मैच बनाने की फ़ैक्टरी शुरू की। तब का एक ब्रांड था ‘मदर इंडिया मैच’ और उसे डैम्प प्रूफ (सीलन-प्रूफ) माचिस कह कर मशहूर किया गया। दो नाडार भाइयों ने कोलकाता की फ़ैक्टरी देख कर यह काम शिवकाशी (तमिलनाडु) में शुरू करने का निश्चय किया। यह 1922 की बात है। 1923 में इस क्षेत्र में स्वीडन की विमको (WIMCO) वैस्टर्न इंडिया मैच कंपनी  भी कूद गई। अपने अंबरनाथ (मुंबई के निकट) के माचिस के प्लांट का बड़े स्तर पर मशीनीकरण किया गया। 1950 के दशक तक मार्किट में इस कंपनी की तूती बोलती रही।

 

       यूं माचिस भले विदेश से आतीं थीं किन्तु उन पर लेबल एक प्रकार से विज्ञापन का काम करते थे। पुरानी 1905-1920 आस्ट्रिया से आयातित माचिस के लेबल पर गायिका गौहर जान का फोटो खूब लोकप्रिय रहा। 1931 की सत्तूर निर्मित माचिस पर भारत की पहली टाॅकी फिल्म आलम-आरा को 'टाॅकिंग सिंगिंग एंड डान्सिंग' कह प्रचारित किया गया। उसी वर्ष हुए गांधी-इरविन समझौते को भी माचिस के लेबल पर खूब प्रचारित किया गया।  1940 का दशक आते-आते माचिस के लेबल भारत की आज़ादी का आव्हान कर रहे थे। ‘हमारा आखरी और अटल फैसला आज़ादी या मौत’।

1927 आते आते भारत में माचिस की छोटी-बड़ी 27 फैक्टरी थीं। भारत आज़ाद होने के बाद माचिस के आयात पर रोक लगा दी गई। 1949 में अकेले शिवाकाशी में माचिस की 90 फैक्टरी थीं। उत्तर भारत में बरेली माचिस उत्पादन के एक बड़े केन्द्र के रूप मे उभरा। 67% माचिस उत्पादन शिवाकाशी में होता है। यह अत्याधिक श्रम-साध्य कार्य है। 90% लेबर महिलाएं होतीं हैं।

 

      अब एक टोटके या अंधविश्वास का ज़िक्र और उसके मूल में क्या है ? आपने देखा होगा कि दोस्तों की टोली एक दियासलाई से तीन सिगरेट नहीं जलाती है। अंधविश्वास यह है कि ऐसा करने से तीनों में से एक की (तीसरे की) मृत्यु हो जाती है। इसकी जड़ में है: जब दूसरे विश्व युद्ध में सैनिक लोग अपनी सिगरेट जलाते थे तो आग से जो रोशनी होती थी उस से दुश्मन सजग हो जाता था। जब दूसरे की सिगरेट जलाई जा रही होती थी उतनी देर में दुश्मन निशाना साध लेता था और तीसरे की सिगरेट जलाते-जलाते दुश्मन  फायर कर देता था।

 

          आज भारत में  माचिस की 8 बड़ी फैक्टरी हैं। यथा एशिया मैच , ग्रीन विन, क्वैन्कर मैचिस,एपोक एक्सपोर्ट्स, एस आर एस भारत एक्सिम, बिलाल मैच ग्रुप, राजश्री मैच वर्क्स, स्वर्ण मैच फैक्टरी।

 

    भारत आज दुनिया में माचिस का सबसे बड़ा निर्यातक है। चीन दूसरे नम्बर पर और टर्की तीसरे स्थान पर है। भारतीय माचिस अमरीका, जर्मनी, नाईजीरिया, भूटान आदि देशों को निर्यात की जाती हैं। भारत प्रतिदिन 400 करोड़ माचिस बाॅक्स बनाती है। विश्व में प्रयोग में आने वाली हर तीसरी माचिस भारत में बनी होती है।  आई.टी.सी. (I.T.C.) ने विमको कंपनी का अधिग्रहण कर लिया और उनके सभी 4 प्लांट्स  बरेली, अंबरनाथ, चेन्नैई और कोलकाता को बंद कर दिया और शिवाकाशी में उत्पादन को छोटी छोटी इकाइयों को ऑउटसोर्स कर दिया।    

Friday, March 1, 2024

व्यंग्य: नंबर गेम

 


