Ravi ki duniya

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Saturday, October 3, 2026

जंतर-मंतर-छूमंतर

 

मेरा भारत महान एक बहुत वाइब्रेन्ट डेमोक्रेसी है। जिसे कहते हैं हैपनिंग बस आप ठीक समझे हिंदुस्तान को आप हल्के में न लें। हिंदुस्तान हैपनिंग प्लेस है। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के जानकार ये बात जानते हैं कि भारत की आज़ादी में स्टूडेंट्स की बहुत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका रही है। लॉर्ड एक्टन बहुत पहले कह गए हैं “शक्ति का रुझान भ्रष्ट करने की तरफ होता है और सम्पूर्ण /अबाध शक्ति सम्पूर्ण तौर पर भ्रष्ट कर देती है” यह बहुत अच्छी सीख है किन्तु सभी सीखों की तरह यह बस उद्धरण करने के काम आती है। हम इससे कुछ सीखते नहीं है खासकर वे जिन पर शक्ति होती है। सत्ता का मद कहिए या सत्ता में ऐसी ही कुछ सिफ़त होती है कि आपको ये भान ही नहीं रहता कि ये आनी-जानी चीज़ है। आपको अगर पता भी है तो यह आप इसके लिए प्रेरित नहीं  हो पाते कि जन-कल्याण किया जाये, जिसके लिए उन्हें चुना गया है। इसके उलट आप समेटने और बटोरने में लग जाते हैं। बिना इस बात को याद किए कि जब शतरंज का खेल खत्म हो जाता है तो बादशाह हो या प्यादा दोनों एक ही डिब्बे में जाने हैं।

 

बहुधा यह कहा-सुना जाता रहा है कि महिलाएं ईमानदार होती हैं वे भ्रष्टाचार में नहीं पड़ती हैं। हमारे भारत महान ने इस मिथक को तोड़ा है। आप पिछले पचास साल की राजनीति पर नज़र डालेंगे तो पाएंगे ऐसा कुछ नहीं है महिलाएं अधिक नहीं तो पुरुषों से इस मामले में भी दोयम दर्जे पर नहीं रहना चाहतीं। आप इसे नाम कुछ भी दे दें। मकसद तो एक ही है। (जैसे स्कूल-कॉलेज किसी न किसी फंड के नाम से अथवा डोनेशन, मेनेजमेंट सीट, एन आर आई कोटा केपिटेशन-फी आप पुकारें किसी भी नाम से गुलाब की खुशबू वही है, जो आप चाहते हैं)

 

इसी तरह यह भी एक मिथक रहा है कि फलां तो अकेला है छड़ा-छांट है उसे पैसे से क्या लेना-देना। उसके ना आगे कोई है ना पीछे कोई है। ये मिथक प्रजा को बहलाने के बड़े काम आता है हालांकि इसमें ज़्यादातर केस में प्रजा को असलियत का पता होता है। यह उसी तरह से है जैसे आपको बंबईया फिल्म में ‘एंड’ पता होता है पर आप पिक्चर पूरी देखते हो। अतः मेरे भारत महान ने ये दो मिथक बुरी तरह झुठलाए है। हबीब जालिब साब ने फरमाया है:

 

               "तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था

                 उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।"

 

ऐसा सुना जाता है कि हर वह शख्स ईमानदार है जिसे मौका नहीं मिला। क्या ऐसा है? देखिये आप जंगल में रहें और अपने ब्रह्मचारी होने का ढिंढोरा पीटें। बात तो तब है जब आप आबादी में रहें जहां फिसलने के अवसर हैं वह है आपके ब्रह्मचर्य का ‘लिटमस टेस्ट’ है। इससे याद आया कि ‘आप बहुत अच्छे हैं’ ये बात तो दूसरे ने कहनी है।  ये क्या बात हुई कि ‘मैं अच्छा हूँ’ यह आपको ही कहना पड़ रहा है या फिर इश्तिहार और अखबार के अखबार में पेज़ दर पेज़ बड़े-बड़े विज्ञापन देने पड़ें। किराये की भीड़ इकठ्ठा करनी पड़े। कहा जाता है कि नेशनल फलक पर लास्ट दो ही नेता रहे हैं जिन्हें लोग सुनने खुद-ब-खुद आते थे।  वे थे इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी।

 

इस रेलम-पेल में आप ये मत भूल जाना कि संत कबीर कह गए हैं “ माया महाठगिनी हम जानि...त्रिगुण फांस लिए बोल मीठी बानि” आपको यह फिक्र भी होनी चाहिए कि लोग आपको कैसे याद रखते हैं। गांधी जी ने अगर सविनय अवज्ञा (सिविल डिसओबीडियेन्स) आंदोलन चलाया तो उन्होने ही ‘अंग्रेज़ो भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का आव्हान किया था।