भारतीय नौकशाही और सफ़ेद तौलिया का चोली- दामन बोले तो तौलिया-दामन का साथ
है। यदि आपकी चेयर पर सफ़ेद तौलिया का खोल नहीं चढ़ा है तो आप खाक सीनियर अफसर हैं।
सीनियाॅरिटी के सुखद एहसास का नाम ही सफ़ेद तौलिया है। सफ़ेद तौलिया के आपकी चेयर से
लिपटे - चिपटे रहने के अनेकानेक अर्थ हैं। ये ऐसे ही है जैसे मंदिर में आप अपने
दैनिक वस्त्रों को थोड़ी देर को त्याग कर दर्शन करते हैं। उसी तरह आपने क्या पहना
है यह बेमानी है। आपकी चेयर पर यह सफ़ेद तौलिया
कवच-कुंडल का काम करती है। यह आपकी
सफेदपोशी का प्रतीक है। शुभ्र-धवल। सफ़ेद रंग शांति का प्रतीक है। शांति से सब
ले-दे कर शांति पूर्ण ढंग से निपटा लिया जाये।
राका शांति...वनस्पति शांति। कभी हमारे घर में महज़ एक तौलिया होता था/होती
थी। पूरा घर उसी से बदन पोंछता था। फिर धीरे-धीरे हम दूसरी -तीसरी तौलिया एफोर्ड
करने लायक हुए तो घर के एक-एक सदस्य पर दो-दो तौलिया हो गईं। इस तौलिया ने स्वदेसी
स्वापी/गमछे का बहुत नुकसान किया है। वो तो भला हो इन पाॅलिटिकल पार्टीज़ और इन
सेना और दल वालों का कि अब गले में पटका/गमछा पहनने लगे हैं लोग।
मैं
कल्पना भी नहीं कर सकता कि इस सफ़ेद तौलिया के आविष्कार से पहले लोग अपना जीवन यापन
कैसे करते थे। बोले तो चेयर पर क्या बिछाते थे। यूं सफ़ेद तौलिया नहीं तो क्या
बिछाना क्या ओढ़ना। एक नौकशाह सभ्य कहलाया ही तब जब बगुले सा श्वेत वर्णीय तौलिया
का आवरण उसकी चेयर पर आ लगा। जिसने भी यह प्रथा चलाई उस दूरदर्शी महापुरुष को
कोटि-कोटि धन्यवाद। इस सफ़ेद तौलिया के बल-बूते पर कितनों के काम सर हो रहे हैं।
क्या बाबू, क्या अफसर, क्या
देखने वाला, क्या चेयर वाला क्या तौलिया वाला, क्या तौलिया धो कर भक्क सफ़ेद करके देने वाला, क्या तौलिया
बदलने वाला, यूं समझिए इस सफ़ेद तौलिया के अकेले के दम पर एक
पूरी मानव श्रंखला रोजगार पर लगी हुई है।
सफ़ेद तौलिया के बारे में एक बहुत बड़ा सवाल यह
है कि इस सफ़ेद तौलिया को बदलने की आवृति क्या रहेगी? क्या
हफ्ते में एक बार या हफ्ते में दो बार या फिर दो हफ्ते में एक बार। नौकशाही का
सबसे बड़ा पहलू है उसका पिरामिडी होना अतः बिना सीनियर - जूनियर आप नौकशाही की
कल्पना नहीं कर सकते। एक कहावत भी है न कि नौकरशाही में कोई किसी का साथी नहीं
होता, या तो आप सीनियर हैं या जूनियर हैं। इसी तर्ज़ पर
तौलिया के बदलने का क्रम है। तौलिया के सभी पहलुओं को यह सीनियाॅरिटी-जूनियाॅरिटी
ही कमांड करती है। अतः जहां सीनियर की तौलिया एक हफ्ते में दो बार बदली जाया करेगी
वहीं जूनियर की दो हफ्ते में एक बार बदली जाएगी। उससे जूनियर की बदली ही नहीं
जाएगी क्यों कि उसे साल में एक तौलिया मिलेगी। उसका ज्यादा तौलिया-तौलिया खेलने का
दिल कर रहा है तो अपने घर से अपना तौलिया लाये। कोई हरकत नहीं। तौलिया, सीनियर को फुल बड़े, बोले तो सुपर साइज़ की मिलेगी।
जिसे वक़्त ज़रूरत वह ओढ़ भी सके अथवा छापा-वापा पड़ने की स्थिति में मुंह ढाँप सके।
जबकि जूनियर की तौलिया साइज़ में छोटी रखी जाएगी। तौलिया की एक खास आदत है कि यह
अपनी जगह से खिसकती बहुत है। बिलकुल नवविवाहिता के पल्लू की तरह। नवविवाहिता
इसीलिए कहा कि जो जूनी-विवाहिता (पुरानी-विवाहिता) हैं वहाँ पल्लू नहीं है। बल्कि
ड्रेस है वो भी उस तरह की जिसमें पल्लू चुन्नी-दुपट्टे का काम ही नहीं। अतः इस तौलिया को खिसकने से बचाने के लिए 'वेलक्रो' लगाने का रिवाज है। कहते हैं कि इन्टरनेशनल
ड्रग डीलर पैब्लो ऐस्कोबार के यहाँ नोटों की गड्डी बांधने को करोड़ों रुपये के
रबर-बैंड लग जाते थे। कुछ कुछ इसी तर्ज़ पर ये छोटे-बड़े तौलिया, उनकी रख-रखाव, अलमारियां, धोने,
कलफ लगाने वाले और वेलक्रो का खर्चा भी अगर करोड़ों में नहीं तो
लाखों में तो जरूर है।
तो हुज़ूर देखा आपने ऐसी ग़रीबपरवर है ये
नौकरशाह की चेयर पर लगी सफेद तौलिया।
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