Ravi ki duniya

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Sunday, April 26, 2026

व्यंग्य: स्टेशन मास्टर और केंटीन का उदघाटन


  

           पूरे राज्य में ये खबर केंटीन के चूल्हे की आग की तरह फैल गयी है कि किसी स्टेशन मास्टर ने ये हिमाकत, बोले तो ये दुस्साहस किया है कि अपने स्टेशन की केंटीन का उदघाटन खुद ही कर डाला। लोग-बाग अब उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जगह-जगह, नुक्कड़ नुक्कड़, चैनल-चैनल यही ब्रेकिंग न्यूज़ गरम है कि इस स्टेशन मास्टर को ये सूझी तो सूझी क्या। ये क्या बात हुई ? अब ऐसी भी क्या मजबूरी आन पड़ी कि मास्साब ने खुद ही केंटीन का फीता काट डाला। यह तो सरासर बेईमानी है। नाइंसाफी है। अब ये ऐरे गैरे मास्टर फीता काटने लगेंगे तो हाकिम बेचारा क्या करेगा? जिस तरह हुकम हाकिम का उसी तरह यह विशेषाधिकार भी हाकिम का है कि वह जी चाहे जिसको काटे। जहां चाहे जिसका फीता काटे, उदघाटन करे। वह केवल उसी सूरत में किसी और को उदघाटन की इजाजत देता है जब उसका नामकरण उसी के नाम से हो। क्या इन मास्टर साब को पता नहीं की हर गाँव-खेड़ा में सभी जगहों का उदघाटन हाकिम ने करना होता है। ये खेकड़ा स्टेशन क्या भारत से अलग है? बसंत कुमार को साफ-साफ शब्दों में बता दिया जाये वह बस नाम का बसंत है। काम का बसंत हर मौसम में हाकिम होता है। 

  

 

इतने सालों में इस स्टेशन मास्टर को ये भी नहीं पता चला कि स्टेशन पर क्या करना होता है क्या नहीं। माना कि ट्रेन को हरी झंडी उसी ने दिखानी है और सारी उम्र दिखानी है। फिर क्यों वह नामाकूल, नाकारा, नालायक एक दिन की ये विजुअल खुशी हाकिम से छीन लेना चाहता है। हो न हो ये किसी दुश्मन राज्य का जासूस तो नहीं जिसने हमारे राज्य में अराजकता फैलाने का ये तरीका निकाला हो। मगर हाकिम उसके इन मंसूबों को कामयाब नहीं होने देगा। उसके सभी पतों पर लोग पूछताछ को भेज दिये गए हैं वे सब दल-बल के साथ पहुँचते ही होंगे और उसकी अगली-पिछली सात पीढ़ियों का हिसाब निकाल कर ले आएंगे। आज तक का रिकॉर्ड है कि हाकिम की टीम कभी खाली हाथ नहीं लौटी।

 

बच्चू ! स्टेशन मास्टर जब दो-चार बरस कारावास में रहेगा तो सारी मास्टरी भूल जाएगा। अब से कारावास ही उसका स्टेशन होगा। इस मास्टर ने डाकिये से भी कुछ न सीखा। भई कैसा मास्टर है? अब देखो ठेके की नौकरियों के रुक्के भी हाकिम खुद दे रहा है। किसी डाकिये ने आवाज़ उठाई। हरगिज़ नहीं। वे समझदार हैं। उन्हें पता है पहले ही ये कूरियर वाले , ई मेल और वाट्स अप से उनकी नौकरी पर बन आई है। चुपचाप अपने दिन काटिए। चूँ चाँ की तो आपको बैरंग घर भेज दिया जाएगा। और पूरा डिपार्ट ही बंद कर दिया जाएगा फिर डाकिया-डाकिया आपस में ही खेलते रहना। अरे हाकिम आखिर हाकिम होता है वह चाहे तो नेज़ा फेंकने वाले से उसका नेज़ा ले कर नीलाम कर दे। यह उस नेजेवाले की खुशकिस्मती है। उसे तो उलटा खुश होना चाहिए और हाकिम का सौ सौ बार शुक्राना अदा करना चाहिए। अब अगर वो नेजे वाला अपना नेज़ा देने में आना-कानी करता तो क्या वह दुबारा नेज़ा फेंकने लायक रह जाता। वह जानता है बांह सलामत रहे नेजे हज़ार। महज़ हुकम हाकिम का नहीं होता, हुकूमत हाकिम कि नहीं होती... कायनात हाकिम की होती है। 

 

व्यंग्य: रेल-भोजन और सूजे होंठ

 

 

लो, जी कॉकरोच से शुरू करके, चूहे, साँप, बिच्छू  के बाद अब पेश है। 'वन मील एंड टू ब्यूटीफुल लिप्स' योजना। एक भद्र महिला ने सफर करते हुए पाया कि ट्रेन का भोजन करने के बाद उसके होंठ सूज गए हैं। उसने डॉ. से उपचार लिया और डॉ. की पर्ची तथा अपने सूजे होंठ के फोटू सोशल मीडिया में डाल दिये। यह देख आई.आर. टी.सी. वाले आग-बबूला हो सूज गए। उन्होने तुरंत डिस्क्लेमर जारी किया कि यह हमारे भोजन का असर नहीं है। कारण कि यदि होंठ हमारे भोजन से सूजने होते तो केवल एक ही यात्री के क्यूँ सूजते, बाकी यात्रियों के क्यूँ नहीं, दूसरे भद्र महिला ने शिकायत की थी कि ट्रेन का यह भोजन करने के बाद उसके बच्चे को दस्त लग गए। इसका प्रतिकार भी ऑथरिटी ने यह कह कर किया है कि और तो किसी बच्चे को दस्त नहीं लगे। लगे भी हों तो हमारे पास ऐसी कोई कम्पलेंट नहीं।

 

अब बेचारी भद्र महिला बहुत परेशान है। जाये तो जाये कहाँ? शिकायत करे तो किस से करे। उसके सूजे होंठों के फोटो सोशल मीडिया में चल रहे हैं। इन दिनों अगर आप ब्यूटी पार्लर जाएँ तो वहाँ 'लैन' लगी है ऐसी भद्र महिलाओं की जो अपने होंठो को सुजाना चाहती हैं। उसे ब्यूटी पार्लर की डिक्शनरी मे 'बी स्टिंग लिप्स' कहते हैं बोले तो ऐसे होंठ जैसे मधुमक्खी ने डंक मार दिया हो। कहते हैं ऐसे होंठ आजकल खूब प्रचलन (डिमांड) में हैं और नवीन ब्यूटी स्पॉट माने जा रहे हैं।

 

