Ravi ki duniya

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Thursday, October 15, 2026

व्यंग्य: सत्यनिष्ठा से समृद्धि


                                                            


यह इस बरस की सतर्कता थीम है। देख रहे हो बिनोद ! कैसे शब्दों के साथ 'खेला' करते हैं। थीम के अंदर छुपा विरोधाभास और विनोदाभास आप भी देख-पढ़ और समझ पा रहे होंगे। ये किस युग की बात है जब सत्यनिष्ठा से समृद्धि आती थी। आज की तारीख में तो हरगिज़ नहीं। दिल पर हाथ रख कर बताएं क्या इसका उल्टा सच नहीं है? हम रात-दिन अपने आस-पास इसका उल्टा ही सच होता देख रहे हैं। असत्य निष्ठा से समृद्धि सुलभ है और शीघ्र है।

                       कहा बड़ों ने सन्मार्ग पर  मंज़िल मिलेगी

                       किन्तु पाया मैंने कुपथ पर लक्ष्य को समीप


अब आप अध्यात्म में मत घुस जाना कि इससे मन को शांति मिलती है। रात को नींद ठीक से आती है। मैंने देखा है वो तो बेचारा ये सोच सोच के मरा जाता है बेटी की शादी कैसे होगी? बेटे की नौकरी का क्या होगा? जो दंदी-फंदी हैं उनका कन्फ़्यूजन तो बस इतना है कि पढ़ने के लिए बालक को इंग्लेंड भेजना है या अमरीका। जबकि तथाकथित ईमानदार का रोना यह है कि आगे की पढ़ाई कैसे चलेगी? मकान कहाँ कैसे बन पायेगा ? या फिर सारी उम्र किराये के मकान में ही निकल जाएगी।


ये तथाकथित सत्यनिष्ठा वाले की लाइफ में 'वान्दे' ही 'वान्दे' होते हैं। 'लट जो संभालूँ तो घूँघट खुल जाये' टाइप।  बशीर बद्र साब ने कहा है ना :


                   ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है जमीं                                                                       

                    पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है


सत्यनिष्ठा वालों के अंतिम संस्कार के भी 'वान्दे' होते हैं। असत्यनिष्ठा वाले समृद्ध होते हैं अत: कितनी ही रकम दे कर अपने लिए पूरी की पूरी क़ब्र क्या मक़बरा बनवा सकते हैं। या फिर अपने महल के ही एक कोने में बढ़िया क़ब्र बनवा सकता है। सच तो ये है कि सत्य निष्ठा और समृद्धि परस्पर पूरक नहीं बल्कि विरोधाभाषी टर्म हैं। ये ऐसी थीम क्यों चुनी जाती है जिसे पढ़ कर बच्चा भी बता दे कि इस वाक्य में क्या गलती है। आपने शायद गांधी जी कीआत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’  नहीं पढ़ी है। चलो नहीं पढ़ी तो न सही पर आपने उनकी फोटो तो देखी है। बस समझ लो सत्य निष्ठा से आदमी को सारी उम्र एक लंगोटी में ही काटनी पड़ती है।


मैं किसी ऐसे समृद्ध व्यक्ति से मिलना चाहूँगा जो कह सके कि उसकी ये सारी समृद्धि सत्यनिष्ठा से आई है। सत्यनिष्ठा से तो आप कायदे के उपदेश भी नहीं दे सकते और ना ही एक सफल बाबा बन सकते हैं। आपने देखे हैं न आजकल के बाबा। ये पता नहीं किस युग में सत्यनिष्ठा से समृद्धि आती थी। मैं ऐसे असत्यनिष्ठ व्यक्तियों को जानता हूँ जिनकी हर महानगर में मकान-मढ़ैया  है। वो काका हाथरसी जी ने एक जगह कहा है ना:


                  क्यों काँप रहा रिश्वत लेकर    

                  पकड़ा जाये रिश्वत लेता

                  छूट जा रिश्वत दे कर


आज ऐसे इंसान को, बाबू को, अफसर को ज्यादा भाव नहीं दिया जाता जो ज्यादा सत्यनिष्ठा-सत्यनिष्ठा रटता रहता है। ऐसे बंदे को लोग संदेह से देखते हैं। या तो फौरन से पहले ट्रांसफर करवा देते हैं या फिर उसे खूब काम से लाद दिया जाता है। वह हरदम रोता ही रहता है। खुद भी तंग रहता है। बीवी बच्चों को भी परेशान रखता है। उन्हें लंबे- लंबे लैक्चर सुनाता है। वह एक गुड मैन  है। आपने ‘गुड मैन  दि लालटेन’ मुहावरा सुना है ना। तो बस जान लीजिये गुड मैन अक्सर 'गुड फॉर नथिंग' होते हैं। 

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