Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Wednesday, July 1, 2026

व्यंग्य: दिल्ली-आई

 

 जिन्हें नहीं पता उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि लंदन में एक बहुत बड़ा, विशाल ऊंचा चरखी वाला झूला है जिसे लंदन-आई (यानि लंदन की आँख) कहा जाता है। लोगों का यह मानना है कि इस झूले पर चढ़ने के बाद पूरा का पूरा लंदन दिखता है। ये चरखड़ी वाले झूले मेलों में खूब लोकप्रिय रहते हैं खासकर बच्चों में। अंग्रेजी में शायद इसे व्हील या जायंट व्हील कहते हैं। पर जो बात चरखी वाला झूला या लंदन-आई कहने में है वह व्हील में नहीं। अब देखिये ना ये झूला लंदन देखने आने वाले पर्यटकों में खूब  लोकप्रिय है। टूरिस्ट गाइड आपको वहाँ ज़रूर ले जाता है। वैसे ही जैसे ताजमहल दिखाने वाले गाइड या रिक्शा वाले आपको एम्पोरियम दिखाने ले जाते हैं। या जिन रेस्तरां वालों से पहले से बात हो रखी होती है वे आपको उसी रेस्तरां में चाय-पानी अथवा लंच आदि को ले जाते हैं। किसी ने हाल ही में मुझे बताया कि कुछ ढाबे वाले यार दोस्तों से कह कर अपनी दो-चार कारें वहाँ ढाबे के बाहर पार्क करवा लेते हैं ताकि ढाबा चलता हुआ और लोकप्रिय जैसा लगे।

 

यह लंदन-आई जो है सो सन् 1999 से लगा हुआ है। इस

 झूले की टिकट 29 पाउंड (3650/-) है यदि ऑन लाइन

 करायें यदि काउंटर से लेंगे तो 39 पाउंड (4907/-) है  यह

135 मीटर ऊंचा है और इसमें एक बार में 800 लोग बैठ

 सकते हैं। एक राउंड 30 मिनट का होता है। ज़ाहिर है इस

 झूले के सभी कल-पुर्जे बैस्ट क्वालिटी के खरीदे गए होंगे

 ठोक-बजा कर। जब बात क्वालिटी की आती है तो पैसों से

 कोई समझौता नहीं। वे जाने-अनजाने कैसे भी आदमी की

 जान खतरे में नहीं डाल सकते। आखिर नेशनल प्राइड भी

 कोई चीज़ है। वे नहीं देख सकते कि ब्रिटेन या लंदन की नाक

 नीची हो। टिकट चाहे जितने की हो मगर सेफ़्टी से कोई

 सम्झौता नहीं। सेफ़्टी फर्स्ट। वहाँ से पर्यटक लंदन के मनोरम

 आकाश, कल-कल बहती साफ सफ्फाक थेम्स नदी, दूर दूर

 तलक फैली हरियाली और हेरिटेज बिल्डिंग्स को देख कर

 एंजॉय करते हैं। लंदनवाले खुद कहते हैं जैसे पेरिस के लिये

  एफिल टाॅवर है उसी तरह लंदन-आई उनके लिये है।

 

सरकार ने घोषणा की है कि ऐसा ही एक झूला दिल्ली में लगाया जाये। जगह भी चुन ली गयी है - मयूर विहार। सुन कर पर्यटकों या तफरीह करने वालों के मन में तो बाद में लड्डू फूटेंगे सब से पहले तो जिस विभाग को ये काम सौंपा गया है उसके अफ़सरान, डीलिंग बाबू और ठेकेदार आदि का मन-मयूर नाच उठा है। सब के सब की 'आई' अब इस दिल्ली-आई की डील पर है। इसका ठेका किसको मिलेगा ? कितने का ठेका खुलेगा? कितना कुछ हिसाब-किताब हो जाएगा आदि आदि। अब या तो सरकार सीधा-सीधा उसी को ठेका दे दें जिसने  लंदन-आई बनाया है अन्यथा हमारे यहाँ तो कोई मेला ऐसा नहीं जाता जिसमें झूला टूटता नहीं हो। आदमी मरते नहीं हों। हमारे यहाँ रोप-वे टूट जाते हैं। ट्रॉली बीच आकाश में लटक जाती है, रस्सी टूट जाती है, बन्जी जम्पिंग के केबल टूट जाते हैं। पैरा ग्लाइडिंग क्रैश लेंड कर जाती है। लाइफ सेविंग जैकेट चमकती खूब है बस 'लाइफ' ही नहीं बचा पाती। हमारे यहाँ आप किसी को एल-1 पर सलेक्ट करें या ना करें उसने मैटीरियल सबसे 'लोएस्ट क्वालिटी' का लगाना है। हमारे यहाँ जुगाड़ इज दि नेम ऑफ दि गेम। आप तो इसका नाम "आई ऑफ जुगाड़" रख दो, मैं अभी से बता रहा हूँ। दूसरे लंदन में तो आदमी झूले पर बैठ कर लंदन की शानदार इमारतें और नीला आकाश तथा हरियाली देखता है और अपना पैसा वसूल समझता है। मयूर विहार में ये  दिल्ली-आई लगा कर आप टूरिस्ट को क्या दिखाना चाहते हैं ? विकास के नाम पर काटे गये पेड़ ? स्लम और अनाधिकृत बस्तियाँ ? आड़ी-तिरछी कॉलोनियाँ, गंदे नाले, सूखती हुई मैली जमुना या फिर हमारी अपनी क्वालालंपुर सरीखी पैट्रोनस ट्विन टाॅवर्स ? नहीं समझे ? अरे भई !  गाजीपुर में कूढ़े के दो जुड़वां पहाड़ ?

 

 

No comments:

Post a Comment