अब इतना सब जानते बूझते हुए इस महिला को शिकायत नहीं करनी थी। उसका ये ब्यूटी ट्रीटमेंट तो बैठे-बिठाए एक भोजन करने मात्र से हो गया। उसे उल्टा धन्यवाद देना चाहिए और फाइव स्टार रेटिंग देनी थी। फीडबेक फाॅर्म से अफसरों को पता लगेगा कि भोजन में क्या डाला जाये कि महिलाओं को यह ‘सर्विस’ ‘पार्लर ऑन व्हील’ मुहैया कराई जाये। शोध का विषय हो सकता है। अभी तक भोजन के 'केसरोल' पर वैज तथा नॉन वैज लिखा होता था अब एस.एल. ( स्वाॅलन लिप्स) अथवा नॉन एस.एल. लिखा भी आया करेगा। आखिर सभी को तो सूजे होंठ नहीं चाहिए होंगे। बहुत से दक़ियानूसी लोग अब भी 'बस पंखुड़ी गुलाब की सी है'  के झमेले में ही पड़े हैं। मेरा अनुरोध है कि आई.आर.टी. सी. कदापि न घबराये। दुनिया में बड़ी बड़ी खोजें इसी तरह हुईं हैं। ज्यादा हो तो इस वाली थाली का नाम इस भद्र महिला के नाम पर रखा जा सकता है। आखिर आपका प्रयोग सफल रहा है। मुंबई में एक 'संजू बाबा चिकन' चला था पता चला कि अभिनेता संजय दत्त ने देर रात चिकन चाहा तो रेस्टोरेन्ट वाले ने कुछ अल्ल-मल्ल मिला के ये चिकन बना दिया था। तभी से इस अल्ल-मल्ल वाली चिकन डिश का नाम संजू बाबा चिकन पड़ गया। भई ! हमारे देश में साधना कट बाल, मुमताज साड़ी, माधुरी दीक्षित धक-धक ड्रेस, अनारकली ड्रेस और राजेश खन्ना कट कुर्ता चला ही है। आप देखना लाइन लग जानी है महिला यात्रियों की। जो इस होंठ सुजाऊ भोजन के सेवन के लिए ही आपकी ट्रेन में यात्रा करेंगी। आपको अलग से कोच लगाने पड़ेंगे। मेन्यू में कुछ और परिवर्तन कर आप लिख सकते हैं 'एंजिलिना जोली' भोजन, इसी तरह से कुछ देसी अभिनेत्रियों को भी 'रोप-इन' कर लें उनके एड आने लगें। मेरे जैसे होंठ पाने के लिए यात्रा करें और भोजन करें फलां ट्रेन में। फिर देखना कैसे ट्रेन 'फूल' जानी हैं। होंठ तो होंठ ट्रेन भी फूल (सूज) जानी हैं।

 

व्यंग्य: चलता फिरता केसर

 


 

मेरे भारत महान की महान ट्रेन में यात्रा करते हुए एक यात्री के भोजन के साथ दी गयी दही में कुछ तैरता हुआ प्रतीत हुआ। उसने गौर से देखा तो वे कुछ कीड़े थे। ऐसा समझिए एक प्रकार से नॉन-वेज दही थी। यात्री पता नहीं वेजेटेरियन था अथवा नॉन वेजेटेरियन। बहरहाल नॉन वेजेटेरियन भी रहा होगा तो भी उसे ये तैरते हुए कीड़े पसंद नहीं आए। उसने केटरिंग स्टाफ को बुलाया और उनसे इस कीड़ों युक्त दही की शिकायत की। केटरिंग स्टाफ सत्य को पा चुके होते हैं। वे सत्य की खोज में नहीं निकले हैं। उन्होने तुरंत यात्री की इस निर्मूल आशंका का समाधान किया और समवेत स्वर में घोषणा की कि ये कीड़े नहीं केसर है। अब बारी यात्री के चकराने की थी।

 

यात्री को सभवतः बताया गया कि उसने अभी तक पिछड़ी हुई, थकी हुई गाय-भैंस के दूध की दही खाई है यह नए भारत की नयी दही है। बहुत नायाब दही है। बोले तो जेनेटिकली माॅडीफाइड और जिसे वह कीड़े समझ रहा है ‘रे मूरख ! वे कीड़े नहीं, नयी प्रजाति की केसर है। बोले तो चलती-फिरती केसर। अंग्रेजी में मोबाइल केसर। भारतीय रेलवे अपने यात्रियों के लिए कितने कष्ट सहती है और उनके लिए एक से एक ‘डेलीकेसी’ लाती है। इसी क्रम में यह चाइना वाली केसर है ये ऐसे ही कीड़े के माफिक लगती है। कोई भी देखे तो ये ही समझे की कीड़े दही में चढ़ उतर रहे हैं। अठखेलियाँ कर रहे हैं।

 

 

यात्री का माथा एक बार को तो ठनका। फिर उसने अन्य यात्रियों को भी दिखाया तो अन्य यात्रियों ने भी तस्दीक की कि यह केसर नहीं कीड़े हैं। ‘क’ से केसर ‘क’ से कीड़े। कहाँ अंतर है ? केटरिंग स्टाफ मानने को तैयार नहीं था। फिर उन्होंने बौद्ध धर्म का मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहा कि आप को ये केसर युक्त दही पसंद नहीं है तो आप मत लीजिये और उन्होने पूरी गंभीरता से इस बात पर ज़ोर दिया कि आप दही के कप पर एक्स्पायरी डेट देख लीजिये अभी एक्सपायर नहीं हुई है। अत: हमारी ओर से यह सर्वथा सेवन योग्य है। इनकी तरफ से ‘केस क्लोज़’। उन्होने यह धमकी भी दे डाली कि इसका विडियो फैलाया या मंत्री जी के पोर्टल पर शिकायत की तो उनसे बुरा कोई न होगा ये कीड़े भी नहीं और वे इस यात्री को मारते मारते कीड़ा बना देंगे। क्या कीड़ा, क्या केसर सभी तो उस कृपालु की क्रिएशन है। समदर्शी बनिए। इस चराचर जगत में क्या जड़, क्या चेतन सभी तो राम की माया है। राम जी का गुड़, राम जी की चींटी। राम जी की कर्ड, राम जी के कीड़े, राम जी की केसर।

 

स्किट: स्वयंवर डॉली का


 

 (प्रस्तुत है सन् 2026 के एक स्वयंवर का दृश्य। स्थान है एक सांभ्रांत सोसायटी, हरे-हरे जंगलों की हरियाली के बीच आपको तो पता है सावन के अंधे को सब हरा हरा ही दिखता है। सभी पात्र, अपात्र, कुपात्र व्यक्ति अपने आपको योग्यतम/उपर्युक्त लाइफ पार्टनर बता रहे हैं। कुछ तो कह रहे हैं कि लाइफ पार्टनर ना सही लिव-इन-पार्टनर ही बना लो।ये जान तो वैसे भी जानी है हम एन.सी.आर. के जाँबाज हैं । प्रदूषण से मरना है या डॉली के प्यार रूपी आभूषण से ? लाइफ आपकी .... चाॅइस आपकी)

 

[ दृश्य: नायिका आधुनिक वस्त्रों में पर्स हिलाती-डुलाती चहलकदमी कर रही है। ग्रीनवुड का नायक नंबर वन का प्रवेश

 

नायक: (टाई पहने/ लैपटॉप का बैग उठाए)  हाय ! हम शायद पहले मिले हैं ? आप जानी-पहचानी लगती हैं ? मैं ग्रीनवुड में रहता हूँ। मैं कॉर्पोरेट जगत का हैड हौंचो हूं। मैं अनममैरिड हूँ क्या आप मुझे अपना लाइफ पार्टनर बनाएँगी?

 

नायिका:   कुछ अपने बारे में बताइये ? आपने तो सीधे डंडा सा मार दिया!

 

नायक1:   जी हमें कॉर्पोरेट वर्ल्ड में टाइम मैनेजमेंट सिखाया जाता है। बायोमेट्रिक के चलते अब तो एक एक मिनट कीमती है। देखो मैं तुम्हें वर्ल्ड टूर पर साल में दो-तीन बार ले जाया करूंगा। मैंने बहुत से फ्रीकुएंट ट्रेवलर पॉइंट जोड़ लिए हैं। खूब शॉपिंग कराऊंगा। यहाँ तक कि मेरी कंपनी के प्रोडक्ट भी तुम्हें मेक्सिमम डिस्काउंट पर दिलाया करूंगा। वीकेंड पर हम दिल्ली जाकर भी घूम सकते हैं। तुम चाहो तो महीने में दो किटी पार्टी करो, चार किटी पार्टी करो, नो प्राॅब्लम! सोच लो!! आज की तारीख में कॉर्पोरेट वालों की बहुत डिमांड है। आधी ज़िंदगी तो वो टूर या मीटिंगों  में ही बिज़ी रहते हैं अतः तुमको क्या बोलते हैं उसे ‘माई स्पेस’ ‘माई प्राइवेसी’ भी मिल जाया करेगी। प्लीज़ मैरी मी। [ एक्ज़िट ]

 

