Ravi ki duniya

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Wednesday, March 20, 2019

व्यंग्य: खुला पत्र नीरव भाई के नाम

    
          नीरव भाई को मेरी यानि अपने सगे नानू भाई की जय श्री किशना ! मैं समझता हूं नीरव भाई ! ये लोग खाली-पीली शोर कर रहे हैं -- भाग गया ! भाग गया ! बैंको का तेरह हज़ार करोड़ रुपया ले कर भाग गया ! आप भाग गये ! आपको भगा दिया. ये गांडा हैं. जानते ही नहीं कि आपका तो नाम ही नीरव है, बोले तो शोर रहित. इसमें आपका क्या गुनाह ? जैसा नाम वैसा काम. ये मूरख क्या जानें ? बारीक़ बात है. इनके कूढ़ मगज़ में पड़ने वाली नहीं. फिर कह रहे हैं कि आपने बैंक से उधार लिया है. अरे तो बैंक होती काय के लिये है ? मैं सू बोलूं छू आपने तो उल्टे बैंकों की मदद की है. देखो ना कैसे चोर-उचक्के पूरा का पूरा ए.टी.एम का ए.टी.एम उखाड़ ले जाते हैं. अब आप पर बैंक का पैसा है ये आप जानते हैं, बैंक जानती है. आपस की बात है, इसमें लोचा क्या है ?  खाते-कमाते उधार भी चुकता हो जाना है. आप टेंशन न लें. ये कौव्वा लोग का तो काम ही काँव-काँव करना है.

          संत-महात्माओं की भूमि पर यह चार्वाक दर्शन के खिलाफ जाता है. आप से पहले भी भारत की पावन भूमि पर अनेक महापुरुष बहुराष्ट्रीय हुए हैं. यहां नाम लेना ठीक नहीं. किसी का छूट गया तो बुरा भी मान सकता है. मज़े की बात ये है उधार बैंक का लिया है, वो भी सरकारी बैंक का, न तो बैंक कुछ कह रही है, न सरकार. बस ये विपक्ष को ना जाने क्या पड़ी है, बावेला मचाये है. इन सब को नीरव कर दो आप तो. इन्हें आप पर गर्व होना चाहिये. आपके तौर-तरीके, बोले तो मॉडस ऑपरेंडाई इन्हें सिलेबस में डाल के प्राइमरी से लेकर बिजनस स्कूल तक पढ़ाई जानी चाहिये. आजकल वैसे भी चारों ओर सिलेबस रिवाइज़ करने की मुहिम चली हुई है. मैनेजरों की भावी पीढ़ी और उद्यमियों को बताया जाये कि हमारे एक हिंदू भाई ने कितनी तरक्की की है और कर सकता है. ऐसे कर सकता है कोई अन्य धर्मावलम्बी ? बस सैकुलर..सैकुलर का गीत गाते रहते हैं. इससे कुछ होना-जाना नहीं है. बैंक की तो टैग लाइन ही थी दि नेम यू कैन बैंक अपॉन अब आपने बैंक किया तो लगे हो-हल्ला करने. वैसे जेटली जी ने आपका काफी बचाव किया है, उन्होने जेठा भाई     माल्या का भी बहुत बचाव किया था. “न कॉन्ग्रेस अनाप-शनाप, अंधाधुंध लोन देती न नीरव को देश छोड़ कर जाता”. लोग कितने खराब होते हैं देखो ! आपके सारे उपकार, सारे कॉकटेल, सारे स्टेज शो भूल गये कहते फिर रहे हैं:
              “ (नी)रव ने बना दी जोड़ी “

          हमें पता है हीरा है सदा के लिये. आप हीरे के सौदागर हैं, सो आप भी सदा के लिये हैं. शाश्वत हैं, अमर हैं. आपको यह वरदान प्राप्त है. अब आप देखिये आपने लंदन में शुतुरमुर्ग के पंखों की एक जैकट पहन रखी थी. ये बेवकूफ उसी को रो रहे हैं कि 80 लाख की थी कि एक करोड़ की थी. अरे भाई ! तो क्या हुआ लंदन में मुम्बई के फैशन स्ट्रीट के या सरोजिनी नगर के  सस्ते कपड़े पहन कर देश की नाक कटवायें. इतनी छोटी सी बात के लिये मगज़मारी करते हैं. ये देश की इज़्ज़त, मान-सम्मान का सवाल है. जैसे शुतुरमुर्ग रेत में मुंह डाल कर निश्चित हो जाता है कि उसे कोई नहीं देख रहा हू ब हू वैसे ही आपकी भी प्लानिंग ये थी कि शुतुरमुर्ग के पंखों की जैकट पहन आपने भी छिप जाना है. बुरा हो इन खोजी पत्रकारों और मोबाइल में कैमरा डालने वालों का. इतनी दाढ़ी-मूंछ में भी आपको पहचान लिये और लगे आपको हरैस करने. आपने सही ही इनके मुंह पर तमाचा मारा ये कह कर कि नो कमेंट्स. सब हाथ मलते रह गये. नहीं ये तो सोचे थे दो-चार दिन टी.वी. पर टी.आर.पी. बढ़ाते रहते. कौन जाने कुछ प्रमोशन कुछ इनाम-इक़राम झटक लेने में क़ामयाब हो जाते.
दरअसल, हमारे देश में कोई किसी को खुश या सफल होते नहीं देख सकता. उसे सहन ही नहीं है कि अगला कैसे इतनी तरक्की कर गया. लग जाते हैं टाँग खींचने और मीन-मेख निकालने में. पर वांदा नहीं. ये गिरफ्तारी, ये रैड कॉर्नर नोटिस ये सब नटवर नागर की लीला है. भूल गये ? मैंने कहा न हीरा है सदा के लिये. आप तो हमारे कोहनूर हो. लंदन-फंदन क्या होता है जी, आदमी व्यापार की खातिर आदिकाल से देश-देश नये-नये तटों पर जाता रहा है. इसमें नया क्या है ?

