Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Monday, June 16, 2025

व्यंग्य: जज को जज

 

 

            हम सुनते हैं राजा - महाराजाओं के ज़माने में कैसे शहर मुंसिफ़, शहर क़ाज़ी, शहर कोतवाल और अदालत अमीरों के हित में और मज़लूमों के खिलाफ काम करती थी। ये रसूख, ये पैसा, ये नज़र, ये दस्तूरी, ये उपहार, ये भेंट, ये बच्चों के लिए मिठाई इत्यादि आदि काल से चले आ रहे हैं। ‘पहला सुख निरोगी काया...’ वाले दोहे में भी एक सुख ‘राज में हो पासा’ बताया गया है। सुधिजन के लिए ये दोहा इस लेख के अंत में पूरा दिया जा रहा है।

 

           अब आप देखिये कैसे हमें ये यकीन दिलाया जाता है कि हम आपके लिए पूर्णतः निष्पक्ष न्याय व्यवस्था लेकर आए हैं। इन लोगों ने सांसारिक सुखों से मुंह मोड़ लिया है, कोई वास्ता नहीं है। ये सब पहुंचे हुए लोग हैं इनका ‘सेल्फ एक्चुलाइज़ेशन’ हो चुका है। इनके लिए धन धुलि समान हो गया है। अब आप समझ गए होंगे कि एक जज साब के आउट हाउस में यही तो हो रहा था धन को धूलि/राख़ में बदला जा रहा था। समस्त मानवता इनकी अपनी हैं अथवा इनकी नहीं है। अतः ये बेस्ट फैसले सुनाएँगे। आपको यकीन नहीं अथवा आप संतुष्ट नहीं तो आप ऊपर की अदालत में जा सकते हैं। ऐसा करते-करते आदमी वाकई ऊपर चला जाता है। अब पता नहीं उस ऊपर की अदालत का निज़ाम कैसा चलता है। किसी ने कभी विस्तार से बताया नहीं या कहिए कोई बताने को लौटा ही नहीं।

 

         सोचने वाली बात ये है कि लेटेस्ट पता चला है कि एक अर्दली महोदय कोर्ट के भीतर ही अपनी बेल्ट में क्यू. आर. कोड खोंसे विचरण कर रहे थे। अब वो कोई केले, संतरे खरीदने को अथवा जागरण के लिये चन्दा तो इकट्ठा कर नहीं रहे थे। पर यह एक बानगी है, झांकी है। देखो हम कितनी बड़ी डिजिटल क्रांति के चश्मदीद गवाह हैं । क्या चाय की टपरी वाले, क्या चाट-पकोड़े वाले, क्या भिखारी बंधु सब आजकल अपना-अपना क्यू . आर. कोड लिए हैं। इंप्रेस होने की बात ही है। इसी की क्लाइमेक्स है ये अर्दली महोदय का कोर्ट में यूं खुल्लमखुल्ला  क्यू. आर. कोड बेल्ट में खोंसे घूमना।

 

 

     कबिरा घूमें कोर्ट में लिये क्यू आर कोड लटकाय

     जो पहले पे.टी.एम. करे सो विजयी हो आय

 

 

       हम हिन्दुस्तानी शायद टेम्परामेंट से जुगाड़ू लोग होते हैं। कहीं लंबी क्यू देखी जुगाड़ खोजने लग जाते हैं। ड्राइविंग लाइसेन्स हो, स्कूल में दाखिला हो, पासपोर्ट हो, नौकरी हो, नौकरी की परीक्षा हो, पेपर लीक का केस हो या फिर इंटरव्यू का, हमारी पहली प्राथमिकता होती है, जुगाड़ देखो, जुगाड़ ढूंढो। किसी का चाचा, मामा, दोस्त, अंकल, सगे वाला, जात वाला ज़रूर ही विभाग में निकल आएगा। सूत्र मिलते ही क्या विजयी भाव आता है मन में, देखते ही बनता है। 

 

 

     पहला सुख निरोगी काया दूजा सुख घर में हो माया

     तीजा सुख सुत आज्ञाकारी, चौथा सुख वचन में नारी

     पांचवा सुख भाईयों में वासा, छठा सुख राज में पासा

 

        जुगाड़-मेव जयते!

