Thursday, February 2, 2012

QUO VADIS RAILWAY?



STORY-1 : Top brass of Ministry of Railways has directed that there should be austerity in various spheres of Railway life. Towards this end, several austerity measures have been introduced, principal being cut in Over Time Allowance and Travelling Allowance and deferring its payment where already due. Several years of ‘No hike’ tariff policy has led to severe financial crunch, in turn, necessitated an unprecedented rise in fare subject to, of course, political compulsions arising out of and in the course of courtship with government’s alliance partners.

STORY-2 : With 19 Railway Recruitment Boards enjoying siesta in hibernation, no or negligible recruitment has taken place during the past several years. That does not mean men have not been inducted in Railways. The Indian Railways has many other ‘inlets’. On Sports ground annually hundreds of sportspersons are inducted in Group ‘C’ and ‘D’. Similarly, inflow in Scout & Guide, Cultural Quota, Minister’s Quota, Bungalow Peon continues unabated. Last but not the least, compassionate ground appointments to the wards in lieu of Railwaymen dying/medically decategorised while in service.

An additional whopping wage bill of 300 crores per year is going to be thrust upon Railways in the ensuing few months when a contingent of strong support staff (class IV) enters the already surplus rank and file of Railwaymen in the name of ‘safety’.

It is amusing to know that the mandarins of Rail Bhavan think that the ‘safety’ can be ensured by these lowest rung green horns.


Sunday, January 22, 2012

व्यंग्य: त्योहार प्रधान हिंदुस्तान

 आपने बहुत बार सुना होगा कि भारत एक कृषि प्रधान ( पढ़ें कुर्सी प्रधान) देश है या गांव प्रधान (पढ़ें फार्म हाऊस प्रधान) देश है. भारत में तीन प्रमुख फसलें होती है. रबी और खरीफ. तीसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है रिलीफ. बाढ़ हो, सूखा हो या फिर भूकम्प हो, सभी में रिलीफ की फसल लहलहाती है. अब भारत इतना विशाल और विविधताओं वाला देश है कि रबी, खरीफ वाले भले बेरोज़गार बैठे रहें या आत्महत्याओं में व्यस्त रहें, ‘रिलीफ’ वाले बरस भर फसल काटते है.


आप गौर करें तो पायेंगे कि भारत वास्तव में एक त्योहार प्रधान देश है. भारत 33 करोड़ देवी देवताओं की पावन भूमि है. अब 33 करोड़ देवी देवताओं की पूजा अर्चना को जनसंख्या भी बहुत चाहिये. हम बहुत धार्मिक किस्म के लोग हैं. जैसे ही हमें पता चला कि इतने सारे देवी देवता हैं और पूजने वाले कम पड़ रहे हैं बस फिर क्या था हम पिल पड़े और एकदम गदर मचा दिया. यहां तक कि चैम्पियन टीम चीन को भी अपनी इज़्ज़त बचाने के ‘वांदे’ हो गये. लोग कह रहे है कि एथेंस ओलम्पिक में चीन ने बहुत सारे पदक जीते जबकि भारत बड़ी मुश्किल से अपना खाता खोल पाया. भई इस वक़्त हमारी प्राथमिकता चीन को जनसंख्या के अखाड़े में पटखनी देना है. एकदम चारों खाने चित्त करना है. उसके बाद ओलम्पिक खेलों पर ध्यान देंगे. फर्स्ट थिंग फर्स्ट. खेल जरूरी है या कि इज़्ज़त बचाना ? और इज़्ज़त बचाना कोई खेल नहीं है. ये इश्क़ नहीं आसां.


भारत की पावन उर्वरा भूमि पर त्योहारों की खूब भरमार है. हर दिन कोई न कोई त्योहार है. जैसे पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये और बहानों की कोई कमी नहीं. आज मूड बहुत खराब है. आज मैं बहुत खुश हूं. आज बॉस से खट्पट हो गयी है. आज तो बहुत थक गये. आज जरा ज़ुकाम सा लग रहा है. आज गला खराब है. आज बदन टूट सा रहा है आदि आदि. उसी तरह श्राद्धालुओं को त्योहारों की कोई कमी नहीं.


अब आप होली को ही ले लें. यह बड़ा अच्छा त्योहार है. भांग खाइये, ठंडाई पीजिये. गरज़ कि दिन में ही पीने-पिलाने के त्योहार का नाम होली है. आप ग्रीज-पेंट लगायें. मिलावटी गुलाल लगायें और अपनी सोसायटी की सारी भाभीजीस को बे-रोक-टोक जेम्स बॉन्ड बन कर गुब्बारे और पिचकारी मारें. इसे कहते हैं ‘लाइसेंस टू किल’ होली के बाद डॉक्टरों खासकर स्किन और नेत्र विशेषज्ञों की मौज रहती है. होली के बाद इनकी होली मनती है. लोग होली पर गले मिलते हैं. जिससे जितना बड़ा काम अटका है उस से उतना प्रगाढ‌ और देर तक गले मिलना होता है. सब चिल्लाते हैं. बच्चे खुश होते हैं अपनी शरारतों से. बड़े खुश होते हैं और बच्चों की तरह किलकारियां मार कर भीगते-भिगोते हैं. दोपहर से ही रेडियो-टी.वी वाले हर साल की तरह खबर देते हैं. ‘देश भर में होली का त्योहार पूरे उल्लास और शांतिपूर्वक तरीके से मनाया गया. फलां फलां ने देशवासियों को इस अवसर पर अपनी शुभकामनायें दीं’ ये शुभकामनायें सूखी-सूखी होती हैं. सिक्योरिटी कारणों से वे या तो होली खेलते नहीं या फिर केवल अपने सिक्योरिटी गार्ड्स के साथ ही खेलते हैं. शाम को बॉस लोगों के घर जाने का रिवाज होता है ताकि दिन की भीड़ में अगर ‘नोटिस’ नही भी हुआ तो बॉस की चौपड़ी में हाज़िरी अर्थात ‘पी’ तो लग जाये. ‘पी’ फॉर पॉलिश.