          छोटे लोग, छोटी सोच. कहते फिर रहे हैं कि आप बड़े मँहगे होटल में रह रहे हैं अरे नहीं तो क्या स्लम में रहें. दरअसल ये खुद जब जाते हैं तो बजट होटल में रुकते हैं बैड एंड ब्रेकफास्ट वाले में और भुक्खड़ लोग ब्रेकफास्ट इतना ठूंस-ठूंस कर करते हैं कि लंच तो लंच इनकी कोशिश होती है कि डिनर भी न करना पड़े. तो मोठा भाई ! आप आना चाहो तो आ जाओ, कोई हरकत नहीं. अपने लोग यहाँ हैं जो सब एडजस्ट कर देंगे. बैंक के अंदर क्या, बाहर क्या. बस आप तो आकर जिसकी भी सरकार हो उसको समर्थन का ऐलान कर दीजिये कि आपसे जो भी बन पड़ेगा तन-मन-धन से देश निर्माण में लगा देंगे. इस सेन्टेंस के सहारे हमारे नेता लोग सन सैंतालीस से अपनी गाड़ी चला रहे हैं. आप चाहो तो राज्यसभा की मैम्बरी की बात चलाऊं ? आप बेफिक़र हो कर देश वापस आओ. कुछ दिन तो नहीं, अब सारे दिन गुजारो गुजरात में. भूल गये ? हीरा है सदा के लिये   

