Ravi ki duniya

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Friday, July 17, 2026

व्यंग्य: सब (रेलवे स्टेशनों) का मालिक एक –आर.पी.एफ.

 

इस आगरा की घटना से पहले, बहुत पहले से लोग बाग कहते और विश्वास करते आये हैं कि आर.पी.एफ.  की फुल फाॅर्म 'राशन पानी फ्री' है। रेलवे स्टेशन पर आप ऐसे समझो मोटा-मोटी कितने ही विभाग के रेल कर्मी कार्यरत होते हैं।

वाणिज्य विभाग: बुकिंग क्लर्क, टी.टी./ टी.सी. खान-पान के स्टॉल, अन्य सभी स्टॉल, कुली (लाइसेन्स दिया जाता है वे रेलकर्मी नहीं होते)

ऑपरेटिंग विभाग: असिस्टेंट स्टेशन मास्टर, स्टेशन मास्टर, स्टेशन सुपरिटेंडेंट, स्टेशन डाइरेक्टर, गार्ड

विद्युत विभाग: स्टेशन की लाइट/पंखे/पंप/ रेल का इंजन/ रेल की लाइट/पंखे/ए. सी./ लोको पायलट (इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन)

मकैनिकल: रेल का इंजन, रेल के कोच/डिब्बों के पहिये/लोको पायलट (डीजल) बर्थ

सिग्नल एंड टेलिकॉम विभाग: सिग्नल सिस्टम, टेलीफोन

इजीनियरिंग विभाग: गेंगमेन, पी.वे. इंस्पेक्टर

 

 लास्ट बट नाॅट लीस्ट आर. पी.एफ. ये तो हो गए औपचारिक मान्यता प्राप्त विभाग। इसके बाद और इन सबसे बड़े होते हैं अनऔपचारिक विभाग। नहीं समझे ? बताइये ये जो भिखारी लोग होते हैं स्टेशन के अंदर-बाहर ? वो किसकी मेहरबानी से ? फूड स्टॉल पर औने-पौने दाम। पानी की बोतल महंगे दाम पर बेचना। जेबकट, उठाईगीरे, ऑटो टैक्सी वाले, बेटिकट यात्रियों की पकड़-धकड़ में महत्ती भूमिका। आप ट्रैक पार करते हो या पार करते पकड़े जाते हो तो आर.पी.एफ. के सौजन्य से। यद्यपि आर.पी.एफ. की ऑफिशियल भूमिका रेलवे की प्रॉपर्टी की सुरक्षा करना है बस। न इससे कम इससे ज्यादा। अब समझ गए आप क्यों ये कुत्ता लेकर डिब्बे डिब्बे घूमते हैं। बेचारे कुत्ते को भी हलकान करते हैं। दरअसल ये अपने शिकार की रेकी करते होते हैं। पिछली सदी की बात है। एक शहर में अफीम की खेती होती थी। अब इस अफीम को बाहर भी भेजना होता है इसके लिए वे 'म्यूल' बोले तो कैरियर की तलाश में रहते और उनके थ्रू ये खेप दूसरे शहरों में भेजी जाती थी। अब इसके लिए रेलवे सबसे सुरक्षित और सस्ता साधन। आर.पी.एफ. वाले इन्हें पकड़ लेते थे। जब बार-बार ये होने लगा तो आर.पी.एफ. ने अफीम वालों को सलाह दी भैये ! आप लोगों को भेजते हो, हम उन्हें पकड़ते हैं आपका माल ज़ब्त करते हैं फिर आपको उन्हें छुड़वाने को मारे-मारे घूमना पड़ता है। कोर्ट-कचहरी करनी पड़ती है और माल भी जाता है, पैसे का खर्चा अलग। तो क्यों न आप हमारी सेवायें लेते। हम पहुंचा दिया करेंगे। काहे को बिचौलिये लाते हो। बस उसके बाद सभी सुख से रहने लगे।

 

एक लड़की अपने बूढ़े माता-पिता के साथ यात्रा कर रही थी। एक स्टेशन पर उनक लिए कुछ लेने उतरी और ट्रेन चल दी तो माता-पिता ने ज़ंजीर खींच दी। जैसे ही लड़की ट्रेन में चढ़ने लगी आर.पी.एफ. ने पकड़ लिया। ले गए अपनी चौकी। फिर दुनिया भर की सिफारिश के बाद उसे अगली ट्रेन से रवाना किया। यदि उसकी जान-पहचान न होती तो पता नहीं कितने दिन हवालात में रहना पड़ता और कितना 'जुर्माना' देना पड़ता। ये जवान दूसरे बेटिकट यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम भी करते हैं।     अब यूं ही तो नहीं रेलवे की नौकरी को इतनी अहमियत दी जाती रही है। आप को पता होगा रेलवे को एक ‘स्टेट’ का दर्जा होता है। अपना टेलीफोन सिस्टम, अपने स्कूल/कॉलेज, अपनी दुकानें, क्लब, अपने रोड्स, अपनी कॉलोनी, अपना बिजली घर अपना पानी का सिस्टम। फिर बचा क्या? रेलवे अपने हर कर्मचारी को इतना 'एम्पाॅवर' कर देती है और उसमें कूट कूट कर सैंस ऑफ बिलाॅगिंग भर देती है कि हर कर्मचारी यही सोचता है कि रेल उसी के कंधों पर चल रही है। एक जबर्दस्त जिम्मेवारी का भाव देती है। इसी जिम्मेवारी के भाव से निकलता है अपने ऑर्गनाइज़ेशन पर गर्व।

 

अब यह कहा और माना जाता है कि रेलवे स्टेशन का मालिक स्टेशन मास्टर होता है। मगर आर.पी.एफ. को इस तरह का हिस्सा-बाँट पसंद नहीं। नेपोलियन का एक कथन है “या तो मैं खामोश रहता हूँ या कमांड करता हूँ” आर.पी.एफ. के ऑफिसर पहले कमांडर ही कहलाते थे अब कमिश्नर (सुरक्षा आयुक्त) है। खाकी वर्दी में कुछ ऐसी ही सिफ़त है कि आदमी एक बार चोर-उचक्कों से नहीं डरता पर खाकी से डरता है। यूं ख़ाकी, ख़ाक का (मिट्टी का) रंग है। आर.पी.एफ. ने वह शेर जरुर सुना होगा:

 

                    मिटा दे अपनी हस्ती अग़र कुछ मर्तबा चाहे

                   कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ओ-गुलज़ार होता है

अतः आपको गुल-ओ-गुलज़ार कराने का महत्वपूर्ण काम आर.पी. एफ. ने अपने ऊपर ले लिया है। अब आप चाहे कितनी ही सफाई दें या गुल-ओ-गुलज़ार बनने से मना करें आर.पी. एफ. के चार जवानों ने आपको टांग/बाजू पकड़ के गुल-ओ-गुलज़ार कर ही देना है। माइंड इट।

 

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