दीवाली के बारे में लिखना बिजली की रंग-बिरंगी लड़ी को दिया दिखाने के समान है. यह हमारा अखिल भारतीय पॉलुशन डे है. आप बावेला ना मचायें इसलिये मशहूर ये कर दिया गया है कि इस से मक्खी- मच्छर मर जाते हैं. घर-बाहर की सफाई हो जाती है. दीवाली लाइट्स और बमों का त्योहार है. बम जो शिवकाशी में बंधुआ बाल मज़दूर बनाते हैं और हर बरस आग लगने से बड़ी संख्या में ज़िंदा जल जाते हैं. आतंकवादियों की स्पॉन्सरशिप में आजकल बरस भर बड़े बड़े बमों की मारामारी रहती है. उसके आगे दीवाली के बम ऐसे ही ‘फुस्स’ मालूम देते है जैसे कि चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार.


दीवाली दरअसल हमारे देश की जी.बी.एम है. जनरल बॉडी मीटिंग ? नहीं नहीं ! गैम्बलिंग, ब्राइब और मदिरा. यह रिश्वत लेने देने का ऑफिशियल त्योहार है. लोग जुआ और शराब पूरी श्रद्धा के साथ ‘बापरते’ हैं. मना करो तो मानते तो वैसे भी नहीं. उल्टा लड़ने को आते हैं. “ क्या मतलब है ? और दिन चंगा त्योहार के दिन नंगा” जिन लोगों ने बरस भर एक केला भी नहीं खाया-खिलाया होता वो भी ड्राई फ्रूट्स के डिब्बे उठाये उठाये फिरते हैं. वो अलग बात है कि डिब्बे दिखने में ही बड़े होते है और उनमें चतुराई से सज़ाये छंटाक छंटाक भर ड्राई फ्रूट से ज्यादा नहीं होते. बाज़ार सज़ जाते है. दीवाली ‘सेल’ के बोर्ड लग जाते हैं. लोग टूट कर पड़ते हैं और ऐसे खुश होते हैं जैसे उल्टे ये ही दुकानदार को ठग आये हों. फायर ब्रिगेड वालों की इन दिनों वैसे ही मांग होती है जैसे फायर फिल्म के बाद बोल्ड बट पूअर हीरोईनों की हो चली है. पूअर इसलिये कि फिल्म का बजट चाहे कितने ही करोड़ का क्यों न हो, उसको तन ढांपने को कपड़े नही देने हैं बैरी प्रोडयूसर ने. बेचारी को या तो चीथड़े पहनने पड़ते हैं या फिर हीरो की टाई में से ही अपने लिये कपड़े निकालने पड़ते हैं.


ईद मुख्यत: दो तरह की होती है. एक में सेमरी (सेवेय्यां) खाने को मिलती है दूसरे में बकरी या बकरा. हर साल ईद के मौके पर दो फोटो अखबार में जरूर छपते हैं. एक में दो बच्चे गले मिलते हुए दिखाये जाते हैं. दूसरे में हिन्दू-मुस्लिम गले मिलते दिखाये जाते हैं. ‘जाने कहाँ गये वो लोग ?’ (फोटो खिंचा कर) नेताओं के बयान बदस्तूर वैसे ही आते है. तमाम हिंदुस्तानियों को मुबारकबाद और रेडियो टी.वी. की घिसी-पिटी खबर कि ये त्योहार बड़ी धूमधाम से पूरे देश में मनाया गया. ईद पर नये कपड़े पहनने का रिवाज़ है. टी. वी. पर बहू-बेगम, ताज महल या ऐसी ही कोई फिल्म दिखाई जाती है. कोई विदेशी अगर भारतीय फिल्में देखे तो सोचेगा कि भारत एक हैपी- गो- लकी देश है. जहां हर वक़्त प्यार-इश्क़-मुहब्बत की बहार रहती है. घर घर में प्रेम का रिवाज़ सा है. प्यार-मुहब्बत के तराने हमेशा लोगों के होठों पर रहते हैं और वो जब तब यानि कि बात बात में गाने लगते है. दरअसल उन्हें नहीं मालूम यहां ‘भगवान’ भी गरीबी और गुमनामी में मरता है.


