Ravi ki duniya

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Tuesday, October 13, 2026

तुझे बिब्बो कहूँ या सुलोचना ...

 

                             



बिब्बो का असली नाम फरहत जहां था और स्क्रीन नाम इशरत सुल्ताना था। इशरताबाद, चावड़ी बाज़ार, दिल्ली में 1906 में दुनिया में उनका आगमन हुआ। इनकी माँ का नाम हफीज़न बेगम (बाई) था। हफीज़न बाई अपने समय की मशहूर गायिका थीं। बिब्बो ने भी इस क्षेत्र में ट्रेनिंग पाई और गायन, नृत्य और संगीत में पारंगता हासिल की। वे बला की खूबसूरत थीं। जल्द ही उनको फिल्मों में ब्रेक मिला। इसकी शुरुआत हुई जब हिंदुस्थान की पहली बोलती फिल्म अर्देशर ईरानी के निर्देशन में ‘आलम आरा’ बनी उसमें यद्यपि मास्टर विट्ठल नायक और जुबेदा नायिका थीं। पृथ्वीराज कपूर और बिब्बो को भी इस फिल्म में अवसर मिला। अतः कहा जा सकता है कि न केवल पृथ्वीराज कपूर बल्कि बिब्बो भी ‘आलम आरा’ की प्रतिभागी बनी। 1931 से 1947 तक बिब्बो ने एक से बढ़ कर एक फिल्म में अपना जलवा बिखेरा और 1947 के बाद पाकिस्तान जाने पर वहां भी उन्होने 50 से अधिक फिल्मों में काम किया।

                                                      


1933 में अजंता सिने टोन के झंडे तले बतौर लीड रोल से अपना केैरियर शुरू करने वाली बिब्बो ने उस दौर के बड़े से बड़े डाइरेक्टर्स के साथ काम किया मसलन महबूब खान, मोहन भवनानी, शांति दवे, ए.पी. कपूर। जल्दी ही बिब्बो दिग्गज नायिकाओं की प्रथम पंक्ति में देविका रानी, दुर्गा खोटे, सुलोचना, मेहताब शांता आप्टे, नसीम बानू, सबीता देवी और लीला देसाई के साथ खड़ी नज़र आती हैं। बिब्बो पहली नायिका थीं जिनके नाम को शुमार कर के रफी कश्मीरी ने सगीर आसिफ के संगीत में फिल्म ‘गरीब के लाल’ 1939 में मिर्ज़ा मुशर्रफ और कमला कर्नाटकी से गीत गवाया था: “तुझे बिब्बो कहूं या सुलोचना…” सुलोचना एक यहूदी नायिका थीं, जिनका असली नाम रूबी मेयर्स था। सोचिए दस साल से भी कम समय में बिब्बो ने ऐसी धूम मचा दी, तब जबकि न इंटरनेट था, न पब्लिसिटी के आज जैसे माध्यम।
 
                                                                 


बिब्बो को पहली बोलती फिल्म में काम करने का एजाज ही नहीं हासिल, बल्कि वह हिंदुस्तान की पहली फिल्म संगीतकार भी बनीं। उन्हें यह क्रेडिट नर्गिस जी की माताजी जद्दन बाई से पहले हासिल हुआ। जद्दन बाई दूसरी महिला फिल्म संगीतकार बनीं। बिब्बो ने 1934 की फिल्म ‘अदल-ए-जहांगीर’ के लिए संगीत दिया था। जबकि जद्दन बाई की संगीत दी हुई फिल्म ‘तलाश-ए-हक़’ 1935 में आई। यही वह फिल्म थी, जिसमें नर्गिस ने बेबी फातिमा के नाम से बाल-कलाकार के रूप में काम किया था। फातिमा उनका असली नाम था। ‘मायाजाल’ 1933 में बिब्बो नायिका थीं। ‘कज्जाक की लड़की’ 1936 में भी बिब्बो ने लीड रोल किया था और म्यूजिक भी दिया था। फिल्म ‘रंगीला राजपूत’ (1933) इससे उनकी प्रतिभा का अंदाज़ लगाया जा सकता है। उन्होने अपने वक़्त के दिग्गज कद्दावर अभिनेताओं के साथ काम किया यथा मास्टर निसार, सुरेंदर, एम. कुमार, मोतीलाल आदि। सुरेंदर और बिब्बो की जोड़ी ने कई सफल हिट फिल्में दीं : मनमोहन (1936), जागीरदार (1937) ग्रामोफोन सिंगर, डायनामाइट (1938) और लेडीज ओनली (1939) तब के वक़्त में बिब्बो का नाम कभी मास्टर निसार के साथ जोड़ा जाता कभी सुरेंदर के साथ। 1930 के अंत तक आते-आते बिब्बो ने अपनी फिल्म ‘अदल-ए-जहांगीर’ के निर्देशक खलील सरदार से निक़ाह कर लिया था। दोनों ने मिल कर लाहौर में 1937 में जब ‘कज्जाक की लड़की’ बनाई और रिलीज की। वह फिल्म फ्लॉप हो गयी। इस के बाद बिब्बो वापिस हिंदुस्तान लौट आयीं और खलील सरदार से तलाक हो गया। खलील सरदार वहीं लाहौर में ही रह गए।