नायक नंबर 2 का प्रवेश: (कैप लगाए, हाथ में बैटन) जयहिंद ! (सेल्यूट मारता है) मैं फौजी हूँ कोई ऐरा-गैरा सिविलियन नहीं। हमेशा अनुशासन में रहता हूँ। एकदम सफाई पसंद। मुझ से शादी करोगी तो सोचो कितना आराम ही आराम होगा। बैटमैन क्या पूरी बटालियन तुम्हारा हुक्म माना करेगी। हर हफ्ते बड़ा खाना हुआ करेगा। तुम्हें चौका-चूल्हा नहीं करना पड़ेगा। हर चीज़ सस्ती मिलेगी। बस तुम्हें हुक्म करने की देर है। समझ रही हो ना मैं केंटीन की सुविधा की बात कर रहा हूँ।  बस तुम मेरी सी.ओ. बन जाओ ? (फिर सेल्यूट एक्ज़िट)

 

नायक नंबर 3: का प्रवेश हाथ में डंडा घुमाते हुए देसी अंदाज़ में : मैडम जी विद ड्यू रिस्पेक्ट आई बैग टू से... आई केम टू नो यू वांट टू मैरी। अपनी पूरे इलाके में धाक है जी। जूरीस्डिक्शन की आप फिकर नाॅट। ये सारे माॅल, रेस्टोरेन्ट जहां आप नज़र डालोगे वो आपकी नज़र होगा जी। आप तो यूं सोचो कि आप ही आई.जी., कमिश्नर, सब हो। क्या आदमी, क्या 'लेडिस' सब पर आपका रौब चलेगा, चलेगा क्या दौड़ेगा जी दौड़ेगा। आप जिसे कहोगे उसे उठवा लिया जाएगा वो भी शुक्रवार की शाम को 48 घंटे उसकी ऐसी खातरदारी करेंगे ऐसी खातरदारी करेंगे कि वो आगे से बस कीर्तन सत्संग करता ही दिखेगा। तुम एक बार अपना हाथ मेरे हाथ में देके तो देखो। हाँ आपका वेट गारंटी बढ़ जाना है जी वो आप जानो। अच्छा चलता हूँ। एफ.वाई. आर. भिजवा देना। नहीं समझे? फर्स्ट यस रिपोर्ट।  बरामदगी तो हम करा ही लेंगे (एक्ज़िट)

 

नायक 4: (सूट टाई कैप पाइप में प्रवेश)      आप सब छोड़ो मादाम प्लीज़ मैरी मी। अपने बैचमेट हर स्टेट, हर शहर में हैं वो सब आपकी सेवा में रहेंगे। घोडा-गाड़ी की कभी कमी नहीं रहेगी। जो जरा भी चूँ करेगा उसको वहीं कायदे से समझा दिया जाएगा। ऐसा उलझायेंगे, ऐसे उलझाएंगे कि ज़िंदगी भर सुलझ नहीं पाएगा। बड़ी बड़ी पार्टियों में आप चीफ गेस्ट बनने की अभी से प्रेक्टिस कर लो जी। बूके की लाइने लग जानी हैं। गिफ्ट्स की तो बरसात होने लगेगी। आप तो यूं सोचो कि बिना इम्तिहान दिये आपने तो खुद आई.ए.एस. बन जाना है। आई.ए.एस. बनने का सबसे आसान तरीका-- मैरी एन आई.ए.एस.

सबमिटिड फॉर एप्रूवल प्लीज़ (एक्ज़िट)

 

नायिका:    वाट दि हैल ! आई डोंट वांट टू मैरी। सॉरी !!! !!!

 

व्यंग्य: खाड़ी युद्ध और हम !


 

      हमारा देश युद्ध का नहीं बुद्ध का देश है। हम शान्तिप्रिय लोग हैं। हमारा इतिहास गवाह है, हमने कभी किसी देश पर अपनी तरफ से युद्ध नहीं छेड़ा। हम तो वसुधैव कुटुंबकम मानने वाले और इस विचार धारा के पोषक हैं। हमने पाकिस्तान-ईस्ट पाकिस्तान में सन् 1971 में युद्ध को समाप्त  कराया ही था। अभी फिलहाल के दिनों में हमने रूस और यूक्रेन का युद्ध रुकवाया ही था। आपने  सुना नहीं था? जब वो बेचारी लड़की रुआंसी होकर अपने माता-पिता को बता रही थी कि पापा मैं न कहती थी, मोदी जी ने वॉर रुकवा दी। इस तरह वहाँ पढ़ रहे बच्चे सुरक्षित भारत वापसी कर सके थे। आप सब ने देखा होगा जब वे विमान से उतरते वक़्त नारे लगा रहे थे और उनकी अगवानी मंत्री लोग कर रहे थे। यह इसीलिए मुमकिन हुआ कि हम विश्वगुरु हैं। ये नया भारत है। माइंड इट।


अब जब खाड़ी देश में मध्यस्थता की बात आई तो सभी देश भारत की ओर देख रहे थे कि भारत अपने विश्वगुरु के दायित्व को निभायेगा। किन्तु ये क्या भारत ने एक 'नरचरेंट पेरेंट' की भूमिका निभाते हुए कहा कि नहीं हम मध्यस्थता नहीं करेंगे। अब यह मौका किसी और देश को दिया जाये। नहीं तो बाकी देशों का विकास कैसे होगा? हमने इनसिस्ट किया कि हमारे 'इमीजिएट नेबर' पाकिस्तान को यह रोल दिया जाये। आखिर ऐसे ही तो बाकी देश विश्व के मामलों मे रुचि लेंगे और अपनी जिम्मेवारी समझेंगे। अतः हमने यह फैसला लिया है कि हमारा पड़ोसी देश, हमारा छोटा भाई ये रोल अदा करे। हमारे 'नेबर' मजबूत बनें यही हमारा ऑब्जेक्टिव है।

 

                     हमारे पास इतना टाइम नहीं है कि हम इस-उस के फटे में टांग अड़ाते फिरें। हमारे अपने  बहुत काम हैं। सूबों में चुनाव सिर पर हैं। 'वी आर बिज़ी पीपुल'। एक बार हमने डिसाइड कर लिया कि खाड़ी के देश आपस में सुलट लें। पाकिस्तान को अब तलक हमने पर्याप्त रूप से ट्रेनिंग दे दी है। अब वक़्त आ गया है कि वह इंडिपेंडेंट रूप से विश्व क्षितिज पर आए। सभी पड़ोसियों को मजबूत बनाना भी हमारा ही फर्ज़ है। 'क्षमा बड़न को चाहिए'। हम चाहते थे कि पाकिस्तान ये काम करे। हम यूं बांग्लादेश का नाम, या श्री लंका का नाम दे सकते थे मगर दोनों देश में अभी नयी-नयी सरकार बनी हैं। उन्हें अपने  काम करने दीजिये। 'नेबर फर्स्ट' हमारी नीति है। उसी के फलस्वरूप हमने विश्व बिरादरी को कह दिया कि हमें इस बार 'बाॅदर' न करें बल्कि पाकिस्तान को ये काम दो। नहीं तो वो कब सीखेगा? अब हम ठहरे विश्वगुरु हमारी बात कोई टाल सके ऐसा मुमकिन ही नहीं। अतः उन्होने हमारे कहे अनुसार ही ये काम पाकिस्तान को दिया है। और तो और हमें इस का कोई क्रेडिट भी नहीं चाहिए। ये तो बात आई तो ज़िक्र कर दिया। नहीं तो हम अपने मुंह मियां मिट्ठू नहीं बनते। न कोई नारेबाजी, न कोई एडवरटाइज़मेंट ना कोई फोटोग्राफ। भैया ! आप मुंशी प्रेमचन्द की 'बड़े भाई साब' पढ़े हैं कि नहीं? बस हम वही बड़े भाई साब हैं।

 

 

व्यंग्य: सड़क पर गड्डों का महत्व

 