Tuesday, December 25, 2018

व्यंग्य: जय हनुमान तेरा ही आसरा

“भूत पिशाच निकट न आवे महावीर जब नाम सुनावे” पर देख रहा हूं कि भूत पिशाच निकट तो नहीं आ रहे पर वो सब अपने-अपने खेमे में ही महावीर को ले आने का दम भर रहे हैं. लेटेस्ट बताते हैं कि हनुमान गुसाई, गुसाईं-फुसाईं कुछ नहीं थे बल्कि दलित थे. अधिकारिक घोषणा की जा चुकी है. कास्ट सार्टिफिकेट बन गया है, चुनाव आ रहे हैं,
यहां तक तो ग़नीमत थी, बुक्कल नवाब फरमा रहे हैं कि हनुमान मुस्लिम थे. अपनी बात की सपोर्ट में उन्होने तर्क भी दिये हैं कि ऐसे नाम सलमान, रहमान रमज़ान, फरमान इस्लाम में ही रखे जाते हैं. सही भी है. नामकरण से तो यही लगता है. पहले एक जोक चला करता था उम्मीद न थी कि वो इतनी जल्द सच भी हो जायेगा. आपने सुन लिया होगा कि सिख भी कह रहे हैं कि हनुमान सिख थे, कारण कि इतना बल-शौर्य और कहीं देखा है आपने ? आपने देखा है किसी और क़ौम में ? उन्होने भी तर्क दिया है कि ऐसे नाम हमारे में ही होते हैं जैसे चंदर भान, गुरदास मान, 
अमेरिका वाले कहां पीछे रहने वाले थे मौका देख कर उन्होने भी दावा ठोक दिया है क्या पता इसी बहाने श्रीलंका वगैरा में घुसने का सुभीता हो जाये. अमेरिका वाले कह रहे हैं कि न केवल ऐसे नाम बल्कि ऐसे गुण वाले लोग केवल उनके यहां  ही होते हैं जैसे सुपरमैन, स्पाइडरमैन, बैटमैन आदि. उनका कहना है कि हनुमान नाम इसी श्रंखला में है और ‘मान’ जो है सो मैन का ही भारतीयकरण है अथवा बिगड़ा रूप है. तो भाईयो बहनों !  हनुमान जी गाँव-खेड़ा की सीमा लांघकर शहर, सूबे की सीमाओं का बॉर्डर कूदते-फ़ाँदते इंटरनेशनल हो गयेले हैं. (हनुमान जी तो वैसे भी हाई जम्प, लॉन्ग जम्प के चैम्पियन हैं)  जो काम पिछले 70 साल में नहीं हो पाया वो हो गया है. 
अब ईसाई लोग की बारी है अपना क्लेम डालने की. 
उधर कम्युनिस्टों ने अपनी पॉलिट ब्यूरो में प्रस्ताव पास कर लिया है कि हनुमान जी कार्ड-होल्डर क्म्युनिस्ट थे. यक़ीन नहीं तो उनका लिबास देख लो. पूरी ज़िंदगी फकत एक लंगोटी में काट दी. और कोई नहीं दिल से एक कम्युनिस्ट कॉमरेड ही ऐसा कर सकता है. 
कश्मीरी कह रहे हैं कि हनुमान जी कश्मीरी थे, जब पंडितों पर घाटी में ज़ुल्म बड़े थे उस दौर में वो माइग्रेट कर गये थे. उनको तभी तो सभी जड़ी-बूटियों का पता था. जब श्री राम ने संजीवनी लेने भेजा तो हनुमान जी को ही क्यों भेजा ? इसलिये कि ये बंदा जानता है कौन सी जड़ी-बूटी कहां मिलेगी, इसकी वाक़फियत भी है वहां तो कोई पंगा नहीं होगा नहीं तो बॉर्डर पर बहुतमच-मच रहती है. जड़ी-बूटी की खेती करने वाले कहीं नकली माल पकड़ा न दें ? आपको क्या पता नहीं है असली केसर और शिलाजीत के नाम पर कितना चूना लगाते हैं वो.  
पारसी कह रहे हैं कि वे खालिस पारसी थे. हम लोग भी शादी ब्याह नहीं करते हैं अलमस्त रहते हैं वैसे ही ‘आपरो बावा हनुमान’ 
नॉर्थ ईस्ट वाले उन्हें अपना बता रहे हैं वे कह रहे हैं कि अंग्रेजी में लोग-बाग हनुमान जी को  मंकी गॉड बताते हैं हमें भी लोग चिंकी-चिंकी कहते हैं, ‘इट इज ए केस ऑफ प्लास्टिक सर्जरी गॉन रॉंग’ 
चीन वाले आप सोचते हैं पीछे रहने वाले थे. वे हम सबसे तेज़ हैं. उनका कहना है कि हनुमान जी चीन अधिकृत तिब्बत के रहने वाले थे. उनका असली नाम हन-यू-मॉन था, जो हिंदुस्तान वालों ने हिंदी-चीनी भाई-भाई की आड़ में हनुमान कर लिया. वैसे भी हिंदुस्तान में नाम बिगाड़ने की प्रथा सी ही है. अच्छे भले कृष्ण को किसन, किसना कुछ भी कर लेते हैं 
इसी बीच ब्रेकिंग न्यूज आई है कि जाट भाई-लोग कह रहे हैं कि तन्नै बेरा भी सै वे हमारे थे, वे जाट थे. तन्नै डाउट हुआ तो हुआ क्यों कर मन्नै भी बता ताऊ ? अरे लय्यो मेरा लट्ठ कितै सै ? वही खिलंदड़पना, वही खाटी हास्य, वही दूसरों के फटे में कूदने की आदत और कहीं देखने-सुनने में आई है तन्नै बावड़ी बूच ?  
पिक्चर अभी बाकी है दोस्त. एक प्रमुख खिलाड़ी ने कह ही तो दिया कि हनुमान जी एक स्पोर्ट्स मैन थे. बस ! फाइनल डिसीजन. वही अदम्य साहस, वही बहादुरी, वही चैलेंज स्वीकारने को लपक पड़ने की तत्परता. खैरियत ये है कि खिलाड़ी ने यह नहीं बताया कि हनुमान जी क्रिकेटर थे, नहीं तो बाकी खिलाड़ियों ने भी मैदान में कूद पड़ना था, वाह जी वाह ये क्रिकेट वालों ने तो धांधली ही मचा रखी है. जहां देखो वहां मैच फिक्स करते डोलते हैं. हनुमान जी दरअसल हॉकी के खिलाड़ी थे, हॉकी की दुर्दशा से दुखी होकर उन्होने न केवल हॉकी से बल्कि सांसारिक ड्रिब्लिंग से ही सन्यास ले लिया था. मगर जब वक़्त आया तो ड्रिबल करते करते श्रीलंका तक आनन-फानन में जा पहुंचे थे. खो-खो और मल्ल खम्भ वाले उन्हें अपना बता रहे हैं. इस सब रेल-पेल में आप पहलवानी को मत भूल जाना जो आज भी अखाड़े में उनकी तस्वीर लगाते हैं और अपने खेल की शुरूआत ही हनुमान जी को नमन करने से करते हैं.  
प्रश्न ये है कि यदि हनुमान जी हिंदु थे तो उनकी जाति, उपजाति, गोत्र क्या था ? यदि वे मुस्लिम थे तो शिया थे या सुन्नी? वोहरा थे या इस्माइली / खोजा ? वे गुर्जर थे या मीणा ? फिर ये कि वे चौकीदार मीणा थे या ज़मींदार मीणा ? अभी तो मेरे भारत महान में असंख्य वर्ग/वर्ण/जाति/उपजाति/गोत्र हैं. सारांश ये है कि यार वोट हमें गिरवा दो चाहे हनुमान को किसी धम/जाति का सार्टीफिकेट हमसे ले जाओ. अपुन का तो एक हीच धर्म है-- कुर्सी  

