भले
आप कुछ भी कहें परंतु हम सब अपने पूर्वाग्रहों से बंधे रहते हैं। यद्यपि इसका कोई
ठोस कारण या लॉजिक नहीं है पर कुछ लोग आपको शकल से अच्छे लगने लगते हैं और उसी
तर्क से कुछ लोग आपको अपने चेहरे और बॉडी लेंग्वेज़ से बिलकुल नहीं भाते। इसको और 'वेलिडेशन' मिलता है जब वह जैसा इम्प्रेशन था वैसा ही
निकलता है तो और बन आती है। "मैं तो शकल देख कर ही पहचान गया था। यह
बदमाश/ठग/चोर/ बेईमान है।" कभी-कभी यह भी सुनने को मिलता है फलां "शकल
से ही खानदानी लगता है। भला आदमी लगता है"। आपने अगर फिल्म डाॅन देखी हो तो
अमिताभ बच्चन अपनी गेंग के एक साथी को गोली मार देता है। दूसरे साथी गेंगस्टर के
पूछने पर डाॅन बताता है “मुझे इसके जूते अच्छे नहीं लगे” दरअसल जूते की हील में
छिपा कर वह खबर/प्लान इधर से उधर करता था।
जब एक सूबे में आई.जी. साब अपने मातहतों की
मीटिंग ले रहे थे। किसी बड़े संजीदा टॉपिक पर बात चल रही थी, उन्होने नोटिस किया एक दरोगा जबसे
वो आये हैं मुस्कराए ही जा रहा है। पहले उन्हें अटपटा लगा। फिर उन्होने देखा उसका
मुस्कराना रुक ही नहीं रहा है। बड़ी गंभीर बात हो रही है। लाॅ एंड ऑर्डर पर चर्चा
चल रही है। लोग मर रहे हैं, कट रहे हैं। एक ये दरोगा बाबू
हैं कि हर बात पर सतत् मुस्कराए ही जा रहे हैं। वो एक 'स्लोगन'
है ना 'हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में मुस्कराना
हमारा नारा है'। पद्मभूषण नीरज जी ने लिखा है: “जिन मुश्किलों में मुस्कराना हो
मना उन मुश्किलों में मुस्कराना धर्म है” मगर इन दरोगा जी का मुस्कराना इन पर भारी
पड़ गया। इन्हें मुश्किल में डाल गया।
जब आई.जी. साब ने देखा कि अगले का
मुस्कराना थम ही नहीं रहा है तो उन्हें 'अनक्मफ़र्टेबल फीलिंग' होने लगी। आप मर्डर और डकैती रोकने की बात कर रहे हैं और अगले का
मुस्कराना ही नहीं रुक रहा। मुस्कराना रुके तो मर्डर/डकैती रुके। मैं तेरे चेहरे
से नज़र हटाऊं तो दुनियां देखूं।
होना क्या था आई.जी. साब ने इसे पर्सनली ले लिया और एकदम खफा हो गए। वे फुल-फुल फायरिंग मूड में आ गए। लगे उसे भला-बुरा कहने। उन्होने देखा कि अगला अब भी मुस्कराए जा रहा है। बस उन्होने आव देखा न ताव और उसको तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर कर छोड़ा। जिसे पुलिसिया भाषा में लाइन हाजिर कहना कहते हैं। जब दरोगा जी को अपने इस ट्रांसफर का पता चला तो उन्हें भान हुआ कि उनकी क़ातिल मुस्कान ने तो उनको ही मुश्किल में डाल दिया। उन्हें अपने मुस्कराने का ग़म नहीं। ग़म ये है कि उनकी मुस्कान को बेदर्द ज़माने की तरह आई.जी. साब भी नहीं समझे। जब वह थाने में अपराधियों से पूछताछ करता या फिर ‘कड़ी’ पूछताछ करता, कंबल परेड अथवा ‘भैरों बाबा के प्रसाद’ के वक़्त भी दरोगा जी मुस्कराते रहते। दरोगा जी ने हाथ जोड़ कर आई.जी. साब को बताया हुज़ूर मेरी इतनी जुर्रत कि आपके इगलास में मुस्कराऊँ? भगवान जानता है और एस.पी. साब से पूछ लीजिये सर मेरी शक्ल ही ऐसी है। ऐसा कहते वक़्त भी दरोगा जी मुस्करा रहे थे। अब पुलिस विभाग सोच रहा है कि दरोगा जी को अपने पी.आर. डिपार्ट में शिफ्ट कर दे। वो 'मोटो' है ना “सर्विस विद स्माइल” उसके जीते-जागते प्रमाण (मास्कट) साबित होंगे हमारे दरोगा जी।

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