                   पहले सड़कों पर गड्डे न थे। दरअसल पहले सड़कें ही न थीं। तब मार्ग सुलभ नहीं हुआ करते थे। इससे आदमी खूब हिचकोले खाता आगे बढ़ता था अथवा पैदल चल-चल कर भाग-दौड़ करके हलकान हुआ करता था। तब आदमी मजबूत हुआ करते थे। वे चपल, फुर्तीले हुआ करते थे। आजकल की तरह नहीं कि जरा दचका लगा और 'स्लिप डिस्क' हो गई। किसी डॉ. के आजीवन गाहक। डॉ. तो तैयार ही बैठे हैं आपको अपने क्लीनिक का 'लाइफ मेम्बर' बनाने को।

  

                     फिर जब सड़कें बनने लगीं तो जाहिर है उनमें गड्डे भी होने थे। कभी ठेकेदार की वजह से कभी इंजीनियर की वजह से और कभी दोनों के संयुक्त प्रेम के सौजन्य से। सड़क पर गड्डे हों तो रोजी-रोटी अच्छी चल जाती है, क्या म्युनिसिपलिटी के अफसर, क्या डॉ. क्या इंजीनियर क्या ठेकेदार। ये सड़क आपको 'पाॅवर' तक नहीं ले जाती बल्कि ये तो सड़क के गड्डे हैं जो आपकी पहचान के क्षितिज को विस्तार देते हैं। उसे गड्डों से निकाल कर उन्नत शिखर तक पहुंचाते हैं।

 

               सड़क पर गड्डे हों तो आप चौकन्ने रहते हैं। आप को गड्डों से बच कर चलना आ जाता है। सड़कों के ये गड्डे आपको 'लाइफ-कोच' की तरह जीवन जीने के गुर सिखाते हैं। कैसे परेशानियों से जूझा जाये, कैसे उनसे बचा जाये। मुसीबतों से कैसे बाहर आया जाये। वो शेर है ना:

 

                   "...आसानियां हों तो ज़िंदगी दुश्वार हो जाये

 

                  जहां सड़कों पर गड्डे न हों तो वहाँ के बाशिंदे बड़े नाज़ुक मिज़ाज, कमजोर होते हैं और उसी रंग में आने वाली पीढ़ी को रंग लेते हैं। जबकि ज़िंदगी न केवल फेयर नहीं है।  वह आसान भी नहीं है। आपको बार-बार गिर कर उठना है। ऐसे नहीं कि एक बार गिरे तो गड्डे के ही होकर रह गए।

 

                      इसी श्रंखला में जब खबर आई कि एक अस्पताल में मरीज के कोमा में जाने के बाद उसके परिजनों ने मरीज को घर ले जाकर क्रियाकर्म करना ही ठीक समझा। कारण - कहते हैं न ज़िंदा हाथी एक लाख का तो मरा हाथी सवा लाख का। अस्पताल वाले कोमा वाले मरीज का भो रोज़ का इतना बिल बना देते हैं कि परिवार बिना अस्पताल के ही कोमा में जाने को होता है। जब वे खटारा एंबुलेंस में दादी को क्रियाकर्म को ले जा रहे थे तो किसी सड़क के गड्डे पर एंबुलेंस इतनी ज़ोर से उछली कि दादी कोमा से बाहर आ गई। दादी को होश आ गया। परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। जिसने भी खबर सुनी वह जहां था वही बिना गाड़ी उछल गया। अब परिवार ने तय किया है कि वे आज से गड्डों को सम्मान से देखा करेंगे। गड्डों को देखने की उनकी दृष्टि ही बदल गयी। वे ठेकेदार को ढूंढ रहे हैं ताकि उसका धन्यवाद दे सकें और सार्वजनिक अभिनंदन कर सकें।

 

                  इस सबके देखते अस्पताल वाले अलग इस रिसर्च में लगे हैं कि कैसे इन मरीजों को अपने शहर की सड़कों से गुजारा जाये ताकि उन्हें भी कोमा से बाहर निकाला जा सके। दूसरे कुछ अस्पताल अपने प्रांगण में ऐसा ट्रैक बनाने की सोच रहे है जिसमें छोटे-बड़े, गड्डे ही गड्डे हों। गोल्फ की तरह मरीज़ से उसी अनुसार फीस ली जाया करेगी। आप अपने मरीज को 'नाइन होल' वाली सड़क से ले जाना चाहते हैं या ‘18 होल' वाली सड़क से ?

 

व्यंग्य: आइंस्टाईन फाइल और मैं

  

     मैं सोच रहा हूँ अगर आइंस्टाईन फाइल जैसी कोई चीज़ होती तो ये जिस-जिस का भी नाम उसमें होता तो वह कैसे इठलाता फिरता। उसका 'स्वैग' ही अलग होता। क्या आपको लगता है ऐसा आदमी किसी से सीधे मुंह बात भी करता। उसे तो पार्टीज़ और कॉकटेल से ही फुरसत नहीं मिलनी थी। उसके चैनल चैनल इंटरव्यू चल निकलने थे। मित्र और रिश्तेदार अलग ईर्ष्या करते, कुढ़ रहे होते। वह भी हवा में आ जाता और टेर टेर के बताता कैसे उसे आइंस्टाईन के ई-मेल पर ई-मेल आ रहे थे। हे ! आर्यपुत्र हम पर कृपा करें और अपने मुबारक कदम मेरे द्वीप पर रखें और कृतार्थ करें। साहिर साब का एक शेर है ना "... तुझसे मिलना खुशी की बात सही... तुझ से मिल के उदास रहता हूँ...." तो आइंस्टाईन फाइल में मेरा नाम आ जाता यह तो खुशी की बात होती ही होती मगर लोग इस पर 'कंट्रोवर्सी' करने लगते कि इसने खुद तो महज़ हिस्ट्री और हिन्दी पढ़ी है, इस कूढ़ मगज का नाम आइंस्टाईन  फाइल में कैसे ? जब ये नाम इन्द्राज किए जा रहे थे तो हम कहाँ थे ? ये सोच-सोच ना जाने कितने लोग उदास हो जाते होंगे। मैंने भी फिर एक तटस्थ भाव से कह देना था कि मैं दो-चार बार देश की खातिर आइंस्टाईन  से मिला था। मैं आइंस्टाईन से मिलने वाला कोई इकलौता हिन्दुस्तानी नहीं, पंडित जवाहर लाल नेहरू भी आइंस्टाईन से मिले थे। मेरे पास सबूत मौजूद है।

 

                       एक मेरा नाम ई-मेल में आया तो क्या

                      और भी इंडियन आइंस्टाईन फाइल में हैं

 

 

आगे आने वाले टाइम में यह  गौरव की बात मानी जाएगी कि जब दुनिया के वखरे वखरे मुल्क़ के लोगों के नाम, बोले तो ! जब टॉम डिक और हैरी के नाम आइंस्टाईन फाइल में थे तब एक हिन्दुस्तानी गंडा सिंह भी था। यानि मेरा नाम देख कर आपका सीना गर्व से 66 इंची हो जाएगा। 

 

 

यह कोई कम गर्व की बात नहीं होती है कि इत्ते बड़े आदमी की 'मेलिंग लिस्ट' में आपका नाम हो। असल में मैं तो आइंस्टाईन के मोबाइल के 'फास्ट-डायलिंग' पर हूँ। अब ये बात मैं अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों को तो क्या ही बताऊँ। वो तो ईर्ष्या के मारे जल-कुढ़ ही जाएँगे। और लगेंगे अंड-बंड बकने। मेरे भारत महान में कोई थोड़ा ऊपर उठ जाये, किसी को जरा मशहूरी मिल जाये, लोग बाग लग जाते हैं उसकी क़ब्र खोदने। "अजी हम अच्छे से जानते हैं, खाने तक के वांदे थे। अब जरा सा पैसा क्या आ गया सब भूल गए। वो दिन भूल गए जब घर में आए दिन फाके होते थे। कपड़े तक ढंग के नहीं थे अब 'थ्री पीस सूट' पहन कर इतराते हैं। एक कमरे के मकान में पूरा परिवार रहता था। अब फार्म हाउस में रहने लगे हैं तो बातें आ गई हैं।“

 

लोगबाग कयास पर कयास लगाए जा रहे हैं कि मेरे आइंस्टाईन के साथ किस तरह के संबंध थे। अब इन पढे-लिखे मूरखों को क्या बताऊँ ?  जो संबंध पानी के टब से आर्कमिडीज़ का था, जो संबंध सेब का न्यूटन से है वही संबंध मेरा आइंस्टाईन के साथ है।

                               

 नोट : मेरा कोई फोटो आइंस्टाईन अथवा उसके परिवार, एक्स्टेंडिड परिवार के साथ नहीं है। ऐसा कोई भी फोटो प्रकाश में आये तो आप समझ लेना ये ए.आई. का काम है और इसके पीछे विरोधी दल के फ्रस्ट्रेटिड लोग हैं।

 

व्यंग्य: कहाँ है गैस की कमी?