             मुझे पता नहीं अंक गणित बोले तो ये गिनती का आविष्कार किसने किया? परंतु नंबरों का ऐसा खेल पहले कभी नहीं देखा था। आप सोचें ये नंबर, ये गिनती, ये अंक हमारे जीवन में कितने गहरे पैठ कर गए हैं। न्यूमरोलोजिस्ट का तो सारा का सारा कारोबार ही अंकों के इर्द गिर्द घूमता है। अंक कितना कुछ बता जाते हैं। मिसाल के तौर पर आप कहें अमुक आदमी 420 है तो और कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है। और जो ये कहा जाये कि फलां आदमी 840 है तब तो कहना सुनना कुछ नहीं, बस पतली गली से कट लीजिये। 3-13 करना, 36 का आंकड़ा होना। तेरे जैसे 56 घूमते हैं। 1 नंबर का इंसान होना या 1 नंबर की वस्तु/ब्रांड होना। 2 नंबर का आदमी होना। 1 नंबर का बदमाश होना। 2 नंबर का धंधा करना। 56 भोग, 16 सिंगार करना, 64 कला में निपुण होना। 9-2-11 होना आदि आदि।  

 

       वर्तमान में इसके अलग अर्थ हो गए हैं। जैसे 400 पार करना। जैसे मंत्री महोदय का कहना कि फलां सूबे में हम 80 सीटें जीतेंगे। दूसरी तरफ देखेंगे वहाँ अलग अंक गणित चल रहा है। उनका कहना है कि वे 100 के नीचे समेट देंगे। कभी कहते हैं 200 के नीचे ले आएंगे। फिर कहने लगते हैं 272 के लाले पड़ जाएँगे।

 

         भाई साहब! अगर दोनों पक्ष सूबे की 80 की 80 सीटें जीत रहे हैं तो ज़ाहिर है एक पार्टी झूठा दावा कर रही है। बस अपने कारकुनों का मुराल हाई कर रहे हैं। उसी तरह समझ नहीं आ रहा कि 400 पार कैसे होगा। मगर कहना ये है कि 400 कह दिया तो 400 जीतेंगे। 401 हो सकता है 399 नहीं होगा। नहीं होगा बस !

 

           अब ज्यादा 3-5 नहीं करने का। पल में तोला पल में माशा बोले तो पल में हीरो पल में 0

व्यंग्य: रतन ले लो भारत रतन

 


      एक वक़्त था जब पद्मश्री को भी बहुत ही मान सम्मान से देखा जाता था। सामान्यतः यह तभी मिलता था जब यह भली-भांति स्थापित हो जाता था कि अमुक व्यक्ति ने किसी नोबल-कॉज़ के लिए अपनी ज़िंदगी खपा दी है। बुढ़ापे में आकर पर्याप्त रूप से सीनियर होने पर ही समाज और देश को दी गईं अपनी सेवाओं को देखते हुए पद्मश्री दी जाती थी। इस को कभी भी संदेह या विनोद से नहीं देखा जाता था। हल्की टिप्पणी करना तो दूर की बात है।

 

      फिर एक दौर ऐसा आया कि लोग-बाग ढूँढे जाने लगे। ट्रंक में से झाड़-पोंछ कर निकाले जाते। दूसरे शब्दों में ये मरणोपरांत दिये जाने लगे। धीरे धीरे लोगों को यकीन हो चला कि जब तलक ज़िंदा हैं तब तक तो ये मिलना नहीं हैं।

 

    फिर वो युग भी आया जब कहा जाने लगा कि देखो हमने एक धूल में पड़े हीरे को ढूंढ निकाला है। जो पिछली सरकारों की लापरवाही से धूल खा रहे थे। हमने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी। अथवा हमने पिछड़े वर्ग के प्रकांड विद्वान को उसका ड्यू दिलाया है।

 

    फिर काम के आदमियों को ये दिया जाने लगा। वो जो काम में माहिर हों। जुगाड़ू हों। वोट दिला सकें। वोटर्स को प्रभावित कर सकें। जो कभी काम आए थे या फिर वो जो काम आ सकें, बोले तो वोट दिला सके। ग्रेट तो उन्होने हो ही जाना है। हमारे राष्ट्रीय पुरस्कार के बाद कभी ऐसा हुआ है कि बंदा ग्रेट न हुआ हो।

 

          इस श्रंखला में कई लिस्टें निकल गईं हैं मेरी तरफ अभी तक ध्यान गया ही नहीं है। ताज भोपाली साब ने ऐसी ही सिचुएशन पर लिखा है:

 

बज़्म के बाहर भी एक दुनिया है

मेरे हुज़ूर बड़ा जुर्म है ये बेखबरी

 

      पहले लोग नाम ही इस तरह के रख लेते थे कलेक्टर सिंह, तहसीलदार सिंह। मैंने अपना नाम सोचा है भारत रतन या पद्म भूषण।

                ये नाम चेंज करने का क्या प्रोसीजर है?

