Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Sunday, April 26, 2026

व्यंग्य: सड़क पर गड्डों का महत्व

 

                   पहले सड़कों पर गड्डे न थे। दरअसल पहले सड़कें ही न थीं। तब मार्ग सुलभ नहीं हुआ करते थे। इससे आदमी खूब हिचकोले खाता आगे बढ़ता था अथवा पैदल चल-चल कर भाग-दौड़ करके हलकान हुआ करता था। तब आदमी मजबूत हुआ करते थे। वे चपल, फुर्तीले हुआ करते थे। आजकल की तरह नहीं कि जरा दचका लगा और 'स्लिप डिस्क' हो गई। किसी डॉ. के आजीवन गाहक। डॉ. तो तैयार ही बैठे हैं आपको अपने क्लीनिक का 'लाइफ मेम्बर' बनाने को।

  

                     फिर जब सड़कें बनने लगीं तो जाहिर है उनमें गड्डे भी होने थे। कभी ठेकेदार की वजह से कभी इंजीनियर की वजह से और कभी दोनों के संयुक्त प्रेम के सौजन्य से। सड़क पर गड्डे हों तो रोजी-रोटी अच्छी चल जाती है, क्या म्युनिसिपलिटी के अफसर, क्या डॉ. क्या इंजीनियर क्या ठेकेदार। ये सड़क आपको 'पाॅवर' तक नहीं ले जाती बल्कि ये तो सड़क के गड्डे हैं जो आपकी पहचान के क्षितिज को विस्तार देते हैं। उसे गड्डों से निकाल कर उन्नत शिखर तक पहुंचाते हैं।

 

               सड़क पर गड्डे हों तो आप चौकन्ने रहते हैं। आप को गड्डों से बच कर चलना आ जाता है। सड़कों के ये गड्डे आपको 'लाइफ-कोच' की तरह जीवन जीने के गुर सिखाते हैं। कैसे परेशानियों से जूझा जाये, कैसे उनसे बचा जाये। मुसीबतों से कैसे बाहर आया जाये। वो शेर है ना:

 

                   "...आसानियां हों तो ज़िंदगी दुश्वार हो जाये

 

                  जहां सड़कों पर गड्डे न हों तो वहाँ के बाशिंदे बड़े नाज़ुक मिज़ाज, कमजोर होते हैं और उसी रंग में आने वाली पीढ़ी को रंग लेते हैं। जबकि ज़िंदगी न केवल फेयर नहीं है।  वह आसान भी नहीं है। आपको बार-बार गिर कर उठना है। ऐसे नहीं कि एक बार गिरे तो गड्डे के ही होकर रह गए।

 

                      इसी श्रंखला में जब खबर आई कि एक अस्पताल में मरीज के कोमा में जाने के बाद उसके परिजनों ने मरीज को घर ले जाकर क्रियाकर्म करना ही ठीक समझा। कारण - कहते हैं न ज़िंदा हाथी एक लाख का तो मरा हाथी सवा लाख का। अस्पताल वाले कोमा वाले मरीज का भो रोज़ का इतना बिल बना देते हैं कि परिवार बिना अस्पताल के ही कोमा में जाने को होता है। जब वे खटारा एंबुलेंस में दादी को क्रियाकर्म को ले जा रहे थे तो किसी सड़क के गड्डे पर एंबुलेंस इतनी ज़ोर से उछली कि दादी कोमा से बाहर आ गई। दादी को होश आ गया। परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। जिसने भी खबर सुनी वह जहां था वही बिना गाड़ी उछल गया। अब परिवार ने तय किया है कि वे आज से गड्डों को सम्मान से देखा करेंगे। गड्डों को देखने की उनकी दृष्टि ही बदल गयी। वे ठेकेदार को ढूंढ रहे हैं ताकि उसका धन्यवाद दे सकें और सार्वजनिक अभिनंदन कर सकें।

 

                  इस सबके देखते अस्पताल वाले अलग इस रिसर्च में लगे हैं कि कैसे इन मरीजों को अपने शहर की सड़कों से गुजारा जाये ताकि उन्हें भी कोमा से बाहर निकाला जा सके। दूसरे कुछ अस्पताल अपने प्रांगण में ऐसा ट्रैक बनाने की सोच रहे है जिसमें छोटे-बड़े, गड्डे ही गड्डे हों। गोल्फ की तरह मरीज़ से उसी अनुसार फीस ली जाया करेगी। आप अपने मरीज को 'नाइन होल' वाली सड़क से ले जाना चाहते हैं या ‘18 होल' वाली सड़क से ?

 

No comments:

Post a Comment