क्रिसमस का जैसा जोर-शोर हमारे यहां होता है सम्भवत: इंग्लेंड और यूरोप में भी न होता होगा. दरअसल हम हर वो त्योहार मनाना चाहते हैं जिसमें पीन-खाना हो. थोड़ी मस्ती हो. क्रिसमस और नये साल से जो बधाई पत्रों का सिलसिला चला है वो अब जीवन के हर इलाके में पहुंच गया है. हर बात या कहना चाहिए बात बात के लिये ग्रीटिंग कार्ड ‘बाज़ारवाद’ ने आप तक पहुंचा दिये हैं. बाज़ारवाद ने हमारे घर-त्योहार, सम्बंधों सभी में घुसपैठ कर ली है. हम न्यू ईयर ऐसे मनाते हैं कि अमेरिका वाले भी शरमा जायें. वास्तव में क्रिसमस से पीने-पिलाने, मौज़-बहार का जो सिलसिला शुरु होता है तो वह नव वर्ष तक चलता है. हमारे यहां साल के पूर्वार्ध में आपने जो कमाया-बचाया होता है, त्योहारों, उकसावों और बाज़ार के चलते साल के सेकंड हाफ में उसे फूंकना होता है. उसके बाद फिर वही प्रॉविडेंट फंड में से उधारी, क्रेडिट कार्ड और लोन मेला. कबीर जानते थे ये होगा:-


‘कबीरा खड़ा बाज़ार में लिये मुराडा हाथ
जो घर जारै आपना, चले हमारे साथ'


हम लोग सदियों से ये त्योहार मना रहे है. हर बरस हज़ारों लाखों रावण जलाये जाते हैं. मगर रावण हैं कि जितने जलते नहीं उस से अधिक पैदा हो रहे है और उनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है. दीवाली हो ईद, क्रिसमस या होली हो, सबका पैगाम अगर प्यार-मुहब्बत है तो एक बात बताइये इतनी नफरत क्यों है चारों ओर ?.






Wednesday, November 23, 2011

व्यंग्य : मेरे अंगने में ....

अमरनाथ उर्फ आशा देवी की अमर बनने की आशाओं पर उस वक़्त तुषारापात हो गया जब अदालत ने उन्हें मर्द घोषित कर दिया और उनसे महापौर का पद छीन लिया जो उन्होनें हिजड़ा बन कर हासिल किया था. पॉलिटिक्स में पुरुषत्व का महत्व है और पुरुषों का अधिपत्य है. यह नामर्दों का काम नहीं. खासकर उन मर्दों का तो बिल्कुल ही नहीं जो पॉलिटिक्स के लिये नामर्द तक कहलाने को तैयार हों, ये माना लोग देश सेवा के लिये बडे‌ से बड़ा त्याग करने को तत्पर रहते हैं. मगर 1857 से लेकर आज तक ऐसा कोई उदाहरण देखने में नहीं आया जबकि किसी ने अपनी मर्दानगी ही त्याग दी हो.
वैसे देखने में यह आया है कि अक्सर अच्छे खासे मर्द पॉलिटिक्स में जाने के बाद नामर्द बन जाते हैं. मगर वो अलग किस्सा है. कभी टिकट के लिये रोना, कभी पार्टी फंड के लिये रोन, कभी पार्टी प्रेसिडेंट के आगे घुटने टेकन, कभी सी.बी.आई. के आगे रोना, गिड़गिडाना. अच्छे भले घर से मर्द निकले थे बेचारे नपुंसक बन के रह जाते हैं.
यह अदालत का ऐथासिक फैसला है. कारण कि हिज़डे‌ खुश थे चलो अब उनकी भी भारत की राजनीति और सत्ता के गलियारों में सुनवाई हुई. अब ‘जैनुइन’ नपुंसक भी चुने जायेंगे. मगर देखते हैं कि इस क्षेत्र में भी घुसपैठ हो गई और मिलावट आ गई. समाज का कोई हलका बचा नहीं है जिसमें मिलावट न हो गई हो. अब आप ही बताइये ऐसे में हिजड़े कहां जायें. बच्चों के पैदा होने पर आपने पह्ले ही बंदिशें लगा दी हैं. हिजड़े बेचारे कभी राज़ा महाराज़ाओं के हरम के पहरेदार थे अब ट्रैफिक सिगनलों पर भीख मांगते फिरते हैं. मगर उसमें भी सुनते हैं बेरोज़गार लड़के हिजड़े बन उनके बीच आ घुसते हैं.
लव के लिये कुछ भी करेगा. वैसे ही पॉवर के लिये कुछ भी करेगा. आप बोलेगा हिजड़ा ? हम बोलेगा “ जी हज़ूर” आप पूछेंगे नपुंसक ? हमारा उत्तर “ बिलकुल ज़नाब ! हम तो खानदानी नपुंसक हैं, हमारा बाप भी नपुंसक था”
जब मध्य प्रदेश में पहला हिजड़ा एम.एल.ए बना था तो एक सुरसुरी सी छा गई थी देश के राजनैतिक क्षितिज़ पर. कमला सभी विरोधियों की मर्दानगी को रौंदती हुई जीती थी. पार्टी बॉसस के मुंह खुले के खुले रह गये. ये क्या हुआ ? अब हम क्या करेंगे ? मर्द लोग नामर्दों से हार गये. जनता ने अपना फैसला सुना दिया था. एक किन्नर ने बाकी सबको किनारे लगा दिया था.