 

Tuesday, February 27, 2024

व्यंग्य: क्लियरेंस सेल अंतरात्मा की

 


 

        पहले मैं इस ग़लतफहमी में था कि अंतरात्मा  बिकाऊ नहीं होती। अंतरात्मा कोई नहीं खरीद सकता। मुझे कोई नौकरी नहीं मिली और अग्निवीर क्या मुझे कोई सा भी वीर बनने का अवसर नहीं मिला। धीरे-धीरे जब मैं ओवरएज हो गया तो मुझे पूरा पूरा यक़ीन हो चला कि अग्निवीर क्या मैं कैसा भी वीर नहीं बन सकता तब मैंने हार कर पकोड़े बनाने का काम हाथ में लिया। दिक्कत ये थी कि हर गली, हर चौराहे पर पहले ही पकौड़ेवाले इतनी बड़ी तादाद में अपनी-अपनी थड़ी, टपरी, खोमचे लगाए थे। मुझसे लोकल पुलिस 'टोल' बोले तो हफ्ता मांगने लगी। वो भी इतनी दूर पकोड़ा बेचने की कह रहे थे जहां लोग-बाग भूले भटके भी नहीं जाते थे।

 

           इस पर मुझे एक विज़न बोले तो सपना आया कि क्यों न मैं पॉलिटिक्स में चला जाऊं। देखता हूं बड़े-बड़े नेताओं के ड्राईवर, सहयोगी, चमचे, निजी सचिव, बोले तो हुक्का यानि चिलम भरने वाले भी बड़े आदमी बन गए हैं और लो जी मैं आ गया। ये फील्ड बहुत रोचक है। हल्दी लगे न फिटकरी। बस लच्छेदार बात करना आना चाहिए। कभी नरम, कभी गरम। लंबी-लंबी छोडना चाहिए। आम-जन को वो बहुत पसंद आता है। ताबड़तोड़ फैन बन जाते हैं। आपको बस कुछ तकिया-कलाम रट लेने हैं देख लेंगे, मार दो, काट दो, विकास करना है। नई ऊँचाइयाँ, चाल चरित्र चेहरा आदि आदि।

 

        अब मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि कब मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनूँ और इधर ब्रीफकेस पकड़ूँ उधर अंतरात्मा कहे जा इसके साथ बैठ जा। ये शर्म, ये झिझक, ये असंजमस क्यूँ ? राम जी का ब्रीफकेस, राम जी की अंतरात्मा। अपने आसपास देख रहा हूं सब अपनी-अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन रहे हैं। एक फैशन सा चल निकला है। अंतरात्मा इठलाती, बल खाती रैम्प वॉक कर रेली है।  बस एक बार ब्रीफकेस बोले तो खोखे दिख जाएँ। जब तक खोखे दिखते रहेंगे, मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनता रहूँगा।

 

      अब मैं अपनी इस अंतरात्मा को क्या कहूँ। यह भी देश-काल के अनुसार वेश भूषा और भाषा बदल लेती है। आत्मा को इतनी सारी भाषाएँ नहीं सीखनी चाहिए थीं। सुबह कुछ आवाज़ देती है शाम को किसी और आवाज़ पर रिस्पोंस देती है। ये खोखे मेरी अंतरात्मा पर बड़ा बोझ डालते हैं। यूं तो अंतरात्मा अक्सर कुंभकर्णी नींद में गुल रहती है। अंतरात्मा  को सोने की बीमारी है। यह यदा-कदा ही जागती है। मैंने मोटा-मोटा ये पाया है कि मेरी अंतरात्मा ब्रीफकेस का आकार-प्रकार देख जाग जाती है। और:

 

जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आए...