Friday, December 7, 2018

व्यंग्य: मैं 2019 का चुनाव नहीं लड़ूंगा



            मैंने बहुत सोचा-विचारा है, और मेरे इस तथाकथित चिंतन के बाद मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि मैं अगला चुनाव नहीं लड़ूंगा. यूँ कहने को मैंने आज तक एम.पी., एम.एल.ए क्या अपनी रेज़ीडेंट वैलफेयर सोसायटी की कार्यकारिणी का चुनाव तक नहीं लड़ा है. दरसल उसके दो कारण हैं एक तो मैं अहिंसावादी जीव हूं अत: इस लड़ने-भिड़ने से उतना ही दूर ही रहता हूं जितना एक सरकारी बाबू ऑफिस के काम से रहता है. दूसरा मुझे इस बात का अंदेशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि मैं चुनाव हार जाऊंगा. घर में अपनी खुद की बीवी तक तो बात मानती नहीं है. मतदाताओं का सामना किस मुंह से करूंगा. मेरी जमानत जब्त होना तय है.

दूसरी बात ये है कि मैं मतदाताओं से क्या नया वादा करूंगा जो हमारे नेता लोग पहले नहीं कर चुके. मैं दिन-रात देखता हूं बेचारे नेताओं को दिन में कितनी बार पल्टी मारनी पड़ती है. धर्मेंद्र जी वाली स्टाइल में “मैंने ऐसा तो नही कहा था”. नेताओं की मानें तो हम सब बस अब स्वर्ग में जीने की प्रेक्टिस कर लें, कारण 2019 में नेता लोग हमारे वास्ते स्वर्ग यहीं भारत में ला रहे हैं. दिल्ली वालों को छोड कर...वे सब तो प्रदूषण के चलते डाइरेक्ट स्वर्ग में जायेंगे. थोडे दिन की ही बात और है.

अब आप से क्या छुपाना सच बात तो ये है मैंने अपने विश्वासपात्रों को इस काम में लगा रखा है जो जल्द ही देशव्यापी आंदोलन छेड़ेंगे उन्हें ये स्क्रिप्ट भी लिख कर दी है न केवल लिख कर दी है बल्कि कई कई बार रटा भी दी है:  “..नहीं नहीं आपको चुनाव लड़ना पड़ेगा, इस देश का क्या होगा ?. समाज का क्या होगा ?. आप ऐसे हमें मझदार में नहीं छोड़ सकते. प्लीज प्लीज कुछ तो हम पर रहम करो आप चुनाव नहीं लड़ोगे ?. ये कैसा बेतुका जानलेवा फैसला है. इसे सुनने से पहले, हमारे कान क्यों न फूट गये, ये दिन देखने से पहले हमारी आँखें क्यों न फूट गयीं. ये धरती क्यों न फट गयी....हम इसमें समा क्यों न गये. हे देवा रे देवा ..इस दो दिन की ज़िंदगी में ये दिन भी देखना था कि गरीबों का मसीहा, दीन दुनियां के दुख से दुखियारा ये कहेगा कि अब वह चुनाव नहीं लड़ेगा...नहींई..ई.. कह दो कि ये झूठ है. ये एक भद्दा मज़ाक है.”


मगर देख रहा हूं कि सारी की सारी स्क्रिप्ट इन नालायकों को लिख कर देने के बावज़ूद 48 घंटे होने को आये कोई बयान नहीं आया है न कोई प्रेस कॉन्फरेंस हुई है. सारे के सारे न जाने कहां जा कर मर गये हैं. कहीं विरोधी दल उन्हे न बहला फुसलाकर ले गया हो. इसी बात का खटका लगा है. 

