मेरा भारत महान है। इसमें जिसको तनिक भी शक़
हो उसके लिए ये खबर है कि मेरे भारत महान की, महानतम
यूनिवर्सिटी के दो चपरासियों ने अलमारी में रखी दो सौ थीसिस कबाड़ीवाले को बतौर
रद्दी बेच दी। पता ये चला है कि ये दोनों मल्टी-टास्किंग स्टाफ संविदा कर्मी थे।
बहुत संभव है कि वे रोज की मच-मच से तंग आ गए हो गए हों। दूसरे संविदा कर्मचारियों
को अपने अनुबंध के नवीनीकरण पर संदेह हो या पता हो कि अब उनका डेरा-डंडा इस
यूनिवर्सिटी से उठ रहा है। एक भानगढ़ और है, हो सकता है इनको
कई महीनों से अनुबंध राशि मिली ही न हो। संविदा कर्मचारियों में से ज्यादातर को
समय पर वेतन नहीं मिलता है। कई महीने के एरियर हो जाते हैं। और फिर बाबू लोग,
जिनकी मुट्ठी ठंडी पड़ी होती है उसको क्रियाशील बनाने को मुट्ठी गरम
करनी पड़ती है। तब हाथ चलते हैं और तब कहीं जाकर कलम चलती है।
एक बात और है जिस बात को यूनिवर्सिटी के
बड़े-बड़े प्रोफेसर नहीं समझ पाये वह 'ज्ञान'
इन दो संविदा कर्मियों को हो गया था। अब ज्ञान की प्राप्ति तो किसी
को, कभी भी, हो सकती है। ये
संविदाकर्मी समझ गए थे ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ हमारे संत कह- कह के
थक गए पर यह 'रियालाइज़ेशन' इन दो ‘संत’
संविदाकर्मियों को हुआ वह तमाम प्रोफेसरों की फौज में से किसी को भी नहीं हो
पाया।
अब आप सोचो ‘प्रेम’ का ढाई अक्षर लिखने को
कितनी जगह चाहिए। दो सौ थीसिस रखने और संभाल के लिए कितनी जगह, कितनी अलमारियां चाहिए। और इस यूनिवर्सिटी में न जाने कितनी थीसिस पड़ी
होंगी जो अंततः दीमक का भोजन बनने को शापित हैं। चलो किसी की रोटी तो इन थीसिस से
चली। एक बात और है यह ‘ज्ञान’ जो इन थीसिस के माध्यम से अर्जित किया जाएगा वह किस
काम का? न रोजगार है! न उद्योग! बाकी जितने भी काम-धंधे और
उद्योग धंधे हैं उनमें ये 'थीसिस' काम
नहीं आनी। अतः अधिक से अधिक ये थीसिस 'स्वांतै: सुखाय' हो सकती हैं। समय आ गया है कि ये
शोध-प्रबंध, ये स्कूल-कॉलेज ये यूनिवर्सिटी किस काम के?
बेकार जगह घेरे हुए हैं। कितने चमक-दमक वाले मॉल और मल्टीप्लेक्स
यहाँ बन सकते हैं। सोचा है कभी?
अतः मैं समझता हूँ इन दो सौ थीसिस से वाकई
कोई लाभान्वित हुआ है तो केवल ये दोनों संविदा कर्मी ही हैं। बेच कर एक जून की
रोटी या दो टाइम की झालमूड़ी तो चल ही जायेगी। यूनिवर्सिटी वाले भी अब चैन से सो
सकेंगे। वैसे ही जैसे डाकू खड्ग सिंह के 'सुल्तान'
नामक घोड़े को छल से ले जाने के बाद बाबा भारती सोने लगे थे।

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