अब न्यायालय ने आशा देवी को मर्द बता कर उसकी नामर्दी पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. नामर्द बनना कोई हंसी ठठ्ठा नही है. ये हर एक के बस की बात नहीं. ये इश्क़ नहीं आसां. आशा देवी अब अपील में जायेंगे या जायेंगी और अपने आप को ‘नामर्द’ घोषित कराने के भरसक प्रयास करेंगी या करेंगे. ठाकुर यह नामर्दी मुझे दे दे ...दे दे .. आखिर महापौरी का सवाल है. नही तो फिर और क्या रह जायेगा. वही ताली पीट पीट कर जचगी में नाचना गाना.

एक बार फिर नेताओं ने साबित कर दिया कि नामर्दों की उनकी दुनियां में मर्दों का कोई काम नहीं. वे नकली नामर्दों को ढूंढ ही निकालेंगे और फिर उनसे पूछेंगे “ मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..?”






Tuesday, November 22, 2011

व्यंग्य: गोरों का बोझ

अमेरिका के जनाब रम्सफील्ड ने कहा है कि हम ईराक में जितना जरूरी है उससे एक दिन भी ज्यादा नहीं ठहरेंगे. वाह ! वाह ! क्या स्टेट्मेंट है. क्या ईमानदारी है. साफगोई तो कोई इनसे सीखे. तभी तो इन्होने इतने सारे खुशबू वाले साबुन चला दिये हैं ताकि आप सब भी साफ सफाई रखें. वे इतने सफाई पसंद हैं कि जिस बाज़ार में आप घुसे उसकी सफाई ही कर दी. कपड़ों के बाज़ार में घुसे तो तन से कपड़े साफ. नवयौवनायें अपने अंग प्रत्यंग साफ साफ दिखाने लगीं. उन्होने कह दिया है कि अगर कपड़े पहनने ज़रूरी ही हों तो हमारे अम्रीकी ब्रांड के पहनो. क्या पैंट-कमीज़ क्या कच्छे-बनियान. तुम्हारा दर्ज़ी और उसके बाल-बच्चे गये तेल लेने. कौन झिकझिक करे. नाप देने जाओ फिटिंग दो, ट्रायल दो, डिलीवरी के लिये चक्कर लगाते फिरो. हमारे शो रूम में घुसो और काऊ बॉय बनके बाहर निकलो. आप अपने आप को कितने ही फन्ने खां समझते रहो उनकी नज़र में आप बस तीन साइज़ों में मिलते हो—रेगुलर, लार्ज, एक्स्ट्रा लार्ज. चौथी कोई कैटेगरी ही नहीं. नॉट बैड.
श्री रम्सफील्ड जी वो ही रट लगाये हैं जो सौ बरस पहले तक अंग्रेज भारतीयों के लिये कहते आये थे. इन नालायक भारतीयों को इंसान बनाना हमारी ड्यूटी है. ये वाइट्मैंस बर्डन हैं. जैसे ही ये सभ्य और ठीक हो जायेंगे हम हिंदुस्तान छोड देंगे. देख लो छोड दिया. जैसे ही उन्हें लगा कि अब आम हिंदुस्तानी अंग्रेजी जानना- बोलना चाहता है व अंग्रेजी पढने के लिये भारी रकम और डोनेशन देने को तैयार है. यहां तक कि अपनी भाषा, संस्कार व साहित्य को हेय नज़र से देखने लगा है तो उनकी ड्यूटी पूरी हो गयी. बाद में सर ना उठा सकें इसलिये वो जाते जाते देश का बंटवारा भी कर गये कि बेटा अब उलझते रहो इसी में.
हिज एक्सीलेंसी रम्स्फील्ड ने वही कहा है जो उनके दादा परदादा विश्व में अपनी दादागिरी चलाने को कहते आये हैं. बेचारा अमरीका ..उस पर कितना बोझा है. कभी वियतनाम, कभी ईराक़. आराम नही है. पूरी दुनियां की जिम्मेदारी उसके ऊपर है. सब के ठीक करना है. सब को सभ्य बनाना है ताकि सभी पिज़ा, हाट डॉग और पेप्सी का सेवन करते रहें. निसंदेह अमरीकी अपने वायदे के मुताबिक ईराक़ छोड़ देंगे.बस जरा ये तेल के कुंओं और ठेकों की बंदरबांट हो जाये. आखिर ईराक़ का पुनर्निर्माण उन्ही का तो सिर दर्द है. तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना. मैं चला जाऊंगा ...दो अश्क़ बहा लूं तो चलूं ...सड़कें चिकनी हो जायें जिन पर आयतित कारें दौड़ सकें. शॉपिंग मॉल. कम्प्लेक्स, ओल्ड एज होम, अनाथालय, स्टेट ऑफ आर्ट तकनीक के अस्पताल बन जायें. केंटकी चिकन और पिज़ा होम बन जायें. डिस्को और मायकल जैक्सन चल जायें. जिस दिन आम ईराक़ी अपनी भाषा, साहित्य और संस्कारों और कुछ भी ईराक़ी से हेट करने लग जायेगा वो चले जायेंगे. वे इंतज़ार में हैं कि कब आदाबअर्ज़ की जगह आम अमरीकी हाय कहने लग जाये. खुदा हाफिज़ की जगह ‘कैच यू लेटर’ कहने लगे. बस ! लो कट टॉप और जींस जरा चल निकलें. रीबॉक और नाइक (या कि नाइकी) लोग बाग अपना लें.अरबी, फारसी बोलने वालों को ज़ाहिल तथा अंग्रेजी बोलने वालों को ज़हीन समझा जानेलगे.फिर उनकी ज़रूरत ही नहीं रहेगी. वो कह ही रहे हैं कि जितना ज़रूरी होगा उससे एक दिन भी बेसी वो ईराक़ में नहीं रहेंगे. वो वायदे के पक्के हैं. देखिये डेढ- सौ साल बाद जैसे ही काले अंग्रेज फील्ड में आये गोरे अंग्रेजों ने जहाज पकड लिया था कि नहीं. तब ? जैसे ही ईराक़ वाले अब्बा को डैड और अम्मी को मॉम कहने लगेंगे, अंकल सैम किसी और देश को आज़ाद और सभ्य बनाने को निकल पड़ेंगे. यू नो, बेचारे गोरों पर सचमुच ही बहुत बोझ है. डोंट यू थिंक सो ?