 

                       मेरे भारत महान में जहां हर दूसरा आदमी गैस की समस्या से पीड़ित है उसे भोजन करने के तुरंत बाद गैस हो जाती है। या गैस के मारे उससे भोजन ही नहीं होता। सर्दी आते ही लोग कार्बन मोनो डाई ऑक्साइड से धड़ाधड़ मरने लगते हैं। कोई बंद कमरे में हीटर जलाने से तो कोई बंद कमरे में अंगीठी जला कर। मरते सब गैस से ही हैं। अब कोई क्या ही करे प्रकृति में भी गैसें ही गैसें भरी पड़ी हैं। आपकी मालूमात के लिए बता दूँ कि हमारे वातावरण में 78.08% नाइट्रोजन है, तो 0.93% ऑरगन गैस है। ले दे कर ऑक्सीजन मात्र 20.95% है। अब इसमें कोई भी देश क्या ही कर लेगा। ये तो 'ईडन-गार्डन' छोड़ने से पहले सोचना चाहिए था। सेब तुमने खाया अब भुगतना पूरी मानव जाति को पड़ रहा है, वो भी बिना सेब खाये।

 

                 

                           गैस मेरी नाली की जित देखूँ तित गैस

                           गैस देखन मैं गयी मैं भी हो गयी गैस

 

                     आप कोई सा मैनहोल खोलो हर एक में जो उतरता है वो गैस से मारा जाता है। नाले से आ रही दुर्गंध असल में दुर्गंध नहीं गैस ही है। अब आपने कैमिस्ट्री तो पढ़ी नहीं है। अब आप क्या ही जानो। बस मुंह उठा कर गैस की किल्लत है! गैस की कमी है! भाई गैस जो है से अनलिमिटेड नहीं है। इसने एक न एक दिन तो कम होते-होते खत्म होना ही है। ये पहले के लोगों को पता था तभी न वे कच्चे फल, कंद-मूल खाते थे। अव्वल तो कुछ पकाना नहीं होता था अगर पकाना पड़ भी जाये तो नीचे आग जला कर ऊपर लकड़ी से टांग दिया जाता था। जंगल सफारी की तरह लो जी पक गया। आज आप जिसे 'बार-बी-क्यू' कहते हैं हमारे पूर्वजों का तो मेन कोर्स ही वो होता था।

 

 

                         पेड़ पौधे अलग गैस छोड़ते फिर रहे हैं। यहाँ तक की बड़े बूढ़े ताकीद करते थे फलां पेड़ के नीचे मत सोना वह हानिकारक गैस छोड़ता है, आज भी छोड़ रहा है। सुनते हैं वातावरण में दर्जनों गैस हैं। सोचो ! प्रकृति में गैसें ही गैसें भरी पड़ी हैं। एक हम हैं हमें कोई भी बहका देता है कि गैस खत्म होने वाली है, गैस की कमी हो गयी है। गैस पर ब्लैक चालू है। हम आ जाते हैं बातों में। हमारी हालत सिंडरेला के उस प्रिंस सी हो गई है जो सिंडरेला का एक सेंडल ले कर दीवाना बना गाँव-खेड़े में घूमता फिरता था। वह सिंडरेला के लिए घूमता था आज हम सिलिन्डर के लिए घूम रहे हैं। भैया ! क्यों नहीं चूल्हा जलाते, हमारी सनातन परंपरा में चूल्हे का विशेष स्थान है। चूल्हे में डालो, भाड़-चूल्हे में गया, सांझा चूल्हा, घर घर माटी के चूल्हे हैं, चूल्हा भी नहीं जला, आदि आदि। ज्यादा आधुनिकता का भूत आप पर सवार है तो अंगीठी जलाइये। अंगीठी भी संस्कारी है। कब से आप से कहा जा रहा है की पेड़ लगाइये। इससे क्या होगा कि आप लकड़ी काट चूल्हे या अंगीठी में जलाएंगे तो तब तक दूसरे पेड़ तैयार हो जाएँगे काटने को। इतनी सी बात आपको समझ नहीं लगती बस इधर उधर अखबार और यू ट्यूब में कुछ देख-सुन लिया लगे बावेला मचाने। इन यू ट्यूब वालों का भी इलाज़ करना पड़ेगा। इन्हें बताना पड़ेगा कि गैस भले हल्की होती है पर हमें हल्के में लेने की भूल न करें।

 

व्यंग्य: गैस पर खाना पकाने के नुकसान


     

                       गैस के घर-घर आने से पहले ज़िंदगी कितनी आसान थी। आज की पीढ़ी इसका अनुमान भी नहीं लगा सकती। जीवन सिंपल था। गृहणियाँ सुबह से शाम तक बिज़ी रह पातीं थी। चाहे गोबर के कंडे बनाना हो या फिर लकड़ी की टाल से लकड़ियाँ लाना हो। जब घर घर मटियारे चूल्हे होते थे जीवन 'फन' था। उसे समय -समय पर बड़े मनोयोग से और कई बार कलात्मक ढंग से पोता जाता था, सजाया जाता था। उसमें से निकलने वाले धुएँ के लिए छत में एक धुंआरा भी बनाया जाता था जो कि बहुत सस्ते में बन जाता था आजकल की तरह डिज़ाइनर चिमनी नहीं हुआ करती थीं जो कि लाखों रुपये में आती हैं। अब इसमें सजावट या क्रिएटिविटी लगाने की न कोई जरुरत है न कोई स्कोप। इसमें तो बस पैसा है। तरह-तरह की चिमनियाँ बाज़ार में हैं। हाँ ए. एम. सी. कराना नहीं भूलना ज़रूरत पड़ती रहती है।

  

                   चूंकि मेरे भारत महान में खाना पकाना महिलाओं का प्रमुख 'टाइम पास' और वृत्ति थी अतः मर्दों के पास उनको बिज़ी रखने का ये भी एक उपकरण था। महिलाओं के लिए गैस एक बहुत बड़ा 'गेम चेंजर' बन कर आया। अब उनके पास टाइम ही टाइम था। जो रख सकते थे उन्होने दो या दो से भी अधिक गैस के सिलिन्डर रख लिए ताकि सप्लाई नियमित बनी रहे। जहां पाइप से गैस आ रही है वहाँ तो और भी आराम हो गया। न कम गैस के सिलिन्डर का झंझट न फोन पर फोन और गैस वाला भैया को टिप देने की आफत। पर देखिये गैस के आने से सबसे पहले तो गैस पर बना खाना खाने से लोगों के पेट में गैस होने लगी। हर घर में हिंगोली, हाजमोला और ईनो मिल जाएगी। हर दूसरा आदमी गैस की समस्या से परेशान है अब चाहे वह सिलिन्डर वाली गैस हो या पेट की गैस। गैस आने के बाद सिलिन्डर भी खूब फटने लगे। जहां देखो, जब देखो गैस सिलिन्डर फट जाता। जान-माल का नुकसान अलग करता। उससे पहले स्टोव भी थे जिसमें घासलेट बोले तो मिट्टी का तेल यानि किरोसिन इस्तेमाल होता था। वह तो खूब ही फटते थे और उनका निशाना सीधा घर की बहू पर होता था। आपने कभी नहीं सुना होगा स्टोव के फटने से फलां सास की मृत्यु। जब मरती तब बहू ही मरती।