Friday, June 13, 2025

व्यंग्य: जिम वाली बहू

 

            जब हम अपने बेटे के लिये लड़की देखने गए तो हमें बताया गया कि उनकी "बेटी जिम की शौकीन है" हमने सोचा आजकल सब फिजिकल फिटनेस को लेकर सचेत हैं, हमारी होने वाली बहू भी अगर फिटनेस के प्रति रुचि रखती है, ये तो अच्छी बात है। हमने रिश्ते के लिये हाँ कर दी सोचा इस बहाने हमारे साहबजादे के पिज़ा/मोमोज और लेट नाइट्स पर कुछ लगाम लगेगी। दिन बीतते क्या टाइम लगता है। शादी हो गई। 


एक तो होता है जिम का शौकीन होना। दूसरा होता है बिला नागा दिन में दो बार जिम जाना, तीसरा होता है जिम में ट्रेनर होना चौथा और फाइनल सोपान  होता है जिम घर में ले आना। बस तो हमारी बहू  ये सभी थी, बोले तो 'फोर-इन-वन'। वह अपने साथ डम्बल, ट्रैड मिल, बैंच प्रैस, अज़ब-गजब गेजेट्स लाई। अपने कमरे को उसने जिम बना लिया। कहीं से कुछ लटक रहा था, कहीं से कुछ और। तरह तरह के वज़न वाली गोल-गोल डिस्क थीं। कहीं साइकिल, कहीं पैडल वाली मशीन,कहीं लाल-नीली बड़ी बड़ी बाॅल, तो कहीं मैट। वो जब उसका मूड करता तब जिम में बिज़ी हो जाती। कभी स्क्वैट, कभी अपर बॉडी, कभी लोअर कभी कार्डियो। वो ऐसे ऐसे नाम लेती जो हमने कभी सुने ही नहीं थे। 


         उसने आते ही मेरी और पत्नी की क्लास ली। "आप लोग तो अपनी फिटनेस का बिल्कुल ख्याल नहीं रखते। ऐसे कैसे चलेगा ? आप का बी.एम.आर.  डांवाडोल है। आपको पता भी है ऑस्ट्रोपोरसिस हो जाएगा। आपने लास्ट टेस्ट कब कराया था ? आप कैल्शियम सप्लीमेंट लेते हैं या नहीं ? 


                     हम दोनों के लिए अगले सप्ताह ही ट्रैक सूट आ गए। महंगे वाले वाकिंग शूज आ गए। प्रोटीन सप्लीमेंट के डिब्बे के डिब्बे आ गए। हमारा एक एक्सरसाइज़ का टाइम-टेबल बहू ने बना दिया। सुबह-सुबह मुझ से तो उठा भी नहीं जाता। मगर वह पहले दिन ही इतने जोर से चिल्लाई कि मुझे लगा कोई आग-वाग लग गई है या घर में चोर घुस आया है। हम दोनों सकपका कर भागते-लुढ़कते नज़र आए। अगले दिन से ये हो गया कि मैं तो ट्रैक सूट पहन कर ही सोने लगा। इधर बेटे-बहू के कमरे से सुबह-सुबह खट-पट की आवाज आती इधर हम दोनों बदहवास से घर से निकल भागते। फिर भले कोई सी दिशा हो। कई बार तो हड़बड़ी में ऐसा हुआ कि पत्नी जी एक दिशा में तो मैं एकदम अपोजिट दिशा में चला जाता। स्पोर्ट्स शूज को पहन कर तो नहीं सो सकते थे मगर टाइम बचाने के लिए एकदम 'रेडी टू वियर' कंडीशन में रखते थे। बैड के नीचे, फीते खोल कर ताकि सुबह फीते खोलने-बंद करने में टाइम खोटी न हो। 


