भारत में टीचर और भूसे का संबंध प्राचीन काल
से रहा है। टीचर को जब भी किसी स्टूडेंट को डांट-डपट करनी होती या उस पर खीज
उतारनी होती तो वह कहता है “तुम्हारे सिर में क्या भूसा भरा है?”
“दिमाग है ही नहीं भूसा भरा है” कहते हैं कई बार ज़ुबान पर सरस्वती
विराजमान रहती है। अतः ऐसे ही किसी क्षण टीचर की सुनवाई हो गयी या समझो इन तानों
से दुखी किसी विद्यार्थी की सुनवाई हो गई। सुना है शासन ने आदेश निकाला है कि टीचर
अब गाय-बैल के लिए भूसा इकठ्ठा करेंगे।
यूं देखा जाये तो यह स्वागत योग्य कदम है।
टीचर लोग खासकर सरकारी स्कूल के, अव्वल तो स्कूल आते
नहीं आते हैं तो पढ़ाते नहीं। और बहुत काम करने होते हैं उन्हे, प्रिंसिपल की बुराई बोले तो निंदा। अपने सह-कर्मियों की लगाई-बुझाई,
ट्यूशन की जुगाड़। लेडी टीचर की ‘गुड बुक्स’ में आना होता है। बच्चों
से अब किस फंड के नाम से पैसे ऐंठे जाएँ यह तमाम योजनाएँ दिमाग में चलती रहती हैं।
पीछे कुत्ते गिनने का काम भी उन्ही को सौंपा गया था। जनगणना, वोटर लिस्ट, चुनाव ड्यूटी, टीकाकरण
आदि न जाने ऐसे कितने ही काम मेरे भारत महान के महान टीचर ही करते आए हैं। इससे
पता चलता है कि वे कितने प्रतिभाशाली हैं और ‘इंडिस्पेंसेबल’ हैं। टीचर नहीं होते
तो इस देश का क्या ही होता? यही सोच कर भूसा इकट्ठा करने का
महत्ती राष्ट्रीय कार्य इनके कर-कमलों से कराने का निर्णय लिया गया है।
वैसे देखा जाये तो जिस गति से सरकारी स्कूल
बंद हो रहे हैं और बच्चे बजाय स्कूल के अन्य राष्ट्रीय पर्वों से ज्यादा सीख रहे
हैं बोले तो लाइफ में जल्दी ही ‘हेण्ड्स-ऑन’ ले रहे हैं तो स्कूल की ज़रूरत ही कहाँ
रह जाती है। हमारे संत महात्मा तो बहुत पहले ही कह गए हैं:
ढाई आखर
प्रेम का पढे सो पंडित होय
अब
ये प्रेम का पाठ गाय-बैल से अधिक कौन समझा सकता है। मुंशी प्रेमचंद की ‘दो बैलों
की कथा’ पढ़ कर देखिये। आए दिन गाय के वात्सल्य और बैल की मेहनत के किस्से आम होते
रहते हैं। फिर टीचर को क्या ग़म है। उन्हें तो उल्टे खुश होना चाहिए कि गऊ माता की
सेवा का पुनीत अवसर उन्हें मिला है। वे यह भूल जाते हैं कि उनकी बी.एड. में, बी.टी. में ‘बी’ जो है सो भूसे के लिए ही है। रही बात एम.एड. और पी.जी.टी.
की तो मास्स साब ! ये समझ लो और गांठ बांध लो कि ‘एम’ से मवेशी और पी.जी.टी. में
जो ‘जी’ है वह गाय ही है। हां भूसे के बदले में आप चाहें तो दूध/गोबर में से कुछ
गुरु-दक्षिणा की आशा रख सकते हैं।
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