Ravi ki duniya

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Wednesday, May 13, 2026

व्यंग्य : बारिश ! बारिश ! भाग जाओ

 

                                     


 

एक सूबे के वज़ीरे-तालीम ने यह ऐलान  किया है कि ये अंग्रेजों ने अपनी संस्कृति भारत पर लादने के लिए अपनी ऊटपटाँग कवितायें (पोयम्स) हमारे छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाने लगे। इससे उनके कोमल मन को, इस तरह से शुरू से प्रभावित कर दिया गया। बल्कि कहना चाहिए ज़हर भर दिया। ये सारी की सारी कवितायें हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराओं और सनातन के अनुकूल नहीं हैं। उल्टे हमारे नन्हें-मुन्ने बच्चों को भारतीयता से विमुख कर रही हैं। चलिये देखते हैं कैसे हमारे बच्चों को बचपन से ही झूठ बोलना, मिथ्या आचरण करना, चोरी चकारी करना यहाँ तक कि कर्तव्य से मुंह मोड़ना और मक्कारी सिखाई जाने लगी। उसी का अंजाम है ये आज की पीढ़ी। अब समय आ गया है कि ऐतहासिक भूल को करेक्ट किया जाये। और फिर अगर हम करेक्ट नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

 

 

1.       अब आप देखिये इस नर्सरी राइम को "रेन रेन गो अवे... कम एनोदर डे ...लिटल जॉनी वांट्स टू प्ले"। देखिये इसमें जॉनी को स्वार्थी दिखाया गया है। इस जॉनी के बच्चे को किसानों का कोई ख्याल ही नहीं है। आखिर किसान हमारा अन्नदाता है। इस सबके बावजूद ये छोकरा जॉनी, जो है सो, रेन से कह रहा है कि तुम चली जाओ मुझे खेलना है। यह हमारी संस्कृति नहीं। उल्टे हमें स्वार्थी होना सिखाती है। इसे तुरंत प्रभाव से हटाया जाना चाहिये।

2.       ये जॉनी जो है सो ऐसा लगता है जैसे इसका निर्माण भारत की संस्कृति को करप्ट करने के लिए ही हुआ है।  इस राइम में जब जॉनी से पूछा गया "जॉनी! जॉनी! ईटिंग शुगर ?" ...वह यद्यपि शुगर खा रहा है और उसके मुंह में  शुगर अभी है भी इस सब के बावजूद वह सफ़ेद झूठ बोलता है "नो पापा"। ये तो जब उससे कहा जाता है "ओपन योअर माउथ" तब वह चोरी पकड़े जाने पर और कोई चारा न देख हँसने लगता है "हा...हा...हा..."

3.       एक और राइम है जो रंगभेद (एपर्थिड) की समर्थक मालूम देती है। पहली लाइन में ही "बा बा ... बा बा ब्लैक शीप..." देखने वाली बात ये है कि ये भेड़ काली ही क्यूँ चुनी गयी है। जबकि भेड़ तो सफ़ेद/भूरी/ब्राउन भी होती है। यह हम अफ्रीकन और भारतीयों के लिए अपमानजनक है चाहे कितने ही अप्रत्यक्ष रूप से क्यों न हो। इसी राइम में एक पंक्ति आती है "वन फॉर माई डेम..." अब यह क्या है? किसी की बहन-बेटी को "डेम" कहना और वो भी "माई डेम" कहना? तौबा! तौबा!

4.       इसी श्रंखला में एक और कविता आती है जो अंग्रेजों ने हमारे समाज में फैलाई है और उसके माध्यम से हमारी मर्यादाओं को भंग करने का प्रयास किया है। "जैक एंड जिल वेंट अप दि हिल"। अब हमारे समाज में इस तरह लड़का-लड़की पहाड़ पर अकेले नहीं भेजे जाते। ये पानी-वानी भरने का काम लड़कियों और महिलाओं के जिम्मे है। फिर वो चाहे कुएं से लाना हो, नदी हो, तालाब से लाना हो। हमारे यहाँ पहाड़ पर चढ़ कर पानी लाने का रिवाज नहीं के बराबर है। वही बात हुई दोनों फिसल गए और गिर पड़े चोट लगी सो अलग। उसी के अनुरूप आज भी जब कहीं 'वेलेंटाइन डे' पर ये जैक एंड जिल दिख जाते हैं तो दोनों की खूब पिटाई करते हैं।

5.       इस तरह अंत में एक और कविता है "ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार ...लाइक ए डायमंड" ... हमारी सनातन संस्कृति कहती है कि सिंपल जीवन जीना है। 'डिटेचमेंट' रखना है। रूखा-सूखा खाना है। किन्तु यहाँ बच्चा, जो है सो, अपने यथार्थ से कटा हुआ दिखाया गया है। वह दिवास्वप्न ले रहा है। वह तारों की तुलना हीरे से कर रहा है। यह सरासर सांसारिक प्रवृति है। यह विलासिता है और कुछ नहीं। बच्चा बचपने से ही हीरे जवाहरात की बात कर रहा है। आगे जाकर यह क्या बनेगा बताने की ज़रूरत नहीं।

 

अतः ये कुछ उदाहरण इसलिए दिये गए हैं कि जब आँख खुले तभी सवेरा है अतः ये जितनी भी अंग्रेज़ी की राइम/कवितायें है वह हमारी संस्कृति के खिलाफ हैं। इनसे जल्द से जल्द छुटकारा पा लेना चाहिए। इन्हें रिप्लेस करना है मंत्रों से, आरती से, श्लोकों से, चौपाइयों से।

शुभस्य शीघ्रम।

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