                कुछ-कुछ दिनों में बहू हमारा बी.पी. लेती। हम दोनों को 'स्मार्ट वाच' के नाम पर एक जासूसी रिस्ट वाच पहना दी गई थी। वो देखती आज हम कितने कदम चले। पाँच हज़ार से कम कदम होते तो वो ऐसे आँखें तरेर कर देखती कि हम हकलाने लगते।


                     जैसे तैसे ये एक्सरसाइज़ से तो निपटने के तौर-तरीके हम दोनों ने खोज लिए। पत्नी जी अपनी महिला समिति में चली जातीं, मैं अपने दोस्त-यारों के साथ गप लड़ाता। बहू के सौजन्य से अब तो मुझे ऐसे ऐसे टर्म याद हो गए थे कि मेरे यार-दोस्त मेरे नाॅलिज़ की दाद देने लग पड़े थे। उन्हें क्या पता था कि हमारी घर में क्या हालत है। ये सब हम अपनी खुशी से थोड़े कर रहे हैं। 


                 अब हमारी वेदना का, यातना का दूसरा पहलू शुरू हुआ। उसने हमारा 'डाइट-चार्ट' बना दिया। अब बना दिया तो बना दिया उसे डाइनिंग टेबल के साथ ही दीवाल पर चिपका भी दिया। वो चार्ट पढ़ने से मुझे तो चक्कर ही आने लग गए। आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। जीवन की निस्सारता यकायक समझ आने लग पड़ी। अब ये भी कोई ज़िंदगी है कि आप सलाद खाएँगे, फीका दलिया खाएँगे और स्प्राउट खाएँगे। लंच में सूप पीएंगे। आधी रोटी खाएँगे मिक्स्ड ग्रेन की, सलाद, टमाटर खाएँगे। एक कटोरी दाल पीएंगे। डिनर में तो और भी बुरी हालत थी। शायद तिहाड़ के क़ैदियों को बेहतर खाना मिलता होगा। कभी टिंडे, कभी लौकी, वही सूखी रोटी, बोले तो नो घी और मक्खन। चाय फीकी। नो अंडा। नो मिठाई, नमक कम। नो मैदा। नो पकौड़े।  वो कभी कहती "नो कार्ब्स फॉर यू" कभी कहती "नो फैट फॉर यू"। मैं सूखी रोटी खा-खा कर सूखता जा रहा था और वो कहती "वंडरफुल ! आपका वेट कोन्स्टेंट है"। वज़न तोलने की दो मशीन वो ले आई थी। एक अपने कमरे में और एक हमारे कमरे में रखवा दी गई थी। वो मशीन मुझे लगता जैसे मुझे मुंह चिढ़ा रही है। सिर्फ चाय ही नहीं मेरी ज़िंदगी ही फीकी-फीकी हो गई है।


 

Wednesday, June 11, 2025

व्यंग्य : कैसी हो डार्लिंग -- कोर्ट के आदेश


 

                               




 


 

       हमारे कोर्ट भी हमारे मनोरंजन में कोई कमी नहीं रखते। अतः ना केवल कार्यपालिका और विधानपालिका बल्कि न्यायपालिका भी हमें हँसाने का कोई अवसर नहीं छोड़ती। उन्हें भी पता है इस इंसान के साथ ना जाने क्या क्या चल रहा है। ये कितने भँवर जाम में है। खबर है कि एक दंपति जब अपने घरेलू झगड़े को लेकर अदालत पहुंचे तो पत्नी का कहना था कि यह अपने में ही मस्त रहता है। अपने में ही खोया रहता है। इसे मेरे कोई परवाह ही नहीं है। मुझसे बोलता नहीं है और जब बोलता है तो सिवाय दारु पी कर झगड़ने के और कुछ नहीं। वे एक दूसरे से इतने आजिज़ आ चुके थे कि तलाक चाहते थे। फुल फुल घरेलू हिंसा का मामला था।