बिब्बो के शौक निराले थे। उनकी समकालीन अभिनेत्रियां उनसे ईर्ष्या रखती थीं। बिब्बो का बिंदास रवैया, लाइफ स्टाइल सभी के लिए रश्क का बायस था। वे बिब्बो को लालची कहतीं। कारण कि जब अपने मियां खलील सरदार के निर्देशन में बनी फिल्म ‘कज्जाक की लड़की’ नहीं चली तो न केवल उन्होंने लाहौर छोड़ दिया बल्कि खाविन्द को भी छोड़ दिया था। बिब्बो घोड़ों की रेस में खूब जानकारी और रुचि रखती थीं। उन्हें रुमाल संग्रह करने की हॉबी थी। शानो-शौकत का आलम ये था कि वे अपने कपड़ों और जूतों तक में हीरे-मोती टाँकती थी।


बिब्बो जी का जूनागढ़ राजघराने में आना-जाना था। ऐसा कहा जाता है कि बिब्बो ने जूनागढ़ प्रिंसली स्टेट के प्राइम मिनिस्टर सर शाहनवाज़ भुट्टो (ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) से निक़ाह कर लिया था। हालांकि सर शाहनवाज़ भुट्टो पहले से ही एक हिंदू महिला लखी बाई (इस्लाम अपनाने के बाद खुर्शीद बेगम) से विवाहित थे। दूसरा, यह भी कहा जाता है कि बिब्बो का निक़ाह सर शाहनवाज भुट्टो नहीं, इमदाद अली भुट्टो के साथ हुआ था। वे ज़ुल्फिकार भुट्टो के बड़े भाई थे। बहरहाल यह सर्वविदित था कि बिब्बो ने ‘भुट्टो’ से निकाह किया हुआ था। सन् 1947 में भारत के विभाजन के वक़्त सर शाहनवाज़ भुट्टो और उनका परिवार ही नहीं बल्कि बिब्बो भी पाकिस्तान चली गईं, वहां उन्होने लगभग 50 फिल्मों में काम किया ज़्यादातर चरित्र रोल किए। ऐसा कहा जाता है कि जब सर शाहनवाज भुट्टो बीमार पड़े तब बिब्बो उनसे मिलने उन्हें देखने रिक्शे से आया-जाया करती थीं। 19 नवंबर 1957 को शाहनवाज भुट्टो का इंतकाल हो गया।
पाकिस्तान का प्रतिष्ठित फिल्म जगत का सर्वोच्च एवार्ड ‘निगार एवार्ड’ 1958 में बिब्बो को मिला अपनी फिल्म ‘ज़हर-ए-इश्क़’ के लिए (इसकी तुलना हाॅलीवुड के एकेडमी एवार्ड अथवा हिंदुस्खान के दादा साब फाल्के एवार्ड से की जाती है) प्रसंगवश ज्ञात रहे कि यह पुरस्कार 1957 से ही आरम्भ हुआ था और अगले बरस ही बिब्बो ने अपनी प्रतिभा से यह पुरस्कार प्राप्त किया। बिब्बो की फिल्मोग्राफी के अनुसार 1931 से 1947 तक 40 फिल्में हिंदुस्थान में और 1950 से 50 फिल्में पाकिस्तान में कीं। सन् 1972 में 25 मई को बिब्बो का टी.बी. से निधन हो गया।

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