सोचता हूं मैं खुद ही कह दूं  कि जनता की पुकार पर और अपने निर्वाचन क्षेत्र के गरीब-गुरबा की मदद को ये हाथ जो बड़े हैं उनको अब मैं वापस नहीं खींच सकता. अंडरवर्ड की तरह ही है ये पॉलिटिक्स का खेल भी. वन वे है. आप घुस तो सकते हैं निकल नहीं सकते. आप इतने ग़ैर जिम्मेवार कैसे हो सकते हैं. मेरे से इनका दुख नही देखा जायेगा. इन्हें मेरी ज़रूरत है. मैं इनके आंसूओं को देख कर अनदेखा नही कर सकता. मैं इनकी खातिर चुनाव लड़ूंगा और ज़रूर लड़ूंगा. हाई कमांड टिकट नहीं भी देगा तो निर्दलीय लड़ूंगा. आप मुझे मेरी प्यारी जनता से दूर नहीं रख सकते. आप मुझे देश सेवा से विमुख नहीं कर सकते मुझे चुनाव लड़ने से कोई नहीं रोक सकता. मेरी प्यारी जनता मैं आ रहा हूं.... अब आपकी लाज मेरे हाथ है. सॉरी..सॉरी मेरी लाज आपके हाथ है बल्कि हाथ भी कहां आपकी उंगली में है...या कहना चाहिये कि तर्जनी के नाखून में छुपी है..प्लीज आपको मेरी कसम मैं आपकी उंगली में नीली स्याही, आँखों में इंगलिश बॉट्ली का लाल डोरा, और जेब में गुलाबी नोट देखना चाहता हूं.


जय जनता जनार्दन

Friday, July 6, 2018

व्यंग्य: मच्छरों का मोटीवेशन समिट




आजकल जगह जगह लोग-बाग अपने अपने समूह बना के रह रहे हैं, ये समूह ताकत और आम चुनाव को मद्दे-नज़र रखते हुए जाति अथवा उपजाति के आधार पर बनाये जाते हैं. ऐसे मैं अगर मच्छर पृथक-पृथक रहेंगे तो कैसे चलेगा ? उनका तो अस्तित्व ही मिट जायेगा. एक तो पहले ही मच्छर उस पर ये अलगाववाद, ये छोटे-छोटे समूह में अपनी अनर्जी बरबाद करना कहाँ की समझदारी है. अत: मच्छरों में से एक लीडरशिप उभरी और उन्होंने पार्क में एक सभा करने की ठानी. सब मच्छर भाई बहनो को फेसबुक, ट्विटर, मैसेंजर और वाट्स अप के जरिये सूचित कर दिया गया था कि ये नॉव और नैवर जैसी स्थिति है वे अब भी यूनाइट नहीं हुए तो हिट, बेगॉन स्प्रे, ऑल ऑउट जैसे दुश्मन की मिसाइल उन्हे नेस्तो नाबूद कर देंगी. पहले ही उनके यहाँ एक तरह से भुखमरी की स्थिति आ गई है. अब तरह-तरह के फैशन के चलते तमाम क्रीम और लोशन चल गये हैं जो महिलाओं को भले सूट करते हों मगर मच्छरों को कतई नहीं करते फलस्वरूप मच्छर महामारी का शिकार हो तरह-तरह की रहस्यमयी बीमारियों से जान गँवा रहे हैं.

आरंभिक फूल माला के आदान-प्रदान के बाद मच्छरों के एक नेता ने माइक सम्भाला और लगभग ललकारते हुए आव्हान किया:
“मेरे प्यारे भाइयो और बहनों ! अब समय आ गया है कि हम इन मनुष्यों को बता दें कि हम कितने शक्तिशाली हैं. ये हमें हल्के में न लें. एक के बाद एक हम पर अत्याचार करना बंद करें कभी डी.डी.टी., कभी धुंआ, कभी ये कभी वो. आखिर हमें भी जीने का हक़ है. जैसे तैसे कितनी पीढ़ियां खपा के हमनें डी. डी. टी. से इम्युनिटी हासिल की थी, हमी जानते हैं. भला हो भ्रष्ट निगमकर्मियों का कि कोई भी दवा आये वो उसमें इतना पानी मिला देते है कि हम पर बेअसर साबित होती है, चाहे मोहिनी हो या  नुआन या फिर डाई ओरान. प्रॉफिट ड्रिवन मार्किट के चलते सब के सब प्रोडक्ट बस मार्किटिंग भर हैं हमारा बाल भी बाँका नहीं कर सकते. 