 

     अब जितनी चट-पट शादी होती है उसी स्पीड से तलाक सुलभ हो गया है। नहीं तो दोनों पार्टनर किसी भी सीमा तक जाने को तत्पर दिखाई देते हैं। जब तक निभ रही है वैल एंड गुड नहीं तो कहीं नीला ड्रम-सीमेंट है तो कहीं शिलांग की खाई। जज महोदय ने युक्ति से और समझदारी से काम लेते हुए सिर्फ यह आदेश दिया है कि पति रोजाना ऑफिस से आने के बाद पत्नी से ये तीन शब्द बिला नागा बोलेगा, ज़ोर से बोलेगा, “कैसी हो डार्लिंग ?” अपना ऑफिस का बैग, टिफिन बॉक्स आदि बाद में रखेगा। जूते बाद में उतारेगा। पहले यह मंत्र बोलेगा। कपड़े बाद में चेंज करेगा। पहले यह बोलेगा। सभी को उम्मीद है कि कुछ पता नहीं यह बोलते बोलते ही इनकी शादी सफल हो जाये। वो किसी डाकू की कहानी है न कि वो कैसे लगातार मरा मरा बोलते बोलते राम राम का जाप करने लगा और मुक्ति पा गया। अतः पति जब रोज़ रोज़ शाम को कैसी हो डार्लिंग ? कैसी हो डार्लिंग ? मंत्र का जाप करेगा तो एक न एक दिन सब ठीक हो जाएगा।

 

          अब कैसी हो डार्लिंग बोलने के भी अंदाज़ हुआ करते हैं। ये नहीं कि आप लाल लाल आँखें दिखाते हुए, क्रोध में नथुने फुला कर लगभग चीखते हुए कहें जैसे कि कोई गाली दे रहे हों। ना ही बस मुंह में बुदबुदाना भर है ! भैया कोर्ट के आदेश हैं । एकदम लाउड एंड क्लियर बोलना है जीभ में समुचित मिठास के साथ बोलना है। सबको सुनाई दे ऐसे बोलना है। आखिर बीवी का भी तो एक सर्कल है, वो अपनी सहेलियों के साथ बैठी है या फर्ज़ करो किट्टी पार्टी में है, तो भी बोलना है। सबको सुनाते हुए बोलना है। कहीं ऐसा ना हो कल को यही लेडिस गवाही दे दें कि ये 'कैसी हो डार्लिंग' बोलता हीच नहीं है।

 

       कहीं अगली पेशी पर 'मी लॉर्ड'  कुछ और लॉन्ग सेंटेन्स ( लंबा वाक्य ) ना दे दें। अतः कैसी हो डार्लिंग ? कैसी हो डार्लिंग ? का जाप करते रहें। ये आपका एक तरह का बीज मंत्र है।

 

            आपका पर्सनल 'जय माता दी' मंत्र।                      

व्यंग्य : अमृत काल है भइये !


 

    

     क्या आबादी बढ़ जाती है तो यह प्रकृति कराती है या कि यह 'मैन-मेड' हादसे हैं  जिनमें बेहिसाब जान जातीं हैं और कोई श्रेय लेने को तैयार नहीं  होता है।  ना कोई जांच, ना कोई पोस्ट-माॅर्टम, ना कोई भविष्य के लिए एहतियात। आप नज़र दौड़ाइए तो आप देखेंगे बेचारे लोग इस अमृत काल में कहीं भी, कैसे भी मर रहे हैं। शायद साइत ही ऐसा निकला हुआ है कि जो भी इस अमृत काल में मरेगा वह डाइरेक्ट स्वर्ग में जाएगा। एक दम टोल फ्री। समझो !  उसके माथे पर 'फास्ट टैग' लग गया है।

 

