इधर नीट का विज्ञापन निकलता है उधर जितने भी 'डार्क' और ओपन दुनिया के 'नीट' और 'नाॅट सो नीट' लोग इकट्ठे हो स्ट्रेटेजी बनाते हैं। जैसे कंपनियों के एजेंट होते हैं उसी तरह इनके एजेंट नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे जाकर इच्छुक उम्मीदवारों को उम्मीद दिलाते हैं और वो भी एक निश्चित रकम ले कर। वो और भी बड़ी उम्मीद इन उम्मीदवारों के अभिभावकों को पकड़ाते हैं कारण कि असली फाइनेंसर तो वो ही होते हैं। उन्हें बहुत रोज़ी-रोज़ी पिक्चर दिखाई जाती है। वो आनन-फानन में जो भी तय रकम है वह इन एजेंट्स को दे देते हैं। ज्यादा हील-हुज्जत की ज़रूरत नहीं पड़ती है। कौन अभिभावक नहीं चाहता कि उनका बालक अच्छे से कॉलेज से डॉक्टरी पास करे और जल्दी से जल्दी आवश्यक/अनावश्यक ऑपरेशन करना शुरू करे।
ये अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा होती है। अतः जब-जब इनका पेपर लीक होता है, जो कि अब अक्सर होने लगा है, तो बयानबाजी भी अखिल भारतीय स्तर की होती है। मसलन, एक नेता जी का कहना है कि ये अगर लीक होनी ही थी तो पहले हो जाती ताकि बच्चों को निराशा न होती। तो एक का कहना है कि बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होतीं रहती हैं। एक ने तो ये तक कह दिया कि ऐसे डॉ. जो पैसे देकर प्रश्नपत्र खरीद रहे हैं वो किस किस्म के डॉ. बनेंगे? अब इस बात पर डिबेट की जा सकती है। बहरहाल, पेपर लीक तो हो गया। यह एक प्रकार से सरकार के लिए विन-विन सिचुएशन है। अगर परीक्षा सफलता पूर्वक हो जाती है तो देखो हमारा सिस्टम हमने इतने साल में पहली बार इतने केंडीडेट्स को लेकर परीक्षा सफलता पूर्वक करा दी। अगर पेपर लीक हो जाये तो देखो हमने तुरंत इसका संज्ञान लिया और तुरंत परीक्षा रद्द कर दी। हमें अपनी नई पीढ़ी का कितना ख्याल है। जो इस लेन-देन में करोड़ों रुपये का खेल हुआ ? भाई पैसा क्या है ? हाथ का मैल है। किसी किसी जगह साल-छह महीने में आपको बनी बनाई डॉ. की डिग्री पकड़ा दी जाती है। धीरे- धीरे विश्वगुरु की छवि के अनुकूल भारत की सभी डिग्रीज़ को अंतर्राष्ट्रीय जगत 'डीरिकाॅग्नाइज़' कर देगा। आप कहेंगे आप भारत से आठवीं पास है तो वे अपने देश का पाँचवीं का इम्तिहान लेंगे तब घुसने देंगे। इसी प्रकार आप कहेंगे आप भारत से ग्रेजुएट हैं तो वो आपका आठवीं का इम्तिहान लेंगे। आपने कहीं एम. ए. बोल दिया तो वे आपकी दसवीं की परीक्षा लेना चाहेंगे। हम सनातनी हैं। हमारी शानदार परंपरा रही हैं। हम ढाई अक्षर प्रेम का पढ़ कर पंडित हो जाते हैं। आप ये बेकार कागज की डिग्री के पीछे बावले हो रहे हैं। असली ज्ञान-ध्यान पर आपकी नज़र ही नहीं जा रही। ऐ परीक्षा योद्धाओ ! अब समय आ गया है कि इस परीक्षा, इस पढ़ाई-लिखाई को भस्म कर दो, नष्ट कर दो, नेस्तो-नाबूद कर दो। इसने आखिर दिया क्या है आपको। ये डिलिवरी बॉय का काम, ये कांवड़िए का काम, ये जुलूस और रैली के लिए अथवा पाँच किलो अनाज के लिए किसी पढ़ाई-लिखाई की ज़रूरत नहीं। जो राम को भजै सो राम का होय। क्या कबीर किसी यूनिवर्सिटी में गए थे? क्या तुलसीदास किसी आई.आई. टी. के प्रोडक्ट थे ? क्या के. आसिफ ने एम.बी.ए. किया था ? ये अंग्रेज़ी शिक्षा ने हम सबको तबाह कर दिया है। आर्थिक और मानसिक रूप से खोखला कर दिया है। बस रट लो और रट के इम्तिहान पास कर लो। इतने इंजीनियर साल-दर-साल निकल रहे हैं इनके बनाए पुल और सड़क देखे हैं आपने ? इतने डॉ सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों से निकल मार्किट में आ रहे हैं। उनसे ज्यादा नयी-नयी बीमारियाँ मार्किट में आ रहीं हैं ? सबका ध्येय एक ही है सब अपनी फीस और डोनेशन का पैसा जल्द से जल्द आप ही से ले लेना चाहते हैं। तभी न आपके 36 तरह के टेस्ट, बात-बात में स्टेंट लगाने, ऑपरेशन करने, सीजेरियन करने और आपको सीधे सीधे वेंटिलेटर पर रख देने की बात करते हैं। वह दिन दूर नहीं जब आप डॉ को कहें कि आपको खांसी जुकाम है और अगला आपको वेंटिलेटर पर रख दे।
यूं देखा जाये तो आज की तारीख में ऐसा क्या है जो वेंटिलेटर पर नहीं रखा हुआ ?
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