 

                      गैस के साथ और भी झंझट हैं जैसे उसकी पाइप का ख्याल रखना पड़ता है। कहीं से गैस लीक तो नहीं कर रही। रात को कितनी बार सोते-सोते उठ कर देखना पड़ता है कहीं गैस खुली तो नहीं छोड़ दी। गैस आई तो 'लाइटर' भी आया, और कितनी ही एक्सेसरीज़ आयीं। दूसरे शब्दों में खर्चा ही खर्चा। लकड़ी के चूल्हे, अंगीठी और स्टोव में इतना खर्चा नहीं होता था। लकड़ी का चूल्हा हमें आत्मनिर्भर बनाता था। क्या अब वक़्त नहीं आ गया है कि हम फिर से आत्मनिर्भर बन जाएँ। वैसे भी नई पीढ़ी बोले तो 'जेन जी' को खाना पकाने से नफरत है। अब ये फैशनेबल हो चला है कि लड़कियां कहती फिरें  उनको खाना बनाना नहीं  आता। असल में उनको किचन से ही नफरत है।

 

           गिव अप गैस। लैट्स गो बैक टू गोबर कंडा चूल्हा। बी आत्मनिर्भर !!

क्या गंगा में नहाने से पाप धुल जाते हैं ?

 

 

यह मेरा कथन नही है बल्कि पी.सी.एस. परीक्षा में पूछा गया एक सवाल है। साथ ही कहा गया है कि ये ‘सिचुएशनल’ सवाल है। जैसे कि यह कह देने भर से इस प्रश्न को एक ‘वेलीडिटी’ मिल जाएगी। आजकल गो बैक टू सनातन एज। जिसमें अंध विश्वास अंधविश्वास नहीं थे बल्कि इकलौता विश्वास हुआ करता था। फेथ बहुत बड़ी चीज़ होती है। एक कहावत है फेथ यूनिवर्स को भी हिला देने की ताकत रखता है। और यह हिला देना तब से जो जारी है आज भी कायम है। आज बेचारे पी.सी.एस. के अभ्यर्थी हिल रहे हैं। नो प्राइज़ फॉर गेसिंग। सब ने एक स्वर में कहा होगा कि गंगा में नहा लेने से न केवल पाप नष्ट होते हैं बल्कि स्वर्ग जाने का मार्ग भी प्रशस्त होता है। क्या हो गया अगर कुछ स्किन रोग हो जाएँ। कुछ हज़ार गंदे नाले और कुछ हज़ार फेक्टरियों की केमिकल निकासी गंगा में हो रही है। आखिर गंगा सबको तारती है। क्या प्राणी, क्या प्राणियों की अस्थियाँ, क्या नदी-नाले क्या घातक केमिकल।  

 

मैंने चलन को देखते हुए और इस प्रश्न को देखते हुए 100 क्यूश्च्न का एक ‘क्यूशच्न बैंक’ बनाया है। अतः किसी भी सलेक्शन बोर्ड को यह आज़ादी है कि वह इस बैंक से किसी भी प्रश्न और कितने भी प्रश्न अपना बता कर ले सकते हैं। मुझे इसमें कोई ऐतराज़ नहीं है। उल्टा मुझे खुशी होगी।  

 

 

1.       क्या काली बिल्ली के रास्ता काटने से काम बिगड़ जाता है ?

2.       क्या छींक देने से काम बिगड़ जाता है ?

3.       क्या कुत्ते के कान फड़फड़ाने से यात्रा अशुभ मानी जानी चाहिए?

4.       घर बदलते वक़्त पुरानी झाड़ू पुराने घर में ही छोड़ देनी चाहिए ?

5.       झाड़ू लिटा कर रखनी चाहिए या खड़ी करके?

6.       कौन सी आँख के फड़कने से क्या फल मिलता है ?

7.       क्या हथेली के खुजाने से पैसा आता है?

8.       क्या पाँव की खुजली से यात्रा का योग बनता है ?

9.       क्या सफ़ेद बाल उखाड़ने से रहे-बचे बाल भी सफ़ेद हो जाते हैं?

10.     क्या सिर के आकस्मिक टकराने से लड़ाई हो जाती है ?

11.     क्या दो बार सिर टकराने से लड़ाई टल जाती है?

12.     क्या जूठा पानी पीने से दोस्ती पक्की हो जाती है?

13.     क्या शराब जूठी होने पर भी जूठी नहीं मानी जाती?

14.     क्या विधवा स्त्री की उपस्थिती मात्र से शुभ, अशुभ होता है?

15.     क्या दही-बूरा खा कर परीक्षा देना पास होने की गारंटी है?

16.     क्या उत्तर पुस्तिका पर टॉप पर धार्मिक प्रतीक बनाने से प्रश्न आसान आते

           हैं    और आपको उनके उत्तर पता लग जाते हैं।

17.     क्या शराब पीने से पहले 2-3 बूंद ज़मीन पर गिराना पुण्यकर्म होता है

18.     क्या रात्रि में उल्लू का बोलना/रोना अशुभ होता है ?

19.     क्या उल्लू का आपके घर के पास दिखना घर शिफ्ट का लक्षण है

20.     क्या घर की मुंडेर पर कौव्वा बोलना मतलब आपके घर मेहमान आ रहा

           है?

21.     क्या उबलते दूध का उफन कर गिर जाने से अशुभ समाचार मिलता है

22.     क्या काला टीका लगाने से नज़र नहीं लगती  ?

23.     क्या मंगलवार को लोहा खरीदने से अशुभ होता है?

24.     क्या मंगलवार को बाल कटाने से अमंगल होता है ?

25.     क्या कैंची को खाली हवा में चलना अशुभ होता है?

26.     क्या बिना टूथपेस्ट ब्रश करना दाँत गिरा सकता है

27.     क्या बाद घड़ी घर में रखना अनिष्ट का संकेत है ?

28.     क्या टूटा बाजा/गिटार/सितार घर में रखना अशुभ होता है ?

29.     क्या नींबू और मिर्च लटकाने से अनिष्ट टल जाता है ?

30.     क्या शाम/रात को झाड़ू लगाना अशुभ होता है?

31.     क्या रात को नाखून काटने से कर्ज़ बढ़ जाता है?

32.     क्या टूटा दर्पण घर में रखना आतयाधिक अशुभ होता है ?

33.     क्या पीपल के पेड़ के पास रात में जाने से बुरी आत्मा आपके अंदर आ

           जाएगी?

34.     क्या सुबह सुबह काला कुत्ता देखना शुभ होता है ?

35.     क्या पुराना जूता/काली हांडी पर जीभ निकाले आकृति निर्माणाधीन

           मकान पर लगाने से बुरी नज़र नहीं लगती

36.     क्या 13 का अंक अशुभ होता है?

37.     क्या ग्रहण काल के दौरान बाहर निकलना अनिष्ट को निमंत्रण देना होता

           है ?

38.     क्या पीछे से आवाज का अर्थ, जिस काम को आप जा रहे थे वह नहीं

          होगा ?

39.     क्या शनिवार को काले जूते नहीं खरीदने चाहिए क्यों कि इससे आपका

          शनि बिगड़ जाता है?

40.     क्या दरवाजे के पास खाली बर्तन/बाल्टी रखने/देखने से जिस काम को

          आप जा रहे हैं, बिगड़ जाता है?

41.     क्या आप ‘तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा’   में यकीन रखते हैं

42.     क्या एक दियासलाई से तीन सिगरेट जलाना अशुभ होता है ?

43.     क्या गिफ्ट बतौर विषम संख्या में रुपया देना शुभ होता है?

44.     क्या तकिये के नीचे चाकू रख कर सोने से बुरे सपने नहीं आते ?

45.     क्या कुछ लेते देते समय बाएँ हाथ से नहीं लेना-देना चाहिए ?

46.     क्या नारियल तोड़ना शुभ होता है?