    लोग 'लोकल' से गिरकर मर रहे हैं। लोग झूले से, पुल से, यहाँ तक कि घर में बैठे-बैठे या फिर शादी में नाचते-नाचते अथवा जिम में कसरत करते- करते स्वर्गारोहण कर रहे हैं। यह सुविधा, विशेषत: अपने नागरिकों के लिए अमृत काल में लाई गई है। एक बार यह अमृत काल खत्म समझो ये ऑफर भी खत्म। मरते रहिए फिर एड़ियाँ रगड़-रगड़ कर। यह फास्ट फॉरवर्ड की सुविधा अमृत काल के रहते-रहते ही सुलभ है।  आप क्या समझते हैं फिर मरना इतना आसान रह जाएगा? हरगिज़ नहीं। अभी तो आप कोरोना से अगर बच भी गए हो तो वान्दा नहीं। अपुन इंतज़ाम किएले हैं। कोई न कोई रोग अपुन तुम्हारे वास्ते लेकर आएंगे ही। आप पानी से भी मर सकते हैं। आप आग से भी मर सकते हैं। आप डूब के भी मर सकते हैं। वो शाहरुख खान की किस फिल्म का संवाद है- जब आप किसी चीज़ को इतनी शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात आपको उसे मिलाने में लग जाएगी। बस आप समझ गए !

 

         पता नहीं यह कौन सा कॉम्बो है या बोलो तो कॉर्पोरेट प्लान है कि पूरी की पूरी नाव पलट जाती है। लेंड स्लाइड हो जाता है। और तो और आप नहाने गए ये सोच कर कि चलो कुछ पुण्य कमा लिया जाये।  स्वर्ग में इंडियंस के लिए वेकेन्सी चल रही है। फौरन सब काम छोड़ कर बस आ जाओ। वो गाना है ना "तुम सब को छोड़ कर आ जाओ"... ट्रेन दुर्घटनाएँ हों या फिर सड़क हादसे या फिर आप कश्मीर घूमने गए ये सोच कर कि आप पृथ्वी के स्वर्ग में घूम रहे हैं। यकायक देखा आप तो वाकई स्वर्ग में टहल रहे हैं। यह सुविधा है अमृत काल में। 70 साल में पहली बार ये स्पेशल सुविधा भारतीयों के लिए विशेष पैकेज के अंतर्गत चलाई गई है। अब ये पुल इस पार से उस पार जाने भर के लिए नहीं है बल्कि बच्चन जी सीनियर के अनुसार:

 

 

         इस पार प्रिये तुम हो, मधु है

         उस पार न जाने क्या होगा

         इस पार मेरे जीने का आधार

         प्रिये तुम हो मधु है

         उस पार न जाने क्या होगा

 

 

 अतः आज के पुल इस पार से उस पार नहीं बल्कि इस भवसागर को ही  पार करा देते हैं। वे इस लोक से परलोक जाने के पुल साबित हो रहे हैं। उसी तरह रेलवे स्टेशन पर रेल ही नहीं बल्कि प्लेटफॉर्म भी भगदड़ के चलते आपको बैकुंठ ले जाने को तत्पर दिखते हैं। जरा सी भगदड़, माइक से जरा सा गलत-सलत  एनाउंसमेंट, और लो जी असंभव, संभव बन जाता है।

 

 

          होनी को अनहोनी कर दे

         अनहोनी को होनी

         एक जगह जब जमा हों तीनों

         झूठ ! गोदी मीडिया! जुमले!