Monday, November 21, 2011

व्यंग्य: भैंस तेरी यही कहानी

रंग भेद की नीति पहले अफ्रीका में जोर शोर से थी. आज यह नीति अफ्रीका में मृत प्राय: है. हमारे देश में भी सदियों से रंगभेद जारी है. हम मानते नहीं हैं मगर प्रैक्टिस करते हैं क्यों कि हम विश्व में हिपोक्रेट नम्बर वन हैं. अन्यथा आप ही बताईये जहाँ चूहों का मंदिर हो, सांप की पूजा होती हो, बिल्ली मौसी हो, बंदर मामा हो, गाय माता हो और मोर से छेड़छाड़ राष्ट्रीय अपराध हो वहां भैंस को ना कोई पदवी-उपाधि ना कोई मंदिर चौबारा. क्या सिर्फ इसलिये कि वह काली है. वह कब से आपकी इस रंगभेद नीति का शिकार है मगर फिर भी चुपचाप आपको दूध दिये चली आ रही है. आप उसे इंजेक्शन लगा लगा कर उसके दूध की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेते हैं. उसे गंदगी में रखते हैं. रूखा-सूखा खाने को देते हैं और नहीं तो वह पॉलीथिन बैग ही खाती फिरती है.
किसी समाज की भाषा व साहित्य उस समाज का दर्पण होता है. हिंदी भाषा तथा लोक साहित्य में जो मुहावरे व लोकोक्तियां हैं वह भी भैंस के साथ पक्षपात करती हैं. न्याय नहीं करतीं.

जिसकी लाठी उसकी भैंस : अरे भई अब लठियों का ज़माना नही रहा. किस सदी में जी रहे हैं आप. अब तो टाइम है मानव बम का, ए.के. 47 का. लाठी तो अब केवल कुत्ते-बिल्ली को डराने-धमकाने के काम आती है. यह कहावत भैंस के साथ अन्याय है और उसे ‘पूअर लाइट’ में रखता है. नवीन मुहावरा होना चाहिये ‘जिसकी ए.के.47 उसका इंडिया 1947’ आप अपने दिल पे हाथ रख कर बताइये क्या यह अधिक प्रासंगिक नहीं .

भैंस के आगे बीन बजाना : दूसरा मुहावरा है, यह भैंस का सरासर अपमान है. षड्यंत्र यह है कि कैसे भैंस को अन्य तथाकथित अभिजात्य पशु-पक्षियों से नीचे दिखाया जाये. आप साबित क्या करना चाहते हैं कि भैंस संगीत प्रेमी नही है. ललित कलाओं का उसे कोई ज्ञान नहीं है. वह फूहड़ है. बच्चू याद कीजिये उसी का दूध पी-पी कर आप इतने बढे हुए हैं.

यह रीति पुरानी है जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो. आज भी नव माताएं भैंस का ही सहारा लेती हैं ताकि उनकी ‘फिगर’ बनी रहे. भैंस का क्या ? वह तो ‘डिस फिगर है ही और यदि भैंस के आगे बीन बजा बजा कर आपको वाह-वाही नहीं मिली तो जाईये किसी और के आगे बजाईये और लिख दीजिये उसका नाम आखिर भैंस ने आपसे कहा नही कि “ हे बीनवादक ! अपनी बीन सुनाओ” वैसे भी आज आपकी बीन सुनता ही कौन है. रेडियो, टी.वी वाले भी रात को साढे‌ ग्यारह बजे से पहले का टाइम नहीं देते ताकि तब तक सब सो जायें.

काला अक्षर भैंस बराबर : भई ये तो हद ही हो गयी यानी कि भैंस अनपढ‌ है. पहले तो आप उसे पढ़ने लिखने ना भेजें , उसे बाहर किसी से मेल-जोड‌ बढाने ना दें जो कि उसका ज्ञान-ध्यान बढे. फिर आप उसे जाहिल गंवार कहें. वैसे भी आप बताईये और किस जानवर ने कितने डिग्री डिप्लोमा पास कर लिये जो बेचारी भैंस के पीछे पड़े हैं. आप भूल रहे हैं कि भैंस तो भैंस भारत में मनुष्यों का कितना प्रतिशत साक्षर है. फिर भैंस के साथ ही यह बे-इंसाफी क्यों ? है कोई जवाब आपके पास. एक तो आपको दूध दे, ऊपर से आपके टौंट भी सुने. भैंस दूध देना बंद कर दे तो बच्चू सब सिट्टीपिट्टी गुम हो जायेगी. बताईये फिर आप किस बी.ए. पास जानवर का दूध पीना चाहेंगे ? शेरनी का ? जो आपको बाल्टी समेत खा जायेगी.

