Ravi ki duniya

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Tuesday, March 5, 2024

डिबिया दियासलाई की

 


    

         माचिस का आविष्कार आपको जानकार आश्चर्य होगा कि लाइटर के बाद हुआ। ऐसा कहा जाता है कि माचिस ने अपना वजूद सन 577 के लगभग चीन देश से बनाया। आपने पुरानी अंग्रेज़ी फिल्में देखी हों तो आपको पता होगा कैसे दियासलाई को हीरो कहीं भी रगड़ कर अपनी सिगरेट या अपना चुरुट जला लेता था। इन माचिस को सल्फर माचिस कहा जाता था। वे कहीं भी जरा सी रगड़ से जल जाया करती थी। इसमें दिक्कत ये थी कि बहुधा इस माचिस में खुदबखुद हिलने-ढुलने/घर्षण से आग लग जाती थी। बाद के बरसों में रसायन अलग-अलग किए गए और फास्फोरस को माचिस की डिबिया से स्ट्रिप रूप में चस्पा किया जाने लगा। अब जब तक आप सजग हो कर माचिस खोलेंगे, एक दियासलाई निकालेंगे और फिर उसे जब तक अपने उँगलियों से पकड़ कर स्ट्रिप पर रगड़ेंगे नहीं आग नहीं लगेगी। इस्तेमाल में सेफ थी। अतः इसको सेफ़्टी मैच भी कहा जाने लगा।

 

      आपकी जानकारी के लिए सन् 1870 में भारत में माचिस आई। ये माचिस जापान, स्वीडन, आस्ट्रिया से आयीं। लाने वाले वही थे आपने ठीक पहचाना ‘टाटा एंड सन्स’ (जापान) यह कहीं भी रगड़ कर इस्तेमाल करने वाली थी। एक अन्य ब्रांड था ‘दि सुन्दरी’     स्वीडन) यह सेफ़्टी मैच थी। इस पर पोस्टर भारतीय लगाए जाते थे। जैसे कि भारतीय वेषभूषा में भारतीय नारी या शेर का चित्र। 1895 आते आते साहसिक व्यापारियों ने  अहमदाबाद (गुजरात) में माचिस उत्पादन का ‘गुजरात इस्लाम मैच कारख़ाना’ डाला। परंतु यह उपक्रम किन्ही कारणो से सफल नहीं रहा।

 

         जापानी प्रवासियों ने 1910 में कोलकाता में मैच बनाना शुरू किया। एक स्थानीय व्यापारी पूर्ण चंद रॉय ने मैच बनाने की फ़ैक्टरी शुरू की। तब का एक ब्रांड था ‘मदर इंडिया मैच’ और उसे डैम्प प्रूफ (सीलन-प्रूफ) माचिस कह कर मशहूर किया गया। दो नाडार भाइयों ने कोलकाता की फ़ैक्टरी देख कर यह काम शिवकाशी (तमिलनाडु) में शुरू करने का निश्चय किया। यह 1922 की बात है। 1923 में इस क्षेत्र में स्वीडन की विमको (WIMCO) वैस्टर्न इंडिया मैच कंपनी  भी कूद गई। अपने अंबरनाथ (मुंबई के निकट) के माचिस के प्लांट का बड़े स्तर पर मशीनीकरण किया गया। 1950 के दशक तक मार्किट में इस कंपनी की तूती बोलती रही।

 

       यूं माचिस भले विदेश से आतीं थीं किन्तु उन पर लेबल एक प्रकार से विज्ञापन का काम करते थे। पुरानी 1905-1920 आस्ट्रिया से आयातित माचिस के लेबल पर गायिका गौहर जान का फोटो खूब लोकप्रिय रहा। 1931 की सत्तूर निर्मित माचिस पर भारत की पहली टाॅकी फिल्म आलम-आरा को 'टाॅकिंग सिंगिंग एंड डान्सिंग' कह प्रचारित किया गया। उसी वर्ष हुए गांधी-इरविन समझौते को भी माचिस के लेबल पर खूब प्रचारित किया गया।  1940 का दशक आते-आते माचिस के लेबल भारत की आज़ादी का आव्हान कर रहे थे। ‘हमारा आखरी और अटल फैसला आज़ादी या मौत’।

1927 आते आते भारत में माचिस की छोटी-बड़ी 27 फैक्टरी थीं। भारत आज़ाद होने के बाद माचिस के आयात पर रोक लगा दी गई। 1949 में अकेले शिवाकाशी में माचिस की 90 फैक्टरी थीं। उत्तर भारत में बरेली माचिस उत्पादन के एक बड़े केन्द्र के रूप मे उभरा। 67% माचिस उत्पादन शिवाकाशी में होता है। यह अत्याधिक श्रम-साध्य कार्य है। 90% लेबर महिलाएं होतीं हैं।

 

      अब एक टोटके या अंधविश्वास का ज़िक्र और उसके मूल में क्या है ? आपने देखा होगा कि दोस्तों की टोली एक दियासलाई से तीन सिगरेट नहीं जलाती है। अंधविश्वास यह है कि ऐसा करने से तीनों में से एक की (तीसरे की) मृत्यु हो जाती है। इसकी जड़ में है: जब दूसरे विश्व युद्ध में सैनिक लोग अपनी सिगरेट जलाते थे तो आग से जो रोशनी होती थी उस से दुश्मन सजग हो जाता था। जब दूसरे की सिगरेट जलाई जा रही होती थी उतनी देर में दुश्मन निशाना साध लेता था और तीसरे की सिगरेट जलाते-जलाते दुश्मन  फायर कर देता था।

 

          आज भारत में  माचिस की 8 बड़ी फैक्टरी हैं। यथा एशिया मैच , ग्रीन विन, क्वैन्कर मैचिस,एपोक एक्सपोर्ट्स, एस आर एस भारत एक्सिम, बिलाल मैच ग्रुप, राजश्री मैच वर्क्स, स्वर्ण मैच फैक्टरी।

 

    भारत आज दुनिया में माचिस का सबसे बड़ा निर्यातक है। चीन दूसरे नम्बर पर और टर्की तीसरे स्थान पर है। भारतीय माचिस अमरीका, जर्मनी, नाईजीरिया, भूटान आदि देशों को निर्यात की जाती हैं। भारत प्रतिदिन 400 करोड़ माचिस बाॅक्स बनाती है। विश्व में प्रयोग में आने वाली हर तीसरी माचिस भारत में बनी होती है।  आई.टी.सी. (I.T.C.) ने विमको कंपनी का अधिग्रहण कर लिया और उनके सभी 4 प्लांट्स  बरेली, अंबरनाथ, चेन्नैई और कोलकाता को बंद कर दिया और शिवाकाशी में उत्पादन को छोटी छोटी इकाइयों को ऑउटसोर्स कर दिया।    

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