ज्ञात हो कि भारतीय रेलवे भारत में सबसे बड़ा
नियोक्ता है। एक समय की बात है कि इसमें लगभग 18 लाख
कर्मचारी थे, जिनमें दो लाख आकस्मिक श्रमिक भी शामिल थे।
चूंकि रेलवे की अपनी संख्या इतनी बड़ी रही है, तदनुसार,
सेवानिवृत्ति/त्यागपत्र/ मृत्यु भी आनुपातिक रूप से बड़ी है। रेलवे
के विपरीत अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की सीमा अन्य केंद्र सरकार के मंत्रालयों
में 5 प्रतिशत है। यह कुल 5 प्रतिशत
रिक्तियों/स्वीकृत पद तक सीमित है।
.
अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान अंग्रेजों
द्वारा बनाई पाॅलिसी के रूप में है। 'क्लोज-शॉप'
कई संगठनों में भर्ती का एक वैध तरीका रहा है। उनका मानना है कि इस
प्रकार वफादारी और समर्पण, आसानी से प्राप्त किए जा सकते
हैं। यह अनुकंपा नियुक्ति संकट में शोक
संतप्त परिवार को सहायता प्रदान करने के लिए था। समय के साथ यह 'एक मौत = एक नौकरी' बन के रह गया। सरकारी रोजगार की
आवश्यकता सभी को होती है, वह भी यदि रेलवे में है तो बल्ले बल्ले ! चिकित्सा सुविधा,
सरकारी आवास और उदार पेंशन लाभों के साथ। इसलिए सरकारी नौकरी के
लिये परिवार अपने को 'संकट' में घिरा
पाता है। कर्मचारी यूनियन सदैव एक शुल्क
पर आपकी सहायता को तत्पर मिलेंगे।
देखा
गया है कि परिवार अपने बेटों में से सबसे नालायक को रेलवे को प्रदान करता है। उनका
मानना है कि 'योग्य' तो अपनी
योग्यता के आधार पर कहीं और भी नौकरी हासिल करने में सक्षम होगा। इसके अलावा,
बेटा उनकी स्वाभाविक पसंद होती है क्योंकि पुत्री तो अंततः शादी कर
लेगी और परिवार को छोड़ देगी। एक आसान सी लिखित परीक्षा आयोजित की जाती है,
जो आम तौर पर मैट्रिक स्तर की होती है। अफ़सोस! बी ए और एम ए इसे
पास करने में विफल रहते हैं। फिर वे आँसू भरे दूसरा मौका देने की गुहार लगाते हैं
क्योंकि उनके अनुसार वे भावनात्मक आघात से गुजर रहे होते हैं। आम तौर पर, एक दूसरा मौका दे दिया जाता है। जहां तक ग्रुप डी (क्लास IV) नौकरियों का संबंध है; कोई लिखित परीक्षा आयोजित
नहीं की जाती है, उम्मीदवार का चयन साक्षात्कार के आधार पर
किया जाता है। 99 प्रतिशत लोग इस नौकरी को पा जाते हैं।
"ग्रुप डी कार्यालय में जो एम.टी.एस. (मल्टी-टास्किंग स्टाफ) की है, मांग अधिक होती है। न कि श्रम साध्य फील्ड जाॅब्स की। जब तक कि कोई तकनीकी
रूप से योग्य न हो और तकनीकी क्षेत्र में अपना भविष्य (कैरियर) बनाने का उत्सुक न
हो। कुछ उम्मीदवार बहुत अच्छे और भविष्य को लेकर गंभीर होते हैं। वे समर्पण के साथ
कड़ी मेहनत करते हैं। जैसे-जैसे रोजगार बाजार सिकुड़ रहा है, रेलवे में नौकरियां कीमती होती जा रही हैं।
डार्क पक्ष:
बेरोजगार बच्चों और लालची पत्नियों ने इसे एक
लूट के रूप में देखना शुरू कर दिया। परिणाम विनाशकारी रहे। रेलवे में भर्ती होने
वाली श्रमशक्ति की गुणवत्ता घटी, जबकि पारिवारिक झगड़े
बढ़ गए। आप सबसे खराब, भयावह, घिनौने
परिदृश्य की कल्पना करें और मेरा विश्वास करें, यह इस
अनुकंपा आधार नियुक्ति के नाम पर हुआ है। पिता को मारना, पति