 

      अंतरात्मा, जो है सो, भेजे से ज्यादा शोर करती है। गोली का इस पर असर नहीं पड़ता। यह तो खोखे की कायल है। बस यह बताओ कितने खोखे में अंतरात्मा जाग उठेगी ताकि व्हिप पर भी व्हिप चल जाये। उसकी अंतरात्मा का भी तो हमीं को ध्यान रखना है।

 

       अंतरात्मा का बहुत ध्यान रखना होता है जब तब जाग जाये तो बहुत गड़बड़ कर देती है। अपना नुकसान करा बैठती है। इधर चुनाव आए नहीं और ये जागी नहीं। वैसे ये सोती रहती है। ऊँघती रहती है। जागती कम ही है।

 

      बस पैसे वसूले और पुनः निद्रामग्न !

Monday, February 12, 2024

व्यंग्य: प्रेम में बलिदान चतुर्भुज का

 


 

          चतुर्भुज जब बीस साल नौकरी करके अफसर बने तब तक 45 से ऊपर हो चले थे। उसे किसी ने बताया कि अब उसको ऑफिसर लाइक क्वालिटीडवलप करनी पड़ेगी। चतुर्भुज हंसा उसने इन बीस साल में न जाने कितने अफसर निकाल दिये उस में ये सब क्वालिटी स्वत: ही आ गईं हैं। अलग से डवलप करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी। उसे सब पता है। उल्टे वो ही इस मामले में ट्यूशन देने में समर्थ है। चतुर्भुज ने सुन रखा था कि  अफसर लोग एक तो कोई न कोई स्पोर्ट्स करते हैं दूसरे कोई हॉबी भी रखते होते हैं। चतुर्भुज का पहलवानी बदन जो उसने मथुरा के मिष्ठान खा-खा कर पुष्ट किया हुआ था उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते थुल-थुल तोंदूमल सा हो गया था। अतः स्पोर्ट्स तो खत्म हुआ। चतुर्भुज का प्रेम अलबत्ता ठाठें मार रहा था। तिस पर जानलेवा ये कविता करने का शौक। उसकी दोनों तरफ को लटकी हुई लंबी मूंछे उसे पुरानी फिल्मों के डकैत का साथी सा बना देती थीं वह इसे ही पर्सनलिटी की अपनी यू.एस.पी. समझता था।

 

      वह प्रेम में पगी कवितायें लिखने लगा।  मथुरावासी होने के कारण वह राधा-कृष्ण के प्रेम से वाकिफ था। अब ऐसी प्रेम कविता लिखने का क्या उपयोग यदि वे अपने गंतव्य अर्थात पात्र तक न पहुंचे। वह  अपनी प्रेम कवितायें पेज दर पेज लिख अपनी ब्रांच की भद्र महिलाओं की फाइलों में डालने लगा। जैसे आजकल समाचार पत्रों के साथ आपको कितने ही सेल के और नए रेस्टोरेन्ट के पेमफ्लेट / हेंड बिल मिलते हैं। अपने कॉलेज के दिनों में वह किताबों में रख कर प्रेम पत्र न दे पाया था अतः वो सब कसर फाइलों में प्रणय निवेदन भरी कवितायें लिख पूरी करने लगा। वह दिन भर में दस से बीस कवितायें लिखने लगा था। एक-एक कविता फाइल में खोंस देता। कोई महिला कविता फाड़ देती, कोई रख लेती कोई उसी को वापिस कर देती। जब कोई जवाब या प्रतिक्रिया न होती तो वो घुमाफिरा कर पूछ लेता “वो फाइल देखी ? आपने वो नोट पढ़ा ? और फिर “मेरी एक कविता नहीं मिल रही है, कहीं धोखे से तुम्हारी फाइल में तो नहीं चली गई ? इस तरह के रूटीन में चतुर्भुज को कहीं-कहीं प्रणय का प्रत्युत्तर भी मिल जाता। इसके दो हानिकारक प्रभाव हुए। एक, वह अपने आप को बांका / सफल प्लेबॉय समझने लग पड़ा, दूसरे, उसे अपनी कविताओं के बारे में मुगालता हो गया कि वह आला दर्जे का प्रेम कवि बन गया है।

 

           एक ब्रांच से दूसरी ब्रांच जब उसका ट्रांसफर होता तो वह नयी ऊर्जा से भर जाता। इस उपक्रम में उसने अपनी ब्रांच की कितनी ही महिलाओं को मथुरा की रबड़ी, पेड़े, दूध-दही, जलेबी खिलाए। चतुर्भुज का यह दृढ़  विश्वास था कि प्रेम और मिठाई का अटूट रिश्ता है:

 

गुड़ नाल इश्क़ मिठा...  

