Ravi ki duniya

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Tuesday, October 13, 2026

पृथ्वीराज कपूर -फिल्मों की फर्स्ट फैमिली के पितामह

 

                                   



यदि आप पृथ्वीराज कपूर को गूगल पर सर्च करें तो सर्च इंजन आपको लाखों एन्ट्रीज़ दिखाता है। यही वो बात है, जिनसे लीजेंड बनते हैं। वास्तव में पृथ्वीराज कपूर अपने जीवनकाल में ही अपनी फिल्मोग्राफी, अपने सद् व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व और गर्मजोशी से एक लीजेंड बन गये थे और सदैव बने रहेंगे।


उनका जन्म 3 नवंबर, 1906 को समुंद्री लायलपुर, फैसलाबाद में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में स्थित है। उनका जन्म का नाम पृथ्वीनाथ था। उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर इंपीरियल इंडियन पुलिस में पुलिस ऑफीसर थे। पृथ्वी राज कपूर अपने दादा दीवान केशवमल से बहुत जुड़े हुए थे। पुलिस में रहते हुए, उनके पिता पेशावर में तैनात थे। पृथ्वीराज कपूर की शिक्षा पेशावर के प्रसिद्ध एडवर्ड कॉलेज में हुई थी। उन्होंने न केवल बी.ए. पास किया, बल्कि कानून की शिक्षा भी प्राप्त की। एक रिकाॅर्ड जो कपूर वंश में कोई अन्य मैच नहीं कर पाया। पृथ्वीराज कपूर के अभिनय कौशल को चमकाने का श्रेय कॉलेज फैकल्टी प्रोफेसर जय दयाल जी को जाता है। उन दिनों के चलन के अनुसार पृथ्वीराज कपूर की 18 वर्ष की उम्र में 15 वर्षीय रामसरनी राम मेहरा से शादी हो गई।

अपनी चाची से पैसे उधार ले कर पृथ्वीराज कपूर ने 1928 में बॉम्बे का रुख किया। 1929 में अपनी तीसरी ही फिल्म-‘सिनेमा गर्ल’ में वे मुख्य भूमिका (लीड रोल) में थे। कुल मिलाकर, उन्होंने 9 मूक फिल्मों में अभिनय किया। कम लोग जानते होंगे उन्होंने ‘आलम आरा’ में अभिनय किया था जो 1931 में भारत की पहली टॉकी फिल्म थी। ‘विद्यापति’-1937 में उनके अभिनय की बहुत सराहना की गई। उनके शानदार अभिनय वाली फिल्म थी सोहराब मोदी की ‘सिकंदर’ – 1941 में अलेक्जेंडर द ग्रेट के रूप में थी। बहुत कम लोगों को पता होगा कि उन्होंने 1971 में एक कन्नड़ फिल्म ‘सक्षतकारा’ में भी अभिनय किया था। उनकी विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण है फिल्म सिकंदर में जहां पृथ्वीराज जी ने 1941 में सिकंदर की भूमिका की (सोहराब मोदी पोरस बने थे) तो ‘सिकंदर-ए-आज़म’ 1965 में पोरस की भूमिका अदा की। (दारा सिंह ने सिकंदर का करैक्टर किया)

पृथ्वीराज कपूर के पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर ने भी ‘अवारा’ में एक छोटा रोल (कैमियो) किया था। पृथ्वीराज अंग्रेजी थिएटर कंपनी ‘जे. ग्रांट एंडरसन’ में शामिल हो गए थे। बाद में, उन्होंने 1944 में पृथ्वी थिएटर की मुम्बई में स्थापना की। हिंदुस्तान में आधुनिक शहरी प्रोफेशनल रंगमंच की अवधारणा को लाने, स्थापित करने और उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे। अब तक, रंगमंच अनिवार्य रूप से या तो ग्रामीण लोक कला या पारसी रंगमंचीय मानस का हिस्सा था। 16 वर्ष की अल्प अवधि में, पृथ्वी राज कपूर ने पृथ्वी थिएटर ने शहर शहर घूम कर 112 नगरों में 2662 शो किए। इसमें उन्हें 5982 दिन लगे। और, हाँ, पृथ्वी राज कपूर ने इन सभी नाटकों में मुख्य अभिनेता की भूमिका अदा की थी। उनके प्रमुख नाटक रहे शकुंतला, पठान, दीवार, गद्दार, पैसा, आहुति, कलाकार, एवं किसान। उनके ट्रूप में 150 सदस्य थे। मुख्य थे वे खुद, उनका परिवार, उज़रा मुमताज़, जोहरा सहगल, प्रेमनाथ, राजेन्द्र नाथ, सज्जन, एल. वी. प्रसाद, मोहन सैगल। बलराज साहनी, ख्वाजा अहमद अब्बास, रामानन्द सागर, राम गांगुली, प्रयाग राज, शंकर-जयकिशन।

सन् 1954 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किया गया था। भारत सरकार ने उन्हें 1969 में पद्म भूषण प्रदान किया था। उन्हें 1971 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अगर किसी से पूछा जाए कि डॉ. जाकिर हुसैन और पृथ्वीराज कपूर के बीच क्या काॅमन है, तो तुरंत जवाब नहीं सूझेगा। सच यह है कि दोनों आजाद भारत की पहली राज्यसभा के सदस्य थे। 1995 में भारत सरकार ने पृथ्वी थिएटर के 50 वर्षों की याद में पृथ्वीराज कपूर के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। और हाँ ! डाक टिकट पर उनका चित्र दिया गया है। कोई नाम नहीं है। कौन है, जो फिल्म उद्योग के इस दिग्गज को पहचान नहीं सकता।

कुल मिलाकर, उन्होंने बेजोड़ समर्पण भाव के साथ नाटकों और 100 से अधिक फिल्मों में काम किया। तब की सभी टाॅप हीरोइन के साथ काम किया यथा नसीम बानो, दुर्गा खोटे, एर्मालीन, वनमाला, ज़ुबेदा, जिल्लो, हुस्न बानो, इंदिरा देवी आदि। 29 मई, 1972 को कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के 15 दिन के अंदर उनकी पत्नी की 14 जून, 1972 को मृत्यु हो गई।

अभिनेता आयेंगे। अभिनेता जायेंगे लेकिन लीजेंड हमेशा के लिए होते हैं और कपूर खानदान आने वाली कई-कई शताब्दियों तक सेल्युलॉइड के माध्यम से ‘मासज़’ और ‘क्लासज़’ दोनों को अपनी विलक्षण अभिनय प्रतिभा से पीढ़ी दर पीढ़ी मंत्रमुग्ध करते रहेंगे।

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