मगर सवाल ये है कि  ये हमारी समस्त प्रजाति को नष्ट करने, मॉस्क्विटोसाइड पर क्यूं तुले हैं. रोज नई नई आर.एंड डी. हो रही है. भाईयो बहनो ! तुम मुझे आज़ादी दो मैं तुम्हें खून दूंगा. खाली-पीली भिन-भिन करने से क़ौम का कुछ भला नहीं होगा. आज़ादी बलिदान माँगती है. आओ हम मिल कर कसम खाते है कि अब कोई भी मच्छर भाई, मच्छरानी बहन या नवजात बेबी मच्छर को खून की कमी से नहीं मरने देंगे. शपथ है हम को मरने से पहले मोहल्ले के मोहल्ले को अपना दम दिखा देंगे. क्या तो डेंगू, क्या मलेरिया, क्या वाइरल, क्या चिकनगुनिया सब अस्त्र-शस्त्र हमने इस्तेमाल करने हैं. प्यार और ज़ंग में सब ज़ायज है. 

तभी मुखबिर ने खबर दी कि निगम दफ्तर में किसी सरफिरे आदमी ने इतना झुंड देख,  शिकायत कर दी है और वो अश्रु गैस की फॉगिंग गन लिये यहीं आ रहे हैं. सुनते ही सभा आनन-फानन में समाप्त कर  दी गई  इस नारे के साथ

तुम मुझे आज़ादी दो मैं तुम्हें खून दूंगा...जो हमसे टकरायेगा बुखार में तप जायेगा

और बिना धन्यवाद प्रस्ताव के सभा तितर-बितर हो गई.

Friday, October 27, 2017

व्यंग्य: और सुनो ! स्मारक बनेंगे विश्व स्तर के


अभी स्विस जोड़े की फतेहपुर सीकरी में पिटाई पर लगी ‘डिटॉल’ सूखी भी न थी कि घोषणा हुई है कि स्मारक विश्व स्तर के बनेंगे. सही भी है. ये क्या कि अगले सात समंदर पार से आयें और आप देसी लट्ठ-भाले से मारें. उफ्फ़ कितना अमानवीय और प्राचीन तरीका है. ये यूथनेसिया का ज़माना है. मगिंग का नाम ही नहीं सुना होगा आपने जिसमें ‘मगर’ पूरी शालीनता से स्विस नाइफ या ऐसी ही कोई चीज आपके पेट या गले पर लगा कर उपर्युक्त सोफिस्टीकेटेड स्वर में कहता है “ योर मनी और योर लाइफ ? ” आप समझ जाते हैं और चुपचाप अपना पर्स, घड़ी, मोबाइल निकाल कर उसे दे देते हैं. तुरत-फुरत में काम हो जाता है. कितनी विश्व स्तर की सनातन, अहिंसक और वैजीटेरियन ‘मॉडस ऑपरान्डाइ’ है. ये क्या कि बेचारे टूरिस्टों के ऊपर आव देखा न ताव पिल पड़े. हमारी क्या छवि ले कर जायेंगे वो अपने देश. आप कुतुब मीनार, ताज महल, लाल किला या ऐसी ही किसी इमारत को देखने जायें तो पहले तो ऑटो-टैक्सी वाले ही आपके इस ट्रिप को यादगार बनाने में कोई कसर न उठा रखेंगे. ये एक तरह से उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है. वे आपसे औने पौने कुछ भी पूरे अधिकार से चार्ज कर लेंगे. आपने ना नुकुर की तो वे इसे और भी अधिक यादगार बनाने से नहीं चूकेंगे...इतना यादगार..इतना यादगार कि हो सकता है आप अपनी याददाश्त खो बैठें या आपका भी स्मारक यहीं कहीं बनाना पड़े.
आपको देख फौरन यहाँ वहाँ छितरे हुए बैठे लोग आपको पहचान लेते हैं और आपकी आवभगत के लिये पूरी आत्मयीता से जुट जाते हैं. उन्हीं में कोई ‘गाइड’ है, कोई सस्ती सस्ती शॉपिंग कराना चाहता है कोई सस्ती टैक्सी तो कोई सस्ता होटल. आप इनसे बचते-बचाते टिकट खिड़की तक पहुंच भी गये तो समझिये कि स्मारक आधा तो आपने देख ही लिया कारण कि टिकट खिड़की आपको ढूंढे नहीं मिलेगी. एक छुपा हुआ मोखा जैसा होगा जिसमें स्मारक के समय का ही व्यक्ति उदासीन बैठा होगा. वो आपको ऐसे देखेगा कि वो तो सन्नी लियोने या ओबामा को एक्स्पैक्ट कर रहा था कहाँ आप आन टपके. फिर भी वो आप पर लगभग एह्सान सा करते हुए आपको टिकट दे ही देगा. क़ुतुबमीनार में तो मीनार कहीं है और टिकट खिड़की सड़क पार करके दूसरी ओर है. कुछ कुछ वैसे ही है जैसे आपने लोकल बांद्रा वैस्ट से लेनी है और टिकट खिड़की बांद्रा ईस्ट में हो या कि लाल क़िले की टिकट जामा मस्जिद में और जामा मस्जिद की टिकट लाल क़िले में मिले. (वैसे जामा मस्जिद में टिकट नहीं है) आप विदेशी हैं तो मॉडर्न आर्ट की नेशनल गैलरी को देखने की टिकट पांच सौ रुपये है. ताज महल में तो विदेशियों से इतने पैसे टिकट के नाम पर ले लेते है कि वो समझ जाता है वंडर ऑफ दि वर्ल्ड देख रहा है.

