Ravi ki duniya

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Tuesday, October 13, 2026

विभाजन का भारत-पाक फिल्म उद्योग पर प्रभाव

 



(शर्मीन चिनॉय निर्देशक, सुल्तान राही, नदीम बेग, माहिरा खान)

विभाजन की विभीषिका से जो झंझावात दोनों देशों के राजनैतिक, सामाजिक, औद्योगिक जीवन में आये उनसे पूछो तो दोनों ही देश के जन-मानस आज तक उबर नहीं पाये हैं। कितने परिवारों ने कितने ही अपनों को खोया। वह भी अमानवीय दुर्दान्त और दिल दहला देने वाली हिंसा से।

तब के संयुक्त हिंदुस्तान में फिल्म निर्माण के तीन केंद्र हुआ करते थे। लाहौर, तब का कलकत्ता, मुंबई और मद्रास। कालांतर में तीनों ही क्रमश: मुंबई, कोलकता और चेन्नई हो गए। लाहौर, कोलकता और मुंबई में प्रमुख स्टुडियो हुआ करते थे। उस वक़्त के लाहौर स्थित तीन बड़े-बड़े स्टुडियो के मालिक दलसुख पंचोली, ए.आर. कारदार और रूप के. शौरी थे। बँटवारे में तीनों ही हिंदुस्तान लौट आए। बहुत से कलाकार पहले से ही लाहौर से आकर यहाँ मुंबई और कोलकता में सक्रिय थे, यथा पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, राजकुमार, कामिनी कौशल, पुष्पा हंस, श्यामा, खुर्शीद, सुरैया, मुमताज़ शांति, मुनव्वर सुल्ताना, स्वर्ण लता, वीणा, मनोरमा, मीना शौरी, बेगम पारा, चाँद बर्क, गीता बाली, बीना राय, आशा माथुर, कुलदीप कौर, शमीम बानो, शमशाद बेगम, मोहम्मद रफी, बी आर चोपड़ा, ओ पी नय्यर, देव आनन्द, नक्श लायलपुरी, राजेन्द्र सिंह बेदी,

विभाजन अपने साथ लाया, सुनील दत्त, मनोज कुमार, प्राण, कुलदीप कौर, विभाजन बेला में जाने वालों की सूची में प्रमुख रहे नूरजहां उनके पति शौकत हुसैन रिजवी, एहसान उल हक़ (नसीम बानो के पति/सायरा बानो के पिता) विख्यात लेखक सआदत हसन मंटो, नज़ीर अहमद खान, स्वर्ण लता, लारी लप्पा गर्ल मीना शौरी, पति रूप के शौरी, खुर्शीद एवं मुमताज़ शांति, नज़ीर (के आसिफ के जीजा/सितारा देवी के पति) जिया सरहदी, रतन कुमार (सैय्यद नज़ीर अली) एम. कुमार, (सैय्यद अली हसन ज़ैदी, ये वही हैं जिन्हें निर्देशक देबकी कुमार बोस ने अपने नाम में से 'कुमार' निकाल कर दिया और इन्हें एम. कुमार बना दिया। 'कुमार' नाम देबकी बोस ने फिर कभी अपने नाम के साथ नहीं लगाया, इनकी देखा-देखी अनेक फिल्म कलाकार अपने नाम के पीछे कुमार लगाने लगे) अजूरी, ( अपने वक़्त की मशहूर डांस क्वीन, इनकी डांस में उत्तराधिकारी बनी कुक्कू और कुक्कू से डांस का चार्ज मिला हेलन जी को) बेगम पारा (वापिस आ गईं थीं) शेख मुख्तार (विभाजन के कई बरस बाद गये) रेहाना, बिब्बो उर्फ इशरत सुल्ताना।


लाहौर न केवल संयुक्त पंजाब की राजधानी रहा अपितु फिल्म निर्माण का मुख्य केंद्र भी रहा। लाहौर आज भी पाकिस्तान की साइड वाले पंजाब की राजधानी है। संयुक्त पंजाब तो इतना विशाल था कि क्या अमृतसर, क्या रावलपिंडी, क्या शिमला, अमृतसर, रावलपिंडी, मुलतान, सियालकोट, गुजरवालां, फैसलाबाद, फ़िरोज़पुर, लुधियाना, जालंधर सभी इलाके, पंजाब के उर्वरा और समृद्ध सूबे का हिस्से थे। यद्यपि इसके अलावा बलोचिस्तान, सिंध, नॉर्थ वेस्ट फ़्रंटियर, प्रिंसली स्टेट जैसे कि बहावलपुर, खैरपुर। अभिनेत्री वीणा और अभिनेता राजकुमार बलोचिस्तान से ही थे। जबकि मनोज कुमार एबटाबाद से थे।

हिन्दुस्तान से पाक हिजरत करने वाले फिल्मी लोग बहुत सारी उम्मीदें और प्रत्याशा के साथ आए थे। उसे टूटते देर न लगी। यहाँ तक कि जब शेख मुख्तार अपनी फिल्म अनारकली को लेकर पाक गए तो वहाँ उन्हें लंबी मुक़दमेबाज़ी का सामना करना पड़ा। ऐसे में उनकी आँखों की रोशनी भी चली गयी। विडम्बना ये है कि जब वे वहाँ की अदालत से केस जीत गए और फिल्म रिलीज़ हुई और हिट हुई उसको देखने के लिए शेख मुख्तार ज़िंदा नहीं थे। बाकी हिजरत कर पाक जाने वाले फिल्म वाले कई कारणों से फुस्स हो गए। उनकी प्रतिभा में कोई कमी नहीं थी बस वहाँ अनुकूल माहौल नहीं मिला। न वो संभावनाएं मिलीं जिनके ख्वाबों का पीछा करते वे वहाँ गए थे।


