Ravi ki duniya

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Sunday, July 5, 2026

व्यंग्य : भर्ती हम करेंगे

 

जब से केंद्र सरकार को पता चला है कि उनके इतने प्रयास के बावजूद अभी भी भारत में ऐसी कुछ जगहें हैं जहां सरकारी तंत्र अपनी मनमर्ज़ी से भर्तियाँ कर रहा है। वह भी परीक्षा ले ले कर, बिना कोई फीस लिए और तो और उनका भर्ती करने का क्राइटेरिया भी बहुत भौंडा और ऑउटडेट्ड है। वही घिसा पिटा फाॅर्मूला लिखित परीक्षा ट्रेड टेस्ट बोले तो दौड़ के दिखाओ गीत गा कर सुनाओ ये बाजा बजा कर दिखाओ। अरे भई! दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी आप अभी तक इन्हीं एपटिच्युड टेस्ट और इंटरव्यू में उलझे हुए हो। ऐसे तो कर ली भारत ने तरक्की। क्या इसी बलबूते पर आप भारत को 2047 में ले जाओगे ? हमारे रहते हरगिज़ नहीं !

 

मंत्रालय दुनिया भर के कोटे भरता है। कहीं स्काउट एंड गाइड कोटा है तो कहीं कल्चरल कोटा है। तो कहीं अनुकंपा आधार पर नियुक्तियाँ हैं। अब होता ये है कि किसी स्थान विशेष पर तुरंत के तुरंत रिजल्ट निकाल कर भर्ती प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। कहीं महीनों तक कोई काम नहीं होता है। कहीं प्रश्न पत्र इतना कठिन होता है कि कोई बिना साॅल्वर पास हो ही नहीं सकता कहीं प्रश्नपत्र इतना आसान होता है कि पता नहीं प्रश्न पत्र रखा ही क्यूँ गया था। दूसरे शब्दों में कोई एकरूपता बोले तो यूनिफ़ाॅर्मिटी नहीं है। चल लिया जितना चलना था अब ऐसा हरगिज़ नहीं चलेगा। हमारे रहते तो कदापि नहीं। ये क्या ? हमारा कोई कंट्रोल नहीं। हम केंद्र हैं । बोले तो हर चीज़ हर गतिविधि के केंद्र में हम रहना मांगते हैं। हमारे बिना ना पेपर सेट होगा, ना पेपर लीक होगा। कौन पेपर कितना आसान करना है ? कितना कठिन करना है ? ये हम डिसाइड करेंगे। आखिर को तो हम केंद्र हैं। अब ये भी बताना पड़ेगा कि केंद्र का काम क्या होता है? केंद्र की क्या भूमिका होती है?

 

कल्चरल कोटा की भर्ती में सुना है कि गायक-गायिका चाहिये तो उनसे गाना सुना जाता है। ये क्या बात हुई हमारी बहन-बेटियों से गाना सुनना यह सनातन संस्कृति के बिलकुल विरुद्ध है। हम ऐसे कोई भी गाना सुनता पाया गया तो उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे। संगीतकार चाहिए तो सुना है उससे बाजा बजवाया जाता है। ये क्या बदतमीजी है? हम सब जानते हैं। कहीं कोई बाजा लोकप्रिय है कहीं कोई बाजा। भारत अखंड है। भारत एक है। अतः इन क्षेत्रीय बाजों को बजने से रोका जाएगा। 'वन नेशन वन बाजा'। ये क्या कोई बांसुरी बजा रहा है तो कोई इकतारा बजा कर ही नौकरी पा जा रहा है। कोई हारमोनियम बजा कर भी फेल हुआ जाता है। कोई पियानो जो कि सरासर अपसंस्कृति का द्योतक है उसे बजा कर नौकरी पा ले रहा है। ये अंधेरगर्दी अब नहीं चलने की। अब 'हम' डिसाइड करेंगे बिलकुल 'नीट' के माफिक। नीट पेपर रहा करेगा। पाँच हज़ार की फीस ली जाएगी प्रत्येक आवेदक से। उसे यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि वह भारत का नागरिक है। उसके लिए ये आधार कार्ड। पैन कार्ड, पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेन्स नहीं चलेगा। शैक्षिक योग्यता पर बल नहीं है। यहाँ उसकी भारतीय संस्कृति में कितनी पैठ है यह देखा जाएगा। ताकि एक सनातनी पीढ़ी का निर्माण हो सके। ना कि पाश्चात्य अपसंस्कृति लादनी है। ढो चुके जितना ढोनी थी। ये नया भारत है यह घर में घुस कर मारता है।

 

कौन पेपर कितना आसान बनाना है, बनाना भी है या नहीं। ये हम डिसाइड करेंगे। कौन पेपर कब किसको लीक करना है ये हम डिसाइड करेंगे। कौन से कल्चरल कोटा में कौन सा वाद्य यंत्र बजेगा ये भी हम डिसाइड करेंगे। हो सकता है कोई वाद्य यंत्र बजवाएं ही नहीं। यह अंत तक गोपनीय रखा जाएगा। इससे एक रूपता आएगी। पेपर में भी और उसके लीक में भी। अब से कोई यह शिकायत नहीं कर सकेगा कि जयपुर में पेपर लीक हो गया मगर बिलासपुर में लीक नहीं हुआ। अब यह लीक भी अखिल भारतीय स्तर पर होगा। यह केंद्र सुनिश्चित करेगा। अतः सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया है कि क्षेत्रीय बैलेन्स बनाए रखने के लिए 70 साल में पहली बार ये सभी स्काउट एंड गाइड, अनुकंपा और कल्चरल कोटा केंद्र से गवर्न होंगे ना कि क्षेत्रीय दफ़तरों से। आखिर हम केंद्र हैं। हमें ये हक़ पंहुचता है कि हम परीक्षा कराएं, कराएं ना कराएं। पेपर आसान बनाएँ, कठिन बनाएँ, लीक कराएं। परीक्षा जैसे तैसे हो भी जाये तो उसका रिजल्ट जारी करें, करें ना करें। यह हमारा विशेषाधिकार है। इस विषय पर कोई सुझाव अथवा ऑबजेक्शन एंटरटेन नहीं किया जाएगा। हमें पता है अर्बन नक्सल और एंटी नेशनल को हमारे ये निर्णय फूटी आँख नहीं सुहायेगा। ज़ाहिर है इनमें विज़न का अभाव है। 

 

 

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