 

       चतुर्भुज की आयु के साथ उसकी प्रेम की इंटेसिटी  बढ़ती जाती और उसी रफ्तार से कवितायें लिखने की स्पीड भी। अब वह एक दिन में बीसियों कवितायें लिख डालता। लिखना क्या था उसक लगभग-लगभग टेम्पलेट उस के पास तैयार था। जुल्फ नागिन, आँखें मद भरे प्याले, बदन फूलों की डाली, सांसें जैसे खुशबू गुलाब  की। बंबई ट्रांसफर होने पर उसमें बंबई की बारिश से प्रेरित हो न झटको जुल्फ से पानी टाइप लाइनें और जुड़ गईं थीं।

फिर चतुर्भुज ने देखा कि एक महिला या तो नीरस है या हिन्दी नहीं जानती।  वह साफ मुकर जाती है कि फाइल में कोई कविता मिली जबकि चतुर्भुज को अच्छी तरह याद है कि उसकी फ़ाइल में दसियों कवितायें वह खोंस चुका है। प्रेम निवेदन की ऐसी अवहेलना ?  ऐसा अवज्ञा?  और एक दिन चतुर्भुज ने बिना फाइल सीधे-सीधे कविता उसे थमा दी। यह ऐसे ही था जैसे कोई बिना पानी-सोडा नीट ग्लास भर दे और कहे बॉटम्स-अप। महिला ने वह कविता ली और लिखित में चतुर्भुज की शिकायत चेयरमेन से कर दी, सबूत के तौर पर कविता नत्थी कर दी। चतुर्भुज जी तलब किए गए। वे बोले “सर ये मेरी हॉबी है ! हो सकता है कोई कविता फ़ाइल में इधर-उधर हो गई हो या फाइल में चली गई हो। अब किसी कविता में किसी भी भद्र महिला का नाम तो लिखा नहीं यह मेरे छवि धूमिल करने का प्रयास है”।  यह सुन भद्र महिला आग-बबूला हो गई और उसने फाइल से निकलीं सब कवितायें चेयरमेन को दे दीं “क्या ये सभी गलती से मेरी फाइल में आ गईं ?”

चतुर्भुज ने दांव चला “यह हो न हो मुझे फँसाने का षडयंत्र है यह कोई बड़ी साजिश है”। चेयरमेन ने पूछा “क्यों ? इसमें इस महिला का क्या फायदा ?” चतुर्भुज ने आव देखा न ताव चेयरमेन को लिख कर दे दिया “मेरा मनोबल टूट कर बिखर गया है (पहले मनोबल के स्थान पर दिल लिखा करते थे) इस आरोप में अगर तनिक भी सच्चाई  हुई तो मेरे इस पत्र को मेरी सेवा निवृत्ति का आवेदन समझा जाये। ऐसी ब्रांच में काम करने का क्या फायदा जहां सम्मान और इंसाफ न हो”। ये खत दे वे अपने घर चले गए। और नए नुक्ते और पेच सोचने लगे।

            हफ्ता भी न हुआ था कि ऑफिस से चिट्ठी आ गई। चतुर्भुज ने विजयी भाव से लिफाफा खोला कि  बुलावा आया होगा “...आप पाक साफ हैं आकर ड्यूटी जॉइन करें”। मगर यह क्या लिखा था “आपकी स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति स्वीकार कर ली गई है इस पत्र के मिलने के एक माह के अंदर अपने सभी फंड्ज आदि लेखा विभाग से ले लें।

 

        चतुर्भुज को काटो तो खून नहीं। उनके पवित्र प्रेम का यह हश्र। दरअसल ब्रांच में बहुत सी महिलाओं ने फाइल से एकत्रित की हुई सब कवितायें चेयरमेन को सौंप दी थीं और अपने बयानों से केस को और पुख्ता कर दिया था। चतुर्भुज को यह पक्का विश्वास था कि उसका यह बलिदान अक्खा बंबई में नहीं तो ब्रांच में सदैव अमर रहेगा। और दुनियाँ जान जाएगी कि जहां बाकी महिलाएं रबड़ी, पेड़े जलेबी खातीं थीं यह तो नौकरी ही खा गई।

 

       सोनम गुप्ता वाकई बेवफा है

Wednesday, January 31, 2024

व्यंग्य : फोटूवाले जी पैपरा जी

 


 

संदर्भ: पिछली शाम अपनी काॅकटेल-कम-काॅन्फ्रेंस

 

          सभी पैपराजी को मेरा दिल से हाअइयय !