हो ना हो ये कोई ‘हाई लेवल’ का ‘प्लाट’ है अन्यथा आप ही सोचिये कि भैंसा जो कि यमराज की सवारी है वह चाहता तो किस की मजाल है जो भैंस को टेढी आंख से भी देखे. किसी दिन जब यमराज मूड में होते धीरे से कह देता कि “सर वाइफ को थोडा प्राब्लम है” मगर नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ. पता नहीं यह क्या चक्कर है. जिसका हसबैंड इतनी ‘एप्रोच’ वाला हो उसकी मिसेज को ये दिन देखने पडें. कभी मुझे लगता है यह कहीं डाइवोर्स या सैपरेशन का मामला ना हो. भैंस भी स्वाभिमानी है उसने ‘मेंटीनेंस’ लेने से इंकार कर दिया हो “ जा हरज़ाई मैंने तुझे हमेशा हमेशा के लिये भुला दिया”

भैंस को इतना ‘नेगलेक्ट’ कर रखा है कि कोई चुनाव चिन्ह के तौर पर भी भैंस चुनाव चिन्ह नहीं रखता. क्यों ? गाय, बैल, बछडा, हाथी, घोडा यहां तक कि गधा भी चुनाव चिन्ह है. तो महाराज आप ‘कनविंस’ हुए कि नहीं कि भैंस के साथ सदियों से दुर्व्यवहार हो रहा है. समाज में उसे उचित स्थान दिलाने के लिये उठ खड़े होइये.



"हर जोर ज़ुल्म की टक्कर में


इन्साफ हमारा नारा है"



अब वक़्त आ गया है कि भैंस को उसका ड्यू दिलाया जाये. सर्वप्रथम तो उसे भाभी, चाची, ताई, दीदी या जो भी अन्य आदर सूचक रिश्ता उससे नवाजा जाये. मेरी गुहार है ‘एनीमल सोसायटी’ वालों से कि इस ज्वलंत विषय पर तुरंत ध्यान दिया जाये. यह काम इलैक्शन से पहले ही निपटा लिया जाये नहीं तो इलैक्शन कोड के चलते आप बंध जायेंगे. मैं नहीं चाहता कि इस सेंसिटिव विषय को और विवादास्पद बनाया जाये. पहले ही क्या विवादों की कमी है. क्यों कि बात नहीं बनी तो फिर आप लोग ही कहेंगे कि गई भैंस पानी में.














Sunday, November 20, 2011

व्यंग्य: कस्बे के नेता की बरसी

हमारे कस्बे के नेता पिछले बरस किसी रहस्यमय बीमारी से चल बसे थे. कुछ लोग बताते हैं कि वे मुम्बई गये थे वहां बलबीर पाशा के विज्ञापन से वे बहुत प्रभावित हुए. खोजी तबियत के थे अत: विज्ञापन की तह में चले गये और पूरी जानकारी फर्स्ट हेंड ले कर ही लौटे थे. आते ही खाट पकड़ ली. खाट ऐसी पकडी‌ कि छोडी तो दुनियां ही छोड़ दी. कस्बे का और नेता का नाम बदनाम ना हो अत: बात दबा गयी. आज इन्हीं का जलसा है. पहले इनके प्रतिद्वंदी रहे एक नेता बोलने उठे. वे सूखाग्रस्त क्षेत्र की गाय से मरियल थे मगर वाणी में ओज़ था. वो चीखे “ बहुत ही काबिल इंसान थे राम खिलावन मेरे तो उनसे सन सैंतालीस से मधुर सम्बंध थे” किसी ने पीछे से कहा आप तो यूथ कांग्रेस के जलसे में पिछले माह अपनी आयु उनतीस बरस बता रहे थे, फिर सन सैंतालीस से मधुर सम्बंध कैसे हो गये. उन्होने तुरंत बात सम्भाली ये दिल की बातें हैं हमें वो बहुत मानते थे. आप सन सैंतालीस की बात कर रहे हैं ... भैया राम खिलावन तो हमसे अक्सर कहते थे “ किसन सरूप हमारा-तुम्हारा पिछले जनम का रिश्ता है. हम तो दो प्रान एक तन.. नहीं नहीं दो तन एक प्रान थे.” पिछले चुनाव में जब उनकी जमानत जब्त हुई रही तो रोते हुए बोले थे किसना मैं हार गया इस सामंती व्यवस्था से. इस भूमंडलीकरण से. जमानत के पैसे तुमसे ही लिये थे बोलो कब दें. हम कहे “ दद्दा ! हमारे और आपके पैसे में कोनी फरक है क्या. आज कही सो कही. अब कभी हम दोनो के बीच पैसे की बात नहीं आनी चाहिये. वो बात के धनी निकले. मरते दम तक ना उन्होने जमानत के पैसे दिये ना दुबारा बात ही छेड़ी.
पिछले साल मेले में नासिक गये रहे. हमें देवलाली छोड़ वे मुम्बई घूमने गये. सुने रहे कि मुम्बई में किसी लाली-डाली के पास पार्टी और अपने हाथ मजबूत करने वास्ते डिस्कस को गयले रहे. लौटे तो खून की कै करते. मैं तो कहता हूं ये लाली-डाली कोई विपक्ष की एजेंट रही होगी. हम चाहते हैं कि रामखिलावन जी की असामयिक मौत की सी.बी.आई. से जांच कराई जाये. सरकार हमारी सुन ही नहीं रही है. बैंक घोटाले, शेयर घोटाले के चलते टाले जा रही है . यदि आप चाहते हो कि बाबू राम खिलावन की मौत की निष्पक्ष जांच हो उर दोसियों को सज़ा मिले तो भाईयो और बहनों अगले चुनाव में हमें दिल्ली भेजिये.हम दिल्ली की ईंट से ईंट बजा देंगे. सरकार सीतापुर की जनता के अबला ना समझे. सीता मैया ज़मीन में समा गयी होंगी. हम तो सरकार हो या विपक्ष ससुर की टांग पर टांग रख कर चीर देंगे. ( अभी टिकट तय नहीं है कि कौन सी पार्टी देगी ) ये जो आतंकवादी ससुरे संसद में घुसे रहे हम वहां रहे होते तो कोनी घुस पाते ? बताईये ? आप ही बताईये ? सभी बोले “ नहीं ...कतई नहीं “ ऐसे नहीं आप सब लोग अपने अपने हाथ उठा कर कहिये राम खिलावन जी की मौत की सच्चाई उजागर करने हमें.... आपके अपने किसन सरूप को मिट्टी पकड़ को जरूर ही जितायेंगे. आप जान लीजिये कि आज देस पर कितना बडा संकट मंडरा रहा है. आप क्या सोचते हो ? ये लोग हमारे हिरन-चीतल मार रहे हैं. हम चुप रहे . पेड़ काटे रहे, हम खामोश रहे. नदियों का पानी बोतलों मे बेचे रहे हम कुछ नहीं बोले पर अब पानी सर के ऊपर हो गया है. आप समझते हो कि अमरीका ईराक के बाद चुप बैठेगा. नहीं. इतिहास गवाह है देस पर सभी हमलावर क्या मुहम्मद गौरी, क्या सिकन्दर, क्या ये आतंकवादी सभी एक ही रास्ते से अंदर आये रहे. हमें ये रास्ता बंद करना है. अगर आप चाहते हो हमार धरती मैय्या पर ये अमरीका वाले नहीं आयें तो हमें वोट दें. आप भूल गये क्या ? अभी 40 बरस पहले अमरीका सातवां बेडा भेजा रहा तो हम ही ना सिस्ट्मंडल ले के दिल्ली गये थे. बाद में ये मंडल बहुत लोकप्रिय हुए रहे और देस के यूथ को नयी दिसा दिये रहे