पिछलग्गू अभी तक आपके साथ हैं. वो आपको गुड़िया, की-चेन, पोस्ट कार्ड के एलबम आदि आदि बेचना चाहते हैं. फोटोग्राफर अलग आपको तरह तरह के फनी पोज़ में फोटो खिंचाने को उकसायेगा. उनसे बचते बचाते “राँड-साँड साँप-सीढ़ी से बचें तो सेवें काशी” की तर्ज़ पर आप अंदर तो घुस गये. अब आप देखेंगे कि दरबान, गेट कीपर और बाकी कर्मियों को आप में तनिक भी इंटरेस्ट नहीं है. दरअसल आप उनके लिये एक प्रकार से अदृश्य मि. इंडिया हैं. वे या तो आपकी उपस्थिति से अनभिज्ञ अपनी बातों में मशगूल हैं या फिर अलसाये अलसाये ऊँघ रहे हैं. दरअसल उनका शरीर ही यहाँ है वे एक प्रकार से ‘निर्वाण’ को प्राप्त कर चुके हैं. कभी कभी आप किसी ओवर एनथुजिआस्टिक कर्मी से भी टकरा सकते हैं जो आपको हिकारत से देखते हुए हो सकता है आपकी तलाशी लेने पर आमदा हो जाये और नहीं तो आपका झोला उतरवा कर बाहर रखवा ले या फिर ताक़ीद करे कि नो कैमरा नो फोटोग्राफी.

अब अगर आपको टॉयलेट जाना हो तो आप पायेंगे कि या तो वहाँ टॉयलेट है ही नहीं या इतनी दूर है या फिर गेट पर जहां से आप घुसे थे था और आप बहुत पीछे छोड़ आये हैं. यही हाल पीने के पानी का है. अव्वल तो नल दिखेगा नहीं. पूछते पूछते दिख भी गया तो आप पायेंगे कि शायद ये भी क़ुतुबद्दीन या शाह्जहाँ के ही ज़माने का है, क्यों कि दस में से दस बार उसमें पानी नहीं होगा. अभी हम गंगा-जमुना साफ कर रहे हैं. प्लीज बेयर विद अस. हाँ कोई कैंटीन भले दिख जाये. जहां पानी की बोतल के वो श्रद्धा अनुसार कुछ भी चार्ज कर सकता है. एक सौ रुपये से लेकर पाँच सौ रुपये तक. इन जगहों के नलों को इस वजह से बेपानी रखा जाता है ताकि आप कैंटीन का पानी रख सकें. रहीम ने इन कैंटीन वालों के लिये ही कहा था:

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून

अगर शौचालय जाना हो तो हो सकता है आप अपना आइडिया मुल्तवी कर दें. वहां आप पायेंगे कि आप से पहले पूरी दिल्ली, अथवा पूरा का पूरा आगरा, या कि आक्खा मुम्बई आकर वहां पहले ही शौच कर गया है. ये स्थल स्वच्छता पार्टी के नेता जी और फोटोग्राफर की पहुंच से अभी बाहर हैं. बारी नहीं आई है.

अपुष्ट खबरें तो ये भी हैं कि सैल्फी का आविष्कार भारत में ही हुआ है कारण कि टूरिस्ट किसी भारतीय को कैमरा देता तो था फोटो खींचने के लिये अभी टूरिस्ट पोज़ बना ही रहा होता था तब तक यह फोटू खींचने वाला इतनी तेजी से तिड़ी हो जाता था कि टूरिस्ट देखता ही रह जाता और वो उसकी आँखों के सामने-सामने ये जा वो जा. दरअसल आपका फोटो खींचने लायक तो वो ही क्षण होता था. शिकायत करने गये तो पता चला पुलिस ने आपकी घड़ी और मोबाइल भी रखवा लिये. और रात भर हवालात में बंद रखा सो अलग. फैलते-फैलते बात इतनी फैली कि हिमसैल्फ और हरसैल्फ सारे के सारे अनुसंधान में लग गये तब सैल्फी का जन्म हुआ. आवश्यकता आविष्कार की मॉम है. (रही बात फतेह्पुर सीकरी की तो वो बात अलग और अपवाद स्वरूप देखी जानी चाहिये वहां स्विस जोड़े की पिटाई इसीलिये की गई कि उन्होने अपने भारतीय ’प्रशंसकों’ के साथ सैल्फी खिंचाने से नानुकुर की थी.)