 

               मेरा सप्ताह का प्रोग्राम फाइनल हो गया है अतः आपके लिये नत्थी कर रही हूं। ख्याल रखें मेरी फोटो साईड से लें और ऐसे दिखाना है कि आपने अचानक मुझे स्पाॅट किया है। मैं सिक्युरिटी चैक तक पहुंचू तब तक रील चलती रहनी चाहिये। आई वांट फुल बैक कवरेज।

 

सोमवार सुबह:

 

                 जिम में आते जाते दोनों वक्त कवर होना चाहिये। मेरे कर्वज, मेरी डीप नैक आनी चाहिये, मैं जर्सी की चेन खोल के रखूंगी।

 

सोमवार शाम:

 

             रेस्टोरेंट में उतरते वक्त की फोटो होनी चाहिये और देखना कि रेस्टोरेंट का साइन बोर्ड भी आ जाये। लौटते वक्त हम सीढ़ियों से नीचे उतरेंगे। फोटो फुल- फुल आना चाहिये और कैमरा ऑन रहे जब तक गाड़ी आँखो से ओझल न हो जाये। मैं थोड़ा चेहरे पर हाथ हथेली रखूंगी पर आप अपनी फोटोग्राफी जारी रखना।

 

मंगलवार सुबह:


            मंदिर जाने का वीडियो लेना है। सड़क पर चलते हुए का। मेरे फाॅरचूनर से उतरने के बाद कैमरा ऑन करना है। गाड़ी नहीं आनी चाहिये।

मैं कैज्युल्स में हूंगी और शाॅल में हूंगी। देखना मेरे नंगे पैर और ट्रिन्कैट्स/डिजायनर पायल जरूर आनी चाहिये।

 

मंगलवार शाम :

 

               एक शांति पाठ में जाना है। फाइव स्टार में है। गाड़ी से उतर कर लाॅबी तक कवरेज चाहिये। आपके साथी को समझा दिया है वो कमेंट्स के लिये मुंह के पास माइक लायेगा, उसको मेरा बाॅउन्सर धीरे से उठा कर परे कर देगा। बाउन्सर को समझा दिया है। हाथ हल्का रखेगा।

 

शुक्रवार सुबह:

 

              नाश्ते के लिये डोसा खाने जाना है। आप 9.10 बजे तक कामथ कैफे के गेट पर पहुंच जाना। मैं 9.20 तक पहुंच जाऊंगी। सवाल याद रखना आप यहां कब से आ रही हैं और दूसरा आपका फेवरिट ब्रेकफास्ट क्या है ?

 

शुक्रवार शाम:


          शाम को डिस्को और बार के उद्घाटन के लिये जाना है। नई लो-कट ड्रेस ली है। थाई-हाई है गोल्डन कलर की। लेटैस्ट क्रेज़ है। टाइम पर पहुंच जाना। ऐसा न हो कि वेट करनी पड़ जाये।

 

सी यू ! चाओ !

Tuesday, January 30, 2024

व्यंग्य: संतन को सीकरी से ही काम

 

          ऐसा कहा जाता है कि जब अकबर बादशाह ने भक्त कवि कुंभल दास को सीकरी आकर मा-बदौलत से मिलने को बुला भेजा तो संत ने बादशाह सलामत से कहा:

 

  संतन को कहा सीकरी सों काम

  आवत जात पनहियाँ टूटी

  बिसरि गयो हरि नाम।...

 