तो भाईयो ! अगर आप चाहते हो कि आपके भाई-भतीजा, साला-साली, छोरा-छोरी पढे-लिखें, सरकारी नौकरी पायें...बड़ा बड़ा कुर्सी पर बैठें... ऊंच-ऊंचा ओहदा पायें तो हमें आपके अपने मिट्टी पकड़ को अपना कीमती वोट दें. हमें राम खिलावन जी की मौत का बदला लेना है.

जब तक सूरज चांद रहेगा....राम खिलावन तेरा नाम रहेगा......राम खिलावन अमर रहें...देस के नेता किसन सुरुप.... किसन सुरुप तुम संघर्ष करो... हम तुम्हारे साथ हैं...किसन सुरुप ज़िंदाबाद.










Saturday, November 19, 2011

व्यंग्य: खुला पत्र वीरप्पन के नाम



( यह पत्र  तब लिखा था जब वीरू भैया ने सबकी खाट खड़ी कर रखी थी )





आदरणीय वीरु भैया

सादर प्रणाम

जब से आपके चर्चे हर अखबार और हर न्यूज चैनल पर आने लगे हैं, हमें सच मानिये, बहुत ‘खुशी’ हो गयी है, हमारा दिल गार्डन—गार्डन ... नहीं ..जंगल ..जंगल हो गया है और चंदन की तरह महक रहा है. हमारे वीरु भैया ने आखिर ‘सम्भव’को ‘असम्भव’ कर दिखाया है. ‘ कर्नाटक’ वाले नाटक कर रहे हैं आपको पकड़ने का. मगर आप उनके हत्थे नहीं चढ़ रहे हैं बिल्कुल राबिन हूड की तरह. आपकी लीला नगरी कुंज वन है. कन्हैया की लीला नगरी भी कुंज वन ही थी. ना कन्हैया की लीला जनसाधारण की समझ में घुसी ना आपकी घुस पा रही है. बडे‌ लोगों की बातें, बडे लोग ही जानें. आज तक कृष्ण कथा सुना सुना कर लोगों को समझाने का प्रयास जारी है. वैसे ही आने वाली पीढि‌यां आपका गुण बखान करेंगी. बस एक ही अंतर है कन्हैया ने कुंज वनों में बंसी बजाई थी आप बांस ( चंदन ) काट रहे हैं और कर्नाटक की खाट खडी- किये हैं.