 

 

   कई बार लगता है कि माॅल्थस और डार्विन से सुपारी लेकर हम जनसंख्या को हर हाल में कम करने हेतु कटिबद्ध हैं। अतः आपका मरना इतना सुलभ कभी न था। किस लिए महज़ इस लिए कि आप जल्द से जल्द बैकुंठ के, स्वर्ग के जन्नत के नागरिक बन सकें। जीवन के आवागमन चक्र से मुक्ति इतनी आसान कहां होती है ? हमने भारत में इसी को आसान कर दिया है। हर आदमी की पहुँच में है बैकुंठ अब, पहली बार 70 साल में आप डिसाइड तो करें, हम हाजिर हैं आपकी सेवा में। बैकुंठ यात्रा को ऐसे समझो कि हमने एक्सप्रेस सर्विस, शुरू कर रखी है। अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ इस ऑफर का लाभ उठाएँ

 

 

         काल मरे सो आज मर, आज मरे सो अब

         अमृत काल बीत जाएगा फेरि मरेगा कब

 

व्यंग्य: जादू की झप्पी 600/- में

        

                                                     


 

            जब से खबर पढ़ी है मुझ तो यकीन ही नहीं हो रहा। गोया कि अब चीन में भी ये चलन चल निकला है। शुगर डैडी तो सुने थे। अब महिलाएं पाँच मिनट की जादू की झप्पी के पुरुषों को 250/- से लेकर 600/- का शुल्क दे रही हैं। इन पुरुषों को 'मैन-मम्स' कहा जाता है। यानि कि वो दिन हवा हुए जब केवल वूमन ही मम्स होतीं थीं या कहलाती थीं। अब यह उपाधि पुरुषों को भी मिल गई है। चीन शुरू से ही बहुत आगे रहा है। जैसे कि बारूद का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ। कहा जाता है कि कागज की मुद्रा का चलन भी चीन मेँ सबसे पहले आया और तो और कागज का आविष्कार भी चीन ने ही पहली दफा किया अतः शुरुआती मुद्रण का चलन और कम्पास भी वहीं की देन है।

 

 

            यह तो गजब ही हो गया। आप 'मैन-मम्स' को ऐप से ही बुक कर सकते हैं। कितना सुलभ हो गया है सब कुछ अब। लेकिन इस सब को जानकर आप कोई अपने बारे में मुगालता न पाल लेना। मुझे याद है जब वियतनाम - अमेरिका का युद्ध चल रहा था तो खबरें उड़ती रहतीं थीं कि वियतनाम में युद्ध के चलते पुरुषों की भयंकर कमी हो गई है। अतः भारत से पुरुष निर्यात किए जाएँगे। भारतीय पुरुष यकायक सचेत हो गए। अपने- अपने बायो-डाटा अपडेट करने लग पड़े। तब बायो-डाटा ही कहते थे। तब तक सी.वी. अथवा रिज्यूमे शब्द चलन में नहीं आया था। 

 

 

        अब उसी वियतनाम स्टाइल में आप कुछ ग़लतफहमी में ना रहें। आपको बता दूँ कि ये जो 'मैन-मम्स' की पोस्ट के लिए कोई भी मर्द नहीं चलेगा बल्कि उसकी कुछ योग्यताएँ हैं, पैरामीटर्स हैं। जैसे कि वह बलिष्ठ हो। मज़बूत हो। दूसरे, वह सौम्य होना चाहिए अर्थात क़ायदे से पूरे मैनरिज़्म के साथ बातचीत कर सके।  सौम्य शब्द के बहुत अर्थ होते हाँ सबको ठीक से पढ़-समझ लीजिये। तीसरी योग्यता जो अनिवार्य है वह है उन्हें धैर्यवान होना ज़रूरी है। अब धैर्यवान के भी अनेक अर्थ होते हैं।

 

         मोटा-मोटा अब यूं समझ लीजिये कि आप शारीरिक रूप से बलिष्ठ हों, मज़बूत हों, सौम्य हों और धैर्यवान हों तब इस पद के लिए पात्र हैं। तुरंत चीन के वीज़ा के लिए एप्लाई कर दीजिये। यहाँ भी अग्निवीर बनना है, चीन में अग्निवीर बनिये।  बोले तो अपनी सौम्यता अपने धैर्य और बलिष्ठ शरीर के बल पर जीत लीजिये चीन की तरुणियों के दिल, जिग़र, दिमाग। ये हमारा झप्पी जिहाद है।

 

         बचना ऐ हसीनो ! लो मैं आ गया !