         यह  700 साल पुरानी बात है।  तब से सियासत बहुत आगे आ गई है। हमको ही देख लो 75 साल में हम कितने बदल गये। उसी तरह संतन भी बदल गये हैं। संत-लोकी बहुत विकास को प्राप्त हुए हैं। अब हों भी क्यों न। चारों ओर विकास ही विकास की फसल लहलहा रही है। बोले तो विकास का बोलबाला है। यूं समझिए विकास, जो है सो, दौर-ए-हाजिर का ‘बजवर्ड’ बन गया है। आप खाक संत हैं अगर आपके मठ, आपके अखाड़े में बड़े-बड़े नेताओं का आना-जाना नहीं है। आपको ऐसे इवैंट लगाने पड़ेंगे जहां नेता लोग आके आपकी ड्योढ़ी पर ढोक बजाएँ। और बजाते जाएँ कभी आपके जन्मदिन पर कभी आपके आश्रम के पुनर्निर्माण के उपलक्ष्य में। सत्ता वाले नेता भी आयें और विपक्ष वाले भी आयें। आप दोनों को सम-भाव से आशीर्वाद बांटें। सत्ता वाले को कि उसकी सत्ता बनी रहे और दिन-दूनी रात आठ-गुनी उन्नति करे। मोहल्ले वाला ब्लॉक का, ब्लॉक वाला ज़िले का , ज़िले वाला प्रांत का और प्रांत वाला देश का नेता बनना चाहता है। विपक्ष वाले का सिम्पल है, बस उसको तो कैसे भी सत्ता में आने का है। फक़त एक आशीर्वाद बस होगा। संतन का काम ही यह  है कि वे नेताओं को यह समझाने में कामयाब हो जाए कि जहां वे कहेंगे उनके भक्त, उनके अनुयायी ई.वी.एम. पर वही बटन दबाएँगे। एक बार यह यकीन आ जाये फिर आपकी पौ बारह है। नेता छोटे-बड़े, वुड-बी नेता सब आपके आगे-पीछे डोलेंगे।

आपकी तरफ फलां-फलां नेता हैं ये खबर आपके अखाड़े, आश्रम जो भी आप अपने इस कारोबार को नाम दें इस से आपके बिजनेस को भी चार चाँद लग जाएँगे। लोग आजकल बहुत अशांत हैं। उनके चित्त को चैन नहीं है। वो एक गुरु की सतत् तलाश में रहते हैं। बस यही वो शून्य है जो आपने भरना है। एक बार वो कन्विन्स हो गए कि आप ही उनको भवसागर पार करा सकते हैं फिर उनकी समस्त सांसारिक चीज़ें आपकी हैं।

 

 

       पूरी की पूरी केबिनेट आपकी खिदमत में रहेगी। किसी को अपना मनपसंद पोर्टफोलियो चाहिए तो  किसी को बस केबिनेट में बना रहना है कहीं अगली रि-शफल में बेचारे का पत्ता ही न न कट जाये। बॉलीवुड अलग दिन रात आपकी सेवा में रहेगा। मेरी फिल्म चलवा दो, मेरे रील को आशीर्वाद दे दो। मुझे स्टार बनवा दो। मुझे हिट हीरोइन बनवा दो फलां प्रोड्यूसर को जरा कह भर दें।

 

 

             नौकरशाह अलग हाथ जोड़े जोड़े यस सर....यस सर कहते लाइन लगाए खड़े रहेंगे। किसी को मनपसंद पोस्टिंग चाहिए किसी को मलाईदार पोस्ट पर ट्रांसफर चाहिए।

 

           अब अपने आश्रम का और इसके साथ साथ अपना भी कोई चटकारा भरा नाम रख लो नाम के आगे स्वामी, बाबा, गुरु जी, साधु, मेरा मतलब कोई तड़कता-फड़कता नाम रखें शुरू में श्रद्धालुओं को नि:शुल्क खाना खिलाएँ फिर फेमस कर दें कि अमुक स्वामी जी के अमुक आश्रम में  कोई प्रसाद कोई चढ़ावा नहीं चढ़ता उल्टा वो हरेक को बिना भोजन नहीं आने देते। भारत जैसे देश में आपने रातों-रात मशहूर हो जाना है। जय जय कार अलग। खबर जंगल में आग की तरह फैल जाएगी।

 

        ज़मीन पर खास ध्यान देना है। अब ये तो नहीं न कि आपने तो अपने आश्रम के लिये ज़मीन झटक ली और उसमें कुछ बाहर से सोशल सर्विस जैसे दिखने वाले काम शुरू करा देने हैं जैसे स्कूल। उसकी आमदनी अलग।

 

      ओ जी ! आमदनी का तो ऐसा है कि आपसे संभले नहीं संभलेगी दौलत। फिर आप चाहें तो देश में सैटल हों या विदेश में। चाहें तो अपना ही एक टापू एक द्वीप खरीद लें। अपनी करेंसी अपना पासपोर्ट। कौन है रोकने वाला ? कोई न जी कोई न।

 

       बस एक बार आपको डिसाइड भर करना है। श्रद्धालुओं की कमी नहीं रहेगी। ये मेरी गारंटी है।