इधर तमिलनाडु में भी आपको पकडने के प्रयासों का जोर शोर से प्रचार किया जा रहा है. आप तनिक भी विचलित ना होना. ये आप तक हरगिज़ नहीं पहुंच पायेंगे. आपकी मूंछ का एक बाल भी बांका ना होगा. ऐसी मूंछें मुझे तो याद नहीं पड़ता. भारत क्या विश्व इतिहास में किसी दूसरे महापुरुष की रही हों. आप तो मूंछों के बल पर ही गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में आ जायेंगे. जितना पुलिस, अमला और गोला बारूद इन्होने आपको पकड़ने में वेस्ट किया है उतने से तो कर्नाटक के गांव-गांव, वन-वन में बिजली पहुंचाई जा सकती थी.

मुझे लगता है कि आपने बिल्ली-चूहे की रोटी वाली कहानी जो बचपन में हम सब सुनते हैं और मर्म जाने बिना भूल जाते हैं को अच्छी तरह आत्मसात कर लिया है. तभी तो तमिलनाडु और कर्नाटक की आपस की लडाई में आप खूब रोटियां तोड़ रहे हैं. कई बार मुझे लगता है कि आजकल के भूमंडलीकरण के टाइम पर आपको अपना एक वीरप्पन ब्रांड पेटेंट करा लेना चाहिये जैसे वीरप्पन ब्रांड दूरबीन, वीरप्पन ब्रांड मूंछें, वीरू राइफल, वीरु केसेट, वीरु घड़ी, वीरू टेप रिकार्डर, वीरू विस्की,मुझे पता नहीं आप शौक करते हैं या नहीं मगर इस से क्या ? हमारे स्टार लोग कितने ऐसे तेल, साबुन की माडलिंग करते फिरते हैं.

अब वक़्त आ गया है कि आप खुलकर सामने आ जायें. पहले तो एक खादी का धोती-कुरता बनवा लें. धोती-कुरता ना सही तो कुरता पाजामा तो कम्पल्सरी है. ये नंगे बदन माडलिंग तो चल सकती है, नेतागिरी नहीं चलेगी. वैसे भी अब ये गांधी का भारत तो रहा नहीं. इससे याद आया आप कोई मच्छर भगाने वाली क्रीम का एड भी कर सकते हैं. इन अभागों ने आपका कोई ‘फुल लेंथ’ फोटो नहीं लिया है. जिससे पता चलता कि आप किस कम्पनी के ब्रीफ, पतलून, मोजे, जूते पहनते हैं. आपका मनपसंद मोबाइल कौन सा है. किस ‘मेक’ की बाइक आप इस्तेमाल करते हैं. आप कौन सा मिनरल वाटर पीते हैं. आपकी पसंद कौन फूड है—इटैलियन, थाई, या चाइनीज और कौन सा रेस्टोरेंट आपका ‘फेवरिट’ है. आप झटपट अपना एक पोर्टफोलियो बनवा लें और एक अच्छा सा मैंनेजर-कम-सेक्रेटरी-कम- मार्किटिंग एक्ज्युकिटिव नियुक्त कर लें. जो आपकी नेट वर्थ बतायेगा. और आपको इंटरनेशनल बनवा देगा.

आपने फिर क्या सोचा है. राजनीति में कदम रखेंगे या फिल्मों में ? दोनो जगहों की ज़रूरतें एक सी हैं. दोनों में अंतर बहुत कम है. देखो जी जब तो फिल्मों में आना हो वीरू नाम बहुत माकूल है . एक्टर, डाइरेक्टर, प्रोडुसर, राइटर, विलैन.... आल इन वन ...वीरू पेश करते हैं वीरप्पन इंटरनेशनल का ‘ चंदन का तस्कर’, ‘जंगल में चंदन’ ‘चंदन मेरी बाहों में’ ‘ हाथी का हत्यारा कौन ?’ ‘ दो आंखें बारह दांत’ मुझे यक़ीन है कि ये फिल्में बाक्स ऑफिस पर बाकी सब फिल्मों को पीछे छोड- देंगी.

और जब पॉलिटिक्स में आना हो तो आप आकर तो देखो... छा जाओगे..छा. आप देखोगे यहाँ तो पेड़ काटने की ज़रूरत ही नहीं बल्कि पेड़ लगाने के प्रोजेक्टों में ही आप चांदी काटने लगोगे.

मैं तो कल्पना कर रहा हूँ माननीय वीरप्पन जी वन मंत्री . फिर देखना जो वनों की ओर कोई टेढी- आंख से भी देख सके. जो वनों की देखभाल ठीक से ना करे या उन्हें नुकसान पहुंचाये उसी आदमी के दांत निकलवा लिये जायें. आपको तो तज़ुर्बा भी है. फिर देखना वन-वन आपका ही नाम गूंजेगा. ऐसा वन मंत्री... ना भूतो... ना भविष्यति. आपके आगे कोई जंगल में छिपने की हिमाकत नहीं कर सकता. आप फौरन उसे ऐसे पकड‌ लेंगे जैसे बच्चे आपस में आइस-पाइस के खेल में एक-दूसरे को पकड़ लेते हैं. बढा मज़ा आयेगा. आपका कैबिनेट रेंक तो पक्का है. वन मंत्री ...अतिरिक्त भार पशु कल्याण. थोडे‌ लिखे को बहुत समझना और इस सेवक को डेपुटेशन पर लेना ना भूलना.



आपका शुभचिंतक



पुनश्च: रिवाज़ के मुताबिक मैं इस पत्र की एक प्रति प्रेस को भी लीक कर रहा हूँ. प्लीज माइंड मत करना.