 

Monday, June 9, 2025

व्यंग्य : आम मेरे नाम का


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                सब का आपको सम्मान करने का अपना अपना तरीका होता है। अब ये आम वाले अंकल जी को ही देख लो ! जिसे दिल से चाहते हैं या जिससे जरा इंप्रेस हो जाते हैं उसके नाम की आम की नई नस्ल पैदा कर देते हैं। पूरे ज़ोर-शोर से उस नई नस्ल का नामकरण अपने लेटेस्ट हीरो के नाम पर रखने की पब्लिक घोषणा भी कर देते हैं। इससे उनका आम, वो खुद और जिसके नाम से आम का नामकरण हुआ है तीनों एक झटके में प्रसिद्ध हो जाते हैं। उनका नाम अखबारों में छा जाता है।

 

 

        अब बड़े-बड़े आदमियों का तो ठीक है। पर फर्ज़ करो कभी ये आम वाले अंकल जी ने मेरे नाम से अपने किसी आम की नयी नस्ल का नाम रख दिया तो ? तो बड़ी फज़ीहत हो जाएगी। मेरा इस पर ध्यान गया तो एकदम सिहरन सी दौड़ गई। कैसे-कैसे फब्तियाँ और जुमले बाज़ार में चल निकलेंगे। देश में पहले ही क्या जुमलों की कमी है। मंडी में सुबह-सुबह लोग टेर टेर के कह रहे हों "ले जाओ बढ़िया रबीनदर! ठीक-ठीक लगा देंगे ! ले जाओ रबीनदर" ! लोग पूछेंगे: "ये रबीनदर किस भाव दिया है ? ठीक-ठीक लगा लो  हम दस किलो रबीनदर ले लेंगे। रबीनदर को काटो, थोड़ा चखाओ तो सही। जरा रबीनदर की एक फांक खिलाओ तब तो जानें रबिनदर का स्वाद। ऐसे बिना चखे कैसे ले लें रबीनदर को"।

 

 

       रबीनदर तोड़ताड़ कर पेटी में बिकने आया करेगा। रबीनदर की नीलामी हुआ करेगी अल-फाँसो स्टाइल में। रबीनदर कहीं दुकान पर, कहीं ठेले में, कहीं फुटपाथ पर बिका करेगा। लोगबाग आएंगे पिचका-पिचका कर देखेंगे। दुकानदार से पूछेंगे "भैया ये रबीनदर में गुठली बड़ी निकलती है या छोटी?"  ये रबीनदर पका हुआ है ? अभी तो कच्चा सा मालूम दे रहा है। ये हरा-हरा क्यूँ है ?

 

 

       खराब बात ये है कि फिर रबीनदर बाज़ार से, पेड़ से, बाग-बगीचों से गायब हो जाया करेगा। चुनाव में जमानत ज़ब्त हुए उम्मीदवार की तरह। लोग पूछेंगे तो दुकानदार बताएगा "ये रबीनदर का मौसम नहीं है। रबीनदर तो अब अगले साल ही आयेगा"। रबीनदर को चूसने से पहले चेंप अलग निकालना पड़ा करेगा। रबीनदर शेक चलेगा मार्किट में। लोग रबीनदर का जूस बना कर पिया करेंगे। रेस्तरां में रबीनदर का पल्प अलग बिका करेगा। गजब ये है कि न बिका हुआ रबीनदर किसी कोल्ड स्टोर में ठिठुर-ठिठुर कर अगले साल का इंतज़ार करेगा या फिर कहीं अंधेरी कोठरी में रबीनदर को सड़ने को छोड़ दिया जाएगा। क्या फजीहत है। अभी अचार और मुरब्बे की बात तो मैंने छेड़ी ही नहीं है। वो यातना का एक और दौर है।

 

 