अब विश्व स्तर के स्मारक बनेंगे तो पता नहीं क्या होगा. क्या शाहजहाँऔर मुमताज़ उठ बैठेंगे और आपको देख गाने लगेंगे:

“जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा” 

या कि ज़िल्ले सुभानी अपना चोगा पहन आपका खैर मक़दम करेंगे.

पानी दे दें, शौचालय दे दें, विश्वसनीय ट्रांसपोर्ट दे दें और लुक्का लोग जो ठगने को आपके आस-पास मँडराते रहते हैं उनसे निज़ात मिल जाये तो समझो स्मारक खुद ही विश्व स्तर के हो जायेंगे. बड़ा काम है विश्व स्तर की इमारतों को बनाना उस से भी कहीं अधिक महान कार्य है इन इमारतों को विश्व स्तर का बनाये रखना. जब तक आस-पास मँडराते बर्बर ठगों के दल के दल की आमदनी का सहारा आपसे छिनैती और ठगी ही है तो कैसे विश्व स्तर की रख-रखाव हो पायेगी? पहले हम तो विश्व स्तर के हो जायें. स्मारक खुद्बखुद हो जाने हैं जी.

Monday, June 12, 2017

व्यंग्य: जान से भी बड़ा एक तोहफा......कारपेट, ए.सी. और सोफा




शहीद सागर के घर से कारपेट, ए.सी., और सोफा, सी.एम. के विजिट के बाद वापस ले गये. ये बुरी खबर नहीं. आप लोग जब असलियत जानोगे तब तारीफ करोगे. असल में बेचारा ग़रीब परिवार कैसे तो ए.सी. का बिजली का बिल भरता , कैसे कारपेट क्लीन करने को वैक्यूम क्लीनर खरीदता, और कैसे सोफे को ड्राईक्लीन कराता. बजाय शुक्रगुजार होने के आलोचना कर रहे हैं. बी पॉजिटिव. सोचो शहीद के गरीब परिवार को कितने फिजूल के खर्चे से बचा लिया.अगर ये सब छोड़ देते तो आप ही ने कहना था उनकी गरीबी का मजाक बना दिया.गरीब लोग कैसे ए.सी. चलायेंगे, कैसे कारपेट ड्राई क्लीन/ वैक्युम क्लीन करायेंगे. मोदी/योगी सरकार ने गरीबों का मज़ाक उड़ाया. अब अगर वो बिजली का बिल नहीं दे पाते तो बिजली कट जाती. फिर आप लोगों ने ही लिखते फिरना था शहीद के परिवार की बिजली काटी. फिर वो कटिया का जुगाड़ लगाते. अब आप इंडिया में रहते हो ये मत पूछ बैठना कि कटिया क्या होता है. ये ऐसे ही है जैसे कोई स्पेन में रहे और पूछे बुल फाइट क्या चीज होती है या तमिलनाडु में रहे और पूछे जल्लीकट्टू क्या होता है.
और बाई दि वे ये आप से कहा किसने कि ये ए.सी., ये कारपेट ये सोफा शहीद सागर के परिवार के लिये थे. आपका तो फोकस ही गलत है. ये सब सी.एम साब और उनके अफसरान के लिये था.उन्हें इन सब की आदत है. उन्हे ये सब बापरना आता है. आपको आता है ? आपको तो ए.सी. चलाते कैसे ये भी नहीं पता होगा. आपको पता है फिल्टर कब धोना है...कैसे धोते हैं.कैसे पहले पंखा चलाना है फिर ए.सी. और जब बंद करना है तो कैसे पहले ए.सी. बंद करना है फिर पंखा.

इसी तरह कैसे कारपेट क्लीन करना है. कैसे ड्राइक्लीन कराना है. कैसे बिना जूते इस पर चलना है. कैसे सुबह-शाम ब्रश से हल्के हाथ से साफ करना है. कब कब धूप दिखानी है. जब मेहमान चले जायें तो कैसे रोल करके रखना है.

सोफे पर कैसे बैठते हैं. ये नहीं कि दोनों पैर रख कर उकड़ू हो कर बैठ गये. रामपुर के लक्ष्मण के रणधीर कपूर की तरह या जीतेंद्र के डबल रोल में गाँव वाले जीतेंद्र की तरह. ये सोफा है पुआल नहीं.
अब आप कुछ कुछ समझे कि योगी या मोदी सरकार ग़रीबों का खासकर शहीद ग़रीबों का कितना ख्याल रखती है. और उन्होने कैसे इन तीनों चीजों को ले जाकर इस परिवार की महान मदद की है. कर सकती थी ऐसा कभी मनमोहन की सरकार ?

जब तक सूरज चाँद रहेगा
योगी तेरा नाम रहेगा.

Tuesday, April 4, 2017