Ravi ki duniya

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Sunday, April 26, 2026

व्यंग्य: गैस पर खाना पकाने के नुकसान


     

                       गैस के घर-घर आने से पहले ज़िंदगी कितनी आसान थी। आज की पीढ़ी इसका अनुमान भी नहीं लगा सकती। जीवन सिंपल था। गृहणियाँ सुबह से शाम तक बिज़ी रह पातीं थी। चाहे गोबर के कंडे बनाना हो या फिर लकड़ी की टाल से लकड़ियाँ लाना हो। जब घर घर मटियारे चूल्हे होते थे जीवन 'फन' था। उसे समय -समय पर बड़े मनोयोग से और कई बार कलात्मक ढंग से पोता जाता था, सजाया जाता था। उसमें से निकलने वाले धुएँ के लिए छत में एक धुंआरा भी बनाया जाता था जो कि बहुत सस्ते में बन जाता था आजकल की तरह डिज़ाइनर चिमनी नहीं हुआ करती थीं जो कि लाखों रुपये में आती हैं। अब इसमें सजावट या क्रिएटिविटी लगाने की न कोई जरुरत है न कोई स्कोप। इसमें तो बस पैसा है। तरह-तरह की चिमनियाँ बाज़ार में हैं। हाँ ए. एम. सी. कराना नहीं भूलना ज़रूरत पड़ती रहती है।

  

                   चूंकि मेरे भारत महान में खाना पकाना महिलाओं का प्रमुख 'टाइम पास' और वृत्ति थी अतः मर्दों के पास उनको बिज़ी रखने का ये भी एक उपकरण था। महिलाओं के लिए गैस एक बहुत बड़ा 'गेम चेंजर' बन कर आया। अब उनके पास टाइम ही टाइम था। जो रख सकते थे उन्होने दो या दो से भी अधिक गैस के सिलिन्डर रख लिए ताकि सप्लाई नियमित बनी रहे। जहां पाइप से गैस आ रही है वहाँ तो और भी आराम हो गया। न कम गैस के सिलिन्डर का झंझट न फोन पर फोन और गैस वाला भैया को टिप देने की आफत। पर देखिये गैस के आने से सबसे पहले तो गैस पर बना खाना खाने से लोगों के पेट में गैस होने लगी। हर घर में हिंगोली, हाजमोला और ईनो मिल जाएगी। हर दूसरा आदमी गैस की समस्या से परेशान है अब चाहे वह सिलिन्डर वाली गैस हो या पेट की गैस। गैस आने के बाद सिलिन्डर भी खूब फटने लगे। जहां देखो, जब देखो गैस सिलिन्डर फट जाता। जान-माल का नुकसान अलग करता। उससे पहले स्टोव भी थे जिसमें घासलेट बोले तो मिट्टी का तेल यानि किरोसिन इस्तेमाल होता था। वह तो खूब ही फटते थे और उनका निशाना सीधा घर की बहू पर होता था। आपने कभी नहीं सुना होगा स्टोव के फटने से फलां सास की मृत्यु। जब मरती तब बहू ही मरती।

 

                      गैस के साथ और भी झंझट हैं जैसे उसकी पाइप का ख्याल रखना पड़ता है। कहीं से गैस लीक तो नहीं कर रही। रात को कितनी बार सोते-सोते उठ कर देखना पड़ता है कहीं गैस खुली तो नहीं छोड़ दी। गैस आई तो 'लाइटर' भी आया, और कितनी ही एक्सेसरीज़ आयीं। दूसरे शब्दों में खर्चा ही खर्चा। लकड़ी के चूल्हे, अंगीठी और स्टोव में इतना खर्चा नहीं होता था। लकड़ी का चूल्हा हमें आत्मनिर्भर बनाता था। क्या अब वक़्त नहीं आ गया है कि हम फिर से आत्मनिर्भर बन जाएँ। वैसे भी नई पीढ़ी बोले तो 'जेन जी' को खाना पकाने से नफरत है। अब ये फैशनेबल हो चला है कि लड़कियां कहती फिरें  उनको खाना बनाना नहीं  आता। असल में उनको किचन से ही नफरत है।

 

           गिव अप गैस। लैट्स गो बैक टू गोबर कंडा चूल्हा। बी आत्मनिर्भर !!

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