एक ज़माना था जब पाकिस्तान संसार में फिल्म बनाने की प्रक्रिया में चौथे नम्बर पर था। (पहला भारत, दूसरा अमेरिका, तीसरा जापान) अभी तक पाकिस्तान ने 14000 फिल्में उर्दू में दी हैं जबकि 10,000 पंजाबी में, 8,000 पश्तो, 4000 सिंधी भाषा में, 1000 फिल्में बलोच भाषा में बनीं हैं। इस सबके बावजूद दुखद ये है कि जहां हिंदुस्तान में अब तक पृथ्वीराज कपूर से आरंभ हो 20 फिल्मी लोग राज्य सभा में नामित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त अनेक मुख्यमंत्री, मंत्री, और लोक सभा के सदस्य रहे हैं और अभी भी हैं। भारत रत्न, व अन्य पद्म एवार्ड्स की तो हिन्दुस्तान में लम्बी सूची है जो फिल्म से बावस्ता लोगों को मिले हैं और साल-दर-साल मिल रहे हैं। इसके बरक्स पाक में केवल दो उदाहरण मिलते हैं एक तारिक अज़ीज़ और दूसरा उदाहरण है कंवल नाॅमेन का। यह इसलिए संभव हो पाया कि न केवल समाज, बल्कि राजकीय स्वीकार्यता और प्रश्रय मिला है वैसा पाकिस्तान में संभव नहीं हो पाया। इसके मुख्यतः धार्मिक, मिलिटरी, राजकीय कारण रहे हैं। पाक में 1960 और 1970 का दशक फिल्म निर्माण में गोल्डन पीरियड रहा है। जबकि 1980 का दशक खासकर जनरल जिया के समय से फिल्म उद्योग का पतन शुरू हुआ। 1965 भारत-पाक युद्ध के बाद भारत की फिल्में पाक में पूरी तरह बैन हो गईं। कुछ ऊटपटाँग किस्म की शर्तें यथा हिदायतकार (डाइरेक्टर) का डिग्री होल्डर होना चाहिए, रॉ मेटेरियल और इक्विपमेंट के आयात को कठिन से कठिनतर करना। रजिस्ट्रेशन के नए दुरूह नियम। फंडिंग की कड़ी शर्तें, नए-नए टैक्स और सिंगल स्क्रीन सिनेमा हाॅल को जबरन बंद कराना। रही बची कसर पाइरेसी और वी.सी.आर. ने पूरी कर दी। एक के बाद एक न केवल थियेटर बल्कि स्टुडियो भी बंद होने लगे। लाहौर से फिल्म उद्योग पेशावर (पश्तो फिल्मों के लिए) चला गया। जिसे बड़ी संख्या में अफगानिस्तान शरणार्थी पसंद करते थे। इसी तरह टेली-प्ले, ड्रामा, सीरियल कराची जा पहुंचा है और खूब फल-फूल रहा है।


जिस तरह हिंदुस्तान में भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री, दादा साब फाल्के एवार्ड हैं जो फिल्मों से जुड़े लोगों को समय-समय पर नियमित रूप से सम्मानित करता रहा है। पाक में भी एवार्ड तो हैं मगर वे उतने व्यापक नहीं हैं यथा निगार एवार्ड, प्राइड ऑफ परफ़ाॅर्मेंस, सितारा-ए-इम्तियाज़, निशान-ए-इम्तियाज़ आदि हैं। हमारे फिल्मफेयर एवार्ड की तर्ज़ पर वहाँ 'लक्स स्टाइल एवार्ड' है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में दो डाॅकुमेंट्री फिल्मों को ऑस्कर एवार्ड भी मिला है। 2012 की सेविंग फेस ( एसिड अटैक पर) दूसरी 2016 की ए गर्ल इन दि रिवर (ऑनर किलिंग पर) दोनों ही डॉक्युमेंट्री महिला डाइरेक्टर शर्मित ओबैद चिनाॅय द्वारा बनाई गईं हैं।


किसी भी कला को पनपने के लिए माकूल माहौल, सुविधाएं और सामाजिक-राजकीय स्वीकार्यता चाहिए, पैट्रोनेज़ रूपी पर्याप्त खाद-पानी चाहिए। पाक में इसका अभाव रहा है। कहावत है कि जब एक दरवाजा बंद होता है दूसरी खिड़की खुल जाती है। पाक के टेली-प्ले, सीरियल और स्टेज के नाटक असाधारण रूप से बेजोड़ हैं और बेहद पसंद किए जाते हैं। पूरी दुनिया में एक दर्शक वर्ग पाक के नाटकों, टेली-प्ले और सीरियलों का दीवाना है। उनका इंतजार करते हैं।


सिने तारिकाएं कान, नाक, गले, बाजू में हीरे-मोती पहनती हैं। आगामी किस्त में आपको परिचित करायेंगे बेहद खूबसूरत बिब्बो (इशरत सुल्ताना) से जिसका शौक रुमाल संग्रह से लेकर हाॅर्स रेस था। सबसे अद्भुत शौक था हीरे-मोती का जो बिब्बो अपनी ड्रेस एवं शूज़ में फिक्स कराती थी।

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