47.     क्या आप पर छिपकली गिरना अशुभ होता है?

48.     क्या लड़कों को घर में अपने दाहिने पैर से और लड़कियों को अपने बाएं

          पैर से प्रवेश करना चाहिए ?

49.     क्या रात को सुई बेचना अनिष्टकारी होता है ?

50.     क्या रात को फिटकरी बेचना अनिष्टकारी होता है?

51.     क्या काला धागा गले / कमर में पहनने से बुरी आत्माएं पास नहीं

          फटकती?

52.     क्या कलाई में लाल धागा पहनने से ईश्वर आपकी रक्षा करता है/ आपका

          काम सिद्ध होता है?

53.     क्या मरते वक़्त गंगाजल पीने से आप डायरेक्ट स्वर्ग जाते हैं?

54.     क्या उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोने से प्रेतात्माएँ आपको घेर लेती हैं

           ?

55.     क्या बेहतर फसल के लिए देवता के आगे भेड़/बकरी की बलि देना जरूरी

          है?

56.     क्या मंगलवार को मांस खाने से आप पाप के भागी हो जाते हैं?

57.     क्या मंगलवार को शराब पीने से आप पाप के भागीदार होते हैं?

58.     क्या आपको हिचकी आती है तो कोई आपको याद करता है?

59.     क्या अपनी चप्पल /जूते उल्टे रखना अशुभ होता है

60.     क्या रात में सीटी बजाने से प्रेतात्मा आतीं हैं ?

61.     क्या बाईं आंख फड़कने से कुछ अशुभ होता है?

62.     क्या दाहिनी आँख फड़कने से कुछ शुभ होता है ?

63.     ऊपर का होंट फड़कने से क्या फल मिलता है?

64.     क्या फल होता है बायाँ अंग फड़कने का ?

65.     क्या राहू काल में शुरू होने वाला काम/यात्रा असफल होगी ?

66.     क्या अंधेरा होने पर एक बल्ब/दीया जरूर जलाना चाहिए

67.     क्या छिपकली का आपके ऊपर गिरना शुभ माना जाना चाहिए

68.     क्या काले कुत्ते को खाना खिलाना शुभ होता है

69.     क्या कढ़ाही या पकाने वाले बर्तन में खाने से आपकी शादी में बारिश होती

          है?

70.     क्या बृहस्पतिवार को केला काटना/खाना वर्जित होता है

71.     क्या कुत्ते का रोना मृत्यु का सूचक होता है?

72.     क्या भोजन के वक़्त जीभ का दांतों में आ जाना सूचक है कि कोई

          आपको याद कर रहा है। 

73.     क्या खड़े होकर पानी पीने से घुटने कमजोर होते हैं और रिपलेस करने

          पड़ते हैं।

74.     क्या शनिवार को पूर्व दिशा में खरीदारी के लिए जाना अशुभ होता है?

75.     क्या शनिवार को नया मटका (घड़ा) खरीदना अशुभ होता है?

76.     क्या सात बार अपने सिर के ऊपर से एंटी-क्लॉक दिशा में नमक वारने से

          नज़र लग गयी हो तो हट जाती है ?

77.     क्या खाली गिलास से टोस्ट करना अशुभ होता है ?

78.     क्या बोतल खत्म होने के बाद उसे वापस मेज पर रखना अशुभ होता है?

79.     क्या ताश में भाग्यशाली होना प्रेम में भाग्यशाली नहीं होता?

80.     क्या शनिवार को काले जूते खरीदने चाहिए ?

81.     क्या उल्टी चप्पल रखने से आर्थिक हानि/मुसीबत हो सकती है ?

82.     क्या एक मैना दुर्भाग्य,दो मैना पक्षी देखना सौभाग्य लाता है?

83.     क्या तुलसी पत्ता चबाना उसका अपमान है अतः निगलना है ?

84.     क्या नदी में सिक्के फेंकने से सफ़लता मिलती है?

85.     क्या किताब में मोर पंख रखने से विद्या आ जाती है ?

86.     क्या मंदिर में घंटा बजाने से भगवान खुश हो जाते हैं?

87.     क्या पूर्वज कौव्वे  के भेष में श्राद्ध खाने आते हैं?

88.     क्या साँप मारने वाले की सूरत साँप की आँखों में आ जाती है?

89.     क्या टिटहरी पक्षी के बोलने से अनिष्ट होता है ?

90.     क्या कब्रिस्तान से गुजरते समय सांस रोक लेनी चाहिए ताकि  सांस लेने

          पर बुरी आत्माएं अन्दर प्रवेश न कर जाएँ ?

91.     क्या मेंढक मेंढकी की शादी करा देने से  बारिश हो जाती है?

92.     क्या मांगलिक से शादी करने का अर्थ एक की आकस्मिक मृत्यु होती है ?

          किन्तु मांगलिक की मांगलिक से शादी में ऐसी कोई आशंका नहीं होती ?

93.     क्या कुत्ते के साथ /पेड़ के साथ विवाह करने से विवाह के मार्ग में आने

          वाली बाधाएँ मिट जाती हैं

94.     क्या घर के अंदर छाता खोलना अशुभ होता है ?

95.     क्या दीवार के सहारे खड़ी सीढ़ी के नीचे से गुजरना अशुभ होता है ?

96.     क्या जूता सुंघाने से मिर्गी का दौरा शांत हो जाता है?

97.     क्या शनिवार को किसी मंदिर में चप्पल या जूते छोड़कर आ जाने से शनि

          का बुरा असर समाप्त हो जाता है ?

98.     क्या बांस को जलाने से वंश नष्ट हो जाता है?

99.     क्या दीवाली पर उल्लू की बलि देने से लक्ष्मी मेहरबान होती है?

100.   क्या तारे के टूटते वक़्त मांगने से मन्नत पूरी हो जाती है?

 

 

 

 

ममता दीदी-मेनका गुरुस्वामी ज़िन्दाबाद !

 

ममता दीदी द्वारा डेरेक ओ' ब्रायन तथा मेनका गुरुस्वामी  को राज्यसभा के लिए भेजने की खबर एक बहुत ही अच्छी पहल है। आपको याद होगा डेरेक भाई कभी टी.वी. पर क्विज़ मास्टर के बतौर आते थे। प्रसंगवश इनके पिता नील ब्रायन भी न केवल एक सफल  क्विज़ मास्टर बल्कि एंग्लो इंडियन कोटा से लोकसभा के सदस्य रहे।  डेरेक एक सफल एंकर रहे हैं। हिन्दी से अधिक अंग्रेजी में धारा प्रवाह वक्ता। उनके क्विज़ शो मनोरंजक और ज्ञान वर्धक होते थे। इसके अलावा वे एंग्लो-इंडियन समुदाय से हैं। 2014 से पहले संविधान के प्रावधानों के तहत दो एंग्लो इंडियंस को राष्ट्रपति लोक सभा में नामित करते थे। फ्रेन्क एंथोनी प्रसिद्ध शिक्षाविद् और एडवोकेट  बरसों-बरस  लोक सभा के एंग्लो इंडियन समुदाय से सदस्य रहे। वे संविधान सभा के सदस्य भी रहे थे।  उनके द्वारा स्थापित फ्रेंक एंथोनी पब्लिक स्कूलों की श्रंखला दिल्ली, बंगलोर, कोलकाता आदि प्रमुख शहरों में सफलता पूर्वक आज भी चल रहे हैं। डेरेक ब्रायन एंग्लो-इंडियन हैं और  मुख्यमंत्री ममता दीदी ने  एक इंक्लूजिव सियासत का उदाहरण दिया है। यूं डेरेक प्रभावशाली ढंग से राष्ट्रीय और बंगाल के मुद्दों को उठाते रहे हैं। वे एक प्रखर वक्ता हैं इसमें कोई संदेह नहीं। वे निश्चय ही टी.एम.सी. के लिए एक 'असेट' हैं।

 

 