को जहर देना जैसे अब कोई पाप ही नहीं रह गया है। एक मामला आया जहां एक मौत (पिता
की) और तीन बेटों को नौकरी दे दी गई थी। कैसे? कोई भी
अधिकारी उस कार्यालय में लंबे समय तक नहीं रहता था। नया अधिकारी आता, नया अधिकारी.. नई केस फाइल, नया बेटा दर्ज हो जाता।
जब अनुकंपा नियुक्तियों की बात आती है, तो आश्चर्यजनक रूप से
इसमें शामिल सभी लोग जरुरत से ज्यादा 'दयालु' हो उठते हैं, जैसे इसके सहारे वे स्वंय के लिये
स्वर्ग में स्थान सुरक्षित कर लेना चाहते हैं।
यहां तक कि मौत का नाटक भी असामान्य नहीं रहा है। एक मामला ध्यान में आया;
एक लड़का सिर मुंडा कर आता है और अपनी 'दुख
भरी' कहानी सुनाता है कि कैसे उसके रेलकर्मी पिता पैतृक गांव
गए और सांप के काटने के कारण वहां उनकी मृत्यु हो गई। अब चिकित्सा प्रमाण पत्र और
ग्राम प्रधान की रिपोर्ट पर निर्भर रहने के अलावा ऑफिस क्या कर सकता है। ऐसी
नियुक्ति के मामलों में आश्चर्यजनक रूप से, कागज पूरे
होते/रिकॉर्ड एकदम क्लियर, एक-एक पेपर सावधानीपूर्वक रखा
जाता। अब ऐसे संगठन/संस्थान हैं जो एकमुश्त अनुदान देते हैं और बस इतना ही। उनके
पास ऐसी कोई योजना नहीं है जहां अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की
आवश्यकता/प्रावधान हो।
भोले-भाले परिवार के गरीब अशिक्षित लोग
प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ नहीं होते हैं, वे
शुभचिंतकों की आड़ में भेड़ियों का शिकार हो जाते हैं। एक मामला देखा गया जहां
गरीब अनपढ़ महिला के पास कुछ कागज थे, ये नकली प्रमाण पत्र
और अंक पत्र थे। उसने अपनी लिखित परीक्षा में सौ में से शून्य हासिल किया था।
मैंने उससे पूछा कि उसने अपनी मैट्रिक कहाँ से पास की ? वह
कनफ्यूज सी ताकती रही। बाद में नम्रता से उसने जवाब दिया "ये कागजात तो मुझे
बाबू जी ने बेचे थे"
एक अधेड़ उम्र का आदमी अपनी एडवोकेट की पोशाक
में मेरे निवास पर आता है; उसे कार्यालय में मिलने के
लिए कहा गया। जाते जाते उसने कहा, "अर्जेंट मिलना है
हमारे परिवार में महिलाएं काम नहीं करती हैं, इसलिए इसके
बजाय मृतक के छोटे भाई को नौकरी दे दी जाये। जब जांच की गई तो पता चला कि इस आदमी
ने ऑफिस से पत्राचार के नाम पर अपनी विधवा पुत्र वधू से सादे कागजात पर हस्ताक्षर
करा लिये थे। महिला ने मांग की कि यदि अनुकंपा आधार पर नियुक्ति का कोई प्रावधान
है तो वह इसे लेना चाहेगी क्योंकि वह इंटरमीडिएट पास है। इस प्रकार, जो उसका हक़ था उसे मिला।
जहाँ पैसा (रिश्वत) चलता है, वहाँ भर्ती हुआ युवक जल्द ही छोटी- मोटी हेराफेरी और भ्रष्टाचार की
तकनीकें सीखने में लग जाता है। नई उक्ति यह प्रतीत होती है: 'मुहब्बत, जंग और अनुकंपा नियुक्ति में सब फेयर है' घृणित साजिशें और जानलेवा योजनाएं इतनी बार सामने आती हैं कि लगता है इस
योजना को बंद कर देना बेहतर होगा। कल्पना कीजिए कि यह परिवार विशेष और समाज में
कैसी कैसी कलह को ला रहा है। हम मुंह फेर कर अन्यत्र देखने का नाटक नहीं कर.सकते
बोले तो जोखिम नहीं उठा सकते।
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