       अतः आम वाले अंकल जी आपको मेरी कसम है मेरे नाम से अपने किसी आम की नस्ल का नाम मत रखना रबीनदर नाम है हमारा।

 

 

Sunday, June 1, 2025

Humor: M.A. in Puja Science


 

 

       During our school days we had a subject called ‘Dharma’. It was a thin simple book with simpler syllabus. In a way, only basic knowledge of all the major religions of the world was imparted with no bias whatsoever. Largely, it was information based i.e. Who was the founder, The Holy Book and principal teachings. Since then, lot of water full of hazardous chemicals mixed with sewer water has flown in the Ganges. Latest is, a prominent University in India has launched a ‘Centre for Hindu Studies’. The various courses and minimum eligibility criterion have been firmed up. Several Post-Graduate and Diploma courses have been introduced. Hitherto, we were taught that Hinduism is no religion rather it is a way of life. If that be so, I wonder why all these courses? But then of late, haven’t you seen hordes of books on parenting while people have been becoming parents, good or bad, since time immemorial.

 

             This ‘Hindu Study Centre’ is going to have courses such as M.A. in Hindu Studies, Post-Graduate Diploma in Temple Management (definitely needed, with temples of all shapes and sizes having been mushroomed, more on unauthorized land every half a kilometer. High time, these temples are managed professionally by the well-educated / trained professionals. I suggest, there must be M.A. (Keertan). Just imagine, how much knowledge is awaiting sincere seekers. We, in our ignorance thought Hinduism is all about Gayatri mantra and Laxmi Pooja. Now you would know that Hinduism is far deeper than one could fathom.  

 

                Just ponder, when you are a Diploma holder in Keertan science, how many Bhajans and their meaning you would be able to memorize. Many table games such as carrom, scrabble, chess karaoke Antakshari and crossword would be evolved based on the Keertans and mantras.

 

        Thank God! Mumbai has tiny temples in each house hold. Similarly, in office and business establishments of all varieties one may not find humans but deity would be there overseeing one and all. With all this, there will not be any dearth of opportunities for industrial attachments. Would there be any dress code for the students of these courses. Yes, another bigger question, would these courses be open for the students from all the four ‘varnas’? Would these courses open for students from other countries?  Could kids of high priests pay capitation fee and get admission out of turn? Admission to these courses would be through CUET? What would be the approx. Dakshina I mean fee? Tilak, choti and tonsured head would be compulsory for the students of these courses? The syllabus would include how to read holy books aloud? Would the course contain how to read and interpret faces/palm and moles on body? Would they be taught to predict what tragedy is going to befall upon devotees, ways and means to escape? Temple management would include what all ingredients are required to be placed and how, in a puja-thali. Which flower to which deity and flowers need to be carried in a thali or in a wooden basket? If a particular flower is not readily available which alternative flower could be considered congruent.  How to recycle coconut offered in a temple?

 

I am wondering whether these courses would dwell upon comparative factual checks vis-à-vis other faiths. For example, what is the Parsi, Buddhism, Christianity and Islamic view on a particular aspect / ritual / hypothesis. I hope it would not be hammered into the brains of the students that ‘Hinduism is The Best’ and all other sects / religions are inferior to Hinduism. No debate on that. Others are just a haphazard crowd of heretics.

              Some courses which would sell like hot cakes could be: Diploma in Puja-Ingredients (DPI), Diploma in Management of Commercial Activities around Mandir (DCAM) Diploma in Fast (Vrat) Management (DFM). Certificate course in Navratre (CIN) Diploma in Crowd Management (DCM) Certificate course in Dream Interpretation (CDI) Also, the prospectus should give some insight about the employment scope for the prospective students.

 

    I hope the students would have campus recruitment so that they don’t have to run temple to temple, armed with their C.V. begging for job like other Engineers / M.As / PhDs. Govt may launch some scheme viz. Asur-Sanharak to complete the pattern of 3As Aanganwadi, Agniveer & Asur-Sanharak.