विवेक शुक्ला जी की नवीनतम पुस्तक मात्र एक पुस्तक नहीं बल्कि अपने दौर का एक दस्तावेज़ है। त्रासदी और मानव इतिहास में इतनी बड़ी तादाद में दोनों तरफ के लोगों के जीवन में झंझावात, जबरन, डर, स्वेच्छा से स्थान परिवर्तन दूसरा नहीं दिखता। कितने ही परिवार बरबाद हुए। कितने ही परिवार उस त्रासदी से कभी उबर ही नहीं पाये। हम अक्सर या तो ‘सक्सेस स्टोरीज़’ सुनते हैं या फिर इस बात पर विनोद करते हैं कि वहाँ से जो भी आया वो यही कहता है कि वहाँ हम महल में रहते थे, सोना-चांदी भरपूर था। सच्चाई इन दोनों के बीच में कहीं है। अब उनके पास खोने को कुछ नहीं था उन्होने दिन रात मेहनत कर और अपनी कुशाग्र बुद्धि से अपने-अपने व्यवसाय को चमकाया।
श्री विवेक शुक्ला जी ने इस विभाजन की त्रासदी के स्पेक्ट्रम से तरह-तरह के रंग उठाए हैं। भले वे राजनीति के क्षेत्र के हों। व्यवसायी हों। आम परिश्रमी लोग हों।फिल्म स्टार हों। कैसे उन्होने तिनका-तिनका कर अपने नशेमन को फिर बसाया-बनाया। विभाजन के चलते उसके दुष्परिणाम सभी क्षेत्र में दिखाई दिये। अफसोस ! मुंबई के फिल्म जगत का ‘लॉस’ पाकिस्तान का ‘गेन’ नहीं बन सका। जो भी लोग वहाँ सुनहरे सपने लेकर गए वे निराश ही हुए और गुमनामी के अंधेरे में खो गए। जबकि मुंबई का फिल्म जगत तरक्की करता गया। इसमें बहुत बड़ा हाथ वहाँ की शासन व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं का भी रहा। कहने को कायदे-आजम ने ‘सेकुलर’ और सभी धर्मों के इबादत की बात कही अपने भाषण में किन्तु ऐसा हो न सका। गांधी जी और जिन्ना दोनों ही 1948 में इस दुनिया को अलविदा कह गए।
इसी प्रकार व्यवसाय और नौकरी आदि के जो अवसर हिंदुस्तान फराहम करा पाया वह पाकिस्तान न कर सका। अँग्रेजी में कहावत है ‘यू कैन नॉट लिव ऑन लव एंड फ्रेश एयर एलोन ’ उसी तरह शासन चलाने को एक विज़न चाहिए, बहुत परिपक्व योजनाएं चाहिए। राष्ट्र निर्माण का एक जज्बा चाहिए। जिस प्रकार का मिलिटरी और धार्मिक उन्माद सरहद पार देखने को मिलता है उससे यही लगता रहा कि ये मुल्क तरक्की कब करेगा और अपने लोगों को कब वो सब दे पाएगा जिस की तलाश में वे सैकड़ों मील दूर चल कर आए थे। मुनव्वर राना अपनी किताब ‘मुहाजिर’ में लिखते हैं :
‘'मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं"
जैसा कि विवेक शुक्ला जी ने भी उल्लेख किया है आम जन दोनों तरफ का अपने को कितनी ही चीजों में कॉमन पाता है। रीति रिवाज, भोजन, भाषा, कहावतें, पहनावा, सिंगार। इसी की नुमायान्दगी करते रहे हैं। मुशायरे, ग़ज़ल कंसर्ट, मगर जब हवा ही ज़हरीली हो तो कुछ पनप नहीं पाता। जनाब जिगर मुरादाबादी साब का कलाम है:
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
मैं विवेक शुक्ला जी की किताब ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ को उसी दिशा में एक कदम मानता हूँ। सियासतदान सियासत करते रहे हैं करते रहेंगे। मगर आम जन यहाँ भी, वहाँ भी एक से हैं। उनके ग़म एक हैं उनकी खुशियाँ एक हैं और तो और उनके मसाइल एक हैं। हम अंग्रेजों की ‘डिवाइड एंड रूल’ को अब तक ढोते आ रहे हैं। अन्यथा सोचिए उस एकीकृत इंडिया की ताकत दुनिया में क्या होती।
184 पृष्ठ की यह पुस्तक ‘प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग इंडिया’ ने प्रकाशित की है। छपाई बहुत सुंदर है। कीमत 390/- है। प्रूफ रीडिंग वर्ड क्लास है। (बोले तो त्रुटिहीन है, आजकल वर्ड क्लास कहने का रिवाज चल निकला है) यह एक संग्रहणीय पुस्तक है क्यों कि जैसा कि मैंने कहा यह उस दौर की और उसके बाद के हालातों का मात्र लेखा-जोखा नहीं बल्कि एक दस्तावेज़ है उस दौर का और उसके बाद की ज़िंदगियों का।

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