मेरे भारत महान की महान ट्रेन में यात्रा
करते हुए एक यात्री के भोजन के साथ दी गयी दही में कुछ तैरता हुआ प्रतीत हुआ। उसने
गौर से देखा तो वे कुछ कीड़े थे। ऐसा समझिए एक प्रकार से नॉन-वेज दही थी। यात्री
पता नहीं वेजेटेरियन था अथवा नॉन वेजेटेरियन। बहरहाल नॉन वेजेटेरियन भी रहा होगा
तो भी उसे ये तैरते हुए कीड़े पसंद नहीं आए। उसने केटरिंग स्टाफ को बुलाया और उनसे
इस कीड़ों युक्त दही की शिकायत की। केटरिंग स्टाफ सत्य को पा चुके होते हैं। वे
सत्य की खोज में नहीं निकले हैं। उन्होने तुरंत यात्री की इस निर्मूल आशंका का समाधान
किया और समवेत स्वर में घोषणा की कि ये कीड़े नहीं केसर है। अब बारी यात्री के
चकराने की थी।
यात्री को सभवतः बताया गया कि उसने अभी तक
पिछड़ी हुई, थकी हुई गाय-भैंस के दूध की दही खाई है
यह नए भारत की नयी दही है। बहुत नायाब दही है। बोले तो जेनेटिकली माॅडीफाइड और
जिसे वह कीड़े समझ रहा है ‘रे मूरख ! वे कीड़े नहीं, नयी
प्रजाति की केसर है। बोले तो चलती-फिरती केसर। अंग्रेजी में मोबाइल केसर। भारतीय
रेलवे अपने यात्रियों के लिए कितने कष्ट सहती है और उनके लिए एक से एक ‘डेलीकेसी’
लाती है। इसी क्रम में यह चाइना वाली केसर है ये ऐसे ही कीड़े के माफिक लगती है।
कोई भी देखे तो ये ही समझे की कीड़े दही में चढ़ उतर रहे हैं। अठखेलियाँ कर रहे हैं।
यात्री का माथा एक बार को तो ठनका। फिर उसने
अन्य यात्रियों को भी दिखाया तो अन्य यात्रियों ने भी तस्दीक की कि यह केसर नहीं
कीड़े हैं। ‘क’ से केसर ‘क’ से कीड़े। कहाँ अंतर है ? केटरिंग
स्टाफ मानने को तैयार नहीं था। फिर उन्होंने बौद्ध धर्म का मध्यम मार्ग अपनाते हुए
कहा कि आप को ये केसर युक्त दही पसंद नहीं है तो आप मत लीजिये और उन्होने पूरी
गंभीरता से इस बात पर ज़ोर दिया कि आप दही के कप पर एक्स्पायरी डेट देख लीजिये अभी
एक्सपायर नहीं हुई है। अत: हमारी ओर से यह सर्वथा सेवन योग्य है। इनकी तरफ से ‘केस
क्लोज़’। उन्होने यह धमकी भी दे डाली कि इसका विडियो फैलाया या मंत्री जी के पोर्टल
पर शिकायत की तो उनसे बुरा कोई न होगा ये कीड़े भी नहीं और वे इस यात्री को मारते
मारते कीड़ा बना देंगे। क्या कीड़ा, क्या केसर सभी तो उस
कृपालु की क्रिएशन है। समदर्शी बनिए। इस चराचर जगत में क्या जड़, क्या चेतन सभी तो राम की माया है। राम जी का गुड़, राम
जी की चींटी। राम जी की कर्ड, राम जी के कीड़े, राम जी की केसर।
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