इसी के साथ मेनका गुरुस्वामी, ऑक्सफोर्ड और हारवर्ड शिक्षित एक सफल एडवोकेट हैं और प्रमुख केसों को प्रभावशाली ढंग से उच्चतम  न्यायालय में लड़ती रही हैं। हम भारत में जब तक किसी को अपने मन में बनाए 'बॉक्स' में फिट नहीं कर लेते बेचैन रहते हैं मसलन ये सामने वाला (जिसकी बात भी हो रही हो तो) वह किस प्रदेश से है, किस जाति/धर्म का है, कहाँ का और कहां तक पढ़ा लिखा है, इसके और संदर्भ बिन्दु कौन से हैं (नेगेटिव वाले मिल सकें, तो और बेहतर है) इससे हमें अपने मन में बनाए पूर्वाग्रह और दुराग्रहों अनुसार अगले को फिट करने में और 'जनर्लाइज़' करने में सहायता मिलती है। हम कम्फ़र्टेबल फील करते हैं। अतः समाचार पत्र हो या सोशल मीडिया मेनका गुरुस्वामी का जहां नाम आया साथ ही यह भी आया कि वे एल.जी.बी.टी. क्यू. समुदाय से हैं और उनके हितों के प्रबल समर्थक हैं। मित्र लोगों को इतने से कहाँ संतोष था ? वे और गहरे उतरे और ज्ञान के मोती निकाल कर लाये कि वे दरअसल 'लेसबियन' हैं। उनकी पार्टनर का नाम है अरुंधति काटजू। कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयाॅर्क शिक्षित अरुंधति काटजू खुद भी सफल वकील हैं।

 

हमारे समाज में उनकी योग्यता की बात दीग़र पहले उनके इस 'ओरियंटेशन' की बात होगी। ममता दीदी के पास प्रतिभाओं की कमी नहीं है। महुआ मौइत्रा उनमें एक हैं। शत्रुघ्न सिन्हा पता नहीं इन दिनों क्यों उतने मुखर नहीं हैं जितनी उनसे अपेक्षा की जाती है। वे एक तजुर्बेकार और फायर ब्रांड वक्ता रहे हैं।

 

मुझे पूरा यकीन है कि इस प्रकार की प्रतिभाओं से जो 'थिंक टैंक' दीदी बना रही हैं वह निर्णयाक साबित होगा और वे सियासत में 'असेट' बनके उभरेंगे। हम लोग डेफ़िनिटली एक बेहतर बौद्धिक संसदीय विमर्श डिज़र्व करते हैं।


इंतज़ार रहेगा ।

व्यंग्य : चिल विद चीला !

   

ये जो चीला है जिसे लोग बतौर नाश्ता और रिफ्रेशमेंट खाते हैं कमाल की चीज़ है। कमाल ये है कि ये अभी तक चल रहा है, सरकार ने इस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है। ये बात समझ से परे है। भई! ऑमलेट खाना है तो ऑमलेट खाओ सीधे-सीधे। फिर किसी ने बताया चीला का आविष्कार ही किसी वेजिटेरियन ने किया होगा। जैसे फिल्मों में 'डबल' होते हैं, सिने-तारिकाओं के 'लुक एलाइक' होते हैं कुछ-कुछ वैसे ही। इसे खाते वक़्त वेजिटेरियन लोग भी ऑमलेट की फेंटेसी ले सकें। अतः चीला ऑमलेट वालों को फेंटेसीलैंड ले जाने का साधन/वाहक है। ऑमलेट जैसा दिखता है पीला-पीला,  ऑमलेट की तरह ही धनिया/प्याज़ डालिए और हूबहू ऑमलेट की तरह लपेट कर प्रजेंट कर दीजिये। चीला के फैन लोग की बांछे खिल जाती हैं। वे इसे खा कर वैसे ही खुश हो जाते हैं जैसे वेजीटेरियन लोग चिकन लाॅली-पॉप नहीं खा सकते अतः उनके लिए आविष्कार किया गया सोया चाॅप का। वैसे ही दिखता है, वैसे ही पकड़िए बस ये है कि ये मुर्गे की टांग नहीं आइसक्रीम की डंडी है। बताते हैं सोया चाॅप सेहत के लिए बहुत हानिकारक है, इसमें कई खाद्य-अखाद्य वस्तुओं की मिलावट होती है। जिसे केवल सोया चाॅप बनाने वाले ही जानते हैं।  यूं तो आजकल चिकन भी इंजेक्शन लगे मिल रहे हैं आपको पता ही नहीं आप चिकन खा रहे हैं या रबड़ या प्लास्टिक और ये सब चिकन की प्रजाति ब्राॅयलर के नाम पर।

 

 

इतना काफी नहीं है। चीला मुख्यतः  बेसन का बनता है। अब कोई पूछे भाई बेसन ही खाना है तो क्यों न उसके गरमागरम पकौड़े बना कर खाये जाएँ। अब तो लगभग हर चीज़ का पकौड़ा बन जाता है। दिल्ली में एक ‘खानदानी’ पकौड़ेवाला है, जहां पकौड़े के खानदानी प्रेमी लोग पकौड़े खाने आते हैं। उसे हर चीज़ का पकौड़ा बनाने में महारत हासिल है। करेला, कमल- ककड़ी, बैंगन, आलू, प्याज, गोभी, पनीर। गोया कि आप उसे कुछ भी दे दें वह उसे पकौड़े में तब्दील कर देगा। मुझे कोई बता रहा था कि लखनऊ में आइसक्रीम का पकौड़ा भी होता है। चीला एक अद्भुत आविष्कार है। इसके प्रेमी इसे फास्ट-फूड बताते हैं। बस तवा चूल्हे पर रखिये बेसन घोलिए और उंडेल दीजिये। धनिया-प्याज अगर खाते हों,  छिड़क दीजिये डोसे की तरह जो अगड़म-झगड़म डालना है  डाल दीजिये।  हो गया चीला तैयार।

 

इस पर बस होता तो गनीमत थी। तुर्रा ये कि चीला बेसन का ही नहीं मैदे का (उत्तपम के माफिक) मूंग की दाल का भी बनता है। कोई कैसे तो चीला को पसंद करे! चीला खाये!  ऑमलेट कनवेंट शिक्षित है। चीला टाट-पट्टी के हिन्दी मीडियम पाठशाला की पैदाइश है। चीला ऑमलेट का 'फेक-नेरेटिव' है। चीला में कितने परसेंट कौन सी विटामिन है, कितना प्रोटीन है इस पर अनुसंधान की ज़रूरत है। कई बार लगता है यह चीला कहीं सिंधु घाटी की सभ्यता अथवा हड़प्पा की खुदाई में न मिला हो। इसे कहीं राष्ट्रीय अल्पाहार न घोषित कर दिया जाये। जैसे लिट्टी-चोखा, दाल बाटी-चूरमा, सत्तू, की श्रंखला में। चीला है किस प्रदेश का ? लगता है किसी के घर में बेवक्त मेहमान आए, बनाने को कुछ था नहीं अतः बेसन का घोल बना कर तवे पर उंडेल दिया और सर्व कर दिया। हम लोग आज तक 'सफर' कर रहे हैं। इसके प्रेमी इसके गुण गिनाते नहीं अघाते। बचपन में हमारे माँ-बाप भी पालक के गुण गिनाते थे। हमें लगता, न शक्ल, न सूरत न कोई स्वाद कोई समझदार आदमी पालक कैसे खा सकता है। जबकि हमारे नाना-दादा कटोरे के कटोरे खाली कर देते थे।

 

मेरे यहाँ कढ़ी भी बड़े चाव से बनाई और खाई जाती है। जिस दिन कढ़ी बनती है उस दिन किचन में फुर्ती और कंस्ट्रेशन देखने लायक होती है। गहमागहमी देख मैं अंदाज़ लगा लेता हूँ 'बेटा! आज कढ़ी मिलेगी खाने में'। तो हुज़ूर आप चीला पार्टी से हैं या इसके विरोधी हैं। सुना नहीं तुम्हारा 6 मेरा 9 हो सकता है।