सच भी है मिटाने ही चाहिए। जब तक ये निशान
रहेंगे हमें याद दिलाते रहेंगे और शर्मिंदा कराते रहेंगे कि देखो पुल इसको कहते
हैं,
सड़क इसको कहते हैं, इमारत इस को कहते हैं जो
सैकड़ों बरसों से ज्यों की त्यों खड़ी हैं। एक तुम्हारे बनाए पुल, इमारतें और सड़कें हैं जो इतने हफ्ते या महीने भी नहीं चलते। अब क्यों कि
हम हार्डिंग ब्रिज सा या उससे बेहतर ब्रिज बना नहीं सकते अतः हमने क्या काम किया
हार्डिंग ब्रिज पर अपनी नेम प्लेट लगा दी और खबर छाप दी आज से हमने इस औपनिवेशिक
निशान को मिटा दिया है। खबरदार जो किसी ने इसे हार्डिंग ब्रिज कहा। आज से यह तिलक
ब्रिज होगा। हमारा अपना देसी तिलक ब्रिज। हालांकि केवल बोर्ड हमारा है जिस पर हमने
तिलक ब्रिज लिखा है।
यही हाल हुआ है औपनिवेशिक निशान मिटाने के
नाम पर कर्ज़न रोड के बोर्ड को बदल हमने कस्तूरबा गांधी मार्ग कर दिया। बस
पेंट-ब्रश का खर्चा पड़ा। रोड तो वही है। फ्लोरा-फाउंटेन का नाम कर दिया हूतात्मा
चौक। दिल्ली में अनेक स्टेचू अंग्रेजों के लगे थे। सबको उखाड़ कर एक जगह कोरोनेशन
पार्क में खड़ा कर दिया। दिल्ली साफ कर दी। दुनिया में कोई सबसे आसान काम है तो वह
है नाम बदलने का। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आ जाता है।
अब इसी श्रंखला में यह तय पाया गया है कि
रेलवे से भी औपनिवेशिक निशान मिटाये जाएँगे। ये निशान भी तो बड़े जिद्दी किस्म के
हैं 1853 से लगे हैं। मिटाते मिटाते टाइम लगेगा। अतः एक तो ये है कि आप बार-बार हम
को ही चुन कर भेजें ताकि हम ये सारे निशान मिटा सकें। यूं अंग्रेज़ जो सिस्टम छोड़
कर गये सारे आज भी वही हैं। सिग्नल को सिग्नल ही कहते हैं ट्रेन ही कहते हैं।
पदनाम भी वही हैं जो अंग्रेज़ दे गए थे। मुसीबत ये है कि ये रेल चलाई ही अंग्रेजों
ने थी। अब या तो पूरी की पूरी रेल ही खत्म कर दो तब मिटेंगे ये औपनिवेशिक निशान
नहीं तो कैसे मिट पाएंगे। एक बाबरी मस्जिद ढहा देने से मुस्लिम आक्रांताओं की
विरासत खत्म नहीं हो पाएगी। हमें ताजमहल, लाल क़िला, जामा मस्जिद, और दुनिया भर की दरगाह-मकबरे मिटाने
होंगे। उसी तरह औपनिवेशिक निशान मिटाने को हमें, क्या इंडिया
गेट, क्या गेटवे ऑफ इंडिया, क्या
राष्ट्रपति भवन, क्या वी.टी. क्या चर्चगेट सब को ढहा कर
दुबारा अपने देसी अंदाज में चीजें बनानी होंगी।
रेल से औपनिवेशिक निशान मिटाने का मतलब समझ
रहे हैं आप ? पूरी की पूरी रेलवे ही खत्म करनी होगी
कारण की पूरी की रेलवे ही औपनिवेशिक है। देसी है तो यात्रियों की टोली देसी है जो
बेटिकट चलने में गर्व महसूस करती है। देसी हैं तो चोर, उचक्के,
जेबकतरे, उठाईगीरे देसी हैं। देसी है तो
दुर्घटनाएं देसी हैं। देसी है तो वे अभागे यात्री देसी हैं जो आज भी गिर कर या
पटरी पार करते मरते हैं। और अगर देसी है तो वो बलास्ट (पत्थर की गिट्टक) है
जो पटरी के दोनों ओर बिछी रहती है जिस पर चढ़ कर 'लपका'
लोग आपके मोबाइल को छीन लेते हैं।
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